Lord Chaitanya Sannyasa lila – Chaitanya Chandrodaya Nataka 4 Hindi
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
इस प्रवचन में चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं, भक्ति के सिद्धांतों और श्रील प्रभुपाद के प्रचार के तरीकों पर गहराई से चर्चा की गई है। पूरे व्याख्यान के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- अन्य मार्गों का सम्मान और कृष्ण भक्ति की श्रेष्ठता: जिस तरह चैतन्य महाप्रभु ने राम भक्तों (जैसे मुरारी गुप्त) की निष्ठा की सराहना की, उसी तरह अन्य आध्यात्मिक मार्गों का सम्मान करना चाहिए। हालांकि, जो लोग अभी शुरुआत कर रहे हैं, उनके लिए चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिया गया कृष्ण भक्ति का मार्ग सबसे सरल, सुलभ और सबसे ऊँचा रस (Higher Taste) प्रदान करने वाला है।
- भक्तों का व्यक्तिगत दृष्टिकोण: भगवान की लीलाओं को देखने का हर भक्त का अपना एक अलग नज़रिया होता है, जो उनके पूर्व अनुभवों और मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। क्योंकि हम सब अपूर्ण और सीमित हैं, इसलिए हमारा दृष्टिकोण भी अलग-अलग होता है।
- ज्ञान के स्रोत (गुरु, साधु और शास्त्र): किसी भी शास्त्र या सिद्धांत को सही ढंग से समझने के लिए गुरु, साधु (पूर्वाचार्यों) और शास्त्र—तीनों के वचनों का संदर्भ लेना चाहिए। केवल किसी एक वाक्य या एक बिंदु पर निर्भर रहने से गलत निष्कर्ष निकल सकता है।
- चैतन्य महाप्रभु की संन्यास लीला: महाप्रभु की संन्यास लीला का पूर्ण चित्र विभिन्न ग्रंथों (जैसे चैतन्य भागवत, चैतन्य मंगल, चैतन्य चरितामृत और चैतन्य चंद्रोदय नाटक) को एक साथ पढ़ने पर ही स्पष्ट होता है। उन्होंने केशव भारती से संन्यास लिया और लीला के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही गुरु का उद्धार किया।
- सिद्धांतों को समझने की सही पद्धति (Hermeneutics): श्रील प्रभुपाद या किसी भी आचार्य के विचारों को समझने के लिए उनके किसी एक वाक्य को पकड़ लेना सही नहीं है। उन्होंने अलग-अलग जगह पर क्या कहा है, उसका समग्र अध्ययन करके ही सही निष्कर्ष (तात्पर्य लिंग) निकाला जा सकता है।
- देश, काल और पात्र के अनुसार प्रचार: प्रचार हमेशा समय, स्थान और श्रोताओं की स्थिति के अनुसार होना चाहिए। प्रचार करते समय श्रोताओं की पुरानी मान्यताओं (जैसे अखाड़े में हनुमान जी की भक्ति) का खंडन करने के बजाय, उसी के अनुसार कृष्ण भावनामृत का संदेश देना चाहिए।
Full Transcription
भगवान की लीलाओं में भक्तों का दृष्टिकोण
पूरा किताब को हम पूरा नहीं कर पाए थे यहाँ पे, और मैं उसमें से कुछ चैतन्य चरितामृत और चैतन्य चंद्रोदय नाटक के साथ कुछ महत्वपूर्ण चीज़ों की चर्चा करूँगा, ज़्यादा लीलाओं की चर्चा करूँगा अच्छे डिटेल में। पर उसके बाद में एक प्रश्नोत्तर के लिए हम और समय रखेंगे कि आपके सवालों को देख सकते हैं।
हर एक जो भक्त होता है भगवान की लीला में, उस भक्त का अपना एक व्यक्तिगत चिंतन होता है। व्यक्ति का दृष्टिकोण न केवल स्वरूप के अनुसार या रस के अनुसार होता है, पर हर एक व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत चिंतन होता है। मान लीजिये अगर आप सब यहाँ पर बैठे हैं और हम यहाँ से अगर बाहर कुछ देखते हैं, तो फिर हर एक व्यक्ति अलग-अलग दृष्टिकोण से देखता है। न केवल दृष्टिकोण—मतलब एक जगह आप यहाँ बैठे देख रहे हैं, मैं यहाँ से बैठे देख रहा हूँ—पर हमारे पूर्व अनुभव हैं, हमारी मानसिकता है, हमारी विचारधारा है, उस दृष्टिकोण से हम देखते हैं।
