How Krishna arranged for Prabhupada to dance (Hindi)
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में शीला प्रभुपाद जी के अमेरिका जाने के ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- भगवान की अहैतुकी कृपा और भक्तों का भाव: प्रभुपाद जी जब अकेले अमेरिका गए, तो उनका उद्देश्य केवल भगवान की सेवा करना था। वे भगवान को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उपयोग नहीं करना चाहते थे, बल्कि स्वयं भगवान की इच्छा के अनुसार पूरी श्रद्धा से सेवा में लगे रहे।
- ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियाँ:
- राजनीतिक: 1965 के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन द्वारा आव्रजन (Immigration) कानून में सुधार किया गया, जिसने विदेशी नागरिकों के लिए मार्ग सुगम बनाया।
- सामाजिक: अमेरिका की युवा पीढ़ी (हिप्पी आंदोलन / काउंटर कल्चर) भौतिक सुखों से असंतुष्ट होकर आध्यात्मिक खोज में लगी हुई थी।
- धार्मिक: उसी समय पोप जॉन पॉल द्वारा अन्य धर्मों में भी सत्य को स्वीकार करने संबंधी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया, जिससे अनुकूल वातावरण बना।
- असली चमत्कार – अटूट श्रद्धा: प्रभुपाद जी को शुरुआती दिनों में अमेरिका में अत्यधिक कठिनाइयों और संघर्षों का सामना करना पड़ा (जैसे गोडाउन में रहना, कागजी कार्रवाई की समस्याएं)। लेकिन उनकी भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा और दृढ़ संकल्प ही वास्तविक चमत्कार था, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में भव्य प्रचार संभव हुआ।
Full Transcription
यह जो दम् यह सुष्टी मायया उनकी शक्ती द्वारा देव्या दिव्य सुझती उत्पन्य करता है अवती पालन करता है अंती सम्हार करता है अजहा अजन्मा अनुवाद अथात्परे कृष्टि कृपाश्रिमूति वक्तेवेदान्त स्वामी श्रृप्रभुपाद्वान अनुवाद
हे ब्राम्हनों इसे गुविय अथा अच्छुत भगवान के कारे कलापों में विशेष आश्चर जनक मत सोचो वे स्वयम अजन्मा होकर अपनी दिवशक्ती से समस्त भवतिक वस्तुवों का सुजन पालंद था समहार करते है तात्परे जीवों के नल्भे मस्तिक्ष के लिए भगवान के कारे कलाप सदईव परवेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है लेकिन उनके सारे कारे हमारे लिए आश्चर जनक लगते है अतर वे सदा हमारी कलपना से परेवने रहते है भगवान सर्व सक्ष्टिमान था परमपूर्ण भगवान सक्ष्ट पूर्ण है लेकिन अन्य लोगों में यह था नारायन, ब्रह्मा, शिवा, देवतागन था अन्य सारे जीवों में ऐसी पूर्णता का कुछ पतिशत ही पाया जाता है कोई न तो उनके तुल्य है न उनसे पड़ा है वे अग्वितिय है
स्थापितं येन भूतले स्वयं रूप कता मैहं तदाती स्वापा दाल्तिकं मंदेहं श्री गुरो श्री उता पदखमलं श्री गुरून वश्णवाँश्च श्री रूपं साग्रजातां सहगनल गुनाथान वितं तंस जीवं साद्वैतं सावधूतं परिजन सहितं कृष्ण चैतन्य देवं श्री राधा कृष्ण पादां सहगनल लिता श्री विशाखान वितामश्च नमाओं विश्णपादार्य कृष्ण प्रश्ठाय भूतले श्रीमते भक्ति वेदान्त स्वामी इतनामिन साद्वैतं सावधूतं परिजन सहितं कृष्ण पादार्य कृष्ण प्रश्ठाय भूतले श्री राधा कृष्ण पादार्य कृष्ण प्रश्ठाय भूतले साद्वैतं सावधूतं परिजन सहितं कृष्ण पादार्य
श्रीमद्भागवतम् और भगवान के आश्चर्यजनक कार्य
श्रेवपर्वाभाजी के सन्यास का दिन है विश्वरोप चितनिमा उनके बड़े भाई थे उन्हों ने आज के दिन सन्यास लिया थी आज ये तात्पर है वह भाववी उच्छित है उसके लिए सर्वाश्चरि मैं अच्छुते
यह स्लोग पतात्पर है कि जो भगवान अलचुत है सर्वा आश्चर्यों से पूर्ण हैं आश्चर्य मये मये मतलब संपूर्ण पुरा संपर्ण संपन्न हूँ आनन्मयो भ्यासात परब्सत्न जो होता है उनको आनन्मय मतलब आनन्से भरे हुए, आनन्से परिपूर्ण है
यहाँ पताय जा रहा है कि जो भगवान है मामंस्थायेतदाश्च के सुतकोस्वामी नमिशारन्य शौनकाति रुश्ये उनको बता रहे हैं कि भगवान ने क्या किया जो ब्रह्मास्त्र आया है इसको का प्रतिकर करना लगवग नामुंकिन है तो उसका ना केवल यहाँ पे दो चमतकार भगवान ने किये
एक चमतकार खा कि जो ब्रह्मास्त्र इसका प्रतिकार करना लगवग नामुंकिन है उसका प्रतिकार किया होने पर उससे बड़ा बड़ी बात है जो ब्रह्मास्त्र तेज़े से आ रहा था उत्तरा पाही पाही कृष्ण को उनको बला रही थी उस समय ब्रह्मास्त्र ने आके विश्वा चिठुपर बताते है कि जो उनके गर्म में परिक्षित था शिशू उसका उवत कर दिया पर भगवान ने अंदर प्रवेश करके पुना परिक्षित को जीवित कर दिया और न केवल जीवित किया परिक्षित को दुष्टी ने दे कि देखे कैसे भगवान उनको बचा रहे है और फिर भगवान ने दर्शिन दे
भगवान एक पल में अगर चाहे तो अपनी इच्छा से भी वो प्रम्हास्त्र का प्रतिकार कर सकते हैं पर भगवान ने एक रूप धारन किया जो परमात्मा का रूप है वैसे ही रूप नो धारन किया और वे उस गर्ब में प्रवेश किये अब प्रवेश करके हमने उसका प्रतिकार किया
ऐसे क्यों किया ताकि परिक्षित देख सके यब वो बालक प्रिक्षित में देखा तो फिर वो जो सुती थी जीवन भर उनके साथ रही कौन थे वे भगवान जो मुझे बचाने के लिए आये थे और वही भगवान की खोज जो जीवन भर करते रहे और जिस तरह से अभी जो ब्रह्मास्तर आया और उससे भगवान ने स्वयम बचाया वैसे ही भागवतम के बार अले स्कंद में पढ़ना आएगा कि तक्षक का एक अस्तर रक्षक रुपी एक अस्तर आएगा जो परिक्षित का वद करना चाहेगा तो क्या तभी भगवान ने सरक्षिन नहीं किया
तभी भगवान ने सरक्षिन किया तभी भगवान भागवतिर कथा के रूप में आउतार लिके उन्होंने परिक्षित मारत का सरक्षिन किया कि शरीर का तो बिनाश अनिवारिय है पर भगवान ने तभी जो उनको अपनी कथा का स्मर्ण उसमे लीन करा दिया
कथा श्रवण और भक्तों की सुरक्षा
तीसर स्कंद में कपिल्लेव जब माता देवभूति को उपदेश दे रहे हैं तभी वो बताते है वो बताते है कि जब भगत मेरे आशराई विहन करते हैं कैसे? कथा मृष्टह मृष्टह मतलब बड़े आनन से बड़िवे कथा होती है और कैसे ऐसा आशराई विहन करना है?
