Kunti’s prayers (1.8.23-1.8.27) – Krishna’s inconceivable protection contradicts our material preconceptions
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संक्षिप्त सारांश
हमने कुंति महाराणी की प्राथना है जो श्मतभागतम के पुर्थम स्कंथ के आठ भे अधिखा है ये अठ्वावे श्लोक से त्याता की श्लोक पर आती है इसके बारे में हमने तो अभी तद दो प्रवचनों में चर्चा की हैं पाँच पाँच लोग हमने हरे प्रवचन में लिये थी इसकी जो ओवर्वियो गरम देखना है इसमें क्या चल रहा है सबसे पहले कुंति महाराणी कोलती है कि हे प्रभो आपका जो स्थर है आपका जो पध है आपकी जो स्थी है वह अचींज के लिए पहले पाँच लोग हमें कर दिये फिर इसके बाद में आपका सरक्षन जो है वह अचींज के लिए फिर इसके बाद में अभी जो हम चर्चा।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
हमने कुंति महाराणी की प्राथना है जो श्मतभागतम के पुर्थम स्कंथ के आठ भे अधिखा है ये अठ्वावे श्लोक से त्याता की श्लोक पर आती है इसके बारे में हमने तो अभी तद दो प्रवचनों में चर्चा की हैं पाँच पाँच लोग हमने हरे प्रवचन में लिये थी इसकी जो ओवर्वियो गरम देखना है इसमें क्या चल रहा है सबसे पहले कुंति महाराणी कोलती है कि हे प्रभो आपका जो स्थर है आपका जो पध है आपकी जो स्थी है वह अचींज के लिए पहले पाँच लोग हमें कर दिये फिर इसके बाद में आपका सरक्षन जो है वह अचींज के लिए फिर इसके बाद में अभी जो हम चर्चा करेंगे कि आपकी जो दीलाएं हैं वे अचींज के लिए और फिर आंत में वह दिवेदन करती है कि हे प्रभो आप आपकी अचींज के पद्धवी से मेरा सरक्षन करेंगे और उसमें असली सरक्षन क्या है कि मेरी चेतना सदैवा आपके होर ही जाती रहे जैसे गंगा सागर की होर जाती है तो इसमें हम अभी एक 28 शलोक से शुरू करेंगे हमने 27 शलोक तर देखा था उसमें वो पताती है कि हे प्रभो साधरन तैलोग चाहते हैं कि सरक्षन मतलब क्या हो कि समस्या ना आए कुन्ति वारण कार्टना करती है समस्या आए क्योंंकि इससे मैं आपकी शरीं लूगी और आपकी शरीं लूगी तो पुना भौति जगत में मुझे वापस बहुत साधरन में भनान ही पड़ेगा तो अभी बहुत तत्वज्ञान के स्थर्प जा रही है और यहां पे 28 से शलोक में होई प्रमो आप कैसे काल के रूप में प्रकत है मन्ये तौम कालं ईशानं अनाधिनिदनं विभुं समं चरंतं सर्वंत्र भूतानां यन्निथा कले तो आप बता रही है कुल्टी भाराडि मन्ये तौम मैं मानती हूँ कालं ईशानं ईश इश मतलि इश्वर आप कौन हो आप कालं हो और क्या आपका सभाव है अनाधिनिदनं विभुं आपका कोई शुरुवात नहीं है आपका कोई अन्त नहीं हो समं चरंतं सर्वंत्र आप सबके प्रती समान भाव से आदान पुदान करते हैं तो इस दुनिया में हम जो भेग देखते हैं और भेग के कारण वाध-वाध होते हैं युद्ध होते हैं वो क्योंं होते हैं भूता नाम यन्मिथा कली वो एक-दूसरे में परस्पर वैर है उसके कारण होते हैं तो वाध-वाध में ये चारो जो पंक्तिया हैं इस श्लोप में अलग-अलग तत्व बताय जा रहे हैं वो बहुती गुण-पंक्ति सम्बंदित हैं तो हम एक-एक-पैंस देखते हैं मन्ये पव्तालवीश्नानम हे प्रभो आप काल को तो इस दुनिया में हम सब देखते हैं कि काल जो है वह एक बहुत बड़ा नियंत्र है हम कहते हैं कि कई बार अगर कोई हमको बुलाता है आप इसके लिए आजा उसके लिए हम कहते हैं मेरे पास समय नहीं है तो जब हम कहते हैं मेरे पास समय नहीं है इसमें हम वास्तव में क्या बता रहे हैं हम आगर सोचे हैं तो कि वास्तव में हम समय के नियंत्रें देते हैं क्योंंकि समय हम बहुत कुछ करना चाहेगे पर समय मर्यादित होने के कारण हम कर नहीं पाते तो कुछ लोग कहते हैं time is money कुछ लोग कहते हैं कि समय भी पैसा कुछ लोग कहते हैं समय पैसे से ज्यादा मातपूर्ण है कि चाहें तो पंडित कहते है कि एक पल समय जो है वहां स्वर्णा कोटी भी हम स्वर्णा कोटी बुद्राय भी देते हैं तो भी हम