Is bhakti philosophy pessimistic – Hindi?
[Bhagavatam class at ISKCON, Pune]
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Lecture Summary
रामायण और भगवद्गीता के उदाहरण:
- भगवान राम: उन्होंने पिता द्वारा दिए गए वनवास को ‘नियति’ और दैव की इच्छा मानकर सहज स्वीकार कर लिया। लेकिन जब रावण ने सीता का अपहरण किया, तो उसे नियति मानकर चुप नहीं बैठे, बल्कि एक पति के ‘कर्तव्य’ के रूप में पूरी शक्ति से उसका प्रतिकार किया और युद्ध किया।
- भगवद्गीता: भगवान कृष्ण अर्जुन को सुख-दुख, सर्दी-गर्मी सहन करने (तितिक्षस्व) को कहते हैं, लेकिन साथ ही धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने का भी आदेश देते हैं। इसका अर्थ है कि छोटी परेशानियों को सहन करना चाहिए ताकि बड़े लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
पाश्चात्य (Western) बनाम भारतीय (Indian) संस्कृति:
- पाश्चात्य संस्कृति (कर्मेंद्रिय प्रधान): यह संस्कृति मानती है कि हमें हर चीज़ को बदलना या नियंत्रित करना चाहिए। नियंत्रण की इस अत्यधिक चाहत के कारण आज समाज में मानसिक तनाव (Anxiety) और डिप्रेशन बहुत बढ़ गया है, क्योंकि हर चीज़ हमारे वश में नहीं होती।
- भारतीय संस्कृति (ज्ञानेंद्रिय प्रधान): यह संस्कृति प्रकृति के स्वभाव को समझने और जो चीज़ें हमारे नियंत्रण से बाहर हैं, उन्हें स्वीकार (Accept) करने पर ज़ोर देती है। इससे मन शांत रहता है।
स्वीकृति (Acceptance) का महत्त्व:
- जीवन में कई चीज़ें (जैसे जन्म, कुछ मर्यादाएँ, बीमारियाँ) हम बदल नहीं सकते। यदि हम इन्हें स्वीकार नहीं करते हैं, तो हमारे भीतर घृणा (Hatred) और खुन्नस (Resentment) पैदा होती है, जो वास्तविक समस्या से ज़्यादा दुख देती है।
- अपनी सीमाओं को स्वीकार करने से हमारी ऊर्जा बचती है, जिसे हम उन चीज़ों में लगा सकते हैं जिन्हें हम वास्तव में बदल सकते हैं।
परिस्थितियों से निपटने के तीन उपाय (Tolerate, Mitigate, Migrate):
- सहन करें (Tolerate): जो परिस्थितियाँ अस्थायी या छोटी हैं, उन्हें सहन कर लें।
- प्रभाव कम करें (Mitigate): यदि समस्या बड़ी है, तो अपनी बुद्धि और शक्ति से उसमें सुधार (परिवर्तन) करने का प्रयास करें।
- दूर चले जाएँ (Migrate): यदि परिस्थिति आपके आध्यात्मिक या मानसिक पतन का कारण बन रही है और सुधारी नहीं जा सकती, तो उससे दूर चले जाना ही बेहतर है।
भौतिक और आध्यात्मिक समाधान का संतुलन:
- केवल भौतिक समाधानों (दवाई, धन, तकनीक) पर निर्भर रहने से निराशा मिल सकती है। मन को सकारात्मक रखना ज़रूरी है, लेकिन “मन ही भगवान है” यह सोचना गलत है।
- हमें भौतिक स्तर पर अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, लेकिन परिणाम के लिए पूर्ण रूप से भगवान की इच्छा पर निर्भर रहना चाहिए। भगवान की सेवा और स्मरण को केंद्र में रखकर किया गया कर्म ही सच्ची सकारात्मकता है।
Full Transcription
भक्तों का स्वभाव और नियति की धारणा
ये भक्तों का स्वभाव है कि दूसरों के हमें सद्गुण देखते हैं, जो दुर्गुण हैं उस पे वे आँखें बंद कर लेते हैं। तो जो बोला है, शायद मैं भविष्य में दूसरों के लिए उतार पाऊँगा। मैं उनके शब्दों के लिए, उनकी शुभ इच्छा स्वीकार करता हूँ। यह जो यहाँ पर श्री राधा कुंज बिहारी जी के यहाँ पर आने का अवसर मिला, बहुत उत्सुक हूँ मैं कि आज यहाँ पर आ पाया हूँ आप सबके संग में। मैं यहाँ पर उनके शब्दों के लिए उनकी शुभ इच्छा स्वीकार करता हूँ।
यहाँ पर जो भागवत कथा है, इस पर हम चर्चा करेंगे, नियति क्या है और नियति के सामने हम कैसे जाते हैं? एक दृष्टांत आता है कि अवन्ती ब्राह्मण का वृत्तांत चल रहा है। जो भी दुख उसको मिल रहे थे, तो वो उसने स्वीकार कर लिए, यह सोच कर कि यह मेरी नियति के अनुसार निर्धारित हुए हैं।
मैं जब अमेरिका में था, अमेरिका के सबसे बड़े यूनिवर्सिटी में से एक है, येल यूनिवर्सिटी (Yale University)। तो येल मेडिकल कॉलेज में मैं एक लेक्चर दे रहा था, वहाँ पर साइंस, स्पिरिचुअलिटी, और सेल्फ इम्प्रूवमेंट (Self Improvement) पर। तो उसके बाद एक मुस्लिम स्कॉलर आया था वहाँ पर उस लेक्चर में, He is a scholar of Islamic studies. और वो कुछ पूछने आया था कि, “आप भारत से हैं, तो India is defined by the caste system. भारत में क्या है, जाति पद्धति है। और जाति पद्धति क्या है, ये सब एक निराशावाद (Pessimism) पर आधारित है। कि तुम्हारे पूर्व कर्मों से तुम्हारा एक जाति में जन्म हो गया है, और तुमको वैसे ही जीना है जिंदगी भर। तुम शूद्र हो, तुम्हें शूद्र ही रहना है। तुम अछूत हो, तुम्हें अछूत ही रहना है। तो ऐसी परिस्थिति में यह जो ऐसा तत्त्वज्ञान है, इसका आज के समाज में क्या relevance (प्रासंगिकता) है? कौन उसको मानने वाला है? और क्यों हमें मानना चाहिए उसको?”
तभी मैंने जवाब दिया कि जो शास्त्रों का सिद्धांत है, वो निराशावाद नहीं है, वो pessimism नहीं है, उसके लिए इंग्लिश में एक और technical word है- Fatalism. Fatalism मतलब जो भी नियति में है, सब कुछ नियति से निर्धारित हो गया है, और हमारे नियंत्रण में कुछ भी नहीं है। पर ऐसा भाव शास्त्रों का नहीं है। मैं महाभारत, रामायण के दो प्रसंगों का वर्णन करता हूँ, फिर इसके आगे तुलना करता हूँ।
रामायण से नियति का दृष्टांत: वनवास और सीता हरण
जब प्रभु श्री रामचंद्र का वनवास हो जाता है, तभी जब उनको पता चलता है, तो वे बड़े धीर भाव से स्वीकार कर लेते हैं। और जब लक्ष्मण सुनते हैं, तो लक्ष्मण बड़े क्रुद्ध हो जाते हैं। और वो कहते हैं कि, “ये तो बड़ा अन्याय है, कि तुम्हें बिना किसी गुनाह के कारण, सजा के रूप में तुम्हें जंगल भेजा जा रहा है, वनवास।” वो बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहते हैं।
तो प्रभु श्री रामचंद्र कहते हैं, “वास्तव में ये मेरे पिता की इच्छा है, मैं स्वीकार करूँगा।” लक्ष्मण कहते हैं, “नहीं, ये तुम्हारे पिता की इच्छा नहीं है, ये कैकेयी का धूर्त भाव है।” तो प्रभु श्री रामचंद्र बोले, “आप जानते हो कि कैकेयी का प्रेम कैसा था मेरे लिए! वास्तव में जैसे कौशल्या मुझे प्रेम करती थी, वैसे ही कैकेयी का भी प्रेम था मेरे लिए। जैसे गंगा का निर्मल प्रवाह हमेशा चलता है, वैसे ही कैकेयी का भी प्रेम था मेरे लिए। मैं बहुत हैरान था, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि एक दिन में गंगा सूख कैसे गई।”
तो आगे प्रभु श्री रामचंद्र बोले, “कि जब मैंने कैकेयी का ये भाव देखा, तो मैं समझ गया, ऐसा परिवर्तन नियति के कारण ही हुआ है। ये दैव की इच्छा है, इसलिए मैं उसको स्वीकार कर लेता हूँ।” तो लक्ष्मण भड़क लेते हैं, वो बोले कि, “वास्तव में ये क्या दैव की बात कर रहे हो? जब अन्याय होता है, तो केवल कायर ही अन्याय को एक दैव के रूप में बोल के स्वीकार कर लेते हैं। जो धीर लोग होते हैं, जो कायर नहीं होते हैं, वो वास्तव में अत्याचार, अन्याय का प्रतिकार करते हैं। तो हमें इसको नियति के रूप में कदापि स्वीकार नहीं करना चाहिए।”
तो फिर तभी रामचंद्र बोलते हैं कि, “मुझे देखना है कि मेरा कर्तव्य क्या है। मैं अगर राजा बनता था, तो वो मेरे पिता की सेवा के लिए है, वो मेरा कर्तव्य है। और अगर पिता की इच्छा है कि मैं जंगल में जाऊँ, तो मैं वो करूँगा। तो इसलिए मैं अभी जंगल में जाऊँगा।” तो अभी यहाँ पे जो होता है, उसको प्रभु श्री रामचंद्र नियति के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।
पर वही अगर हम आगे देखते हैं, जब वो जंगल में होते हैं, दण्डकारण्य में होते हैं, तभी रावण बड़ा षड्यंत्र करके सीता का अपहरण कर लेता है। पर तभी प्रभु श्री रामचंद्र नहीं कहते हैं, “अरे यह नियति की इच्छा थी, सीता का अपहरण हो गया, मैं उसको स्वीकार कर लेता हूँ।” नहीं, तभी वे क्या करते हैं? प्रतिकार करते हैं, पूरी शक्ति से प्रतिकार करते हैं, वो एक पूरा युद्ध करते हैं, और सीता को पुनः प्राप्त करते हैं।
तो मतलब, नियति के अनुसार स्वीकार करना यह एक सिद्धांत है, पर हर जगह में, हर चीज को नियति बोलके कुछ भी न करना, यह सिद्धांत नहीं है। तो अभी प्रभु श्री रामचंद्र जब उनको वनवास में भेजा जाता है, तो वो उसको नियति के रूप में क्यों स्वीकार करते हैं, और सीता का अपहरण होता है, तो उसको नियति के रूप में स्वीकार क्यों नहीं करते हैं?
