If the soul is eternal, why is the world’s population increasing (Hindi)
Podcast:
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Lecture Summary
- सीमित गणना: जब हम जनसंख्या वृद्धि की बात करते हैं, तो हम केवल मनुष्यों को गिनते हैं, जबकि पृथ्वी पर मौजूद असंख्य जानवरों, पेड़-पौधों और घास को अनदेखा कर देते हैं।
- अन्य योनियों का विनाश: शहरीकरण और मानवीय प्रभाव के कारण जंगल कट रहे हैं और कई जानवरों की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।
- आत्मा का स्थानांतरण: आत्मा केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि हर चेतना वाले जीव (पेड़, पौधे, जानवर) में होती है। वर्तमान में कोई ‘नई’ आत्माएँ नहीं आ रही हैं, बल्कि जो आत्माएँ पहले जानवरों या पेड़-पौधों की योनियों में थीं, वे अब मानव रूप में जन्म ले रही हैं।
- अपूर्ण दृष्टि: स्कूल के एक खाली और भरे हुए क्लासरूम का उदाहरण देकर समझाया गया है कि हमारी दृष्टि बहुत सीमित है। हम केवल एक छोटे से हिस्से (मानव जनसंख्या) को देखकर गलत निष्कर्ष निकाल लेते हैं।
Full Transcription
आत्मा और जीवों की गणना
जब आत्मा का पुनर्जन्म हो रहा है, तो विश्व की जनसंख्या कैसे बढ़ रही है? देखिए, जब हम जनसंख्या गिनते हैं, तो हम केवल मानवों की जनसंख्या ले रहे हैं। पर इस पृथ्वी पर ही अनेक जीव हैं। और इस जगत में कितनी घास है, उसकी गणना किसने की है? कितने वृक्ष हैं?
प्रकृति और अन्य योनियों का विनाश
मान लीजिए, अगर हम देखते हैं, तो पहले हरियाली बहुत थी। अभी जैसे शहर बढ़ रहे हैं, मानवीय प्रभाव इस सब पर बढ़ रहा है, तो हम पेड़ काट रहे हैं, खेत काट रहे हैं, घास काट रहे हैं। कई ऐसे जानवर हैं, जो अभी न केवल एंडेंजर्ड स्पीशीज (endangered species) में आ गए हैं, उनका अस्तित्व खतरे में है, बल्कि अभी उनका अस्तित्व खत्म भी हो गया है।
हर जीवित इकाई में आत्मा का वास
इसका मतलब क्या है कि वो सब भी आत्मा हैं। आत्मा केवल मानव शरीर में नहीं होती है। जहाँ भी जीवन है, जहाँ भी चेतना है, जीवन के लक्षण हैं, चेतना के लक्षण हैं, वहाँ पर आत्मा होती है। घास में आत्मा है, पेड़ में आत्मा है, जानवरों में आत्मा है। तो मानव जनसंख्या बढ़ रही है, पर इसका मतलब ऐसे नहीं है कि नई आत्मा आ रही है। पर जो आत्मा दूसरे शरीर में थीं, वह दूसरे शरीर और दूसरी योनियों में थीं, चाहे घास की योनियों में थीं, पेड़ों की योनियों में थीं, कुछ जानवरों की योनियों में थीं, वहाँ से अभी मानव शरीर में आ रही हैं।
सीमित दृष्टि का उदाहरण
हम मान लीजिए एक तरह से देखते हैं कि कोई स्कूल है। और स्कूल यों तो खाली होता था। मान लीजिए कोई बाहर का व्यक्ति आता है मानवीय संस्कृति को समझने के लिए। वो सोचेगा कि, वो क्लासरूम का निरीक्षण अगर कर रहा है, तो रोज़ नौ से चार के बीच में इस क्लासरूम की जनसंख्या बढ़ जाती है और उसके बाद में इसकी जनसंख्या पूरी कम हो जाती है।
अपूर्ण दृष्टि और गलत निष्कर्ष
तो वो क्या है? वो एक बहुत ही लिमिटेड सैंपल (limited sample) देख रहे हैं। उनकी संकीर्ण दृष्टि है। सीमित दृष्टि के कारण वो सोच रहे हैं कि अच्छा यहाँ बहुत लोग, यहाँ जनसंख्या बढ़ रही है, यहाँ जनसंख्या कम हो रही है। तो हमारी जो सीमित दृष्टि, वैसी ही हो जाती है। मतलब हम केवल मानवों की गणना करते हैं। तो फिर जो आत्मा मानव योनि के बाहर हैं, उनकी गणना हम नहीं कर रहे हैं। इसलिए हमारी यह ‘the incomplete vision leads to an incorrect conclusion’ (अपूर्ण दृष्टि गलत निष्कर्ष की ओर ले जाती है)। सीमित दृष्टि से गलत निष्कर्ष आ जाता है। तो आत्मा का पुनर्जन्म और जनसंख्या का बढ़ना, इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।