प्रस्तुत प्रवचन में कुंती महारानी द्वारा की गई स्तुतियों के आधार पर भगवान के काल रूप, उनकी निष्पक्षता और उनकी मधुर लीलाओं के गूढ़ तत्वज्ञान का वर्णन किया गया है। इसका मुख्य सारांश निम्नलिखित है:
श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कंध में वर्णित कुंती महारानी की स्तुतियों पर आधारित एक गहन विवेचन। इस लेख में हम काल का स्वरूप, भगवान की निरपेक्षता, और उनकी मधुर लीलाओं के पीछे के गूढ़ तत्वज्ञान को समझेंगे।
हमने कुंती महारानी की प्रार्थनाएं जो श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कंध के आठवें अध्याय में हैं, ये अठारहवें श्लोक से तैंतालीसवें श्लोक तक आती हैं। इसके बारे में हमने तो अभी तक दो प्रवचनों में चर्चा की है। पाँच-पाँच श्लोक हमने हर प्रवचन में लिए थे।
इसका जो ओवरव्यू अगर हम देखते हैं, इसमें क्या चल रहा है? सबसे पहले कुंती महारानी बोलती हैं कि हे प्रभो! आपका जो स्तर है, आपका जो पद है, आपकी जो स्थिति है, वह अचिन्त्य है; इसके लिए पहले पाँच श्लोक हमने कर दिए। फिर इसके बाद में आपका संरक्षण जो है वह अचिन्त्य है। फिर इसके बाद में अभी जो हम चर्चा करेंगे कि आपकी जो लीलाएं हैं वे अचिन्त्य हैं, और फिर अंत में वह निवेदन करती हैं कि हे प्रभो! आप अपनी अचिन्त्य पदवी से मेरा संरक्षण करेंगे, और उसमें असली संरक्षण क्या है कि मेरी चेतना सदैव आपकी ओर ही जाती रहे जैसे गंगा सागर की ओर जाती है।
भगवान काल के रूप में
तो इसमें हम अभी 28वें श्लोक से शुरू करेंगे। हमने 27वें श्लोक तक देखा था, उसमें वो बताती हैं कि हे प्रभो! साधारण लोग चाहते हैं कि संरक्षण मतलब क्या हो कि समस्या ना आए। कुंती महारानी प्रार्थना करती हैं कि समस्या आए, क्योंकि इससे मैं आपकी शरण लूंगी, और आपकी शरण लूंगी तो पुनः भौतिक जगत में मुझे वापस भौतिक शरीर में आना नहीं पड़ेगा। तो अभी बहुत तत्वज्ञान के स्तर पर जा रही हैं और यहाँ पे 28वें श्लोक में बता रही हैं कि हे प्रभो! आप कैसे काल के रूप में प्रकट हैं:
मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम्।
समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः॥ (भागवतम् 1.8.28)
तो यहाँ बता रही हैं कुंती महारानी – ‘मन्ये त्वाम्’ मैं मानती हूँ ‘कालम् ईशानम्’ – ईश मतलब ईश्वर। आप कौन हो? आप काल हो। और क्या आपका स्वभाव है? ‘अनादिनिधनं विभुम्’ – आपकी कोई शुरुआत नहीं है, आपका कोई अंत नहीं है। ‘समं चरन्तं सर्वत्र’ – आप सबके प्रति समान भाव से आदान-प्रदान करते हैं। तो इस दुनिया में हम जो भेद देखते हैं और भेद के कारण वाद-विवाद होते हैं, युद्ध होते हैं, वो क्यों होते हैं? ‘भूतानां यन्मिथः कलिः’ – वो एक-दूसरे में परस्पर वैर है, उसके कारण होते हैं।
तो वास्तव में ये चारों जो पंक्तियाँ हैं इस श्लोक में, अलग-अलग तत्व बताए जा रहे हैं, वो बहुत गूढ़ तत्व से संबंधित हैं। तो हम एक-एक पंक्ति देखते हैं – ‘मन्ये त्वाम् कालम् ईशानम्’। हे प्रभो! आप काल हो। तो इस दुनिया में हम सब देखते हैं कि काल जो है, वह एक बहुत बड़ा नियंत्रक है। हम कहते हैं कि कई बार अगर कोई हमको बुलाता है, आप इसके लिए आ जाओ उसके लिए, हम कहते हैं मेरे पास समय नहीं है।
समय का वास्तविक मूल्य
