Krishna descends to elevate us to happiness – Janmashtami class (Hindi)
Talk at ISKCON, Seshadripuram, Bangalore
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Lecture Summary
यह प्रवचन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर दिया गया है, जिसमें भगवान कृष्ण के आविर्भाव (जन्म), उनके अलौकिक सौंदर्य और भक्त-वत्सल स्वभाव को महाभारत और भागवत की लीलाओं के माध्यम से समझाया गया है।
प्रवचन के मुख्य बिंदु:
- भौतिक सुख बनाम आध्यात्मिक आनंद: भौतिक संसार का सुख अक्सर दूसरों की ईर्ष्या या दिखावे पर निर्भर करता है, जो कि अस्थायी और खोखला (Zero-sum game) है। इसके विपरीत, भगवान की भक्ति और कीर्तन का सुख असीमित है; यह किसी और का सुख कम नहीं करता, बल्कि सबके आनंद को बढ़ाता है।
- भगवान की दृष्टि (हृदय का भाव): दुनिया बाहरी दिखावा देखती है, लेकिन भगवान केवल हृदय का भाव देखते हैं (God sees inside out)। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में धूल, मिट्टी और पसीने से सने हुए सारथी बने भगवान कृष्ण का सौंदर्य कम होने के बजाय और भी अलौकिक हो जाता है।
- भीष्म पितामह और रथांगपाणि लीला:
- भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वे कृष्ण को शस्त्र उठाने पर मजबूर कर देंगे। दूसरी ओर अर्जुन अपने दादा पर प्रहार करने में संकोच कर रहे थे।
- जब अर्जुन के प्राण संकट में आए, तो भगवान कृष्ण ने अपने भक्त की रक्षा के लिए अपनी ‘शस्त्र न उठाने’ की प्रतिज्ञा तोड़ दी और रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़ पड़े।
- यह लीला दर्शाती है कि भगवान अपने भक्त के प्रेम के अधीन हैं और उनके लिए अपने नियम भी तोड़ सकते हैं। भीष्म यही वात्सल्य देखना चाहते थे।
- अदृश्य ईश्वरीय कृपा (माँ और शिशु का उदाहरण): जिस तरह रात में ठंड लगने पर एक माँ अपने सोते हुए बच्चे पर चुपचाप शॉल डाल देती है और बच्चा बिना देखे भी माँ का प्रेम और सुरक्षा महसूस कर लेता है, उसी प्रकार कीर्तन और स्मरण करने पर भगवान हमारी चेतना पर शांति और कृपा की शॉल डालते हैं।
- कारागृह का आध्यात्मिक अर्थ (कृष्ण जन्म):
- कंस के अहंकार के कारण कृष्ण का जन्म एक अंधेरी कोठरी (कारागृह) में हुआ।
- वास्तव में यह कारागृह हमारे अज्ञान से भरे ‘हृदय’ और भौतिक शरीर का प्रतीक है, जहाँ हमारी आत्मा कैद है।
- जिस तरह कृष्ण के जन्म लेते ही कारागृह के द्वार अपने आप खुल गए और बेड़ियाँ टूट गईं, ठीक उसी तरह जब हम भगवान को अपने हृदय में आमंत्रित करते हैं, तो हमारी सारी सांसारिक आसक्तियों की बेड़ियाँ टूट जाती हैं और जीवन में ज्ञान का प्रकाश छा जाता है।
Full Transcription
हरे कृष्णा! तो आज जन्माष्टमी के परमपवित्र अवसर पर भगवान की आविर्भाव तिथि है, कुछ ही मिनट अभी दूर हैं। उस समय हम भगवान की महिमा के बारे में दो लीलाओं के द्वारा चर्चा करेंगे। तो पहले, हमारे जीवन में जन्म होता है, अंत होता है, तो उसके बीच में जो भी घटना होती है, उनको हम जीवन कहते हैं। पर वास्तव में हमारा जीवन शाश्वत है। जीवन जो है हमारे जन्म से पहले भी होता है और मृत्यु के आगे भी चालू रहता है, पर हमारी दृष्टि में जन्म और मृत्यु बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। तो भगवान कैसे जन्म लेते हैं और कैसे किसी को जीवन का अंतिम स्तर जो मृत्यु है, उसमें कैसे मदद करते हैं, उसके बारे में हम चर्चा करेंगे।
पहले हम जैसे भगवान के एक महान भक्त हैं भीष्म पितामह, उनकी लीला के बारे में चर्चा करेंगे। और जैसे भगवान के जन्म की तिथि पास में आएगी, तो हम उनके जन्म के बारे में कुछ चर्चा करेंगे।
भगवान की दृष्टि: बाहर नहीं, हृदय के भीतर