तो फिर एक ही शब्द से, एक नाम से, हर एक के मन में अलग-अलग विचार उत्पन्न होंगे। नाम एक ही है, पर जो विचार उत्पन्न होगा वह अलग होगा। कोई आपका बहुत अच्छा मित्र होगा जिससे झगड़ा हो गया है, और फिर उसका नाम सुनते ही क्रोध भी आ सकता है। वही एक चीज़ से अलग-अलग अनुभव हो सकते हैं। हर एक भक्त भगवान की लीला को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। यह व्यक्ति के अपूर्णत्व के कारण है। हम सब सीमित हैं, हम सब अपूर्ण हैं, इसलिए हम अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।
ज्ञान की सीमितता और एक्वेरियन गॉस्पेल का प्रसंग
भगवान के जो शुद्ध भक्त होते हैं, वह कोई भी जीवात्मा भगवान की तरह पूर्णतया सर्वज्ञ नहीं होता है। केवल भगवान ही सर्वज्ञ होते हैं। इसलिए जो सीमितता है, वह एक शुद्ध भक्त में भी होती है। भगवान जितना ज्ञान देना चाहेंगे, उतना ज्ञान वो प्राप्त करते हैं और फिर बाकी ज्ञान नहीं होता है।
प्रभुपाद जी जब अमेरिका में गए, तो कई बार वहाँ पे लोग कहते थे कि जीसस क्राइस्ट जो थे, वो 2000 साल पहले आये, तो उसके बाद में क्रिश्चियनिटी में अनेक संत आये हैं। और भारत में भी अनेक लोग होते हैं जो साधु होते हैं। तो उस समय 1965-66 में एक किताब बहुत पॉपुलर था, उसका नाम था ‘एक्वेरियन गॉस्पेल’ (Aquarian Gospel)। गॉस्पेल मतलब जो जीसस की कहानियों के बारे में बता रहा है, उसको गॉस्पेल कहते हैं। पर ये एक्वेरियन गॉस्पेल जो है, इसमें जीसस के बारे में वो बातें हैं जो बाइबल के चार गॉस्पेल में नहीं हैं।
तो इस एक्वेरियन गॉस्पेल में वर्णन आता है कि कैसे जीसस भारत में आये थे और भारत में आकर जगन्नाथ पुरी में रह रहे थे। उन्होंने जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ जी की पूजा की थी, वहाँ पे सीखे थे, और फिर वो वापस चले गए। तो एक बार जब जगन्नाथ रथयात्रा का उत्सव हुआ, तो प्रभुपाद जी ने वो कोट किया कि आप जगन्नाथ रथयात्रा कर रहे हैं, ये आपके लिए नई नहीं है, क्योंकि आपके जीसस क्राइस्ट ने जगन्नाथ जी की पूजा की थी।
तभी क्या हुआ? तभी कई भक्त थे प्रभुपाद जी के, एक स्कॉलरली भक्त शिष्य थे रवींद्र स्वरूप प्रभु। पंडित विद्वान लोग कहते हैं कि ये एक्वेरियन गॉस्पेल का प्रसंग ऐसा लगता है कि 300-400 साल पहले किसी ने लिखा होगा, पर वो जीसस के नाम पर डाल दिया है। तो इसलिए मतलब यहाँ पे क्या है कि हम सब ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो प्रधान ज्ञान हम प्राप्त करते हैं, वो शास्त्रों से ज्ञान प्राप्त करते हैं (शब्द प्रमाण), और उसके साथ-साथ हम प्रत्यक्ष अनुमान से भी ज्ञान प्राप्त करते हैं। और अगर किसी ने वो ज्ञान लिया है और वो उन्हें कुछ गलत बता रहा है, तो उसमें कुछ गलती आ सकती है।
गुरु, साधु और शास्त्र का सामंजस्य
यह जो आध्यात्मिक ग्रंथ हैं, जो प्रभुपाद जी के ग्रंथ हैं… प्रभुपाद जी को एक बार पूछा गया था कि हम कई अलग-अलग कहते हैं कि प्रभुपाद जी का ये मूड है, तो हम अपने गुरुदेव का मूड कैसे जानें? वास्तव में शिक्षाओं का सार क्या है, कैसे जान सकते हैं?