तो जब हम कहते हैं मेरे पास समय नहीं है, इसमें हम वास्तव में क्या बता रहे हैं, अगर हम सोचें तो? कि वास्तव में हम समय के नियंत्रण में हैं, क्योंकि हम बहुत कुछ करना चाहेंगे पर समय मर्यादित होने के कारण हम कर नहीं पाते। तो कुछ लोग कहते हैं “time is money”, कुछ लोग कहते हैं कि समय ही पैसा है, कुछ लोग कहते हैं समय पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। चाणक्य पंडित कहते हैं कि एक पल समय जो है, वहाँ स्वर्ण कोटि मुद्रायें भी हम दे दें, तो भी हम उस एक पल को पुनः प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तो समय ये वास्तव में धन से भी अधिक मूल्यवान है क्योंकि time is irrecoverable and unstored। जो पैसा है, वो अगर चला गया तो हम पुनः प्राप्त कर सकते हैं और हम उसको संचित करके रख सकते हैं। पर हम समय को संचित नहीं कर सकते हैं। समय जो है, हर पल हम उसको व्यतीत कर ही रहे हैं, उसको खर्चा कर ही रहे हैं। तो पैसा हम संचित कर सकते हैं, हम समय संचित नहीं कर सकते हैं।
इसलिए हमें बहुत गंभीर होना चाहिए, अगर मैं खर्चा कर ही रहा हूँ तो कैसे खर्चा कर रहा हूँ, उसके लिए। और पैसा हम गँवा भी दें तो पुनः प्राप्त कर सकते हैं मेहनत करके, पर जो समय है उसको पुनः प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
तो यहाँ जो समय के मूल्य को समझना है, यह अच्छा है कि समय इतना मूल्यवान है, पर यहाँ भी दृष्टि तत्वज्ञान की दृष्टि से पूर्ण नहीं है। यह केवल समय का उपयोग समझना है। समय का समझना मतलब कि समय मेरे लिए क्या कर सकता है, उस आधार पर हम समय को मूल्य देते हैं। पर शास्त्र बताते हैं कि समय को हम सिर्फ यूटिलिटेरियन (utilitarian) दृष्टि से नहीं, इंट्रिंसिक (intrinsic) दृष्टि से भी समझना चाहिए। यूटिलिटेरियन मतलब कि वो मेरे लिए क्या कर सकता है। इंट्रिंसिक मतलब समय वास्तव में क्या है।
भगवान और काल का सम्बन्ध
यहाँ पर कुंती महारानी उस तरह से बता रही हैं कि समय क्या है। समय वास्तव में दृष्टि है – ‘मन्ये त्वाम् कालम् ईशानम्’। हे प्रभो! आप स्वयं काल हैं। काल क्या है? यह तत्वज्ञान, विज्ञान, सबके लिए बहुत बड़ी समस्या की बात है। अभी आइंस्टाइन, जो बड़े विख्यात वैज्ञानिक थे, उन्होंने कहा कि जैसे तीन डायमेंशंस (dimensions) होते हैं – लेंथ, ब्रेड्थ, वैसे टाइम ये चौथा डायमेंशन है विश्व में। ये बाकी ऊँचाई, चौड़ाई, लंबाई जैसे होती हैं, वैसे ही एक और मात्रा है। पर इस विचारधारा में समस्या ये होती है कि बाकी सब मात्राएं जो हैं, उनमें हम ऊपर भी जा सकते हैं, ऊँचाई को बढ़ा सकते हैं, कम कर सकते हैं। पर समय जो है, केवल एक ही दिशा में जा सकता है। समय में हम केवल आगे जा सकते हैं, पीछे नहीं जा सकते हैं। तो समय को जब हम बाकी सब मात्राओं के समान मान लेते हैं, तो वह अपूर्ण संकल्पना है।
तो वास्तव में समय क्या है? यह भगवान की शक्ति है, भगवान का ही इस जगत में रूप है। तो कैसे भगवान का रूप है? भगवान सबके नियंत्रक हैं। तो इस भौतिक जगत में जो जीवात्मा भगवान का नियंत्रण स्वीकार नहीं करते हैं, सब लोग आ गए हैं, तो वो क्या करते हैं? वो समय के नियंत्रण में आ जाते हैं। तो हमें समय कम पड़ता है, और जब मृत्यु आ जाती है, समय जब आ जाता है, तो हम सबको चला जाना पड़ता है। हम भले ही भगवान का नियंत्रण स्वीकार नहीं करें, काल हमें ज़रूर नियंत्रित करता है।
और यह काल किस प्रकार का नियंत्रण चलाता है, जो भगवान बताते हैं। गीता के 11वें अध्याय में जो वो विश्व रूप दर्शन दिखाते हैं, तो उसमें काल रूप दिखाते हैं। और अर्जुन ये भयावह रूप देखते हैं कि सारी कौरव सेना उनके मुँह में जा रही है, खून से लथपथ हो रहा है उनका मुँह। और वो पूछते हैं हे प्रभो! यह उग्र रूप कौन है? तभी भगवान बताते हैं – ‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो’। और वो तभी काल की एक विशेषता बताते हैं, क्या है वो? सब लोकों का क्षय (नाश) करता है।
तो यहाँ भगवान कहते हैं काल मेरा ही ऐसा रूप है, जो नाश करता है। वास्तव में जो काल है, वह परिवर्तन करता है। सृष्टि करता है, पालन करता है, नाश करता है। भौतिक चीज़ों, भौतिक जगत में ये तीन परिवर्तन को निर्देशित करता है। तो आध्यात्मिक जगत में भी काल है, पर किस प्रकार का काल है? वह काल जो है, इस जगत में नियंत्रण करता है और विनाश करता है, परन्तु आध्यात्मिक जगत में काल न तो नियंत्रण करता है, न विनाश करता है।
