How Krishna-katha extinguishes the blazing fire of material existence (tava kathamritam explanation) – Hindi
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Lecture Summary
श्रीमद्भागवत दशम स्कंध (गोपी गीत) और जीवन दर्शन: सारांश
यह व्याख्यान श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 31वें अध्याय (गोपी गीत), भगवान कृष्ण की लीलाओं, महाभारत के प्रमुख युद्ध प्रसंगों और भौतिक जीवन की समस्याओं के आध्यात्मिक समाधान पर आधारित है।
मुख्य बिंदु
1. गोपी गीत और चैतन्य महाप्रभु का प्रसंग
- गोपी गीत का महत्व: श्रीमद्भागवत के सबसे बड़े दशम स्कंध (90 अध्याय) के अंतर्गत रास पंच अध्याय (29 से 33) आते हैं, जिनमें 31वां अध्याय ‘गोपी गीत’ (19 श्लोक) है। यह तब गाया गया जब भगवान कृष्ण गोपियों को छोड़कर चले गए थे।
- पहला श्लोक (तवकथामृतं…): यह अत्यंत विख्यात श्लोक है जो भगवान की कथा के अमृतमय और कल्याणकारी स्वरूप को दर्शाता है।
- चैतन्य महाप्रभु की अनुभूति: जगन्नाथ यात्रा के दौरान जब प्रतापरुद्र महाराज ने वेश बदलकर यह गोपी गीत गाया और इस श्लोक पर आए, तो चैतन्य महाप्रभु भाव-विह्वल हो उठे और उन्होंने प्रेम से आलिंगन कर उन्हें “भूरिदा जनाः” (कल्याण करने वाले) कहकर सम्मानित किया।
2. भौतिक संताप, वासना और उनका समाधान
- जीवन की तप्तता: हमारा जीवन मुख्य रूप से दो कारणों से तप्त (दुःखी) है—वासनाएं (और पाने की इच्छा) और चिंताएं।
- भोग से आग का बढ़ना: भगवद्गीता और भागवत के अनुसार, भौतिक भोगों से इच्छाएं कभी शांत नहीं होतीं, बल्कि वे अग्नि में घी डालने के समान और प्रज्वलित हो जाती हैं (दुष्पूरेण अनलेन)।
- समस्याओं का प्रबंधन: जीवन में समस्याएं सड़ी हुई सब्जी के समान हैं; उन पर अत्यधिक विचार करने से वे और बड़ी हो जाती हैं। समाधान यह है कि मन को शांत कर भगवान का आश्रय और उनकी कथा का श्रवण (श्रावण मंगलम्) किया जाए, जिससे सहनशक्ति और सही मार्ग सूझने की क्षमता प्राप्त होती है।
3. भौतिक स्तर के प्रयासों की सीमाएं
- संयुक्त राष्ट्र का उदाहरण: पिछले दशकों में वैश्विक स्तर पर करोड़ों डॉलर खर्च करने के बाद भी दुनिया की मूल परिस्थितियों में कोई खास सुधार नहीं आया है। भौतिक स्तर पर किए गए प्रयास केवल ‘पेनकिलर’ (अस्थायी राहत) की तरह हैं, जो मूल बीमारी (अज्ञान और भौतिक चेतना) को ठीक नहीं कर सकते। असली हल हृदय का शुद्धिकरण और भगवत प्रेम की प्राप्ति है।
4. महाभारत युद्ध और भगवान का संरक्षण
- कौरव-पांडव प्रसंग: महाभारत युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य, कर्ण और दुर्योधन द्वारा रची गई विभिन्न व्यूह रचनाओं और षड्यंत्रों (जैसे अभिमन्यु वध और जयदथ वध का प्रसंग) का वर्णन है।
- अजेय सुरक्षा: चाहे कैसी भी विकट परिस्थितियां या मायावी कवच क्यों न हों, जब पांडवों के साथ भगवान कृष्ण का प्रत्यक्ष आश्रय और संरक्षण होता है, तो बड़े से बड़े संकट को भी पार किया जा सकता है। अर्जुन और भीम का पराक्रम इसी दिव्य संरक्षण का परिणाम है।
5. गोपी प्रेम और योगमाया का रहस्य
- योगमाया: गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम इतना अनन्य और गाढ़ा है कि वे उनके परम ईश्वरत्व को जानते हुए भी अपने मधुर भाव (वात्सल्य, सख्य और माधुरी प्रेम) को ही प्रधान रखती हैं। आकाश में तारे होने पर भी सूर्य की तेज रोशनी के सामने उनका ज्ञान पीछे छूट जाता है और केवल शुद्ध प्रेम ही सर्वोच्च रूप में चमकता है।
Full Transcription
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का गोपी गीत और भगवद्कथा की महिमा
प्रभु, श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 31वें अध्याय के नवम श्लोक के आधार पर थोड़ा बोलूंगा आज। श्रीमद्भागवत में 335 अध्याय हैं, उसमें से 90 अध्याय दशम स्कंध में हैं, जो सबसे बड़ा स्कंध है। नवम स्कंध के सबसे महत्वपूर्ण अंग रास पंच अध्याय हैं, जो 29 से 33 अध्याय तक हैं। उसमें 31वां अध्याय गोपी गीत है, जब भगवान कृष्ण गोपियों को छोड़कर चले जाते हैं, उसमें 19 श्लोक हैं।
पहले चार श्लोक में गोपियां बताती हैं कि हे प्रभु! कृपा आपस आके हमें दर्शन दीजिए। अगले चार श्लोक में बताती हैं कि कृपया आप दर्शन कामें हैं, आशीर्वाद हैं, तो अलग-अलग प्रकार से हमें कृपा करो। और बाद में जो श्लोक हैं, उसमें गोपियां भगवान की लीला का स्मरण करती हैं और उससे उनके विरह को सहन करने का प्रयास करती हैं। तो उसमें जो पहला श्लोक है, मतलब नवा श्लोक उस श्लोक का, वह श्लोक काफ़ी विख्यात है।
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भूरिदा जनाः भुर्ति गन्ति ते॥
गोपी गीत की एक विशिष्टता है कि बहुत ही काव्यात्मक पद्धति से इन श्लोकों की रचना है। तो लगभग पूरा जो गोपी गीत है, इसी रहस्य से है, एक-दो श्लोक के अपवाद हैं। तो काव्यात्मक पद्धति बहुत सुंदर रही है और यह जो श्लोक है, बहुत विख्यात है।
जब चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ यात्रा के उत्सव में नृत्य करके प्रद्युम्न जगन्नाथ वल्लभ वाटिका जो है, बगीचा है, वहां पर वह विश्राम कर रहे थे, तभी प्रतापरुद्र महाराज एक साधारण नागरिक का वेश पहनकर वहां पर आ गए और उन्होंने वहां पर यह श्लोक गाया। चैतन्य महाप्रभु पहले पसंद नहीं कर रहे थे, पर पूरा गोपी गीत उन्होंने गाया और जब इस तरह से गोपी गीत गा रहे थे, तभी जब इस श्लोक पर आए, तो चैतन्य महाप्रभु भाव-विह्वत हो गए थे, लेटे हुए थे। जब यह श्लोक गाया, तो तुरंत चैतन्य महाप्रभु उठ गए और उन्होंने आलिंगन कर लिया और उन्होंने कहा कि आप भूरिदा जनाः हो। भूरिदा जनाः मतलब क्या? भूरि मतलब अच्छा, दा मतलब देने वाले, जना मतलब जो लोग अच्छा दान करते हैं, अच्छा कार्य करते हैं विष्णु के लिए। तो चैतन्य महाप्रभु उठ गए और प्रतापरुद्र को जो कृपा काफी समय से नहीं मिल रही थी, वह कृपा उनको तुरंत मिल गई।
