Is what we are going to get in life determined at birth – Hindi?
Answer Podcast
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Lecture Summary
- भाग्य और हमारी प्रतिक्रिया (Destiny vs. Free Will): हमारे जीवन की मुख्य घटनाएँ और परिस्थितियाँ (भाग्य) पूर्व निर्धारित हो सकती हैं, लेकिन उन परिस्थितियों में हम क्या प्रतिक्रिया देते हैं, यह पूरी तरह हमारे हाथ में है। उदाहरण के लिए— बारिश का आना भाग्य है, लेकिन भीगने से बचने के लिए छाता लेना हमारा कर्म है।
- कर्म का महत्व: महाभारत में विदुर जी के अनुसार, भाग्य हमारे कर्मों का परिणाम तय करता है, हमारे कर्मों को नहीं। किसी भी फल की प्राप्ति के लिए तीन चीज़ें आवश्यक हैं— कर्म, दैव (भाग्य) और काल (समय)। परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मनुष्य को अपना कर्तव्य (कर्म) कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- प्रारब्ध और शरीर रुपी यंत्र: हमें जन्म, परिवार, रंग-रूप और शारीरिक क्षमता हमारे पूर्व कर्मों (प्रारब्ध) के अनुसार मिलते हैं। यह एक साधन (जैसे बाइक या BMW गाड़ी) की तरह है। हम जन्म से मिली इन चीज़ों को बदल नहीं सकते, लेकिन इस जीवन रुपी गाड़ी को कैसे चलाना है, यह पूरी तरह हम पर निर्भर है।
- भक्ति और आध्यात्मिक प्रगति: भक्ति किसी भी बाहरी परिस्थिति या केवल सात्विक नियमों की मोहताज नहीं है। यदि कोई व्यक्ति बुरी आदतों (जैसे शराब) में भी फँसा है, लेकिन वह उस आकर्षण के मूल कारण के रूप में भगवान का स्मरण करता है (जैसे पानी का स्वाद भगवान हैं), तो वह भी आध्यात्मिक प्रगति कर सकता है।
Full Transcription
भाग्य और हमारी प्रतिक्रिया
तो क्या ये सत्य है कि हमारे जो भाग्य में लिखा है, जन्म से लिखा है और सुख ज़्यादा हमें कभी नहीं मिल सकता है, और भाग्य के अनुसार सब कुछ फैसला हो जाता है? हमारे जीवन में जो प्रधान घटनाएँ घटने वाली हैं, वह एक तरह से फिक्स (fix) होती हैं, पर उसकी हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी, यह फिक्स नहीं है।
जैसे हम कई बार वेदर फोरकास्ट (weather forecast) सुनते हैं, आज बारिश आने वाली है, तो ठीक है, बारिश आएगी आज। पर बारिश आने के बाद मेरी प्रतिक्रिया क्या होने वाली है, वह मुझ पर निर्भर है। अगर मैं वहाँ पर बारिश में भीगूँगा, तो मुझे सर्दी हो जाएगी। अगर मैं रेनकोट लेके जाऊँगा, छाता लेके जाऊँगा, तो मैं इतना भीगूँगा नहीं। मैं बाहर नहीं जाऊँगा, तो भीगूँगा नहीं।
तो क्या है, हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार, हमारी नियति, हमारी डेस्टिनी (destiny), दैव जो है, वो निर्धारित है। पर वो दैव क्या फैसला करता है? कि जैसे, हमारे जीवन में क्या प्रधान घटनाएँ घटने वाली हैं, पर उन घटनाओं में, हमारी क्या प्रतिक्रिया होने वाली है, वह हम पर निर्भर है।
अगर मान लीजिए, मेरे पूर्व कर्मों से, मैं एक तूफ़ान में फँसने वाला हूँ। मैं गाड़ी ड्राइव कर रहा हूँ, और एक तूफ़ान में फँसने वाला हूँ, तो यह मेरा कर्म है। उदाहरण दे रहा हूँ मैं इसके लिए। पर अभी उस समय मैं क्या करूँगा? अगर उस तूफ़ान में फँसने के पहले मैंने कोई शराब पी ली, तो वो तूफ़ान में फँस जाऊँगा, तो एक बड़ा एक्सीडेंट हो जाएगा, मृत्यु भी हो सकती है। अगर मैं पहले से चौकन्ना था, और अभी तूफ़ान आ गया है, मैं जानता हूँ तूफ़ान आ गया है, तो फिर मैं बड़ा चौकन्ना था, बड़ी सावधानी से चलाता हूँ गाड़ी, तो कुछ ज़्यादा हादसा नहीं होगा।
तो उसी तरह से हमारे जीवन में जो परिस्थितियां आने वाली हैं, उसमें भी सब परिस्थितियां नहीं, प्रधान घटनाएँ जो हैं, पूर्व भाग्य से हमें प्राप्त होती हैं। पर हमारी प्रतिक्रियाओं का कभी फैसला नहीं होता है, वो हम खुद चुनते हैं।
महाभारत का उदाहरण: दैव और कर्म
महाभारत में बताया गया है, कि जब विदुर, धृतराष्ट्र को बता रहे थे, कि आप दुर्योधन को इन पांडवों को उकसाने के मार्ग से रोको। वो पांडवों को अगर ऐसे उकसाएगा, तो तुम्हारे वंश का पूरा नाश हो जाएगा, दुर्योधन की मृत्यु हो जाएगी, सारे वंश का नाश हो जाएगा। और तभी दुर्योधन… धृतराष्ट्र कहता है, कि अगर ये दैव ने फैसला कर लिया है, कि हमारे वंश का नाश होने वाला है, तो मैं तो छोटा सा इंसान हूँ, मैं क्या कर सकता हूँ?