भीष्म पितामह एक बहुत ही दिलचस्प हस्ती हैं महाभारत में। वे सबसे बुजुर्ग हैं और परिस्थिति के वश से उनको पांडवों के खिलाफ युद्ध करना पड़ता है, उनको कृष्ण के खिलाफ युद्ध करना पड़ता है। जब दुनिया व्यक्ति को बाहर से देखती है, एक भक्त व्यक्ति के अंदर क्या है वो देखते हैं। जब लोग बाहरी आवरण को देखते हैं, भगवान सबसे पहले अंदर, हृदय में क्या भाव है, वो देखते हैं, और उसके बाद में बाहर से क्या कार्य कर रहे हैं, वो देखते हैं।
तो यह जो भगवान की दृष्टि है—सबसे पहले अंदर देखना—यह वास्तव में हम सबको बहुत सांत्वना और शक्ति दे सकती है। क्योंकि अगर हम बाहर की दृष्टि से देखेंगे, तो हम देखेंगे कि हमारे पास कुछ चीज़ें होनी चाहिए; हम दिखने में अच्छे हैं, हमारे पास ऐश्वर्य है, हमारे पास बोलने की शक्ति है, हमारे पास बहुत सी संपत्ति है या ऐसी चीज़ें हैं जो दुनिया में बड़ी आकर्षक लगती हैं। पर यह चीज़ें हमारे पास कितनी भी होंगी, कई लोग ऐसे होंगे जिनके पास हमसे भी ज्यादा होगी। और उसके कारण क्या होता है? उसके कारण इनसिक्योरिटी (Insecurity) आ जाती है, उसके कारण हम खुद को कम मानने लगते हैं।
सुख की परिभाषा और भौतिक ईर्ष्या
और समाज की जो चेतना होती है, वह उसके सुख की परिभाषा पर निर्भर होती है। जिन चीजों में हम सोचते हैं कि मुझे सुख मिलेगा, उसके आधार पर हम परिभाषा करते हैं—यह अच्छा है, यह बुरा है, यह मुझे चाहिए, यह मुझे नहीं चाहिए। तो आजकल के समाज में, लोगों की क्या इच्छाएं हैं, वो हम क्या विज्ञापन देखते हैं, उससे हम समझ सकते हैं। जो विज्ञापन दिखते हैं, वो लोगों की क्या इच्छाएं हैं वो बताते हैं, और जिनमें वो इच्छा नहीं है, वो विज्ञापन वो इच्छा जागृत भी कर देते हैं। तो दोनों स्तर पर क्या स्वीकार है, वो विज्ञापन दिखाते हैं।
तो मैंने एक विज्ञापन देखा, उसमें क्या लिखा था? एक व्यक्ति था, नौजवान युवक था, वो एक कार में जा रहा था, और जब वो कार में जा रहा था, तो एक युवती उसकी ओर बड़े एडमिरेशन (Admiration)—बड़े प्रशंसात्मक, बड़ी प्रिय दृष्टि से देख रही थी। और वो एडवरटाइजमेंट (Advertisement) का क्या विज्ञापन था? “Buy this car and enjoy”—कि आपका पड़ोसी है, उसकी आँखों में जो ईर्ष्या आएगी, वो ईर्ष्या का आप भोग करो।
तो अभी, वास्तव में, ये कितने नीचे का स्तर है सुख का! हाँ, अगर दूसरों की आँखों में ईर्ष्या आती है, उससे कुछ सुख मिलने वाला है? मिलेगा, पर वो बहुत ही नीचे के स्तर का सुख है। वो ऐसा सुख है जो खुद के सुख में सुख नहीं है, वो दूसरों को दुख हो रहा है, वो दुख में सुख है। तो ये बड़ा ही विकृत सुख है।
सर्वोच्च आध्यात्मिक आनंद और भौतिक सुख की सीमा
हमें सबसे ऊंचे स्तर का सुख मिलता है भक्ति में। अभी ये ऊंचे स्तर और नीचे स्तर का हम किस तरह से फैसला कर सकते हैं? किस तरह से? जो हम सुख प्राप्त करते हैं, हमारे सुख से दूसरों को क्या होता है? तो अभी मैंने ये ईर्ष्या का उदाहरण दिया। तो हमारा सुख किस में आ रहा है? अगर मान लीजिए मैंने नई कार खरीद ली, पर मेरे पड़ोसी ने मुझसे अच्छी कार खरीद ली, तो मुझे कुछ सुख नहीं मिलने वाला है, उल्टा मुझे दुख होगा। और वह भी अगर मेरे ही स्तर पर उसकी चेतना है, तो मेरे दुख से उसको सुख मिलेगा।
तो क्या है, ये स्तर में ‘Happiness is a zero-sum game’—जीरो-सम (Zero-sum) मतलब, उसमें किसी को वास्तव में सुख नहीं मिलने वाला है। मेरे सुख से दूसरे का सुख कम होने वाला है, दूसरे के सुख से मेरा सुख कम होने वाला है। तो इसलिए, इस स्तर में जो सुख है, वो कभी शाश्वत नहीं रहता है। मेरे पास आएगा, मुझसे चला जाएगा; किसी और के पास आएगा, किसी और से चला जाएगा; फिर मेरे पास आएगा। ऐसा जो सुख है, वह अस्थाई है।