भागवत कथा और आध्यात्मिक स्तर पर अमरता
प्रतापरुद्र का प्रसंग देखते हैं, यह प्रसंग आपके बारे में जो कथा है, बहुत अमृत के समान है। ऐसे भागवत महात्म्य में बताया गया है कि जब भागवत की कथा चालू होने वाली थी, तभी देवी-देवता अगर आ गए शुकदेव गोस्वामी के पास और वह कहने लगे कि आप यह पृथ्वी पर भागवत कथा करने लगे हो, हमारे स्वर्ग में आ जाओ और स्वर्ग में आप कथा करो। तभी क्या हुआ? शुकदेव गोस्वामी को बोले, मैं तो परीक्षित महाराज के लिए कथा करवा रहा हूं, परीक्षित महाराज के पास आप जाओ। परीक्षित महाराज ने क्या कहा? परीक्षित महाराज को बोले यह देवता कि आपको मृत्यु का डर है, तो हम आपको स्वर्ग से सुधा दे देंगे और उससे आप संतुष्ट हो जाएंगे। आपको तक्षक भी काटेगा तो आपको मृत्यु नहीं होगी। इस तरह से आप संतुष्ट हो जाओ और सुधा पीकर व्यक्ति को आध्यात्मिक स्तर पर ले जाती है।
तो इसलिए यह वाक्य स्थित अमृत है, तो हम सब वास्तव में अमर हैं आत्मा के स्तर पर। शरीर के स्तर पर हमें मृत्यु आती है, तो जितना हम शरीर के स्तर पर आसक्त होते हैं, उतना हमें मृत्यु का भय सताता है।
जीवन की समस्याएं और मन की शांति
भगवद्गीता पर मैं एक लेख लिखता हूं, जो वेबसाइट में मैं इंटरनेट पर डालता हूं। तो उसमें एक लेख लिखा था मैंने—“Life doesn’t determine our problems; we determine their size.” जीवन हमारी समस्याएं निर्धारित करता है, पर वो समस्या कितनी बड़ी होगी, वह हम निर्धारित करते हैं। मतलब जो समस्या आती है, उस पर हम जितना विचार करते हैं, जितना विचार करते हैं, उतनी बड़ी होगी समस्या।
अगर मान लीजिए कोई सब्जी मार्केट में सब्जी खरीद के लेकर आते हैं और बाद में देखते हैं कि जो सब्जी है, वह सड़ी हुई है, तो व्यक्ति गुस्सा हो जाता है। तो पैसे दिए, वह आदमी ने सब्जी मार्केट में अगर सड़ी हुई सब्जी दी है, तो मैं क्या करूंगा? इसको ज़्यादा कुकिंग कर लूंगा? तो ज़्यादा कुकिंग करूंगा तो सड़ी हुई सब्जी अच्छी बन जाएगी? होगा ऐसा कभी? नहीं! यह सड़ी हुई सब्जी है, तो वह सड़ी हुई है। तो अभी क्या करना है? उसको ज़्यादा कुकिंग करने से कुछ नहीं होने वाला है, खराब होगी, उसको फेंक देना है। तो उसी तरह से कि अगर कोई व्यक्ति सोचता है कि अभी ये जीवन में समस्या आ गई है, तो समस्या आ गई है, समस्या एक सड़ी सब्जी के समान है। अभी आ गई है, तो उससे सोचते हैं क्यों हुआ? हम उसमें बहुत से क्यों खंगाल रहे हैं? क्यों हुआ? हम इतना विचार करते रहते हैं, क्योंकि अगर मन उद्दीग्न है, मन बिचलित है, तो फिर हम उस समस्या का राहत नहीं निकालते हैं। हम क्या करते हैं, उस समस्या को और बढ़ा देते हैं। सबसे पहले हमें मन को शांत करना है। सबसे पहले हमें मन को शांत करना है।
तो ऐसे नहीं है कि समस्या को आंखें बंद कर लो, समस्या है ही, समस्या इस दुनिया में है। पर हम जितना वह समस्या के बारे में विचार करते हैं, अगर हम वह समस्या के बारे में विचार करने की जगह पर भगवान का स्मरण करते हैं, भगवान की कथा का आश्रय ग्रहण करते हैं, तो उससे मन शांत हो जाता है और फिर उसके बाद में हम शांत मन से उस समस्या के बारे में विचार करते हैं, तो समस्या के लिए राहत निकाल सकते हैं कि ऐसे जो कोई मार्ग है उसको निवारण करने का, वह निकाल सकते हैं।
अगर सहन भी करना है समस्या, ऐसी समस्या जिसका कोई हल ही नहीं है, तो इसको सहन करना है, सहन करने की शक्ति भी आ जाती है। हमारे दुनिया में समस्या आती है, उनके कारण भगवान का आश्रय ग्रहण करना छोड़ना नहीं चाहिए। बहुत समस्या है, इसलिए मैं भक्ति नहीं कर रहा हूं? वास्तव में बहुत समस्या है, इसलिए और भक्ति करनी चाहिए! क्या होता है? जब समस्या ज्यादा होती है, तो समस्याओं से हमारा मन अधिक विचलित हो जाता है और जितना मन अधिक विचलित होता है, उतना हम ऐसे कार्य करते हैं जिससे समस्या और बढ़ जाएगी। इसलिए जब समस्या आती है, तो मन को पहले शांत करें, भगवान का आश्रय ग्रहण करें, उसके बाद में जब हम उन समस्याओं के सामने जाते हैं, तो हम उसका अच्छी तरह से निवारण कर सकते हैं।
वासना, चिंता और भौतिक जगत का संताप
जीवन है, हम सब जल रहे हैं। इस जीवन में किस चीज़ से जल रहे हैं? दो चीज़ों से! प्रह्लाद महाराज बताते हैं सप्तम स्कंध के नौवें अध्याय में उनकी प्रार्थना है और सुंदर प्रार्थना है। तो बताते हैं—प्राकृत क्लेश। तो बताते हैं कि इस भौतिक चीज़ों में प्रिय और अप्रिय कुछ चीज़ें हमें चाहिए, कुछ चीज़ें हमें तकलीफ हैं, अच्छी चीज़ें हैं। और क्या होता है हर बार, अधिकांश बार जो प्रिय चीज़ें हैं, उनसे वियोग हो जाता है, जो मिलती नहीं हैं उनको, और जो अप्रिय चीज़ें हैं, वह क्या होता है? वह हम पर लादी जाती हैं।
यस्मात् प्रियप्रियवियोगसंयोगजन्मोशोकाग्निना…
वासना, चिंता! हमारे जो विज्ञापन हैं, टीवी पर होते हैं, रास्तों में बिलबोर्ड्स पर होते हैं, हम सब क्या करते हैं? हम सब की वासनाओं को और बढ़ाते हैं, जलाते हैं वासनाओं को। और यह इतनी आश्चर्य की बात है कि भौतिकवादी लोग भी समझते हैं कि यह जलन है। कई बार बॉलीवुड मूवी में ऐसे गीत होते हैं—सावन जो आग लगा है, वो भी जानते हैं कि यह आग है, पर वो सोचते हैं कि हम भोग करेंगे तो यह आग बुझ जाएगी और वो बुझेगी नहीं!