प्रभुपाद जी ने बताया कि अगर आप एक पॉइंट लेते हैं, तो एक पॉइंट से आप अनेक लाइन मार सकते हैं। और अगर दो पॉइंट साथ में लेते हैं, तो दो पॉइंट से कितनी लाइन जाएगी? एक ही लाइन जाएगी। तीन पॉइंट लेते हैं, तो एक ही लाइन जाएगी। चार पॉइंट लेते हैं, तो एक ही लाइन जाएगी। उससे प्रभुपाद जी कहते हैं कि अगर आप सिर्फ हमारा जो प्रमाण है—गुरु, साधु, शास्त्र—सिर्फ आप गुरु के शब्द पढ़ते हैं, और शास्त्र को नहीं समझते, साधु (पूर्वाचार्यों) के शब्द नहीं पढ़ते, तो फिर क्या होगा? एक पॉइंट से अलग-अलग लाइनें हम निकाल सकते हैं।
पर गुरु और पूर्वाचार्य—आप गुरु के वचनों को देखते हैं और पूर्वाचार्यों के वचनों को देखते हैं—तो फिर हम देखेंगे क्या? कि उनके वचनों में जो समानता है, कुछ भिन्नता भी होगी और समानता भी होगी। भिन्नता क्यों होती है? क्योंकि हर एक आचार्य देश, काल, और पात्र के अनुसार उपदेश करते हैं।
तो इसलिए हम देखते हैं कि भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर जो थे, वो स्वयं शर्ट-पैंट, कोट पहना करते थे कभी-कभी। और वो अपने शिष्यों को भी शर्ट-पैंट पहनने को बोलते थे। पर प्रभुपाद जी ने बोला कि मैं नहीं करूँगा, प्रभुपाद जी अमेरिका में गए, वो धोती-कुर्ते में ही गए। प्रभुपाद जी और भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के भाव में वेशभूषा को लेकर कुछ भेद था। भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने जब प्रचार किया, और प्रभुपाद जी जब अमेरिका में प्रचार करने गए, तो उन्हें भगवद्गीता पढ़ना नहीं था या जो प्रभुपाद जी ने लिखा था।
चैतन्य महाप्रभु की संन्यास लीला का वर्णन
चैतन्य महाप्रभु के संन्यास की लीला है, इसका वर्णन कई किताबों में किया गया है, पर जो वर्णन है वह हर लेखक के भाव के अनुसार है। तो चैतन्य भागवत को अगर हम पढ़ते हैं, तो उसमें वृन्दावन दास ठाकुर संन्यास के बाद की लीलाओं का थोड़ा बहुत वर्णन करते हैं, पर संन्यास का वर्णन लगभग करते ही नहीं हैं। और करते भी हैं तो विस्तृत रूप से नहीं है। उसके बाद अगर हम चैतन्य मंगल पढ़ते हैं, तो उसमें भी थोड़ा बहुत वर्णन आता है। चैतन्य चरितामृत में बहुत विस्तृत वर्णन आता है। पर अगर हम इन तीनों को साथ में पढ़ते हैं, तो फिर हमको एक पूर्ण दृष्टि प्राप्त होती है।
और ये कवि कर्णपूर का ‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ है, उसमें जो संन्यास की लीला है, उसकी पृष्ठभूमि देते हैं और फिर वो उस लीला का वर्णन करते हैं। यहाँ पर जो है, कि भक्तों के दृष्टिकोण से बता रहे हैं। चैतन्य चंद्रोदय नाटक कैसे हो रहा है? कवि कर्णपूर इसको बता रहे हैं। आचार्य चंद्रशेखर हैं, उनकी पत्नी भागीरथी हैं। वह आयु में थोड़े से वृद्ध हैं, चैतन्य महाप्रभु की उम्र के नहीं हैं, तो थोड़े वृद्ध हैं, चैतन्य महाप्रभु से उम्र में बड़े हैं। तो उनकी पत्नी और शची माता एक दूसरे को अच्छे से जानती हैं।