क्योंकि जो वैदिक संस्कृति है, वो डेस्टिनी-सेंटर्ड (Destiny-centered) नहीं है, वो ड्यूटी-सेंटर्ड (Duty-centered) है। वो नियति को केंद्र नहीं बनाते हैं, हमारे कर्तव्यों को केंद्र बनाते हैं। हम सबका, हरेक का कर्तव्य क्या है, वह देखना है। तो प्रभु श्री रामचंद्र देखते हैं कि जब उनके पिता उनको बोलते हैं, तुम जंगल में जाओ, वो सोचते हैं, “मेरा कर्तव्य है, मेरे पिता के आदेश का पालन करना।” और जब सीता का अपहरण होता है, तो वो सोचते हैं कि “मैं पति हूँ, पत्नी का संरक्षण करना, यह मेरा कर्तव्य है।” इसलिए वो युद्ध करते हैं।
तो जो वैदिक सिद्धांत है, वो नियति के सामने सिर्फ झुक जाना, ऐसा नहीं है। वहाँ कर्तव्यनिष्ठ बना रहना है। और कर्तव्यनिष्ठ बने रहने के लिए, कभी-कभी हमें नियति के रूप में जो हो रहा है, उसको स्वीकार करना है। और कभी-कभी उसका प्रतिकार करना है।
भगवद्गीता में सहनशीलता और कर्तव्य
अभी भगवद्गीता में, भगवान कहते हैं अर्जुन से:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
भगवान कहते हैं अर्जुन से, “तांस्तितिक्षस्व”, जो सुख-दुख आते हैं, जो ठंडी-गर्मी आती है, उसको सहन कर लो। पर उसका अर्थ ऐसा नहीं है। अगर अर्जुन ऐसा अर्थ लेते, या कृष्ण का ऐसा उद्देश्य होता कि “अभी पांडवों ने आपके प्रति इतना अन्याय किया है, द्रौपदी के सम्मान को अपमानित किया है, उसको भी तुम सहन करो।” नहीं!
जहाँ भगवद्गीता बता रही है कि “तांस्तितिक्षस्व” (सहन करो), वही भगवद्गीता यह भी कहती है अर्जुन से कि तुम उठो और युद्ध करो, तुम्हारी विजय मेरी योजना के अनुसार निर्धारित है पहले से, तुम राज्य का भोग करो और मेरे निमित्त मात्र बनो। तो वही भगवद्गीता जो सहन करने को बता रही है, वही भगवद्गीता का ये भी एक उद्देश्य है कि तुम युद्ध करो। मतलब एक तरह से युद्ध करना मतलब सहन नहीं करना। तो फिर जो हम नियति को स्वीकार करते हैं, तो इसका मतलब क्या है?
तो सहन करना मतलब क्या है? सहनशीलता का मतलब क्या है? कि छोटी चीजों को छोटा रखना, जिससे कि जो बड़ी चीज है, उस पे हम हमारी चेतना, हमारी शक्ति केंद्रित कर सकें। इस जगत, दुनिया में जब हम जीते हैं, तो अनेक समस्याएँ आती हैं। तो अभी हर समस्या का, अगर हम हल करने का प्रयास करेंगे, तो हमारी जो शक्ति है वो पूरी उसी में क्षीण हो जाएगी। हम कुछ कर ही नहीं पाएँगे।
मान लीजिए कोई मुंबई जैसे शहर में बड़ी भीड़ में लोकल ट्रेन में जा रहा है। और लोकल में कोई व्यक्ति है और उसके बाजू में खड़े हैं और वो ढकेल रहा है। अपने पैर से, अपने शरीर से ढकेल रहा है। कोई व्यक्ति सोचता है, “तुम जो ढकेलते हो, मैं तुमको ढकेलता हूँ।” वो ढकेलता है, हम ढकेलते हैं, वो ढकेलता है, हम ढकेलते हैं। और हम दोनों ढकेलने में इतना लग जाते हैं कि हमारा स्टेशन आता है पर हम भूल जाते हैं। और आगे चले जाते हैं।
तो अभी ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। वो ढकेल रहा है, ठीक है, थोड़ा बाजू को हो जाओ। कितने समय तक हम इस ट्रेन में हैं? थोड़ा समय तक हैं, थोड़ा बाजू को हो जाओ। वो उसको दिखाना चाहता है, मैं कितना शक्तिशाली हूँ! ठीक है, कोई फर्क नहीं पड़ता है। तो क्या है, अगर वो ढकेलने में हम उसका प्रतिकार करने लग जाएँगे और हमारा गंतव्य भूल जाएँगे, तो क्या हो गया है? वो छोटी चीज को इतनी बड़ी बना दी हमने कि जो बड़ी चीज थी, हमको जहाँ जाना था, वो भूल गये।
पर मान लीजिए, अगर वही व्यक्ति आपको ढकेल रहा है, ढकेल रहा है और ट्रेन से ही बाहर ढकेल रहा है, तो तभी हम सहन नहीं कर सकते हैं। तभी हमें उसका प्रतिकार करना पड़ेगा। तो Tolerance always has to be seen (सहनशीलता को हमेशा इस दृष्टि से देखना होगा) कि जीवन का कोई बड़ा उद्देश्य है हमारे जीवन में। कोई महत्वपूर्ण चीज है, जो हमें करनी है और वह करने के लिए, वह करते समय हमें अनेक असुविधाएँ आएँगी। तो वो असुविधाओं को हम सहन कर लेंगे। पर अगर वह उद्देश्य ही पूरा नहीं हो रहा है, तो फिर हम वह सहन नहीं कर सकते हैं, तब हमें उसका प्रतिकार करना है।
पर अगर छोटी-छोटी असुविधाएँ आ रही हैं, उनका ही हम प्रतिकार करने में हमारी सारी जिंदगी लगा देते हैं, तो फिर कोई बड़ा उद्देश्य पूरा ही नहीं होगा। तो इंग्लिश में कहते हैं “Don’t sweat the small stuff”. Small stuff मतलब छोटी-छोटी चीजें। छोटी-छोटी चीजों पर इतना पसीना, इतनी मेहनत मत करो कि तुम्हारी असल आत्मशक्ति उसमें गवाँ दी जाए।
ज्ञानेंद्रिय प्रधान (भारतीय) बनाम कर्मेंद्रिय प्रधान (पाश्चात्य) संस्कृति
प्रधान फर्क यह एक है, कि भारतीय या पूर्वी संस्कृति (Eastern Civilization) में भी हम देख सकते हैं, जैसे चीन, कन्फ्यूशियस या बुद्धिज्म जो है, उसमें क्या है? कि अधिक जोर इस पर है कि जो हो रहा है उसको स्वीकार करो। और जो पाश्चात्य संस्कृति (Western Civilization) है, उसका जोर है कि जो भी है उसको बदलो, आप उसको बदलो।
तो भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, उन्होंने पहला ग्रंथ लिखा था, बंगाली में- ‘वैष्णव बंगाली सामाजिकता’ (Vaishnava Bengali Sociality)। लगभग 1905 के समय में शायद उन्होंने लिखा था वो। तो तभी पाश्चात्य देश, अंग्रेज जो थे, वो भारत पर हावी हो गए थे। वे कहते थे कि “जो भी है, तुम उसको स्वीकार कर लेते हो, तुम्हें मेहनत करनी चाहिए, तुम्हें कुछ कर के दिखाना चाहिए।”
तभी भक्तिसिद्धान्त ठाकुर अपने लेख में लिखते हैं कि जीव जो है, इस भौतिक जगत में दो पद्धतियों से आदान-प्रदान करता है। एक है अपनी ज्ञानेंद्रियां और दूसरी है अपनी कर्मेंद्रियां।
तो ज्ञानेंद्रियों के द्वारा हम दुनिया का निरीक्षण करते हैं और यह दुनिया क्या है, वह सब जानने का प्रयास करते हैं। दुनिया का स्वभाव क्या है, दुनिया कैसे चलती है, दुनिया में कैसे जीना चाहिए, इसके बारे में हम पूछते हैं। और हम कर्मेंद्रियों के द्वारा इस दुनिया में कार्य करते हैं जिससे कि हम परिवर्तन करें इस दुनिया में।