धूमावृतानि वह्निर्मथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥
भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में भगवान बोलते हैं कि यह कैसी आग है? अनलेन! अनलेन मतलब यह आग है, पर कैसी आग है? दुष्पूरेण! दुष्पूरेण मतलब जो कभी बुझेगी नहीं, वो और बलती जाएगी। तो कैसे है? जब हम भोग करते हैं, तो अग्नि में हम घी डालने के समान जाते हैं।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध में ययाति महाराज बताते हैं कि जब हम भोग करते हैं, तो उससे उपभोगेन शाम्यति, वो सोचते हैं कि उपभोग से इच्छा है, मुझे इच्छा को पूरा कर लूंगा, शांत हो जाएगी, नहीं, ऐसा नहीं होगा! क्यों? कहते हैं अग्नि में आप हविर्षा कृष्णवर्त्मेव भूयाः, पुनः क्या होगा? एव अभिवर्धते और बढ़ जाएगा!
तो हम सबका जीवन तप्त जीवन, जीवन तप्त क्यों है? वासनाओं के कारण और चिंताओं के कारण। इस दोनों चीज़ों के कारण हमारा जीवन तप्त है और भौतिक स्तर पर इन दोनों का अंत हम कभी नहीं करते हैं, ये रहते हैं।
भौतिक भोग और धन की तृष्णा
बहुत सी ऐसी चीज़ें होगी, व्यक्ति कितना भी धनवान बन जाए, फिर भी कभी भी सभी वासनाओं की पूर्ति नहीं होगी। हमेशा व्यक्ति को और चाहिए। व्यक्ति को कभी इतना चाहिए, उतना नहीं मिला। मैं यहां पर हमारे परिवार का सबसे अमीर व्यक्ति बनना चाहिए। फिर उसके बाद में हमारे शहर का सबसे बड़ा व्यक्ति, अमीर व्यक्ति बनना चाहिए। फिर सारे प्रांत का, फिर सारे राष्ट्र का, फिर सारे विश्व का, फिर सारे विश्व के इतिहास का, तब तक व्यक्ति इतिहास बन जाता है, समाप्ति हो जाती है और फिर क्या पैसा साथ जाएगा?
प्रभुपाद जी जब हेनरी फोर्ड के पोते थे—अम्बरीश प्रभु… हेनरी फोर्ड यह अमेरिका के बहुत रईस व्यक्तियों में से थे, उन्होंने फोर्ड नाम का पहला कार बनाया था और उसके सारे-साढ़े आदमी सारे अगला प्रकार कार आ गए, वो पहला कार था साधन लोगों के लिए, बहुत अमेरी व्यक्तियों। जब उन्होंने से मिले, प्रभुपाद जी, हेनरी फोर्ड के पोते जो थे, अम्बरीश प्रभु, अल्फ्रेड फोर्ड, प्रभुपाद जी ने उनसे कहा—”क्या आप हेनरी फोर्ड के पोते हो? कहां है वो?”
साधन-लोगों के लिए जब उन्होंने से मिले, तो दुर्गुण जो हैं, वो अच्छे तोड़ने हैं। तो इन दोनों में संघर्ष चल रहा है। जब हम भगवान की कथा का श्रवण करते हैं, उससे हमारे सद्गुणों को शक्ति मिलती है, तो सद्गुण जो हैं, वो दुर्गुणों को हरा सकते हैं। तो भगवान की धनी से सद्गुणों को शक्ति कैसे मिलती है? भगवान की कथा से, भगवान के नाम से, क्योंकि भगवान जो हैं, वहां परम शक्तिशारी हैं।
वास्तविक आधिदैविक और आधिभौतिक दुखों का निवारण
तो वह देवी भागवत में नहीं है और यह भागवत में अमल धर्म का बताता है। तो देवी भागवत तो एक अलग चीज़ बता रहा है। बोलते हैं कि ये जो देवी भागवत थे वो अच्छे पुराणों में से नहीं है, जो असली भागवत है… जो दुर्गा देवी के हाथ में क्या है? त्रिशूल है, वहां क्लेश देवी है। जो दुर्गा देवी क्लेश क्यों में होती है? दुर्गा देवी ऐसे नहीं कि वो निष्ठुर है, पर उनका भाव क्या है? दुर्ग मतलब किला। इस भौतिक जगत में जो लोग इस जगत अगर कैद, अगर आराम घर जैसा हो जाएगा, आराम से मैं उठते रहेगा, कोई उठते उस जेल से निकलने की इच्छा ही नहीं करेगा।
तो जो दुर्गा देवी के तीन त्रिशूल जो है, उसके तीन तो क्या मतलब क्या है? आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक। तो कई बार वो बोल रहे हैं कि मैं तो भक्ति कर रहा हूं, इसके बावजूद मेरे जीवन में इतने दुख आ रहे हैं, ऐसे क्यों भी? तो हमें समझना चाहिए कि जो बुद्धिमान भक्त है, जो शास्त्र का अध्ययन करता है, वह क्या सोचता है? जब जीवन में दुख आ रहे हैं, तो इससे जो बुद्धिमान भक्त की श्रद्धा कम नहीं होती है, श्रद्धा बढ़ती है, क्योंकि भक्त क्या सोचता है कि भगवान जो बता रहे हैं, वह सत्य है।
भगवान क्या बता रहे हैं शास्त्र में? वह श्लोक का प्रमाण भाव क्या है कि यह दुक्खालयम अशाश्वतम् के लिए निकल जाओ। आओ, भौतिक जगत दुक्खालयम अशाश्वतम् के लिए और जो मेरी भक्ति करते हैं, मामुपेत्य… जो मेरी भक्ति करते हैं, पुनर्जन्म न विद्यते, उनको पुनर्जन्म नहीं होता है। वह क्या होता है? नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः। वह जो परम गति है… तो जो भौतिक जगत से बाहर निकालने के लिए भगवान माध्यम देता है। तो मान लीजिए किसी को बाहर निकालना है, तो दुर्गा देवी जो है, पीछे से त्रिशूलनी है, तो अगर पीछे से कोई प्रहार कर रहा है, तो हमें समझ में नहीं आता है कहां से प्रहार आ रहा है, पीछे से क्या होता है? इसमें सिर्फ वेदना होता है। पर जो हमारे गुरु होते हैं, वह आगे से हमें पुकारते हैं।
श्रवण मंगलम: कथा सुनने से दुखों से छुटकारा
तो हम जब गुरु, साधु, शास्त्र का श्रवण करते हैं, तो उससे दुख से चलता है कि हमें क्या करना चाहते हैं। तो दुख आते हैं, सिर्फ दुखों से साक्षात्कार नहीं होता है। इस दुनिया में बहुत से लोग दुख करते हैं, पर वो दुख से कभी-कभी दुख आता है, तो क्या वो शराब पीने लगते हैं? शराब में अपने दुखों को भूलने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग होते हैं आत्महत्या कर लेते हैं। तो दुखों से ही व्यक्ति भवति भक्ति नहीं करता है, श्रावण भवति भक्ति नहीं करता है।