जब भगवान गोपियों के साथ रासलीला कर रहे हैं, तभी वह अपनी घड़ी को नहीं देखते हैं। भगवान क्या करते हैं? समय को विस्तारित करते हैं। एक रात को ब्रह्माजी की रात के बराबर बना देते हैं। तो आध्यात्मिक जगत में समय है, पर समय नियंत्रक नहीं है, समय भगवान का सेवक है। और भगवान की इच्छा के अनुसार समय विस्तारित होता है, ताकि लीला का आस्वादन हो सके।
काल की समानता और जीवात्मा के कर्म
तो इस भौतिक जगत में कुंती महारानी कहती हैं – ‘मन्ये त्वाम् कालम् ईशानम्’। तो अभी वो काल जो है, वो ईशानम् यानी ईश्वर है, और किस प्रकार का ईश्वर है? ‘अनादिनिधनं विभुम्’ – इसकी कोई शुरुआत नहीं है, इसका कोई अंत नहीं है। तो भगवद्गीता में विभूति योग में बताते हैं भगवान – ‘अहमेवाक्षयः कालो’। जो काल है, वो ही भगवद्गीता में बता रहे हैं कि काल सब चीज़ों का क्षय करता है, सब चीज़ों का विनाश करता है। पर काल जो है, वह स्वयं अक्षय है! उसका कोई क्षय नहीं होता, उसका कोई परिवर्तन नहीं होता है। समय स्वयं परिवर्तित नहीं होता है। हम कहते हैं कि ये समय अनुकूल है, ये समय प्रतिकूल है। अगर कोई ज्योतिष शास्त्र देखते हैं – ये मंगल समय है, ये अमंगल समय है। पर वास्तव में वह समय मंगल या अमंगल नहीं है, हम पर समय का जो प्रभाव हो रहा है, वह मंगल या अमंगल है। समय जो है वह ‘अनादिनिधनं विभुम्’ है।
‘समं चरन्तं सर्वत्र’ – वह बताती हैं, हे प्रभो! आप और आपका काल सर्वत्र समान रूप से विचरण करते हैं। आप कोई भेद नहीं करते हैं। अगर इस दुनिया में भेद होता है, वह हमारे कर्मों के फल के रूप में होता है। वेदांत सूत्रों में इस पर विस्तार से चर्चा होती है। तो वेदांत सूत्रों में बताया गया है कि वास्तव में भगवान जो हैं, वह एक प्रधान कारण हैं, पर वह तुरंत के (immediate) कारण नहीं हैं। He is the ultimate cause, not the immediate cause. वह जो हैं, प्रधान कारण हैं। जैसे बारिश होती है, तो बारिश सब प्रकार के फलों-फूलों के बढ़ने का एक कारण है। विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों के उगने में बारिश भेदभाव नहीं करती ना। पर जो उगता है, वो उस बीज के कारण होता है। बीज अपने प्रकार के पेड़ को जन्म देता है, यद्यपि बारिश सब पर समान गिरती है। उसी प्रकार ‘भूतानां यन्मिथः कलिः’।
तो इस दुनिया में जो लोगों में एक भेद होता है, उसके कारण इनमें वैर होता है, कलह होता है, झगड़ा होता है, युद्ध भी होता है। वह भूतानां यन्मिथः कलिः होता है। उसके लिए भगवान ज़िम्मेदार नहीं हैं। उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? वह जीवात्मा ही ज़िम्मेदार है।
पर कुंती महारानी, आप ये सब ज्ञान क्यों बोल रही हैं? पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि हे प्रभो! आपका जो संरक्षण है, अचिन्त्य है। तो अभी वह भगवान के संरक्षण से भगवान की लीलाओं की ओर जा रही हैं। और उन लीलाओं में भगवान कैसे कभी लगता है पक्षपात करते हैं? भगवान जो थे, उन्होंने पांडवों का पक्ष लिया। आपका संरक्षण अचिन्त्य है, तो भगवान पक्षपात करते हैं? तो लोग जो भगवान पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते हैं, उसका वो प्रतिकार करने वाली हैं। उसके लिए भूमिका तैयार कर रही हैं कि भगवान की लीलाएं ‘समं चरन्तं सर्वत्र’ हैं।
भगवान की लीलाओं की अचिन्त्यता
इसके बाद में कुंती महारानी अगले श्लोक में बताती हैं कि किस तरह से भगवान अपनी लीलाएं करते हैं, और भगवान की लीलाएं हम कैसे समझ नहीं पाते हैं:
न वेद कश्चिद् भगवंश्चिकीर्षितं तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम्।