तो वहाँ भक्तिसिद्धान्त ठाकुर कहते हैं कि जो भारतीय संस्कृति है उसमें ज्ञानेंद्रियों को प्रधान माना गया है। देखें कि आप दुनिया को देखो और दुनिया का असली स्वभाव क्या है, यह समझने का प्रयास करो। पाश्चात्य जो संस्कृति है वो कर्मेंद्रिय प्रधान है- “करना है हमें कुछ, यह करना है, वो करना है, वो करना है।”
तो जो संस्कृति कर्मेंद्रिय प्रधान है, और जो ज्ञानेंद्रिय प्रधान संस्कृति है, उसने क्या प्राप्ति की है, क्या प्रगति की है, वह समझना चाहिए। क्योंकि दोनों के समझने का जो reference point है, जो आधार है, वही अलग है।
तो वह कहते हैं, जो ज्ञानेंद्रिय प्रधान संस्कृति होती है, वह निसर्ग के, प्रकृति के स्वभाव को समझकर, खुद को प्रकृति के स्वभाव के अनुसार harmonize कर लेती है, खुद को उसके अनुसार ढालकर जीती है। पर जो कर्मेंद्रिय प्रधान संस्कृति होती है, वह दुनिया को अपनी इच्छा के अनुसार परिवर्तन करने का प्रयास करती है।
अब एक तरह से, पाश्चात्य संस्कृति जो है, वह आजकल पूरे विश्व में फैल गई है। और उसका आधार क्या है? कि हमें जो भी है, उसको परिवर्तन करना है। पर इस परिवर्तन का प्रभाव क्या हुआ है? वास्तव में, पाश्चात्य देशों में एक तरह से मानसिक विकार जो है, बहुत अधिक है। जितना भारत भी पाश्चात्य हो रहा है, वहाँ पर भी मानसिक विकार बहुत बढ़ रहे हैं। जो एंजाइटी एपिडेमिक (Anxiety Epidemic) है, चिंता जो है, उसका एक बड़ी बीमारी के रूप में फैलाव हो गया है। लाखों-लाखों की मात्रा में लोग मानसिक स्तर पर रुग्ण हो गए हैं।
और इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं, पर इसका एक प्रधान कारण है कि पाश्चात्य संस्कृति का जो आधार है कि हम दुनिया को परिवर्तित कर सकते हैं, हम प्रकृति के साथ झगड़ा कर सकते हैं। उसके कारण क्या है? Acceptance, स्वीकार करना यह बहुत मुश्किल होता है।
जो हम बदल नहीं सकते, उसे स्वीकार करना
तो अभी हम सबके जीवन में ऐसी चीजें हैं जो हम बदल नहीं सकते हैं। अभी किसी का वर्ण है, जन्म से उसको एक वर्ण मिल गया है, वह उसको बदल नहीं सकता है। हमारी बुद्धि है, हम हमारे आई-क्यू (IQ) को थोड़ा-बहुत बढ़ा सकते हैं, पर अलग लोगों की अलग स्मरण शक्ति होती है, हम उसको बदल नहीं सकते हैं। हमने किस कुल में जन्म लिया था, उसको हम परिवर्तित नहीं कर सकते हैं। तो कई ऐसी चीजें हैं, जो हम परिवर्तित नहीं कर सकते हैं और उनको स्वीकार करना बहुत जरूरी है।
उसके प्रति, what is resentment? खुन्नस करना, resentment is खुन्नस। घृणा करना, घृणा hatred है, और खेद, खेद is lamentation। आप, इन तीनों के बीच में जो भी आता है, आप समझ लीजिए- घृणा, खेद और ग्लानि।
तो ये ऐसे क्यों है, ऐसे क्यों है, ऐसे क्यों है? जो resentment (खुन्नस) होता है, उसमें लोगों की बहुत मानसिक स्तर पर बहुत शक्ति ऐसे ही चली जाती है। “ये व्यक्ति ऐसा क्यों है, ये ऐसे क्यों हो रहा है, ये ऐसे क्यों हो रहा है?” तो जब हममें स्वीकार करने की शक्ति कम होती है—हमें ज़रूर दुनिया में परिवर्तन भी करना है, पर परिवर्तन करते समय एक आधार हमें स्वीकार करना है कि कुछ चीजें मैं नहीं बदल सकता हूँ।
और अगर हम ये स्वीकार नहीं कर पाते हैं, अगर हम सोचते हैं कि “हाँ, मैं मेरे कार्य करूँगा, मैं परिवर्तन करूँगा,” तो उससे क्या होता है, ये धारणा बढ़ती है हममें कि “मैं नियंत्रक हूँ, और मैं नियंत्रण करूँगा।” और जितनी हममें हमारी धारणा होती है कि मैं नियंत्रक हूँ, उतना जब हम नियंत्रण नहीं कर पाते हैं, तो उतना हमारा मन पागल हो जाता है।
तो अगर मुझमें ये भाव है ही नहीं कि मैं नियंत्रक हूँ, तो फिर अगर कुछ मेरी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ, तो मैं इतना विचलित नहीं होऊँगा। पर जब मैं सोचता हूँ कि मैं नियंत्रण करूँगा और मैं नियंत्रण नहीं कर पाता, तो फिर मन बड़ा विचलित हो जाता है।
तो आजकल के समाज में ऐसी धारणा होती है कि तुम जो भी इच्छा करो, तुम अगर दृढ़ संकल्प से मेहनत करोगे, तो तुम जरूर प्राप्त करोगे। दृढ़ संकल्प, दृढ़ता महत्वपूर्ण है, पर दृढ़ संकल्प कितना भी हो, कई चीजें ऐसी हैं, जो हमारी प्राप्ति के बाहर हो सकती हैं। कोई व्यक्ति, अगर उसमें संगीत की कुछ क्षमता है ही नहीं, वो टोन डेफ (Tone deaf) है, तो फिर वो अगला ग्रैमी अवार्ड विनिंग सिंगर (Grammy Award winning singer) नहीं बनने वाला है, कुछ भी कर ले।
तो ऐसे, कई ऐसे लिमिटेशन्स (Limitations) हैं जिनको हम लांघ सकते हैं, पर कई ऐसी मर्यादाएँ हैं, उनको हम लांघ नहीं सकते हैं। और यह स्वीकार करना, कि यह नहीं कर सकता मैं, तो उससे क्या होता है? “ठीक है, मैं यह कर सकता हूँ।” जब हमारी मर्यादाएँ स्वीकार करते हैं हम, तो फिर जो चीजें हम परिवर्तन कर सकते हैं, उस पे हम जोर दे सकते हैं।
अगर हम सोचते हैं कि “मुझे कोई मर्यादा है ही नहीं, जो मैं चाहूँ मैं करूँगा,” तो फिर क्या हो जाता है, जो चीजें हम परिवर्तन नहीं कर सकते हैं, वो करने में हम लग जाते हैं। और उसमें हमारी शक्ति हम इतनी गँवा देते हैं, कि फिर जो हम कर सकते हैं, उसके लिए कोई शक्ति रहती नहीं है।
तो इसलिए हमारे भारत का सबसे विख्यात क्रिकेटर जो था, सचिन तेंदुलकर, जब उसने क्रिकेट खेलना शुरू किया था, उसकी इच्छा थी कि मैं फास्ट बॉलर (Fast bowler) बनना चाहता हूँ। और फिर फास्ट बॉलर बनने के लिए काफी प्रैक्टिस कर रहा था, तब उसको बोला गया, उसने वो स्वीकार कर लिया। और फिर उसके बाद उसने पूरा केंद्र अपना बैटिंग पर लगा दिया। अगर उसने सोचा होता कि “आपके लिए बॉलर के रूप में ही करना चाहता हूँ,” तो वो कुछ ज्यादा नहीं कर पाता।
हर चीज में हमें समझना चाहिए। कुछ दुख ऐसे होते हैं जिनका हम प्रतिकार नहीं कर सकते हैं। अगर मान लीजिए हम कहीं यात्रा पर जाने वाले हैं, कहीं घूमने जाने वाले हैं और सब मेरे मित्रों के साथ जा रहे हैं। उसके पिछले दिन शाम को हमको बुखार आ जाता है। और फिर बुखार से हम बिस्तर में पड़े हो गए हैं और मन इतना चीख रहा है- “क्यों हुआ ये, सब मेरे मित्र जा रहे हैं, वहाँ पे घूमने जा रहे हैं, ये देख रहे हैं, वह देख रहे हैं, इतना आनंद ले रहे होंगे, मैं यहाँ पे पड़ा हूँ!”