जब श्रावण होता है, तो श्रावण मंगलम, श्रीवृदातं! इस दुनिया के जो दुख है, वो अमंगल है, पर भगवान की कथा का श्रवण है, वो मंगलम है! क्यों? क्योंकि इस कथा के द्वारा इन दुखों से कैसे छुटकारा प्राप्त करना है, वो भगवान बताते हैं। जितना हम भक्ति-भक्ति का प्रगति करते हैं, इतना भौतिक चेतना में दुख होते हैं, वो कम होते हैं।
इस दुनिया में बाकी सब जो लोग हैं, वो जो अस्थायी हल बता रहे हैं, शाश्वत हल नहीं बता रहे हैं। मैं अलग-अलग बार जब कॉन्फिडेंस होते हैं, तो वहां पर मुझे स्थान का वक्ता के रूप में बुलाया जाता है, तो एक विश्व की सबसे बड़ी संस्था जो है, उसका नाम है संयुक्त राष्ट्र, United Nations। तो संयुक्त राष्ट्र का एक अधिवेशन हो रहा था, पुणे में, तो उसके शिखर पर मुझे पुणे में वक्ता के रूप में बताया है, तो वहां पर संयुक्त राष्ट्र के जो प्रधान व्यक्ति हैं, वह बता रहे थे कि पिछले 60 साल में हमने बहुत सी संस्थाएं, United Nations एक संस्था है, उसके बाद UNESCO संस्था है, UNICEF है, फिर फूड एग्रीकल्चर एक संस्था है, एक संस्था है, जो सारे विश्वियों में अलग-अलग प्रकार से कल्याण करने के लिए कार्य करते हैं। तो ये जो संस्थाएं हैं, वह बहुत काफ़ी गहन सहानुभूति के साथ, प्रामाणिकता के साथ, वह प्रयास कर रहे हैं, जो परिस्थिति है उसको और अच्छा करने के लिए और वह कुछ तरह कार्य भी कर रहे हैं प्रामाणिकता से। पर बताते हैं कि पिछले 60 साल में हमने करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं और हजारों की मात्रा में हमारे कर्मचारी हैं, वहां कार्य कर रहे हैं, पर जितने भी हमारे विभाग हैं, वो सारे विभागों में जो 1946 में परिस्थिति थी और 2006 में परिस्थिति है, वो और खराब ही है! एक भी ऐसा विभाग नहीं है, ऐसा संस्था नहीं है, जिसकी कार्यक्षेत्र में परिस्थिति और अच्छी है।
इसलिए क्या मतलब है कि भौतिक स्तर में जब हम समस्या का निवारण करने का प्रयास करते हैं, तो केवल भौतिक स्तर में निवारण अस्थायी रूप से नहीं है, वो अस्थायी है, थोड़े साल के लिए तो अच्छा लगेगा, बाद में वापस लग जाएगा। क्योंकि बहुत हो रहा है, असहनीय दर्द है, तो ये पेनकिलर लेना तो ठीक है, जो भी है, पर पेनकिलर से व्यक्ति की बीमारी ठीक नहीं होगी, सिर्फ दर्द को महसूस करने की संवेदना है, वो संवेदना को बंद कर लेगा। तो कोई व्यक्ति अगर बीमार है और सिर्फ पेनकिलर लेता है, तो उससे वो ठीक नहीं होगी। अगर दर्द है तो पेनकिलर नहीं ठीक है, तो उससे समस्या का हल नहीं होगी, उसके लिए दवाई चाहिए।
भगवान का आश्रय और परम आनंद
तो भौतिक स्तर पर समस्या का हल करना क्या है? पेनकिलर और भगवान की कथा का श्रवण करना, भगवान का आश्रय ग्रहण करना। तो आजकल का समाज क्या है? ये सही आश्रय से समस्या है, वो केवल पेनकिलर ले रहे हैं। तो सिर्फ पेनकिलर लेने से थोड़ा समय के लिए अच्छा लगता है, तो बाद में वापस सारी समस्या का पूर्ण हल कभी नहीं होगा। जब केवल हम भगवान का आश्रय के लिए दौड़ते हैं, तो तभी समस्या का आश्रय के लिए दौड़ते हैं, यह हल क्या है? हम हमारे हृदय का शुद्धिकरण करते हैं, उससे चिंताओं और वासनाओं, दोनों की अगली जोड़ आते हैं, उनका हल करना है। पर उसमें इतना नहीं लग जाना है, कि हमें भक्ति करने के लिए समय नहीं है, क्योंकि भौतिक स्तर पर समस्या आएगी, उसका हम हल करेंगे, उससे समस्या आएगी, उसका हल करेंगे, इसी में सारा जीवन चल जाएगा, सुख-दुख आ गया, उसका प्रतिकार कर लिया, हां, विश्वस्त हो गया, हम सुखी हो गया, सुखवान मन्यते गृही।
पर वास्तव में यहां सुखी नहीं है, असली सुख जो है, वो केवल दुख का प्रतिकार नहीं है, असली सुख जो है, वो वास्तव में आनंददायक है। वो ऐसा आनंद है, जो प्राप्त हो जाएगा, कभी चला नहीं जाता है।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥
भगवद्गीता के छठे अध्याय में ही श्रीभगवान बोलते हैं कि असली आनंद क्या है? यं लब्ध्वा न प्राप्त किया, चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः, यहां जब प्राप्त कर लिया, तो वहां प्राप्त करने के बाद और कुछ इससे अच्छा है और कुछ प्राप्त करना है, ऐसी इच्छा नहीं है। वह प्राप्त की है—भगवत प्रेम! तो भगवत प्रेम प्राप्त कर लेंगे, तो उससे ऐसी संतुष्टि मिलेगी कि और कुछ प्राप्त करने की जरूरत नहीं है, और कुछ और चाहिए ऐसी कामना नहीं होगी, हम संतुष्ट रहेंगे और संतुष्टि के साथ, और संतुष्टि को और फैलाने के लिए हम सेवा करेंगे।
तो यह जो है, यह मैं बता रहा था, यह जो श्लोक है, क्या बता रहा है? हम सब जल क्यों रहे हैं? चिंताओं से और वासनाओं से। वासना मतलब क्या? जो मेरे पास है, उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं, मुझे और चाहिए, और चाहिए। पर यह श्लोक बताता है, कि जब हम भगवत प्रेम प्राप्त कर लेंगे, तो और चाहिए इस वासना की… मतलब जब इस अवस्था में भगवत प्रविष्ट हो जाएंगे, दुःखेन गुरुणापि न विचाल्यते, दुःख गुरुणापि, बड़ा विशाल दुख भी आ जाएगा, न विचाल्यते, दुःख गुरुणापि न विचाल्यते, दुःख गुरुणापि, बड़ा विशाल दुख भी आ जाएगा, उससे हम विचलित नहीं होंगे!