न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम्॥ (भागवतम् 1.8.29)
तो कहती हैं – ‘न वेद कश्चिद्’ – कोई भी समझ नहीं पाता है। ‘भगवंश्चिकीर्षितं’ – चिकीर्षितं मतलब आपकी लीलाएं हैं। भगवान, आपकी लीलाओं को कोई समझ नहीं पाता है। ‘तवेहमानस्य’ – तव मतलब आपकी, इहमानस्य मतलब इस जगत में एक साधारण मानव के समान लीला करते हैं। ‘नृणां विडम्बनम्’ – आप जनसाधारण लोगों को मोहित करते हैं। सब उसमें उलझन में पड़ जाते हैं कि क्या हो रहा है। ‘न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद्’ – आपके लिए कोई दयित (प्रिय) नहीं है। ‘द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम्’ – न ही आप किसी के प्रति द्वेष करते हैं। तो वो कह रही हैं कि प्रभो! आप पक्षपात नहीं करते हैं। आपके लिए न कोई प्रिय है और न ही कोई अप्रिय है।
भगवान की ‘Impartially Partial’ प्रकृति
तो भगवान अगर पक्षपात नहीं करते हैं, तो भगवान देवताओं का पक्ष लेते हैं, असुरों के विरुद्ध जाते हैं, ऐसा क्यों करते हैं? तो यहाँ समझने के लिए हमें भगवान की निरपेक्षता जो है, वह अच्छी तरह से समझनी चाहिए। कृष्ण न्युट्रल (neutral) हैं, पर इस न्युट्रालिटी (neutrality) में वो पक्षपात नहीं करते हैं, लेकिन रेसिप्रोकेट (reciprocate) करते हैं। मतलब क्या भगवान पत्थर के समान नहीं हैं। पत्थर को मान लीजिए… या लकड़ी है, इसको मैं पॉलिश करता हूँ या उसको पॉलिश करता हूँ, दोनों को कुछ फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि पत्थर निर्जीव होता है। तो इसलिए पत्थर के साथ कैसे भी व्यवहार करेंगे, उसको कुछ फर्क नहीं पड़ता है। पर अगर कोई व्यक्ति इस प्रकार का व्यवहार करता है, तो फिर उस व्यक्ति से हम संबंध जोड़ते हैं, तो हम स्नेह का आदान-प्रदान करते हैं। तो कृष्णा न्युट्रल हैं, पर व्यक्ति के साथ रेसिप्रोकेट करते हैं। रेसिप्रोकेट मतलब वो आदान-प्रदान करते हैं। तो भगवान, जो उनके प्रति अधिक शरणागत होते हैं, उनसे अधिक स्नेह करते हैं। तो यह पक्षपात नहीं है क्योंकि भगवान सबको मौका देते हैं कि सब उनसे संबंध जोड़ सकते हैं और सब उनसे स्नेह का आदान-प्रदान कर सकते हैं।
तो कृष्णा impartially partial हैं। impartially partial मतलब क्या है? वह पक्षपाती हैं, किसके प्रति पक्षपाती हैं? जो उनसे स्नेह करते हैं, जो उनके पक्ष में रहते हैं, वह उनको पूर्ण संरक्षण देते हैं। पर भगवान सबको अपने पक्ष में आने का मौका देते हैं। किसी को उस भक्ति के मौके से वह वंचित नहीं रखते हैं। तो इसलिए भले ही भगवान पक्षपाती हों, वह निरपेक्ष रूप से पक्षपाती हैं। मतलब क्या? वह अपने भक्तों का पक्ष लेते हैं और सबको भक्त बनने का मौका देते हैं।
तो भगवान गीता के नौवें अध्याय के 29वें श्लोक में बोलते हैं, वह दोनों चीज़ें बोलते हैं:
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ (भगवद्गीता 9.29)
वह कहते हैं कि मैं सबके प्रति समान हूँ। पर फिर भी वह कहते हैं कि जो मेरा भजन करते हैं, उनके साथ भगवान बड़ा ही निकट संबंध दर्शाते हैं। वह कहते हैं – मैं उनमें हूँ और वो मुझमें हैं (‘तेषु चाप्यहम्’)। और भगवान कहते हैं कि ये जो मौका है, सबके लिए है। और एक-दो-तीन श्लोक के बाद में, जो 32वें श्लोक में भगवान बोलते हैं कि सब प्रकार के लोग उनके पास आ सकते हैं। भले ही वो पापी ही क्यों न हों, वो सब मेरा आश्रय ले सकते हैं और उससे परागति प्राप्त कर सकते हैं।
तो भगवान चूँकि आदान-प्रदान करते हैं, इसीलिए वास्तव में उनसे प्रेम करना यह रसमय हो जाता है। अभी कोई पत्थर है, लकड़ी है, वह वास्तव में निर्जीव है, वो आदान-प्रदान नहीं करती है, उससे कोई प्रेम नहीं कर सकता है। तो क्योंकि कृष्णा रेसिप्रोकेट करते हैं, इसीलिए हम उनसे प्रेम कर सकते हैं। वास्तव में, अगर भगवान सिर्फ निरपेक्ष हों, पत्थर के समान, तो उनसे कोई प्रेम नहीं कर पाएगा। क्योंकि भगवान आदान-प्रदान करते हैं हर एक भक्त से, उस भक्त के जो भाव हैं उसके अनुसार वो आदान-प्रदान करते हैं।
