How to increase our faith – Hindi
[Sunday feast class at ISKCON, Sant Nagar, Delhi, India]
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Lecture Summary
इस प्रवचन में मुख्य रूप से भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा विकसित करने, आधुनिक जीवनशैली के भ्रमों से बचने और जीवन में आने वाले दुखों के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाने पर चर्चा की गई है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- भगवान की भ्रांत धारणाएँ और नास्तिकता: भगवान परम कृपालु पिता हैं, क्रूर नहीं। यह संकीर्ण धारणा कि “जो हमारे मार्ग पर नहीं चलेगा वह नरक में जाएगा” गलत है। अक्सर आस्तिकों की यही संकीर्णता लोगों को नास्तिक बना देती है।
- आधुनिक जीवनशैली का भ्रम (WWS): आज का समाज WWS (Work, Watch, Shop – काम करो, टीवी देखो, खरीदारी करो) के चक्र में फँस गया है। विज्ञापन हमारी बुद्धि को भ्रमित करते हैं और यह झूठा विश्वास दिलाते हैं कि भौतिक वस्तुएँ (शैम्पू, सिगरेट आदि) खरीदने से हमें आज़ादी या सुख मिलेगा।
- सात्त्विक बुद्धि और विज्ञान: ‘जो दिखता है वही सच है’ (Seeing is believing) यह जानवरों का स्तर है। जिस प्रकार न्यूटन ने सेब गिरते देखकर अदृश्य गुरुत्वाकर्षण को समझा, उसी प्रकार सात्त्विक बुद्धि वाले लोग इस सृष्टि की व्यवस्था को देखकर इसके अदृश्य परम नियंता (भगवान) को पहचानते हैं।
- दुख का कारण और भगवान का आश्रय:
- दुनिया में दुख का अर्थ यह नहीं है कि भगवान नहीं हैं; इसका अर्थ है कि लोग भगवान की शरण में नहीं जा रहे हैं (जैसे डॉक्टर के होते हुए भी मरीज़ उसके पास न जाए)।
- ग्लव्स का उदाहरण: हमारे कर्मों के अनुसार दुख (टीचर की मार) तो आएगा, लेकिन भगवान का आश्रय और कृष्ण भावना उन ‘मोटे ग्लव्स’ की तरह है, जो हमें दर्द का अनुभव नहीं होने देते।
- दुख के समय सहानुभूति का महत्त्व: जब कोई व्यक्ति (भक्त या सामान्य जन) भावनात्मक या शारीरिक दुख में हो, तो उसे केवल ‘तत्त्वज्ञान’ या उपदेश नहीं देना चाहिए। जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की विपत्ति में सहानुभूति और व्यावहारिक मदद की थी, उसी प्रकार हमें भी पीड़ित व्यक्ति की मदद करनी चाहिए और उसे उबरने का समय देना चाहिए।
निष्कर्ष: सच्ची श्रद्धा अच्छे भक्तों के संग और बुद्धि के पोषण से वटवृक्ष (निष्ठा) के समान दृढ़ हो जाती है। जब हम भगवान का आश्रय लेते हैं, तो हम दुनिया के हर दुख का डटकर सामना कर सकते हैं और भगवत् प्रेम के शाश्वत आनंद को प्राप्त कर सकते हैं।
Full Transcription
हमारी श्रद्धा कैसे बढ़ाएं?
हरे कृष्ण! आज मैं कृतज्ञ हूँ कि आप सबके बीच में भगवान के संबंध में, कुछ भगवान की कथा के बारे में चर्चा कर सकते हैं। तो मैं आज चर्चा करूँगा कि हम हमारी श्रद्धा कैसे बढ़ा सकते हैं। कि समस्याएँ क्यों आती हैं और समस्याओं के परे जाकर हम श्रद्धा का विकास कैसे कर सकते हैं।
तो भगवद्गीता के चौथे अध्याय का उनतालीसवाँ श्लोक है:
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
भगवान के बारे में जो श्रद्धावान हैं, जिनके पास श्रद्धा है, वो ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः’ – जो भगवान के बारे में जानने की इच्छा रखते हैं, उसके लिए तत्पर हैं, आज उसके लिए उत्सुक हैं, और ‘संयतेन्द्रियः’ – जो अपनी इन्द्रियों पर संयम रखते हैं, उन्हें वो ज्ञान मिल जाता है। ‘ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति’ – और उनको परम शांति प्राप्त होती है। अचिरेण मतलब बिना ज़्यादा समय की प्रतीक्षा किए, जल्दी ही यह जो भगवत् प्राप्ति है, शांति जो है, आसानी से मिल जाती है। तो यहाँ पर श्रद्धा का फल क्या बताया है? शांति।
नास्तिकता और भगवान की भ्रांत धारणा
मैं अभी कुछ समय पहले अमेरिका में था। दो-तीन दिन के लिए अमेरिका में था, तो स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) में एक लेक्चर था मेरा। टॉपिक था “The missing self in the selfie”, कि जो लोग सेल्फी पिक्चर दिखाते हैं, तो वो वास्तव में किसकी पिक्चर ले रहे हैं, उनको पता नहीं है। तो उसके बाद एक विद्यार्थी ने कहा कि, “मैं भगवान को नहीं मानता, मैं नास्तिक हूँ।”
तो मैंने उससे पूछा कि, “ये ठीक है, आप किस भगवान को नहीं मानते हैं?”
उसने कहा, “मैं किसी भी भगवान को नहीं मानता हूँ।”
तो मैंने कहा, “ठीक है, पर आप जिस भगवान को नहीं मानते हैं, उसकी संकल्पना क्या है? कि आप कैसे भगवान को नहीं मानते?”
उसने कहा, “मैं ऐसे भगवान को नहीं मानता हूँ, जो अगर आप उनकी शरण में नहीं जाते हैं, तो आपको हमेशा के लिए नरक में भेज देते हैं।”
तो मैंने कहा, “तो हाथ मिलाते हैं! मैं भी ऐसे भगवान को नहीं मानता हूँ।”
अगर आपकी धारणा ये है कि जो भगवान की शरण नहीं जाते, भगवान उनको हमेशा नरक में भेज देते हैं, तो ऐसी भगवान की जो धारणा है, यह भ्रांत भगवान है। भगवान परम कृपालु हैं। भगवान क्या कहते हैं? ‘सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति’ (भगवद्गीता 5.29) — मैं सब जीवों का परम हितैषी हूँ। साधारणतः, अभी कुछ धर्मों में ऐसे बताया गया है कि अगर आप इस जन्म में भगवान की शरण में नहीं आते हो, तो फिर आप नरक में जाओगे, हमेशा के लिए नरक में जाओगे।
अब इसमें क्या तर्क है? हम माता-पिता हैं, अगर हमारा बच्चा कोई गलती करता है, तो हम उसको सुधारने का मौका देते हैं। अगर भगवान परम पिता हैं, परम कृपालु हैं, तो अगर हम कोई गलती करते हैं, तो क्या भगवान हमें सिर्फ एक मौका देते हैं? यह कुछ लॉजिकल (तार्किक) नहीं है। तो कई बार जब लोग कहते हैं कि मैं नास्तिक हूँ, तो वहाँ उनकी भगवान की कुछ ऐसी ही गलत संकल्पना होती है।
एकाधिकारवादी धर्म और गर्भपात का तर्क
मैं साउथ इंडिया में ट्रेवल कर रहा था, तो ट्रेन में मेरी बाजू में एक क्रिश्चियन प्रचारक बैठे थे। वो बोलने लगे कि भगवान से बात करने का एक ही मार्ग है, जो उनके पैगंबर हैं, वही आपको बचा सकते हैं।
तो मैंने कहा, “ठीक है, अगर आप ये मानते हो कि भगवान असीमित हैं, पर आप असीमित भगवान को सीमित क्यों बना रहे हैं? कैसे सीमित बना रहे हैं? भगवान असीमित हैं, पर आप कह रहे हैं कि भगवान तक पहुँचने का एक ही मार्ग है। जो इस मार्ग से भगवान तक नहीं पहुँचते हैं, उनकी क्या दुर्गति होती है?”