तो देखा, बता रहे हैं भगवान, चिंता से नहीं होंगे, दुनिया में समस्या आ जाएगी, पर चिंता से हम कम हो जाएंगे, हम भगवत प्रविष्ट से तो जाएंगे। भगवत प्रविष्ट ऐसी संपत्ति है, कोई उसे हम छीन नहीं होगी, हमेशा हमारे साथ रहेंगे, उससे तो संतुष्ट हो जाएंगे, तो फिर हम किसी भी समस्या से विचलित नहीं होंगे, समस्या आ जाएगी, उनका हम सामना करेंगे।
अर्जुन और भगवद्गीता का तत्वज्ञान
मान लीजिए कोई व्यक्ति बड़े शहर में जा रहा है, शहर में बड़े-बड़े गगनचुंबी इमारत है, तो वो उनके बीच में चल रहा है, तो क्या लगता है? मैं कुछ चुंबी सा लगता हूं, इमारतें भी इतनी बड़ी-बड़ी है। पर वही व्यक्ति अगर हवाई जहाज में है, तो वो बड़ी-बड़ी इमारतों के समान लगती है, तो मेरी समस्याएं इतनी बड़ी-बड़ी है, तो मैं कुछ समस्याएं लगती हूं।
पर जब हम भगवान की भक्ति का आश्रय ग्रहण करते हैं,
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥
बारहवें अध्याय के सातवें श्लोक से भगवान कहते हैं कि मैं मेरे भक्तों को उठा लेता हूं, महासमुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्! ये संसार-सागर से बारहवें अध्याय के सातवें श्लोक से उठा लेता हूं। तो हम जब भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं, तो मान लीजिए हवाई जहाज में चल रहे हैं, तो वही हवाई जहाज में अगर उच्च स्तर पर हैं, तो बड़ी-बड़ी समस्याएं जो हैं, वहां इतनी बढ़ जाता है, तो समस्याओं से हम चिंता नहीं होते हैं, उनका सामना होते हैं।
इसलिए शास्त्र का अध्ययन जो है, वह केवल भगवान कथा मतलब कुछ आंखें लीला है सुनना, कि भगवान का जन्म ऐसे हुआ, भगवान ने यहां पर इसको ऐसे मारा, यह आश्रय प्राप्त करना है। इसमें फर्क क्या है? मनोरंजन मतलब, यहां आई अच्छा है, मजा आ गया, इसलिए कोई टीवी देखने जाते हैं, कोई मूवी देखने जाते हैं, कोई चित्रपट देखने जाते हैं लोग, इसलिए लोग कथा सुनने आ जाते हैं, भगवान की कथा का उससे प्राप्त फल क्या है? आश्रय! जो आश्रय प्राप्त करना है।
तो हमें तत्वज्ञान ही समझना है। भगवान बताते हैं चौथे अध्याय के नौवें श्लोक में—
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
बताते हैं कि जब मेरे जन्म और कर्म को व्यक्ति तत्वतः समझता है, तत्वतः, वो इस भौतिक जगत में जन्म नहीं लेता है। तो हमें भगवान की लीला का श्रवण करना है, पर तत्वतः श्रवण करना है, तत्व के साथ। तत्व के साथ श्रवण करते हैं, तभी हम इस भौतिक जगत में हम नहीं हैं, हमारा भगवान पर आकर्षण हो जाएगा।
महाभारत युद्ध और भगवान की रक्षा
तो जो महाभारत है, इसमें अनेक प्रसंग ऐसे आते हैं, जिसमें बताया है कैसे भगवान अपने भक्तों का संरक्षण करते हैं और कैसे बहुत अपने प्रामाणिक भक्तों का हमेशा मिलते हैं।
महाभारत का जो युद्ध हुआ था, वो 18 दिन का युद्ध था। तो उसमें पहले 10 दिन के लिए भीष्म पितामह सेनापति थे, अगले 5 दिन के लिए द्रोणाचार्य सेनापति थे, अगले दो दिन के लिए कर्ण सेनापति थे, 18वें दिन के लिए शल्य सेनापति थे और 18वें रात के लिए अश्वत्थामा सेनापति थे। अश्वत्थामा ने रात को बाकी सब पांडवों के युद्ध जब रात को सो रहे थे तब द्रोपदी के पांचों पुत्रों को मार डाला।
तो इस तरह से पहले 10 दिन में जब चल रहा था, भीष्म सेनापति बन गए, तो प्रधान युद्ध जो होते थे, वो कुछ प्रधान युद्ध नहीं है, जब भीष्म और अर्जुन युद्ध कर रहे हो, अर्जुन और द्रोणा युद्ध कर रहे हो। कर्ण के बारे में प्रसंग आता है। कर्ण ने कहा तो मेरे सेनापति बन जाओ और मुझे भीष्म ही बनाओ। कर्ण में बड़ा गंगी हो गए थे। कर्ण ने कहा कि मैं सूत्र का पुत्र हूं और यहां पर मुझे एक और क्षत्रिय पुत्र से योगता है, तो मुझे सेनापति के रूप में स्वीकार नहीं थे। तो तुम जो द्रोणाचार्य है, वो तुम्हारे गुरु है और वो तुम्हारे पक्ष में युद्ध कर रहे हैं, उनको सेनापति बनाओ।
तो जब इस तरह से द्रोणाचार्य के पास गए, अभी द्रोणाचार्य सोच रहे थे कि कर्ण को सेनापति बनाओ, सब लोग अपेक्षा कर रहे थे कर्ण ही सेनापति बन जाए, कि कर्ण बहुत प्रिय था द्रोणाचार्य के, वास्तव में प्रिय नहीं था कर्ण, तो उनको बड़ा दुख हो रहा था उससे। तो इसलिए तो उन्होंने कहा कि प्रतापी द्रोणाचार्य आ गए और आचार्य आप मेरे सेनापति बन जाओ। अगर आप सेनापति बन जाओ, तो मैं बड़ा तुष्ट हो जाऊंगा। तो उससे द्रोणाचार्य को आश्चर्य, कितना मैं बड़ा प्रसन्न हो गया और उन्होंने कहा कि मैं बड़ा प्रसन्न हो गया इनसे आदर से और मैं तुम्हें कुछ वर देना चाहता हूं, क्या वर चाहिए तुम्हें?