तो हमें क्या होता है? अगर बुखार आ गया है, थोड़ी शरीर में कमजोरी है, उससे थोड़ी समस्या है। पर बुखार से बहुत पीड़ा नहीं होती है, जो मन गुस्से में है, उससे अधिक पीड़ा होती है। Resentment of reality often hurts more than reality. सत्य से हमें इतना दुख नहीं होता है, सत्य से जो घृणा करते हैं, उससे अधिक दुख हो जाता है।
तो अगर मैं मान लो स्वीकार कर लेता हूँ- “यह हो गया है, कुछ नहीं कर सकता हूँ,” स्वीकार कर लेते हैं। “अगर मैं आगे क्या कर सकता हूँ?” जब हम स्वीकृति लाते हैं, “जो हुआ वो हो गया, उसके बारे में कोई नियंत्रण नहीं है मेरा,” स्वीकृति जो भाव लाती है, तो फिर जो हम परिवर्तन कर सकते हैं उसमें केंद्र ला सकते हैं।
भक्ति में नियति का स्थान और संघर्ष
वैदिक संस्कृति का भाव यह है कि हमें हमारी आध्यात्मिक प्रगति पे जोर देना है। हमें हमारे भगवान कृष्ण के साथ जो संबंध है, उसको जोड़ने में जोर देना है। और उसके लिए जो भी करना ज़रूरी है, उस पे हमें केंद्रित करना है। और उसके साथ-साथ भौतिक स्तर पे जो हम कर सकते हैं हम करेंगे। पर भौतिक स्तर पे परिवर्तन केवल उस पे ही हम जोर नहीं देते हैं।
ऐसा नहीं है कि हम भक्ति कर रहे हैं तो यह भौतिक स्तर पे परिवर्तन नहीं करना है। कभी-कभी भौतिक स्तर पे परिवर्तन करना ज़रूरी हो सकता है। पर वह हमारा प्रधान लक्ष्य नहीं होता है। प्रधान भाव क्या होता है कि “मैं कैसे भगवान की भक्ति में प्रगति कर सकता हूँ? कैसे मैं भगवान की अधिक सेवा कर सकता हूँ?” और सेवा के भाव से जो अनुकूल है, वह परिवर्तन मैं ज़रूर करूँगा। पर अगर सेवा के लिए अगर कोई प्रतिकूल चीज मुझे सहन भी करनी पड़ेगी, तो मैं सहन कर लूँगा उसको।
प्रभुपाद जी जब भारत में प्रचार कर रहे थे तो बहुत बार उनको बहुत सी समस्याएँ आईं। वे दिल्ली में जब भगवत दर्शन (Back to Godhead) का वितरण कर रहे थे तो एक बार गाय आके उनको टकरा गई। एक बार वे गर्मी के कारण बेहोश हो गए। इतनी मेहनत करने के बाद भी कोई उनको अच्छा प्रतिसाद नहीं मिल रहा था, कोई ज्यादा लोग भक्ति में आ नहीं रहे थे।
तो प्रभुपाद जी ने तभी क्या फैसला किया? “कि भारत में नहीं, मैं अमेरिका में जा के प्रचार करूँगा।” तो यहाँ मतलब क्या, उन्होंने स्वीकार किया? केवल स्वीकृति नहीं की, परिवर्तन किया- “यहाँ पर नहीं हो रहा है, मैं वहाँ पर जाऊँगा।” पर जब एक सेवा में लग गए वो, तो वो सेवा में जो भी समस्या आई, उसको स्वीकार किया। जब अमेरिका में गए, तो अमेरिका में कुछ चीजें आसान नहीं थीं। अकेले थे वो, उनको दिल के दौरे पड़े, उनका जो टाइपराइटर था किसी ने चोरी कर लिया, जहाँ पर रह रहे थे, वो आदमी ने उनको बोला कि तुम सिर्फ कीर्तन कर सकते हो, तुम प्रवचन नहीं दे सकते। तो जो उनका पहला शिष्य बनने वाला था, वही ड्रग्स के नशे में आके पागल होके उन पर आक्रमण करने आ गया।
तो यह सब प्रभुपाद जी ने सहन किया। मतलब हम नियति किसको बोलते हैं? कि जब हम धर्म के मार्ग पे अग्रसर हो रहे हैं, उसमें जो भी हमें समस्याएँ आएँगी, उसको हम नियति के भाव में सहन कर लेते हैं। पर अगर कोई परिस्थिति हमको धर्म के मार्ग में ही जाने से रोक देती है, तो उसको नियति बोलके हम स्वीकार नहीं करते, उसको हमें परिवर्तन करना है। और वो परिवर्तन करना भी वहाँ हमारी सेवा है।
हम शरणागति के दो भाव हमारे शास्त्रों में देखते हैं। द्रौपदी का भाव है, वह अपने हाथ ऊपर कर लेती है जब दुःशासन उसका वस्त्रहरण करता है। “हे कृष्ण, आप ही मुझे बचाओ!” वह शरणागति है। भगवद्गीता के अंत में अर्जुन को भगवान कहते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
“हे अर्जुन, आप मेरी शरण में आ जाओ।” तो अभी भगवान जब कहते हैं अठारहवें अध्याय के छयासठवें (66th) श्लोक में, तो सात श्लोक बाद तिहत्तरवें (73rd) श्लोक में अर्जुन कहते हैं: “हाँ, मैं आपकी शरण में आता हूँ।”
करिष्ये वचनं तव
“मैं जो आप बोलोगे, वही करूँगा।” मतलब “मैं आपकी शरण में आ रहा हूँ।” पर अर्जुन की शरणागति कैसे है? अर्जुन तो अपने हाथ ऊपर नहीं कर लेते हैं। अर्जुन की शरणागति है कि वो अपना धनुष उठा लेते हैं युद्ध करने के लिए!
तो शरणागति का ये भाव हो जाता है कि हम भगवान के लिए युद्ध करेंगे, वो भी शरणागति है। पूरी तरह भगवान पर निर्भर हो जाना, वो भी शरणागति है। तो शरणागत होने की अलग-अलग पद्धतियाँ हैं। दोनों में भाव क्या है? कि हम हमारी चेतना भगवान पे केंद्रित करके, हम भगवान की उपस्थिति महसूस करते हैं।
तो जब कोई कहता है कि भारतीय संस्कृति (येल का प्रोफेसर मुझे बता रहा था कि भारतीय संस्कृति) निराशावादी है, निराशावादी नहीं है! उसमें भाव क्या है? कि भौतिक स्तर पे परिवर्तन करने में ज़्यादा ज़ोर मत लगाओ। और उसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन मत करो। आध्यात्मिक स्तर पे! आध्यात्मिक स्तर पे परिवर्तन करने के लिए बहुत मेहनत भी करनी पड़ी तो लोग करने के लिए तैयार हैं।
जो तथाकथित ग्रंथ जो हैं, जिसको लोग कहते हैं कि निराशावादी हैं, जैसे महाभारत। अगर कोई कहता है महाभारत एक 110,000 (एक लाख दस हजार) श्लोक हैं। इसमें अभी हमको एक श्लोक याद करना मुश्किल जाता है, एक श्लोक लिखना बड़ा, रचना करना बड़ा मुश्किल है। तो अगर किसी ने एक लाख दस हजार श्लोक रचित किए हैं, तो वह व्यक्ति निराशावादी तो नहीं हो सकता है! उसने मेहनत की है। और ये इतनी मेहनत है कि वास्तव में दुनिया के किसी लेखन में इतनी मेहनत नहीं की गई है। जो दूसरे यूरोप में जर्मनिक सागास (Germanic sagas) थे, इलियड और ओडिसी (Iliad and Odyssey) जो वहाँ पर बहुत लंबी कविताएं बताई गई हैं, तो दोनों को साथ मिलाएँगे, उनको आप सात बार मल्टीप्लाई (Multiply) करो, फिर भी वो महाभारत से छोटे पड़ते हैं। इतनी बड़ी कविता लिखी!