सुन्मन्ति कथा यंति चाह श्रवन करना, कथन करना पर इससे क्या होता है? तपंतिवित्ह स्तापा इस भोतलर जगत में आन एक प्रकार के ताप है जिनसेझेव आत्मा जवद तप जाता है
तपनतिवित्ह स्तापा नैतान मद गत चेत सखा नाईतां वो मेरे बखत को परिशान धी करते है मद गत चेत सखा मद माद लोगि उसने मेरी अपनी जी चेतना हैं मुझे हरपन करती हैं
तो ये कैसे संभव हो सकता है कि इस अगर दुनिया में दुख है तो भक्त दुखी न होगा लोगि मद्गत चेतसा इसके लिए उधारण ले सकते हैं कि अगर बाहर बहुत गर्मी है तपन्ती पर कोई व्यक्ति कोई एर कंटिशन रूम में आ जाता है तो फिर बाहर सारी गर्मी हैं पर अंदर उसको बिल्कुल गर्मी महसूस नहीं होती हैं
तो उसी तरह से हम जब भगवान का स्वण करते हैं तो मान लेज़े हम एक कृष्णा कंटिशन रूम में प्रवेश कर लेते हैं तो जैसे ही हम वो भगवान का स्वण करते हैं तो तपन्ती विधास्तापा नैतान मत गदचीतस पर हम वो उसने प्रवेश करने के ज़वापे बाहर वो गर्मी से ज़वापे थे तुम इतनी गर्मे क्यों हो याँ थे तो बहुत आजाओ अंदर आप वो गर्मी नहीं लगेंगे
इंसें इंग्लिएश में कहावत होती है डोंट टेल गौड हाँ बिग योर प्रॉबलंस हैं कि अपने समस्याओं को बताओ भगवान कितने बड़े हैं
भगवान का आश्रे ग्रहिन करेंगे तो फिर सारे समस्याओं हैं जो रहेगी पर हमें उद्धियों नहीं करेंगे
मचित्ता सर्वदुर्गाणी मत प्रसादात तरिश्यसी अतः चेत्तम अहंकारा नश्रोश्यसी विनंश्यसी
अठ्रवे अध्याय भगवान के अठ्ठावन विश्लोक में भगवान बोलते हैं मचित्ता अगर आप मेरी चेतना में लग जाते हों सर्वदुर्गाणी मत प्रसादात तरिश्यसी आप तरं कर लोगे कैसे तो फिर बिनंश्यसी आप गुम्राहा हो जाओगे
तो भागवतम इस पसंग से हमें दिखा रहा है कैसे भगवान अपना आश्रे प्रदान करते हैं और दो आश्चर जनक कारय थे जो ब्रह्मास तरफ अतिकार करना और जो मृत हो गए उसको पुनर जीवित करना तो ये दोनों बड़े आश्चर जनक हैं पर विपी सुद्धवस्मानी पता रहे है कि मामंस्तयेतदाश्चर्यं इसमें आप कुछ आश्चर की बात मत करो क्योंकि भगवान सारे आश्चर से बड़े हुई है
सरवा आश्चरि मये चुते और उनका आश्चर क्या है मुझे उधारन ले रहे है इसके लिए कि ये तत माया देविया कि यो माया की शक्ति तो यारवा क्या करते है इस भौती जगते सुझत्य वत्य हंत्य अजा कि भे भगवान उनको कुछ प्रफाव नहीं होता है पर वह इस भौती जगते पालन करते है विनाश करते है
अगर हम इसके विचार करेंगे कि ब्रह्मान इतना विशाल है हम छोटा एक घर बनाना चाहते है वो उसके लिए इतनी समस्या लगते है कमप्यूर्ट पर एक प्रोग्राम लिखना होता है उसके लिए इतनी समस्या होती है तो भूरा ब्रह्मान अगर बनाना है कितनी समस्या होगी उसके लिए पर भगवान कैसे करते है सोते सोते अपने सपने में हो जाता है क्यों? क्यों? उत्तारनियस्य भवसंभवलोपहेतो
तो आप सारा भवः है इस सारी सुश्टी है सारा ब्रह्मान इस सुष्टी करते है पालन करते है उसका विनाश करते है अगर वो करने के लिए आपको कुछ समस्या नहीं है तो मेरे बंधन का विनाश करने के क्या समस्या हो सकते है।
भगवान की अहैतुकी कृपा और भक्तों का भाव
तो फिर भगवान कहते हैं, वक्षना शक्या को बताते हैं, आचारे अंपर आते हैं वहाँ पे, कि भगवान कहते हैं कि ठीक है, यह समस्या नहीं है, पर मुझे करने के लिए तुम्हारा बंधन को चुड़ाने के ज़रून भी क्या है।
तो होते है, मूर्धेश्वेन अनुग्रहात बंधो, कि जो महान लोग होते हैं, महत, तो उनका सवभाव होता है, कि जिसकी कोई पातरता भी नहीं है, उस ते भी वो कुर्पा करते हैं.
येसे, कोई बड़ा रईस विख्ति है, तो उसको कोई नौकरी मांगने आएगा, नौकरी देते हूंगे, तो फिर नौकरी जब चाहिए, तो फिर उसके पातरता देखेगा, तुम्हारे तुम्हारे आनुभव क्या है, तुम्हारे डिग्री क्या है, क्या क्या कर सकते हो, तुम्हारे पतिभाई क्या क्या है, पर अगर कोई भीग माँगने आता है, तुम्हारे डिग्री क्या है, पूछते लिए, क्या, तो जो कृपा है, वो कोई धन्दा नहीं है, कृपा ये क्या है, भगवाने बस दे, दिक्षा दे रहे हैं हमसे, तो इसलिए, वो कहते है, जो महार नेक्ती है, वो पात्रदा नहीं देखते किसे के, उनके कृपा दरने का सभाव होता है, बुड़ेश्वाई महधनुग्रात बंधो, तो आर्त बंधो, जो इस दुनिया में आर्त है, बड़े दुखी है, उनके अब बंधो, और फिर, भगवान वहाँ पर बोले है कि, चक्रोजबाद बताते है कि, पार, इतने सारे लोग मुझे कृपा याश्णा करने के लिए आजेंगे, मैं तुम्हें कृपा दे?