उसको एक पल को बुना प्राप्प नहीं कर सकते हैं तो समय ये वास्तव में धन से भी अधिक मोल्यवान है क्योंंकि time is irrecoverable and unstored जो पैसा है वो अगर चला गया तो हम प्राप्प कर सकते हैं बुना और हम उसको संचित करके रख सकते हैं पर हम समय को संचित नहीं कर सकते हैं समय है वो हर पल हम उसको गतित कर भी रहे हैं उसको खर्चा कर भी रहे हैं तो पैसा हम संचित कर सकते हैं हम समय संचित नहीं कर सकते हैं इसलिए हमें बहुत गंभीर होना चाहिए अगर मैं खर्चा कर ही रहा हूं तो कैसे खर्चा कर रहा हूं उसके लिए और उसको हम पैसा गमा भी दिया तो पुनहां प्राप्ट कर सकते हैं मिहनत करके पर जो समय है उसको पुनहां प्राप्ट नहीं कर सकते हैं तो यहां जो समय की मोले को समझना यहां है यहां अच्छा नहीं कि समय इतना मोले वाल है पर यहां भी दुश्टी, तत्वज्ञान का दुश्टी से पुण नहीं है यह एक समय का समय का समझना है समय का समझना मतलब कि समय मेरे लिए क्या कर सकता है उस आधार पर हम समय को मोले देते हैं पर शास्त्र बताते हैं कि समय को हम सिर्फ यूटिलिटेरल दुश्टी से नहीं इंट्रिंसिक दुश्टी से भी समझना जाएगा यूटिलिटेरल मतलब कि वो मेरे लिए क्या कर सकता है इंट्रिंसिक मतलब समय वास्तव में क्या है यहाँ पर कुंति महाराणी उस तरह से बता रहे है कि समय क्या है समय वास्तव में दुश्टी है मन्यितों कारंविशानम दिखें दबो आप स्वयम कार् ये आप स्वयम ही है कार् ये क्या है तत्वज्ञान, विज्ञान सब के लिए बड़ा बड़ा बड़ा बड़ा समस्यान की बात है अभी आइन्स्टाइन जो बड़े ख्यात विज्ञानिक थे उन्होंने कहा कि जैसे तीम डामेंशन्स होते है लेंग, ब्रेट, वैसे टाइम ये चौथा डामेंशन है विश्वमें ये बाकी उंची, उजाएं, चोडाएं, लंपाएं जैसे होती है वैसे ही एक और मात्रा है पर इस विचारदारा में समस्या ये होती है कि बाकी सब मात्राएं है उन्होंने हम उपर भी जा सकते हैं मुंचाएं को बड़ा सकते हैं, कम कर सकते हैं पर समय जो है केवल एक ही दिशा में जा सकते है समय में हम केवल आगर जा सकते हैं पिछली जा सकते हैं तो समय को जब हम बाकी सब मात्राओं के समाथ बढ़ लेते हैं तो वह अपूर्णा संकल्पना है तो वास्तव में समय क्या है यह भगवान की शक्ति है भगवान का ही इस जगत में भूप है तो कैसे भगवान का भूप है यह भगवान सबके नियंत्र है तो इस भगवान जगत में जो जीवात्मा भगवान का नियंत्र सुखार नहीं करते हैं सब लोग आ गए हैं तो वो क्या करते हैं वो समय के नियंत्रें में आ जाते हैं तो हमें समय कम पढ़ता है और जब उत्तियों आ जाती है समय जब आ जाता है तो हम सबको चला जाना पढ़ता है हम भले कि भगवान का नियंत्र सुखार नहीं करें काल हमें ज़रूर नियंत्र करता है और यह काल किसी प्रकार का नियंत्रें चलता है जो भगवान बताते है तो दीता के 11 अध्याय में जो वो विश्व रूप दर्शन लाते हैं तो तबी जो उसमें काल रूप दिखा ले और अर्जुन ये भ्यावः रूप देखते है कि सारे कौरो सेना जो उनके मुँ में जा रही है कून से लकपत हो रहा है उनका मुँ और वो देखते है कौन हां भवा आख्यान हे भवा उब्र मुँ को कौन हां तबी भगवान बते है कालोस और वह तबी काल की एक विशेष्टा बताते है बुन बताते है क्या है वहाँ?
लोकम शेह भूत करता है लोकम शेह सब लोकों का नाश करता है तो यहाँ भगवान कहते है काल ये ऐसा रूप है मैयनी रूप ये ऐसा रूप है जो नाश करता है वास्तव में जो काल है वह परिवर्तन करता है सृष्टि करता है, पालन करता है, नाश करता है बातिक चीज़ों, बातिक जगत में ये तीम परिवर्तन को दिरेंते हैं तो आध्यात्मिक जगत में भी काल है पर किस लकारा काल है? वह काल जो है इस जगत में काल नियंत्रन करता है और विनाश करता है आध्यात्मिक जगत में काल नहीं तो नियंत्रन करता है ना विनाश करता है जब भगवान गोपियों के साथ रास्थीला कर रहे है तभी वह अपने घड़ी को नहीं देखते है नहीं भगवान क्या करते है?