जैसे अगर कोई हमको ईमेल भेजता है और एक लंबा ईमेल भेजता है, तो हम पहले तो लगता है कि “इतना लंबा पढ़ेगा कोई नहीं!” पर अगर हम पढ़ते हैं तो बड़ा ध्यान पर, सोच पर लिखा है, कि ये बहुत गंभीर व्यक्ति रहा है। तो आधुनिक मानव ने बड़ा प्रयास किया है कि वह चंद्रमा पर चला जाए, अपने को उठाने के लिए बहुत प्रयास किया है। पर अपनी चेतना को उठाने के लिए प्रयास नहीं किया है।
तो भगवद्गीता हमें अपनी चेतना को कैसे उठाना है, यह सिखा सकती है। तो हम जब भक्ति करते हैं तो हम हमारी चेतना के अनुसार कार्य करते हैं, चेतना के लिए अनुकूल क्या है उसके अनुसार कार्य करते हैं। उसमें अगर हमें परिवर्तन करना पड़ता है, हम परिवर्तन करते हैं। पर हम दोनों में देखते क्या हैं? कि मैं भगवान की शरण में और कैसे बढ़ सकता हूँ? मैं भगवान की सेवा में प्रगति और कैसे कर सकता हूँ? मैं खुद को, मेरे बाजू में जो लोग हैं, उन सबको भगवान के करीब कैसे ले आ सकता हूँ?
तो इसके लिए भक्त बहुत सतर्क होता है। इसके लिए भक्त कभी निराशावादी नहीं होता है। तो जब हम ये भाव समझते हैं कि Destiny is not meant to accept everything that happens, destiny is meant to accept that which is unchangeable. जो भी हुआ उसको स्वीकार करना, ये नियति नहीं है। जो हुआ, जो अनिवार्य है, उसको स्वीकार करना ताकि हम जो परिवर्तित कर सकते हैं उस पे ज़ोर दे सकें- यह हमारे वास्तव में नियति की पहचान, नियति की समझ है।
सहें, बदलें या दूर चले जाएँ (Tolerate, Mitigate, Migrate)
तो अभी एक सम-अप पॉइंट करूँगा। तो हम कैसे कहेंगे कि अभी कौन सी चीजें परिवर्तन कर सकते हैं और कौन सी चीजें परिवर्तन नहीं कर सकते हैं, यह हम कैसे समझते हैं?
तो प्रभुपाद जी कहा करते थे, उपदेशामृत (Upadeshamrita) के परिचय में लिखते हैं कि अगर हम सत्त्वगुण पर आ जाते हैं, तो फिर आगे प्रगति कैसे करनी है, उसका हमें अन्दर से ज्ञान हो जाता है।
मतलब क्या है कि अगर हम भक्ति की साधना अच्छी तरह से करते हैं, शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो हमारी जो बुद्धि है सतर्क हो जाती है।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानम्
सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है। तो वह तीनों पर्याय हैं, वह वैलिड (Valid) हैं। क्या तीनों पर्याय हैं? मैं इंग्लिश में कहता हूँ, इसको क्या है? कि Tolerate, Mitigate, Immigrate/Migrate (टॉलरेट, मिटिगेट, माइग्रेट)।
Tolerate मतलब सहन कर लो, Mitigate मतलब परिवर्तन कर लो (प्रभाव कम कर लो), Migrate मतलब चले जाओ यहाँ से तो।
जैसे कि मैं अभी मेलबर्न (Melbourne) में था। तो मेलबर्न जो ऑस्ट्रेलिया के बहुत सदर्न (Southern), दक्षिण के पार में है। और वहाँ पर ठंडी में ऐसी ठंडी हो जाती है, अगर आप मुँह खोलेंगे, तो बर्फ आता है मुँह के सामने। हमारी भाप बर्फ में बन जाती है। हमारी वायु निकलती है आँखों से, नाकों से, मुँह से बर्फ बन जाता है। आपके सामने बर्फ बनता हुआ दिखता है आपको। हमेशा नहीं, पर कभी-कभी।
तो अभी ऐसी ठंडी है, वह अगर बहुत ज्यादा है, जो भारत से कोई जाए, उसको जमता ही नहीं है, तो फिर क्या करेंगे? तीन पर्याय हैं। एक है कि अगर मैंने नौकरी है, कपड़े नहीं पहने हैं, तो दाँत-दाँत उसको सहन कर लो। अभी वो तो सहन कर रहा है, तो नामुमकिन है, ऐसी ठंडी पर कैसे कोई रह सकता है।
Mitigate मतलब क्या करते हैं वहाँ पे? हर कार में हीटिंग (Heating/Conditioning) होता है, अलग-अलग प्रकार के स्वेटर होते हैं। जो कोई स्वेटर होता है, वो ऐसे मटेरियल का बनाया होता है कि बिलकुल कुछ टेम्परेचर इंसुलेशन (Temperature insulation) होता है पूरा, बहुत मोटे स्वेटर होते हैं। तो आप ऐसा कुछ करो जिससे कि मिटिगेट करें। परिस्थिति है पर उसका प्रभाव आप पे नहीं हो रहा है।
एक है कि वो सहन कर लो आप, दूसरा है कि उसको परिवर्तित दिखा सकें पर उसका हम पे प्रभाव कम करते हैं।
पर तीसरा है, वो नहीं जमता है, फिर भी… जब पांडवों को भीम को जहर देने का प्रयास किया कौरवों ने, तो तब भी जब उनको वारणावत (Varnavata) में जलाने का प्रयास किया, तो युधिष्ठिर ने कहा कि “ये घर की बात है, दुनिया के सामने में मत बताओ, कुछ करो मत, सहन कर लो इसको।”
पर जब द्रौपदी का अनादर हुआ, दुःशासन उतना ही उद्दंड था। जब कृष्ण को उन्होंने गिरफ्तार करने का प्रयास किया, तब उन्होंने फैसला किया कि “इसके अत्याचार की अभी सीमा पार हो गई है।” तो उसका प्रतिकार किया उन्होंने, युद्ध किया।
पर बाद में जब भगवान कृष्ण ये जगत छोड़ के चले गए, तो फिर पांडवों ने कहा कि “हम भी अभी राज्य छोड़ देंगे।” तो सबसे पहले उन्होंने टॉलरेट (Tolerate) किया, सहन किया। दूसरे बाद में युद्ध करके उन्होंने मिटिगेट (Mitigate) किया। और अंत में वो माइग्रेट (Migrate) कर गए, छोड़ दिया।
तो ये तीनों जो पर्याय हैं, हम कर सकते हैं अलग-अलग परिस्थितियों में।
हम प्रभुपाद जी के जीवन में भी देख सकते हैं। पहले जब उनको, जब दिल्ली की सड़कों पर जब उनको किसी गाय ने गिरा दिया, तो भी प्रभुपाद जी उठे और अपना भगवत दर्शन चलाते रहे, वो सहन किया वो। पर जब जुहू में जब अभी उनको ज़मीन मिली थी, तो तभी वो उनसे कोई छीनने का प्रयास किया।
अभी मैं जब अमेरिका गया था, गिरिराज महाराज से मिला था। तो गिरिराज महाराज को प्रभुपाद जी ने एक आदेश दिया था कि “वो जो जुहू का जो स्ट्रगल (Struggle) था, उसके बारे में एक ग्रंथ लिखो आप।” तभी महाराज वो एक पूरा कर रहे हैं ग्रंथ। महाराज बता रहे थे वो बहुत ड्रामैटिक (Dramatic) है वो पूरा। तो फिर महाराज बता रहे थे कि शायद वो एक हिस्ट्री के रूप में लिखेंगे और उसका वृत्तांत एक नॉवेल (Novel) के रूप में लिखेंगे, थोड़ा ड्रामाटाइज़ (Dramatize) करके।
तो फिर प्रभुपाद जी ने क्या किया? तो भी युद्ध किया प्रभुपाद जी ने। प्रभुपाद जी बोले कि, “I will never let this rascal steal away Krishna’s property.” प्रभुपाद जी ने स्वीकार नहीं किया नियति से जो हो रहा है वो। प्रभुपाद जी ने क्या किया? वो प्रतिकार किया।
भगवान अर्जुन से कहते हैं, युद्ध करो। पर वो कहते हैं: निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव किसी के प्रति वैर का भाव मत रखो।
प्रभुपाद जी, वो मिस्टर एन (Mr. N) से उन्होंने बड़ा युद्ध किया। पर वो मिस्टर एन का बाद में हार्ट अटैक आ गया, जो उसके लिए क्षति हो गई। तो मिस्टर एन उसके लिए प्रभुपाद जी युद्ध करने लगे थे, पर बाद में उनको समझ गया कि ये कुछ होने वाला नहीं है। तो वो प्रभुपाद जी से मिलने आ गए। प्रभुपाद जी को उन्होंने प्रणाम किया। प्रभुपाद जी फिर उनको बोले, “तुम मेरे बेटे जैसे हो।” तो प्रभुपाद जी ने कोई खुन्नस नहीं रखी।
युद्ध करना था तो युद्ध कर लिया। पर युद्ध हम भगवान के लिए कर रहे हैं, हम किसी के खिलाफ नहीं कर रहे हैं। “मुझे भगवान की सेवा करनी है, अगर वो व्यक्ति उसमें विघ्न बन रहा है, तो मैं उसके खिलाफ युद्ध करूँगा। पर मुझे उससे कुछ घृणा नहीं है, उससे कुछ नफरत नहीं है। वो किसी भावना के कारण भगवान की सेवा कर रहा है… मतलब कि व्यक्ति आ रहा है तो इसलिए मुझे प्रतिकार करना पड़ रहा है, पर मैं आपके लिए नहीं, पर्सनल हूँ।” तो हमें नकारात्मक भाव से प्रतिकार भी नहीं करना।
और जब हम चले जाते हैं, इमिग्रेट (Migrate) कर लेते हैं, उसमें भी क्या है? Walking away मतलब हम कोई परिस्थिति में हैं, यहाँ से निकल जाते हैं, क्यों? ऐसे नहीं कि I have more important things to do in my life (मेरे जीवन में और भी महत्वपूर्ण काम हैं)। “मुझे यह झगड़ा, यह जो समस्या इतनी जटिल बन गई है, मुझे अपनी जिंदगी इसको सुलझाने में नहीं गँवानी है, मुझे और महत्वपूर्ण चीजें करनी हैं।”
तो मेरा केंद्र क्या है? और जो मुझे महत्वपूर्ण चीजें करनी हैं, उसमें है। पर जब हम किसी परिस्थिति से भाग जाते हैं, मतलब क्या है? कि हमारा मन अभी तो उसमें “अरे यह इतना खराब है, यह इतना बुरा है, मैं इसका सहन नहीं कर सकता हूँ, इसलिए मैं भाग जाता हूँ यहाँ से।” तो फिर क्या है?