भगवान बताते है, किम ते न ते प्रिय जनान अनुसेव तामना, यह मेरी पातरता है, मैं तुम्हें पातरता नहीं बोलता कि, मेरी, आप मुझे कृपा देने चाहिए क्योंकि, मैं आपके भगवान की सेवा कर रहा हूँ, किम ते न ते प्रिय जनान अनुसेव तामना, हाँ, तुम मेरे भगवान की सेवा करो, तुम जरूर आपको कृपा देखेंगा, तो परलाद महराज नारद मनी की सेवा कर रहे हैं, तो यह यहां पे, पहले बता रहे हैं परलाद महराज की, आपको किसी के भी भौतिक सुष्ट्री, भौतिक बंधन का, विनाश करने के लिए कोई समस्या नहीं है, और व्यक्ति की पात्रता भी नहीं है, तो भी आप कृपा करने का सुभाव है, और खास करके जो आपके बक्तों की सेवा कर रहे हैं, उन पे आप कृपा कैसे नहीं कर सकते हैं, तो कृपया आप मुझे अपनी कृपा दे देखें, तो बासता में यहाँ जो भाव है, भगवान की कृपा एक तरह से सत के लिए हैं, पर खास करके जो उनके बक्तों की सेवा करते हैं, भगवान के ओर और पपाल होते हैं, क्यों ऐसे है, क्योंकि भगवान की इच्छा होती है, कि अपने भक्तों की इच्छा पूरी करें, भगवान की इच्छा क्या होती है, अपने भक्तों की इच्छा पूरी करें, पर साधार अंतया जो भक्तों होते हैं, वो ऐसे इच्छा नहीं करते हैं, कि भगवान मेरी इच्छा पूरी करें, भगवान मेरी सेवा में लग जाये, ऐसा भगवान, भक्तों का कोई नहीं होता है, कि प्रहुपा जी जब अमेरिका जा रहे थे, तो प्रहुपा जी ऐसे इच्छा नहीं होती है, कि कृष्णा आखे साब को बता देगे, तो भक्त भगवान की सेवा करना चाहते हैं, पर भक्त भगवान को अपनी सेवा में नहीं लगाना चाहते हैं, भले उनको सेवा करनी हैं, हम जानते हैं, वो रभुनातरस कस्वंग के संदर हैं, जब वो जब कर रहे थे, वहाँ पर एक शेर आ गया, और जब शेर आ गया, वो नती के तक्पे थे, और वहाँ पर वो शेर उनके बाजु में था, और सनादं गोस्वानी दूर से देख रहे थे, कि भगवान कृष्ण आखे दंडा लेते हैं, और वो रभुनातरस कस्वंग बचा रहे थे, तो एक तरह से यह रभुनातरस गोस्वानी की भहिमा है, कि भगवान स्वाहिम उनके रक्षिण के लिए गया, अवसर रक्षिबे कृष्ण, तो वो जप में मंगना थे, नहीं तो उन्होंने शेर को देखा, नहीं भगवान को देखा, वो सिर्फ हरे कृष्ण महावंतर की जप में लिए थे, पर जब स्वाहिम गोस्वानी देखा, तो उनने क्या कहा, कि आप हरे कृष्ण महावंतर जप कर रहे हैं, मतलब भगवान से यासना कर रहे हैं, कि आप मेरी सेवा करो, पर आप आपके वैराग्या के नाम पर क्या कर रहे हो, आप कहे रहे हैं, मुझे कृष्ण महावंतर नहीं चाहिए, कृष्ण महावंतर नहीं चाहिए, आपको खतरा जाले, तो भगवान को आपकी सेवा करने के लाना पड़ता है, तो भगतों का भाव क्या होता है, कि हमें भगवान की सेवा करनी है, पर वो सेवा करने के लिए भगवान को हम निउजित नहीं करने चाहते हैं, जरुम हम भगवान की आश्ना करते हैं, पर ऐसे नहीं है कि भगवान को जादू कुई कार करके हमारे लिए मदद करें, भगतों से उसते चाहते हैं कि हमें परिशन करना चाहते हैं, तो फिर अगर भगतों को सेवा करनी हैं, भगत की सेवा करने के लिए इतनी इच्छा होती है कि वो व्यक्ति अकेले कभी कुछ में सेवा नहीं कर सकते हैं, कि भगतों की इतनी इच्छा होती है, कि जो महान भगतों होते हैं, कि तो वो अकेले शार्रिक रूप से उसते सेवा नहीं कर सकते हैं, तो इसलिए तो भगवान की इच्छा है कि ये भगत की इच्छा मैं पूरी करूँगा, पर वो भगत शार्रिक रूप से एक लगती है, दो हाथ है, दो आखे है, शार्रिक रूप से वो बाकी सब जैसे ही है, जो शद्धा और भगती है वो बहुत प्रतीम है, पर शार्रिक रूप से वो अकेले ही है, तो तभी वो अकेले कितनी सेवा कर सकते हैं, तो उनकी सेवा करने की इच्छा उनकी एक शम्ता से बहुत अधिक होती है, तो इसलिए अगर कोई जीवात्मा इस भौतिक जगत से, कोई साधक हो, वो भक्तों की सहयता करने लग जाता है, तो फिर भगवान उझ जीवात्मा करती के दर्दे करते हैं, बड़े कुछ क्यों जाते हैं, क्यों? क्योंकि वो भगवान को अपनी इच्छा पूरी करने में वहयत कर रहा है, मैं पता रहा हूँ समझ रहा है, भगवान यहाँ पह है, भक्त यहाँ पह है, भक्त इस दुनिया में भगवान की सेवा करना चाहते हैं, पर भक्त नहीं चाहते कि भगवान इस दुनिया में आखे, जो मैं करना चाहता हूँ करवा, तो फिर इस दुनिया में अगर कोई वेक्ती आता है, वो भक्तों की मदद करता है, जो महान भक्त की मदद करता है, तो क्या होता है, भगवान इसके कृतग्यों जाते हैं, कि तुम मुझे मेरे भक्त की इच्छा पूरी करने में मदद कर रहे हो, और इसलिए वो वेक्ती की पातरता भी न हो, तो भी भगवान उसका शुद्धी करना आज तेरी से कर देते हैं, उसको सक्षम बना देते हैं,
प्रभुपाद का अमेरिका प्रस्थान और भगवद्भाव
और इसलिए हम देखते हैं कि शुद्धी प्रहुपा जी जब अमेरिका गए, तो वो क्या कह रहे थे, मेरी पातरता क्या है, प्रहुपा जी जब अमेरिका गए, तो वो नहीं कहा ये कि मैं आध्यात्मी प्रेगल से आया हूँ आप सबको उठा के लिए, प्रहुपा जी कहा मेरे गुरुदेव ने आपको मिझे लिया है, प्रहुपा जी, जो दो घीतों ने लिखे, जलदूत में, मार्कीने भागव जो अरिनाम फैल जाएगा, और वो भगवान से प्रातुना करते हैं, तो क्या प्रातुना करते हैं, कि भगवान मुझे मेरे गुरुदेव की इच्छा करने ने मार्कुन करूं।
और तभी हम जब प्रहुपा जी अमेरिका में गए, तो फिर हम देखते हैं क्या चमतकार हो गया। प्रहुपा जी, ये शद्धार, वो उनके जो मार्कीने भागव धर्म जो घीत है, उसमें दिखाते हैं। साथारं दया, अगर कोई योध्धा बड़े कठिन युद्ध पर जा रहा है, तो फिर उसकी विचारधार के कैसे मैं आकरमन करूंगा, कैसे शित्व को करूंगा। तो उसने अगर अपना डाएरी लिखा हुआ है, तो बाद में अगर वो जीत जाता है, तो कैसे तुम्हें योध्धा बड़े, तुम्हें क्या विचार था, और देखने में बहुत अच्छा लगेगा।