तो उन्होंने कहा, “वो नरक में जाएंगे।”
ठीक है, फिर मैंने उनसे कहा कि, “कई बार आजकल गर्भपात (Abortion) होता है। तो जो शिशु गर्भ में होता है, जिसको मार दिया जाता है गर्भपात में, तो उसको भगवान कहाँ ले जाते हैं?”
उन्होंने कहा, “वो स्वर्ग में चला जाएगा, हेवन (Heaven), उनकी अज्ञानता के कारण उन्हें स्वर्ग मिलता है।”
मैंने कहा, “ठीक है, तो फिर जीवन का उद्देश्य क्या है? भगवान के पास जाना, स्वर्ग में चले जाना। अगर आप कह रहे हो, आपके सामने जो जीवित व्यक्ति हैं, उनमें से जो भी भगवान की शरण नहीं जाएगा, वो नरक जाएगा। और जिनका जन्म ही नहीं हुआ, जिनका गर्भपात हो जाता है, वो सब सीधे भगवान के पास! तो फिर हम सबका गर्भपात कर देते हैं, सब सीधे भगवान की शरण में चले जाएंगे!”
उन्होंने कहा, “नहीं, नहीं! ऐसे कैसे कर सकते हैं? गर्भपात तो बड़ा पाप है, ऐसा नहीं कर सकते हैं।”
मैंने कहा, “पर ठीक है, आप ही बता रहे हैं कि जीवन का उद्देश्य है स्वर्ग में जाना। जिस शिशु का गर्भपात कर देते हैं, वो स्वर्ग में चला जाएगा। और जिसका जन्म हो जाएगा, वो शायद भगवान की शरण नहीं लेगा, वो स्वर्ग में नहीं जाएगा। तो फिर अगर स्वर्ग में जाना ही उद्देश्य है, तो इसका गारंटी है कि गर्भपात कर देते हैं, तो वो स्वर्ग में चला जाएगा!”
उन्होंने कहा, “नहीं, नहीं, ऐसे कैसे कर सकते हैं, यह तो बड़ा पाप है।”
मैंने पूछा, “क्यों बड़ा पाप हो रहा है? उससे जीवन का उद्देश्य तो पूरा हो रहा है, तो पाप क्यों है यह?”
तो उनका इसके पास कोई जवाब नहीं था।
डॉक्टर का उदाहरण और सही दृष्टिकोण
हर धर्म में, एक ऐसा उद्देश्य होता है कि जो भी अनुयायी है, वो एक मार्ग का पालन करे। मान लीजिए, अगर कोई डॉक्टर है, और उसके पास कोई पेशेंट (मरीज़) आता है, और वो पेशेंट बताता है कि यह समस्या है। डॉक्टर उसको दवाई बोलता है। और वो पेशेंट कहता है कि, “नहीं, मैं उस डॉक्टर के पास गया था, उसने यह बताया। फिर मैं उस डॉक्टर के पास गया था, उसने वो बताया।”
तो डॉक्टर बोलता है, “बाकी डॉक्टर ने जो बोला है छोड़ो, मैं जो बोलता हूँ, तुम करो। तुम यह करोगे, तो ठीक हो जाओगे।” तो अभी जब यह डॉक्टर ऐसे बताता है, “मैं जो बोलता हूँ, तुम करो”, इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी सब डॉक्टर गलत हैं। उसका उद्देश्य क्या है? कि तुम दवाई लेना चाहते हो, और तुम अगर ऐसा नहीं करोगे, तो ठीक नहीं होगे। मैं जो बताता हूँ, वो दवाई लो, तुम ठीक हो जाओगे।
तो जो स्टेटमेंट्स एक्सक्लूसिविस्ट (Exclusivist) होते हैं, उनका उद्देश्य यह बताना नहीं है कि बाकी सब गलत हैं। उसका उद्देश्य यह है कि अगर तुम्हें कुछ प्रगति करनी है, तुम्हें एक डॉक्टर की दवाई लेनी है, एक बात का अनुसरण करना है, तो एक निष्ठ होकर करो। तो अभी क्या होता है, जब लोग ये नहीं समझते और कहते हैं, “मेरा ही मार्ग सबसे बड़ा मार्ग है, और बाकी सब मार्ग गलत हैं”, तो कई बार नास्तिकता का सबसे बड़ा कारण ये आस्तिक लोग ही होते हैं। जब आस्तिक लोग बहुत संकीर्णवादी बन जाते हैं, तो फिर लोग नास्तिक बन जाते हैं।
अमेरिका में, साउदर्न (Southern) पार्ट में कई प्रांत हैं, उनको बाइबल बेल्ट (Bible Belt) कहते हैं। वहाँ पे काफ़ी क्रिश्चियन होते हैं, वो थोड़े एग्रेसिव (Aggressive) होते हैं, उनको इवेंजेलिकल (Evangelical) कहते हैं। वो बहुत सब को प्रचार करने का प्रयास करते हैं। तो वहाँ अमेरिका में एक व्यक्ति ने एक टी-शर्ट पहना था जिस पर लिखा था: “हे भगवान, आपके प्रचारकों से मुझे बचाओ।” (Lord, save me from your followers).
अभी साधारणतः भगवान, उनके प्रचारकों के द्वारा हमें बचाते हैं, उनके प्रचारकों के द्वारा हमें ज्ञान मिलता है, उनके द्वारा हमें भक्ति के बारे में, आध्यात्म के बारे में पता चलता है।
सत्संग का महत्व और संकीर्णता से बचाव
तो इसलिए हमें अगर श्रद्धा बढ़ानी है, तो सबसे पहले ज़रूरत क्या है? कि हमें अच्छे भक्तों का संग चाहिए। ऐसे भक्त जो धर्म का पालन भगवान के पास जाने के लिए करते हैं, आध्यात्मिक प्रगति के लिए करते हैं। कई बार लोग धर्म का पालन इसलिए करते हैं कि वो खुद के ईगो (अहंकार) को बढ़ाने के लिए करते हैं, कि “मैं सबसे बड़ा, मैं इतना बड़ा हूँ, फिर मेरा धर्म बहुत बड़ा है।”
एक बार तीन लोग, तीन अलग-अलग धर्म से थे— अ, ब, क (A, B, C)। तो वो तीन धर्म के लोग भगवान से प्रार्थना करने के लिए गए। तो धर्म ‘अ’ का जो व्यक्ति था, उसने कहा कि, “हे भगवान, ये जो धर्म ‘ब’ के लोग हैं, उन सबका विनाश कर।” तो धर्म ‘ब’ का व्यक्ति आया, उसने भगवान से प्रार्थना की, “भगवान, ये धर्म ‘अ’ के जो लोग हैं, उनका विनाश कर।”
तीसरा जो धर्म ‘क’ का व्यक्ति था, वो गया। उसने कहा, “हे भगवान, मुझे मेरे लिए कुछ भी नहीं चाहिए, ये धर्म ‘अ’ और ‘ब’ के लोग जो प्रार्थना कर रहे हैं, बस उन दोनों की इच्छा पूरी कर दे!”