तो फिर तभी विदुर जी जवाब देते हैं, “Destiny determines the consequences of our actions, not our actions themselves.” (विदुर जी जवाब देते हैं, “Destiny determines the consequences of our actions, not our actions themselves.”)
मतलब क्या? कि अगर विद्यार्थी है, विद्यार्थी अगर परीक्षा के पहले पढ़ाई नहीं करता है, और बोलता है पढ़ाई क्यों नहीं करता है, कि दैव में लिखा नहीं है। नहीं! पढ़ाई नहीं कर रहे हैं, तो ये दैव नहीं है, ये गैर-जिम्मेदारी है। दैव निर्धारित नहीं करता है, वह हम हमारी स्वेच्छा से निर्धारित करते हैं।
कर्म, दैव और काल (किसान का उदाहरण)
इसका कोई किसान का उदाहरण देते हैं हम। तो जब खेती करता है कोई, तो उसमें खेती करते समय, जो बीज डालना और ज़मीन को सींचना जो है, वह कर्म है व्यक्ति का। फिर बारिश आना सही मात्रा में, सही समय पे, वो दैव है। और फिर उसके बाद में काल निर्धारित होता है, उसके बाद में फसल आती है, हार्वेस्ट (harvest) आता है।
तो फिर क्या है मतलब? हर फल को प्राप्त करने के लिए तीन चीज़ें हैं— कर्म, दैव और काल। कर्म है, वो जो व्यक्ति, जो किसान है, वो अपने बीज डाल रहा है, सींच रहा है ज़मीन को, वो कर्म है। बारिश आना ये दैव है। और फिर काल का प्रवाह, उचित समय तक, उसके बाद में फल आता है।
तो क्या है, कि बारिश आने वाली है, ये दैव है, वो हमारे हाथ में नहीं है। पर इसका मतलब ये नहीं है कि खेती करना या नहीं करना, ये हमारे हाथ में नहीं है। वो हमारा कर्तव्य है, हमें करना है।
सब कुछ कर्तव्य है, भाग्य में नहीं है, सब कुछ कर्तव्य है, संघर्ष करता है। बच्चा करता है, बच्चा स्कूल में पढ़ता है, बहुत पढ़ता है, दिन-रात पढ़ता है, फिर भी बीमार पड़ता है, कुछ अनहोनी हो जाती है, जब भाग्य सबसे आगे आ गया था। पर इसका मतलब ये नहीं है कि कर्तव्य करना छोड़ दें। कर्तव्य करना ये कभी व्यर्थ नहीं जाता है, कर्म करना ये हमारा कर्तव्य है।
तो यह एक सत्य है कि कई बार हमारे जीवन में, हमारी शक्ति के परे कुछ ऐसी चीज़ें हो जाती हैं, जिसके कारण हमको दुख मिलता है, जिसके कारण हमारी पराजय हो जाती है, हमारे जीवन में बड़ी समस्या, आपत्ति आ जाती है। तो वो हमें स्वीकार करना है, हम स्वीकार करते हैं कि भाग्य है। पर इसका मतलब ये नहीं है कि हमारे जीवन में सब कुछ जो है, भाग्य से ही निर्धारित होता है।
प्रारब्ध कर्म और शरीर रूपी यंत्र
“प्रारब्ध पहले बना है, फिर शरीर बना है” ऐसा तुलसीदास जी ने कहा है। तो फिर क्या मतलब है इसका? प्रारब्ध ही शब्द का एक विशेष अर्थ है। प्रारब्ध मतलब जो कर्म… हमारा जन्म किसी एक परिवार में होता है, किसी एक वंश में होता है, किसी एक प्रकार की स्थिति में, किसी एक प्रकार की बुद्धिमत्ता के साथ, इसको हम बदल नहीं सकते हैं। As an individual, this is a starting point for desires to develop.