इससे ऊंचा जो सुख है, भक्ति का जो सुख है, वह सर्वोच्च सुख है। और सर्वोच्च क्यों है? क्योंकि ये ऐसा सुख है, कि हमारा सुख जो है, दूसरों के सुख को बढ़ाता है। जब हम भगवान की भक्ति में आनंद लेते हैं, जब हम भगवान के कीर्तन में, भगवान की कथाओं में, भगवान के श्रवण में आनंद लेते हैं, तो हमारे आनंद से किसी और का आनंद कम नहीं होता है। हमारे आनंद से वास्तव में दूसरों का आनंद बढ़ता है।
मान लीजिए कोई स्वादिष्ट व्यंजन है। अगर मान लीजिए अभी आप सब उपवास कर रहे होंगे, हम सब उपवास कर रहे हैं, तो उपवास जब ब्रेक (Break) करेंगे, तो शायद उसमें कुछ स्वीट (Sweet) होगा, स्वादिष्ट व्यंजन है। पर वास्तव में क्या है? यह एक सीमित मात्रा में है। जितना वो हम व्यंजन खा लेते हैं, उतना वो कम हो जाता है, और फिर वो खत्म हो जाता है। पर भगवान की भक्ति में जो आनंद है, वह असीमित है। जितना हम आनंद प्राप्त करते हैं—अगर कोई भक्त है, भगवान के कीर्तन में बड़े रुचि से कीर्तन कर रहा है, तो हमें भी आनंद महसूस होता है।
तो भक्ति का आनंद सर्वोच्च है, इसलिए भी है, अनेक कारण हैं, पर एक कारण हमारी तुलना में, हमारे इस विश्लेषण में यह है, कि यह जो आनंद है, दूसरों को दुख देके नहीं मिलता है। यह आनंद जो है, हमारा है, और फिर हमें एक वास्तव में सुख का मार्ग बना देता है, जिससे कि हम भी दूसरों को सुख दे सकते हैं। इस तरह से यह जो सुख है, यह अगर हम प्राप्त करते हैं, तो हम कभी इनसिक्योरिटी (Insecurity) महसूस नहीं करते हैं, क्योंकि बाह्य रूप से अगर सुख प्राप्त हो रहा है, तो वो कभी भी जा सकता है।
भगवान का अलौकिक सौंदर्य
तो भगवान जो हैं, हमें कैसे देखते हैं? God sees inside out—अंदर से बाहर देखते हैं। इसलिए बाहर हमारे पास क्या है, क्या नहीं है, यह भगवान के लिए कुछ फर्क नहीं पड़ता है। हमारी अंतरंग चेतना क्या है, भगवान वो देखते हैं।
वहां जब अर्जुन के सारथी थे भगवान, पार्थसारथी के रूप में, तो जब भीष्म तीर मार रहे थे—साधारण योद्धा योद्धा को तीर मारता है, पर क्योंकि रथ इधर-उधर हिल रहा होता है, तो कभी योद्धा को तीर मारा जा रहा है, वह कभी सारथी को भी जाके लग सकता है।
तो भीष्म पितामह याद करते हैं, जब मैंने तीर मारे, तो क्या हुआ? वो तीर जाके भगवान के शरीर को लगे। और वो कह रहे हैं कि भगवान के शरीर को लगे, कि जब वे रणभूमि में युद्ध कर रहे थे, तो रणभूमि में जब युद्ध हो रहा था, तो तभी क्या हो रहा था?
युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्
तो तभी सारे घोड़े जब दौड़ रहे थे, उनके दौड़ने से धूल, जो मिट्टी थी, ऊपर उड़ गई थी। और जब मिट्टी ऊपर आ गई थी, तो वो भगवान के चेहरे पे लग गई थी। साधारणत: कोई व्यक्ति, जब हम देखते हैं, अगर वो सुंदर दिखते हैं, आकर्षक दिखते हैं, तो काफी वो सजावट करते हैं। और कुछ भी अगर गंदगी हो गई, तो सुंदर नहीं दिखते हैं। तो बड़े साफ-सफाई करने के बाद, सजावट करने के बाद सुंदर लगते हैं। पर भगवान का ऐसा अलौकिक सौंदर्य है, कि वो घोड़ों के पैरों से जो धूल निकली है, वो भगवान के चेहरे पे लगी हुई है, पर वो भगवान के चेहरे पे लगने से उनका सौंदर्य और बढ़ गया है!
और भगवान जब घोड़ों को संभाल रहे हैं, तो घोड़ों को इधर-उधर हिलाना होता है, खींचना होता है, तो वो काफी मेहनत का काम होता है। उससे भगवान के चेहरे पे पसीना आ गया है, पर वो पसीने से भी उनका सौंदर्य और बढ़ गया है! और वो कह रहे हैं कि मैंने जब तीर मारे, वो तीरों से खून भी निकल रहा है, पर वो खून से भी क्या हो रहा है?
श्रमवार्यलंकृतास्ये
यह भगवान के लिए अलंकार है! तो भगवान का सौंदर्य ऐसा है जो किसी बाहर की चीज़ पे निर्भर नहीं हो रहा है, उनका अंतरंग सौंदर्य है, और जो भी परिस्थिति है, वो उनके सौंदर्य को और बढ़ा देती है।
भीष्म पितामह की प्रार्थना और भगवान की कृपा
तो इस तरह से भीष्म पितामह स्मरण कर रहे हैं कि हे भगवान!