तो प्रभुपा जी एक बड़े युध्ध पर जा रहे हैं, अकेले, क्या है सारे पास्चात्र संस्कुर्ति, जो भोतिकाली संस्कुर्ति है, उसके खिलाप युध्ध करने जा रहे हैं। और प्रभुपा जी की चेतना क्या है, वो इस मांके में भागवत धर्मन में दिखाते हैं। पर जो पहला भाग था, वो लिखना बड़ा मुझ्किल था। वो बोलते है, कि मुझे लगबब एक सो एक लोग मिले, जो बताया थे, मैंने भक्तिवान स्वाली को आईडिया दिया, कि आप अमेरिका में जाओ। तो जो कार्य हो गया, उसके लिए श्रेय रहने के लिए बहुत से लोग आपे आगे। तो फिर वो बोले, इसमें से कौन सत्य बोल रहा है, कौन असत्य बोल रहा है, वो समझना बड़ा मुझ्किल था।
तो इसलिए पहला वोल्यूम जो था, वो लिखना, उनको बहुत समझन करना बड़ा आपे बाद में वो लिखे। तो इसलिए तभी जब प्रावपाजी, उसके बाद में बैसेट, त्रैसेट, चौसेट, तीन सालों में ने पहला भागवतम का वोल्यूम था, पहला केंटो, उसको तीन वोल्यूम में चाहिए था। प्रावपाजी का भाव, जो मातिरे भागवधर्म में दिखते हैं, वो क्या कह रहे है, कि मैं भागवतम को लेकिजाने वाले केवल कूली हूं।
जो भागवतम है, वह सब को परिवर्थिक करेंगा। इसलिए, अगर हम ये मातिरे भागवधर्म लग पढ़ेगे, तो उसके प्रावपाजी की चेतना क्या है, वो पूरे भागवतम के जो दूसरा अध्याय है, पहले सकन्द का, उसके जो शलोक है, श्रुवतां सो कथा क्रिष्ण, पुन्य श्रोन कीर्तन, वो सब लंभी शंक ला है, उसी शलोकों के 1.2.6 से 22 तक, वो उस शलोकों पे प्रावपाजी ले नीव बृंदावन में, बाद में, बहुत पसुद्ध प्रवचन की दिये हैं, और यो धर्म जो अध्यात्म का राजमार नाम की छोटी जी गिताब हैं, वो हम प्रवचनों पे आधार रहते हैं
तो यह जो शलोक है, सम्पूर्ण, जो शिम्द भागवतम की 335 अध्यार हैं उन में से सबसे अधिक, किसी एक अध्यार से अगर प्रावपाजी शलोक कोट किये है तो वो है पहले अध्यार का दूसरे अध्यार से तो यह बहुत महतूर्ण था प्रावपाजी के लिए प्रावपाजी का क्या भाव था? कि अगर मैं भागवतम ले जाओंगा और लोगों को भागवतम सुनाने को लगाओंगा अगर भागवतम सुनेंगे तो क्या होगा?
प्रावपाजी को कहते हैं इसी गीती में आगेने भागवतम में कि भागवतेर कथा से तब अवतार धीरहया शुन जदी काने बारबार तो जो बेंगालिया बड़ा भिंदी मराकिस समान में तो क्या है? भागवतेर कथा से तब अवतार कि ये प्रावपाजी जो भागवत कथा है यह आपका ही अवतार है और अगर कोई शुनी जदी बारबार, अगर बारबार कोई शुनता है तो क्या होगा?
धीरहया, वो में ती धीर ही हो जाएगा धी, जो रजस्तम भाव हो जाएगा, वो सब से मुक्त हो जाएगा तो प्रावपाजी का भाव क्या था उस गीत में? तो प्रावपाजी जब जा रहे हैं, अकेले अमेरिका तो वो क्या, वो नहीं सोचे की, मैं ऐसे बाशन दूआ के सबको प्रावपाजी का क्रुपा हो जाएगी, तो फिर क्या होगा, सकल ही संभव होगा सब कुछ संभव होगा, सब कुछ संभव हो जाएगा, क्यों? तुमी से कौतू की तुमी से कौतू की मतलब, आप हर प्रकार का चमतकार कर सकते हैं सरवा अश्चरी में यह बताया है, आप सब प्रकार का चमतकार कर सकते हैं प्रावपाजी का क्या कह रहे हैं, वहाँ पर वहाँ भाव एक करते हैं कि भागोतम का जो रस है, यह इतना उंचा है यह रजितम होन के लोग हैं, यह कैसे समझ पढ़ेगे तो उसके लिए मैं भगवान के पाढ़ना करते हूँ
अखिला जगत गुरू बचन से आमार अलंकृत कोरी बार कामता तौमार बोले अखिला जगत गुरू, आप सद के गुरू हो जो श्रावन करने वाले हैं मुझसे, उनके भी आप ही गुरू हो आप उनके रुदे में जिमान हो और आप क्या करो, अलंकृत कोरी बार आप मेरे जो शब्त हैं उनको अलंकृत करो आप इस तरह से मिझसे वचन बोला आओ, जिससे कि वो समझ पाए और परवपाजी नहीं कह रहे है, उनका नमर्दा भी देखी है वो ऐसे नहीं कह रहे है, कि आप मुझे शक्ती दो कि मैं ऐसे वचन बोलूं, कि उससे उनका रुदे परिवारत हो जाएगा परवपाजी बोल रहे है, मैं जो वचन बोलूंगा, मैं ही बोलूंगा पर जब मैं वचन बोलूंगा, उसको आप अलंकृत करो उसको आप अलंकृत करो, और तर क्या होगा उससे? उससे परिवारतन हो जाएगा उनका
आप रवपाजी महाँ बताते हैं, जो हो कि आने आच्छे जड़ी प्रभू, आने आच्छे जड़ी प्रभू अगर आप मुझे यहां पर लेके आए हो, आपको ज़रूर कोई काम होगा, तो क्या होते हैं? तो नाचाओ नाचाओ प्रभू, नाचाओ से मांते काश्टेर पुतली जड़ा, नाचाओ से मांते कहते हैं प्रभू, अगर आप मुझे यहां पर लेके आए हो, तो ज़रूर काम होते हैं, ज़रूर काम नाचती है, ज़रूर काम नाचने वाला होता है उसके अच्छार, आप इसे ही नुचाओ
तो प्रभू पाजी जब अखेले गए, उनको वास्तो में क्या होने वाला है, कहां जाने वाला है, कुछ भी पता नहीं था तो जब प्रभू पाजी नियोग में गए, तो वहाँ पर उसके पहले राम कृष्ण मिशन का एक आशरम वहाँ पर था तो वहाँ पर उसके अधिर्शेवे स्वामी निकिलानन्द में प्रभू पाजी से बोले, कि जो अमेरिका में है, यहाँ पे आप आप अगर मास नहीं खाओगे और शराब नहीं पिओगे, तो यहाँ पे जीवती नहीं ले सकते हैं यहाँ पे इतनी धन्डी है और यहाँ पे वातावर ऐसे है कि यह खाना बहुत जरूरी है और अगर आप शर्ट पैंट नहीं पहनोगे, अगर आप चमच से खाना नहीं सिखोगे तो लोग आपको कु संस्कुत मानेंगे, अंकल्चर मानेंगे पर कोई आपको सुनने को नहीं आएगा तो हुआ क्या वास्तव में? बहुत लोग प्रहुपा जी को सुनने को आगे, उनके पार सुनने को जो अतने आते हैं उतने ही आते रहे और कुछ हुआ नहीं तो प्रहुपा जी येसे बोले थे कि उनका वास्तव में कैसे हो गया?