जो समय को विस्तारित करते हैं एक रात को प्रमाजी की रात बना रहे है तो आध्यात्मिक जगत में समय है पर समय नियंत्रत नहीं है नियंत्रत है समय भगवान का सेवक है और भगवान की इच्छा के अनुसार समय विस्तारित होता है ताकि लीला का आर्म असाथ स्वाद हो सके तो इस भौतिक जगत में कुछी महाराणी कहते है मन्ये तौंकालं इशानं तो अभी वो काल जो है वो इशानं यह इश्वर है और किस लकार का इश्वर है अनाँधिनिननंविभू इसकी कोई शुरुवात नहीं है इसकी कोई अंत नहीं है तो भगवानीता में भिग्रूती जोगां बताते है भगवान अहं एवाक्षयः कालो अहं एवाक्षयः जो काल है वो ही भगवानीता में बता रहे है कालो से योग क्षे चुत्रू तो काल सब चीज़ों का क्षे करता है सब चीज़ों का विनाश करता है पर काल जो है अग्षयः है काल जो है अग्षयः है काल जो है अग्षयः है उसका कोई परिवर्तन नहीं है कोई भी परिवर्तन नहीं है उसका और फिर क्या करते हैं वो आगे समय परिवर्तित नहीं होता है हम कहते हैं कि ये समय अनुपूर्थ है ये समय कृतिकूर्थ है ये कोई अगर जोति शास्त देखते है कोई मंगल समय है ये अमंगल समय है पर वास्तर में वह समय मंगल अमंगल नहीं है हम पे समय का जो प्रभाव हो रहा है वह मंगल अमंगल है समय जो है वह अनाधिरि दर्म के भूत है समंचरंतं सर्वत्र वह बताती है प्रभो आप और आपका काल संकित्र समाओं समाओं चरंतं सर्वत्र आप कोई जो भेद नहीं करते हैं अगर इस दुनिया में भेद होता है वह हमारे कर्मों का पल के रूप में होता है वेदांत शुत्रों में इस पे बिस्सारे तो चर्चा होती है तो वेदांत शुत्रों में बताये गया है कि वास्ता में भगवान जो है वह एक प्रधान कारण है पर वह तुलन्त का कारण ही है He is the ultimate cause, not the immediate cause वह जो है प्रधान कारण ही जैसे बारिश होती है तो बारिश सब प्रकार के फलुलो के बढ़ने के एक कारण है इसका प्रकार के पलपु.. इसने पेट पेट अधिस्य के परुवने को बारिश नहीं उठा ना पर वो जाकता है या को ईस की भीज का कारण के बात पर अधान के इसे प्रण पर day नल है शिक्ड़े करते हैं लेकिन कल भूता ना या निखा करते हैं तो इस दुन्या में जो लोगों के एक भेद होता है उसके कारण इसमें वैर होता है कलह होता है जग्ड़ा होता है युद्ध में होता है वह भूता ना होना होता है उसके लिए भगवान जिन्मेदार नहीं है उसके लिए कौन जिन्मेदार है वह जीवात्मा ही जिन्मेदार है बहुत कुंते महाराणी आप ये सब एसे तो ग्यान क्योंं बोत रहे हैं बिश्कर श्रुप में उन्हें बताया कि ए प्रभो आप जो आपका सरक्षन अच्छे वित्य है तो अभी वह भगवान के सरक्षन से भगवान की लीलां के हो जा रही है और उन लीलाओं में भगवान कैसे कभी लगता है पक्षपात करती है भगवान जो थे उन्होंने पांड़व का पक्ष लिया आपका सरक्षन अच्छे वित्य है तो भगवान पक्षपात करती है तो वो जो भगवान के पक्षपाती के परी जो आरोग लगाते है लोग उसको वो प्रतिकार करने वाली है उसको तयार कर रहे है भगवान की लीलां समंचरंतं सर्वंत्र है नहीं पर आप सुना है तो बोल दाई मन्येतों कालंपी शानं मन्येतों कालंपी शानं अनाधिन धनविभो अनाधिन धनविभो समंचरंतं सर्वंत्र समंचरंतं सर्वंत्र भूतानां यन्मिथाकली इसके बाद में बड़ी कुंती महारानी अगले श्रोंक में बताती है कि इस सझ से भगवान अपनी अपनी लीलाई करते हैं तो भगवान की लीलाई हम कैसे समझ नहीं पाते हैं नवेद कश्चितमं चिकीरशित तवेहमानस्चिनना पिरंपन देश्ट कश्चित दैतो सभी जविजिन।
विश्चस्च विश्चमा मते हुणना तो कहती है नवेद कश्चितमं कोई भी सभिश्चनी पाता है। भगवं चिकीरशितम् चिकीरशितम् मते आपकी लीला है। भगवान आपकी लीला है तो सभिश्चनी पाता है।
