How Krishna left and returned to Vrindavan – Hindi
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Lecture Summary
श्री कृष्ण का वृंदावन से प्रस्थान और पुनरागमन: सारांश
यह प्रवचन भगवान श्री कृष्ण के मथुरा प्रस्थान, वहाँ उनके द्वारा विभिन्न असुरों के वध, और अंततः उनके वृंदावन पुनरागमन एवं गोलोक धाम गमन की दिव्य लीला का विस्तार से वर्णन करता है:
- मथुरा प्रस्थान और कंस वध: नन्दनंदन कृष्ण कंस का वध करने के बाद उग्रसेन जी को मथुरा का राजा बनाते हैं और स्वयं जल्दी ही वृंदावन लौटने की इच्छा रखते हैं।
- धर्मसंकट और ब्रजवासियों का विरह: मथुरा और यदुवंश की सुरक्षा के दायित्व तथा जरासंध व कालयावन जैसे असुरों के निरंतर आक्रमणों के कारण कृष्ण को मथुरा में ही रुकना पड़ता है। वे ब्रजवासियों को वस्त्र-संदेश और उद्धव-बलराम के माध्यम से सांत्वना भेजते हैं।
- असुरों का वध और गीता की पृष्ठभूमि: कृष्ण क्रमशः जरासंध के बार-बार होने वाले आक्रमणों को विफल करते हैं और अंत में दंतवक्र का वध करते हैं। दंतवक्र वध के पश्चात वे घोषणा करते हैं कि अब वे कभी शस्त्र नहीं उठाएंगे, जो कि आगे चलकर महाभारत और कुरुक्षेत्र युद्ध में उनकी पार्थ-सारथी भूमिका का आधार बनता है।
- वृंदावन पुनरागमन और दिव्य मिलन: दंतवक्र के वध के बाद कृष्ण अपने सारथी दारुक और रथ के साथ वृंदावन लौटते हैं। ब्रजवासियों का प्रेम देखकर सभी गदगद हो जाते हैं।
- पौर्णमासी की मध्यस्थता और गोपियों का विवाह: योगमाया के प्रभाव से वृंदावन में अद्भुत लीला प्रकट होती है, जहाँ सभी गोपियाँ और राधारानी अग्नि परीक्षा व विस्तार लीला के माध्यम से अपनी पूर्ण शुद्धता सिद्ध करती हैं और कृष्ण के साथ उनका दिव्य विवाह संपन्न होता है।
- गोलोक धाम गमन: अंत में, कृष्ण उसी दिव्य रथ को अपनी योगशक्ति से विशाल बनाकर नंद बाबा, यशोदा मैया, समस्त ब्रजवासियों, गैया और वृंदावन सहित भौतिक जगत से परे सीधे आध्यात्मिक जगत—गोलोक वृंदावन की ओर प्रस्थान करते हैं।
Full Transcription
श्री कृष्ण का वृंदावन से प्रस्थान और पुनरागमन कथा
हरे कृष्णा! तो आप सब पूज्य महाराज जी के प्रवचन की अपेक्षा कर रहे होंगे, लेकिन उनकी तबीयत आज ठीक नहीं है, इसलिए दुर्भाग्यवश आप सबको मुझे सहन करना पड़ेगा। जैसे पंडित कहते हैं कि जो कौवा है, वह गरुड़ की जगह कभी नहीं ले सकता है, पर फिर भी महाराज जी के आदेश के अनुसार, उनके आशीर्वाद के साथ, मैं कुछ सीमित प्रयास करूँगा।
मैं जो बारह महाजनों की श्रृंखला चालू कर रहा था, उसमें कपिल देव का जो वृत्तांत है, वह आज की बारी थी, लेकिन मुझे अभी महाराज जी ने 5-10 मिनट पहले ही बताया तो वह तैयार नहीं कर पाया हूँ। तो मैं दूसरी विषय पर आज चर्चा करूँगा। इसका मैं अभी अध्ययन कर रहा हूँ कि भगवान कृष्ण का वृंदावन में पुनरागमन कैसे होता है?
भागवत में बताया गया है कि जिस तरह से वे वृंदावन छोड़कर जाते हैं, तो कैसे वे वृंदावन पुनः लौटकर आते हैं, उसके बारे में हम चर्चा करेंगे। जब भगवान कृष्ण वृंदावन छोड़कर जाते हैं, अक्रूर जी लेने आते हैं, तो भगवान वादा करते हैं कि मैं ज़रूर लौटकर आऊंगा।
मथुरा प्रस्थान और कंस वध का उद्देश्य
और उनको जाना क्यों होता है? क्योंकि बाहरी रूप से कारण है कि नंद महाराज जो हैं, वे कंस के राज के अंदर में एक नागरिक हैं और राजा का आदेश तो पालन करना ही चाहिए। और भगवान कृष्ण सोचते हैं कि कंस बार-बार वृंदावन में आतंक मचा रहा है राक्षसों के द्वारा, तो मैं उधर जाऊंगा तो मैं यह जो आतंक है, इसको अंत कर सकता हूँ। इसलिए भगवान जाते हैं।
और जब भगवान जाते हैं, तो उनकी योजना होती है कि वो कंस का वध करेंगे और तुरंत लौट के आ जाएंगे। और योजना के अनुसार जब कंस का वध कर देते हैं, तो उसके बाद में जो कंस के पिता होते हैं, उग्रसेन, वे वहां बड़े लज्जित हो जाते हैं। एक तरह से क्योंकि अभी वास्तव में जब पिता होता है, तो जो पुत्र है, वह राजकुमार होना चाहिए, पुत्र राजा नहीं बनता है। पर यह कंस इतना निष्ठूर था, इतना नालायक था कि अपने पिता को कैद करके खुद राजा बन गया था।
तो अभी क्योंकि भगवान कृष्ण ने कंस का वध किया था, तो साधारणतया अगर एक राजा आके दूसरे राजा को हरा लेता है, तो दूसरा राजा जीत लिया है, तो उसका वो राजा बन जाता है। तो अभी महाराज उग्रसेन सोच रहे थे कि मेरे पुत्र ने कृष्ण और वृंदावनवासियों उन सबके प्रति इतने अपराध किए हैं, तो मैं उसके लिए शर्मिंदा हूँ।
और भगवान कृष्ण सोच रहे थे कि अभी यहां पर उग्रसेन महाराज यहां पर सामने आ गए हैं, तो मैं उनको राज गद्दी दे दूंगा और मैं वृंदावन चले जाऊंगा वापस। तो भगवान की इच्छा थी कि जल्दी से जल्दी वृंदावन चले जाएं।
उग्रसेन का राज्याभिषेक और यादव समाज की सभा
और फिर उग्रसेन ने कहा कि जो मेरा कंस नालायक पुत्र था, उसने जो भी किया, उसके लिए तो मुझे माफ कर दो और यह जो राज्य है, उसके लिए तुम भी उचित हो। जिसके पास शक्ति होती है, जिसके पास नैतिकता होती है, वही राजा बनना चाहिए और तुम्हारे पास दोनों हैं, तो इसलिए तुम राजा बन जाओ।
तो तभी भगवान कृष्ण ने विचार किया और कहा कि वास्तव में आप कंस के पिता हैं और आपका ही राज्य का अधिकार है और मैं आपका सेवक हूँ। कृपया आप राज पद स्वीकार कीजिए। और फिर यह सुनके जो बाकी सब यदुवंश के लोग थे—अभी जब भगवान लीला करते हैं, तब भी ऐसा नहीं होता है कि सबको पता होता है कि भगवान भगवान हैं—तो जो असुर होते हैं, वे महामाया के प्रभाव में होते हैं, उनको पता नहीं होता है। जो भक्त भी होते हैं, वे योगमाया के प्रभाव में होते हैं और वे सब कभी जानते हैं कि यह भगवान है, कभी जानते नहीं हैं कि यह भगवान है, उनको लगता है कि कृष्ण बहुत शक्तिशाली व्यक्ति है।
तो इस तरह से कृष्ण का बर्ताव देखकर, क्योंकि सारे यदुवंश के लोग जो सेनापति थे, वे सब कंस की शक्ति से बड़े भयभीत थे। और उन्होंने कृष्ण के बारे में बहुत सुना था कि इतने सारे असुरों को मार डाला, पर पहली बार कृष्ण को उन्होंने शक्ति का प्रदर्शन देखा। मुष्टिक असुर, चाणूर, मल्ल युद्ध, विसार, दंभासुर, वैरी, कंसारी, मुरारे, मेरे शांतक—तो उन्होंने देखा कि मुष्टिक असुर, चाणूर, ये सब मल्ल थे, उन सबका वध कर दिया, फिर कंस का वध कर दिया। तो उसकी शक्ति तो बहुत है, देख लिया।
और बाद में जो निस्वार्थ भाव है, वो देखा कि अभी राज्य का अधिकार है, पर राज्य नहीं ले रहे हैं, वो कह रहे हैं कि मैं मेरे जो दादा के समान उग्रसेन हैं, उनका सेवक बनूँगा। तो यहां देखे सारे यदुवंश के जो वरिष्ठ थे, वे सब बहुत प्रसन्न हो रहे हैं और उन्होंने कृष्ण का गुणगान किया। और उग्रसेन से कहा कि आप कृष्ण की इच्छा के अनुसार राज्य पुरस्कार कर लो।
और फिर राज्याभिषेक हो गया उग्रसेन जी का। और फिर कृष्णा जो यदुवंश की असेंबली में, यदु के सभागार में गए और वहां उन्होंने कहा कि अभी आप मुझे सब निवेदन दीजिए, आज्ञा दीजिए, ताकि मैं वृंदावन वापस चले जाऊं।
यदुवंशियों की चिंता और कृष्ण का धर्मसंकट
और इस समय में हम जानते हैं कि जब भगवान कृष्ण वृंदावन से मथुरा आए थे, तभी उनके साथ नंद महाराज भी आए थे और कई ग्वाले आए थे और उनके कई मित्र भी आए थे। तो कुछ वरिष्ठ ग्वाले आए थे और कुछ मित्र आए थे, जो वृंदावन की स्त्रियां थीं, उनके बारे में भी चर्चा है।
तो यदुवंश के जो वरिष्ठ लोग थे, उन्होंने कहा कि जरासंध है, दंक्रवक्र है, शिशुपाल है और ये सब असुर हमारे साथ हैं, हम उनसे युद्ध नहीं कर सकते हैं। अभी एक संकट से आपने हमें बचा लिया है, पर अगर आप हमारे साथ नहीं रहोगे, तो इससे और बड़ा संकट आ जाएगा। तो जब तक ये असुरों का उपद्रव नहीं होता है, तब तक आप कृपया मत जाइए।