तो एक बार वे दोनों मिलते हैं और वे कहते हैं कि हमारे गाँव में, हमारे शहर में एक संन्यासी आये हैं और आप उस संन्यासी की बहुत सेवा कर रहे हैं, कुछ कारण है इसका? तो अभी तक क्या हुआ है, चैतन्य महाप्रभु को दीक्षा लेनी है ईश्वर पुरी से। जो दीक्षा लेते हैं, उसके बाद में वो कृष्ण भक्ति में रहे हैं। और अभी तक उन्होंने संन्यास लिया नहीं है। केशव भारती से उन्हें संन्यास प्राप्त हो रहा है कटवा में। कटवा भी नवद्वीप से थोड़ा दूर है, पर उनको खबर मिल जाती है कि केशव भारती आये हैं और चैतन्य महाप्रभु को भी जाना है।
गुरु का उद्धार: केशव भारती तारण
केशव भारती तारण, परिव्राजक शिरोमणि, उत्कल पावन, श्री कृष्ण चैतन्य।
उनका पहले नाम क्या था? विश्वम्भर था और निमाई पंडित था। संन्यास के बाद ‘श्री कृष्ण चैतन्य’ उनका नाम था। श्री कृष्ण चैतन्य चंद्र, वो एक चंद्र के समान हैं। साधारणतः क्या होता है, कोई दीक्षा लेता है तो गुरु अपने शिष्य का उद्धार करते हैं, पर चैतन्य महाप्रभु ने क्या किया? अपने गुरु का उद्धार किया। ‘भारती तारण’ – उद्धार का मतलब क्या हुआ?
क्या आप जानते हैं वो लीला? कि जब केशव भारती सोच रहे थे कि मैं क्या मंत्र दूँगा? तो उन्होंने सोचा कि मैं सोचता हूँ कि क्या मंत्र देना चाहिए। तो फिर चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “मुझे कल रात सपने में एक ब्राह्मण आया था, उन्होंने मुझे एक मंत्र बताया। और अगर आपको ये मंत्र अच्छा लगता है, तो आप ये मंत्र मुझे दीजिये।” तो फिर चैतन्य महाप्रभु गए, उन्होंने उनके कान में वो मंत्र बताया। केशव भारती ने उसी का उद्धार किया। उसके बाद में ‘परिव्राजक शिरोमणि’ – मतलब जो संन्यासी हैं, जो प्रवास करते हैं, उनमें से वो शिरोमणि हैं। ‘उत्कल पावन’ – उत्कल मतलब ओडिशा का भाग, उत्कल का उद्धार किया।
तात्पर्य लिंग (शास्त्रों को समझने के 6 नियम)
तात्पर्य लिंग क्या है? उसके लक्षण क्या हैं?
उपक्रमोपसंहारौ अभ्यासोऽपूर्वता फलम्।
अर्थवादोपपत्ती च लिंगं तात्पर्यनिर्णये॥
पहला अगर समझना है तो कैसे समझ सकते हैं? हम देख सकते हैं उपक्रम (शुरुआत) में क्या बताया। “आज मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा”—यह उपक्रम है, और फिर उपसंहार (अंत)। अर्थवाद और उपपत्ति। उदाहरण किस चीज़ के लिए दिए गए थे?
तो ये चीज़ के लिए दिए गए थे, वो सबसे पहले प्रस्थापित करते हैं कैसे भागवतम सर्वश्रेष्ठ है। तो कहते हैं सर्व-प्रमाण-चक्रवर्ति भागवतम्। तो उसके बाद में वो विश्लेषण करते हैं कि भागवतम की शुरुआत में क्या बताया गया है, उसमें सबसे अधिक गुणगान किसका किया गया है, और सबसे बड़ा उदाहरण किस चीज़ के लिए दिया गया है। और इसके द्वारा बताया गया है कैसे कृष्ण भक्ति ही श्रीमद् भागवतम का सार है। इस प्रकार तात्पर्य लिंग से हम किसी भी शास्त्र का अर्थ निकालते हैं।
आचार्यों के दृष्टिकोण को समझना (Hermeneutics)
अगर हमें समझना है कि इस विषय में इस्कॉन के GBC ने एक कमिटी बनाई है—Hermeneutics (हर्मेन्यूटिक्स)। हर्मेन्यूटिक्स मतलब किसी शास्त्र में जो बताया है, कोई भी किताब है, उसको कैसे समझना, उसकी जो पद्धति है समझने की, उसको हर्मेन्यूटिक्स कहते हैं।