मम निशित-शरैर्विदार्यमाण-त्वचि विलसत्-कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा
वो कह रहे हैं कि हे कृष्णा, मेरी चेतना भी आपकी ओर आने दो। एक तरह से देखा जाए तो, भीष्म पितामह प्रार्थना जब बोल रहे हैं, तो वो रणभूमि पे लेटे हुए हैं, तीरों के एक बिस्तर पे हैं। और उनकी जो परिस्थिति है, एक तरह से कृष्णा और अर्जुन ने की है, अर्जुन के तीरों से उनकी यह परिस्थिति हुई है। पर कृष्ण क्या देख रहे हैं, और भीष्म क्या देख रहे हैं? भीष्म देख रहे हैं कि ‘ये व्यक्ति मेरे भक्त हैं, ये मेरे स्वामी हैं, ये मेरे आराध्य देव हैं, और मैं चाहता हूँ कि इस समय मेरी चेतना उनमें लग जाए।’
और भगवान कृष्ण जो आते हैं, उनकी भीष्म पितामह के सामने दृष्टि है, भगवान ये नहीं देखते हैं कि ‘इसने मुझ पे तीर मारा था।’ भगवान क्या देखते हैं? ‘ये मेरे महान भक्त हैं, और मैं इनको कृपा देने के लिए आया हूँ।’
तथात्वेकान्तभक्तानां पश्य भूपानुकम्पितम्।
यन्मेऽसूंस्त्यजतः साक्षात् कृष्णो दर्शनमागतः॥
कि कृष्ण मुझे दर्शन देने आ रहे हैं। क्यों आ गए हैं? क्योंकि मैंने उनकी भक्ति की है। दुनिया कहेगी, तुमने पांडवों के विरुद्ध युद्ध किया, पर भगवान दुनिया की बात को नहीं, भगवान भीष्म के हृदय को देख रहे हैं।
और क्या देखते हैं वो? कि भगवान भीष्म के द्वारा एक सीख देना चाहते थे। क्या सीख थी वो? कि भीष्म पितामह बहुत शक्तिशाली थे, बहुत ज्ञानवान थे, और जब वो किसी पक्ष में युद्ध कर रहे हैं, तो उस पक्ष की जीत की संभावना बहुत बढ़ जाती थी। पर भगवान ने क्या दर्शाया? भगवान ने भीष्म को उनके हृदय के अंदर से प्रेरणा दी कि तुम कौरवों के पक्ष से युद्ध करो, और फिर भीष्म पितामह की श्रेणी का भी योद्धा अगर युद्ध कर रहा है, पर वहां धर्म के खिलाफ जाता है, वह भगवान के खिलाफ जाता है, तो उसकी पराजय हो जाएगी।
तो भीष्म पितामह जानते थे कि मैं जिस पक्ष में युद्ध करूँगा, मैं उसमें परास्त हो जाऊँगा। मैं जिस पक्ष में युद्ध करूँगा, वह अधर्म के पक्ष में है। मैं जिस पक्ष में युद्ध करूँगा, उससे मैं बदनाम हो जाऊँगा कि मैं अधर्म के पक्ष में युद्ध करूँगा। बाह्य रूप से भीष्म पितामह जो हैं, ऐसे एक चुनाव में, ऐसी परिस्थिति में आ गए थे वो, कि हर तरह से अपयश उनको मिलने वाला था। पर उन्होंने वो नहीं देखा, उन्होंने देखा कि भगवान की क्या इच्छा है, और भगवान उनका भाव देखते हैं।
भीष्म की प्रतिज्ञा और अर्जुन का संकोच
और यही जो महाभारत का युद्ध जो हो रहा था, तो दसवें दिन भीष्म पितामह—युद्ध का आखिरी दिन था—उसके पिछले दिन, नौवें दिन में जब युद्ध हो रहा था, तो तभी भीष्म पितामह ने व्रत लिया कि “आज या तो मैं पांडवों का वध करूँगा। नहीं तो मैं आज कृष्ण को शस्त्र उठाने पे मजबूर कर दूँगा।”
अभी जब ऐसा व्रत लिया भीष्म पितामह ने, तो उनका भाव क्या था? उनका भाव ये था कि वो जानते थे कि कृष्णा कभी पांडवों का, खास करके अर्जुन का वध नहीं होने देंगे। तो वो देखना चाहते थे क्या लीला करेंगे कृष्णा, जिससे कि वो अपने भक्त को बचाएंगे। तो उन्होंने ऐसा व्रत इसलिए लिया, कि वो देखने को कि कृष्णा क्या लीला करने वाले हैं। और ऐसे भाव से उन्होंने क्या किया? उस दिन ऐसा भीषण युद्ध किया, भीष्म पितामह अपनी पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे थे। उसके पहले के दिनों में भी युद्ध कर रहे थे, पर फिर भी उनका पूरा हृदय नहीं था क्योंकि वो सोच रहे थे कि दुर्योधन तो इतना अधर्मी है, मैं उसके पक्ष में युद्ध कर रहा हूं।
पर इस दिन उनका पूरा हृदय लगा कि युद्ध किया। क्यों? वे दुर्योधन के लिए युद्ध नहीं कर रहे थे, वे कृष्ण के लिए युद्ध कर रहे थे। किस तरह से? वे देख रहे थे कि कृष्ण क्या लीला करेंगे, कैसे अपने भक्त को बचाएंगे वो।
और अर्जुन सोच रहे थे कि ‘ये तो मेरे दादा हैं, मैं इनसे कैसे युद्ध कर सकता हूँ।’ जब पहला दिन युद्ध का हो रहा था, उसके पहले वे भीष्म पितामह से मिल के आए, तो तभी अर्जुन कृष्ण से कहने लग गए, कह रहे, “ये भीष्म जो हैं, जब मैं छोटा था, मैं बाहर से खेल के आता था, और खेल के आके मैं फिर उनकी गोदी में बैठ जाता था। और फिर मैं उनकी दाढ़ी से खेला करता था, और खेलते-खेलते मैं उनको पिता बुलाता था। तो तभी वे मुझे, मेरे बाल सहलाते थे और कहते थे—बेटा, मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ, मैं तुम्हारे पिता का पिता हूँ। तो ऐसे भीष्म पितामह पर मैं कैसे तीर चला सकता हूँ?”