तो द्रोणाचार्य जानता था कि आप युधिष्ठिर को जिंदा गिरफ्तार करके मेरे सामने लाओ। जब ये सुना है तो उन्होंने सोचा द्रोणाचार्य की आंखें बड़ी हो गई। वो कहने लगे अच्छा, युधिष्ठिर तो इतने अजातशत्रु है कि तुम भी उनको मृत्यु नहीं चाहते, तुम उनको जिंदा गिरफ्तार करना चाहते हो? तो द्रोणाचार्य के चेहरे पे बड़ा ही खतरनाक षड्यंत्र से भरा हुआ चीज़ अगर करते हैं कि नहीं है, अगर हम युधिष्ठिर को मार डालेगे, तो अर्जुन और भी पागल हो जाएगा और वो हम सबका वध कर देगा। मेरी योजना क्या है? मैं युधिष्ठिर… पेद्वाचार्य बोले कि ठीक है, मैं तुम्हें यह करने में युधिष्ठिर को गिरफ्तार कर सकता हूं, पर एक जिम्मेदारी है कि मेरा शिष्य अर्जुन जो है, वो मैंने जो भी सिखाया है और सब कुछ सीख गया है, इसलिए वो हर तरह से मेरा समान बन गया है और वो मैं जरूर-जरूर-जरूर गिरफ्तार करने का…
फिर जब इस तरह से बताते हैं, तो फिर वो तभी सुशर्मा नाम के एक संशप्तक राजा होते हैं, वो कहते हैं कि हमारा अर्जुन से बड़ा पुराना बैर है, तो मैं अर्जुन को जरूर दूर लेके जाऊंगा और तुम जरूर-जरूर को कहते हैं, ठीक है मैं जरूर-जरूर गिरफ्तार हूं। तो अर्जुन को गिरफ्तार करने के जो जासूस होते हैं, समाचार पांडवों को दे देते हैं, पांडवों को दे देते हैं, तो क्या होता है? अर्जुन चिंता पड़ जाते हैं, पर युधिष्ठिर कहते हैं कि हम यह दुष्ट जो है, वो द्रोण का वध करने के संदर्भ में लिया हैं, युधिष्ठिर तुम तुम्हारा संरक्षण करो, आचार्य आपने व्रत लिया था, आपने पूरा क्यों नहीं किया? तो युधिष्ठिर पूरा प्रयास करते हैं, पर सारे पांडव योद्धा होते हैं, युधिष्ठिर महाराज रक्षा करते हैं और द्रोणाचार्य अपना व्रत पूरा नहीं कर पाते हैं। तो द्रोणाचार्य कहते हैं कि कल मैं व्रत करता बैठता हूं, कि कल या तो हम पांडवों में से एक महारथी को पकड़ते हैं, उसको वध करते हैं और अगले दिन से क्या करते हैं? वो चक्रव्यूह बनाते हैं।
अभिमन्यु वध और जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा
तो व्रत लेते हैं कि मैं अगले दिन जयद्रथ वध करता हूं। तो जयद्रथ ने बाकी सारे सेनापति थे, उनको चक्रव्यूह के अंदर जाने के लिए रोक दिया और वो अभिमन्यु के वध का कारण है। तो फिर व्रत लेते हैं कि जयद्रथ उधर कर्ण के पक्ष में वो सारा उत्सव मना रहे थे, अभिमन्यु को मार डाला और जयद्रथ ने कहते हैं कि हे आचार्य, कल आप एक चक्रव्यूह बना दो, कल शायद हम अर्जुन को पकड़ लेंगे चक्रव्यूह के लिए।
तो इस तरह से बड़ा आनंद कर रहे होते हैं, भच्चर-गिप्सा, पांडव सब विलाप कर रहे होते हैं और तो भी पांडवों के पक्ष से बड़े विजय घोष, शंख बजने लगता है। तो जयद्रथ दुर्योधन के टेंट में जबड़ने आता है, उसका चेहरा एक भूत जैसे सफेद हो गया होता है, यानी कि वो जो अर्जुन है, उसने मेरा मुझे कांप रहा होता है, बोल भी नहीं पा रहा कि यहां पर तो अच्छा मौका मिल गया हो, कल अगर हम अर्जुन को रोक दे, तो क्या होगा? कल हम अर्जुन की मृत्यु हो जाएगा।
तो बोलते हैं कि तुम चिंता मत करो, हमारी सारी सेना जो है, हम तुम्हारे संरक्षण के लिए लगा जाएंगे और अर्जुन तुम तक पहुंच भी नहीं पाएगा, अर्जुन अकेला तो है ना आचार्य? तो द्रोणाचार्य बोले, मैं मेरी सारी सेना लाऊंगा, अर्जुन अकेला तुम तक कभी पहुंच नहीं पाएगा। बाहर से बोलते हैं अर्जुन अकेला तुम तक पहुंच नहीं पाएगा, पर अंदर से जानते हैं, वो अर्जुन अकेला नहीं है, अर्जुन के प्राण हैं, कृष्ण के प्राण हैं! थोड़ा है कि कृष्ण के प्राण जब हैं, सारे देवी, सारे देवता, सारे असुर साथ में भी आ गए, तो अर्जुन और कृष्ण उन सब को दोनों को हरा देंगे, ऊर्जा प्राप्त करने हैं, प्राप्त करने हैं। तो सोचते हैं कि जयद्रथ की मृत्यु फिर भी क्षत्रिय के लिए रणभूमि में मृत्यु प्राप्त करना बड़ा अच्छा भाग्य कर वाला है।
जयद्रथ कांपने लगता है सुनके—नहीं-नहीं, वो तक पहुंचेगा नहीं, महाराज!