तवेहमानस्य तव आपकी हमानस्य इस चदत में एक साधारन मानों की समान लीला करती है। तवेहमानस्य ब्रंबनं ब्रंबनं ब्रंबनं आप जन साधारन लोगों क्या करते हैं ब्रंबनं बोहित करते हैं सब उसने उलजन पर जाते हैं क्या हो रहा है? तवेहमानस्य ब्रंबनं ब्रंबनं नयस्य कश्चित तैंतो स्थिकरभिचे आपके लिए कोई दैत नहीं है आपके लिए कोई प्रिय नहीं है नयस्य कश्चित तैंतो स्थिकरभिचे विश्यस्य यस्वि विशेमा मत्यविर्णा नहीं आप किसी के परती लेश करते हैं तो वो कह रही है कि प्रभों आप पक्षपात नहीं करते हैं आपके लिए कोई प्रिय है और नहीं कोई अप्रिय है तो भगवान अगर पक्षपात नहीं करते हैं तो भगवान देवताओं का पक्षी लेते हैं असुरों के विरुद जाते हैं ऐसी क्योंं करते हैं तो यहां समझने के लिए हमें भगवान की निरम्बेश्यता जो है वह अच्छी तैसे लग जाएँ भगवान कि कृष्णा इस नूट्रल है पर इस नूट्रालिटी नहीं पक्षपात नहीं करते है इस नूट्रालिटी नहीं पक्षपात नहीं करते है यह प्रियसिक प्रॉंस है बतलब क्या भगवान पत्थर के समाल नहीं है पत्थर को कोई मालिजे यह लकड़ी है इसको मैं मालिश करता हूँ या उसको मालिश करता हूँ दोनों से कुछ फरक नहीं पड़ता है क्योंंकि पत्थर निरजीव होता है पत्थर निरजीव है तो इसलिए पत्थर में पर कैसे भी वेवहार करेंगे उसको कुछ फरक नहीं पड़ता है पर अगर कोई व्यक्ति इस परकार का वेवहार करता है व्यक्ति अगर इस परकार का वेवहार करता है तो फिर उस व्यक्ति से सममन्ध हम सममन्ध जोडते हैं तो क्या हम स्नेह का आदान करना करते हैं तो प्रिश्णा है नूट्रल पर व्यक्ति रसीप्रूकर है क्या है रसीप्रूकर मतलब वो आदान जोडान करते हैं तो भगवान जो उनके मते अधिक शरानालत होते हैं वह उनके में अधिक स्नेह करते हैं तो यह पक्षपाती नहीं है क्योंंकि भगवान सबको मौका देते है कि सब आप उससे सममन्ध जोड सकते हैं और सब मेरे से स्नेह का आदान करना कर सकते हैं तो प्रिश्णा इंपार्शेली पार्शी इंपार्शेली पार्शी मतलब क्या है वह पक्षपाती है किस विराद पक्षपाती है जो उनसे स्वेह करते हैं जो उनके पक्षपाती करते हैं वह उनको खील सारक्षेल देते हैं पर भगवान सब को अपने पक्षपाती करने का मौका देती किसी को उस बक्ति के मौके से वह वाँचित नहीं रखते हैं तो इसलिए भले ही भगवान पक्षपाती है वह निरम्पेक्ष रूप से पक्षपाती है मतलब क्या वह अपने बक्तों का पक्ष देते हैं और सब को बक्त बनाने का मौका देते हैं तो भगवान इदा के नावे अध्याय के उन्दिती सुश्लोग में बोलते हैं वह दोनों चीज़ें बोलते हैं समोहं सरोडू तेशु नवीधे शोस्टी नत्रिया ये बजन तुत्रमा हुँ भग्या मैं तेशु तेशु पाप्य हुँ वह कहते हैं कि मैं सबके परते समाल हुँ पर तिर भी वह कहते है जो मेरा भजन करते हैं वह भगवान बड़ा ही निकट सम्मन दर्शते है मैं ते वह कहते हैं मैं उन में हुँ और वो मुझ में हुँ तेशु चाप्य अनुभुल हुँ और वह भगवान कहते है ये जो मौंका है सब के लिए है और एक-दो-थी श्लोक की बाद में जो 32 शलोक है ये 29 शलोक है 32 शलोक में भगवान बोलते है नव्य अज्ञाय के कि वह कहते है कि सब परकार के लोग उनके पास के हुमे कुछ भी हो बले ही पापी की होना वो सब मेरा अश्रित खेल कर सकते है और उससे परांगती प्रापत कर सकते है तो भगवान क्योंंकि वे आदान प्रदान करते है इसी लिए वास्तव में उनसे प्रेम करना ये रसमै हो जाना है अभी ये कोई पत्थर है, लकडी है वह वास्तव में निर्जी है, वो भी आदान प्रदान नहीं करती है उससे कोई प्रेम नहीं कर सकता है तो क्योंंकि कृष्णा को अश्रित करता है इसी लिए वास्तव में, नहीं वास्तव में अगर भगवान सिर्फ निर्पेक्षर है, पत्थर के समान तो उनको भी प्रेम नहीं कर पाए क्योंंकि भगवान आहान प्रदान करती है हर एक भक्त से अपने वो भक्त के जो भाव है उसके अनुसार वो आदान प्रदान करती है यहाँ तो कि जिवगोष्वामे