कृष्णा ने कहा, “हे अर्जुन, ये भावनाओं में जाने का समय नहीं है, तुम अपना कर्तव्य याद करो।” तो ये भाव था। अर्जुन युद्ध कर रहे थे, पर अर्जुन अपना पूरा हृदय नहीं लगा रहे थे युद्ध करने में। और दूसरी ओर से, भीष्म अपनी पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे थे, और वो पूरा पांडवों के पक्ष में विध्वंस कर रहे थे।
रथांगपाणि: भगवान का भक्त के लिए नियम तोड़ना
और जब कृष्णा ने देखा, कृष्णा ने देखा कि अर्जुन युद्ध नहीं कर रहे हैं पूरी शक्ति से, और भीष्म ऐसे युद्ध कर रहे हैं कि अब अर्जुन का वध हो जाएगा, पांडवों की पराजय भी हो सकती है। तो कृष्णा विचार करने लगे। और फिर कृष्णा अर्जुन के रथ पर सारथी के रूप में थे, तो एकाएक कूद गए। अर्जुन देख रहे थे, कृष्णा कहाँ चले गए? तो कृष्णा कूद गए और उन्होंने इधर-उधर देखा। वो अभी देख रहे थे कि अगर अर्जुन युद्ध नहीं करेंगे, तो अर्जुन का वध हो जाएगा।
कृष्णा का एक शस्त्र होता है सुदर्शन चक्र। तो अभी सुदर्शन चक्र से कितने भी शस्त्र हों, उसका वध कर सकते हैं। तो अभी जब उन्होंने रथ का पहिया देखा, तो उन्होंने उसको उठा लिया। चक्र उठा लिया, तो उनका नाम हो गया ‘रथांगपाणि’। रथांग था चक्र वो, उसका एक पहिया था, उसको उठा लिया। तो उन्होंने रथ के चक्र को क्यों उठा लिया, अपने सुदर्शन चक्र को क्यों नहीं बुलाया? वो इतने चिंता में थे कि ‘मेरे भक्त को क्या हो जाएगा’, तो भूल गए सुदर्शन चक्र बुलाने के लिए। तो इसलिए जो सामने दिख गया, उसको उठा लिया।
और अभी, जब भगवान सुदर्शन चक्र लेते हैं, तो क्या होता है? वो जहां पे होते हैं, वहीं से सुदर्शन चक्र छोड़ते हैं, और वो जाके शत्रु का वध कर लेता है। पर यहां पे क्या हुआ? भगवान कृष्ण इतने चिंताओं में थे अपने भक्त के लिए, तो उन्होंने सोचा कि “मैं यहां से अगर चक्र फेंकूंगा, तो शायद वो निशाने पे लगेगा या नहीं लगेगा, पता नहीं।” तो इसलिए, अगर किसी को गोली मारनी है, दूर से मारने के लिए तो शायद चूक जाएगा, तो उसके सामने जाओ, फिर गोली मारो। तो ऐसे भगवान ने सोचा कि “मैं भीष्म के पास जाऊँगा, और वहां से चक्र फेंकूंगा”, और वे भीष्म की ओर दौड़ने लगे।
तो अभी अर्जुन अपना युद्ध कर रहे थे तीर मार के, और देखा कि कृष्णा ने अभी रथ का पहिया उठा लिया है और दौड़ रहे हैं। तो इससे अर्जुन बड़े विचलित हो गए। क्यों विचलित हो गए? अर्जुन को ये भय नहीं था कि भीष्म मेरा वध कर देगा। अर्जुन को भय ये था कि कृष्णा ने युद्ध शुरू होने के पहले व्रत लिया था कि ‘मैं कोई शस्त्र नहीं उठाऊंगा’, और अभी कृष्णा ने शस्त्र उठा लिया है! और तुरंत समझ गए, दो व्यक्तियों में अगर बहुत स्नेह होता है, तो तुरंत समझ जाते हैं—’मेरे लिए कृष्णा ने अभी शस्त्र उठा लिया है।’
तो अर्जुन कृष्णा को चिल्लाने लगे, “कृष्णा रुक जाओ! तुम शस्त्र मत उठाओ।” क्योंकि अर्जुन को चिंता थी कि अगर कृष्णा ने शस्त्र उठा लिया, तो बाद में लोग उनकी निंदा करेंगे। लोग उनकी निंदा करेंगे कि तुमने व्रत लिया था शस्त्र नहीं उठाओगे, और अभी शस्त्र उठा लिया है। देखो तुम अपने वचननिष्ठ नहीं हो। और अर्जुन को यह सहन नहीं हुआ कि कोई कृष्णा की निंदा करेंगे।
इसलिए वो कृष्णा से कहने लग गए, “हे कृष्णा रुक जाओ, मैं युद्ध करूंगा, मैं भीष्म का वध करूंगा, आप शस्त्र नहीं उठाओ।” पर वो चिल्ला रहे थे इस तरह से, पर कृष्णा इतने क्रोधित हो गए थे, अपने भक्त की सुरक्षा की चिंता से इतने विचलित हो गए थे कि उन्होंने कुछ सुना नहीं। सीधा दौड़ के जा रहे थे वो।
अभी मैं सारी लीला बता रहा हूँ, मुझे काफी मिनट लग रहे हैं बताने को, ये कुछ क्षणों में हो रहा है सब कुछ। कृष्णा कूद गए नीचे और दौड़ने लग गए। और अर्जुन अभी देख रहे थे, तो अर्जुन ने देखा कुछ हुआ नहीं, तो अर्जुन भी अपने रथ से कूद गए। अर्जुन दौड़ रहे थे, अर्जुन ने जोर से छलांग मारी, और सीधे वो कृष्णा के पास में जाके गिर गए। और उन्होंने कृष्णा के पैर को पकड़ लिया, ताकि कृष्णा के पैर को पकड़ के वो कृष्णा को रोक सकें। पर कृष्णा इतने क्रोध में और भाग रहे थे कि कृष्णा अर्जुन को घसीटते हुए लेके जा रहे थे।
जब कोई राजा गलत कार्य पे लगता है, तो उसके मंत्री की जिम्मेदारी है कि वो राजा को सही मार्ग पे लाए। (भीष्म पितामह ने सोचा था) कि “तुमने धृतराष्ट्र को सही मार्ग पे नहीं लाया, इसीलिए तुम इस युद्ध के लिए जिम्मेदार हो, और मैं आज तुम्हारा वध कर दूँगा।” कुछ बड़े क्रोध से भीष्म को चिल्लाते हुए वो जा रहे थे।
और जब इस तरह से जा रहे थे, तो भीष्म पितामह बड़े प्रसन्न हो गए! यही लीला देखने के लिए उन्होंने सारा युद्ध किया था। तो उन्होंने अपना धनुष बाजू में रख दिया, और कहा, “हे केशव, मैंने पूरा प्रयास किया, पर दुर्योधन से इतना आसक्त था कि वो अंधा हो गया था धृतराष्ट्र।” (मतलब वो आसक्ति से अंधे हो गए थे और उनके आसक्ति की जो भी चीज़ें थीं, सारे उनके पुत्रों का जब वध हो गया, कुछ भी आसक्ति के लिए रहा नहीं, तब ही आसक्ति उनकी गई। तो इस तरह से वो आसक्ति के कारण अंधे हो गए थे।) “तो यहाँ पे भीष्म बता रहे हैं कि मैंने प्रयास किया पर धृतराष्ट्र माने नहीं हैं। पर अगर आप समझते हो केशव कि मैं जिम्मेदार हूँ, तो आओ आप मेरा वध कर दो। आपके हाथों से मृत्यु पाना मतलब मैं जीवन की परम गति प्राप्त कर लूँगा।”
इस तरह से भीष्म बड़े प्रसन्न हो गए थे। कृष्णा और क्रोध में बढ़ रहे थे। और अभी अर्जुन ने देखा ‘मैं रोक ही नहीं पा रहा हूँ।’ अर्जुन ने कृष्णा के पैरों को पकड़ा था और कृष्णा उनको घसीटते हुए लेके जा रहे थे। तो अर्जुन ने क्या किया? अभी उनके बड़े क्षत्रिय पैर थे, उन्होंने ऊपर उठाए और जोर से ज़मीन पे मारे। और जब ज़मीन पे मारे, तो वो क्षत्रिय थे, बड़े क्षत्रिय थे, तो ज़मीन में खड्डे हो गए। दोनों पैर उन्होंने ऊपर उठाके ज़मीन में मार दिये। और जब ज़मीन में खड्डे हो गए, उनका पैर वो खड्डों में अटक गया। और पैर खड्डों में अटक गया और उन्होंने कृष्णा को पकड़ रखा था, तो क्या हो गया? उसके कारण कृष्णा रुक गए।
और इस तरह से जब वो रुक गए, अर्जुन चिल्ला रहे थे—”कृष्णा! कृष्णा रुक जाओ। तुम युद्ध मत करो। मैं भीष्म का वध करूँगा।” इस तरह से बोले तो कृष्णा शांत हो गए।
भगवान का वात्सल्य और आध्यात्मिक प्रगति
जो हम जितना आध्यात्मिक प्रगति करते हैं, उतना हम उस आनंद को अनुभव करते हैं। जैसे कि अगर कोई नवजात शिशु है, अभी-अभी जन्म हुआ उस शिशु का, तो वास्तव में उस शिशु को कुछ भी पता नहीं होता है। जब जन्म होता है, तो वो रोने लगता है। और फिर जब उसको उठाती है माँ, और माँ अपने स्तन से दूध पिलाती है, तो पहले तो उसको ये भी पता नहीं होता है कि यहाँ पर कोई व्यक्ति है जो मेरी माँ है। उसको सिर्फ अभी कुछ मुंह में लग रहा है, और वो वहां से कुछ स्वादिष्ट आ रहा है, पी रहा है।
तो धीरे-धीरे जब बड़ा होने लगता है, तो वो समझता है कि ये केवल एक दूध का स्रोत नहीं है, ये एक व्यक्ति है। और ये व्यक्ति मेरी माँ है, और ये मुझसे प्रेम करती है। तो ये कैसे होता है? जितना वो बड़ा होने लगता है, उतना वो चेतना जागृत होती है, और फिर वो तभी समझने लगता है।
तो जब ऐसे थोड़ा भी शिशु बड़ा हो गया है, और मान लीजिए अभी रात को बहुत ठंडी है, तो माँ देखती है कि, “अरे मेरा बालक जो है, मेरा शिशु जो है, वो थोड़ा कांप रहा है,” तो माँ एक शॉल लायेगी और उसके ऊपर डाल देगी। तो अभी जब वो बालक बहुत छोटा है, उसको कुछ भी समझेगा नहीं। उसको लगेगा, “पहले मुझे ठंडी लग रही थी, अभी ठंडी चली गई है।” पर, बाद में जैसे थोड़ा बड़ा हो जाता है, समझता है कि मेरी माँ कितना प्रेम करती है। भले ही वो बालक ने आँखें खोली नहीं हैं, उसने देखा नहीं है, वो समझ जाता है। क्या समझता है? ‘मेरी माँ ही होगी, और माँ ने मुझे एक शॉल डाली है।’
मुझे कीर्तन करने में, भगवान के कीर्तन में विलीन होने में बड़ा आनंद है। यह आनंद क्यों होता है? हमारा मन बड़ा विचलित होता है, पर अगर हम भगवान के कीर्तन में आ जाते हैं, तो हम देखते हैं कि मन शांत हो जाता है। भले ऐसे बहुत से लोग हैं जो मूर्ति पूजा को मानते नहीं हैं, पर फिर भी वो लोग महसूस करते हैं कि अगर मंदिर के वातावरण में हम आ जाते हैं, तो शांति आ जाती है। तो अब वो लोग समझ नहीं पाते कि शांति कहां से आ रही है। मंदिर की दीवारों से शांति नहीं आ रही है, मंदिर के फर्श से शांति नहीं आ रही है, शांति क्यों आ रही है? क्योंकि भगवान वहां पे विद्यमान हैं।
तो क्या है, कि भगवान के जब हम सानिध्य में आते हैं, तो क्या हो रहा है कि हम एक दिव्य प्रकार की शांति अनुभव करते हैं। सिर्फ अभी क्या लगता है, ‘अभी ठंडी से राहत मिल रही है।’ जैसे बालक बड़ा होता है, तो वो जब शॉल देखता है उसके शरीर पे, वो शॉल से क्या समझता है? ‘मेरी माँ मुझसे प्रेम करती है।’ और उसके प्रेम का क्या स्वरूप है अभी, कि उन्होंने मेरे शॉल डाली है, उससे मुझे शांति मिल रही है। उससे मुझे ठंडी से राहत मिल रही है।
उस तरह से हम क्या देखते हैं कि हम जब भगवान का स्मरण करते हैं, भगवान का कीर्तन करते हैं, तो भगवान का प्रेम दर्शाया जा रहा है। हम जब भगवान की भक्ति में लगते हैं, उनका स्मरण करते हैं, जैसे माँ अपने बालक पर शॉल डालती है, तो भगवान उनके स्मरण की शॉल हमारी चेतना पर डालते हैं।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
भगवान कहते हैं कि अगर आप मेरी चेतना में लग जाते हैं, आप मेरा स्मरण करते हैं, तो क्या होगा? मेरी कृपा से आप सारी समस्याओं के पार होगे। तो क्या होगा जब हम भगवान का स्मरण करते हैं? तो जो भी समस्या है, उसमें हम उससे उद्विग्न नहीं होंगे। हम समझेंगे कि वास्तव में समस्या है, पर भगवान इससे बड़े हैं और भगवान इस समस्या का या तो हल कर देंगे, या समस्या का सामना करने की शक्ति मुझे दे देंगे। हम अंदर से शक्तिशाली हो जाते हैं। जो हमको राहत मिलती है चिंताओं से, जो अन्दर से संतुष्टि और शक्ति मिलती है, यह वास्तव में हमारे स्तर पे भगवान के प्रेम का प्रदर्शन है।
और इस तरह से, अगर हम ज्ञान की दृष्टि से, शास्त्रों की दृष्टि से समझेंगे कि ‘यहां भगवान का प्रेम है मेरे लिए’, तो हम भक्ति में और प्रगति करेंगे। और भक्ति में मन लगाएंगे और लगाएंगे और उससे क्या होगा? और शांति, और संतुष्टि हम महसूस कर पाएंगे। और इस तरह से हम एक स्तर पे आ जाएंगे।
आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।
हर पल में आनंद है। हर पल में ऐसा आनंद है कि वो एक सागर है, और सागर का भी वर्धन हो रहा है! ऐसा आनंद हम सब प्राप्त करते हैं भगवान की भक्ति के द्वारा।
भगवान का भौतिक जगत में अवतरण
और वही भगवान आज के दिन में, हज़ारों साल पहले इस भौतिक जगत में आए हैं। जब भगवान इस भौतिक जगत में आते हैं, वो क्यों आते हैं? वो भगवान के संग के लिए हमारी चेतना ऊपर उठे और असेंट (Ascent) के लिए। ताकि जो मानव है, हमारी चेतना उनके स्तर पे आ जाए और हम उनकी प्राप्ति कर सकें।
भगवान इस भौतिक जगत में आते हैं, अनेक स्तर हैं, अनेक उद्देश्य हैं उसके। वो यहाँ पर धर्म की संस्थापना करते हैं। वो ज्ञान देते हैं, वो पद्धति दिखाते हैं जिसके द्वारा हम उनके पास जा सकें।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
वो कहते हैं कि जब आप मेरी लीलाओं को समझोगे, आप मेरे जन्म को समझोगे, तो उसके द्वारा आप मेरी ओर आकर्षित हो जाओगे और आप जब मेरी ओर आकर्षित हो जाओगे तो आप मेरी प्राप्ति कर लोगे। और यही प्राप्ति दिलवाने के लिए मैं यहां पे आता हूँ।
कंस का अहंकार और कारागृह में जन्म
तो जब भगवान इस भौतिक जगत में आते हैं कृष्ण के रूप में, अवतार के रूप में, तो वे एक अंधेरी कोठरी में आते हैं। देवकी और वसुदेव को कंस ने अपने कारागृह में बंद कर लिया होता है। तो क्यों बंद किया होता है? क्योंकि बहुत पहले एक भविष्यवाणी हुई होती है। जब देवकी का विवाह हुआ होता है, तो भविष्यवाणी क्या हुई होती है कि “ये देवकी का अष्टम गर्भ तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा।”
और यह जब सुनता है कंस, तो क्या करता है वो? तुरंत देवकी का वध करने के लिए तैयार होता है। वो उसकी बहन है। तो यह इतना घृणास्पद कार्य है कि वास्तव में किसी क्षत्रिय को किसी स्त्री पर आक्रमण करना यह घृणास्पद है, ऊपर से किसी भाई को अपनी बहन पर आक्रमण करना यह घृणास्पद है, और जब किसी स्त्री का विवाह हो रहा है उस समय पर उसका आक्रमण करना यह घृणास्पद है। तो यह ‘Sin Cubed’ (तीन गुना पाप) था, तीन स्तर पर वो महापाप कर रहा था।
तो तभी वसुदेव क्या करते हैं? वसुदेव अभी जानते हैं कंस बड़ा शक्तिशाली है और वह कंस से शक्ति के स्तर पर युद्ध नहीं कर सकते हैं। और ऊपर से वो सोचते हैं कि युद्ध हो जाएगा तो यह अपशकुन हो जाएगा विवाह के मंगल कार्य में। तो इसलिए वो प्रतिकार कैसे करते हैं? वो बुद्धि से कंस का प्रतिकार करते हैं। उससे कहते हैं कि “जिसके जो पुत्र होंगे, तुमको इससे तो खतरा नहीं है, इसके जो पुत्र होंगे तो मैं उनके पुत्र तुमको दे दूँगा।” तो तभी कंस मान लेता है।
अब कुछ लोग पूछते हैं कि अगर कंस को देवकी के गर्भ से ही चिंता थी, उसके पुत्र से भय था, तो फिर उसने देवकी और वसुदेव को एक ही कारागृह में क्यों रखा? अगर अलग जगह रखते तो उनका पुत्र ही नहीं होता था, पुत्र नहीं होता था तो खतरा नहीं होता था। तो ऐसा क्यों नहीं किया?
तो वास्तव में कंस क्या था? कंस एक असुर था। और असुर मतलब क्या था, उसका भाव था कि जब वो आकाशवाणी हुई कि आठवां गर्भ मेरा वध करेगा, तो उसने अपने अहंकार से सोचा कि “मैं यह जो देवताओं ने आकाशवाणी की है, मैं इसको झूठा साबित करूँगा!” तो उसने क्या सोचा कि “जैसे पहले मैंने देवताओं को हरा दिया है युद्ध में, तो वैसे अभी मैं देवताओं के वचनों को भी हरा दूंगा।” इसलिए उसने क्या सोचा कि “होने दो देवकी का पुत्र, होने के बाद मैं उसका वध करूँगा और उसके द्वारा मैं इन देवताओं को गलत साबित करूँगा।”
तो इस भाव से उसने क्या किया? वसुदेव और देवकी को कारागृह में रखा और बड़ी बेरहमी से उसके छह पुत्रों को मार दिया। सातवां पुत्र जब हुआ, कन्या हुई और कन्या उसके हाथों से छूट गई और वो देवी के रूप में प्रकट हुई। और फिर जो आठवां गर्भ जब हुआ, आठवां पुत्र जब हुआ, तो क्या हुआ? कृष्ण एक अंधेरी कोठरी में जो कारागृह में प्रकट हुए थे।
हृदय का कारागृह और भगवान का प्रकटीकरण
तो वैसे वो जो कोठरी थी, वास्तव में हमारे हृदय के समान है। वास्तव में हमारे हृदय में हमारा जो आत्मा है, वो वास्तव में बंधा हुआ है। जो आत्मा है वो अनन्त जीवन चाहता है पर ये शरीर में जो बंधा होता है, तो वो वास्तव में सीमित जीवन जो मृत्यु की छाया में जीवन होता है (जीता है)। तो उस तरह से जो कारागृह में बंधे भाई थे, जैसे वसुदेव देवकी कारागृह में बंधे थे, उसी तरह से हमारी जो आत्मा है शरीर के कारागृह में बंधी है।
और जब कृष्ण प्रकट हुए तो क्या हुआ? कृष्ण प्रकट हुए तो अचानक कारागृह के दरवाज़े खुल गए! वसुदेव और देवकी के जो शैकल्स (Shackles) ज़ंजीरें थीं, वो टूट गईं, खुल गईं और उन्होंने कृष्ण को वहाँ से ले लिया। तो कृष्ण का जन्म हुआ तो एक चमत्कार हो गया।
उसी तरह से जब कृष्ण हमारे हृदय में आते हैं, भले ही अंधेरा हो वहाँ पे, हमारी जो आसक्तियां हैं, हमारी जो ऐसी आदतें हैं जो हमें पीछे रखती हैं, वो सब टूट जाती हैं। और अंधेरे में जो वो रोशनी कृष्णा ने अपने प्रकटीकरण से की थी, वैसी ही रोशनी वो सब हमारे हृदय में लाते हैं।
और यही प्रार्थना हम कर सकते हैं कि हे कृष्णा! आप मेरे हृदय में आ जाओ और मेरे हृदय को आप रोशन कर दो आपके ज्ञान के द्वारा, आपकी भक्ति के द्वारा, और मुझे आपके धाम में ले जाओ। यही प्रार्थना के साथ हम प्रवचन का अंत करते हैं। कृपया एक बार दोहराएं:
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