पांडव क्या करते हैं उस दिन? अगले दिन योजना बनाते हैं कि अर्जुन कौरवों के पक्ष को भेद करके नजर आता है। बाकी सारे महारथी जो होते हैं वो अलग-अलग जगह पर आक्रमण करते हैं ताकि बाकी सारे महारथी जो होते हैं, वो कौरवों के प्रतिकार करने के लिए… तो अर्जुन कौरवों के पक्ष को भेद करते-करते नजर आते हैं, वहां कोई भी उनको रोक नहीं पाता है।
तभी दुर्योधन जो होता है, वो द्रोणाचार्य के पास जाता है। आचार्य, ऐसा लगता है कि ये अर्जुन एक दिन में लगता है जयद्रथ को, मेरे सारे सेना को ध्वस्त कर देगा। कुछ तो करो उसको रोकने के लिए। दुर्योधन जो होता है, पांडवों ने अपनी रचना बड़ी अच्छी की है, हमारे सारे सेना अलग-अलग योद्धा हैं, वो अलग-अलग जगह पर अभी लगे हुए हैं। अभी एक ही योद्धा है जो अभी को रोक सकता है, वो कौन है? तुम।
तो दुर्योधन कांपने लगता है, तो बोलता है—आप क्या बोल रहे हैं, ये तुम? भले शायद चक्रवर्ती भी आ जाए, तो मैं उसका सामना कर सकता हूं, अर्जुन साधारणतया ही बहुत शक्तिशाली योद्धा है, तो मैं उसका सामना नहीं कर सकता।
दुर्योधन कहते हैं कि राजकुमार, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें बलिका बकरा नहीं बनाने सकता हूं, तो मैं जानता हूं कि तुम दुर्योधन आदि का सामना नहीं कर सकता, पर मेरे पास एक कवच है और ये कवच ऐसा है, देवी-देवताओं ने दिया हुआ है, ये कवच अगर तुम पहन लोगे, तो कोई भी शस्त्र तुम्हें छेद नहीं पाएगा, तुम्हें कुछ भी नहीं होगा और तुम उस कवच को पहन के अर्जुन का सामना कर सकता हूं। तुम्हें बड़ा प्रसन्न होता है, अगर ये कवच होता है, उससे शारीरिक कवच नहीं होता है, मंत्रों का कवच होता है।
तो दुर्योधन वो कवच देता है और कर्ण और दुर्योधन सामने आ जाता है। तो बाकी सारे कौरवों सैनिक होते हैं, कौरव योद्धा होते हैं, ये दुर्योधन क्या कर रहे हो? अर्जुन को सामने मत जाओ, अर्जुन आ रहे हैं, बहुत भयानक भाव में हैं आज तो किरीट और अर्जुन! दुर्योधन को सामने आ जाता है कि दुर्योधन कहां से सामने आ गया? आज लगता है कि आज जयद्रथ के लिए हम दुर्योधन की पर आहुति कर देंगे, तो युद्ध आज ही खत्म हो जाएगा।
पर अर्जुन जानते हैं कि वो दुर्योधन का वध नहीं करेंगे क्योंकि भीम ने प्रतिज्ञा की है। अर्जुन अपना तीर वापस लेते हैं, तो दुर्योधन कहते हैं, हंसता है, तुम्हारे सारी शक्ति इस्तेमाल करो, आज आज तुम अप्रभ हो जाओगे, तभी मैं तुम्हारा वध करूंगा। अर्जुन ऐसे तीर मारते हैं, वो पहाड़ को भेद कर देंगे, पर वो दुर्योधन को कुछ भी नहीं करते हैं।
हम अगर यहां देखते हैं, तो सारे सैनिक होते हैं, पांडवों के पक्ष से तालियां भी बजती हैं, आज बहुत अच्छा और दुर्योधन का वर और व्यर्थ जाता है। तो दुर्योधन कहे, क्या हो गया तुम्हारे व्यर्थ का? भूल गए? चलाओ शक्ति से! तो कृष्णा आज क्या हो गया? आज क्या आप फॉर्म में नहीं है? क्या हो गया आज? तो अर्जुन विचारने पड़ जाते हैं, तुम्हें पता है क्या हो गया आज? यह जो है, तुम्हें दुर्योधन का कवच के कारण बड़ा गर्व कर रहा है, यह कवच ऐसा है, देवी-देवता भी उसका भेद नहीं कर सकते हैं, पर इस कवच के बावजूद मैं देखो उसके अहंकार को कैसे अस्नमोद कर लेता हूं!
अब अर्जुन जानते हैं, ये सारा कवच होता है, वो सारे शरीर को आच्छादित नहीं करता है, वो केवल एक भाग और होता है। तो अर्जुन क्या करते हैं, दुर्योधन अपने बड़ा गर्व से तीर छोड़ रहा है और हंस रहा है, तो अर्जुन बड़ा बर निशाना लेते हैं, तीन-दस तीर छोड़ते हैं और वो दस तीर बड़ा बर दुर्योधन को मारते हैं… और वो नहीं रहता रहा है, तो क्या होता है?