की संदर्वों में बताते है संदर्व ये बड़े तत्वग्यान के ग्रंथ हैं जिवगोष्वामे ने लिखे रहे हुए उसमें बताते हैं कि आध्यात्मिक जगत में अनंत जीव है और भगवान के अनंत गुण है तो भगवान के सब गुण बक्तों को आक्षित करते हैं पर हरे एक बक्तों को आक्षित करने के लिए भगवान का एक विश्वीश गुण है तो आप को आक्षित करने के लिए भगवान का विश्वीश गुण है तो भगवान के लीलावों कोई समझ नहीं पाता है जब लोग आते हैं भवतिक जगत मेरी बगवान आते हैं भवतिक जगत मेरी तो जन साधारन लोग उनको समझ नहीं पाते हैं तो दुर्योधन एक ही नहीं था उसमें भगवान का विश्वरूप भी देखा नवेट नवेट नयस्ते कश्चित दैतो उस्तिकाहेचे तो अभी वो पांड़ाओ के प्रती पक्षिपात कर रहे हैं अगर हम देखेंगे महाभारत में तो यह पक्षिपात नहीं है क्योंंकि भगवान सबको मौका देते हैं भग्यान शानटि दूध के रुपने जाते हैं दुर्योधन के पास और उसको भी मौंका देते हैं भगवान तो बकुज troubled चली राजा है वो साधरन्त है राजा जो हे वो दूध के रुप नहीं जाता है दूत का जो सेवा होती है तो कोई नीचने विक्ति करता है पर भगवान स्वयम दूत के रुप में जाते हैं और वो क्योंं जा रहे हैं?
दूरियोदिन को मौका लेने के लिए वास्तव में जब भगवान जाते हैं उसके पाले पांड़वों में और क्रिष्ट भगवान में चर्चा हो रही है महाभारत के उद्योग पर्व में वरना आता है महाभारत में अठ्रा पर्व है उसमें जो युद्ध हैं वो छटे पर्व से दस्वे पर्व तक बता है तो उसके पहले जो पर्व आता है उद्योग पर्व उद्योग मतलब कारी वासता में ये नाम बहुत उचिन किया है क्योंंकि उद्योग मतलब कारी या मेहनत सारे पांडव बड़ी मेहनत करते हैं कि युद्धा नोगे तो पूरे उद्योग पर्व में यही उद्योग है कि कैसे युद्धा टाला जाए तो उसमें पुरिश्मवास्तमें तीन अदां प्रदान होते हैं युद्धा टालने के लिए जब अध्यानत्वास खतम हो जाता है तो दुरुपद विराट के राज्ये में आ जाते हैं और दुरुपद का एक ब्रामभण वो भेशते है कौरो के पास कि अभी वनवास का समय खतम हो गया कृपय पांडव का राज्या बुना दे देजेगे तो उसके पाद में धुतराष्ट संझय को भेशते हैं और धुतराष्ट बड़े धूर्त होते हैं वो कहते हैं संझय की संधिस क्या भेशते हैं इस दुनिया में जो भी हम प्राप्त करते हैं उसको हमें त्यागना है व्यक्ति ग्रहस्त बनता है बाद कि उसको वानप्रस्त लेना ही है तो तुम मारा इतना भागे तुम अभी वानप्रस्त बन गये हो तो पुना ग्रहस्त क्योंं बनना है तो जो बाद में प्राप्त करना है वो भी प्राप्त कर लिया है तो अभी आसक्ति में मत बढ़ो और तुम बनवास में हो तुरेदन को राजा बने रहे है तो तत्मग्यायन क्या इस तरह से वो दून तो इस्तेमाल करने का प्रयास्ते है तो तत्मग्यायन क्योंं जवाब देते है कि वास्तव में मुझे कोई आसक्ति नहीं है पर मेरा यह करता हुए नहीं है भगवान कृष्ण की इच्छा है कि मैं राजा बना हूँ और जो व्यक्ति अगर कोई ब्रह्मचारी बनना चाहता है तो वास्तव में मुझे कोई आसक्ति नहीं है पर मेरा यह करता हुए नहीं है पर मुझे राजा बनना चाहता हूँ इसलिए मुझे राजा चाहिए और उसके आपने कृष्ण भगवान जाते हैं और वो क्या कहते हैं तो केवल पाँच आप घाव दे देजी तो इससे हैं हम देखें तो जबी उसमें बारतालाव करता है पांडव और कृष्ण नहीं तो तबी पांडव कहते हैं, भीम कहते हैं कि आस्तो में हम जानते हैं कि दुर्योधन मानने वालां नहीं है कृष्ण कहते हैं मैं भी जानता हूँ नहीं पर फिर भी मैं दिनियां को दिखा चाहता हूँ कि आपने पूरा प्रयास किया कि युध को टाला चाहें तो इस तरह से भगवान क्या करते हैं सब को मौका देते हैं दुर्योधन को भी मौका देते हैं तो इसलिए भगवान किसी के बीच पक्षिपात नहीं करते हैं सब को भगवान मौका देते हैं जो मौका