इसमें क्या हो गया है? तीनों लोग संकीर्णतावादी बन गए। तो ऐसा जब भाव होता है, तो तब भक्त लोग भी भगवान के प्रति संकीर्ण हो जाते हैं। पर जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति ऐसा है, जो सही में भगवान के बारे में जानना चाहता है, भगवान की भक्ति करना चाहता है, भगवान की भक्ति को दूसरों को बताना चाहता है, तो इस तरह से सही में आध्यात्म में रुचि लगने लगती है। ऐसे भक्तों का जब भगवान की कृपा से संग मिलता है, तो उससे हमें प्रेरणा मिलती है।
तो जब हम भक्ति में आते हैं, तो मंदिर में आएंगे, तो अलग-अलग प्रकार के लोग होते हैं मंदिर में। तो हमें मंदिर में उन लोगों का संग करना है, जिससे हमें प्रेरणा मिलती है। कैसे है, कि हम सभी ने पूर्व जन्मों में कुछ भक्ति की है, उससे हमारे पास भक्ति का कुछ स्टॉक है। अगर स्टॉक मार्केट का उदाहरण लेते हैं, तो स्टॉक मार्केट में लोग जाते हैं किसलिए? वो अपना पैसा बढ़ाने के लिए। उनके पास कुछ पैसा है और फिर वो पैसे को और बढ़ाना चाहते हैं। और स्टॉक मार्केट में अगर अच्छी तरह से पैसा इन्वेस्ट किया, तो फिर आपका पैसा बढ़ सकता है। पर ऐसे नहीं है कि सिर्फ स्टॉक मार्केट में जाने से अपने आप आपका पैसा बढ़ना है; स्टॉक मार्केट में जाने के बाद भी बुद्धिमत्ता से निवेश करना पड़ता है, तब आपका पैसा बढ़ सकता है।
आधुनिक जीवनशैली: Work, Watch, Shop (WWS)
लोग सोचते हैं, “मैं ये चीज़ खरीदूँगा, तो सुख मिल जाएगा। मेरा ये संबंध बन जाएगा, तो सुख मिल जाएगा।” पर ये ऐसे होता है कि लोग हमेशा वैसे ही अतृप्त रहते हैं। कितना भी हम खरीद लेंगे, सोचते हैं वो खरीद लेंगे तो मिल जाएगा, टीवी खरीद लेंगे तो सुख मिल जाएगा। उसके लिए हमें बुद्धि की ज़रूरत है।
जो आजकल की आधुनिक समाज की परिस्थिति है, उसको हम कह सकते हैं WWF नहीं, बल्कि WWS। यह WWS क्या है? अभी अधिकांश लोग क्या करते हैं? मेहनत करते हैं, नौकरी होती है, घर में काम होता है, ऑफिस में, दफ्तर में काम होता है। तो वर्क, वर्क, वर्क (Work, Work, Work)। बहुत मेहनत करते हैं। और फिर मेहनत करने के बाद, जब घर में आ जाते हैं, तो वो बहुत थक जाते हैं। “मुझे कुछ राहत चाहिए”, तो टीवी चालू करते हैं। अब टीवी चालू करते हैं तो क्या होता है? यह कार्यक्रम देखो, वो कार्यक्रम देखो, वो कार्यक्रम देखो— वॉच, वॉच, वॉच (Watch, Watch, Watch)।
जब कार्यक्रम देखते हैं, तो अभी हमको लगता है कि यह कार्यक्रम देखने से मनोरंजन हो जाता है। ठीक है, थोड़ा मनोरंजन हो जाता है, पर वास्तव में सिर्फ मनोरंजन नहीं होता है, उससे ज़्यादा क्या होता है? मन का उत्तेजन हो जाता है, मन विचलित हो जाता है। क्यों मन विचलित होता है? अगर आप कोई सीरियल देख रहे हैं, या कार्यक्रम देख रहे हैं, उसमें एक घंटे का सीरियल होगा। तो वो 54 मिनट का अगर वो सीरियल होगा, वो 54 मिनट का सीरियल बनाने के लिए जितना पैसा खर्च होता है, उससे ज़्यादा पैसा खर्च होता है, वो 6 मिनट के विज्ञापनों (Ads) पर।
विज्ञापनों का भ्रम और आज़ादी का झूठा नारा
टीवी में दिखाते हैं, वो एक लड़का चल रहा था रस्ते पे, और वहाँ पर बाजू में कुछ लड़कियाँ चल रही थीं, वो लड़कियाँ इस पर ध्यान भी नहीं दे रही थीं। तो तब एक बॉलीवुड का स्टार वहाँ पे आ गया, और सब उसका नाम चिल्लाने लगे, उसके पास जाके, उसको किस करने लगे, उसको हग करने लगे। और यह बेचारा देख रहा है। फिर वो बॉलीवुड स्टार उसको बोलता है, “आप जानिएगा? मेरा राज़ क्या है?” वो कहता है, “क्या है?” तो बताता है कि कोई ‘Fair and Handsome’ क्रीम या शैम्पू है। तो फिर वो उसे लगा लेता है। और जब वो लगा कर आ जाता है, तो क्या होता है? वो जैसे ही उसे लगाता है और वो जो लड़कियाँ उसको देखती हैं, उससे आके चिपकने लगती हैं, उसका आलिंगन करने लगती हैं।
तो अभी यह ऐसा विज्ञापन है, ऐसा ऐड (Ad) है, यह वास्तव में पुरुष और स्त्री दोनों की बुद्धि के प्रति अपमान है। क्यों? क्योंकि अगर केवल कोई शैम्पू लगा लेगा और जो लड़कियाँ हैं उससे आके चिपकने लगती हैं, यह स्त्रियों की बुद्धि के प्रति अपमान है। और ऐसी कहानी कोई पुरुष सच मानकर उस पर विश्वास कर रहा है, तो यह पुरुष की बुद्धि के प्रति अपमान है। पर क्या है? यह विज्ञापन ऐसे बनाए जाते हैं कि हमको लगने लगता है कि “हाँ, यह मिल जाए, तो हमें सुख मिलेगा।”
अमेरिका में 1929 में, हर साल जैसे अभी कुछ दिन पहले American Independence Day हुआ था, तभी उनका मार्च होता है। तो 1929 में ऐसा मार्च हुआ था। तभी क्या हुआ था? सिगरेट की कंपनियाँ थीं, उन्होंने तभी सिगरेट कुछ बेच रहे थे। जो भी युवा लोग थे, जिनके पास सिगरेट खरीदने की क्षमता थी, वो सब लोग सिगरेट पीने लग गए थे। तो अभी सिगरेट कंपनियों को अपना मार्केट बढ़ाना था। तो अभी मार्केट बढ़ाएँ कैसे? जितने लोगों के पास पैसा हो सकता है वो तो खरीद रहे हैं। तभी उन्होंने सोचा कि वास्तव में बहुत बड़ा मार्केट तो स्त्रियों का है, क्योंकि स्त्रियाँ स्मोक नहीं करती हैं। तो अभी स्त्रियों को स्मोक करने की आदत कैसे लगाएं?