यहाँ तक कि जीव गोस्वामी अपने संदर्भों में बताते हैं (संदर्भ ये बड़े तत्वज्ञान के ग्रंथ हैं जीव गोस्वामी द्वारा लिखे गए), उसमें बताते हैं कि आध्यात्मिक जगत में अनंत जीव हैं और भगवान के अनंत गुण हैं। तो भगवान के सब गुण भक्तों को आकर्षित करते हैं, पर हर एक भक्त को आकर्षित करने के लिए भगवान का एक विशेष गुण है। तो आपको आकर्षित करने के लिए भगवान का कोई विशेष गुण है। तो भगवान की लीलाओं को कोई समझ नहीं पाता है।
महाभारत में भगवान का निष्पक्ष स्वरूप
जब भगवान आते हैं भौतिक जगत में, तो जन साधारण लोग उनको समझ नहीं पाते हैं। तो दुर्योधन समझ नहीं पाया था, यद्यपि उसने भगवान का विश्वरूप भी देखा। तो अभी वो पांडवों के प्रति पक्षपात कर रहे हैं अगर हम देखेंगे महाभारत में, तो यह पक्षपात नहीं है क्योंकि भगवान सबको मौका देते हैं। भगवान शांति दूत के रूप में जाते हैं दुर्योधन के पास, और उसको भी मौका देते हैं भगवान। तो राजा जो है, वो साधारणतः दूत के रूप में नहीं जाता है। दूत की जो सेवा होती है, वो कोई निचला व्यक्ति करता है। पर भगवान स्वयं दूत के रूप में जाते हैं, और वो क्यों जा रहे हैं? दुर्योधन को मौका देने के लिए।
वास्तव में जब भगवान जाते हैं, उसके पहले पांडवों और कृष्ण भगवान के बीच चर्चा हो रही है महाभारत के उद्योग पर्व में। वर्णन आता है, महाभारत में अठारह पर्व हैं। उसमें जो युद्ध है, वो छठे पर्व से दसवें पर्व तक बताया है। तो उसके पहले जो पर्व आता है – उद्योग पर्व। उद्योग मतलब कार्य। वास्तव में ये नाम बहुत उचित दिया है क्योंकि उद्योग मतलब कार्य या मेहनत। सारे पांडव बड़ी मेहनत करते हैं कि युद्ध न हो। तो पूरे उद्योग पर्व में यही उद्योग है कि कैसे युद्ध टाला जाए।
तो उसमें मुख्यतः तीन आदान-प्रदान होते हैं युद्ध टालने के लिए। जब अज्ञातवास खत्म हो जाता है तो द्रुपद और विराट के राज्य में आ जाते हैं, और द्रुपद एक ब्राह्मण को भेजते हैं कौरवों के पास कि अभी वनवास का समय खत्म हो गया, कृपया पांडवों का राज्य पुनः दे दीजिये। तो उसके बाद में धृतराष्ट्र संजय को भेजते हैं। और धृतराष्ट्र बड़े धूर्त होते हैं। वो संजय के हाथों संदेश क्या भेजते हैं? “इस दुनिया में जो भी हम प्राप्त करते हैं उसको हमें त्यागना है। व्यक्ति गृहस्थ बनता है, बाद में उसको वानप्रस्थ लेना ही है। तो तुम्हारा इतना भाग्य है कि तुम अभी वानप्रस्थ बन गए हो, तो पुनः गृहस्थ क्यों बनना है? तो जो बाद में प्राप्त करना है, वो अभी प्राप्त कर लिया है, तो अभी आसक्ति में मत पड़ो। और तुम वनवास में हो, दुर्योधन को राजा बने रहने दो।” तो तत्वज्ञान का इस तरह से वो दूत के द्वारा इस्तेमाल करने का प्रयास करते हैं।
तो युधिष्ठिर क्यों जवाब देते हैं? “वास्तव में मुझे कोई आसक्ति नहीं है, पर मेरा यह कर्तव्य है। भगवान कृष्ण की इच्छा है कि मैं राजा बनूँ। मुझे कोई आसक्ति नहीं है, पर मेरा यह कर्तव्य है, मुझे राजा बनना है इसलिए मुझे राज्य चाहिए।” और उसके बाद कृष्ण भगवान स्वयं जाते हैं। और वो क्या कहते हैं? “तो केवल पाँच गाँव दे दीजिये।” तो इसमें हम देखें, तो जब वार्तालाप होता है पांडवों और कृष्ण के बीच, तो भीम कहते हैं कि वास्तव में हम जानते हैं कि दुर्योधन मानने वाला नहीं है। कृष्ण कहते हैं, “मैं भी जानता हूँ। पर फिर भी मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूँ कि हमने पूरा प्रयास किया कि युद्ध को टाला जाए।”