हमें अगर भगवान पे केंद्र रखते हैं और भगवान की सेवा मैं कैसे कर सकता हूँ, इस भाव से कार्य करते हैं, तो फिर कौन सा पर्याय चुनना है? कौन से दुख को सहन करना है? कौन से दुख का प्रतिकार करना है? तो वहाँ हमें:
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते
भगवान हमें बुद्धि देंगे। और इस तरह से हर परिस्थिति से, भले ही वो परिस्थिति का परिवर्तन सकारात्मक रूप से हो न हो, उस परिस्थिति के द्वारा हमारी चेतना का सकारात्मक परिवर्तन हो जाएगा और हम भगवान के और करीब जाते हैं।
तो हमने सारांश में चर्चा की, किस तरह से जब हम नियति को बोलते हैं, भागवत कथा में नियति के रूप में जो भी दुख है, स्वीकार कर लेता है, उसका मतलब क्या है। तो देखा कि कैसे प्रभु श्री रामचंद्र ने दशरथ महाराज का वनवास का आदेश था, उसको स्वीकार किया नियति के रूप में। पर सीता का अपहरण उसको स्वीकार नहीं किया। क्योंकि वैदिक संस्कृति जो है वो नियति केंद्रित नहीं है, वो धर्म केंद्रित है, कर्तव्य केंद्रित है।
तो अभी हमारा परम कर्तव्य है कि हमें भगवान से संबंध जोड़ना है, भगवान की सेवा करनी है। तो प्रभु श्री रामचंद्र के लिए अपना कर्तव्य था अपने पिता का आदेश पालन करना, उनका कर्तव्य था कि अपनी पत्नी का संरक्षण करना। दो अलग-अलग प्रकार के कार्य किए, पर भाव एक ही था, कर्तव्यनिष्ठा की।
तो जो पाश्चात्य संस्कृति है, उसका जोर यह है कि “हमें परिवर्तन करना है, परिवर्तन करना है, परिवर्तन करना है।” जो भारतीय संस्कृति है, उसका भाव है कि “स्वीकार करो भौतिक स्तर पे, ताकि आध्यात्मिक स्तर पे परिवर्तन कर सकें।” जोर इस स्तर पे है।
पाश्चात्य संस्कृति कर्मेंद्रिय प्रधान है, कर्मेंद्रियों से परिवर्तन करो। भारतीय संस्कृति जो है वो ज्ञानेंद्रिय प्रधान है। ज्ञानेंद्रियों से समझो क्या हो रहा है, और फिर उसके अनुसार सबसे उचित कार्य क्या है वो करने का प्रयास करो।
तो जब हम बहुत कर्मेंद्रिय प्रधान हो जाते हैं, यह भावना से कार्य करते हैं कि “मैं सब कुछ परिवर्तित कर सकता हूँ,” तो जब परिवर्तन नहीं कर पाते हैं हम, तो तभी हमारा मन पागल हो जाता है। जितनी मन की भावना है कि “मैं नियंत्रक हूँ,” तो जब नियंत्रण नहीं कर पाता हूँ, तो मन पागल हो जाता है।
तो यही एक प्रधान कारण है कि पाश्चात्य संस्कृति में, कि लोगों को मानसिक समस्या इतनी है क्योंकि उनकी स्वीकार करने की शक्ति बहुत कम है। कुछ गलत हो जाता है, कुछ बुरा हो जाता है, तो डिप्रेशन (Depression) पर चले जाते हैं, वायलेंस (Violence) पर चले जाते हैं, हिंसा पर चले जाते हैं, बड़े हताश हो जाते हैं।
तो जब इतनी हमारी स्वीकृति करने की शक्ति बढ़ जाएगी, उतना हम जो महत्वपूर्ण चीजें हैं उस पे जोर दे पाएँगे। सहनशीलता मतलब सब कुछ जो हो रहा है उसको स्वीकार करना, ऐसा नहीं है। सहनशीलता मतलब समझना कि कौन सी चीजें कम महत्वपूर्ण हैं, उनको ठीक स्वीकार कर लें ताकि जो महत्वपूर्ण चीजें हैं, उसमें हम परिवर्तन कर सकें।
हम लोकल में हमको कोई बाजू में ढकेल रहा है तो बाजू हो जाओ और हम अपने गंतव्य पर चले जाएँ। पर लोकल से कोई बाहर ढकेल रहा है तो फिर हमें प्रतिकार करना पड़ेगा। तो यह छोटी चीजें कौन सी हैं, बड़ी चीजें कौन सी हैं, यह बुद्धिमत्ता से अगर हम समझेंगे, उसके लिए हमें चाहिए हमारा बड़ा उद्देश्य क्या है। उस उद्देश्य की दृष्टि से हम देख सकते हैं कि यह छोटी चीजें हैं, यह बड़ी चीजें हैं।
दुनिया का, जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है हमें भगवान से संबंध जोड़ना है। और भगवान की सेवा करने के लिए हम कभी सहन कर सकते हैं, कभी प्रतिकार कर सकते हैं। अगर हम भक्ति साधना से सत्त्वगुण में आते हैं, भगवान से प्रार्थना करते हैं, तो हमें दोनों- सत्त्वगुण के द्वारा और भगवान की कृपा के द्वारा बुद्धि मिलती है। और बुद्धि के द्वारा हम समझ सकते हैं कौन सी चीज कितनी महत्वपूर्ण है, और क्या चीज को स्वीकार करना है, क्या चीज को परिवर्तन करना है।
और हम अगर नकारात्मक भाव से सहन करते हैं तो उससे खुन्नस आ जाती है, फिर वो स्फोट जाता है। नकारात्मक भाव से हम परिवर्तन करते हैं तो उससे फिर नफरत बढ़ जाती है और फिर उससे भी समस्या और बढ़ जाती है। नकारात्मक भाव से हम दूर चले जाते हैं तो हम भाग जाते हैं वहाँ से, पर हममें विक्टिम मेंटालिटी (Victim mentality) आ जाती है, “अरे दुनिया इतनी बुरी है, सब मेरे साथ ऐसा ही करते हैं।”
पर हम सकारात्मक भाव से, सेवा भाव से कर सकते हैं, तो हम भले ही सहन करें, प्रतिकार करें या दूर चले जाएँ, हम तीनों के द्वारा भगवान के करीब जाएँगे। बाहरी रूप से परिवर्तन हो न हो, आंतरिक रूप से हमारी चेतना का परिवर्तन होके हम भगवान के पास जा सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद। किसी के कोई सवाल या टिप्पणी है?