और फिर वो गंभीर हो कर कहने लगे, “वास्तव में वैसे भी तुम नंद के पुत्र नहीं हो, तुम तो हमारे पुत्र हो, तुम हमारे वंश के हो और तुम्हारा हमारे प्रति कर्तव्य है, वह वास्तव में प्रजा-स्वामित के प्रति कर्तव्य जो है, उससे अधिक है।”
जब कृष्ण ये सुनने लग गए, तो उनका हृदय मानो कर्तव्य और प्रेम दो रस्सियों से खींचा जा रहा था। कर्तव्य के कारण उनको मथुरा में रहना था कि संरक्षण तो करना है, और जो प्रेम है, प्रेम से इच्छा हो रही थी कि वृंदावन में वापस चले जाएं।
तो उन्होंने विचार किया और बाद में सोचा कि अगर मैं वृंदावन में चला भी जाऊंगा, तो न केवल मथुरावासियों को खतरा होगा, पर साथ-साथ जो ब्रजवासी हैं, उनको भी खतरा होगा, क्योंकि सारे के सारे असुर जो आएंगे वो सब मुझ से बदला लेने का प्रयास करेंगे। और मैं वृंदावन में रहूंगा तो वृंदावन में भी आक्रमण हो जाएगा, तो वृंदावनवासियों को भी बचा नहीं पाऊंगा मैं। और अगर मैं वृंदावन में होंगा तो मथुरावासियों को बचा नहीं पाऊंगा। तो इसलिए बेहतर है कि मैं मथुरा में रहूंगा।
नंद महाराज से संवाद और संकोच
और वो गए, नंद महाराज इंतजार कर रहे थे कि कब नंद महाराज को यह पता चला कि कृष्णा हमारा पुत्र नहीं है, कृष्णा वास्तव में वसुदेव का पुत्र है। तो शास्त्रों में जो पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, इनमें जो वृत्तांत आता है, उसमें भागवतम का विस्तारित वर्णन आता है।
तो वहां पर देखते हैं कि नंद महाराज अंत तक कभी स्वीकार ही नहीं करते हैं कि कृष्णा मेरा पुत्र नहीं है, वे हमेशा सोचते हैं कि कृष्णा मेरा ही पुत्र है। और फिर जब कृष्णा जाते हैं नंद महाराज के पास, अभी हम देखेंगे तो हम सोचते हैं कृष्णा भगवान है, पर उस समय जो भगवान लीला कर रहे हैं, तो एक छोटे बालक हैं, दस साल की उम्र भी अभी तक नहीं हुई है, छोटे बालक हैं वो।
तो वो नंद महाराज के पास जाते हैं और कहते हैं कि पिताजी, यह जो यदुवंश के लोग कह रहे हैं कि उनका संरक्षण करने के लिए मुझे रुकना चाहिए, और वो जो दुर्गा देवी ने भविष्यवाणी की थी कि मेरा वसुदेव का आठवां पुत्र कहीं और चला गया है, तो वो सोच रहे हैं कि वो आठवां पुत्र मैं ही हूँ।
तो भगवान नहीं कहते हैं कि मैं वो पुत्र हूँ, वो कहते हैं कि वो सोच रहे हैं कि मैं वो आठवां पुत्र हूँ और उसके कारण वो मुझे जाने नहीं दे रहे हैं। तो इस तरह से जब कृष्ण बोलते हैं, तो जो नंद महाराज है, वो गंगाधर रूप से हंसने लगते हैं और वो कहते हैं कि जो वसुदेव है, उनका हमने सेवा करने का प्रयास किया, रोहिणी की देखभाल की, बलराम की देखभाल की, पर उसके बदले में वो हमारा ही पुत्र छीन के ले जा रहे हैं हमसे।
और फिर वो क्या समर्थन करते हैं? भागवतम के छठे अध्याय में वर्णन आता है कि पहली बार जब नंद और वसुदेव मिलते हैं कृष्ण के जन्म के बाद, तभी वसुदेव कृष्ण से कहते हैं कि आप काफी वृद्ध हो गए थे और आपको पुत्र नहीं हुआ था, पर अभी यह बड़ा सौभाग्य है भगवान की कृपा है कि ये भी आपको पुत्र हो गया है।
तो फिर नंद महाराज क्या समर्थन करते हैं? देखो, वसुदेव ने नहीं बताया था कि मुझे पुत्र हुआ है, तो मतलब कृष्ण मेरा ही पुत्र है, ये वास्तव में वसुदेव का पुत्र नहीं है। तो फिर भी नंद महाराज कहते हैं कि ये हमारा भाग्य है कि हमारे पुत्र को बड़े लोग जो राजा है, वो अपना पुत्र मान रहे हैं और हमारे मित्र हैं, उन्होंने अभी तक सेवा की है, तो अभी भी हमें सेवा करनी चाहिए और उनको खतरा तो है, इसलिए ठीक है।
ब्रजवासियों को सांत्वना और वस्त्र-संदेश
तो वसुदेव महाराज ने कहा कि जब तक तुम सारे असुरों का वध नहीं करते, तब तक मैं यहीं रहूंगा और फिर तुम्हें साथ लेके ही वापस जाऊंगा, उसके बिना मैं यशोदा तुम्हारी माँ को कैसे मैं देख सकता हूँ? मैंने उनको बोला था, मैंने उनको आश्वासन दिया था कि मैं तुम्हें वापस लेके आऊंगा।
तो फिर कृष्णा सोचने लगते हैं और कृष्णा कहते हैं कि पर अगर आप यहाँ पर रहेंगे, तो यशोदा माई कैसे आपके बिना रह सकती है? तो नंद महाराज कहते हैं कि कोई बात नहीं, मैं उनको भी यहाँ पर बुला लूँगा। तो फिर कृष्णा सोचने लगते हैं और कहते हैं कि पर यशोदा माई आ जाएगी, पर बाकी सब ब्रजवासी क्या करेंगे? बोलते हैं कि वास्तव में कोई भी ब्रजवासी आपके बिना नहीं रह सकते हैं, तो इसलिए सब ब्रजवासी यहाँ पर आ जाएंगे, मथुरा के तट में, जब तक तुम्हारा काम नहीं होता है, तब तक यहीं पर रहेंगे, कम से कम आप रोज तट में देख तो सकते हैं।
तो फिर कृष्णा सोचते हैं कि पिताजी, अभी तो आपके लाखों-लाखों गैया हैं, इसलिए हमारे स्वार्थ के लिए हमें गैया को पीड़ा नहीं देनी चाहिए, तो कृपया आप पुनः वहाँ पर चले जाएंगे और मैं जल्दी ही आ जाऊंगा।
और फिर कृष्ण एक और बात कहते हैं कि मुझे एक और चीज़ आपको बतानी पड़ेगी कि मुझे अभी न केवल मथुरा वासियों का संरक्षण करना है, आपका भी संरक्षण करना है। और भगवान कृष्ण जब लीला करते हैं, तो अधिकांश रूप से वो खुद को भगवान दिखाते नहीं हैं, तो इसलिए वो कहते हैं कि मैं अगर मथुरा में रहूँगा, तो अगर वृंदावन में कोई असुर आक्रमण करेगा, तो मैं संरक्षण नहीं कर पाऊँगा। इसलिए जब तक मैं मथुरा में हूँ, तो दुनिया को यह पता नहीं चलना चाहिए कि मैं आपका पुत्र हूँ और हमारा जो संबंध है, वो हृदय का संबंध है। वो अगर यहां तक किसी को पता नहीं चले, बहुत अच्छा है, ताकि आपका संरक्षण रहेगा।
तो इसलिए नंद महाराज जब वे सुनते हैं, तो मान लीजिए उनके हृदय पर ऐसा पत्थर गिर जाता है, सोचते हैं, नहीं, तो कृष्णा हमारे साथ आ रहा है, पर कृष्णा यह भी कह रहे हैं कि हम उनसे मिलने भी नहीं आ सकते हैं। अगर बार-बार मिलने आएंगे, तो हम क्षत्रियों में हमेशा जासूस रहते हैं, जासूस से पता चल जाएगा कि ये कृष्ण का बड़ा घनिष्ठ संबंध है, ये ब्रजवासियों से।
नहीं तो बाहर के लोगों, बाकी सब लोगों को क्या लग रहा था? एक छोटा बालक था, कहीं और रहने की जगह नहीं थी, कंस का आतंक चल रहा था, इसलिए उसको अपने चाचा के घर में भेज दिया, तो एक चचेरे भाई हैं नंद महाराज और वसुदेव, इसलिए उनके घर में भेज दिया है।
तो नंद महाराज कहते हैं, “ठीक है, पर हम हर दिन तुम्हारा स्मरण करेंगे, मैं तो समझ जाऊंगा, तुम्हारी मां समझ जाएगी, पर गैया कैसे समझ पाएगी, वो तुम्हारे बिना जी नहीं सकती है।”
तो कृष्ण ने कहा कि वे भी समझ जाएंगे, तो मैंने जो मेरे वस्त्र हैं, मेरे वस्त्रों का मेरे शरीर का सुगंध है, तो मैंने मेरे वस्त्र, वो सुदामा और दामक उन दोनों को दूंगा, मेरे और बलराम जी के वस्त्र, और ये जब वो पहनेंगे, तो सब गैया सोचेगी कि कृष्ण-बलराम ही वापस आ गए और वो मेरे ऐसे ही वेणु बजा सकते हैं। तो इस तरह से हम उनको सांत्वना देंगे।
और ये जब बातें चल रहे थे, सब बाकी सब ब्रजवासियों के बीच में, कृष्ण के ग्वाल मित्र भी थे, और वहां सब रोने लग गए। कृष्ण ने कहा कि तुम इस तरह से रोओ मत, क्योंकि मेरा आप तो रो रहे हो, पर मेरा हृदय रो रहा है, मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता, पर मेरा वसुदेव और उनके परिवार का संरक्षण करने का भी कर्तव्य है, तो इसलिए कृपया आप मेरी मदद कीजिए।
तो इस तरह से कुछ निवेदन करते हैं, तो सब ब्रजवासी रोते-रोते जाते हैं। और जब ब्रजवासी लौट के आते हैं और जब बाकी सब जो ब्रजवासी मथुरा गए नहीं हैं, वो इंतजार कर रहे हैं और जो देखते हैं कि सारे ब्रजवासी आ गए हैं पर कृष्ण नहीं हैं, तो जो कर्वदैतूर चलता है और उन्हें पता चलता है कि कृष्ण कुछ समय के बाद आएंगे। तो कितना समय? किसी को पता नहीं, कितना समय?