कि प्रभुपाद जी को अगर हमें समझना है कि एक विषय पर उनकी क्या पोजीशन है, क्या विचार हैं, तो हम उनके एक वाक्य को देखकर निर्णय नहीं कर सकते हैं। अगर एक विषय पर देखना है, तो प्रभुपाद जी ने अलग-अलग जगह पर उस विषय पर क्या कहा है, वो देखकर ही हम उनका सिद्धांत समझ सकते हैं। प्रभुपाद जी खास करके जब भागवतम के आगे के स्कंधों में जाते हैं, तो फिर वो और ऊँचे-ऊँचे पॉइंट बताने लगते हैं। जो बेसिक पॉइंट हैं, वो बताते हैं, पर उन पर इतना ज़ोर नहीं है। जहाँ तक “कृष्ण परम सत्य भगवान हैं”, इसको हमने बार-बार हर तात्पर्य में बताया है। और जहाँ पर ऐसे विषय आते हैं जहाँ शिवजी का गुणगान हो रहा है, तो प्रभुपाद जी क्या करते हैं, कि वहाँ पर शिवजी की महिमा बता के छोड़ देते हैं।
शिवजी जो हैं, एक तरह से भेद है, एक तरह से अभेद है। तो कई जगह पर हम समझने के लिए अभेद बताते हैं कि शिवजी को परम सत्य भगवान नहीं माना जाता। तो दूसरी दृष्टि से अभेद भी है, अभेद को समझना भी महत्वपूर्ण है। तो प्रभुपाद जी जब इस तरह से बताते हैं, इसको अभेद के रूप में देखते हैं। और किसी भी विषय में प्रभुपाद जी के एक या दो वाक्यों को पढ़के उनका जो सिद्धांत है, वो हम नहीं समझ सकते, अलग जगह पर क्या बताया है, वो देखकर ही निर्णय होना है।
देश, काल और पात्र के अनुसार प्रचार
जब हम देश, काल, पात्र देखते हैं, तो फिर वहाँ कैसे प्रचार करते हैं? अगर हम देखेंगे जो रामानुजाचार्य हैं, माधवाचार्य हैं, उन्होंने कुछ विषयों को बहुत विस्तार से बताया है। पर अगर हम देखेंगे जो मायापुर या राधा-कृष्ण के प्रेम के बारे में है, तो वहाँ पर वो लीला अधिक नहीं बताते हैं। वहाँ पे जो हमारे गौड़ीय सिद्धांत हैं, वो प्रचार करते हैं।
हम देखते हैं चैतन्य महाप्रभु की लीला में दो भक्त हैं जो राम भक्त हैं। एक थे मुरारी गुप्त और दूसरे थे अनुपम (रूपा और सनातन गोस्वामी के भाई)। और हम देखते हैं कि चैतन्य महाप्रभु ने ज़बरदस्ती नहीं की कि आप कृष्ण भक्ति ही करो। उनको आदर किया कि आप राम भक्ति कर रहे हैं और राम भक्ति में लगे रहें, सराहना भी की। पर हम ये भी देखते हैं कि अनुपम तो थोड़े जल्दी ही गुज़र गए, पर मुरारी गुप्त भी किसी के दीक्षा गुरु नहीं बने। चैतन्य महाप्रभु ने, कोई अन्य भक्ति कर रहा है तो उसकी सराहना की, पर जहाँ तक प्रचार करना है, तो जो गौड़ीय सिद्धांत के लिए कर सके, वही हमारे संप्रदाय में दीक्षा गुरु बने हैं, वही हमारे संप्रदाय में प्रचारक बने हैं।
अन्य मार्गों का सम्मान और भक्ति का मार्ग
अलग-अलग सर्कल होते हैं, तो एक स्तर पे हमें यह करना है जो लोगों को भगवान के करीब लाये। पोप जॉन पॉल जो थे, जो कैथोलिक चर्च के सबसे बड़े लीडर थे, उनको खास लिखा गया। हमें क्या करना है, अगर कोई पहले से भक्ति कर रहा है… यह क्या है कि परम सत्य एक पहाड़ के समान है, और उस पहाड़ की अलग-अलग शिक्षाओं को जो विचारवान लोग हैं, वो अलग-अलग दृष्टि से देखते हैं।