तो फिर उन्होंने क्या किया? वो जो अमेरिकन इंडिपेंडेंस डे का मार्च था, उस समय जो हॉलीवुड या अमेरिका के जो फीमेल आइकॉन्स थे, फीमेल मॉडल्स थे, वो सब उस मार्च में जा रहे थे। और जब मार्च का सबसे विज़िबल पॉइंट आया, जहाँ कैमरा हैं, फोटो ली जा रही हैं, सारी दुनिया में जा रही हैं फोटोज, तभी ये सब जो फीमेल स्टार्स वगैरह थे, उन सबको पैसा दिया गया। और उनसे कहा गया, “तभी आप सब अपनी जेब से सिगरेट निकालो और फूँको।” और सबने फूँका। और रिपोर्टर्स ने बोला, “आप ये क्या कर रही हैं? ये सिगरेट क्या है?” तो उन्होंने कहा, “हम आज़ादी की ज्योति जला रहे हैं (Torches of Freedom)।”
अभी सिगरेट पीने और आज़ादी के लिए क्या संबंध है? वास्तव में कुछ भी संबंध नहीं है। पर उस समय ऐसा क्या है कि आज़ादी हम सबको बहुत अच्छी लगती है। और किसी भी चीज़ के साथ आज़ादी जोड़ दो, तो लगता है, “हाँ, हम आज़ादी जला रहे हैं।” तो क्या हो गया, उन्हें ऐसा लगा कि सिगरेट को आज़ादी की ज्योति बता दिया और उससे इतने लोग प्रलोभित हो गए कि हज़ारों-लाखों की संख्या में स्त्रियाँ अगले पांच साल में स्मोकिंग करने लगीं।
और उसके कई साल बाद सिगरेट पीने के क्या खराब परिणाम होते हैं, शरीर पर पता चल गए। और खासकर स्त्रियों पर क्या परिणाम होते हैं, खासकर जो गर्भवती स्त्रियाँ हैं उनके बच्चों पर क्या परिणाम होते हैं, वो सब बाद में पता चल गए। पर तब तक काफी देर हो चुकी थी, बहुत से लोग उससे आसक्त हो गए। वास्तव में उसमें सुख कुछ नहीं होता है। वो हमको प्रलोभित करके बंधन में डाल लेते हैं, परेशानी में डाल देते हैं।
तो मैं बता रहा था कि आधुनिक संस्कृति में हम काम करके आते हैं और बोलते हैं कि “ये राहत है”, तो टीवी देखते हैं। और टीवी में क्या होता है? “ये खरीदो, ये खरीदो, ये खरीदो!” वॉच, वॉच (Watch, watch)। हम देखते हैं, तो फिर क्या होता है? उसके बाद तीसरी चीज़ है: शॉप (Shop)। जाके खरीदो! ये खरीदो, वो खरीदो, वो खरीदो। आज हम खरीदते लगते हैं, खरीदते लगते हैं। तो फिर क्या होता है? कोई चीज़ मुफ्त में तो नहीं मिलती है। बहुत चीज़ें खरीद लेते हैं, तो फिर अभी उसको शायद कर्ज़ में कुछ ले लेते हैं, कुछ इंस्टॉलमेंट्स (Installments) में ले लेते हैं। तो फिर अभी उसको सारा पे (Pay) करना है, तो और काम करते हैं। तो और काम करते हैं— वर्क, वर्क, वर्क (Work) बढ़ जाता है। इसलिए और तनाव आ जाता है, तो फिर आके टीवी देखो— वॉच, वॉच, वॉच (Watch)। तो टीवी देखते हैं तो और इच्छाएं बढ़ जाती हैं, फिर— शॉप, शॉप, शॉप (Shop)।
इन तीनों में— वर्क, वॉच, शॉप (Work, Watch, Shop) में ही लोगों का पूरा जीवन निकल जाता है। यही WWS है— World Wide Stupidity. यह दुनिया भर में इस प्रकार से लोग पागल हो जाते हैं। अभी चीज़ें खरीदना बुरी बात नहीं है, हम सब खरीद सकते हैं चीज़ें। पर यह सोचना कि “यह खरीदने से मुझे सुख मिल जाएगा”, वहाँ ग्रहण लगा है।
सात्त्विक बुद्धि का विकास
तो अभी इस सब को समझने के लिए, कि यह जब सारे विज्ञापन हो रहे हैं, इससे आपको सुख मिल जाएगा… नहीं, इससे सुख नहीं मिलेगा। यह समझने के लिए बुद्धि की ज़रूरत है। तो हमारी बुद्धि का विकास करना है। अभी बुद्धि का विकास करना है मतलब क्या? बुद्धि क्या है? एक फंक्शन है। लोग कहते हैं कि भगवान में श्रद्धा नहीं है, पर भौतिकवाद में उनको बहुत श्रद्धा है। “ये खरीदूँगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा”, “वो खरीदूँगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा।” ऐसे लोगों को भौतिकता में श्रद्धा होती है। श्रद्धा सब में है। पर कुछ लोगों की श्रद्धा अच्छी चीज़ में है, कुछ लोगों की श्रद्धा गलत चीज़ में है।
तो अभी जितना हमारी बुद्धि का विकास होता है, तो फिर हम समझ सकते हैं कि किस चीज़ में श्रद्धा रखनी है और किस चीज़ में श्रद्धा नहीं रखनी है। ऐसा बुद्धि का विकास हमारा होता है शास्त्रों के आधार पर, जब हम भक्तों के संग में आते हैं। पर इसमें शास्त्रों के ज्ञान को समझना है। भगवद्गीता में बताते हैं:
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ (भगवद्गीता 18.30)
वो कहते हैं कि जो सत्त्वगुणी बुद्धि होती है, वो समझती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। “प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये” – किस कार्य करने से मुझे डरना चाहिए, “अगर यह कार्य करूँगा तो मैं फँस जाऊँगा, इसमें नहीं घुसना चाहिए।” और कौन सा कार्य करना अच्छा रहेगा, “भले मुझे अभी अच्छा नहीं लगता है, तो भी मुझे करना है, क्योंकि इससे मेरा कल्याण होगा।” तो इस प्रकार से हमारी सात्त्विक बुद्धि हो जाती है। जब सात्त्विक बुद्धि विकसित हो जाती है, तो फिर जो हमको दिखता है, उसके परे हम देख सकते हैं, उसको हम समझ सकते हैं।
Seeing is Believing: विज्ञान और आध्यात्म
कई बार लोग कहते हैं “Seeing is believing” (जो दिखता है, वही सच है)। “अगर आप मुझे दिखाओगे तो मैं इस पर विश्वास करूँगा। भगवान आप नहीं दिखाते हैं, भगवान मैं देख नहीं सकता हूँ, तो मैं आप पर विश्वास नहीं करूँगा।” पर वास्तव में “Seeing is believing”—जो दिखता है वह सत्य है, यह जानवरों का स्वभाव है, मानव का नहीं है।