अस्ट्राजिया लग बात, जो हिट्टी लोग वहाँ थे वो कुछ तो भी दुनिया से अलग करना चाहते थे और जब प्रहुपा जी को नहीं देखा चिरादर उपनान भगवान की प्रहुपा जी को नहीं देखा तो हम बोले कि ये तो इतने ऐसा लगती है हमने कभी देखा ही नहीं है तो उससे वास्तव में आकरशेत हो गया
ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियाँ
तो अभी मैं जो उस समय के एतिहासिक और समाजिक परस्थति है उसकी बार मैं परा वरहन करूँगा कैसे अगर हम कहते हैं कि भगवान योजना करते है बक्त के लिए तो उसका मतलब क्या है अगर हम कहते हैं कि भगवान को प्रहुपा जी नहीं भगवान प्रहुपा जी को भगवान एम्पावर करते हैं हमें शक्ति देती हैं शक्ति देती हैं उसका मतलब क्या है उसके अलग अलग मतलब हो सकती है
एक तो ऐसे नहीं है कि शक्ति देती मतलब कोई भी समस्या नहीं आते है ऐसे नहीं समस्या आती है पर जो वास्तों में असली एम्पावर्मिंट असली शक्ति क्या है कि समस्या आजाए व्यक्ति आजे फिर भी व्यक्ति का दुर्शंकल्प है वो कभी नश्ट नहीं होता है
आपने शायद पहले कभी पुराने जो पहले रामायंड वगे आता था तो उस समय अगर वो दो योध्धा योध्धा कर रहे हैं तो लक्षमा इदर से तीर छोड़ता है इन्डरजीद इदर से तीर छोड़ता है तो दोनों तीर का ठक्कर होता है और फिर इंडरजीद का ठीर निशे के जाता है तो लक्षमा का ठीर आगे चलते रहता है तो वैसे वो चित्र उप से दिखा रहे है तो वैसे ही क्या होता है भक का दुर्शंकल को होता है और दुर्शंकल और जो दुनिया से समस्या आते हैं इन दोनों का ठक्कर होता है तो क्या होता है जब वो ठक्कर होता है तो हमारा दुरशंकल बगिर जाता है पर जो बहान भक्त होते हैं समस्या आती है तो उनका दुरशंकल इतना बनाए रहता है क्योंकि समस्या गिर जाती है और वो आके चलते रहते हैं तो ऐसे नहीं है कि प्रभुपाजी की समस्या नहीं आए
पहले ज़े प्रभुपाजी नियोर्ख में गए हम जानते हैं बाद में बाउरी में जाकर रह रहे थे बाउरी मतलब जहाँ पर यहां से चालिया हम दे है जो वैसे वो जगमें रहे थे पर उसके पहले भी प्रभुपाजी यहां पर रह रहे थे वो वास्तमें हम जानते हैं प्रभुपाजी कार्गो शिप से गए कार्गो शिप मतलब मालगारी जैसे होती है मैसे मालगारी से कोई ट्रावल करता है तो वो बिलकुल सुभिधा नहीं होती पर अमेरिका में जाकर जो पहले रूम में जहाँ प्रभुपाजी रह रहे थे वो वास्तव में एक गोडाउन था तो उसमें कोई हवा लेकिन जगह नहीं थी और उसमें कोई बातुर्ण नहीं था तो लंबा चलके वहाँ बातुर्ण में जाना पड़ा था और वहाँ पे बैठने के लिए चीज़ जगह नहीं थी और अगर कोई मिलने आया तो वो देखेगे ऐसे है यह अन्धारी कोटली जैसे है यहाँ पे कौन यहाँ पे क्या ग्यान की जोती मुझे मिलने वाजी है यहाँ पे पैसे लगेगा और तो वहाँ पर प्रभुपाजी रहे थे रोना का जो वाच्च्मैन था उसने प्रभुपाजी का टाइप रेटर छोड़ी करने है तो आज मैंने सरक्षिन करने है वो ही छोड़ी करने है तो वासिते में बहुत समस्या प्रभुपाजी का आगाप्पे आगे है पर तो भी प्रभुपाजी का तुलसंकल गना आएगा
पर जो है भगवान भी योजना कर रहे थे उसने भगवान कैसे योजना कर सकते है हम ये कलपना भी नहीं कर सकते है तो प्रभुपाजी, तो मैं तीन जो एक धार्मिक, एक राजनेतिक, और एक सामाजिक तीन परस्थित्या जो भी, जिसके खारण प्रभुपाजी को सुभिधा मिल रही जिससे कि प्रभुपाजी प्रचार कर पाए
तो क्या हुआ जो प्रभुपाजी अमेरिका में गए तो प्रभुपाजी का दो महने का वीजा था दो महने का सिर्फ वीजा था और दो महने के बाद इनको भारते आपस आना पड़ा है तो वास्तव में, अमेरिका की सर्कार यह काफ़ी स्ट्रिफ्ट है वो कोई गरकान लोग से कोई आता है तो रहने नहीं देते इनको और अगर प्रभुपाजी को अमेरिका से कोई रेकमेंडेशन नहीं मिलेगा कोई अमेरिका के नागरी बोलेगे के नहीं हम को यहाँ पे, यह हमारे शिक्षक है, हम को इनसे फायदा हो रहा है हम चाहते हैं कि आप यहां पर रहे हैं या फिर बड़ी प्रमार्ण में लोग आते हैं और वो बोलते हैं कि यह व्यक्ति हमारे लिए बड़ा महद्वपूर्ण है तो फिर उनको, जो उनको रहने को मौका देते हैं जैसे कि यह भारत के सरकार के इतनी, इतनी दुरफाजी की बात है कि प्रवाजी के अनेक शिश्य हैं जो भारत में हैं भी पर अभी तो वो सब प्रवाजी की शिश्य हैं जो इसकान में अभी गुरुवर्ग हैं वो सब बड़ा प्रचार कर रहे हैं और वो भारत लोगों भारत संस्कुति चिकाते हैं पर भारत की सरकार उनको भारत में नागरी के लड़ने के इजासत नहीं देती
और अगर भारत की सरकार को जाके बोलते हैं कि ये इतना सारे लोग प्रचार करें, इतनी सब हैं गुरुवर्ग हैं वो तो गुरुवर्ग हमारे देश में बहुत है, आप जाओ अपने देश में प्रचार कर और फिर आप भारत की सरकार से परमिशन प्राप करने के लिए उनको दिखाना पड़ता है कि भौतिक स्थर पर आप क्या करते हैं अगर फिर उनको बोलते हैं कि अगर इतनी सारे गरील लोगों को हम खिला रहे हैं, इतनी सारे पाटशालाई चला रहे हैं, या उसके लिए ज़रूर रहो आप, ज़रूर रहो आप तो क्या होता है, यानिशा सर्वभूतानं तस्यां जागते से जब तो भारति सर्कार जो है, अगर कोई आध्यात्मिक कारे करता है तो उसके लिए कोई, उसके कोई कीमत भी नहीं देती है