तो इस तरह से भगवान क्या करते हैं? सबको मौका देते हैं। दुर्योधन को भी मौका देते हैं। तो इसलिए भगवान किसी के बीच पक्षपात नहीं करते हैं। सबको भगवान मौका देते हैं। जो मौका स्वीकार करता है, वो भाग्यवान बन जाता है। श्रील प्रभुपाद को एक बार पूछा गया था, ‘क्या आप अपने सब शिष्यों से समान रूप से प्रेम करते हैं?’ प्रभुपाद कहते हैं, ‘मैं सबसे प्रेम करता हूँ, पर जो ज़िम्मेदारी स्वीकार करने आगे आते हैं, उनके साथ विशेष आदान-प्रदान होता है।’ माता-पिता हैं, वो अपनी सब संतानों से समान प्रेम करते हैं, पर कोई संतान अगर विशेष रूप से आगे आ जाता है, माता-पिता की ज़िम्मेदारी में मदद करता है, तो स्वाभाविक है वो उनके लिए और विशेष बन जाता है। तो भगवान का भी वैसा ही भाव है।
भगवान का अजन्मा होते हुए भी जन्म लेना
तो इस श्लोक में कुंती महारानी बता रही हैं कि आप भेद नहीं करते हैं। भगवान अपनी लीलाओं में भेद नहीं करते हैं। तो वो अवतार लेते हैं, तो भी अवतार का यह तत्व है। उसके बारे में कुंती महारानी तीसवें श्लोक से विस्तार से चर्चा करती हैं। भगवान की लीलाएं कब होती हैं? जब वो अवतार लेते हैं। आध्यात्मिक जगत की लीलाएं हम यहाँ पर देख नहीं सकते हैं। तो अभी वो बताती हैं कि आप जब अवतरित होते हो, आपकी लीलाएं अचिन्त्य हैं, आपका पक्षपात नहीं करना, वह अचिन्त्य है। तो अभी आप जो रूप लेते हो, वह भी अचिन्त्य है। वह कहती हैं:
जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मनः।
तिर्यङ्नृषिषु यादःसु तदत्यन्तविडम्बनम्॥ (भागवतम् 1.8.30)
हे ‘विश्वात्मन्’! आप जो मेरे सामने खड़े हो, पर आप कौन हो? सारे विश्वों की आत्मा हो। जो परमात्मा सारे विश्वों के अंदर होते हैं, आप वो ही हो – ‘जन्म कर्म च विश्वात्मन्’। वह बताती हैं, यहाँ पर विरुद्ध शब्द इस्तेमाल कर रही हैं – ‘अजस्याकर्तुरात्मनः’। वह बताती हैं, आप जन्म ले रहे हैं, पर आप क्या हैं? आप ‘अज’ (अजन्मा) हैं। आपका कभी जन्म नहीं होता।
तो उसमें क्या समझना है? उसकी जो एक विडंबना है, समझने में मुश्किल है, बता रही हैं कि आप अज हैं पर जन्म लेते हैं। आप कुछ कर्म (कार्य) नहीं करते हैं, फिर भी आप कर्म करते हैं। तो ‘अज’ इस शब्द का अर्थ क्या है? कि आपका जन्म नहीं होता है। अभी जन्म का अर्थ क्या है? साधारणतया वेदों से पता चलता है जन्म और मृत्यु साथ में होगी। अगर जन्म हो गया तो मृत्यु होगी। तो भगवान को जब अज बताया गया है, उसका मतलब क्या है? कि भगवान काल के परे हैं। वो काल के अधीन नहीं हैं। जब भगवान को अज बताया गया है, उससे यह बताया जा रहा है कि आप शाश्वत हैं। आप काल के प्रभाव से परे हैं, आप उसके प्रभाव में नहीं आते हैं।
भगवान के कार्य (आनंद की अभिव्यक्ति)
तो भगवान काल के परे आध्यात्मिक जगत में रहते हैं और वहाँ से सिर्फ लीला के लिए वो इस भौतिक जगत में आते हैं और लीला करके पुनः चले जाते हैं। वह प्रभावित नहीं होते हैं। तो यह बताया जा रहा है कि आप अज हो और जन्म लेते हैं। यह क्या है? एक धर्म की संकल्पना है भगवान की, और एक तत्वज्ञान की संकल्पना है।
अभी तत्वज्ञान की संकल्पना जो है भगवान की, वह क्या है? कि भगवान परिपूर्ण हैं। भगवान हर तरह से पूर्ण हैं। उनको कुछ चाहिए नहीं, उनको कुछ ज़रूरत नहीं। क्योंकि अगर भगवान को कुछ करना पड़ता है, कुछ कार्य करना पड़ता है, तो फिर वो कार्य क्यों करेंगे भगवान? शायद उनको कुछ कमी महसूस हो रही है, शायद उनको कुछ चाहिए। हम कार्य करते हैं, क्यों कार्य करते हैं? हम नौकरी करते हैं क्यों? क्योंकि हमको पैसा चाहिए। हम कुछ भी कार्य करते हैं, उसको करने के लिए कुछ हेतु होता है। तो तत्वज्ञान में चर्चा होती है कि अगर भगवान कुछ कार्य करेंगे, तो वो कार्य करने के लिए उनको कुछ हेतु होना चाहिए। और अगर हेतु होगा, तो मतलब वो अपूर्ण हैं। और अगर वो अपूर्ण हैं, तो वो परिपूर्ण कैसे हुए?