मान लीजिए, एक रेगिस्तान में कोई जानवर घूम रहा है, उसको एक मृगजल (Mirage) दिख जाता है, तो वो क्या करता है? वो उसके पीछे दौड़ने लगता है। क्यों? क्योंकि जो दिखता है उस पर वो विश्वास करता है। और अगर एक बुद्धिमान व्यक्ति देखता है कि “यहाँ पर पानी दिख रहा है, पर कोई भी उसके ओर जा नहीं रहा है, और पानी सब जगह तो नहीं है”, तो फिर हम विचार करते हैं। और हम जो देखते हैं उस पर तुरंत विश्वास नहीं करते, पर हमारी बुद्धि के अनुसार जांच करते हैं। यह वास्तव में बुद्धि का लक्षण है। जो देखें उसी पर विश्वास करना, यह तो जानवरों का स्तर है, यह मानवों का स्तर नहीं है।
यहाँ तक कि विज्ञान में भी प्रगति “Seeing is believing” के आधार पर नहीं होती है। जो दिखता है सिर्फ उस पर विश्वास करने से विज्ञान नहीं हो रहा है। मैं दो साल पहले कैम्ब्रिज (Cambridge) गया था। वहाँ पर Science and Spirituality (विज्ञान और आध्यात्म) पर एक लेक्चर था, Cambridge University में। वहाँ तभी हम जा रहे थे, तो वहाँ पर जो आइज़ैक न्यूटन (Isaac Newton) विख्यात वैज्ञानिक हैं, उनके बारे में बताया जाता है कि वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे और तभी एक सेब गिर गया। तो वो जो जगह है, वो जो पेड़ अभी तक जीवित है, तो हम उसी रास्ते से गए थे। वो जो पेड़ है, वहाँ पर लोग, कई वैज्ञानिक लोग आते हैं, वो उनके लिए एक तीर्थक्षेत्र के समान होता है कि वहाँ पर जाके वो वैज्ञानिक प्रेरणा लेते हैं।
पर वो जो प्रेरणा है, अगर आप देखते हैं, कुछ लोग कहते हैं वो फल उनके सामने गिर गया, कुछ लोग कहते हैं उनके सिर पे गिर गया, जो भी हो। पर अगर मान लीजिए, न्यूटन की जगह वहाँ पर एक बंदर होता। और वो बंदर के सामने अगर फल गिर जाता है, तो बंदर क्या करता है? फल उठा के खा लेता है। पर न्यूटन ने क्या किया? “यह फल क्यों गिरा? कैसे गिरा?” तो सवाल के जवाब ढूँढे। और यह सवाल के जवाब में उसने क्या किया? गुरुत्वाकर्षण (Gravity) जो थ्योरी है, उसका प्रतिपादन किया।
अभी गुरुत्वाकर्षण किसने देखा है? गुरुत्वाकर्षण कोई नहीं देख सकता है। तो विज्ञान की प्रगति कैसे होती है? जो दृश्य चीज़ है, उसको देख के कुछ अदृश्य चीज़ का प्रतिपादन करना। दृश्य चीज़ एक प्रयोग की प्रक्रिया है जो हमको दिखती है, उसको समझने के लिए कोई अदृश्य तत्त्वों को प्रतिपादित करना पड़ता है। उसके द्वारा ही विज्ञान में भी प्रगति होती है। तो इसलिए किसी बौद्धिक स्तर पर हमें कुछ समझना है, तो सिर्फ जो दिखता है उस पर विश्वास करने से हम नहीं जान पाते हैं। विज्ञान की भी प्रगति नहीं होती अगर कोई व्यक्ति सिर्फ दिखने पर विश्वास करता है। हाँ, जो दिखता है हम उसकी जांच करते हैं और उसके पीछे क्या चल रहा है वो समझने का प्रयास करते हैं। तो ठीक इसी तरह से जो बुद्धिमान व्यक्ति है, वो सिर्फ जो दिखता है उस पर विश्वास नहीं करता।
विश्व का ऑटोमेटिक सिस्टम और परम नियंता
सारा विश्व चल रहा है। कैसे चल रहा है यह विश्व? कौन चला रहा है इस विश्व को? अभी कुछ लोग कहते हैं कि भगवान आपको दिखते ही नहीं हैं, तो क्यों भगवान पर विश्वास करते हैं?
अगर आप एक बड़ी बिल्डिंग में जाते हैं और बड़ा होटल है या बड़ा इम्पोर्टेन्ट बिल्डिंग है, ऐसे ही आप उस दरवाज़े के सामने जाते हो, तो दरवाज़ा खुल जाता है अपने आप। आप लिफ्ट के सामने जाते हो, लिफ्ट खुल जाती है। आप हाथ धोने जाते हो, आप हाथ नीचे रखते हैं टैप (पाइप) में, टैप में से पानी आने लगता है। तो ये सब कुछ आटोमेटिक (Automatic) होता है।
अगर सब कुछ आटोमेटिक हो रहा है, तो व्यक्ति दो निष्कर्ष निकाल सकता है। एक निष्कर्ष है कि यहाँ पे सब कुछ अपने आप चल रहा है, कोई भी कंट्रोल में नहीं है, कोई भी नियंत्रक (Controller) नहीं है। और दूसरा निष्कर्ष है कि सब कुछ अपने आप चल रहा है, ऐसा लग रहा है, इसका मतलब जो नियंत्रक है, जो मैनेजर (Manager) है, वो इतना अच्छा है कि उसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति की ज़रूरत ही नहीं है।
तब हमको पता चलता है कि दुनिया में बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता है। कुछ भी दुनिया में अपने आप अच्छा नहीं चलता है। अपने आप छोड़ दो तो सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। विज्ञान में भी इसका एक नियम है, Law of Entropy (एन्ट्रापी का नियम) कहते हैं उसे। प्रकृति इतनी अच्छी आयोजित की गई है कि भगवान को बार-बार हस्तक्षेप करने की ज़रूरत नहीं है। The best management is where everything is managed and no manager is seen. सबसे अच्छा मैनेजमेंट क्या है? सबकुछ अच्छा चल रहा है पर कोई भी मैनेजर दिखाई नहीं देता है। तो यह सबसे अच्छा मैनेजमेंट है। भगवान का मैनेजमेंट ऐसा ही है। तो इस तरह से बुद्धि का हम इस्तेमाल करेंगे, तो हम दुनिया को देख सकते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देख सकते हैं, जिससे हमारी भगवान के बारे में श्रद्धा बढ़ेगी।
अनुभव: दुख का अर्थ भगवान की अनुपस्थिति नहीं
और तीसरी चीज़ है: अनुभव। अनुभव मतलब, जब हम दुनिया में जीते हैं, हमारे जो अनुभव होते हैं, उसके बारे में हम विचार करते हैं, उसके बारे में कुछ समझने का प्रयास करते हैं। उसके द्वारा हम हमारे जीवन में भगवान की जो योजना है, वो समझते हैं।
“दुख क्यों है? दुनिया में दुख है, इसका मतलब है भगवान नहीं है।” तो एक बार एक भक्त थे, वो एक डॉक्टर के पास गए। वो डॉक्टर नास्तिक था। तो उसने देखा भक्त ने तिलक पहना था, कंठी माला थी। उसने कहा, “तो भगवान को मानते हैं आप? इस दुनिया में इतना दुख है, इसका मतलब भगवान नहीं है।”
भक्त ने कहा, “आपके तर्क के अनुसार तो इस शहर में कोई डॉक्टर नहीं है।”
डॉक्टर ने कहा, “क्या मतलब? मैं डॉक्टर हूँ, आप मेरे सामने बैठे हो, आप बाहर आ जाओ।”