और उसको देखकर थोड़ी अलग-अलग समझ बताते हैं। और अलग-अलग जो महान संत हैं, वह इस पहाड़ पर चढ़ रहे हैं अलग-अलग दिशाओं से। तो अगर कोई सही में उस पहाड़ पर चढ़ रहा है, तो फिर क्रिश्चियनिटी का प्रामाणिक होना सिद्ध होता है। हमें क्या करना है कि उसको उसी मार्ग पर और चढ़ने के लिए प्रेरित करें।
पर मान लीजिये कोई उस पहाड़ के नीचे ही खड़ा है और पूछ रहा है कि “ये मार्ग कैसा है?” तो हम कहते हैं कि अनेक मार्ग हैं उस पहाड़ पर चढ़ने के लिए, पर चैतन्य महाप्रभु ने जो कृष्ण भक्ति का मार्ग हमें दिया है, वह बहुत सरल मार्ग है। आसानी से और तेज़ी से इसमें बढ़त होती है। क्योंकि कहा गया है, जो ‘Higher Taste’ (उच्च रस) है, वह इसमें अच्छा मिलता है। भगवान का इतना सारा ज्ञान है, चैतन्य महाप्रभु के द्वारा दिया गया मार्ग बाकी मार्गों से बहुत सुलभ है। इसलिए अगर कोई ज़मीन पर ही है, तो हम चाहते हैं कि अगर आपको ऊपर जाना ही है, तो इस मार्ग से आप आसानी से जा सकते हैं।
और ऐसा नहीं है कि हम इस मार्ग का पालन कर रहे हैं इसलिए हम बोल रहे हैं। वास्तव में हम देखते हैं कि कई लोग अन्य मार्गों में जाते हैं पर फिर भी नियमों का पालन नहीं कर पाते हैं। पर जब वो हमारे पास आते हैं तो कर लेते हैं। इसलिए देश, काल, पात्र के अनुसार विचार होता है।
प्रचार में उपयुक्त उदाहरणों का प्रयोग
प्रभुपाद जी को एक बार अखाड़े में बुलाया गया था (जहाँ व्यायाम शाला होती है)। प्रभुपाद जी बोले कि आप शरीर हो या आत्मा हो? आप सबने यहाँ पर हनुमान जी का चित्र रखा है, तो हनुमान जी बहुत बलवान हैं और आपने पढ़ा है कि हनुमान जी हमेशा राम-राम जपते हैं। तो प्रभुपाद जी ने बताया कि आप अपना व्यायाम कर रहे हो, उठ रहे हो, बैठ रहे हो, तो क्या है?
अगर हम किसी और की जगह में जाकर प्रचार कर रहे हैं, तो उनकी जो विचारधारा है, जो भक्ति की संकल्पना है, उसको हमें तोड़ने की ज़रूरत नहीं है। उसके अनुसार हम हमारा प्रेजेंटेशन दे सकते हैं। और जब वह हमारे मंदिरों में आ रहे हैं, हमारे कार्यक्रम में आ रहे हैं, तो फिर हमें क्या करना चाहिए? हमें सिद्धांत के विषय में दृढ़ रहना चाहिए।
अगर हमारे प्रवचन में हम समझाने के लिए अन्य ग्रंथों से उदाहरण इस्तेमाल करते हैं, उसमें कोई भी बात गलत नहीं है। प्रभुपाद जी ने भी कई जगह पे… अगर हम देखें, प्रभुपाद जी ने एक-दो जगह पे तुलसी रामायण की फिलॉसफी की आलोचना की है, पर कई जगह पे प्रभुपाद जी ने तुलसी रामायण को कोट भी किया है (रामचरितमानस को)। मेरे पास एक पेपर है जिसमें प्रभुपाद जी के पंद्रह-सोलह रेफ़रेंसेज़ देखे गए हैं, जिसमें से एक ही बहुत नेगेटिव है, बाकी सात-आठ अच्छे रेफ़रेंसेज़ हैं, और प्रभुपाद जी ने उनको कोट किया है कई जगह पे।
तो इसलिए ऐसा नहीं है कि हम कहते हैं कि सिर्फ एक ही शास्त्र से ज्ञान लेना है और कहीं से भी ज्ञान नहीं लेना है। अंत में मात्र क्या है, अगर हम दक्षिण भारत में जाएँगे, वहाँ पर हम वैष्णव संप्रदाय की कथाओं का श्रवण कर सकते हैं साधारण समन्वय के लिए।