स्विकार करता है वो भाग्यमान बन जाता है भगवान को एक बार पूछा गया था क्या आपके सब शिष्यों से समान मुख से प्रेम करते हैं भगवान को नहीं करते हैं पर जो जुल्मेदारी जुकार करने आगे आते हैं उनके साथ भिषेश आगे आगे आते हैं माता पिता है वो अपने सब संतानों से समान प्रेम करते हैं पर कोई अगर भिषेश आगे आगे आजाता है माता पिता को अपनी जुल्मेदारी मज़ब करते हैं तो स्वभाविंद है वो इसके लिए हम और बन जाता हैं तो भगवान का भी वैसे भी भाव तो इस लोक में कुंटी महारानी बता रही है कि आप भेज नहीं करते हैं तो भी भगवान की लीलाओं में भेज नहीं करते हैं तो वो अवतार लेते हैं तो भी अवतार का यह तत्व है उसके बारे में कुंटी महारानी तीस्विश लोक से चर्चा करती है तो उसके बारे में 32 स्विश लोक से विष्टारे से चर्चा करती है और उसके ओर अगर सद्वई तो भगवान की लीलाओं कम होती हैं जब वो अवतार लेते हैं आध्यात्मी जगत में लीलाओं हम यहां पर देख नहीं सकते हैं तो अभी वो बताती है कि आप जब अवतारित होते हो आपके लीलाओं अच्छीन के हैं आपका जो पक्षपात नहीं करना वह अच्छीन के हैं तो अभी आप जो रूम लेंदे हो वह भी अच्छीन के हैं वह कहती है जन्म कर्म च विश्वात्मन हे आप जो आप मेरे सामने देख खड़े हो पर आप कौन हो सारे विश्वों के आत्मा हो जो परमात्मा सारे विश्वों के अंदर होते हैं आप वो दी हो जन्म कर्म च विश्वात्मन वह बताती हैं यहाँ पर विरूद्ध की शब्द इस्तिमाल कर रही है अजिस्या कर्तुर आत्मन हा वह बताती है जन्म ले रहे हैं पर आप क्या हो आजय हो आपको कभी जन्म नहीं होना हो जन्म कर्म च विश्वात्मन वह बताती है यहाँ पर विरूद्ध की शब्द इस्तिमाल कर रही है अजिस्या कर रहे है पर आपको कभी जन्म नहीं हो आजय हो आपको कभी जन्म नहीं हो आजय हो आजय ह तो उसमें क्या समझना है उसकी जो एक बिरम्मणा है समझने मिश्किलें बता रहे है कि आप आजय हो पर जन्म लेते हैं आप कुछ कारण नहीं करते हैं फिर भी आप कारण करते हैं तो भगवान चाहिए तो अजय अगर इस शप्ते का आर्था क्या है कि आप का जन्मन ही होगा है अभी जन्म का आर्था क्या है कि जादानत्या वेदे से पता रहे है जन्म और मुत्यू साथ में होगी अगर जन्म हो गया तो मुत्यू होगी तो भगवान को जब अजय बताया गया है उसका मतलब क्या है कि मैं काल के परे भगवान काल के परे वकाल के अधिन्यती कि जब भगवान को अजय बताया गया है उससे क्या बता जा रहा है कि आप शाश हो रहे हैं आप काल के प्रभाव से परे हैं आप उसके प्रभाव में नहीं आते हैं तो भगवान काल के परे आध्यातमी चिगत में रहते हैं और वहाँ से सिर्फ लीला के लिए वो इस भौतिर चिगत में आते हैं और लीला करके पुना चल जाते हैं वह प्रभावित नहीं होते हैं इस भौतिर चिगत में आते हैं तो वह बता जा रहा है कि आप अजव हो और जन्म लेते हैं जन्म लेते हैं वह क्या है?
एक धर्म की संकलपना है भगवान की और एक तत्व ज्ञान की संकलपना है भगवान अभी तत्व ज्ञान की संकलपना जो है भगवान की वह क्या है? कि भगवान परिपूर्ण है भगवान हर तरह से पूर्ण है उनको कुछ चाहिए नहीं उनको कुछ जरूरत नहीं क्योंंकि अगर भगवान को कुछ करना पड़ता है भगवान को कुछ कारे करना पड़ता है तो फिर वो कारे क्योंं करेगे भगवान? चाहिए उनको कुछ कमी महसूस हो रही है चाहिए उनको कुछ चाहिए हम कारे करते हैं क्योंं कारे करते हैं?
यह हम नौकरी करते हैं क्योंं? क्योंंकि हमकों पैसा चाहिए हम कुछ भी कारे करते हैं उनको करने के लिए कुछ हेतु होता है तो तत्वज्ञान में चर्चा होती है कि अगर भगवान कुछ कारे करेंगे तो वो कारे करने के लिए उनको कुछ हेतु होना थी और अगर हेतु होगा तो मतलब उसके पहने कोई अपूर्ण है और अगर वो अपूर्ण है तो भगवान कैसे है? वो मरीपूर्ण कैसे है?