Q&A: क्षत्रिय धर्म और सहनशीलता
प्रश्नकर्ता/श्रोता: (कुछ टिप्पणी करते हैं) वक्ता: हाँ, माता जी, आप स्पीक कर सकते हैं, मैं एक क्लियर करता हूँ। हरे कृष्णा।
प्रश्नकर्ता/श्रोता: (प्रश्न पूछते हैं कि क्षत्रिय धर्म और सहनशीलता में संतुलन कैसे करें)
वक्ता: हाँ, पहले कर्तव्य के लिए… अगले श्लोक में, वो जब क्षत्रिय गुण बता रहे हैं, क्षत्रिय गुण तभी बताते हैं: तेजः क्षमा… युद्धे चाप्यपलायनम् कि युद्ध जब आता है, तो वो उससे दूर नहीं भागते हैं। जो ब्राह्मण होते हैं, समस्या आ गई, माफ़ करते हैं, चलो आगे जाते हैं। पर क्षत्रिय युद्ध करते हैं।
भागवतम में, जब ध्रुव महाराज का अपमान होता है, वहाँ पे एक श्लोक आता है, नारद मुनि कहते हैं: अहो क्षत्रियतेजसः, मानभंगममृष्यतः देखो क्षत्रियों की महिमा, कि वे अपमान को सहन नहीं कर सकते। तो अभी हमको बताया है, ‘अमानीना मानदेन’, सब सहन कर लो। पर यहाँ पर बता रहे हैं, क्षत्रियों की महिमा है, कि वे अपमान को सहन नहीं कर सकते।
पर अपमान को सहन नहीं करना यह ठीक है। पर अगर अपमान होता है, तो प्रतिक्रिया क्या होती है? ऐसा नहीं कि वे अधर्म में चले जाते हैं। वे धर्म के द्वारा अपमान का सामना करते हैं। इसमें क्या है कि ऐसा नहीं है कि वे धर्म के द्वारा अपमान का सामना करते हैं… क्योंकि वे धर्म के द्वारा अपमान का सामना करते हैं, क्या सही है और क्या गलत है, यह ऐसी फिक्स केटेगरी (Category) नहीं है।
इस चीज़ में जो भी है, जो सहन करता है वो महान है, जो प्रतिकार करता है वो अच्छा नहीं है, ऐसा नहीं है। यह कॉन्टेक्चुअल (Contextual) है, परिस्थिति के अनुसार है। कभी-कभी ये सही हो सकता है, कभी-कभी वो सही हो सकता है। तो हमें देखना है कि मेरी भक्ति की प्रगति के लिए क्या महत्वपूर्ण है।
और उसके अनुसार हमें… क्या भक्ति की प्रगति मतलब ऐसा नहीं है कि हमारा भक्ति करने के लिए हमारा शरीर और मन भी हमें अच्छी परिस्थिति में रखना ज़रूरी है। अगर किसी भक्त के बर्ताव से हमारे मन को बहुत परेशानी हो रही है, तो फिर उस भक्त के साथ सेवा करना हम नहीं सहन कर सकते हैं। अगर किसी जगह में उसका वातावरण ऐसा बहुत ही गर्मी है, बहुत ही ठंडी है, कि हमें वहाँ पर जप में मलिन लगता है, तो शायद हमें कहीं और जाना पड़ेगा जहाँ पर हम जप कर सकते हैं।
तो मतलब भक्ति के अनुसार, हमारे शरीर और मन को कैसे हम भक्ति में लगा सकते हैं, हम फ्लोट (Float) इस नेचर से करते हैं। क्योंकि हम स्वभाव के लिए कार्य कर लेते हैं और स्वभाव के खिलाफ चले जाते हैं। हम हमारे स्वभाव के साथ भगवान के लिए कार्य करते हैं।
(यहाँ ऑडियो में थोड़ी अस्पष्टता थी)
उसके व्यक्ति को बोलूँगा तो क्या होगा, वो प्रतिकार करेगा और बढ़ जाएगा। पर कोई और भक्त है, कोई और मित्र है, मैं उससे बात करता हूँ और फिर वो समझते हैं मुझे और वो समझाते हैं मुझे। तो इस तरह से हम अपनी भावनाओं को प्रोसेस कर सकते हैं। कभी-कभी हम जर्नल (Journal) में लिख सकते हैं, खुद की भावनाओं को लिख दें, और फिर उसके बारे में उसको वेंट (Vent) कर देते हैं एक बार।
और फिर उसके बारे में उसको देखते हैं, “ठीक है, यह ऐसे हुआ है।” मैं कई बार लोगों से ईमेल में बातचीत करता हूँ, तो कई बार गुस्सा आ गया तो मैं गुस्से में ईमेल लिख देता हूँ। पर मैंने एक पॉलिसी (Policy) बनाई है कि कितना भी गुस्सा आया हो, ईमेल लिख दूँगा, पर मैं 24 घंटों के लिए वो ईमेल भेजूँगा नहीं।
तो फिर उसके बाद में क्या होता है, 24 घंटों के बाद कई बार वही व्यक्ति बोलता है “अरे, I am sorry मैंने यह कर दिया, या यह ऐसे हुआ है, वो ऐसे हुआ है, वो ऐसे हुआ है।” मैं देखता हूँ 24 घंटों के बाद कि इतनी बड़ी बात नहीं है, क्यों मैं इसको कर रहा हूँ? तो कई बार क्या होता है कि अगर हम खुद को यस (Yes) बोलते हैं, नो (No) बोलते हैं, दोनों में समस्या आती है। तो क्या करते हैं कि पॉज़ (Pause)। यस भी नहीं, नो भी नहीं। पॉज़! यस बोलेंगे तो परेशानी हो जाएगी, नो बोलेंगे तो परेशानी हो जाएगी। पॉज़ बोलेंगे, ठीक है।
तो हमें एकनॉलेज (Acknowledge) करना होगा। मैं स्वीकार करता हूँ, मुझे गुस्सा आ गया है, मुझे दुख हो रहा है, पर मैं उससे कार्य नहीं करूँगा।
भौतिक और आध्यात्मिक समाधान
प्रश्न/टिप्पणी: तो अगर हमारे जीवन में जो भी होता है, अगर हम उसमें भगवान पर निर्भर होते हैं कि भगवान की इच्छा होती है, तो कोई बीमार व्यक्ति ठीक हो जाएगा, तो ऐसा अगर बोलते हैं तो लोग कहते हैं कि हम नकारात्मक हैं।
वक्ता: तो नकारात्मक और सकारात्मक भाव क्या हैं वास्तव में? तो इसमें दो अलग-अलग चीजें हैं। भगवान से हमारा संबंध है, उसमें निर्भरता है, उसमें क्रियाशीलता है, दोनों हैं। और दुनिया में जो हो रहा है उसके प्रति हमारा भाव है। तो कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो भी हुआ, हर समस्या का हल ढूँढ के निकालते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं हर हल में समस्या ढूँढते हैं!
हमें जीवन जीना है और जीवन जीने के लिए हमें कोई न कोई मार्ग चाहिए, हमें आगे बढ़ना है। तो अगर कोई समस्या का हल बताता है, और हम बोलते हैं कि “ये सही नहीं है, ये सही नहीं है”, तो लोगों को लगेगा कि नकारात्मक हैं।
तो एक है कि हम भौतिक स्तर पे कार्य करते हैं, एक है आध्यात्मिक स्तर पे कार्य करते हैं। अभी ये दोनों ऐसे नहीं हैं कि ये कम्पेटिटिव (Competitive) हैं, दोनों साथ में आ सकते हैं। अभी अर्जुन ने भगवद्गीता का ज्ञान सुनने के बाद कुरुक्षेत्र युद्ध किया और कुरुक्षेत्र युद्ध जीता उन्होंने। तो कुरुक्षेत्र युद्ध कैसे जीता उन्होंने? क्या उन्होंने भगवद्गीता के ज्ञान से युद्ध जीता या जीवन भर द्रोणाचार्य से जो धनुर्विद्या का ज्ञान लिया था, उसके सामर्थ्य से उन्होंने जीता?