तो प्रभुपार्जी जब मिन्दिरा गांगी से मिले थे, तो तब पहला निवेदन उन्होंने किया जब भी किसे राजनतिक को मिल से थे, तो क्या हो रहा था जब प्रभुपार्जी मायापुर मंदिर बना रहे थे, बॉंबेल मंदिर बना रहे थे तो क्या हो रहा है, हर दो, तीन, यहाँ से आज 6 मेगे बाद है साब जो भक्ते उनको भारत से बाहर जाना पड़ता था नेपार में जाओ या कहीं और जाओ, और कुछ दिनों के लिए बाहर जाओ और महां से वापस पर्मिशन लो और वापस भारत में आ जाओ
तो प्रवापा जी बोल रहे थे भी, इससे वो जो सारी सेवा है, उससे मैं मुबाईल वगे नहीं था, अगर निपार में जाएगा तो कोई कौंटाक करना बड़ा मुझ्किल था अभी प्रवापा जी बड़े निवेदन करते थे, तो वैसे ही अमेरिका में किसी दुसरी देश के लोगों आने को मौका देना बड़ा मुझ्किल होता था, मौका देते नहीं आना
पर जो 1965 में प्रवापा जी, हम जानते हैं कि August में निकले, September में पहुँझे, September में पहुँझे, October एंड में, November के लगबर 12-15 तरह को दो मेनीं ख़तम होके प्रवापा जी को भारवाना पढ़ता था तो उसी महले के October के एंड में, लगबर 29-30 उक्टोबर को, जो जब अमेरिगा के प्रेज़िडन्ट थे और प्रेज़िडन्ड जॉनसन, उन्होंने एक लॉब पास के था और वो लॉब Immigration भारतियों के लिए उपन कर दिया, कि भारते लोग जितना चाहे उतना आ सकते ह और वहाँ पे रहने को मुझे मौखा मेलेगा
पर जब शद्धा से कोई लगती कारे करता है तो भववान कैसी योजना बनाएगी इसकी कोई कलपंबर नहीं कर सकता है और उसी तरह से तो ये एक राज्ञातिक तरह से हो गया था
और फिर सामाही तरह से क्या हुआ गया था कि उस समय जो अमेरिका के युवा पीड़ी थी वो भावतिक सुखों से बड़ी ही असंतुष्ट हुए थी तो उसको उसमें काउंटर कल्चर कहते हैं काउंटर कल्चर मतलब जो संस्कुति है उसके दुर्द जाना है तो संस्कुति का साधारन क्या भावत था कि आप पढ़ाई करो फिर आप नौकरी करो फिर आप विवाह करो फिर आप आपका अच्छा करियर बनाओ पहले जो युवक थे वो उनको हिप्पी कहा गरते हैं वो सारे संस्कुति के परेशले थे और कहने लगे कि इस सारे जिवन में क्या लगा कर रहा है तो ऐसे क्यों हो रहा है क्योंकि 1940 में, 40 से 44 जो दुसरा महाँ युद्ध होगा उसमें जो अमेरिका, इंग्लेंड, फ्रांस ये सब जीद गए पर उसमें जो युद्ध अधिकान सुप से जो यूरोप में हुआ था तो इसलिए पूरा यूरोप उद्धवस्थ हो गया फ्रांस उद्धवस्थ हो गया, इंग्लेंड उद्धवस्थ हो गया तो इंग्लेंड उसके बाद में पूरा इंग्लेंड की शुक्ती थी उससे पूरे कतम हो गया पर अमेरिका यूद्ध में जीत गया पर अमेरिका को अमेरिका की शेतर में कुछ यूद्ध नहीं हुआ था वास्तद में अमेरिका की शेतर बाकी साथ देशों को वो वो सारे बाद अस्तध सस्थ दे रहे थे और सारे बाद देशों को पैसा प्राप्ट कर रहे थे तो क्या हो गया?
अमेरिका के बाद बहुत पैसा कर रहे थे और जो पोस्ट वार जनरेशन थी जो यूद्ध के बाद में जो पीड़ी थी वो फूरे एशवाराम से रहे लगे और उस पीड़ी के जो पुत्र थे पुत्र पुत्रिया थे वो बच्पन से एशवाराम रहे थे तो जो भौतिक सुख चाहिए बच्पन से उनको मिल रहा था और जो भौतिक सुख बच्पन से मिल रहा है उसको जो भी उन्होंने अनुभव करना है अगर वो सब अनुभव कर लिया तो इसमें कुछ है नहीं है और कुछ होना चाहिए नहीं है और फिर उस समय तो ऐसे परसिती थी उस समय प्रावपाजी महाँ पे गए और वो सारे जो युवग थे वो अध्यात्मा के बारे में खोज रहे थे अगर कभी कभी हम सोचते थे प्रावपाजी को 1922 में मक्तिसान सुठाकूर ने आदेश दिया प्रावपाजी 40 साल तक क्यों नहीं थे भगवान कुछ नहीं योजना पनाये कि जब अमेरिका के लोग सबसे अधिक परिपक्व थे तभी प्रावपाजी को होने देजा थे तो बराबर अगर प्रावपाजी 10 साल तहले 10 साल बाद में आदे थे भगवान कुछ भी सबस्कार कर सकते है तो कभी भगवान कुछ शुद्धा पर प्रचार कर सकते है पर जो एतिहास प्रुक्षन लेकते है समाजिक परसुति बहुत अनुकूर थी तभी अनुकूर मतलब ऐसे नहीं के वो तो प्रावपाजी आगे सबको धन्डवत कर दिया ऐसी बात नहीं है पर वो आध्यात्मी खोज नहीं थी फिर भी प्रावपाजी को कितने सारे समस्याई वहाँ पे लेनी थी उस पर में अंत में आओंगा
और तीसरी जो घटना थी, तीसरी जो परसुति क्या है कि जो जो ये अलग-अलग धर्मों होते हैं उन सब का सिभधानत अलग होते हैं ऐसे हम कहते हैं कि अल्ला, जिहोवा, क्राइस्ट, कृष्णा ये सब एक ही है, ये सब एक ही भगवान है पर बाकिर सब धर्म ऐसे नहीं सुझते है अगर इस्लाम हो, क्रिश्चानिटी हो वो क्या सुझते हैं, कि हमारे भगवान है अकेले भगवान है और बाकिर सब धर्मों के भगवान है वो क्या है, वो भगवान नहीं है वो सैतान के रूप है वो सैतान के रूप है और इसलिए हम देखते हैं कि जब मिसल्मान लोग जो आते थे वो अगर कुसी भी राज को जीत ले जाते हैं तो वो साधारन्ते या दूसरे धर्मों के खिलाफ होते हैं पर दूसरे धर्मों के प्रचारक है वो तो उनको तो सैतान के दूत मान लेते हैं तो उनके खिलाफ बहुत होते हैं तो एतिहासिक रूप से यह धर्म है क्रिश्ट्यानिटी, इस्लाम और जुडाइजन इतिनों को आगरायमिक धर्म कहते हैं यह बड़े ही संकीर्णवादी हैं जो दूसरे धर्मों का बिल्कुल सेहन नहीं करते हैं पर जो आधुनिक प्रगती हो रही थी उससे वास्तव में समझ जाया है कि अगर हम ऐसे संकीर्णवाद रहेगे तो हमारा कुछ चल देवा नहीं है