तो फिर नंद महाराज कहते हैं कि भले ही हम नहीं आ सकते हैं, पर हम जो संदेशवाहक हैं, उनको निर्देशित करेंगे। और वो कहते हैं कि हर कुछ दिनों में संदेशवाहक यहां से वृंदावन से मथुरा जाएंगे और मथुरा में कृष्ण क्या कर रहे हैं, उनका समाचार प्राप्त करके हमारे पास ले आएंगे। और रोज चलते रहेंगे, तो कम से कम कृष्ण क्या कर रहे हैं, उनके पास चलता रहेगा।
रोहिणी का आगमन और द्वारका-मथुरा की लीलाएं
और उसके बाद में, जब कृष्ण अभी वसुदेव और देवकी के साथ हैं, तो कैसे है? कृष्ण एक बालक के समान व्यवहार कर रहे हैं। तो मान लीजिए एक बालक है, उसको एक माता-पिता ने बचपन से बड़ा किया है और अचानक किसी और के घर में जाते हैं और वहां पर रहने लगते हैं।
तो फिर देवकी वो सोच-विचार करती है कि वसुदेव-देवकी मेरे माता-पिता है, पर वही स्वाभाविक प्रेम का संबंध नहीं होता है, तो इसलिए जब वसुदेव देखते हैं कि कृष्ण देवकी को एक मां के रूप में बुलाकर मां के समान स्नेहपूर्वक संबंध नहीं निभा पा रहे हैं, तो अब वसुदेव सोच में पड़ जाते हैं कि कृष्ण को तो मां का प्रेम मिलना चाहिए।
तो वो क्या सोचते हैं? “मैं रोहिणी को बुला लेता हूँ, रोहिणी मेरी पत्नी है और रोहिणी ने बचपन से कृष्ण और बलराम को स्नेह दिया है।” संदेश भेजते हैं और नंद महाराज को संदेश भेजते हैं कि कृपया आप, जो यहां पे आप हैं और मैं बोलने को बोल गया, अभी कंस का कोई आतंक नहीं है, इसलिए रोहिणी को आप मथुरा भेजते हैं।
जब रोहिणी ये संदेश सुनती है, तो वास्तव में वह एक तरफ से दुखी तो भी दुखी हो जाती है। लोग ‘गोपाल चंपू’ में जीव गोस्वामी वर्णन करते हैं कि रोहिणी और यशोदा, ये दोनों वास्तव में मानवी एक आत्मा जो दो शरीर में हैं।
जब वो दोनों का पहली बार मिलन होता है, यशोदा माई कहती है कि वास्तव में मेरा तो भाग्य नहीं है कि कृष्ण का पुनः दर्शन कर सके, पर तुम जाओगी और तुम कृष्ण के साथ रहोगी, तुम कृष्ण को खाना खिलाओगी, तुम कृष्ण को देखोगी, तुम्हारे आंखों से मैं कृष्ण को देखूंगी, तुम्हारे हाथों से मैं कृष्ण के बाल को सहला पाऊंगी, मैं तुम्हारे हाथों से कृष्ण को प्रेम करवा पाऊंगी। तो कृपया जाओ और जो वृंदावन लीला है और जो द्वारका-मथुरा लीला है, इन में जो समन्वय है, वो पांच व्यक्तियों का है।
वास्तव में जो कृष्ण-बलराम स्वयं हैं और तीसरी शक्ति जो है, वो है रोहिणी, चौथा है उद्धव, इसके बारे में हम चर्चा करेंगे, और पांचवें जो हैं, वो है दारुक, जो कृष्ण के सारथी हैं। इसके बारे में हम चर्चा करेंगे, पर रोहिणी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।
तो अब जब रोहिणी आ जाती है, तो फिर कृष्ण और बलराम यहां पे अभी मथुरा में रह रहे हैं, पर अपने हृदय का जो दुख है, वो केवल एक-दूसरे को बता सकते हैं, क्योंकि वो किसी और को बता नहीं पा रहे हैं। तो रोहिणी को जब आती है, तो वो सब कुछ बताते हैं उनको।
तो रोहिणी सोचती है कि अभी क्या हो रहा है कि जो यदुवंश के लोग हैं, वो सोच रहे हैं कि यह हमारा बालक है कृष्णा, हमने उनको ब्रजवासियों के पास रखा था देखभाल के लिए, पर उन्होंने क्या जादू कर दिया है उसपे, कि वो अभी उनसे हमसे अधिक प्रेम करता है और कभी भी हमें लगता है, डर लगता है कि कभी भी अगर उसको थोड़ा ढीला छोड़ेगा, तो इसलिए यदुवंश के लोग उनको थोड़ा भय हो रहा है और थोड़ा नाराज़गी है ब्रजवासियों के प्रति।
तो देवकी ये देखती है, तो देवकी सोचती है कि ये जो गलत प्रेम है, मैं उसको निवारण करने का प्रयास करूंगी और वो बताने का प्रयास करती है कि ब्रजवासियों का वास्तव में कृष्ण के प्रति कितना प्रेम है, कितना निस्वार्थ भाव से प्रेम है, निर्मल प्रेम।
तो जब ये सुनाने लगती है, तो यदुवंश की जो स्त्रियां हैं, आशुर्ष्या कहती है, वो कहती है कि वो हंसने लगती है और वो कहती है, “लगता है कि तुम्हें भी वृंदावन के मक्खन का जो स्वाद है, वो लग गया है, उसके कारण तुम भी उनके पक्षपाती बन गए हो।”
जब ऐसे सुनती हैं, तो रोहिणी शांत हो जाती है, वो कहती है कि ब्रजवासियों के बारे में कुछ कहोगे, कुछ कह ही नहीं सकते हैं, यहां भी।
उपनयन संस्कार और शिक्षा प्राप्ति
और फिर वो बाद में कृष्ण के अलग-अलग संस्कार होते हैं, जो thread ceremony, होती है, इसको हिंदी में क्या बोलते हैं? उपनयन संस्कार होता है, करना होता है। तो फिर कृष्ण वसुदेव-देवकी से कहते हैं कि क्या मैं ब्रजवासियों को, नंद महाराज को, यशोदा माई को बुला सकता हूँ यहाँ भी?
तो वसुदेव-देवकी ना तो नहीं कहते हैं, पर हां भी नहीं कहते हैं, वो ना नहीं कह सकते हैं, कृष्ण को ना कैसे कहेंगे वो, पर हां भी कहने की इच्छा नहीं होती है, तो उनके हृदय को उनकी भाव बोलते हैं।
तो कृष्ण कहते हैं, “नहीं बुलाएँ, पर कृष्ण क्या कहते हैं? कृष्ण संदेश भेजते हैं कि ये जो सुदामा, दामक जो है, वो मेरे प्रतिनिधि है। तो वास्तव में आप भी, वैश्य-क्षत्रिय उपनयन होता है, वो क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तीनों करते हैं, तो क्या कीजिए आप, आप यहां पर मेरे उपनयन को निभा पा रहे हैं, तो आप उन दोनों के द्वारा मेरा उपनयन आप वहां पर कीजिए।”
तो उसमें आप मेरा जो मूर्ति के रूप में, आप मेरा सान्निध्य प्राप्त कर पाओगे।
और फिर इसके बाद में, जब उपनयन हो जाता है, तो अभी कृष्ण सोचते हैं कि मुझे किसी गुरु के पास जाके शिक्षण ग्रहण करना चाहिए, पर वो सोचते हैं कि अगर ब्रजवासियों को पता चलेगा कि मैं दूर कहीं गया हूँ, तो इसलिए उनको भय हो जाएगा, तो इसलिए वो कहते हैं कि ब्रजवासियों को संदेश कि मैं कहा गया हूँ।
आज जब हम जानते हैं कि आपने अगर दशम स्कंध पढ़ा है, तो कृष्ण जब संदीपानी मुनि के आश्रम में जाते हैं, तो कितने दिनों में सारा शिक्षण प्राप्त कर लेते हैं? चौंसठ दिनों में! सात साल का जो ब्रह्मचर्य का शिक्षण होता है, वो 5 साल से 25 साल तक चलता है, तो जो 20 साल का शिक्षण है, भगवान कृष्ण दो महीने में, कुछ ही समय में कर लेते हैं।
क्यों ऐसे कर लेते हैं इतनी तेजी से? एक तरह से वो अपनी प्रवीणता दिखा रहे हैं कि जो भी सीखना है, कितना तेजी से मैं सीख सकता हूँ। पर साथ-साथ कृष्ण सोच रहे हैं कि जितना दिन ज्यादा रहूंगा मैं दूर, उतना ब्रजवासियों को संशय हो जाएगा और फिर उनको पता चल जाएगा कि मैं मथुरा से दूर कहीं अवंती चला गया हूँ और फिर उनको भय हो जाएगा। इसलिए कृष्ण सोच रहे हैं कि मैं अभी एक क्षत्रिय की भूमिका निभा रहा हूँ, तो जो कृष्ण का कर्तव्य है, वो करना ज़रूरी है मुझे, इसलिए मैं गुरुकुल में तो जाऊंगा, पर गुरुकुल का काम जल्दी से निपटा लूंगा।
तो इसलिए दो महीनों में ही निपटा के तुरंत कृष्ण वापस कृष्ण-बलराम मथुरा आ जाते हैं। और जब मथुरा आते हैं, तो तभी वो पूछते हैं रोहिणी से कि वृंदावन से कोई संदेशवाहक आए थे? तो कहते हैं, “हां, आए थे।”
तो क्या हुआ? तो कहते हैं, “वो इधर-उधर सब जगह आपको ढूंढ रहे थे, किसी ने कोई संदेश नहीं दिया, उनको समझ में नहीं आया कि कहां गए थे।”
तो तुरंत कृष्ण कहते हैं कि मैं मेरी ओर से संदेशवाहक है, तो उनको भी नियुक्त कर दूंगा और वो हमेशा मेरा संदेश बार-बार यहां से उधर ले जाएंगे और कहते हैं कि अभी सब कुछ ठीक है, मैं कुछ समय के लिए यहां पे मथुरा में मेरी जानकारी आपको नहीं मिली होगी।
जरासंध और कालयावन के आक्रमण
तो साधारणतया जानते हैं जब कोई एक राजा उस राज्य पे आक्रमण कर रहा होता है, तो मथुरा यहां पे है, वृंदावन यहां पे है, जरासंध का जो राज्य है, यहां पे है। जरासंध की जब सेना आती है, तो वो वृंदावन से ही होके आती है, विशाल सेना जब आ रही है, जब ब्रजवासी देखते हैं, तो क्या करते हैं?