दोनों के द्वारा! ऐसा नहीं है कि अर्जुन को भगवद्गीता के ज्ञान के द्वारा ही धनुर्विद्या का ज्ञान भी मिल गया। नहीं, भगवद्गीता के ज्ञान के द्वारा उनको जो धनुर्विद्या का ज्ञान था कैसे इस्तेमाल करना है, उसका एक दिशा मिल गया। भौतिक और आध्यात्मिक जो है, विवाद नहीं है, दोनों साथ में चलते हैं।
तो अगर हम कहते हैं कि हर चीज़ का केवल आध्यात्मिक ही हल है और भौतिक चीज़ पर कुछ कार्य करते नहीं हैं, तो यह हमारा सिद्धांत नहीं है। हमारे शास्त्रों में क्या है, कोई बीमार है व्यक्ति तो आयुर्वेद है उसके लिए।
आयुर्वेद ये भौतिक बीमारी के लिए भौतिक दवाई है। उसमें भगवान पर श्रद्धा है एक भाग, पर भौतिक बीमारी के लिए भौतिक दवाई है। तो अगर हम ऐसे कर लेते हैं कि भौतिक चीज़ पर कुछ कार्य करते ही नहीं हैं, और सिर्फ हर चीज़ को बोलते हैं कि “आध्यात्मिक ही हम करेंगे।” और हमारा भाव हो सकता है कि “मैं आध्यात्मिक स्तर पे कार्य करूँगा, पर कोई भौतिक स्तर पे कार्य कर सकता है,” तो फिर वो स्वीकार्य है।
पर अगर हम हर भौतिक स्तर पे कार्य जो है, उसको ‘ना, ना, ना’ बोल देंगे, “यह मत करो, वह मत करो, यह गलत है, वह गलत है,” तो लोगों को लगता है कि नकारात्मक हैं। पर हम देखते हैं कि मैं अस्पताल में गया था, तो उसमें वहाँ पे लिखा था: “हम दवाई देते हैं पर भगवान वास्तव में ठीक करते हैं।” क्योंकि कई बार दवाई देते हैं पर व्यक्ति ठीक नहीं होता है।
तो इसलिए हम देखते हैं कि भौतिक और आध्यात्मिक कॉम्प्लिमेंट्री (Complementary) हैं। तो कुछ लोगों, खास करके जो भक्त नहीं हैं, उनका भाव हमेशा होता है कि भौतिक स्तर पे ही उन्हें कार्य करना है- “यह समस्या है, यह हल करो, यह हल करो, यह हल करो।” और जब भक्त बन जाते हैं, तो हम आध्यात्मिक स्तर पे कार्य ज्यादा करते हैं।
तो कुछ लोग हमें कहते हैं कि “आप नकारात्मक हैं”, तो हम देख सकते हैं क्या हम भौतिक स्तर पे जो समस्या का हल कर रहे हैं, उसकी बहुत ज्यादा हम निंदा कर रहे हैं? अगर हम नहीं कर रहे हैं, तो जो भौतिक स्तर पे समस्या का हल कर रहे हैं, उसको हम प्रोत्साहन कर सकते हैं, उसमें कुछ मार्गदर्शन दे सकते हैं, उनका भी उत्साह बढ़ा सकते हैं। पर यह कहते हैं कि “तुम वो करो, मैं आपके लिए प्रार्थना कर रहा हूँ”, तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रार्थना करो, तुम्हें कुछ करना ही नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि तुम सब करो, आध्यात्मिक कुछ करना ही नहीं है।
तो आध्यात्मिक और भौतिक, हम दोनों साथ में रखते हैं। तो फिर हम अगर केवल भौतिक स्तर पे ही सकारात्मक रहते हैं और भौतिक स्तर पे ठीक नहीं हुआ, तो क्या वो सकारात्मक हुआ? हताश हो जाएगा व्यक्ति! पर अगर हम भौतिक और आध्यात्मिक दोनों कर रहे हैं, तो फिर ठीक है, भौतिक स्तर पे नहीं हुआ, पर आध्यात्मिक स्तर पे मैंने प्रार्थना की, वो व्यक्ति को आध्यात्मिक स्तर पे तो फायदा जरूर हुआ है।
तो इसलिए आध्यात्मिक स्तर पे जो है, वह हमें जरूर कार्यशील रहना चाहिए। पर ऐसा नहीं है कि आध्यात्मिक स्तर पे कार्यशील रहने के लिए, भौतिक स्तर पे नहीं रहना चाहिए। भौतिक स्तर पे भी हम कार्य करते हैं, पर वो भी हम देखते हैं कि वह भगवान की सेवा के अनुसार ही है। मतलब भगवान की इच्छा के अनुसार ही वह भौतिक स्तर पे भी कार्य का फल होगा।
बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह कि पिता जो है, बालक का संरक्षण तभी कर सकते हैं जब भगवान की अनुमति होती है, भगवान की इच्छा होती है। तो इसलिए हमें नकारात्मक नहीं होना है, हमें आध्यात्मिक और भौतिक दोनों स्तर पे कार्य करके पूर्णतया सकारात्मक होना है।
हाँ, यह ठीक है, कुछ लोग कहते हैं, लुई हे (Louise Hay) जो हैं, वो एफर्मेशन्स (Affirmations) पे बहुत जोर देती हैं, कहते हैं कि आप सकारात्मक विचार करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा। तो ठीक है, सकारात्मक विचार करना अच्छा है, पर सकारात्मक विचार करने से क्या हो गया है? जो मन की समस्या लोगों को है आजकल, तो क्या करते हैं, लोग सोचते हैं मन ही पूरी समस्या है और मन के अलावा कुछ समस्या है ही नहीं, ये एक लोगों की धारणा आ गई है। “अगर आप मन ठीक कर दो, आपकी दुनिया में कोई भी समस्या नहीं होगी”, पर ऐसा नहीं है!
मैं, अगर मेरा मन कितना भी सकारात्मक कर लूँ, मैं बूढ़ा नहीं होने वाला, मैं बीमार नहीं होने वाला, मेरी मृत्यु नहीं होने वाली है? यमराज आ गए, तुम्हारी मृत्यु हो गई! तो सकारात्मक विचारधारा के लिए जरूर भावना है और योगदान है, पर यह नहीं है कि यह ओमनीपोटेंट (Omnipotent) है।
कैसे है कि कुछ आधुनिक विचारधारा है, उसमें भगवान की जगह दो चीज़ों ने ले ली है। एक है पहले विज्ञान ने, कि विज्ञान से लोग कहते हैं कि हम जो भी चीज़ है परिवर्तन कर सकते हैं। पर दूसरा भाव है कि मन ने परिवर्तन कर लिया है, मन ने भगवान की जगह ले ली है। आप मन सकारात्मक कर लो, कोई भी समस्या का हल कर लोगे।
ऐसा नहीं है। अभी लुई हे की किताब मैंने भी पढ़ी है, बहुत अच्छी किताब है। पर उसमें क्या है, कि जो बीमारियां जो हैं, व्यक्ति की नकारात्मक भावना से बीमारियां और बढ़ जाती हैं। पर लुई भी स्पष्ट रूप से लिखती हैं कि ऐसा नहीं है कि जो कोई बीमारियां हैं, तो सिर्फ दिमाग के विचारों से ठीक हो जाती हैं, दवाई लेनी चाहिए। There is need for medicine, but there should not be over dependence of medicine. क्या है, कि हर चीज का हम दवाई से ठीक नहीं कर सकते हैं।
मन को भी सकारात्मक बनाना जरूर है, हमको मन की शक्ति को पहचानना है, पर हमें मन को भगवान नहीं बनाना है। जो कहते हैं कि मन के विचारों से सारी समस्या का हल हो जाएगा, वो क्या कर रहे हैं, मन को भगवान बना रहे हैं और वो सत्य नहीं है।
अगर हमें फैसला करना है, कब परिवर्तन करना है, कब स्वीकार करना है, और अगर मैं अभी सत्त्वगुण में नहीं हूँ, तो मैं परिवर्तन करता हूँ, परिवर्तन करता हूँ। ये ऐसा है, ये ऐसा है, ये ऐसा है। और कुछ हमारे विचारों को लिख सकते हैं। और हम सत्त्वगुण में नहीं हैं, इसलिए हमारे मार्गदर्शक भी होते हैं, काउंसलर (Counselor) होते हैं, हमारे गुरुवर होते हैं, उनसे भी हम बात कर सकते हैं।
पर वास्तव में, उनसे भी बात करने के लिए, अगर हमने खुद का होमवर्क अच्छे से कर लिया है, खुद के विचारों को अच्छे से समझा है, तो फिर हम उनको हमारे विचार समझा सकते हैं, बता सकते हैं। फिर वो हमको अच्छे से समझकर फिर वो वर्णन कर सकते हैं।
तो इसलिए ऐसा नहीं कि हम “अच्छा, ये काम हो गया, ये काम करना, ये काम करना, ये काम करना।” तो अगर एक बड़ा जिंदगी का डिसीजन (Decision), वो हम टू-डू (To-do) आइटम में डाल देते हैं, कि आज दस आइटम करना है, तो ग्यारहवां आइटम वो कर दें, वैसे नहीं होता है।
अगर एक बड़ा जिंदगी का डिसीजन करना है, तो उसके लिए क्वालिटी समय (Quality time) निकालना पड़ता है। और ऐसा क्वालिटी समय निकालना, जब हम रिलेटिवली (Relatively) शांत रहते हैं। हम भी देख सकते हैं कि अलग-अलग हमारे जीवन के, हमारे दिन में, अलग-अलग समय में शायद सुबह के समय में सत्त्वगुण में हो सकते हैं। या कुछ हमने भगवान से प्रार्थना की है, शास्त्रों का अध्ययन किया है, तो मन थोड़ा शांत रहता है, तो तभी हम शांति से विचार करते हैं।
तो हमारा खुद का, जब हम सत्त्वगुण में होते हैं, तभी विचार करना, और कोई हमारे मार्गदर्शक हैं जो भी सत्त्वगुण में हैं, तो दोनों के आदान-प्रदान से हम समझ सकते हैं कि मेरे लिए अभी उचित कार्य क्या है।
तो इसलिए हम हमेशा सत्त्वगुण में नहीं हैं, पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम जब सत्त्वगुण में हैं, तब हमें महत्वपूर्ण फैसले हमारी जीवन में नहीं करने हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद!