How the mind troubles us – and how to protect ourselves – Hindi
[Congregation program at Kharagpur, India]
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Lecture Summary
तो सारांश में मैंने आज चर्चा की कि किस तरह से हमारा मन हमारी समस्याओं को बढ़ाता है और कैसे हम उसका सामना कर सकते हैं।
- सबसे पहले मैंने उदाहरण दिया वो बच्चे का जो माता-पिता होते हुए अनाथ बन गया था। तो क्या हो गया, जब मन तमोगुण से प्रभावित हो जाता है तो छोटी चीज़ को वो बड़ी बना लेता है और एक चीज़ को सबकुछ मान लेता है। जैसे दक्ष कर रहा था सती के बारे में।
- मन क्या है? मन वास्तव में एक स्क्रीन है जो हमें बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है वो दिखाता है, खिड़की समान कार्य करता है, पर कभी भी वो खिड़की से टीवी बन सकता है। और टीवी से कभी भी वो हॉरर मूवी दिखा सकता है।
- तो इसलिए हमें क्या करना है? इस मन से बचने के लिए, उसको जांच करने की आदत डालनी है। मन वास्तव में एक ऐसा चीज़ है जो अलग-अलग प्रकार की चीज़ें दिखाता रहेगा। उसको पहचानना है, पर उससे खुद की पहचान नहीं करानी है। जैसे अम्पायर (Umpire) क्या करता है, फील्डर जो बोलता है उसको सुनता है, पर उसको इवैल्यूएट (Evaluate) करता है, जांच करता है।
- और साक्षी भाव के परे है सेवा भाव। जब हमारे जीवन को हम भगवान की सेवा से भर लेते हैं, तो फिर मन की समस्याएं कम हो जाती हैं। खुद की पहचान करानी है कि मैं वास्तव में भगवान का सेवक हूँ। और फिर भगवान का आश्रय ग्रहण करने की जब हम आदत बना लेते हैं, तो कितनी भी बड़ी समस्या क्यों ना आ जाए, हम उसके परे जा सकते हैं। शांति और शक्ति प्राप्त करके फिर हम जो भी बाहर की दुनिया की समस्या है और मन की समस्या है, दोनों का सामना करके उनके परे जा सकते हैं।
Full Transcription
तमोगुण का प्रभाव: एक चीज़ को सबकुछ मान लेना
हरे कृष्णा, मैं कृतज्ञ हूँ, आप सबके बीच में आज आने का मौका मिला है। संकीर्तन प्रभु मेरे बहुत प्रिय मित्र हैं और भले ही मैं कृष्ण भक्ति में पहले आया हूँ, पर जिस तरह से उन्होंने कृष्ण भक्ति को तीव्रता से ले लिया है और बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियां भगवान की सेवा में ले रहे हैं, उससे कई बार बहुत आश्चर्य हुआ है और प्रेरणा मिली है।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥
भगवान भगवद्गीता में बोलते हैं कि जब हम तमोगुण में होते हैं, तो हम एक चीज़ को सबकुछ बना लेते हैं। उस एक चीज़ से बड़े आसक्त हो जाते हैं। तो मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि किस तरह से हमारा मन हमारे संबंधों को और हमारे जीवन को बर्बाद कर सकता है।
मैं अभी अमेरिका से आ रहा हूँ। दो-तीन हफ्ते पहले ही मैं आया उधर से। मैं अमेरिका में था तो मैं एक कार्यक्रम, कॉलेज प्रोग्राम में जा रहा था। मैंने एक फाइव वीक्स (Five weeks) में एक कोर्स किया वहाँ पे विद्यार्थियों के लिए जैक्सनविले में। तो वहाँ पे एक विद्यार्थी से मैं बात कर रहा था, तो वह मुझे बता रहा था कि वो बचपन में फॉस्टर होम (Foster home) में बड़ा हुआ। फॉस्टर होम मतलब, जिन लड़कों के माता-पिता नहीं होते हैं (जो अनाथालय नहीं होते हैं, उसके बीच में जो होता है), मतलब कोई और दंपत्ति, कोई पति-पत्नी, वो उसके माता-पिता बन जाते हैं। अच्छे कृष्ण के लिए जैसे नन्द महाराज और यशोदा माई थे। तो वो बच्चा बोला कि मैं फॉस्टर होम में रह रहा था, मैं बड़ा हुआ।
तो मैंने उसको पूछा कि क्या हुआ आपके माता-पिता को? कुछ एक्सीडेंट में गुज़र गए हैं? तो बोला कि नहीं, मेरे माता और पिता दोनों जीवित हैं। मैं हैरान हुआ, तो फिर फॉस्टर होम में क्यूं हुआ? वो बोला कि जब मैं पाँच साल का था, तब मेरे माता-पिता सेपरेट (Separate) हो गये, उनका डिवोर्स (Divorce) हो गया। और जब उनका डिवोर्स हो गया, वह बहुत ही बिटर (Bitter) था, वो डिवोर्स, बहुत झगड़े हुए। और दोनों माता-पिता ने मुझे बताया कि ये जो मैंने विवाह किया था, ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। और दोनों ने उस बच्चे को बताया कि, “तुम मुझे उस गलती की याद दिलाते हो, इसलिए मुझे तुमसे कुछ लेना-देना नहीं है।”