सारे ब्रजवासी अपने गइयों को साथ लेकर वृंदावन के दक्षिण भाग में जो पहाड़ होता है, पहाड़ के जंगल में जाकर रहते हैं और क्योंकि जरासंध को जो ब्रजवासियों का कृष्ण से संबंध पता नहीं है, इसलिए वो सोचता है ये वृंदावन दूसरे ये गांव के समान गांव है, इसलिए वहां पर कोई उपद्रव नहीं करता है, वो मथुरा में आता है।
हर बार कृष्ण सोचते होते हैं कि ये सारे असुरों का जल्दी-जल्दी वध कैसे करें? तो जरासंध आक्रमण करने आता है, तो कृष्णा और बलराम सारे यदु-वेदु के सैनिक होते हैं, बहुत डर जाते हैं कि इतनी बड़ी सेना होती है और जरासंध स्वयं भी बड़ा योद्धा होता है। तो फिर कृष्णा और बलराम स्वयं, मान लीजिए थोड़ी सेना होती है, पर वो दोनों अकेले ही तो सारी सेना का विनाश करते हैं।
और बलराम जी बड़े क्रोधी हो जाते हैं, कि जरासंध को पकड़ लेते हैं और जरासंध को पकड़ के वध ही करने वाले होते हैं, तो कृष्णा सोच रहे होते हैं, तो कृष्णा आके अचानक रोक देते हैं, कृष्णा बलराम जी का हाथ पकड़ लेते हैं। क्यों पकड़ लेते हैं? वो सोचते हैं कि जरासंध का वध कर देंगे, तो फिर बहुत से आगे असुर हैं, वो एक-एक करके आएंगे, पर अगर जरासंध को जिंदा छोड़ देंगे, तो जरासंध वापस आएगा आक्रमण करने के लिए, बाकी सब असुरों को लेके आएगा, तो यहां पे बैठे-बैठे सब असुरों का हम वध कर देंगे, तो इसलिए हम गुप्त पता से काम करेंगे।
तो बलराम जी आश्चर्यचकित हो जाते हैं और फिर तो कहते हैं, “ज जरासंध को तुम छोड़ दो।”
तो जरासंध बड़ा अपमानित जाता है, सोचता है क्या करूं? तो सोचता है कि शायद मुझे ये क्षत्रिय की जो अपमान है, वो मृत्यु से बड़ा बत्तर है, “मरना प्रागच्छति, मरनात् तिरश्चरति”, वो सोचता है कि मैं अभी जाके संन्यास लेके, हिमालय, वानप्रस्थ लेके मैं हिमालय चले जाऊं, इतना बड़ा अपमान हो गया है।
तो जरासंध के अलग-अलग योद्धा होते हैं, उनकी तो मृत्यु हो जाती है, पर जरासंध के कुछ मित्र सैनिक होते हैं, सेना होती है, तो कुछ पीछे से आ रही होती है और जरासंध अकेले आता है और देखकर क्या हुई, पूछते हैं, जरासंध सब कुछ बुलाता है, बोलते हैं, “कोई बात नहीं, जो है, युद्ध जो है, ये खेल के समान है और खेल में कभी कोई जीतता है, कभी कोई हारता है, और हार-जीत तो होती रहती है, ये नियति से निर्मित होती है और ये एक बार कुछ कृष्ण जीत गए, पर वापस तो जीतने वाले नहीं हैं, तो इसलिए तुम ऐसे हताश मत हो जाओ, वापस तुम सेना को जोड़ो, अपना हो जाओ।”
तो जरासंध जो होता है, जो असुर होता है, उनको अगर कोई दैवी कार्य करना है, सौ बार बोलेंगे, तो भी वो सौ कारण देंगे नहीं करने के लिए, और कोई आसुरी कार्य करना है, एक आधा कारण भी दिया है, तो क्या होता है? कारण ही चाहिए! “हां, अगली बार तुम कृष्ण का वध ज़रूर कर दोगे।”
जरासंध वो वध सुनता है, तो फिर तुरंत वो चल जाता है अपने राज्य में और वहां भी जो पूरी सेना तैयार करने लगता है। तो जब ऐसे होता है, तो दूसरी बार आता है भगवान, दूसरी बार वो ही करते हैं, सारे सेना का वध कर देते हैं, उसको छोड़ देते हैं।
दूसरी बार, चौथी बार, दस, ग्यारह, पंद्रह, सत्रह बार होता है और अठारहवीं बार जो होता है, तो जरासंध सोचने लगता है, कितने सेना को लेकर आऊंगा मैं? यह तो चलते रहेगा। तो वो सोचता है कि मैं न केवल मेरे साथ के जो सेना है, उनको लेकर आऊंगा, मैं दूसरों को भी लेकर आऊंगा। तो कालयावन, यवन का राजा होता है, वो साथ में लेकर आता है।
मुचुकुंद महाराज का प्रसंग और कालयावन का वध
और कृष्ण अंधकार में चले जाते हैं और कालयावन देखता है, तो कोई व्यक्ति सो रहा है वहां में, तो समझते हैं कि कृष्णा ही नाटक कर रहे हैं, सांवर से लात मारता है, उससे लात मारता है।
तो वो मुचुकुंद महाराज सो रहे होते हैं। अगर वो बड़ी लंबी कहानी है कि मुचुकुंद महाराज ने जो व्यक्ति सो रहा है कि देवताओं को मदद करने का और वो लात हजारों-हजारों साल तक युद्ध करते हैं देवताओं के सहायता के लिए असुरों के साथ। और अभी देवताओं का जो दिन और रात बहुत लंबा होता है मानव के तुलना में, तो इसलिए अगर देवताओं के अगर दस दिन तक युद्ध चल रहा है, तो वो मानव के तुलना से हजारों साल तक युद्ध करते हैं।
तो वो बहुत समय तक युद्ध करते हैं और जब अगर देवताओं के लिए कहते हैं कि अभी हम आपसे बहुत प्रसन्न हो गए हैं कि आपने हमारे लिए इतना युद्ध कर रहे हैं, तो कुछ वर दीजिये। तो अभी मैं इतने थक गए होते हैं, मुझे एक ही वर चाहिए, ये सुनना है, तो अभी इतना थक गया, मुझे वो सोना है, और अगर आप कोई वर देना चाहते हैं, तो ये वर दो कि जो भी मेरी नींद को तोड़ेगा, वो भस्म हो जाएगा। तथास्तु, दो कहते हैं।
तो भगवान ये तो जानते हैं, तो मुचुकुंद जब सो रहा होता है, तो क्या होता है? कालयावन आके मुचुकुंद को लात मारता है और मुचुकुंद अपनी आंखें खोलता है। आंखें खोलता है, स्वाहा! तो कालयावन वहीं पर भस्म हो जाता है।
तो वास्तव में शास्त्रों में बताया गया है, कोई व्यक्ति सो रहा है, तो उसको उठाना भी है, तो उसको वास्तव में निद्रा से जागृति में लाना है, तो वो स्नेह से लाना चाहिए। ऐसे नहीं उठा, ऐसे तरह से नहीं करना चाहिए। कोई व्यक्ति सो रहा है, तो उसको अगर निद्रा से जागृति में लाना है, तो स्नेहपूर्वक, आदरपूर्वक भाव से लाना चाहिए, इसलिए तो वो एक अपराध होता है।
वास्तव में अगर हम बहुत तमोगुण में रह रहे हैं, भगवान की सेवा नहीं कर रहे हैं, वो भी एक तरह से अपराध है, तो इसलिए हमें नहीं सोचना चाहिए कि तुम मुझे उठा रहे हो, अपराध कर रहे हो, ऐसा भाव नहीं है।
पर तो यहां पे जो इस तरह से कालयावन का वध हो जाता है और फिर भगवान कृष्ण को अपना दर्शन देते हैं, उसका आशीर्वाद देते हैं और फिर पुनः वो मथुरा आते हैं और तब तक कौन आ गया होता है वहां पे? जरासंध आ जाता है। फिर पुनः जरासंध से भी युद्ध किए बिना भगवान भागते हैं और वो सोचते हैं कि जरासंध, मैं सोचता हूँ, मेरी इच्छा, भगवान हमेशा भक्त वत्सल, तो वो क्या दिखाना चाहते हैं कि कैसे मेरे भक्त महान हैं।
तो वो सोचते हैं कि ये जरासंध का वध जो है, मैं मेरे हाथों से करूंगा, तो मुझे गुणगान मिल जाएगा, पर अगर जरासंध का वध मैं नहीं करता हूँ, मेरा भक्त करता है, तो उससे मेरे भक्त का गुणगान और बढ़ जाएगा। इसलिए उनकी योजना क्या होती है कि वो प्रेम के हाथों से जरासंध का वध करना चाहते हैं, इसलिए वे जरासंध को पुनः मारते नहीं हैं, वो एक बड़े पहाड़, प्रस्त्रवण नाम के प्रस्त्रवण में जहां पे हमेशा वर्षा हो रही होती है, वैसे पहाड़ भी के ऊपर चढ़ जाते हैं।
द्वारका गमन और रुक्मिणी हरण
और जरासंध सोचता है क्या कर रहा है यह? पहाड़ पर चढ़ गया है, तो वो अपने सारा ईंधन लेके आता है और पहाड़ को जला देता है। ऐसे आजकल के आतंकवादी होते हैं, कोई बिल्डिंग में अगर कोई यंत्र है, तो बिल्डिंग को बढ़ाते हैं, तो उस तरह से वो सोचता है कि यह सारे पहाड़ को जला देगे। पर वो जानते भी हैं कि वो पहाड़ को जला देते हैं, पर भगवान कृष्णा जो है, वो सीधा उधर से कूद जाते हैं और हंसते-हंसते वहां से वापस मथुरा पहुँच जाते हैं।
मथुरा से देखते हैं कि यहाँ पर कृष्णा आ गया है और फिर वहाँ से द्वारका पहुँच जाते हैं। और फिर जब यह संदेशवाहक वहाँ पर आते हैं, कृष्णा से मिलते हैं, मथुरा-वृंदावन से आया संदेशवाहक, तो कृष्णा उनसे कहते हैं कि तुम ब्रजवासियों को बता देना कि अभी मैं थोड़ा दूर जा रहा हूं, पर चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, मैं उनके संरक्षण के लिए थोड़ा दूर जा रहा हूं।
और आप संदेशवाहक हैं, उनके लिए मैं आप सबके लिए एक हजार बहुत ही तेज घोड़ों का योजना करता हूँ, ताकि तुम्हें जल्दी से जाना पड़ेगा वृंदावन से द्वारका, तो समय लग जाएगा, घोड़ों पर जाओगे तो तेजी से आप जा सकते हैं। तो इस तरह से जब योजना हो जाती है, तो फिर कृष्ण द्वारका में रह रहे होते हैं।
और फिर उसके बाद में अलग-अलग लीलाएं होती हैं, तो रुक्मिणी हरण की लीला होती है। तो जब रुक्मिणी भगवान से निवेदन करती है कि अगर आप मुझे बचाने के लिए नहीं आओगे, तो शत जन्म भी सातवां आती है, क्योंकि वो कहती है कि अगर आपके चरण कमल जो है, वो श्री वल्लभ अपने सिर पर लेते हैं, अगर मुझे आपके चरण कमल का आश्रय नहीं मिलेगा, तो फिर मैं जीवित नहीं रह सकती, मैं प्राण त्याग दूंगी, त्याग दूंगी, शत जन्म में बीच से, मैं सात जन्म तक यूं ही तपस्या करती रहूंगी, ताकि मुझे आपका सानिध्य, आपका सानिध्य मिल सके, आपकी सेवा मिल सके।
तो कृष्ण सोचते हैं कि अगर मैं द्वारका में रहूंगा और द्वारका में अगर मैं विवाह कर लूंगा किसी से, तो अपने विवाह के बंधन में पड़ जाऊंगा मैं और फिर मैं वृंदावन जा नहीं पाऊंगा, फिर क्या करूंगा मैं?
और वो सोचते हैं कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा, तो ये रुक्मिणी है, उसके जो भापून खत लिखा है, उसके अनुसार वो खुद को मार भी डाल सकती है, तो मैं तो यह नहीं चाहता कि वो खुद को मार डाले, वो तो मेरी भक्त है, वो सोचते हैं ठीक है, मैं उसको बचा लेता हूँ, फिर बाद में देखेंगे क्या करना है।
असल भगवान जाते हैं और रुक्मिणी को वो शिशुपाल के आंखों के सामने उससे छीन के ले आते हैं और फिर वो तुरंत गोपाल चंपू में योजना आता है कि तुरंत विवाह नहीं करते हैं, क्योंकि वो सोचते हैं कि नंद महाराज और वसुदेव-देवकी के, नंद महाराज और यशोदा माई की इजाजत चाहिए। तो जब वसुदेव नंद महाराज को एक खत लिखते हैं कि रुक्मिणी यहां पे आई है और इसके पहले जो होता है, रेवती और बलराम जी का विवाह हो जाता है।
उद्धव का ब्रज में संदेश और बलराम का वृंदावन गमन
और जब यह समाचार मिलता है कि रेवती और बलराम जी का विवाह हो गया है, तभी नंद महाराज सोचते हैं, कृष्ण क्या करेंगे? अगर कृष्ण किसी क्षत्रिय लड़की से विवाह करते हैं, उसका मतलब है कृष्ण यह स्वीकार कर रहे हैं कि वह एक क्षत्रिय है। अगर कृष्ण वृंदावन में आएगे और हमारे गांव में किसी वैश्य लड़की से विवाह करेंगे, तो वह स्वीकार कर रहे हैं कि वह वैश्य है, वह हमारे परिवार करेंगे। तो सोचते हैं, अभी क्या करेंगे कृष्ण?
नंद महाराज सोचते हैं कि बलराम जी तो विवाह करेंगे, वो उचित है, पर कृष्ण क्या करेंगे? जो वसुदेव इस तरह से खत भेजते हैं कि रुक्मिणी आई है, उनसे विवाह करना है, तो नंद महाराज सोचने के लिए लगते हैं कि वास्तव में कृष्ण और बलराम दोनों बचपन से ही साथ में थे, तो अगर बलराम जी ने विवाह कर लिया है और वो अपने पत्नी के साथ आएगा, तो कृष्ण का विवाह होना चाहिए। कृष्ण ने हमारे लिए वादा किया है कि वापस आएंगे, पर जरूर वो आएगा, किस तरह से आएगा, हमें पता नहीं है, पर हमें विश्वास है कि वो आएगा।
तो इसके पहले जो कृष्ण द्वारका में होते हैं, मथुरा में होते हैं, तो कृष्ण बड़े उतावले होते हैं कि मैं कब वृंदावन जा पाऊंगा? तो इसलिए सोचते हैं कि मैं जा नहीं पा रहा हूँ, इसलिए वो क्या करते हैं, उद्धव को भेजते हैं।
उद्धव को भेजने के कई कारण हैं:
- उद्धव सबसे पहले दिखने में कृष्ण के समान ही हैं, तो उससे ब्रजवासियों को कृष्ण का स्मरण होगा।
- दूसरा कारण यह है कि जो मथुरावासियों में से कृष्ण के हृदय के सबसे करीब जो है, वो उद्धव है। उद्धव बचपन से ही कृष्ण की भक्ति करते हैं और कृष्ण के जो एक चाचा थे, उनके पुत्र थे, कृष्ण के चचेरे भाई हैं उद्धव, और वह कृष्ण का और उनका जो प्रेम था, वो साख्य रस के समान था, बोलते हैं साख्य रस में नहीं है, पर साख्य के समान ही है। तो बिल्कुल उनके उद्धव सकते हैं, वो कहते हैं कि मेरे हृदय की भावना को उद्धव समझ पाएगे और ये भावना वो ब्रजवासियों को समझाओ।
- और साथ-साथ उद्धव सोच रहे थे कि वास्तव में सारे मथुरावासी जो प्रेम करते हैं कृष्ण से, उनमें से सबसे घनिष्ठ मैं हूँ, तो दिखाना चाहते हैं कि तुम से भी अधिक प्रेम करने वाले कौन है, इसलिए वो ब्रजवासियों का प्रेम का दर्शन उद्धव को कराना चाहते हैं।
तो इसीलिए इन तीन कारणों से उद्धव का संदेशवाहक के रूप में भेजते हैं।
और जब भेजते हैं इस तरह से, तो तभी उद्धव जाकर संदेश देता है और सांत्वना देता है और कई समय तक रहता है। और उद्धव इस तरह सारे ब्रजवासियों से बर्ताव करता है कि सारे ब्रजवासी उद्धव को अपना ही एक ब्रजवासी मानने लगते हैं, वो इतना अच्छा है। और वो कहते हैं कि कृष्ण ने आश्वासन दिया है कि वो जरूर आएगा।
जैसे भारत से बड़े आकांक्षा के साथ कोई माता-पिता अपने विद्यार्थी, अपने पुत्र को सिखाते हैं और उसको अमेरिका भेजते हैं कि आप अमेरिका में जाके पढ़ाई करो, और जब अमेरिका में पढ़ाई कर रहा था, यहां पर कोई अमेरिकन लड़की से विवाह कर लेता है, माता-पिता सोचते हैं कि भारत आएगा कि नहीं वापस? अगर भारत नहीं आएगा तो हमको तो उधर बुलाना चाहिए, नहीं तो हमको यहीं रह जाएगा, वो उधर रह जाएगा।
तो उसी तरह से जो ब्रजवासी होते हैं, उनको चिंता होती है। तो कृष्ण जाते हैं उद्धव के पास और कहते हैं, “उद्धव, आप पुनः जाके संदेश लिए जा सकते हैं?”
तो वो तो मुझे एक बार में संदेश लिए गया था और जो पहली बार, अगर अभी तक आप वापस नहीं गए हो, तो क्या तुम्हें लगता है ब्रजवासी मुझको विश्वास करेंगे? वो तो मुझे झूठा मान लेंगे, मेरे वचनों से कभी आश्वासन नहीं मिलेगा और वो तो उतावले हैं। मैं ना तो जा सकता हूँ, मैं जाने की इच्छा भी नहीं है, ना तो मैं उनको आश्वासन कर सकता हूँ और ना तो मैं उनका जो दुख है, वो देख सकता हूँ, तो नहीं जाना चाहिए।”
कृष्ण सोचते थे कि मैं तो जा ही सकता हूँ, अभी दंतवक्र शिशुपालों का वध नहीं हुआ है, तो तभी क्या करें?
तो वो मुझे कहते हैं, तभी बलराम जी वहां पे आते हैं, बलराम जी कहते हैं कि बहुत समय से मेरे पैरों में एक जोश, क्या जोश? मेरे पैर दौड़ते हुए वृंदावन जाने की इच्छा कर रहे हैं, तो मैं बहुत समय से ये पैरों के जोश, इसको नियंत्रण कर रहा हूँ, तो अभी मैं नियंत्रण नहीं कर सकता हूँ, कहते हैं, “मैं अभी वृंदावन जा रहा हूँ और न केवल वृंदावन जा रहा हूँ, तो मैं भी साथ में लेकर जाऊंगा।”
तो कृष्ण कहते हैं कि मेरी तो बहुत इच्छा है वृंदावन आने की, जाने की, पर देवकी-वसुदेव वो जाने नहीं देंगे, तुम तो वसुदेव के पुत्र हो और वो जानते हैं कि तुम उनके पुत्र हो, तो उनको यह भय नहीं है कि तुम वृंदावन जाओगे तो वापस नहीं आओगे, इसलिए तुम जाओ और तुम मेरा संदेश लेके जाओ कि मैं जरूर आऊंगा।
दंतवक्र वध और कथा का समापन
तो फिर यह जो है, यह भागवतम के 65वें अध्याय में वर्णन आता है, तो पहले उद्धव का जो, उद्धव जब वृंदावन जाते हैं, उसका भागवतम के 66 से 70 अध्याय में वर्णन आता है। तो उसके बाद में जो 55 से 60 अध्याय हैं, उनमें कृष्ण के अलग-अलग विवाह का वर्णन आता है और फिर उसके बाद में कृष्ण जो होते हैं, बलराम जी को वृंदावन भेजते हैं।
और जब इस तरह से वृंदावन भेजते हैं बलराम जी को, बलराम जी वृंदावन में 2 महीने तक रहते हैं और उनकी जो गोपियां करते हैं और फिर कृष्ण की गोपियां जो हैं, उनको कृष्ण का स्मरण दिलाते हैं और सब ब्रजवासी सांत्वना लेके पुनः वापस हो जाते हैं।
और फिर इस समय तक अधिकांश असुरों का वध हो गया है, अधिकांश असुरों का वध हो गया है और कुछ असुरों बाकी है। तो शिशुपाल जो होता है, उसका वध राजसूय यज्ञ के समय हो जाता है। और राजसूय यज्ञ के समय वध होता है उसका, उसके बाद में जब कृष्ण पांडव के साथ होते हैं, शिशुपाल जो होता है, दंतवक्र जो होते हैं, ये कौन होते हैं? जय-विजय होते हैं। तो दंतवक्र वो सोचता है कि मेरा शिशुपाल इतना विधुर था, उसका वध कर दिया, मैं जरूर इस कृष्णा का वध कर दूंगा।
तो वास्तव में दंतवक्र जो होता है, वहां राजसूय यज्ञ के समय में नहीं होता है, क्यों नहीं होता है? वो तो सोचता होता है कि कृष्णा एक-एक करके असुरों का वध कर रहे हैं, मुझे कुछ करना चाहिए, तो इसलिए वो जाता है हिमालय में, तपस्या करता है और शिव जी से शक्ति प्राप्त करता है, कहता है कि मेरा एक शत्रु है और मैं शक्ति का वध करना चाहता हूँ।
वो जानते हैं कि अगर शिव जी जो हैं और शिव जी तो एक कृष्ण भक्त से नहीं होंगे, उनका तो अगर कृष्ण का वध करना है बोलेंगे, तो शिव जी वर नहीं देंगे। पहले से वो अनुभव हो चुका है कि जयद्रथ भी वैसे ही मांग करते हैं कि मैं पांडवों का वध करना चाहता हूँ, बोलेंगे कृष्णा, पांडव, कृष्णा के भक्त हैं, मैं वो नहीं कर सकता हूँ।
तो दंतवक्र सोचता है कि अगर शिव जी नहीं देते हैं, तो कृष्ण का वध करने का वर कैसे दे? सोचता है कि मेरा एक शत्रु है, मुझे उसका वध करना है, तो इस प्रकार से।
इसी प्रकार से विरधजवर, साल्वे और दंतवक्र दोनों मांगते हैं और फिर कृष्ण साल्वे का वध कर रहे थे और तभी दंतवक्र जो होता है, वो मथुरा के इलाके में पागल की तरह घूम रहा होता है और वो सोचता है कि कृष्णा कहां मिलेंगे मुझे? और जब उसको सुनता है कि कृष्णा ने अपने सुदर्शन चक्र से जो शिशुपाल का वध कर दिया है, सोचता है कि मैं कृष्णा को ऐसे समय में पकड़ने चाहता हूँ, जब उसके पास सुदर्शन चक्र नहीं होगा।
अगर उसके पास सुदर्शन चक्र होगा, तो मैं कुछ कर नहीं सकता और कब ऐसे मिलेंगे कि कृष्णा के पास सुदर्शन चक्र नहीं होगा और तभी मैं उसका वध कर दूंगा। तो सोचता है कि कृष्णा ने कभी वृंदावन में मेरा चक्र इस्तेमाल नहीं कर रहा है, तो सोचता है कि शायद वृंदावन में मेरा चक्र को भूल जाता है, तो इसलिए मैं वृंदावन के इलाके में रहता हूँ, जब कृष्णा यहां पर आ जाएंगे, तो चक्र को भूल जाएंगे, तो तब मैं उसका वध कर दूंगा।
तो इस तरह सोचता है कि असुर जो होते हैं, वो कभी समझते नहीं है कि भगवान की शक्ति किसी और चीज़ से नहीं आ रही है, भगवान से ही आ रही है। कि असुरों की शक्ति जो होती है न, वो उनकी खुद की शक्ति नहीं होती है, किसी देवताओं से प्रार्थना की है, कोई शस्त्र प्राप्त की है, उससे उनकी शक्ति मिलने है, तो उनकी शक्ति कि भगवान की शक्ति भी ऐसी है।
तो भगवान के पास अगर कोई भी शस्त्र नहीं है, वास्तव में भगवान ने वृंदावन में केवल सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल नहीं किया, कोई भी शस्त्र का इस्तेमाल नहीं किया, सारा जो लीला है, क्रीड़ा के रूप में आ गया। उद्धव कहते हैं कि सारा जो भगवान ने वध किया है, वो सब क्रीड़ा के रूप में वध किया है। कोई असुर आ गया, उसको मुट्ठी मारा, उसके मुंह में चला गया, उसका वध हो गया, केशी का उस तरह से वध हो गया। दूसरा कोई अवत्सासुर आ गया, उसका पूंछ पकड़ लिया, गोल-गोल घुमा दिया, फिर इतना मेहनत कर लिया, उठा लिया, कुछ फायदा तो मिलना चाहिए, इसका, तो क्या कर रहे हैं वहां पे पेड़ है, इस पेड़ पर अच्छे फल है, उसको उधर दिया और फिर उस जाके विस गया, सारे फल नीचे आ गए और फल खाली हैं।
तो भगवान के साथ जो वृंदावन में लीला है, वो खेल के समान है। पर यह दंतवक्र सोचता है कि यहां पे चक्र-वक्र नहीं है, तो इसलिए वह वध के फिराक में घूमता है, यहां पर शायद कृष्णा आ जाएगा तो चक्र नहीं होगा। तो जब नारद मुनि संदेश भेजते हैं, जब नारद मुनि संदेश भेजते हैं कि कृष्ण को, कि दंतवक्र आपका इंतजार कर रहा है, तो तभी कृष्णा सोचता है कि यह अच्छा मौका है, तो सोचता है कि दंतवक्र अभी आखिरी असुर बाकी है, इसका मुझे वध करना है।
अभी तक इसमें क्या हो रहा है? जब कृष्णा साल्व से युद्ध कर रहे होते हैं, तो तभी क्या होता है? तभी इधर युधिष्ठिर सभागृह में आते हैं जुआ खेलने के लिए, तो भागवतम का वृत्तांत है और महाभारत का वृत्तांत है, ये दोनों में क्या हो रहा है? साल्व का वध कर रहे हैं, तभी द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा है, पांडवों की सारी सेना है…
दंतवक्र वध और भगवान कृष्ण का मथुरा आगमन
सारा अच्छे है, उससे छीना जा रहा है और उस समय है, कृष्णा को अभी तक यह पता नहीं चल रहा है, सर्वज्ञता ही कृष्णा, सब कुछ सर्वज्ञ है, पर जब लीला करते हैं, तो अपनी सर्वज्ञता दिखाते नहीं हैं। तभी और फिर जब वे दंतवक्र के बारे में जानते हैं, तो अभी जो दुर्योधन, शकुनि ये सब जो है, ये सब पांडवों के रिश्तेदार ही हैं, तो अभी तक उन्होंने अपनी एक असुर प्रवृत्ति नहीं दिखाई नहीं है।
तो इसलिए जब दंतवक्र से युद्ध करते हैं और दंतवक्र का वध कर रहे थे कृष्णा, तभी वो कहते हैं कि अभी मैं मेरे सारे शास्त्र नीचे रख देता हूँ। अभी मैं वृंदावन जाने वाला हूँ, मेरे जितने असुरों का वध करना था, मैंने वध कर लिया है, अभी मैं कभी शास्त्र नहीं उठाने वाला हूँ।
और इसलिए जब कुरुक्षेत्र का युद्ध होगा, तो भगवान कृष्ण ने पहले से बतला दिया कि अभी मैं युद्ध में शास्त्र नहीं उठाने वाला हूँ। इसलिए वहाँ पर अपने भक्तों का वात्सल्य के कारण, भक्तों के साथ तो रहना है, पर युद्ध नहीं करते हैं। इसलिए वे पार्थ सारथी बन जाते हैं।
और वो गीता पूरे महाभारत में हम देखेंगे, जब कुरुक्षेत्र का युद्ध हो जाता है, उसमें कृष्ण शास्त्र नहीं उठाते हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने अभी सारे असुरों का वध कर दिया है और अभी वृंदावन जाते हैं। “स्वैरं अपने हाथों से कुछ असुरों का वध करते हैं, तो कभी दूसरों के हाथों से कुछ असुरों का वध करते हैं।” तो कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले भगवान अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और कुरुक्षेत्र में वो अपने भक्तों की शक्ति का प्रदर्शन दुनिया में दिखाते हैं।
पर दंतवक्र का वध करने के बाद यहाँ होता है, वो अपने रथ से, अपना रथ जो है दारुक, जो उनका सारथी है, उसके साथ वो आ जाते हैं मथुरा में, दंतवक्र का वध कर रहे हैं और फिर पूरी उत्सुकता के साथ वो आ जाते हैं वृंदावन में।
वृंदावन में पुनरागमन और ब्रजवासियों का मिलन
और जब वृंदावन में आते हैं, तो जब ब्रजवासी इतना इंतजार कर रहे हैं, ब्रजवासी कहते हैं कि साधारण माता-पिता होते हैं, अपने पुत्र से स्नेह होता है, तो कभी कोई पुत्र मिलने आता है या कभी माता-पिता पुत्र से मिलने आते हैं, पर हमारा ऐसा दुर्भाग्य है कि जो हमारा पुत्र न तो हमें मिलने आता है, न हम उनसे मिलने आ सकते हैं।
और फिर भी ब्रजवासी कहते हैं कि ये संदेशवाहक यहाँ पे आ रहे हैं, कि वो संदेश देते हैं, तो उस समय आप ज़्यादा भोगते हैं, क्योंकि कृष्ण का विरह हमें हो रहा है। यहाँ देखें हमें दुख होता है, पर हम दुखी हैं। यहाँ जब कृष्ण सुनेंगे, तो उससे कृष्ण को दुख होगा और हमारे कारण अगर कृष्ण को दुख होगा, तो उससे हमें बहुत ज़्यादा दुख होगा।
संदेशवाहक आते हैं, तो आप कृपया रोना मत, क्योंकि वे संदेशवाहक भी बुद्धिमान होते हैं। हम देखते हैं कि ब्रजवासी कितनी विरह की पीड़ा में हैं, तो जो माता-पिता, वसुदेव, नंद महाराज, यशोदा माई हैं, वो सब अपने हृदय के दर्द को नियंत्रित करते हुए जीवन जी रहे होते हैं।
और जब कृष्ण पुनः लौट के आते हैं, तो वे सब कृष्ण को देख के महान… वो जब कृष्ण देखते हैं, कृष्ण आ रहे हैं, उनकी आंखें बड़ी करके देखते हैं, सोचते हैं कि मैं कृष्ण दिख रहा हूँ। और वो डर है कि अगर आंखों को बंद कर लेंगे, पुनः आंखों को खोलेंगे, क्या कृष्ण नहीं होगा यहाँ? तो इस तरह से वो सोचते हैं कि आंखों को बंद ही न करें। अब तो पूरी स्थिति से देखते रहते, देखते रहते हैं।
और जब कृष्ण को आंखें स्पर्श करते हैं, तो ऐसे बताते हैं कि जो अलग-अलग रस्में होते हैं, भगवान का, उनका सारे भगवान से आकर्षण होता है। जो दास्य रस्में होते हैं, उनको भगवान के चरण-कमल बहुत प्रिय होते हैं, कि वो भगवान के चरण-कमल को स्पर्श करना चाहते हैं। जो साख्य रस्में होते हैं, वो भगवान कृष्ण के हाथों से उनको आलिंगन करते हैं, उनको हाथों से हाथ मिलाते हैं। जो वात्सल्य रस्में होते हैं, जैसे मां होते हैं, पुत्र का प्रेम का एक लक्षण होता है, कि वो बालों को सुगंध लेती है, तो सिर को प्रवेश करते हैं, सिर को आशीर्वाद देते हैं, सिर को प्रवेश करते हैं। और जो गोपियां आते हैं, वो कृष्ण को आलिंगन करते हैं।
तो इस तरह से सब रस के भक्त होते हैं, वो सब देखते हैं। और जब देखते हैं कि वास्तव में ये कोई स्फूर्ति नहीं है, सही में कृष्णा आ गए, तो बड़े आनंदित होते हैं।
दारुक और रथ की सेवा तथा नंद महाराज की चिंता
और जब वो रह रहे होते हैं, अब ये दारुक के लिए साथ रहता है, तो कृष्णा कहते हैं कि ये मेरा सारथी है दारुक और ये हमारा रथ है। तो सारे ब्रजवासी दारुक का भी इतनी सेवा करने लगते हैं और वो न केवल दारुक की सेवा करते हैं, वो सारे घोड़ों की सेवा करते हैं, वो रथ को साफ करते हैं।
और दारुक कहते हैं कि ब्रजवासियों का कितना प्रेम है कृष्ण के प्रति! किन अगर कृष्ण के प्रति प्रेम है, मेरा सारथी कृष्ण संबंध से इतना प्रेम है, रथ से प्रेम है।
और जब कृष्ण ब्रजवासी से बात कर रहे होते हैं, तो बार-बार नंद महाराज की आंखें वो रथ की ओर जा रही होती हैं। तो कृष्ण समझ जाते हैं, तो बोलते हैं कि आप बार-बार रथ की ओर इस तरह से क्यों देख रहे हो?
तो कहते हैं कि पहले एक रथ आया था, तो मैं लिख गया और जब तक यह रथ यहाँ पर रहेगा, तो हमारे हृदय में भय बना रहेगा, तो कभी भी यह रथ तुम्हें पुनः लेके जाएगा। तो हमारी इच्छा… “रहिदास, कि अभी आप यहाँ पर आ गए हो, अभी तुमने असुरों का वध कर दिया, अभी आपको यहाँ पर रहना चाहिए, तो यहाँ पर आप रह लो।”
तो वो कृष्ण से लगते हैं। कृष्ण कहते हैं, “अगर यही आपकी इच्छा है, तो मैं अभी यहाँ पर रहूंगा।”
और फिर वो दारुक से कहते हैं कि तुम संदेश भेजो और बलराम और रोहिणी उन दोनों को भी यहाँ पर लेके आओ। और फिर बलराम और रोहिणी भी यहाँ पर आ जाते हैं।
पौर्णमासी और गोपियों का दिव्य विवाह
तो यह सब योग माया के प्रभाव से होता है। तो द्वारकावासियों को पता ही जाता है, ये सब क्या चल रहा है? कृष्ण आते हैं और कृष्ण समय को विस्तारित करते हैं।
और तभी कृष्ण कहते हैं कि मैं अभी यहाँ पर आ गया हूँ, मैं यहीं पर रहूंगा। नंद महाराज कहते हैं कि फिर अगर तुम यहाँ पर रहने वाले हो, तो तुम्हें विवाह करना चाहिए। तो फिर वो पौर्णमासी जो होती है… बस, वृंदावन में सब ब्रजवासियों की उम्र हमेशा एक ही रहती है। तो वृंदावन में एक ही व्यक्ति बोलती है, वो है पौर्णमासी। वो सारे ब्रजवासियों की दादी के समान है और सबको वो उपदेश देती है।
तो नंद महाराज जी पौर्णमासी के पास जाते हैं और वो कहते हैं कि हमें कृष्ण का विवाह करना है। तो कहते हैं, किससे विवाह करें? तो वो कहते हैं, श्यामा और बाकी सब सखियाँ हैं, उनसे आप विवाह कर सकते हैं।
तो पौर्णमासी देखने लगती है, पौर्णमासी देखने लगती है… “राधारानी केवल कृष्ण की ही भार्या है और उसका विवाह किसी और से नहीं हो सकता है, यह कैसे संभव है?”
“पर उसका विवाह तो हम सब ने देखा है।”
तो कहती है, “तुम ऐसे करो, सारे ब्रजवासियों को एक सभा में बुला के लेके आओ, तभी मैं चमत्कार तुम्हें दिखाऊंगी।”
तो सब ब्रजवासी जो वहाँ पे आते हैं, तो सारे ब्रजवासी यहाँ पे आते हैं और फिर तभी वहाँ की जो तरुणी सखियाँ जो होती हैं, वो सब भी आती हैं वहाँ पे। जब वो वहाँ पे आती हैं, तो फिर वो कहते हैं, “ठीक है, सब ब्रजवासी यहाँ पे आ गए हैं? हाँ, आ गए हैं।”
और फिर तभी योगमाया जो होती है, वो एक दिव्य दर्शन दिखाती है और क्या दिखाती है? सारी सखियाँ हैं, साथ-साथ सबको दो राधारानी दिखती हैं, दो चंपकलता दिखती है, दो सुदेवी, दो रंगदेवी, सारे दो सखियाँ हैं, दो ललिता, दो विशाखा। और ये किस संबंध है, क्या हो रहा है?
तो ब्रजवासी बताती है, योगमाया का चमत्कार है। जैसे जब रावण ने सीता का हरण किया था, तो रावण जो असुर है, वो सीता को स्पर्श भी नहीं कर सकता है, तो वास्तव में एक माया सीता को तभी रावण लेके गया था और अस्मिता जो थी, वो जो अग्निदेव की पत्नी है स्वाहा, उनके सानिध्य में थी, उनके संरक्षण में थी।
उसी तरह से जो राधारानी और सारी गोपियाँ जो हैं, वो वास्तव में हमेशा कृष्ण की ही भार्या हैं, तो कृष्ण की ही रानियाँ हैं, वो किसी और से उनका स्पर्श भी नहीं हो सकता है।
तो वास्तव में मेरे योजना से क्या किया था? सारे गोपियों का एक असली रूप और एक माया रूप था। तो जो विवाह हुआ था, तथाकथित जो विवाह हुआ था, वो केवल माया सीता, माया राधा थी, माया ललिता थी, उनका विवाह हुआ था। जो असली राधा है, जो असली ललिता है, वो सब पूर्णतया शुद्ध हैं और वो कभी भी दूषित नहीं हो सकती हैं और उनका विवाह कृष्ण से ही होना चाहिए।
और जब इस तरह से जब वर्णन होता है, तो इनमें से कौन सारे सखा दो-दो रूप में दिख रहे हैं सबको? तो सब सोचते हैं कि इसमें से असली सखा कौन सी है, कैसे पहचानेंगे?
तो जो असली राधारानी होती है, असली जो विशाखा जी होती हैं, वो कहती हैं कि वास्तव में हम सब सारे दुनिया को दर्शन चाहते हैं कि कैसे सीता देवी जो थी, वो रावण के महल में रही थी, तो उसकी कारण अयोध्यावासियों ने कभी अग्नि में ऐसे सोचा कि सीता का शुचिता शुद्ध नहीं होगी, सीता अग्नि परीक्षा से गई थी, पर वो अग्नि परीक्षा से लंका में गई थी, तो इसलिए अयोध्यावासियों ने देखा था।
तो इसलिए हम वृंदावन के वासी हैं, तो आप सबके सामने हम अग्नि परीक्षा में जा जाते हैं। तो तभी सबके, तभी भगवान के लिए अपने दुर्वासा मुनि आते हैं और दुर्वासा मुनि गोपांत अपने उपदेशित बताते हैं कि गोपियों को कि आप सब कृष्ण की पत्नियां हैं और कृष्ण आपके पति हैं।
और दुर्वासा मुनि कहते हैं कि मैं रुद्र का विस्तार हूँ और सारी अग्नि मुझसे आती है, तो मैं अभी स्वयं एक विशाल अग्नि का रूप लूंगा और इस अग्नि में सारी गोपियाँ प्रवेश कर सकती हैं और उससे वो सबको अपना शुद्धता दर्शा सकती हैं।
तो जब ऐसे है, सारे जो ब्रजवासी होते हैं, वो विस्मित हो जाते हैं, एक तरह से भयभीत हो जाते हैं कि कोई अग्नि में प्रवेश करने वाले क्या होगा? और दूसरी ओर से आश्चर्य लेते हैं, क्या होना है, बड़े आश्चर्य की बात होगी।
और सबके सामने जो ब्रजवासी में माई-सईं लेते होते हैं, वहाँ पर एक भीष्म नहीं आती है और जो राधारानी, ललिता, विशाखा वे सारी गोपियाँ हैं, वो उसमें प्रवेश करती हैं और प्रवेश करके एक ओर से आती हैं, दूसरी ओर से बाहर जाती हैं और किसी को भी कुछ भी नहीं होता है। और इस तरह से उनकी शुद्धता शुद्ध हो जाती है।
फिर उसके बाहर में कृष्णा और राधारानी, कृष्ण का सब गोपियों के साथ विवाह हो जाता है। और लीला के लिए कृष्णा क्या करते हैं? वो एक समय में विस्तार कर लेते हैं। और भगवान की विस्तार करने की इतनी अद्भुत लीला है ये, कि अगर राधारानी का विवाह हो रहा है, तो राधारानी हमेशा ललिता, विशाखा इन सब सखियों के साथ होती है। तो अगर ललिता, विशाखा, विवाह भी उसी समय हो रहा है, तो राधारानी के विवाह में ललिता, विशाखा नहीं प्रस्तुत हो सकती हैं।
तो कृष्णा क्या करते हैं? सारे ब्रजवासियों को विस्तार करते हैं, तो हर एक विवाह में हर एक ब्रजवासी है, तो राधारानी के विवाह में ललिता, विशाखा, नंद महाराज, यशोदा माई सब कुछ है। ललिता के विवाह में राधारानी है, विशाखा है, सब कुछ है।
तो इस तरह से जो आनंद का सागर है, वो बिना किसी तट के सारे ब्रज में फैल के सबको डुबा लेता है और फिर कृष्ण का सारे गोपी से विवाह हो जाता है।
आध्यात्मिक जगत गोलोक वृन्दावन की ओर प्रस्थान
और अभी, अभी तो नंद महाराज को ब्रजवासियों को आश्वासन होता है कि कृष्ण ने विवाह कर लिया है, तो अभी कृष्णा आप ब्रजवासियों को छोड़ के जाएंगे नहीं।
पर हम सोचते हैं, अभी तक यह दारुक यहाँ पर क्यों है? तो जाना चाहिए, अभी तो बार-बार वो दारुक की ओर देख रहे होते हैं, रथ की ओर देख रहे होते हैं। तो कृष्णा कहते हैं, “पिताजी, अभी तक आपको विश्वास नहीं है, मैं आपको छोड़ के कभी नहीं जाऊंगा।”
कहते हैं, “किसी को एक बार भूत दिखता है, तो जब भूत की दृष्टि होती है, वो कभी जाती नहीं जीती, तो हमारे लिए रथ है, यही भूत के समान है। तो रथ जब तक हमारे विश्वास में रहेगा, तब तक हमें कभी शांति नहीं मिलने वाली है।”
तो फिर कृष्णा सोचते हैं, क्या कहते हैं? “कि वास्तव में यह रथ ने अगर आपको इतना दुख दिया है, तो यह रथ ही आपके सर्वोच्च सुख का कारण बनेगा।”
क्यों कहते हैं? कृष्ण कहते हैं, “अगर आप हमारे साथ हो, तो वही हमसे सहज सर्वोच्च सुख है, इससे और ऊंचा सुख क्या चाहिए हमें?”
कहते हैं कि यह रथ के माध्यम से ही मैं हमेशा आपके साथ रहेगा। क्या मतलब? कृष्ण कहते हैं कि इसी रथ से मैं तुम सबको, आप सबके साथ यहाँ से आध्यात्मिक चीज़ पर जाऊंगा।
तभी यह रथ होता है, छोटा रथ होता है, पर कृष्णा की योगशक्ति से तो विस्तार विशाल जाता है रथ, उतना विशाल हो जाता है रथ कि उसमें नंद महाराज, यशोदा महाराज, सारे गोपियां, सारे गोपा, सारा वृंदावन समझ जाता है उसमें। तो अपना रथ होता है, उसी मार्ग में जाता है, जिस मार्ग में अक्रूर का रथ गया था, यमुना के तरफ में पहुंचता है।
और यमुना के तरफ में पहुंचते ही जो सीधा ऐसे तरफ जा रहा होता है, अचानक ऊपर से जाता है और ऊपर से जा रहा है, सीधा वह भौतिक जगत से समुद्र के ऊपर, ब्रह्मलोक के ऊपर, ब्रह्म ज्योति के परे, सीधा जाता है आध्यात्मिक जगत में। और आध्यात्मिक जगत में वो भूरा वैकुंठ धालोकों से परे जाकर गोलोक नाम आता है, वृंदावन में भी, आध्यात्मिक जगत में गोलोक नाम जो है, उसके भी रोहिणी और बलराम जी और उद्धव की चाहते हैं कि मैं एक तन्मयता बनना चाहता हूँ वृंदावन में।
और फिर जब इस तरह से कृष्ण चले जाते हैं आध्यात्मिक जगत में, सब भूरा जगत में देखें, तो उस समय कृष्ण जब जा रहे होते हैं, तो वो जो रथ को पहले दारुक चला रहे हैं, तो दारुक जब चला रहे होते हैं, तो यमुना तक चलाते हैं, पर जब वो ऊपर जाने लगता है, तो दारुक नीचे रह जाते हैं। और कृष्ण का जो विस्तारित रूप जो होता है, एक जो कृष्ण का वो आध्यात्मिक जगत में चले आते हैं, पर जो वसुदेव कृष्ण, कृष्ण का जो ऐश्वर्य का रूप है, वहाँ बलराम जी और रोहिणी, वो उसी आत्मन पुनः वापस द्वारका चले आते हैं, अपने द्वारका में।
भगवान कृष्ण पुनः चुका नहीं सकता, तो उसको मैं सिर्फ कृष्ण को पूरा करता हूँ।
निष्कर्ष एवं मंगलाचरण श्लोक
तो इस तरह से कृष्ण पूरा करते हैं। तो जो कृष्ण और ब्रजवासियों का प्रेम है, उसका कृष्ण स्तोत्रेश्वर नाम श्लोक में बहुत सुंदर वर्णन है। तो उसका कृष्ण के दो नाम एक श्लोक है, उसको हम दोहरा के हम अंत करेंगे।
तो आप प्रेम से पिरोइए, मैं उसके पहले अर्थ बोलता हूँ।
नंद व्रजजनानंद—नंद जो है, नंद और अपनी सब ब्रजजन हैं, तो उनके वो आनंद हैं, सर्वश्रेष्ठ आनंद के वो कारण हैं।
पर वो कौन हैं? सच्चिदानंद विग्रह—वास्तव में उनका जो रूप है, वो कोई साधारण गोल-बाल नहीं है, गोल या गोल-बाल नहीं है, वह सर्वश्रेष्ठ सच्चिदानंद परमब्रह्म रूप है।
और भी वो क्या कैसे लीला करते हैं? नवनीत विलिप्तांगो—वो क्या करते हैं? छोटे बाला जो होते हैं, तो वही सच्चिदानंद हैं, वो क्या करते हैं? नवनीत—नवनीत मतलब माखन। कृष्ण कल माखन चुराते हैं, बहुत प्यार छोटे होते हैं, तो क्या होंगे? माखन के डिब्बे से माखन निकाल रहे हैं, तभी वो खुद ही माखन के डिब्बे में गिर जाते हैं और उनका सारा शरीर जो होता है, माखन से लिप्त हो जाते हैं। नवनीत विलिप्तांगो!
नवनीत नटनट—तब वो नवनीत नटनट मतलब वो अलग-अलग प्रकार से नए-नए लीलाएं करते हैं और वो क्या है? अनघ है, अनघ है मतलब संपूर्ण है, ता पूर्ण शुद्ध है, उनके समक्ष कोई मेल नहीं है।