तो डॉक्टर की क्लिनिक के बाहर ही, एक भिखारी था, और भिखारी खांस रहा था, बुरी तरह खांस रहा था, बीमार था।
भक्त ने कहा, “ये बीमार है, ये सबूत है कि इस शहर में कोई डॉक्टर नहीं है।”
डॉक्टर ने कहा, “अरे, वो बीमार इसलिए है, क्योंकि वो मेरे पास आ नहीं रहा है। वो मेरे पास आएगा, मैं ये दवाई दूँगा, वो लेगा, उसकी बीमारी ठीक हो जाएगी।”
भक्त ने बोला, “एक्जेक्टली! (Exactly!) दुनिया के लोग दुखी हैं, इससे ये साबित नहीं होता कि भगवान नहीं हैं। इससे ये साबित होता है कि लोग भगवान के पास आ नहीं रहे हैं, भगवान का आश्रय ग्रहण नहीं कर रहे हैं, भगवान ने जो बताया है उसका पालन नहीं कर रहे हैं, इसलिए वो दुखी हैं।”
तो दुनिया में दुख है, पर दुख का मतलब ये नहीं है कि भगवान नहीं हैं।
ग्लव्स (Gloves) का उदाहरण और भगवान का आश्रय
तो दुनिया में जो भी दुख होगा, उसमें अगर हम आश्रय लेते हैं तो हमें एक आत्म-राहत मिल जाएगी, सुकून मिल जाएगा। तो एक उदाहरण साझा करूँगा, कि मान लीजिए एक विद्यार्थी है, उसने अपना होमवर्क (Homework) नहीं किया है, और अभी उसकी जो टीचर (Teacher) है, वो बड़ी स्ट्रिक्ट (Strict) है। तो जो विद्यार्थी होमवर्क नहीं करते, टीचर उनके हाथ पे छड़ी से मारती हैं।
अब जो माँ है, माँ चाहती है कि उसका जो विद्यार्थी (बच्चा) है, उसको कुछ दर्द न हो, उसको कोई सज़ा न मिले। ये माँ की एक इच्छा है। पर साथ-साथ माँ ये भी चाहती है कि बच्चा समझदार बने, कि वो पढ़ाई में होमवर्क अच्छे से करे। तो माँ को पता है, “आज इसने होमवर्क नहीं किया है।” तो होमवर्क नहीं किया है, तो अभी क्या करना है? उसको तो सज़ा मिलनी है। जब वो स्कूल जा रहा होता है, तो बच्चे की माँ क्या करती है? उसके दोनों हाथ में बड़े, मोटे ग्लव्स (Gloves) डाल देती है।
तो ग्लव्स डाल देती है और ग्लव्स के साथ वो जाता है स्कूल में। टीचर पूछती हैं, “आपने होमवर्क किया?” वो एक हाथ दिखाता है। हाथ दिखाता है, तो टीचर छड़ी मारती हैं। जब वो टीचर छड़ी मारती हैं, तो बड़ा आवाज़ आता है। पर वो जो ग्लव्स होता है, वो ग्लव्स के कारण बच्चे को दर्द महसूस नहीं होता।
प्रकृति के नियम जो माया देवी हैं, वो इस टीचर के समान हैं। हम सब विद्यार्थी के समान हैं, बालक के समान हैं। और भगवान हमारी माँ के समान हैं। तो हमारे ही पूर्व कर्मों के कुछ फल हमें मिलने वाले हैं, कुछ दुख आने वाले हैं। भगवान नहीं चाहते हैं कि हम दुखी हों। तो भगवान हमें वो ग्लव्स दे देते हैं। वो ग्लव्स है ‘कृष्ण भावना’, भगवान कृष्ण का स्मरण। उस स्मरण से हम उत्तेजित नहीं होंगे, अगर हम भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं।
भागवतम् के तीसरे स्कंध में बताया गया है:
मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च ।
तपन्ति विविधास्तापा नैतान मद्गतचेतसः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 3.25.23)
जो भगवान के आश्रय में अपनी चेतना को लगा देते हैं, उनके जीवन में ताप आते हैं (तपन्ति विविधास्तापाः), पर ‘नैतान् मद्गतचेतसः’, क्योंकि उनकी चेतना मुझमें लग गई है, तो उसके कारण उनको वो दर्द जो है, अनुभव नहीं होता है। समस्याएँ आती हैं पर समस्याओं से वो इतने विचलित नहीं होते हैं। हम सबके जीवन का, इस जगत का स्वभाव है कि सबके जीवन में समस्याएँ आती हैं। पर अगर हम भगवान का आश्रय लेते हैं, तो अधिक दुख का प्रभाव नहीं होता।
दुख के साथ जीना vs दुख में जीना और ‘निष्ठा’
कुछ लोग कहते हैं कि हमें दुख के साथ जीना पड़ता है। भागते हुए जीना पड़ता है। साधारणतः हमें दुख के साथ जीना पड़ता है, पर हमें दुख में जीने की ज़रूरत नहीं है। दुख के साथ जीना मतलब क्या? “हाँ, ये समस्या है मेरे जीवन में, इसका कब हल निकलेगा, कैसे हल निकलेगा पता नहीं है, मुझे उसके साथ जीना है।” कुछ लोगों को पीठ का दर्द होता है, तो पीठ के दर्द की कई बार कोई दवाई नहीं होती है, कुछ इलाज नहीं होता है, तो उसके साथ जीना पड़ता है। पर कभी-कभी पीठ का दर्द होता है, कभी-कभी नहीं होता है।
पर कुछ लोग 24 घंटे उसके बारे में विचार करते हैं, “अरे पीठ का दर्द है, पीठ का दर्द है, अभी तो नहीं है पर आने वाला है। बाद में जब दर्द होगा तो क्या होगा, क्या परेशानी होगी?” तो वो दुख के साथ नहीं जी रहे, वो दुख में जी रहे हैं।
दुख में भी जब हम भगवान का आश्रय लेते हैं तो सुकून मिलता है, शक्ति मिलती है, उसका अनुभव करते हैं। तो वो अनुभव श्रद्धा के लिए सबसे अधिक पोषक है। हम खुद देख सकते हैं, हमारा मन विचलित होगा, “यह समस्या, यह समस्या।” फिर हम मंदिर में आते हैं, कीर्तन चल रहा है, भगवान का दर्शन करते हैं, तो थोड़ी शांति मिलती है, थोड़ी राहत मिलती है। यहाँ नास्तिक लोग भी आते हैं। एक संशोधन (Research) हुआ था, नास्तिक लोग भी आते हैं, उनको लगता है कि यहाँ पर कुछ शांति है। उनको पता नहीं क्यों, पर यहाँ शांति लगती है। तो वास्तव में भगवान के सानिध्य में वो शांति का अनुभव हर व्यक्ति कर सकता है।
तो इस तरह से, अगर हम भक्ति का प्रयोजन करके, भक्ति का अनुसरण करके, अगर हम वो जो दिव्य अनुभव करते हैं शांति का, सुकून का, सुख का, तो उससे जो हमारी श्रद्धा बढ़ जाएगी, वो अतुलनीय वृद्धि होगी। वो ऐसी वृद्धि होगी, जो हमेशा हमारे साथ रहेगी। जैसे अनुभव के बारे में श्रद्धा बढ़ती है, उसको कहते हैं ‘निष्ठा’।