पाश्चात्य संस्कृति में एरिस्टोटल (Aristotle) नाम के एक तत्वज्ञानी थे, तो उन्होंने कहा कि ‘God is the unmoved mover’. अनमूव्ड मूवर मतलब भगवान कुछ भी नहीं करते हैं पर वो सब चीज़ों की शुरुआत हैं। तो उनके तत्वज्ञान में एक समस्या आ रही थी कि वो कुछ मूव (move) करेंगे ही क्यों? अगर उनको कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, तो वो शुरुआत भी क्यों करेंगे? तो यह जो संकल्पना है कि भगवान परिपूर्ण हैं इसलिए वो निष्क्रिय हैं, यह परिपूर्णता जो है, इसमें कोई रस नहीं है। और जो क्रिश्चियन धर्म था उसमें भी यही भगवान की संकल्पना है। अगर बाइबिल पढ़ते हैं, तो बाइबिल में ज़्यादातर यही बताया है कि आप ऐसे करो, ऐसे करो। तो यह जो संकल्पना है भगवान की, यह एक जड़ परिपूर्णता है।
जैसे अगर कोई चित्रकार चित्र बना रहा है, तो अगर कोई चित्रकार होता है वो जानता है कि अभी चित्र परिपूर्ण हो गया। अब अगर और रंग लगाए गए, एक रंग या एक ब्रश का भी और स्पर्श करेंगे तो वो परिपूर्णता चली जाएगी। एक ब्रश का स्पर्श कम करेंगे तो भी परिपूर्णता चली जाएगी। तो ऐसे क्या है कि ये जो तत्वज्ञान में भगवान की संकल्पना है कि भगवान परिपूर्ण हैं, पर वह कुछ कार्य करेंगे तो कार्य क्यों करेंगे? क्योंकि कुछ इच्छा है, इच्छा है मतलब अपूर्णता है, और अपूर्णता है तो फिर वह परिपूर्ण नहीं हैं। तो इसलिए तत्वज्ञान में भगवान की संकल्पना एक जड़ परिपूर्णता बन जाती है।
तो यह जो तत्वज्ञान है, केवल पाश्चात्य संस्कृति में नहीं, वेदांत सूत्र में भी इसकी चर्चा हुई है। तो वेदांत सूत्र में बताते हैं कि क्या भगवान एक इस तरह से फ्रोज़न परफेक्शन (frozen perfection) हैं? भगवान कुछ कार्य नहीं कर सकते क्योंकि वे परिपूर्ण हैं? तो रामानुजाचार्य अपने श्रीभाष्य में बताते हैं कि भगवान जब लीला करते हैं, तो भगवान की लीला किसी कमी के कारण नहीं है, वो खेल के लिए एक लीला है। जैसे कोई व्यक्ति नौकरी करता है, तो वो काम क्यों कर रहा है? क्योंकि उसे पैसा चाहिए। पर वो बाद में जब घर आता है, तो शायद अपने बच्चे के साथ कुछ खेलता है। तो वो जो खेल रहा है, उसकी उसको ज़रूरत नहीं है, जैसे वो दफ्तर में जाता है पैसा कमाने के लिए। उस तरह कोई हेतु खेल में नहीं है। तो इससे हम कहते हैं, भगवान की लीला जो है, वह केवल आनंद के लिए है।
तो बलदेव विद्याभूषण अपने जो वेदांत सूत्र के तात्पर्य हैं, गोविंद भाष्य में, वो उसका और रस बताते हैं। वो बोलते हैं कि यह पूर्ण उदाहरण नहीं है। क्योंकि कहते हैं अगर भगवान कुछ करते हैं, आनंद के हेतु से भी करते हैं, तो भी वे अपूर्ण हैं। क्योंकि उसका मतलब है वो कार्य करने के पहले वो आनंदी नहीं हैं। तो बोलते हैं कि भगवान की लीला जो है वो एक खेल नहीं है, वो एक नृत्य है। अभी खेल और नृत्य में फर्क क्या है? वो बोलते हैं कि जब व्यक्ति बहुत आनंदी होता है तो क्या होता है? जब आनंद होता है तो वो नाचने लगता है। तो the dancing is not done to become happy, the dancing is a result of happiness. नृत्य क्यों कर रहा है? आनंदी है इसलिए नृत्य कर रहा है। ठीक उसी तरह से कहते हैं, भगवान की लीला वो आनंद प्राप्ति के लिए नहीं है, वो आनंद व्यक्त करने के लिए है।
तो इस तरह से भगवान अकर्तु हैं। अकर्तु हैं मतलब उनको कार्य करने के लिए कोई भौतिक हेतु नहीं है। भगवान किसी तरह से अपूर्ण नहीं हैं, पर अपनी पूर्णता दर्शाने के लिए वे कार्य करते हैं। वो बताते हैं कि व्यक्ति जब कार्य करता है, तो एक पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के लिए आकर्षित होते हैं, क्यों? क्योंकि दोनों को लगता है कि हम अपूर्ण हैं। तो इसलिए वह कहते हैं कि ‘better half’, पूर्ण नहीं है। तो भगवान पूर्ण हैं, भगवान इस तरह से अपूर्ण नहीं हैं। तो भगवान कार्य क्यों करते हैं? तो कहते हैं कि भगवान का कार्य क्यों है? It is not to attain completeness but to share the joy of completeness. यहाँ पर इस भौतिक जगत में पुरुष और स्त्री अपूर्ण होते हैं इसलिए साथ में आते हैं पूर्णता प्राप्त करने, पर भगवान जब अपूर्ण नहीं हैं, वह पूर्ण हैं, पर अपनी परिपूर्णता का आनंद व्यक्त करने के लिए और दूसरों को देने के लिए वह कार्य करते हैं।
भगवान का दिव्य अवतरण और प्रेम की विजय
वह इसलिए इसमें कहते हैं, जब आप कार्य करते हो, आप अद्भुत रूप में प्रकट होते हो। आप मछली के रूप में, मानव के रूप में, मत्स्य अवतार के रूप में। अगर हम जो 84 लाख योनियाँ देखते हैं, उनमें जो मछलियाँ हैं, उनको सबसे नीचे रखा गया है, तो तिर्यक रूप होता है, वह उतना कोई उच्च रूप नहीं है। पर ऐसे रूप में भगवान उत्पन्न होते हैं, आप प्रकट होते हैं। जो कि भगवान किसी भौतिक चीज़ से प्रभावित नहीं होते हैं। ऋषिषु मतलब कि आप एक ऋषि के रूप में प्रकट होते हैं, नर-नारायण ऋषि के रूप में। तो इस तरह से अगर कोई व्यक्ति है, उसको प्रकट भी होना है, तो साधारणतया व्यक्ति बड़े शक्तिशाली, आकर्षक रूप में प्रकट होता है, ताकि सब लोग आशिक हो जाएँ। पर भगवान ऐसे (तिर्यक) रूप में प्रकट होते हैं।
भागवतम् के अष्टम स्कंध के चौबीसवें अध्याय में, जब मत्स्यावतार का वर्णन आता है, तो वहाँ पे परीक्षित महाराज सवाल पूछते हैं कि जगन्य रूप, कि यह जो मछली का रूप है, यह तो कुछ अच्छा रूप नहीं, जगन्य, यह निचला रूप है। तो ऐसे रूप में आप क्यों प्रकट होते हैं?
जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मनः।
तिर्यङ्नृषिषु यादःसु तदत्यन्तविडम्बनम्॥
तो इसके बाद में कुंती महारानी भगवान की लीलाओं का वर्णन करती हैं। उसमें जो हम कार्तिक मास की बात कर रहे हैं, उसका ही वर्णन हो रहा है:
गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्।
वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्बिभेति॥ (भागवतम् 1.8.31)
जो भगवान साक्षात् भय हैं, भय स्वयं जिनसे भयभीत हो जाता है, वह भगवान कैसे भयभीत हो सकते हैं? तो अभी हम चर्चा कर रहे थे, इसके लिए चित्र की परिपूर्णता क्या है? एक निष्क्रिय स्तर पे, अभी वो सबसे आकर्षक बन गया है। पर भगवान एक व्यक्ति हैं और भगवान की परिपूर्णता क्या है? भगवान की परिपूर्णता केवल निष्क्रियता नहीं है, यह प्रेम का आदान-प्रदान है। So the perfection of love is not inactivity. निष्क्रियता यह प्रेम की परिपूर्णता नहीं है।
प्रेम की परिपूर्णता क्या है? कि everything else stops so that love can go on. कि जो प्रेम का आदान-प्रदान है, वही चले और बाकी सब बंद हो जाए। जब भौतिक स्तर पे भी कोई काव्य लिखते हैं, कोई प्रेम के बारे में काव्य लिखते हैं, तो लोग कहते हैं कि एक लड़का और एक लड़की एक-दूसरे को देखते हैं तो वह कहते हैं कि जब मैंने आपकी आँखों में देखा तो समय रुक गया। तो भगवान अपना परम पद त्याग कर देते हैं, जिससे कि प्रेम परम पद पे आ जाए। तो आध्यात्मिक जगत में भगवान सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं, प्रेम सर्वश्रेष्ठ है। और यह प्रेम, वास्तव में यशोदा माई जो बाँधती हैं, यह प्रेम की विजय है। भक्ति से बंधे हुए। आध्यात्मिक जगत में प्रेम राजा है, भगवान राजा नहीं हैं।
निष्कर्ष एवं मुख्य बिंदु:
कुंती महारानी की स्तुतियां स्पष्ट करती हैं कि भगवान की लीलाएं, उनका काल रूप और उनका पक्षपाती प्रतीत होना सब दिव्य और अचिन्त्य है। भगवान पूर्ण हैं, और उनके कार्य किसी अपूर्णता को भरने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पूर्णता के आनंद को भक्तों के साथ बांटने (प्रेम के आदान-प्रदान) के लिए होते हैं। अंततः, भगवान से भी श्रेष्ठ वह शुद्ध प्रेम है जो उन्हें भी बांध लेता है।