भक्त जीवन में कोई समस्या आ जाए, तो भगवान दुर्योधन से समस्या से बाहर आगे निकाल जाता है। तो ये कवच था, उसको तोड़ तो नहीं सकते हैं, पर क्या है? मार्ग उत्तर से उससे आगे चलते हैं, समस्या जो आती है, नहीं, समस्या से मार्ग आगे कहीं ना कहीं कोई मार्ग आगे निकाल चले जाते हैं।
भीम का पराक्रम और भगवान की लीला
तो इसके बाद में अर्जुन जो बढ़ता चले जा रहा होता है, तभी क्या होता है? युधिष्ठिर चिंता हो जाते हैं, कल ऐसे ही शत्रु के पक्ष में अभिमन्यु चला जाता है और अभिमन्यु का मुझे कहा कि अर्जुन चला जाते हैं, अर्जुन पूछा जाते हैं, क्या करेंगे? शक्ति के चले जाते हैं और तभी शक्ति के अर्जुन का मदद करने चले जाते हैं और उतना अंदर पूछा जाते हैं, उसका भी वध हो जाएगा।
तो वो भीम को बुलाते हैं, अगर भीम युधिष्ठिर का रक्षण करने के लिए वहां पर है और भीम जो युद्ध करने के लिए इतने उत्साही हैं, आ जाते हैं—”यहां मैं बैठ के क्या करना हूं? युद्ध करना है मुझे अपने अस्त्र…” जब भीम को बुलाते हैं, तो भीम के आंखें चमकने लगते हैं, उन्हें कहते हैं कि तुम जाके शक्ति के अर्जुन का मदद करो, मेरे शक्ति के मदद करो कि दुष्ट रूम यहां पे है और वैसे भी द्रोणाचार्य आज भी मुझे आक्रमण करने नहीं पाएगा, यह युद्ध का संरक्षण के लिए खड़े हो गए।
भीम जब युद्ध करता होता है, वो भी धनुष-बाण इस्तेमाल करता है, पर धनुष-बाण उनको लिपता है कि है, भीम की गदा में जब धनुष-बाण से चलता नहीं करता है, तो अपने गदा से उतर जाते हैं, अपने गदा लेके रथ से उतर जाते हैं और जो भी होता है, उसको अपने गदा से ही मारते हैं।
तो जब वो युद्ध करते हैं, शत्रुओं के विरुद्ध क्या होता है? उनका सारा शरीर जो होता है और सिर्फ दो भाग जो होते हैं, सफेद होते हैं—एक है उनका आंख जो सफेद दिख रहा है और दूसरा वो हंस रहे होते हैं, क्योंकि सफेद दांत दिख रहा है। तो उनको देख के ही सफेद जाते हैं और दैत्यों के लिए दूर चले जाते हैं, तो वो सबका विनाश करते हुए कुछ ही समय में सत्यकी और अर्जुन और साथ में आ जाते हैं। सत्यकी तक अर्जुन पहुंच जाते हैं और सत्यकी अर्जुन तक पहुंच जाते हैं, उसके आगे भीम भी पहुंच जाते हैं।
जब भीम पहुंच जाते हैं, तो पहले ही अर्जुन जो ऐसे क्रोधित रहे हैं, कि उसके साथ में कौरव आ रहे हैं, जैसे भीम को देखते हैं सब दौड़ जाते हैं वहां से। तो तभी यहां देख के कर्ण वहां पे आता है, पर कर्ण अर्जुन को चुनौती देता है कि कर्ण से युद्ध में लग जाओगे, सारा दिन चला जाएगा। तो कृष्णा होते हैं, वो भीम को इशारा करते हैं और कर्ण अर्जुन पर आक्रमण करने वाला आता है, तभी भीम कर्ण को चुनौती देता है और जैसे ही कर्ण भीम के… कर्ण कर्ण को चुनौती देता है, तुरंत उससे कृष्णा अर्जुन आक्रमण चल जाएगा है कि कर्ण भीम के बहुत बड़ी दिन में जाएगा है, कर्ण बहुत खतरनाक होता है।
तो कर्ण और भीम में वास्तव में तीन बार सामना होता है, तो दो बार जो होता है भीम हावी होता है कर्ण पे और एक बार कर्ण भीम पे हावी होता है। तो अभी जब युद्ध होता है, बहुत खूंखार युद्ध होता है इन दोनों में और कर्ण सारे शस्त्र इस्तेमाल कर रहा है, पर भीम सब चीज़ वास्तव में पिराएगा हो, कर्ण वहां पे सामने ही है, तभी एक घंटे में भीम जो होता है, दुर्योधन के 30 भाइयों का वध करता है, 30 भाइयों का वध चाहते हैं! जब ये समाचार दुर्योधन के 30 भाइयों का वध पहुंचता है, तो हाहाकार मच जाता है।
गोपी प्रेम और योगमाया का रहस्य
वास्तव में गोपियों को पता है कि कृष्ण भगवान हैं, क्या उनका प्रेम इतना है कि उनको कृष्ण का स्तर पता नहीं है? तो वास्तव में गोपियों के जो स्तर है, गोपियों के योग माया से आते हैं। अगर वास्तव में योग और माया यह विरोध है, माया मतलब जो हमें भगवान से भुला देते हैं, योग मतलब जो भगवान से संबंधित करते हैं, तो योग माया यह विरुद्ध रहता है। यहां तो कायर-वीर है, यहां तो कायर है, यहां तो वीर है, कायर-वीर कैसे हो सकते हैं? यहां यह एक बुद्धिमान-मूर्ख है, यहां तो बुद्धिमान है, यहां मूर्ख है, इसको इंग्लिश में ऑक्सीमोन कहते हैं। ऑक्सीमोन मतलब दो विरुद्ध… कि माया मतलब जो भूल जाना और योग मतलब याद करना, भगवान को संबंध जोड़ना, भगवान को भूल जाना।
तो योग माया साथ में कैसे आता है? तो योग माया यह अनुपस काम की माया है, यह ऐसी माया है—योग मतलब भगवान से मन जोड़ना और माया मतलब ऐसा जो भगवान का संबंध और बढ़ाता है। तो भगवान को स्वामी के रूप में समझना, यह योग है, पर योग माया है, वहां भगवान के लिए स्नेह और बढ़ जाता है, जब हम भगवान को, हमारा संबंध है, हमारा पुत्र, हमारा प्रेमी, इसी के लिए, उन्नत है, हम भगवान के स्तर को स्मरण करते हैं, पर योग माया का स्तर है, वो उससे ऊंचा है, उसमें भगवान के ऐश्वर्य का ज्ञान है, पर उससे अधिक माधुरी बना है। जैसे अभी भी आसमान में तारे हैं, पर सूरज की रोशनी इतनी है कि तारे छिप जाते हैं, इसी तरह से गोपियों को भगवान का स्तर पता है, पर उनका प्रेम इतना है कि वो उस स्तर को याद नहीं करते हैं।
एक कई बार हम देखते हैं गोपी गीत में, जैसे पांचवें श्लोक में बताते हैं वो गोपी गीत के कि—
तवकथामृतं तप्तजीवनं…
यही चिंता श्लोक है, पांचवें श्लोक में बताते हैं उस श्लोक में, जैसे पांचवें श्लोक में—
खल गो गोपी का नन्दनों भवान्, अखिल देही नाम अंतरात्मदः…
यह कल ने खाती तो विश्व गुरुफते हैं, सखपुदे विवां स्वस्पतां खुले बताते हैं वहां पे, कि आप वही व्यक्ति हो जो आपके दुने में परमात्मा हैं, आप वही व्यक्ति हो जो इनको ब्रह्माजी ने आश्ना की थी, तो आप अवतार हो, पर वो यही बताते हो, क्या बताते हैं उनको? सखपुदे विवां, वो बताते हैं सखा, आप उनकी चेतना में प्रधान नहीं रहते हैं, तो पीछे रहते हैं, तो भगवान का प्रेम और बढ़ाने के लिए कई लिए याद आयाता है, तो बताते हैं, पर वह उनकी चेतना में प्रधान नहीं है। प्रधान क्या है? उनका जो विशेष लीष्टे में, विशेष लिह उनका भाव है, वह प्रधान है। हरे कृष्ण!