जो पास्च्यात्य संस्कुति में अरेस्टोटल नाम का एक तत्वज्ञान ही थे तो उन्होंने कहा कि गौड़ इस अन्मूर भूवर अपरिथि अन्मूर भूवर मतलब भगवान कुछ भी नहीं करते हैं पर वो सब चीज़ों की शुरुवाल है तो उनके तत्वज्ञान में एक समस्या आ रहे थी कि वो कुछ मू करेंगे ही क्या? अगर उनको कुछ करने की जुरुवाल नहीं है तो वो शुरुवाल थी क्योंं करेंगे? तो यह जो संकलपना है कि भगवान परिपूर्ण है इसलिए वो मिश्क्रिय है यह परिपूर्णता जो है यह उसमें कोई रस नहीं है और जो क्रिश्यल धर्म था उसमें भी यही भगवान की संकलपना है कि अगर बाइबन पढ़ते हैं तो बाइबन में जाधा तत्वज् कि आप ऐसे करो ऐसे करो मिथी के बारे में बता रहा है तो यह जो संकलपना है भगवान की यह बाइबन परिपूर्ण है कि एक जड़ परिपूर्णता जिसे अगर कोई चित्रकार चित्र बना रहा है तो अगर कोई चित्रकार होता है वो जानता है कि यहाँ प राज्ना के संगेर रचना है कि आभी यूटrió परिपूर्ण हो गएं और और रंग लगाए गएं तो ऐ तो एक रंग का एक ब्रश का और अगर सपर्श करेंगे तो वो जो परिपुर्णता चली जाएगे एक ब्रश का सपर्श कम करेंगे तो भी परिपुर्णता चली जाएगे तो वह जो स्तर है तभी वह परिपुर्ण तो ऐसे क्या है कि ये जो तक्त्व ज्ञान में भगवान की संकल्पना है कि गौड़ हैस्टु भी एक परिपुर्णता चली जाएगे कि भगवान परिपुर्ण है पर वह कुछ कारे करेंगे तो कारे क्योंं करेंगे क्योंंकि वह कुछ इच्छा है इच्छा है मतलब अपूर्णता है और अपूर्णता है तो फिर वह परिपुर्ण नहीं है तो इसलिए तक्त्व ज्ञान में भगवान की संकल्पना है उसमें भगवान ये एक जड़ परिपुर्ण बन जाते है परिपुर्ण तो यह जो तक्त्व ज्ञान है एक एवर पास्चात्य धन्सकुते नहीं बेदान सुत्र में भी इसकी चार्चारी भी है तो बेदान सुत्र में बिताते है कि क्या भगवान एक इस तरह से प्रोजन परफेक्शन है भगवान कुछ कारय नहीं कर सकते क्योंंकि वे परिपुर्ण हैं तो रामनु सुच्यार्या अपने श्रीभाषियों बताते हैं कि भगवान जब लीला करते हैं तो भगवान की लीला वो किसकमी के कारण नहीं है वो खेल के लिए एक लीला है जैसे कोई वेक्ति नौकरी करता है तो वो काम क्योंं कर रहा है इसको पैसा चाहता है पर वो बार्ण में जब घर आता है तो शायद अपनी बच्चे के साथ कुछ खेलता है तो वो जो खेल रहा है उसने उसको ज़रूरत नहीं जैसे वो दक्तर में जाता है पैसा कमाने के लिए उस तरह कोई हेतू खेल में नहीं है तो इससे हम कहते हैं बगवान की जीदा जो है वह केवल आनंद के लिए है तो बल्दे विद्ध्यमनुश्यां अपने जो वेदांचकत कात्पर हैं गोविंद भाष्चे में वो उसका और रस बताते हैं वो बोलते हैं कि यह बुच्चतु धारण नहीं है क्योंंकि कहते है अगर भगवान कुछ करते हैं आनंद के हेतु से भी करते हैं तो भी वे अपूर्ण हैं क्योंंकि उसका मतलब है वो कारे करने के पहले वो आनंदी नहीं है तो बोलते हैं कि भगवान की लीला जो है वो एक खेल नहीं है वो एक विद्ध्य है अभी खेल और रुद्ध में फ़रक क्या है वो बोलते है कि बहुत आनंदी होता है तो क्या होता है जब आनंद होता है तो वो नाचते लगता है तो the dancing is not done to become happy, the dancing is a result of happiness पर रुद्ध्य क्योंं कर रहा है आनंदी है इसे रुद्ध्य करना है तिक उसी तरह से कहते हैं भगवान की जीला वो आनंद प्राप्ति के लिए नहीं है वो आनंद अव्यक्त करने के लिए है तो इस तरह से भगवान अकर्तू है अकर्तू है मतलब उनको कारे करने के लिए कोई भौतिक हेतू नहीं है भगवान किसी तरह से अपूर्ण नहीं है पर अपनी पूर्णता दर्शाने के लिए वे कारे करें वह बताते है कि व्यक्ति जब कारे करता है तो एक पुरुष और स्तुरी एक और दूसरी के लिए आकर्ष्य होते हैं क्योंं?
क्योंंकि दोनों को लगता है कि हम अपूर्ण हैं तो इसलिए वह कहते हैं कि बेटर हाफ पूर्ण नहीं है तो भगवान पूर्ण है तो फिर भगवान इस तरह से अपूर्ण नहीं है तो भगवान कारे क्योंं करते हैं? तो कहते हैं कि भगवान का कारे क्योंं है? It is not to attain completeness but to share the joy of completeness. यहाँ पर इस भौतिक जगत में पुरुश औस्तरी अपूर्ण होते हैं इसलिए साथ में आते हैं पूर्णता प्राप्त करने पर भगवान जब अपूर्ण नहीं है वह पूर्ण है पर अपनी परिपूर्णता का आनंद व्यक्त करने के लिए और दूसरों को देने के लिए वह कारे करते हैं वह इसलिए में कहते हैं जब आप कारे करते हों कि आप अद्भूत रूप में प्रकरते हों कि आप मचली के रूप में, मानाव के रूप में, मचली के रूप में, मत से अवतार के रूप में अगर हम जो 84 लाक योंगिया देखते हैं, उन में जो मचलीया हैं, उनको सबसे निचेर रखा रहे हैं, तो तीरीय रूप होता है, वह उत्ता कोई उच्छा रूप नहीं है, पर ऐसे रूप में भगवान उपन होते हैं, आप प्रकरत होते हैं, जो कि भगवान अची तो किसी भौतिक चीज से प्रभाव के लिए होते हैं, विशिशु मतलब कि आप एक इशी के रूप में प्रकरत होते हैं, नर नारायन्ड इशी के लिए तो इस तरह से अगर कोई व्यक्ति है, उसको प्रकरत भी होना है, तो साधारा नितया, व्यक्ति बड़ी शक्तिशाली, आकरशक रूप में प्रकरत होता है, तो ताकि सब लोग मिलेगा आशिक हो जाए, पर भगवान ऐसे रूप में प्रकरत होते हैं, भावतम के दशंस, आफ़े स्कंग के चौबे स्वे अध्यायने, जब मत्स्यावतार का वर्मन आता है, तो वहाँ पे परिशित महाराज सवाल पूछते है कि जगन्य रूप, कि यह जो मचली का रूप है, यह तो कुछ अच्छा रूप नहीं, जगन्य, यह निचला रूप है, तो ऐसे रू किसी ज़ादाा चे पड़ी नहीं था जनूप करनो चविश्वात्मन अजस्शाऽ कर तुराँत्मन हां पीर्येंन्न शिषुयां गसो तद अ्त्यन्त विड़ां बरहां तो इसके बाद में भगवान की लीलाओं का वर्ण करती हैं।
उसमें जो अगर कार्टिक मास की बात कर रहे हैं उसका ही वर्ण हो रहा है। गोप्या ददे त्वई कृताग सिदामतावर् जाते दशाश्व का लीलांजन संब्रमाँचन संब्रमाँचन संब्रमाँचन सं सामाँप्रिगोख्यति यह उजीद मुझे विकने भीर अपियत्विभेति जो भगवान को भैवि जो भैव सुन है भगवान से भैवित हो जाता है और वह भगवान कैसे भैवित हो? तो अभी हम चेसा कर रहते हैं इसके लिए चित्र के परिपूर्णता क्या है?
एक निष्क्रियस दर पे अभी वो सबसे आकरशक बन गया है पर भगवान यह एक व्यक्ती है और भगवान के परिपूर्णता क्या है? भगवान के परिपूर्णता यह प्रेम का आदाम नहीं है So the perfection of love is not inactivity निष्कृयता यह प्रेम की परिपूर्णता नहीं है प्रेम की परिपूर्णता क्या है? की everything else stops so that love can go कि जो प्रेम का आदाम लगना एक प्रेम का काव़ नहीं है वही चले और बाक की सब बनद हो जाए जब भौतिक स्थर पे भी कोई कावे लिखते हैं कोई प्रेम के पारे में कावे लिखते हैं तो लोग कहते हैं कि एक लड़का और एक लड़की एक उसे को देखते हैं तो वह कहते हैं कि जब मैंने आपके आखों में देखा तो भगवान अपना परमपद हैं इसको त्याग कर देते हैं, जिसलिए कि प्रें परमपद पे आ जाएं।
तो आध्यात्मी जगत में भगवान सरसेष्ट नहीं है, प्रें सरसेष्ट हैं। और यह प्रें, वास्तों में एशेडमायी जो बांती है कि प्रें का विजय है। दितक्रेवं दामों वेरं, भक्ति बढ़्डं, भक्ति से बांदे गरें।
आध्यात्मी जगत में प्रें राजा है, भगवान राजा नहीं है।