और उसको ज़्यादा बदल नहीं सकते हैं। कोई व्यक्ति बचपन से बहुत अच्छे दिखते हैं, कोई लोग इतना अच्छे नहीं दिखते हैं। हम उसको थोड़ा संवार सकते हैं, पर ज़्यादा बदल नहीं सकते हैं। तो इस जीवन के लिए हमको एक यंत्र मिला है, वो है हमारा शरीर।
जैसे किसी व्यक्ति के पास एक मोटरसाइकिल हो सकता है, किसी व्यक्ति के पास एक कार हो सकता है, किसी के पास एक बी.एम.डब्ल्यू (BMW) हो सकता है। तो अभी कोई व्यक्ति बी.एम.डब्ल्यू को बड़े लापरवाही से चला के उसका एक्सीडेंट कर सकता है। और कोई व्यक्ति सीधा बाइक को बड़े संभाल के चला के लंबा सफर तय कर सकता है। पर बाइक और बी.एम.डब्ल्यू में फर्क है।
तो उसी तरह से प्रारब्ध कर्म मतलब क्या? हमको हमारे पूर्व कर्मों से एक प्रकार का शरीर मिला है। तो किसी व्यक्ति को एक बाइक मिला होगा, किसी को एक बी.एम.डब्ल्यू मिला होगा, किसी को बीच की कोई और गाड़ी मिली होगी। पर वो गाड़ी का इस्तेमाल हम कैसे करते हैं, यह हम पर है।
जन्म और हमारे नियंत्रण की सीमाएं
तो प्रारब्ध कर्म मतलब जिस प्रकार का शरीर हमें मिला है, वह पहले से निर्धारित है, उसको हम बदल नहीं सकते हैं। हम जब जन्म लेते हैं, हमारे माता-पिता को हम नहीं चुनते हैं। हम जब जन्म लेते हैं, तो हम किस वंश में, किस जाति में, किस देश में, किस शरीर में, क्या कॉम्प्लेक्शन (complexion) है, हमारा चेहरा कैसा है, वो हम तय नहीं करते हैं। यह सब बचपन से तय होता है, जन्म से तय होता है। तो यह हमारा प्रारब्ध है।
तो किसी व्यक्ति का चेहरा बड़ा ही सुन्दर हो, पर हमेशा अगर वो घृणा करते हैं, क्रोध करते हैं, नफरत करते हैं, तो फिर क्या होता है? वो सुन्दर चेहरा भी इतना सुन्दर नहीं लगता है। (किसी व्यक्ति का चेहरा सुन्दर नहीं लगता है)। पर जन्म से व्यक्ति का ये भाग्य है जो कुछ चीज़ें निर्मित करता है, निर्धारित करता है, उसको हम बदल नहीं सकते हैं।
पर उसके साथ-साथ हम भी कुछ चीज़ें निर्धारित कर सकते हैं। हमारी जीवन में जो मिलने वाला है, इस जीवन के परे जो मिलने वाला है, उसको हम बदल सकते हैं।
सात्विक जीवन और भक्ति की शक्ति
तो सवाल है कि यहाँ… Suzuki के ऑफिस में हैं? आपने खाने-पीने और रहने का जैसे देखना नहीं है। खान-पान आप राजसिक खाएंगे, राजसिक रहेंगे। अब सात्विक होने के लिए, हमें सैक्रिफाइस (sacrifice) करने के लिए, हमें सात्विक चीज़ें चुननी पड़ेंगी।
और उनका दूसरा प्रश्न है यह— एक प्रश्न है, लिखें, क्विकली (quickly), तो हमारा खाना-पीना जब सात्विक होता है तभी हम सात्विक बन पाएंगे, और फिर भक्ति कर पाएंगे? तो अगर वो नहीं कर पाएंगे तो क्या करेंगे?
देखो, भक्ति किसी भी चीज़ पर निर्भर नहीं है। व्यक्ति तमो गुण में भी होगा तो भी भक्ति कर सकता है। कोई व्यक्ति… प्रभुपाद जी बोला करते हैं, कोई व्यक्ति शराब पीता है और शराब छोड़ भी नहीं पा रहा है, तो अगर वो सोचता है कि ये शराब का इतना आकर्षक स्वाद कहां से आ रहा है? वास्तव में भगवान कहते हैं: “रसोऽहमप्सु कौन्तेय” (कि मैं पानी का स्वाद हूँ)।
तो वो सोचता है कि ये शराब का स्वाद भी अगर भगवान ही हैं, इस तरह से वो शराब में भगवान का स्मरण करता है, तो उससे भी वो प्रगति करेगा। शराब पीने से प्रगति नहीं करेगा, पर शराब का जो आकर्षण है, वो समझता है कि ये भी आकर्षण कहां से है।
वो मेरे खाने-पीने पर भी नियंत्रण नहीं कर पा रहा… That has got this thing. मैं मेरे खाने-पीने पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा हूँ, और मेरे खाने-पीने, भावों को करें…
प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानन्दे!