जब श्रद्धा प्राथमिक स्तर पर होती है, वो एक केले के पौधे के समान होती है, जो हिल जाते हैं जब भी कोई समस्या आती है। पर जब हमको प्रायोगिक अनुभव हो जाता है, साक्षात्कार होता है, तभी ये जो श्रद्धा होती है, वो एक वटवृक्ष (बरगद के पेड़) के समान बन जाती है। उसको ‘निष्ठा’ कहेंगे। समस्या कितनी भी आ जाए, हाँ, समस्या से हम थोड़े विचलित होंगे, पर भगवान में हमारी आसक्ति रहेगी। हमारे पास एक शक्ति होती है, ये सारी शक्तियों से हम हमारी समस्याओं का सामना करने का प्रयास करते हैं, सुख प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। पर हमें समस्याओं का सामना करने के लिए, और सुख प्राप्त करने के लिए वो जो सबसे बड़ी शक्ति है, वो है भगवान में श्रद्धा। श्रद्धा के द्वारा, कोई भी समस्या क्यों ना आ जाए, उसका हम डटकर सामना कर सकते हैं।
परम आनंद और श्रद्धा की वृद्धि
और श्रद्धा के द्वारा, जो परम आनन्द है, भगवान में हम चेतना लगाने से, भगवत् प्रेम प्राप्त करने से, और अंत में भगवत् धाम के जाने से, वह परम आनन्द भी प्राप्त होता है। और यही परम आनन्द हम सबको देने के लिए, यही श्रद्धा की वृद्धि करने के लिए, श्रील प्रभुपाद जी ने कृष्ण भावनामृत संघ की स्थापना की है, और यहाँ पे आकर हम हमारी श्रद्धा को सुदृढ़ कर सकते हैं। तो यह जो परम शक्ति है, वो हम सबको प्राप्त होगी।
नास्तिकता और संकीर्णतावाद
कई बार जो लोग नास्तिक बन जाते हैं, उनका कुछ ऐसे संकीर्णतावादी धार्मिक लोगों से संग हुआ होता है, जिसके कारण उनको लगता है, कि यह धार्मिक लोग अच्छे नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं, “तो आप मेरे मार्ग का पालन नहीं करोगे, तो आप नरक में जाओगे।” तो यह संकीर्णतावाद है। ऐसे धर्म के ग्रंथों में ऐसी बातें भी हैं, पर उसका उद्देश्य इन धर्मों का खंडन करना नहीं है, उसका उद्देश्य क्या है? फोकस (Focus) करना है। जैसे कोई डॉक्टर बताता है।
परिपक्व भक्तों का संग और बुद्धि का पोषण
परिपक्व भक्त होते हैं, मतलब क्या? उनकी रुचि भगवान के प्रति है, भगवान के प्रति आकर्षण बढ़ाने की उनकी इच्छा है। ऐसे भक्तों का अगर हम संग करते हैं, तो उससे हमारी भक्ति में प्रेरणा बढ़ती है, उससे हमारी श्रद्धा बढ़ती है, हमारा उत्साह बढ़ जाता है। उसी तरह से, अगर हमारी भक्ति को, जो श्रद्धा है, जो भक्ति है, उसको बढ़ाना है तो अच्छे भक्तों के संग में रहते हैं, जो भगवान में रुचि रखते हैं, उसके द्वारा हमारी भक्ति बढ़ती है। और केवल उनके संग में आना नहीं है, संग में आकर हमें ज्ञान प्राप्त करना है, हमारी बुद्धि का पोषण करना है।
बुद्धि के पोषण के प्रसंग में मैंने देखा, बताया कैसे कि जब जो दिखता है, वो सही है या नहीं, ये जाँच करना बुद्धि का लक्षण है। आजकल के समय में क्या है, विज्ञापनों के द्वारा क्या बताते हैं वो? काम करो, टीवी देखो, खरीदारी करो। इसमें पूरा जीवन खपा जा रहे हैं लोग। पर अगर हम बुद्धि विकसित करेंगे, तो हम जाँच करेंगे— क्या इस चीज़ से सही में सुख मिलेगा, या क्या ये मृगजल के समान है? लोग कहते हैं, उसको समझने के लिए कोई अदृश्य तत्त्व का प्रतिपादन किया जा रहा है। जैसे न्यूटन ने फल को गिरते हुए देखा, तो गुरुत्वाकर्षण का प्रतिपादन किया। उस तरह से इस दुनिया में जो योजनाबद्धता है, उसको देखकर बुद्धिमान लोग भगवान के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। जैसे कोई भिखारी बीमार है, उसका मतलब यह नहीं कि डॉक्टर नहीं है, उसका मतलब यह है कि भिखारी डॉक्टर के पास जा नहीं रहा है, या डॉक्टर के तत्त्वों का पालन नहीं कर रहा है।
संकट में भगवान का आश्रय और तत्त्वज्ञान
और अगर हम भगवान का आश्रय लेते हैं, तो समस्याओं से मैं विचलित नहीं होता हूँ, क्योंकि मैंने भगवान में अपनी चेतना लगा दी है। इसके दो-तीन उदाहरण हैं। मैंने खुद का अनुभव किया है, जब मुझे फ्रैक्चर हो गया था, तभी मैंने भगवद्गीता के श्लोक गान करने में चेतना लगा दी थी। और ऐसी श्रद्धा ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। और ऐसी श्रद्धा जो निष्काम है, तो वो आ जाएगी, और दुनिया में कोई भी समस्या क्यों ना आ जाए, हम उसका सामना कर सकते हैं। और दुनिया का सबसे बड़ा आनंद है, शाश्वत आनंद है, भगवद् भक्ति का, भगवद् प्रेम का, उसकी प्राप्ति होगी, जब हम श्रद्धा से अग्रसर होंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्ण।
भक्ति में तत्त्वज्ञान और भावना का संतुलन
आपका सवाल करने के लिए बहुत धन्यवाद। अच्छी भी तरह से कोई व्यक्ति, भगवान की भक्ति में लग जाता है, वो अच्छा है। पर, जब वो भक्ति में लग जाते हैं, तो उनको तत्त्वज्ञान सिखाया जाता है। तो तत्त्वज्ञान से क्या होता है? सिर्फ वो भावना का कारण नहीं रहता है भक्ति में आने के लिए। “हाँ, यह अच्छी बात है”, तो किसी भी कारण भक्ति में आना ठीक है। पर अच्छा है कि इसके परे एक आध्यात्मिक जगत है, “मैं वास्तव में आत्मा हूँ और आत्मा के स्तर पर मेरा शाश्वत जीवन है।” तत्त्वज्ञान से समझते हैं, कम से कम मूल रूप से।
तो फिर क्या होता है? भक्ति हम ज्ञान के स्तर पर करते हैं। भक्ति ये दिव्य भावना है, पर अभी हम सिर्फ भावना के स्तर पर भक्ति करेंगे, तो स्थिर नहीं रहेंगे। जीव गोस्वामी एक बात कहते हैं, “जो शुद्ध भक्त हैं, जो महान भक्त हैं, वो भक्ति में अपनी प्रीति के कारण रहते हैं।” प्रीति मतलब, उनको भगवान से आकर्षण के कारण रहते हैं। पर हम सब साधक जो हैं, हम भक्ति में रहते हैं, हमारी बुद्धि के कारण। तो साधारणतया, जब वो भक्ति में लग जाते हैं, तो उनको तत्त्वज्ञान समझने की सुविधा मिलनी चाहिए, ग्रंथ पढ़ना चाहिए।
विपत्ति में सहानुभूति और व्यावहारिक मदद
जब महाभारत में अभिमन्यु की मृत्यु होती है, तो सुभद्रा रोने लगती हैं, और सबको कोसने लगती हैं, अपने भाइयों को कोसने लगती हैं— “क्या तुमने सारे वो शस्त्र छोड़कर तुम्हारे हाथ में चूड़ियाँ पहन ली हैं? तुम सब मेरे पुत्र का संरक्षण नहीं कर सके, ग्लानि है तुम पर! मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा है।” तो तभी भगवान अर्जुन से नहीं कहते हैं, “मैंने तुमको बताया है हम शरीर नहीं आत्मा हैं, तुम भूल गए सब कुछ?” ऐसा कुछ भगवान नहीं बोलते हैं। भगवान अर्जुन को सहानुभूति से कहते हैं, कि “अर्जुन, इसे देखो, वो भी दुखी है। जितना तुम्हें दुख हुआ है अभिमन्यु के लिए, पर उनको भी दुख हुआ है। तुम ऐसे वचन नहीं बोलो, जिससे कि उनके दुख को बढ़ावा मिले। तुम अपने तत्त्वज्ञान से उनको एन्करेज (Encourage) करो, तुम प्रोत्साहन दो।”
तो तभी हमको अमल करना है, मतलब क्या? उस व्यक्ति की मदद करनी है। उनको सिर्फ बातें बताना काफी नहीं है, वो एक मार्ग है जिससे उनको बात करते हैं, पर मदद करने का भाव बचाना है। यह क्या आता है? दुनिया में लोग भगवान का प्रेम कैसे देख सकेंगे? वो शायद भगवान हमारे सामने आके हमको आलिंगन नहीं करते हैं। ऐसा होता नहीं है। बहुत पतित लोगों तक भगवान का प्रेम भगवान के भक्तों के प्रेम के द्वारा आता है।
तो इसलिए अगर कोई दुख में है, तो तभी उनको तत्त्वज्ञान बोलने के साथ-साथ, हम जहाँ तक हो सके उनके लिए मदद करना चाहते हैं। और अगर तभी हम मदद करते हैं, तो फिर लोगों को लगता है कि “भक्त पर समस्या आ गई है और भक्त लोग अच्छी मदद करते हैं।” तो हम एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं। इसमें एक-दूसरे की हम सब मदद करते हैं। तो तभी हमें इस तरह से अगर लोगों की मदद करते हैं, तो फिर उससे उनकी श्रद्धा बढ़ सकती है। समस्या से सब कोई पीड़ित होते हैं, पर अगर देखते हैं कि भले प्रत्यक्ष रूप से भगवान मेरी मदद नहीं कर रहे हैं, पर प्रत्यक्ष रूप से भक्त मेरी मदद कर रहे हैं। और मदद कैसे कर सकते हैं? हर एक व्यक्ति की क्षमता अलग-अलग होती है।
भावनात्मक आघात और रिकवरी का समय
पर जब हम उनके साथ बात करते हैं कि जब कोई व्यक्ति दुखी होता है, तो वो एक भावनात्मक स्तर पर उसको चोट लग रही है। और हमको समझना है तभी, ये जो माया है, ये जो भौतिक आसक्ति है, तो ऐसा नहीं होना है कि हम बोलें, “अरे सुख तो नहीं है, दुख है।” उसको तभी मान लीजिए अगर वो बोले, “अरे कुछ नहीं, तुम शरीर नहीं हो, तुम आत्मा हो, तुम पर असर नहीं होगा!” नहीं, ऐसा नहीं कर सकते। जैसे शारीरिक चोट होती है, तो वैसे ही कभी-कभी हमको मानसिक चोट, भावनात्मक चोट भी लगती है।
और जब भावनात्मक चोट लगती है, तो उस समय हमको कुछ समय लगता है ठीक होने के लिए। तो तभी जैसे अगर हाथ में फ्रैक्चर हो गया है, तो तभी हाथ को आराम देना पड़ेगा ताकि वो ठीक हो सके। तो ये एक स्वाभाविक बात है कि किसी व्यक्ति के जीवन में बहुत दुख आ गया, तो कभी-कभी वो सबको दोष देगा। अभी कुछ समय नास्तिक भाव भी करेगा वो। तो वो सब जो है, उसको ज़्यादा सीरियस (Serious) नहीं लेना चाहिए। तो समझना चाहिए कि ये ज़ख्म हुआ है, और जो घायल हुआ है, उसके कारण ऐसी प्रतिक्रिया आनी है।
द्रौपदी का उदाहरण: भगवान की योजना और समय
जब द्रौपदी का अनादर होता है, जब वो द्रौपदी कृष्ण से मिलती है (जब वनवास में होते हैं), तो द्रौपदी कृष्ण को पूछती है— “कृष्ण, मैं आपकी भक्त हूँ, मैं आपकी रिश्तेदार हूँ, मैं आपकी सेविका हूँ, आपकी सखी हूँ। इसके बावजूद मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? तुमने मेरी मदद क्यों नहीं की?”
तो भगवान ऐसे नहीं कहते कि, “अरे शांत रहो… मेरी प्लानिंग परफेक्ट (Planning Perfect) होती है। तुम कैसे मेरी प्लानिंग को चुनौती दे सकती हो?” भगवान सहानुभूति लेते हैं। भगवान कहते हैं, “मुझे पता नहीं था कि यहाँ जूए का मैच (Dice Game) होने वाला है। वो द्वारका पे एक असुर ने आक्रमण कर दिया था और उस असुर के आक्रमण से बचाने में मैं व्यस्त था। जैसे ही मुझे पता चल गया, मैं तुरंत यहाँ पे आ गया। हे द्रौपदी, ऐसी विपत्ति में भी तुम धर्मनिष्ठ रहीं। यह तुम्हारी महानता का विषय है। जिसने तुम्हारा अपमान किया है, उन सबको सज़ा ज़रूर मिलेगी।”
तो भगवान क्या करते हैं? भगवान स्वयं द्रौपदी को सांत्वना देने का कार्य करते हैं। तो जब कोई घायल हो गया है, तो उनको समय देना चाहिए ठीक होने के लिए। इसलिए फ्रैक्चर है— “हाँ, ठीक है उसको रेस्ट (Rest) करो।” पर उसको रेस्ट करने के बाद, उसको आराम देने के बाद, धीरे-धीरे उसको एक्सरसाइज़ (Exercise) भी करनी होती है। तो कुछ काल के लिए उसको आराम देना पड़ता है और कुछ काल के लिए धीरे-धीरे एक्सरसाइज़ करना पड़ता है।
तो जो लोग दुखी हैं, दुख में कुछ बोलेंगे, कुछ करेंगे, उससे अगर मदद नहीं होती है। पर धीरे-धीरे, अगर उन्होंने पहले भक्ति की है, तत्त्वज्ञान तक पहुँच जाएँ, तो फिर क्या है, उन्हें भक्ति मिल जाएगी। और उसके लिए प्रधान है कि भक्तों के संग में उनसे कैसे बर्ताव होता है। भक्तों के संग में उनको सहारा मिलता है, सहयोग मिलता है, तो फिर वैसे अनुभवों से उनकी श्रद्धा कम होने के बजाय उनकी श्रद्धा बढ़ सकती है। कुछ समय के लिए जैसे भगवान से दूर चले गए, पर बाद में वो भगवान के और करीब चले गए।
बहुत-बहुत धन्यवाद। श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्तों के संग मिल जाये। निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!