दोनों माता-पिता होते हुए वो बच्चा अनाथ बन गया। तो अभी ये कितना दुर्भाग्य के वश है कि ठीक है, दो व्यक्तियों का अगर नहीं जमता है तो अलग हो गए, अच्छी बात नहीं है पर ठीक है। पर वो बच्चे को उस दृष्टिकोण से क्यों देखना है? वो बच्चे की क्या गलती है? तो मतलब क्या हो गया, वो उस व्यक्ति को एक व्यक्ति के रूप में देख ही नहीं रहे हैं। एक ही चीज़ से देख रहे हैं—कि यह मैंने जो गलती की, उसकी उत्पत्ति है।
तो इस तरह से जब हमारा मन तमोगुण से प्रभावित हो जाता है, तो छोटी चीज़ को हम लेते हैं और उसको बहुत बड़ा बना लेते हैं। और जो बड़ी बात है, कि वह बच्चा है, उसका अपना एक व्यक्तित्व है, एक आत्मा है, उसे देख ही नहीं रहे हैं। क्या देख रहे हैं? सिर्फ ये कि इस गलती की उत्पत्ति है। तो ये जो है, हमारा मन जब एक चीज़ से आसक्त हो जाता है, तो पूरा जो बड़ा पिक्चर है, बिग पिक्चर (Big picture), उसको भूल जाता है।
दक्ष प्रजापति और सती का प्रसंग
और ये ऐसे नहीं है कि ये अभी ही होता है। भागवतम् में चौथे स्कंध में वर्णन आता है दक्ष प्रजापति का। दक्ष प्रजापति की जो बेटी थी दाक्षायणी या सती, उसका विवाह शिवजी से हुआ था। दक्ष और शिवजी का थोड़ा जमता नहीं था। दक्ष को लगता था कि शिवजी मुझे उचित आदर नहीं देते हैं। वास्तव में दक्ष थोड़े भौतिक रूप से ऐश्वर्यशाली थे और शिवजी जो थे, थोड़े अजीब प्रकार के व्यक्ति थे, भस्म लगाते थे, जंगल में रहते थे। तो दक्ष सोचते थे, “इसको मैं कैसे अपना दामाद बनाऊँ?” पर क्योंकि ब्रह्माजी ने उन पर थोड़ा ज़ोर लगाया, तो उन्होंने अपनी बेटी दे दी उनको। पर उनको पहले से लगता था कि शिवजी अच्छे व्यक्ति नहीं हैं।
तो जब वो यज्ञ कर रहे थे, तो उन्होंने शिवजी और सती को बुलाया नहीं। तो जब सारे लोग वो यज्ञ में जा रहे थे, तभी सती ने कहा, “शिवजी हम जाते हैं।” शिवजी ने कहा, “हमको आमंत्रण नहीं मिला है, हमें नहीं जाना चाहिए।” सती बोलीं कि, “वह तो मेरा ही घर है, अपने घर में क्या आमंत्रण की ज़रूरत है?” शिवजी बोले, “नहीं आमंत्रण नहीं मिला है, मत जाओ।” सती बोलीं कि, “आप नहीं जाओगे तो मैं अकेली जाऊँगी।” और वो चली गईं।
जब वो गई वहाँ पर, तो उनकी बहनों ने उनका बड़ा स्वागत किया। पर उनके पिता दक्ष ने उनकी ओर देखा भी नहीं। और वो एक के बाद एक शृंखला बढ़ती गई। और दक्ष इतने अपमानित हो गए, और तभी सती इतनी अपमानित हो गईं कि वो आत्महत्या करने पर आ गईं। और फिर भी दक्ष ने कुछ भी नहीं किया।
दक्ष ने कुछ क्यों नहीं किया? क्योंकि दक्ष की दृष्टि तमोगुण से दूषित हो गई थी। वो सती को अपनी बेटी के रूप में देख ही नहीं रहा था। क्या देख रहा था वो? “यह उस व्यक्ति की पत्नी है जिसने मेरा अपमान किया है। तो इसलिए इसका तिरस्कार करके मैं शिवजी से बदला लूँगा।”
तो अभी हर एक व्यक्ति जो होता है, वो केवल एक संबंध से या एक पहलू से पहचाना नहीं जाता है। तो जब हम लोगों से आदान-प्रदान करते हैं, तो हर एक का मन जो होता है, वहाँ एक कहानी बना रहा होता है। सती सोच रही थीं, “ये तो मेरा घर है, ये मेरे पिताजी हैं, ये मेरी माँ हैं, ये मेरी बहनें हैं।” तो वो खुद को उसी घर का एक सदस्य मान रही थीं। पर दक्ष जो थे, वो क्या देख रहे थे? कुछ अलग ही दृश्य देख रहे थे—”ये उस व्यक्ति की पत्नी है जिसने मेरा अपमान किया, तो मैं उसका बदला लूँगा, इसका अपमान करते हैं, इसका तिरस्कार करते हैं।”
सहनशीलता और सत्य का विकृत चित्र
तो इसलिए जो हमारा मन है, वह जब तमोगुण में चला जाता है, तो वह एक चीज़ को लेकर बहुत बड़ा बना देता है। सहनशीलता है, उसका अर्थ क्या है? सहनशीलता का एक अलग अर्थ होता है:
Tolerance means to keep small things small so that we can see the big picture.
(छोटी चीज़ें हैं, उसको छोटा रखना ताकि जो बड़ी चीज़ें हैं, पूरा चित्र जो है, वह हम देख सकें।) जो बड़ी चीज़ें हैं, उस पे हम ज़ोर दे सकें।
पर हमारा मन जो है, जब किसी चीज़ से आसक्त हो जाता है, तो वह छोटी चीज़ को बहुत बड़ा बना देता है। तो तभी व्यक्ति को क्या करना है, कैसे करना है, यहां कुछ समझता नहीं है। वह एक चीज़ के पीछे पागल हो जाता है। और इस तरह से जो व्यक्ति कार्य करता है और जो साधारण व्यक्ति कार्य करता है—तमोगुण के प्रभाव में आके, मन के द्वारा जो विकृत चीज़ को देखता है—उससे जो कार्य करता है, बहुत अलग हो जाता है।
वास्तव में हम सत्य के पीछे नहीं जाते हैं, जो हम कार्य करते हैं, सत्य को देखकर हम कार्य नहीं करते हैं। सत्य का जिस प्रकार का चित्र हमारे मन पर आता है, उसके आधार पर हम कार्य करते हैं। अगर कोई रेगिस्तान में जा रहा है और वहाँ पर मान लीजिए कोई मृगतृष्णा (Mirage) है, जल है नहीं, पर हमें क्या दिखता है? पानी दिखता है। तो हम सत्य में क्या है वह देखकर कार्य नहीं करते हैं, सत्य का हमारे मन पर जो चित्र आता है उसके अनुसार हम कार्य करते हैं।
और जिस हद तक हमारा मन शुद्ध है या कम से कम सत्त्वगुण में है, उस हद तक जो सत्य है उसको स्पष्ट रूप से हम देख सकते हैं। जितना हम रजोगुण में हैं या तमोगुण में हैं, उतना सत्य का एक विकृत चित्र हमारे सामने आता है। जब विकृत चित्र आता है, जैसे कभी-कभी हम कार में जा रहे हैं, तो वहाँ पर एक रियर व्यू मिरर (Rear view mirror) होता है, पीछे क्या है दिखता है। पर कभी-कभी उस रियर व्यू मिरर में चीज़ें वैसी की वैसी नहीं दिखतीं। कुछ छोटी चीज़ें बड़ी दिखती हैं, कुछ अच्छा चेहरा विकृत दिखता है। जैसे सत्य है वैसे दिखती नहीं हैं।
तो वैसे ही हमारा मन जो है, हमें चीज़ें असल में जैसी हैं वैसी नहीं दिखने देता। मन के आईने में या मन की स्क्रीन में चीज़ें विकृत हो जाती हैं। और जब ये विकृत हो जाती हैं, तो उससे हमें बहुत परेशानी हो सकती है।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं:
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
“अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करो, अपने मन के द्वारा अपना पतन मत होने दो।”
मन: एक खिड़की या एक टीवी?
अभी इसके लिए आवश्यक क्या है कि जब हम कार्य कर रहे हैं, तो मन वास्तव में है क्या और मन कैसे चित्र को विकृत करता है, यह समझना।
अभी यहां पे एक खिड़की है, इस खिड़की से मुझे बाहर की चीज़ें दिखती हैं। मैं अमेरिका में एक भक्त के घर में था और उनकी दीवार में एक बड़ी खिड़की थी। और वहाँ पे थोड़ा ग्रीनरी (Greenery) था, तो कुछ पेड़-पौधे दिख रहे थे। और अचानक मैंने देखा कि उस खिड़की के बाहर एक बहुत बड़ा गोरिल्ला आ गया है! और वो गोरिल्ला खिड़की को तोड़ने वाला है। तो मैं अचरज में पड़ गया था कि इतना बड़ा गोरिल्ला कहां से आ गया?
और वो जो भक्त थे, वो हँसने लगे। क्या हुआ? उनके हाथ में कुछ रिमोट था, उन्होंने उसे दबा दिया। और उन्होंने क्या किया था, ऐसे थोड़ा ऑप्टिकल इल्यूज़न (Optical illusion), थोड़ा मज़ाक करने के लिए उन्होंने वही बाहर के बैकग्राउंड का एक वीडियो बनाया था और उसमें वो गोरिल्ला दिखा रहे थे। तो क्या है, अगर हम वो चित्र को देख रहे हैं तो एक पल में लगेगा कितना सुन्दर निसर्ग (प्रकृति) का चित्र है, और दूसरे पल में लगेगा कि गोरिल्ला वहां पे आ गया है।
तब ये क्या है? हमारा मन ऐसे ही है। मन साधारण रहता है, खिड़की के रूप में होना चाहिए जो बाहर जो हो रहा है वो दिखाए। पर यही मन जो है, एक पल में एक टीवी बन जाता है। और जब ये टीवी बन जाता है, तो फिर वो कुछ और चीज़ें दिखाने लगता है।
खिड़की मतलब क्या है? कि जो बाहर की दुनिया में हो रहा है, वो सब जो अभी आप देख रहे हैं, सुन रहे हैं, अलग-अलग चीज़ें हो रही हैं। पीछे दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आ रही है। हम इन पाँचों इंद्रियों—आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा—से ज्ञान प्राप्त करते हैं। तो अभी यह सारे इंद्रियों का जो इनपुट (Input) आता है, जो हमें जानकारी मिलती है, वह सब मन के स्क्रीन पर आती है।
और यह मन के स्क्रीन पर अलग-अलग चीज़ें आती रहती हैं। जैसे अगर आप टीवी देख रहे हैं, टीवी में चैनल बदलते रहते हैं। अगर आप रिमोट को ऑटो मोड में डाल दोगे तो चैनल बदलते रहेंगे। तो वैसे क्या है, हमारे मन के स्क्रीन पर अलग-अलग चीज़ें आ रही हैं। मान लीजिए अब आप सुन रहे हैं, तो जो ध्वनि और दृष्टि, यह दोनों मन के स्क्रीन पर अभी बड़े होकर आए हैं। पर मान लीजिए अब आप बात कर रहे हैं और पीछे से रसगुल्ले की गंध आने लग जाती है, सुगंध आती है। तो फिर तुरन्त मन में क्या होता है? सुगंध नाक से आने लगती है, वो बढ़ती है।
तो मन एक तरह से हमारा खिड़की के रूप में कार्य करता है, पर किसी भी पल में वह एक टीवी बन जाता है। टीवी बन जाता है मतलब, जो वर्तमान में कुछ देख रहा है, पर उससे वह कहीं और चला जाएगा। और जब इससे चला जाता है, तो फिर हमें पता नहीं चलता। एक पल वह खिड़की दिख रही थी और अगले पल में वह टीवी बन गया। अगर मेरे हाथ में रिमोट नहीं है तो मुझे पता भी नहीं चलेगा कब ये खिड़की है और कब ये टीवी बन गया है। और शायद मैं डर भी जाऊँ—”अरे बाप रे, ये गोरिल्ला आ गया है, क्या करेगा ये गोरिल्ला?” पर वास्तव में वो गोरिल्ला है ही नहीं।
तो हमारा मन ये ऐसी चीज़ है कि कभी भी उसका स्वभाव बदल जाता है। ये स्वभाव बदल जाता है तो फिर वह कैसे कार्य करेगा, क्या दिखाएगा, उसके मन के स्क्रीन पर क्या आएगा, अगर हम उसका ध्यान पूर्वक निरीक्षण नहीं करते हैं, तो हम उससे पूरा प्रभावित हो जाएँगे।
भावनाओं का निरीक्षण: साक्षी भाव
भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में भगवान तीन गुणों का वर्णन करते हैं—सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। और फिर उसके बाद में अर्जुन सवाल पूछते हैं कि तीन गुणों के परे हम कैसे जाते हैं:
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥
पूछते हैं कि जो इन गुणों के पार गया है उसका स्वभाव क्या होता है? उसका आचरण कैसे होता है? हम गुणों के परे कैसे जाते हैं? तो उसका जवाब भगवान 22-23 श्लोक में पहले सवाल का जवाब देते हैं कि उसके लक्षण क्या होते हैं। 24-25 श्लोक में भगवान बोलते हैं कि उसका आचरण कैसे होता है। और 26 श्लोक में भगवान बोलते हैं, क्या पद्धति है जिससे हम गुणों के परे जाएं।
तो उसमें सबसे पहले भगवान बोलते हैं कि Become an observer of your emotions (अपनी भावनाओं के निरीक्षक बनो)। कि आपकी जो भावनाएं हैं, आपके जो विचार हैं, उनके आप निरीक्षक बन जाओ।
अगर मान लीजिए आप घर में गए हैं और आपका बच्चा टीवी देख रहा है, वो टीवी देखने में मगन है। पर अगर आप देखेंगे कि वह क्या देख रहा है, मन के स्क्रीन पर किस प्रकार का चित्र आ रहा है? पूर्ण सत्य तो दिख ही नहीं रहा है। ऐसे जब होता है, तो हमारा जो विचार है और आचार है, दोनों गलत हो जाते हैं।
भारत में अगर मेंटल हेल्थ केयर (Mental health care) के बारे में बोलना है तो पागलखाना सोचते हैं, वास्तव में वो पागलखाना नहीं है। वहाँ पर जो लोग जीवन की समस्याओं से विचलित हो जाते हैं, तो वहाँ पर रहते हैं। जो सुसाइड हेल्पलाइन (Suicide helpline) पर काम करते हैं। सुसाइड हेल्पलाइन मतलब कोई आत्महत्या करने वाला है, आत्महत्या करने के पहले वो फोन कर रहा है, “मैं आत्महत्या करने वाला हूँ।” और अगर तभी कोई बात करता है, कोई प्रोत्साहन देने वाला शब्द बोलता है, कोई सांत्वना देने वाला शब्द बोलता है, तो शायद वो तभी आत्महत्या न करे।
तो अभी ये बहुत ही हाई प्रेशर जॉब (High pressure job) है क्योंकि अगर आप उसे नहीं बचा पाए, वो तभी आत्महत्या कर लेगा। तो वो बता रहे थे कि उनको एक लड़की का फोन आया था। और लड़की ने आत्महत्या करने के बाद फोन किया! मतलब उसने आत्महत्या करने के लिए पिल्स (Pills) ले लिए थे और बाद में फोन किया। तब उन्होंने तुरंत एम्बुलेंस को वहां पर भेज दिया और एम्बुलेंस पास में ही थी, तो वो बच गई।
पर बाद में जब बात कर रहे थे कि उसने आत्महत्या क्यों की? उसने बताया कि उसका किसी लड़के से संबंध था और उसने उस लड़के को फोन किया और लड़के ने उसका फोन नहीं उठाया। सिर्फ लड़के ने फोन नहीं उठाया इसलिए उसने आत्महत्या कर ली! अभी फोन नहीं उठाना कितनी बार होता है, पर क्या हो गया? उसके मन में एक कहानी चालू हो गई।
मन कभी खिड़की के समान रहता है, खिड़की से कब वो टीवी बन जाएगा पता नहीं। जब वो टीवी बन जाता है तो क्या होता है? उसके मन ने कहानी बताना शुरू कर दी—”कि उसने फोन नहीं उठाया, वो तुम्हारी परवाह नहीं करता है, शायद उसने तुम्हे छोड़ दिया है, शायद वो किसी और के साथ है, और वो तुम्हें कभी देखेगा भी नहीं, भविष्य में तुम संबंध बनाओगे वो भी तुम्हें छोड़ देगा, और हमेशा लोग तुम्हें छोड़ देंगे, तुम अकेले रह जाओगे, तुम्हारे सारे मित्र अच्छे संबंधों में रहेंगे और तुम अकेले रहोगे, सब तुम पर दया करेंगे।”
मन्थरा और कैकेयी का प्रसंग
जैसे रामायण में मन्थरा जब आती है और बोलती है कि राम का राज्याभिषेक होने वाला है, तो तभी कैकेयी इतनी प्रसन्न होती है कि कैकेयी वास्तव में अपना एक गहना निकाल के देती है—”इतनी खुश ख़बर तुम लाई, ये लो तुम्हारे लिए।” पर जब मन्थरा अपनी नकारात्मक कहानी बताती रहती है और कैकेयी सुनती रहती है, उसका प्रभाव क्या हो जाता है? पूरा उसका चित्र बदल जाता है। जिस राम को वो अपने बेटे के समान प्रेम करती थी, वह भी उस राम को शत्रु के रूप में देखने लगती है और फिर उसको वनवास दे देती है।
तो जिस तरह से मन्थरा ने कैकेयी को पदभ्रष्ट किया है, उसी तरह से हमारा मन हमें पदभ्रष्ट कर सकता है। और पूरा विकृत हो जाएगा। तब राम और लक्ष्मण का प्रसंग आता है। लक्ष्मण को बड़ा क्रोध होता है, कैकेयी पर क्रोध होता है, दशरथ पर भी क्रोध होता है। तो तभी राम कहते हैं लक्ष्मण से, “लक्ष्मण क्रोध मत करो, तुम जानते हो कि कैकेयी का जो मेरे प्रति प्रेम था वो मेरी माँ कौशल्या से कुछ अलग नहीं था। कैकेयी का जो प्रेम था वह गंगा के निर्मल प्रवाह के समान था।”
तो लक्ष्मण बड़े क्रुद्ध होकर बोले, “क्या था वही मुझे समझ भी नहीं आ रहा है, एक रात में गंगा सूख कैसे गई?”
यह मन का चमत्कार है। चमत्कार नहीं, यह खतरनाक चीज़ है। पर मन इस तरह से हमारी पूरी विचारधारा को बदल सकता है। तो कब मन एक खिड़की के लिए कार्य कर रहा है, सत्य को हमें दिखा रहा है, और कब वो टीवी बनता है, हम समझ नहीं पाते हैं। छोटी-छोटी चीज़ों से हम बहुत विचलित हो जाते हैं। जो मन होता है, वो हमारी समस्याओं को और बढ़ा देता है। और फिर उस समय हम कुछ ऐसे कार्य करते हैं जिससे वो समस्या और बढ़ जाती है। समस्या पहले छोटी ही होती है, पर मन कल्पना करता है यह बहुत बड़ी समस्या है। हमारा कार्य ही ऐसा होता है कि समस्या बड़ी हो जाती है।
तो इसलिए ये मन को समझना बड़ा ज़रूरी है। तो भगवान कहते हैं, ये मन को कैसे संभालें?
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
तो कहते हैं कि मन में अलग-अलग प्रकार की भावनाएं आएं, कभी मुझे अच्छा लगे (प्रकाश), सबकुछ स्पष्ट रूप से दिखे। तो उसको हम पहचान लेते हैं कि “यह शिकायत करने का कार्यक्रम मन ने चालू कर दिया है।” हमारा मन का जो स्वभाव है, वो ऐसा है कि वो कई बार नकारात्मक विचार लाता है। पर ऐसे नहीं है कि हर बार नया-नया नकारात्मक विचार लाता है। उसकी कुछ पद्धतियां हैं, कुछ प्रकार की विचारधारा वो लाता है। जब गुस्सा आने लगता है किसी पर, तो “यह मन ने अपना एंगर प्रोग्राम (Anger program) चालू कर दिया है।”
अगर इतना ही हम आत्मनिरीक्षण कर लें, हम समझ पाएंगे, तो हमें गुस्सा होने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा नहीं कि व्यक्ति ने जो भी किया है वो सबकुछ स्वीकार करना है। महत्वपूर्ण यह है कि हमें समझना है क्या उचित है, क्या उचित नहीं है। तो जब भगवान कहते हैं कि तुम्हारे मन को एक व्यक्ति के रूप में देखो, और उसको क्या भावनाएं आ रही हैं, उसको जांच करो, और फिर उसके बाद में आप कार्य करो। यहाँ भगवान कहते हैं ‘उदासीनवदासीनो’ (तटस्थ रहकर देखना)।
बुद्धि और मन का द्वंद्व
पर अभी अगर हम मन को बोलते हैं कि कुछ सोचो मत, तो ऐसे नहीं हो सकता है, विचार तो आएंगे। पर हम चुनाव कर सकते हैं कि उस पे हमें ध्यान देना है या नहीं देना है। कभी-कभी होता है टीवी पे एक प्रोग्राम चल रहा है। वो टीवी पे क्या प्रोग्राम चल रहा है, वो हम बदल नहीं सकते, पर वो टीवी देखना है कि नहीं, उस प्रोग्राम पर हमारा ध्यान देना है कि नहीं, वो हम चुनाव कर सकते हैं। उसी तरह से मन में क्या विचार आएंगे, क्या इच्छाएं आएंगी, क्या भावनाएं आएंगी, उनको नियंत्रित करना बड़ा मुश्किल है, पर उन पर ध्यान देना है कि नहीं, यह फैसला हम कर सकते हैं।
और इसके लिए हमारी बुद्धि है। भगवान कहते हैं कि हमारी बुद्धि के द्वारा हम जांच कर सकते हैं, किस प्रकार के विचार आ रहे हैं। जैसे जो अम्पायर (Umpire) होता है, वो बुद्धि से जांच करता है, क्या यह सच में आउट है या आउट नहीं है। विचार और भावनाएं तो आएंगी हमारे मन में, पर बुद्धि से हम जांच करते हैं कि क्या यह सत्य बोल रहे हैं या सत्य नहीं है।
सत्य नहीं है, मतलब क्या है? कब एक खिड़की टीवी बन जाता है और अलग-अलग कल्पनाएं करने लगता है, अलग-अलग कहानियां बनाने लगता है, यह हमें पता भी नहीं चलेगा। इसलिए हमें बुद्धि सक्षम रखनी चाहिए। जब शास्त्रों का श्रवण करते हैं, अध्ययन करते हैं, हम शास्त्रों के द्वारा समझते हैं कि मन का स्वभाव क्या है। इसको शास्त्रों में बताया गया है ‘साक्षी भाव’। जैसे अम्पायर होता है, साक्षी होता है, देखता है क्या हो रहा है।
तो भगवान बताते हैं, सबसे पहले कि मन को नियंत्रित करना है, साक्षी भाव अपनाओ। जो भावनाएं आ रही हैं, उनको देखो, उनका निरीक्षण करो, और फिर उचित कार्य करो।
सेवा भाव और भगवान का आश्रय
पर इसके बाद में, 26वें श्लोक में भगवान दूसरा एक मार्ग बताते हैं मन का नियंत्रण करने का। क्या कहते हैं? ‘सेवा भाव’। कहते हैं कि अगर आप दृढ़ संकल्प के साथ मेरी सेवा में लग जाते हो, तो फिर आप गुणों के कारण मन में जो विकार आते हैं, उनके आप परे जा सकते हो।
सेवा भाव से क्या होता है वास्तव में, कि मान लीजिए अगर आप कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहे हैं, महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, और टीवी पर कुछ कार्यक्रम चालू हो गया है। अगर कुछ काम नहीं होगा तो ज़रूर कार्यक्रम देख लेंगे। अगर हम कुछ ज़िम्मेदारी से कार्य नहीं कर रहे हैं तो मन जो बोल रहा है, उस पर हम ज़ोर देते हैं।
मनोवैज्ञानिकों ने संशोधन किया है कि लोग चिंता कब करते हैं? जब लोग अपना काम कर रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, ज़िम्मेदार काम कर रहे हैं, तब तक मन इतनी चिंता नहीं करता है। पर जैसे ही वो आराम से बैठते हैं, अभी सारा काम हो गया है, मन काम (चिंता) करने लगता है।
और इसके लिए जब हम सेवा भाव रखते हैं, उससे एक स्थिरता मिलती है। ठीक है यह समस्या आएगी, वो समस्या आएगी। क्या होगा उससे? “मैं भगवान का सेवक हूँ, मैं भगवान की सेवा करता रहूँगा। जो भी समस्या क्यों ना आए, सत्य तो यह है कि मैं हमेशा भगवान का सेवक हूँ। भगवान हमेशा मेरे हृदय में हैं, भगवान कभी मेरा त्याग नहीं करने वाले।”
इस भाव से हमें स्थिरता मिलती है। भगवान की सेवा मतलब क्या है? मैं इस उदाहरण के साथ अंतर करता हूँ। मैं बता रहा था कि कोई बच्चा टीवी देख रहा है, और टीवी में एक हॉरर मूवी (Horror movie) चल रही है। और वो हॉरर मूवी देख के वो डर रहा है, कांप रहा है, रो रहा है, चीख रहा है। पर अभी वास्तव में वह अपने घर में बैठा है, कुछ भी डरने की चीज़ है नहीं। पर वो हॉरर मूवी में उसका मन लग गया है, उसके कारण वो डर रहा है।
तो अगर उस समय मान लीजिए, वो देखता है, मेरी माँ मेरे पास में है, और माँ को पकड़ लेता है। जैसे ही माँ को पकड़ लेता है, क्या होता है? शांति महसूस करता है। तो वैसे ही भगवान हमेशा हमारे साथ में ही हैं। वो जो भी आएगा-जाएगा, जो मन है, हम हमेशा भगवान के साथ हैं। तो जब हम भगवान का नाम लेते हैं, भगवान की कथा सुनते हैं, भगवान की पूजा करते हैं, हमारे भजन करते हैं, तो वो सिर्फ एक रीति-रिवाज़ के रूप में नहीं करना है। वो हम करते हैं इसलिए, कि जैसे छोटा बालक अपनी माँ के हाथ को पकड़ लेता है, वैसे हम भगवान को पकड़ लेते हैं। जब भगवान को पकड़ लेते हैं, तो तुरंत शांति महसूस करते हैं।
तो जितना हम दृढ़ संकल्प कर लेते हैं, “कुछ भी क्यों न हो जाये, मैं भगवान की सेवा में लगा रहूंगा।” कोई भी समस्या क्यों न आ जाये, अगर होगा, तो देख लेंगे, पर क्या सत्य है? “मैं भगवान का सेवक हूं।” यह सेवा भाव जो है, वह हमें शांति और शक्ति देता है।
अगर हमने ऐसी आदत बना ली है कि भगवान का आश्रय ग्रहण करना है, जप करने का, कीर्तन करने का, श्लोकों को गाने का, भगवान के चित्र को देखकर प्रार्थना करने का। जब ऐसी हमारी आध्यात्मिक आदत बन जाती है, तो भले ही मन में विकृत चित्र आ रहा हो, भगवान से संबंध जोड़ने से शांति मिल जाएगी, शक्ति मिल जाएगी।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
भगवान कहते हैं कि अगर आप मेरी चेतना में लग जाओगे, कृष्ण भावना भावित हो जाओगे, तो जो भी समस्या आयेगी, उनके आप पार जा सकते हो। जिस हद तक हम हमारी आध्यात्मिक आदतों को शक्तिशाली बनाते हैं, उस हद तक हम हमारे मन की समस्याओं और दुनिया की समस्याओं का सामना करके उनके परे जा सकते हैं।
सारांश
तो सारांश में मैंने आज चर्चा की कि किस तरह से हमारा मन हमारी समस्याओं को बढ़ाता है और कैसे हम उसका सामना कर सकते हैं।
सबसे पहले मैंने उदाहरण दिया वो बच्चे का जो माता-पिता होते हुए अनाथ बन गया था। तो क्या हो गया, जब मन तमोगुण से प्रभावित हो जाता है तो छोटी चीज़ को वो बड़ी बना लेता है और एक चीज़ को सबकुछ मान लेता है। जैसे दक्ष कर रहा था सती के बारे में।
मन क्या है? मन वास्तव में एक स्क्रीन है जो हमें बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है वो दिखाता है, खिड़की समान कार्य करता है, पर कभी भी वो खिड़की से टीवी बन सकता है। और टीवी से कभी भी वो हॉरर मूवी दिखा सकता है।
तो इसलिए हमें क्या करना है? इस मन से बचने के लिए, उसको जांच करने की आदत डालनी है। मन वास्तव में एक ऐसा चीज़ है जो अलग-अलग प्रकार की चीज़ें दिखाता रहेगा। उसको पहचानना है, पर उससे खुद की पहचान नहीं करानी है। जैसे अम्पायर (Umpire) क्या करता है, फील्डर जो बोलता है उसको सुनता है, पर उसको इवैल्यूएट (Evaluate) करता है, जांच करता है।
और साक्षी भाव के परे है सेवा भाव। जब हमारे जीवन को हम भगवान की सेवा से भर लेते हैं, तो फिर मन की समस्याएं कम हो जाती हैं। खुद की पहचान करानी है कि मैं वास्तव में भगवान का सेवक हूँ। और फिर भगवान का आश्रय ग्रहण करने की जब हम आदत बना लेते हैं, तो कितनी भी बड़ी समस्या क्यों ना आ जाए, हम उसके परे जा सकते हैं। शांति और शक्ति प्राप्त करके फिर हम जो भी बाहर की दुनिया की समस्या है और मन की समस्या है, दोनों का सामना करके उनके परे जा सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा।
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A)
प्रश्न: किसी का कोई सवाल है? कहा जाता है कि बुद्धि से हमारे मन को नियंत्रित करें। पर आईआईटी (IIT) के जो बड़े बुद्धिमान विद्यार्थी होते हैं, वो भी आत्महत्या कर लेते हैं। तो फिर बुद्धि से मन का नियंत्रण कैसे होता है?
उत्तर:
क्या है, वास्तव में ‘बुद्धि’ शब्द के अलग-अलग अर्थ होते हैं। बुद्धि जब हम शैक्षणिक पद्धति में, आजकल के समय में देखते हैं, तो यह इन्फॉर्मेशन प्रोसेसिंग एबिलिटी (Information processing ability) है—कैसे चीज़ों को याद रखना है, नंबर्स को कैलकुलेट करना है, जानकारी को कैसे प्रोसेस करना है। उसको हम बुद्धि मान लेते हैं, वो बुद्धि का एक अंग है।
पर शास्त्र में जो बुद्धि का विचार करते हैं, बुद्धि का अर्थ क्या है? भगवान कहते हैं, सात्त्विक गुणी बुद्धि जो होती है, उसके बारे में अठारहवें अध्याय के 30वें श्लोक में बोलते हैं:
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
वो कहते हैं कि वो बुद्धि—बुद्धि मतलब क्या है, जिससे हम समझते हैं क्या कार्य करना है, क्या कार्य नहीं करना है; क्या उचित है, क्या अनुचित है; क्या सत्य है, क्या असत्य है। तो ये जो भेद करने की, डिस्क्रिमिनेटिंग पावर (Discriminating power) जो है, उसको बुद्धि कहते हैं।
तो ये जो इन्फॉर्मेशन प्रोसेसिंग एबिलिटी है, वह पूर्व कर्मों से भी मिल सकती है। पर हमें हमारे जीवन जीने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण बुद्धि है, वह है हमारी ‘विवेक बुद्धि’। विवेक बुद्धि मतलब, वह बुद्धि जिससे हम समझें कि सही क्या है, गलत क्या है। तो यह बुद्धि शास्त्रों के अध्ययन से आती है।
इसलिए हम जब बुद्धि की बात कर रहे हैं, बुद्धि अकेली पर्याप्त नहीं है, बुद्धि के साथ में भक्ति चाहिए है। बुद्धि से कम से कम हम समझ सकते हैं कि यह मन जो बोल रहा है, वो करने की ज़रूरत नहीं है। बुद्धि से हम समझ सकते हैं कि मुझे भगवान का आश्रय लेना है। केवल बुद्धि से हम मन को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, पर बुद्धि से हम भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं।
प्रश्न: अगर कोई शराबी बात करता है, तो मन और बुद्धि दोनों दिखाई देते हैं, तो कैसे समझें, क्या मन की बात है, क्या बुद्धि की बात है?
उत्तर:
हाँ, यह जो है बड़ा मुश्किल है। अंदर से हमें समझना बड़ा मुश्किल है, पर हम बाहर से देख सकते हैं। बाहर से मतलब, कि वो जो बोल रहा है, उसका फल क्या होगा? अगर यह करने से अच्छा होने वाला है, तो जो आवाज़ हमें अच्छे मार्ग पर ले जाती है, उसको हम समझेंगे कि वो बुद्धि की आवाज़ है, और जो आवाज़ हमें गलत मार्ग पर ले जाती है, वो हम समझेंगे कि मन की आवाज़ है।
मान लीजिए, रास्ते में एक शराब की दुकान है। दो व्यक्ति अपने दफ्तर जा रहे हैं। एक व्यक्ति ने कई बार शराब पी है, दूसरे व्यक्ति ने कभी शराब नहीं पी है। जो पहला व्यक्ति जाता है, जैसे जाने लगता है, शराब की दुकान है। उसने कई बार शराब पी है—”नहीं नहीं नहीं पीना है… काम करना है… एक गिलास पी लेता हूँ, क्या प्रॉब्लम है?” बड़ा द्वंद्व तो चलता रहेगा उसके मन में।
दूसरा व्यक्ति है, वह शराब की दुकान को देखेगा भी नहीं, चला जाएगा अपने काम में। तो एक व्यक्ति का मन उसको बहुत प्रलोभन कर रहा है, दूसरे व्यक्ति का मन प्रलोभन नहीं कर रहा है। क्यों? क्योंकि एक व्यक्ति ने पहले शराब पीके उस प्रकार के इम्प्रेस्शंस (Impressions), उस प्रकार की छवि, उस प्रकार का संस्कार अपने मन में डाल दिया है।
तो जो मन, जिस प्रकार के हमने संस्कार डाले होते हैं, उसके अनुसार वह हमको प्रवृत्त करता है। अगर हमने मन में अच्छे संस्कार डाले हुए हैं, हम भक्ति अच्छे से करते हैं, भक्तों के संग में आते हैं, मंदिर जाते हैं… तो अगर बहुत बड़ी समस्या आती है, तो समस्या आएगी, पर हमने अच्छी भक्ति की है—”चलो मंदिर में जाते हैं, भगवान का आश्रय लेते हैं, कुछ भक्तों से बात करते हैं।”
अधिकांश रूप से हमारे मन में संस्कार विपरीत होते हैं, वह अच्छे नहीं होते हैं, इसलिए कई बार हमारा मन हमारे शत्रु के रूप में कार्य करता है। पर ऐसे नहीं है कि हमेशा मन शत्रु रहता है, कभी-कभी मन अच्छे विचार भी बताता है। कोई व्यक्ति इंटीरियर डेकोरेशन (Interior decoration) में बहुत अच्छे होते हैं, वो कमरे में आएंगे और देखेंगे—”कर्टन (Curtain) आप ऐसे लगाओ, एक कुर्सी आप यहाँ पर लगाओ, इसको ऐसा पेंट करो, यह बड़ा अच्छा दिखेगा।” दूसरा व्यक्ति आएगा, एक हफ्ते के लिए उस घर में रहता है, उसको समझ नहीं आएगा कैसे डेकोरेट करें। तो यह दक्षता (Expertise) वास्तव में मन के संस्कार हैं, उसको इंस्टिंग्स (Instincts) कहते हैं।
प्रश्न: जो लोग उनको बचपन में बहुत समस्याएं आई ही हैं, तो फिर उनको कैसे मदद कर सकें, उनको शांति कैसे कर सकें?
उत्तर:
क्या है कि, मैं बता रहा था कि मन एक स्क्रीन के समान है। जब मन टीवी बन जाता है, तो वो कभी-कभी भविष्य में ले जाता है, और कभी भूतकाल में। आजकल के समाज में लोगों के दो प्रकार की मानसिक समस्याएं बहुत हैं: एक है एंजाइटी (Anxiety), चिंता, और दूसरा है डिप्रेशन (Depression), उद्विग्नता।
जब मन टीवी बन जाता है, और भविष्य के बारे में दिखाने लगता है, तब हम चिंता करने लगते हैं—”अरे यह हो गया तो क्या होगा, वो होगा तो क्या होगा?” यह मन को वर्तमान में लाना है। जो टीवी भविष्य में ले जाता है, वो अच्छा नहीं है, वो भूतकाल में ले जाता है, तो भी अच्छा नहीं है।
महाभारत में कहते हैं कि जो शोक है, लामेंटेशन (Lamentation), शोक ऐसी भावना है, जो हमारी चेतना को भूतकाल में बंदी बना के रख देता है। (Lamentation imprisons our consciousness in the past)।
हम सबको ऐसे लगता है कि मेरी समस्या बहुत बड़ी है। पर जब हम दूसरों की समस्याएं सुनते हैं, तो हमें लगता है, अच्छा, इसके इतने समस्या हैं! तो वो बताया था कि एक बार बहुत अच्छा एक्सरसाइज (Exercise) हुआ, सबने अपनी समस्याएं बताईं। और फिर उन्होंने प्रस्ताव रखा कि अगर आपको शक्ति होती है कि अभी आप सबकी समस्याएं एक टेबल पर रखते हैं, और किसी और की समस्याएं आप ले लें (इंटरचेंज करें), तो आप किसी की समस्याएं लेने जाएंगे? किसी ने बोला, “नहीं चाहिए!” क्या होता है, The mind makes us think we alone are suffering and that makes our suffering much more.
सत्य यह है कि हाँ, कुछ लोगों का बचपन बुरा रहा होगा, घाव भी हुए हैं। पर अगर मान लीजिए, मेरे हाथ पर घाव हो गया है, फ्रैक्चर हो गया है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि मैं उस हाथ को वैसे ही हमेशा के लिए बेकार रख दूँगा। थोड़ा उसको शांत रखना पड़ेगा ताकि वो हील (Heal) हो सके, पर बाद में थोड़ा एक्सरसाइज (Exercise) करना पड़ेगा, उससे ही ठीक होगा वो।
भूतकाल के घावों को ठीक होने के लिए समय देना चाहिए, उसके बाद में हमें ज़िंदगी में आगे बढ़ना चाहिए। ज़िंदगी में आप कुछ पढ़ाओ, कुछ मंदिर में आप कुछ सेवा करो।
भगवान की दक्षता है कि हमारा जो बुरी चीज़ है, उससे कुछ अच्छा भी ला सकते हैं। (Krishna can bring good even out of the bad)। मैं एक इंटरफेथ कांफ्रेंस (Interfaith Conference) में गया था, तो वहाँ पे एक क्रिश्चियन प्रीस्ट (Christian Priest) आए थे। वह बता रहे थे कि वे शराब और ड्रग्स (Drugs) में लग गए थे, और किसी ने कुछ गुनाह किया और उनको जेल में डाल दिया। वास्तव में उसने कुछ गलती नहीं की थी। जब वो जेल में गए, वहाँ पर एक प्रिज़न प्रीचिंग प्रोग्राम (Prison preaching program) था। वहाँ पर वो भक्तों से मिल गए और भक्त बन गए। और बाहर आके न केवल वो खुद भक्त बने रहे, पर भक्ति का प्रचार भी करने लगे।
तो जो उनके साथ हुआ बड़ा अन्याय था, फिर भी भगवान की क्या योजना है, हमें पता नहीं है। तो तीन चीज़ें हैं:
- वर्तमान में हमें मन को लाना है।
- वर्तमान में मन को लाने के लिए सेवा भाव करना है।
- भगवान में श्रद्धा रखनी है कि इससे भी कुछ अच्छा आ सकता है।
और वो अच्छा कब आएगा? जब मैं वर्तमान में रहकर भगवान की सेवा करूँगा। भूत में रहकर “अरे मेरे साथ यह क्यों हुआ” ये सब छोड़ जाएंगे, और हमारा भविष्य उज्जवल बन जाएगा।
कोई और सवाल है किसी का? नहीं? स्टॉप यहाँ।
बहुत धन्यवाद!
प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!