तो 1965 में ही प्रवपाजी आगुस्ट में गए, सब्टेंबर में जो पोक जौन पॉर्ड थे, जो कैथलिक चर्च के सबसे बड़े अध्यक्ष्य थे तो उन्होंने एक महतपूर्ण रेजलूशिन पास था रेजलूशिन क्या था? कि उन्होंने कहा उसमें कि बाकी सब धर्मों में all that is noble and good in all other religions we accept that also as valid कि अगर बाकी सब धर्मों में भी अगर कोई और सत्य है हम उसको सुखार करते हैं तो वास्तव में इससे क्या हो गया? बहुत से लोग वहाँ पे और open हो गयें और वो दुसरे धर्मों के बारे में जानने के लिए और वो उत्सहई हो गयें
और प्रहुपाजी का अनोखी बात क्या थी? कि उसके पहले जो सब लोग आए थे जो सब अनेंग भारत से गुरू गय थे वो सब मायावादी गुरू गय थे और जो मायावादी गुरू थे जो क्रिश्यालिटी इस्लाम है वो मायावाद मतलब वो भगवान के पति बड़ा ही भगवान के पति बड़ा अपराद मान लेते हैं तुम कहते हैं तुम भगवान हैं कितना बड़ा अपराद है तो एक तरह से वहाँ पर जब अमेरिटा में साधारंद जो भी गुरू गय थे वो सब बता थे कि वास्तों में तुम्हारा धर्म कहता है कि हम सब भगवान के पति हैं इसलिए हम सब महान है हमारा धर्म कहता है कि हम सब भगवान है इसलिए हम सब महान है तुम्हारा धर्म कहता है कि हम सब पापी है हमारा धर्म कहता है कि हम सब शुद्ध है हम सब ब्रह्मन है हम सब भगवान है तो ये ऐसा जो भाव था ये इससे जो अमेरिका में अधिकार ख्रिश्यन धर्म है था तो उनका हिंदु धर्म के परती बड़ा ही नकारात्मक भाव था
पर उससी समय प्रवुपा जब उन्होंने कहा पोप जौन पॉर्टने ने कहा कि वास्तो में हम हिंदु धर्म भी सबते अच्छा है तो प्रवुपा जब बता रहा है कि शुद्ध भक्ती है जो भाव आप प्रवुपा जब कहते है कि जीसस हमारे भी गुरू है तो उससे क्या हो गया एक बहुत आश्चर जनक प्रभाव बाद में ये क्रिश्चिन लोग भक्त नहीं बने क्रिश्चिन पंडित थे वो भक्त नहीं बने पर बाद में जब भक्तों को कुछ समस्या आ गई लोग कह रहे है कि आप ऐसे कुछ तो उससे समय इन सब लोगों ने सपोर्ट किया तो कोर्ट केसल बग़ेरे हो गई
शुद्ध भक्ति और भगवद कृपा
तो यह पॉइंट हमें आप बता रहे है कुछ लोग कहेंगे क्योंकि ये सब राजनयतेक, सामालजीक और धार्मिक घटनाय हो गए उसके कारणें प्रहुपा जी इतना एक्षिस्य हो गए पर ऐसे भाव नहीं है पास तो मैं इसे नचाओ, नचाओ, नचाओ इसे मैं तुझे बता रहा है कि प्रहुपा जी बोले नचाओ मुझे तो अगर कोई बहुत अच्छा नुत्ते कर रहा है तो नुत्ते करने के लिए एक अच्छा स्टेज चाहिए स्टेज में नुत्ते हो सकता है पर कितना भी अच्छा स्टेज हो अगर व्यक्ति को नुत्ते करने नहीं आता है तो कितना भी अच्छा स्टेज कुछ फर्त नहीं पड़ते वाला है उससे
तो भगवान के भगत चुद्ध भगतों जी थे प्रहुपा जी वो भगवान की इच्छा के नसार नुत्ते करने के लिए वो चले गए और जब वो चले गए तो भगवान क्या कर रहे थे उससे भगवान स्टेज बना रहे थे सारी परिस्थिती भगवान अस्योजित कर रहे थे जिस से कि उनके भगता एक आदमी की एप पंधती से प्रचार कर सके और जो प्रचार हुआ 10-11 सालों में वो विश्व के इतिहास में अभी तक अगरिती है किसी ने इस प्रकार का प्रचार नहीं किया है
बहुत से मायवादी गुरु भारत से गए थे उनके प्रचार के पंध का प्रचार क्या था कि वास्तव में कोई सांस्तुतिक परिवर्तन नहीं किया कोई रदे का परिवर्तन नहीं किया उन लोगों का कोई बुरे आदमें से चुड़ाये नहीं कि आप सब सुखार करो कि आप भगवान है वो तो पहले से लोग सोचते ही है उसमें क्या बड़ी बात है सुखार करना प्रवापा जी एक बार आस्ट्रेलिया में गरे थे तो भाँपे एक ऐसे लंबी टोपी और जादुगर जैसे होता है वैसा तो प्रवाचन के बाद में कहा उसने प्रवापा स्वामिजी मैं आपको पता चाहता हूँ कि मैं भगवान हूँ और अगले मैने, फेबुरुवारी में मैं साभित करने वाला हूँ कि मैं भगवान हूँ तो प्रवाचन ठीक है, सब अलोग ऐसे ही सोचते हैं next question तो वास्ता में जो मायावात की जाधरा है वो जीवातना की मित्यांकार को वास्ता में बढ़ाती है तो इसलिए मायावात का प्रचाथ करना जाधा मुश्किल नहीं है आप लोग कहें कि भगवान के शरंद जाओ क्यों जाओ शरंद? एक बहुत लोग प्रिय एक प्रिय गुर्व थी, अभी बड़े उन्हें कोई स्केंटल में आ गए वो वो अभी बड़े कुक्षात हो गए उसका वो गुर्व क्या कहते थे बहुत से गुर्व आके कहे है अवतक कि वे भगवान हैं मैं आया हूँ आपको बताये भी आप भगवान हैं तो आप लोगों को ऐसे बताये थे कोई नहीं आएगा सुनने को, सब लोग आएगे तो मायावास का प्रियाल करना इतना मुश्किल नहीं है
पर शुद्ध भक्ति का प्रचा करना लोगों को बताना आप सब भगवान के सेवक हो और सेवा में ही आसान है वह आसान नहीं है, वह जो प्रभुपाजी ने किया और न केवल एक ऐसा जो सिद्धान था तत्वग्यान था, वह जिवात्मा के लिए प्रिया लगने वाला ऐसा सिद्धान नहीं है उसका प्रचार किया, क्यों उसका प्रचार किया हजारों लोगों को परिवर्तित किया प्रभुपाजी ने परिवर्तित किया, सारों जो बुले आदमों से चुड़ा दिया और जो भगवाजिता के अंत में बताया सर्वाधर्मान पर्तजमाने कम्षार नमर्जा प्रभुपाजी के प्रिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्तित के परिवर्त
जो प्रचार है वो भगवान सारी योजना बनाएगी तो भकत सामुत महराज काई बार में से कहते हैं कि I am a dreamer कि मैं बहुत सपने देखता हूँ मुझे जैसे भकत चाहिए कि जो सपने पूरे करने के लिए मदद करें तो हम सबको ये मौका है कि उनकी जो योजनाए है उनकी जो इच्छा है उसमें हम अगर कुछ मदद करें तो भगवान की कृपा के दोरा जो बाकी सब समस्याए है वो चली जाएगी और वो कैसे जाएगी उसके हम कलपना नहीं कर सकते हैं उसके बार में विचार भी करेंगे तो हम क्या होगा हम हता सुझाएगे
तो एक श्रद्धा की बहुत सुझदा श्रद्धा की अलग अलग परिवाशय है श्रद्धा की एक परिवाशय है कि जो अगर मैं इस रस्ते पे चल रहा हूँ तो अगर कोई बताये उनकी अच्छा यह रस्ते पे पूरा रस्ते में अगर रोष्णी होगी यहाँ से निकलूगा अगर आनी तक कहा जाना है वो सारा रस्ता अगर मुझे दिखेगा तो मैं रस्ते पे जाओंगा तो ऐसे अगर हम बोलते हैं तो उसमें श्रद्धा कुछ हैं नहीं श्रद्धा मतलब क्या?
अगर सिर्फ मुझे एक पद आगे दिख रहा है तो मैं एक पद लोगा और मैं विश्वास रहता हूँ कि अगला पद जो लेना है उसके लिए भगवान मत करें तो फेथ मिंस टू बी रेड़ी टू टेक इवन वान स्टेप पुरा रस्ता में दिख भी नहीं रहा है पर एक पद तो दिखता है कि मैं यह कर सकता हूँ तो एक पद अगर मैं आगे लेता हूँ इतनी श्रद्धा रखता हूँ तो क्या होगा? भगवान परे आगे भी दिखा देखे
तो अगर हम बोलते पहले अगर मैं भगवान के शरन में आ जाओंगा तो फिर मुझे क्या सेवा मिलेगे? कहां रहूंगा? कैसे क्या करूंगा? क्या होगा? अगर हम सवाल पूछेगे तो मुझे श्रद्धा की बात कहा है उसमें वो तो फिर एक तरह से कोई धन्दा करता है
प्रहुपाजी शुद्ध भगत है, जरूर शुद्ध भगत है पर ऐसे नहीं हो जाता कि प्रहुपाजी को सब कुछ बता था कि मैं अमेरिका में जाओंगा, फिर इस व्यक्ति से मिलूंगा फिर उस व्यक्ति से मिलूंगा, फिर हम यहां पर प्रचार करेंगे प्रहुपाजी कई बार योज्ञे बनाते थे, फिर बदलते थे कि इसमें समस्या आ गई, ये ट्राय कर, ये ट्राय कर प्रहुपाजी जरूर उनको विश्वास था जब प्रहुपाजी कहते है कि मैं देख रहा हूँ कि बहुत से मंदिर है दुनिया भर में और सारे मंदिर भप्तों से बरे हुए तो ये प्रहुपाजी का विश्वास था भगवान पर ये कैसे होने वाला है ये प्रहुपाजी को पता नहीं था वो प्रहुपाजी एक पल आगे लेते थे जो भी मौका भगवान दे रहे थे एक पल लेते थे तो उससे क्या हो गया फिर भगवान ने चमतकार ये से कर दिया और मामंसं बेटदाश्चर्यं
तो आज हम देखते हैं तो प्रहुपाजी को किया वैं चमतकार का समान है पर वास्तों में असल चमतकार का था प्रहुपाजी के रुदे में जो शर्धा थी भगवान के परती जो अतूत जो दुर्द संकल्प था वहाँ चमतकार है तो हमारे रुदे में क्या होता है कि हम बहुत सोचते हैं कि मैं भी बहुत से सेवा करना चाहता हूँ पर ऐसा कुछ करना चाहता हूँ कि बहुत अपरतीन चीज़ हो जाएगे पर उसके लिए प्रातना करने के लिए भगवान आप मेरे रुदे में अतूत शर्धा थे शर्धा आजाएगी तो दुल्संकल पाजाएगा भगवान की सेवा करने का तो बायरूप से जो भी करना ज़रूरी है वो करने के लिए भगवान योजना मना देगे हमें बुद्धी देगे वो आपर हम कर पाएगे
तो अंतरन रूप से जो शर्धा है तदाम भुद्धी ओगं कम यही नमामुपयांति ते भगवान के लिए कि मैं आपको भुद्धी दूँगा कि आप कैसे प्रगति कर सकते हैं पर उसके लिए क्या है तेशांसतत्युक्तानां भजतां प्रितिपुर्वकं तो आप मेरी प्रितिपुर्वकं भगति करों मैं अंतरन से एक चाचा बोलता हूँ जो उत्सहा निष्या धहिर्याद हैं उत्सहा निष्या धहिर्याद हैं कि हमें उत्सहा रखना चाहिए निष्या धहिर्याद तो क्या होता है?
हमारी सेवा होती है और सेवा का फल होता है तो हमारा… जो धहिर्याद मतलब सबर रखना आप करते रहो करते रहो जब फल में जाएगा आजाएगा तो हमारा क्या होता है? हम सेवा के फल के लिए उत्सहा ही रहते हैं पर सेवा के लिए हम नहीं रहते हैं अरांसे सेवा करो तो अगर हम प्रभुबाजी का उलधान देखेंगे तो प्रभुबाजी क्या? सेवा के लिए उत्सहा दी सेवा का फल 40 साल लग गया ने 43 साल लग गया पर उत्सहा रखा उन्होंने
तो हम उल्टा कर देते हैं पर अगर हम सेवा के लिए उत्सहा रखेंगे और फल यह भगवान जहाई दे दे देगे तो भगवान जब दे गे तो एक आप्रतीम कुछ से फल भी दे सकते हैं
भगवान बहुत बहुत धन्यवाद ग्रंथाचार्य श्रीमद्भागवतम् की शीला प्रभुपाद की गौर भक्त वृंद की जय गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल