Mahajanas 1 – Brahma (Hindi)
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Lecture Summary
यह व्याख्यान श्रीमद्भागवतम के संदर्भ में बारह महाजनों में प्रथम ब्रह्माजी के जीवन, स्वरूप और विभिन्न स्कंधों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिकाओं पर प्रकाश डालता है। यहाँ इस प्रसंग का मुख्य सार दिया गया है:
मुख्य बिंदु
- ब्रह्माजी का स्वरूप और नाम:
- “ब्रह्म” का अर्थ है सर्वव्यापी ब्रह्मज्योति, जबकि “ब्रह्मा” सृष्टिकर्ता देवता हैं।
- उन्हें स्वयंभू और हिरण्यगर्भ भी कहा जाता है।
- वे ब्राह्मण कुल के आदि स्रोत हैं (चूँकि उनका कोई भौतिक अस्त्र नहीं होता, उनके हाथ में वेद और ग्रंथ होते हैं)। उनकी पत्नी देवी सरस्वती विद्या की अधिष्ठात्री हैं, और ब्रह्माजी ‘वागीश’ (वाक् शक्ति के स्वामी) कहलाते हैं।
- वेदों और ग्रंथों का प्राकट्य:
- ब्रह्माजी के मुख से वेदों का विस्तार हुआ। भगवान कृष्ण के वंशीय स्वर से उन्होंने गायत्री मंत्र को प्रकट किया।
- उन्होंने ही महर्षि वाल्मीकि को रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी और सबसे पहले चतुःश्लोकी भागवतम का ज्ञान प्राप्त कर नारद मुनि को प्रदान किया।
- श्रीमद्भागवतम के विभिन्न स्कंधों में भूमिका:
- चौथा स्कंध: दक्ष प्रजापति के यज्ञ विध्वंस के बाद भगवान शिव को शांत करने के लिए ब्रह्माजी कैलाश धाम जाते हैं। पृथु महाराज और इंद्र के युद्ध के समय भी वे आकर मध्यस्थता करते हैं और उचित मार्गदर्शन देते हैं।
- पाँचवें स्कंध: राजकुमार प्रियव्रत को गृहस्थ आश्रम और राज्यधर्म स्वीकार करने का उपदेश देते हैं।
- सातवें स्कंध (हिरण्यकशिपु का प्रसंग): असुरों द्वारा तपस्या करने पर वरदान देने और उसके परिणामों (आतंक) तथा अंत में नृसिंहदेव के प्रकट होने पर प्रह्लाद महाराज द्वारा उनकी स्तुति का वर्णन है।
- आठवें स्कंध (वामन लीला): वामनदेव और बलि महाराज की लीला के दौरान बलि की परीक्षा पर ब्रह्माजी और प्रह्लाद महाराज द्वारा भगवान से कृपा की प्रार्थना का प्रसंग आता है।
- दसवें स्कंध (ब्रह्मविमोहन लीला): एक बार भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं और ग्वाल-बालों के साथ उनकी सहज मित्रता (जैसे मधुमंगल के साथ छाछ की लीला) को देखकर ब्रह्माजी की बुद्धि भ्रमित हो जाती है, जिसे भगवान कृष्ण दूर करते हैं।
- ग्यारहवें और बारहवें स्कंध: यदुवंश के समापन के समय ब्रह्माजी का भगवान से निवेदन और प्रलय के विभिन्न रूपों का वर्णन।
- भक्ति और गुरु-शिष्य परंपरा:
- ब्रह्माजी हमें सिखाते हैं कि सृष्टि संचालन के उत्तरदायित्व के साथ-साथ भगवान श्री कृष्ण की शरणागति और उनकी सेवा ही सर्वोपरि है।
- अंत में, ब्रह्मसंहिता के वचनों के माध्यम से ब्रह्माजी स्वीकार करते हैं कि वे और संपूर्ण सृष्टि भगवान गोविंद (कृष्ण) की ही सेवा में समर्पित हैं: “गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि।”
Full Transcription
ब्रह्माजी की महिमा और श्रीमद्भागवतम: बारह महाजनों में प्रथम
हरे कृष्णा। आज के रविवार्ग्य कार्यक्रम में आप सब का स्वागत हैं। तो श्रीमद्भागवतम में बारह महाजनों का उल्लेख है। छठे स्कंध का तीसरा अध्याय है। यमराज अपने यमदूतों को उपदेश दे रहे हैं। तो बारह महाजनों का उल्लेख करते हैं। तो जो बारह महाजन भक्त हैं, महान हस्तियां हैं, जो अलग-अलग पद्धतियों से हमें भक्ति कैसे करना हैं, यह सिखाते हैं। तो जब मैं यहां पे रहूँगा, तो यह सब आएगा, तो मैं एक-एक महाजन के बारे में चर्चा करूँगा। तो आज हम, जो पहले महाजन के बारे में उपक्रम आ रहे हैं, ब्रह्माजी, उनके बारे में चर्चा करते हैं। स्वयंभू का नाम यहां पे बताया गया है। तो महाजन, जन मतलब लोग, महा मतलब महान, पर वो एक शब्द आता है, आत्मा, महात्मा, तो जो सर्वश्रेष्ठ हस्ती है भगवान, उनसे संबंध हो जाते हैं, तो जो जन महाजन बन जाते हैं, जो आत्मा है, वो महात्मा बन जाते हैं। कैसे होता है? जो सर्वश्रेष्ठ आत्मा है, सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति है, उनसे संबंध हो जाता है, तो वो महाजन बन जाते हैं। तो उनमें से जो प्रधान, पहली इस श्रृंखला में जो है, वो ब्रह्माजी हैं। तो ये जो श्लोक है, तो हम ये ब्रह्माजी के बारे में चर्चा तीन भागों में करेंगे, पहले ब्रह्माजी के बारे में थोड़ी साधारण जानकारी ही हम देखेंगे, तो उसके बाद में अलग-अलग ग्रंथों में ब्रह्माजी की क्या भूमिका है, वो देखेंगे।
श्रीमद्भागवतम और ब्रह्माजी की लीलाएं
और क्योंकि हमारे लिए सुचेतन महाप्रभु ने बताया है कि जो परम प्रमाण है, अमलपुरान जो है, वो श्रीमद्भागवतम है। तो श्रीमद्भागवतम में, ब्रह्माजी लगभग हरेक स्कंध में आते हैं। तो समय के अनुसार हम ब्रह्माजी के अलग-अलग लीलाओं के बारे में श्रीमद्भागवतम से चर्चा करेंगे।
तो ब्रह्मा ये शब्द का मूल है बृह, बृह मतलब विस्तारित होना। तो ब्रह्म और ब्रह्मा ये अलग है। ब्रह्मा ये शब्द का अर्थ है ब्रह्मज्योति जो सबसे विस्तारित है, सर्वव्यापी है उसको ब्रह्म कहते हैं।
पर जो व्यक्ति है, देवता है, उनका नाम ब्रह्मा नहीं है, उनका नाम ब्रह्मा है। जो ब्रह्मा नाम है, उनके अनेक नाम है, स्वयंभू एक नाम है, और फिर एक और नाम है उनका हिरण्यगर्भ कि वो वास्तव में भगवान के गर्भ से प्रकट हुए थे, तो एक सोनेरा गर्भ जो है, उनका नाम हिरण्यगर्भ है और क्योंकि वो एक जन्म हुआ था उनका, तो ऐसे पंकज जो होता है, अंक जो उनका भी एक नाम है, सोने एक नाम है उनके तो ब्रह्माजी की सब देवताओं में एक विशेषता है कि ब्रह्माजी का स्वयं का कोई अस्त्र नहीं है वो कभी युद्ध नहीं करते बहुत विख्यात है वैदिक शास्त्रों में पर वह उस शक्ति को संबोधित करता है जो ब्रह्म परम शक्ति से संबंधित है तो ब्रह्माजी के पास कोई अस्त्र नहीं होता है इन्द्र का एक वज्र होता है यमराज का एक डंडा होता है अलग-अलग प्रकार के देवताओं के अस्त्र होते हैं तो ब्रह्माजी जो हैं क्यों उनका कोई अस्त्र नहीं है क्योंकि वे ब्राह्मण हैं ब्राह्मण युद्ध नहीं करते हैं तो याति पद्धति है वो जन्म से नहीं होती है वो कर्म से होती है हम देखते हैं कि ब्रह्माजी से अनेक पुत्र आते है तो श्रृंखला में जो देवतागण है वो भी ब्रह्माजी के पुत्र है ब्रह्माजी से आते है प्रजापति आते है तो उनमें से एक प्रजापति एक कश्यप और कश्यप के पुत्र देवता और असुर है तो इंद्र जो है उनको क्षत्रिय माना गया है देवता है और इसलिए इंद्र के ब्राह्मण ऋषि उनके जो पुरोहित होते है वो बृहस्पति हैं तो एक ही कुल में जो सबसे आगम शुरुआत है वो एक ब्राह्मण से है पर बाद में उसमें क्षत्रिय भी आते हैं तो गुण कर्म विभागशः तो इंद्र जो है क्योंकि वो आसक्त है वो भी महान भक्त है पर वो राज, ऐश्वर्य, इन सब से आसक्त है और उसके कर्म, उनके गुण कर्म के अनुसार उनको क्षत्रिय बताया गया है और ऋग्वेद में उनका वर्णन है कि वो तो एक क्विंटेंसियल क्षत्रिय एक क्षत्रिय का बहुत अच्छा उदार है, क्षत्रिय का विचार उधार क्या होते हैं? कैसे आसक्तियां होती हैं? कैसे उनके प्रलोभन होते हैं उनके जीवन में? यह इंद्र से संबद्ध होता है, पर ब्रह्माजी जो हैं, वो ब्राह्मण हैं इसलिए उनका कोई शस्त्र नहीं है उनके हाथ में क्या है? साधारण उनके हाथ में वेद होते हैं ग्रंथ होता है तो जो ग्रंथ है उससे ब्रह्माजी ज्ञान देते हैं ब्रह्माजी की जो पत्नी है, उनका नाम क्या है? सरस्वती सरस्वती जो है, उनका नाम, उनके कई नाम है, उनका एक और नाम है वेद माता है एक और नाम है गायत्री है तो ये जो है, सरस्वती देवी वह विद्या की अधिष्ठाता देवी मानी जाती है विद्या व्यक्त कैसे होती है? वाणी से होती है तो जब व्यक्ति बोलता है तो हमें समझता है कि इस व्यक्ति में विद्या है या विद्या नहीं है तो इसलिए सरस्वती देवी का एक नाम है वागीश और ब्रह्मा जी का नाम है वागीश तो जो बोलते हैं वाक् शक्ति, वाक् देवी ये सरस्वती का नाम है और उनके जो स्वामी है उनका नाम है वागीश तो ब्रह्मा जी ये सबसे एक तरह से इस सृष्टि में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है क्योंकि जो बुद्धि के अधिष्ठाता देवी है उनके ही वे स्वामी है अब ब्रह्मा जी हम जानते हैं उनके चार सिर है तो चार सिर क्यों है क्योंकि वो चारों दिशाओं में देखकर भगवान का चिंतन कर रहे है ब्रह्मा जी के हाथ में कभी-कभी माला होती है हम जो श्लोक पर चर्चा करने आएगे इसके बारे में हम चर्चा करें कैसे वो ब्रह्मा जी भक्त हैं क्रतुः पुलहः पुलस्त्य प्रचेता ये सबसे अनेक पुत्र हैं उनके और उनसे ही बाकी सारे जो सृष्टि है उसमें जनता का विस्तार होता है उनके बिन ब्रह्मा जी से ही सब सृष्टि की शुरुआत होती है और ये ब्रह्मा जी इस तरह से उनका जो लोक है उसका नाम क्या है सत्य लोक सत्य लोक या ब्रह्म लोक वह चौदह लोकों में सबसे सर्वश्रेष्ठ लोक है ये सृष्टि जो है उसको हम एक चौदह मंजिल की अगर इमारत मानते है तो फिर ये जो चौदह मंजिल की इमारत है वह कैसी है कि उसके सात मंजिल जमीन के ऊपर है और सात मंजिल जमीन जो है जमीन के अंदर तो इसलिए अगर इस बिल्डिंग से बाहर आना है तो वो ऊपर से आपको निकलेगे तो कूदना पड़ेगा तो इसलिए अगर ऐसे शास्त्र बताया गया है कि ब्रह्माजी की जगह जो पद है सर्वश्रेष्ठ है इस ब्रह्मांड में पर अगर किसी को मुक्ति प्राप्त करनी है भगवतधाम लौटना है तो उसके लिए सर्वोत्तम लोग सांतवा लोग है क्योंकि यहाँ जमीन से बहुत आसान है करीब है ब्रह्माजी को भी मुक्ति मिलती है पर कब मिलती है जब मान लीजिए यह इमारत है इमारत से किसी को बाहर निकलने सातवें मंजर पर आओ पर कोई ऐसे अमेरिका में कुछ साल पहले आतंकवादियों ने आक्रमण किया था और ट्विन टावर्स पर तो सारी इमारत गिर रही थी तो वैसे जब सारी इमारत गिर जाती है तो तभी क्या होता है इमर्जन्सी टेक ऑफ होता है तो तभी अपने आप निकल सकते हैं तभी ब्रह्माजी वो वहीं से भगवत धाम लौट जा रहे है पर उसके अलावा अनेक युगों तक प्रलय होते रहता है सृष्टि होती रहती है सहस्र युग पर्यन्तम अर्यद् ब्रह्मणो विदो भगवान भगवगीता के आठवें अध्याय में बताते है आठवें अनुनिस श्लोक में कि सहस्र युग पर्यन्तम कि ब्रह्माजी का जो आयु है वो बहुत विशाल है और उस समय तक बहुत से सृष्टियां होती है प्रलय होता है नीचे के लोकों में तो ब्रह्माजी का जो पद सबसे शाश्वत है इस ब्रह्मांड में एक ब्रह्माजी के जीवन में अनेक बार इंद्र आके जाते रहते हैं पर ब्रह्माजी एक ही रहते हैं शाश्वत रहते हैं वो तो यू ब्रह्माजी वो जब प्रलय हो जाता है संपूर्ण अंतिम प्रलय होता है सारा ब्रह्मांड का नाश होता है तब अगर वे शुद्ध भक्त हैं तो वे भगवत धाम लौट जाते हैं और फिर ब्रह्माजी जैसे मैंने बताया था कि वो जो है ब्राह्मण तो ब्राह्मण की भूमिका होती है ज्ञान देना तो ब्रह्माजी जो ज्ञान देते हैं अनेक पद्धति से देते हैं वो उनसे ही सब वेद आते हैं उनके मुख से वेद आते हैं जो गायत्री, गायत्री एक देवी है और गायत्री एक मंत्र भी है तो जो गायत्री मंत्र है वह ब्रह्मसंहिता में बताया गया है कि जब ब्रह्माजी ध्यान में भगवान कृष्ण पर चिंतन कर रहे थे तो उन्होंने भगवान कृष्ण के वेणु के आवास सुनी और वो जो वेणु के आवास उन्होंने सुनी तो उसके बाद में उन्होंने अपने शब्दों में उसको उच्चारित करने का प्रयास किया कैसे ध्वनि है ये तो भगवान के वेणु की ध्वनि है वो अद्वितीय है कोई उसको दोहरा नहीं सकता है पर शब्दों में जब बोलने का प्रयास किया तो तभी गायत्री मंत्र प्रकट हुआ जो गायत्री मंत्र है वह शब्दों में प्रकट कृष्ण के वेणु की ध्वनि है तो ब्रह्मा जी के द्वारा गायत्री मंत्र आता है उसकी साथ-साथ ब्रह्मा जी नहीं प्रेरणा दी वाल्मीकि ऋषि को रामायण लिखने की आप सब जानते हो गए वो कथा कैसे वाल्मीकि ऋषि को जब वो खंडित हो गए थे एक शिकारी था और शिकारी ने किसी पंछी थे पंछी और पंछी संग कर रहे थे शिकारी ने उनको मार डाला तो उन्होंने उनको शाप दे दिया और शाप भी निकला बहुत सुंदर श्लोकों के माध्यम से शाप निकला और फिर वो विचार कर रहे थे वाल्मीकि ऋषि में ब्रह्माजी वहां पे आए और वो बोले कि ये जो श्लोक है वाल्मीकि ऋषि को आदि कवि कहा गया है तो भागवतम में आदि कवये ये उल्लेख ब्रह्माजी को किया गया है कवि इस शब्द का दो अर्थ हो जाता है कवि इस शब्द का अर्थ है तत्वज्ञानी कवि इस शब्द का अर्थ है जो कविता करता है तो जो तत्वज्ञानी है आदि त्वज्ञानी है वहां है ब्रह्माजी पर जो आदि काव्य रचक है काव्य रचना करने वाले है वो है वाल्मीकि ऋषि तो फिर ब्रह्माजी ने वाल्मीकि ऋषि से कहा कि हे वाल्मीकि ऋषि इस श्लोक है ये भगवान के गुणगान के लिए आपके मुझे निकला है तो इसी श्लोक के द्वारा आप अभी प्रभुश्री रामचंद्र के महिमा का गुणगान करो इसी मीटर में, इसी छंद में आप करो और फिर उन्हें वाल्मीकि ऋषि ने रामायण की रचना की। इस तरह से जो ब्रह्मा जी है उनको सबसे पहले श्रीमद्भागवतम सुनने को मिला।
श्रीमद्भागवतम का प्राकट्य और गोपालतापनी उपनिषद
श्रीमद्भागवतम के तीसरे स्कंध में चतुःश्लोकी भागवतम आता है और वो सबसे पहले ब्रह्मा जी ने सुना, ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को दिया तो ऐसे जो भागवतम है उसमें सिर्फ अट्ठा आता श्लोक है, ऐसे नहीं है। वास्तव में स्वर्गलोकों में जो भागवतम है, वो और विस्तारित है और व्यक्ति की बुद्धिमत्ता के अनुसार, श्रिमता के अनुसार कभी भागवतम संक्षिप्त होता है कभी विस्तारित होता है तो वो संक्षिप्त भागवतम जो है, वो चतुःश्लोकी भागवतम सबसे पहले ब्रह्मा जी को मिला और उनके द्वारा हम सबको ये ध्यान मिला है और जो अंतराश्चिक श्रीभावनामृत संघ में हम सब आए हैं, ये ब्रह्म माध्य गौरीय परंपरा में होता है तो ये श्रृंखला है, जो ध्यान की परंपरा जो है, उसके शुरुआत ब्रह्मा जी से होती है तो अभी हम भागवतम के ब्रह्मा जी के अनेक महत्वपूर्ण भूमिका है, एक और महत्वपूर्ण भूमिका है, कि एक गोपाल तापनी उपनिषद नाम का उपनिषद है और उपनिषदों में साधारण निरविशेष निराकार ब्रह्म का वर्णन आता है, पर ये गोपाल तापनी उपनिषद जो है, बहुत विशेष उपनिषद है इसमें सब भाई ऋषिगण जाते हैं ब्रह्मा जी के पास, और वो कहते हैं कि हे ब्रह्मा जी हम बहुत मोहित हो गए हैं शास्त्रों में ऐसे तत्त्व तत्थे बताए गए हैं, कि उनको समझना बड़ा मुश्किल है तो आप स्पष्ट हर के हमें बताएं, कि सर्वश्रेष्ठ साध्य क्या है और सर्वश्रेष्ठ साधन क्या है, किसको हमें प्राप्त करना है, और कैसे हमें प्राप्त करना है, उनको सवाल जब पूछते हैं तो तभी ओम श्री गोपाल पहुँच सुंदर श्लोक आते हैं, गोपाल तापनी उपनिषद में ब्रह्माजी गोपाल भगवान का गुणगान करते हैं, और वो कहते हैं कि वास्तव में ये ही परमा आराध्य भगवान है और उनकी भक्ति करना यह परम साधना है तो इसलिए हमारे जो आचार्य गण बलदेव विद्याभूषण वेदांत उनके गोविंद भाष्य टिका में गोपाल तापनी उपनिषद का कई बार उल्लेख करते हैं वहाँ उनको ब्रह्माजी की कृपा से मिला है तो लगभग हरेक ग्रंथ में ब्रह्माजी का सहयोग होता है जो वैदिक शास्त्र के प्राप्ती में है तो श्रीमद्भागवतम जो है उसमें ब्रह्माजी की भूमिका हरेक ग्रंथ में आती है लगभग तो हम कुछ लीलाएं विश्रिमद्भागवतम से चर्चा करेंगे श्रीमद्भागवतम के पहले स्कंध में ही उल्लेख आता है कि जो नारद व्यास संवाद हैं पहले स्कंध के चौथे से चौथे अध्याय तक उसमें नारद मुनि बताते हैं कि वास्तव में ब्रह्माजी मेरे पिता हैं और उनसे मुझे यह अमर शरीर प्राप्त रहा है और अभी हम जो श्लोक चर्चा कर रहे हैं वहाँ दूसरे स्कंध के पांचवें अध्याय से आता है तो ये बड़ा सुंदर प्रसंग है नारद मुनि ऐसे बताया गया है कि जाते हैं वे ब्रह्माजी के पास और वे कहते हैं हे पिताश्री वास्तव में नारद मुनि के पिता है ब्रह्माजी तो इसलिए वे कहते हैं हे ब्रह्माजी आप मुझे बताओ कि इस सारे ब्रह्मांड के स्वामी कौन है सर्वश्रेष्ठ कौन है जहाँ तक मैं देखता हूँ कि सारी सृष्टि है आपके हाथ में जिसे कोई बीज होता है कोई बीज में ले लेगा हाथ में वैसे बीज में आपने नियंत्रण किया हुआ है इसलिए मुझे विश्वास है कि आप सब कुछ जानते हो तो कृपया आप मुझे बताओ कि इस सृष्टि का उद्देश्य क्या है इस सृष्टि का रहस्य क्या है और सृष्टि की अंतिम गति क्या है और फिर नारद मुनि स्वयं सोचते हैं पर मुझे शंका हो रही है कि वास्तव में मैं देखता हूँ कि आप भी ध्यान करते हो और मुझे पता है कि आपने भी तपस्या की थी तो अगर आप ध्यान करते हो आपने तपस्या की थी क्या इसका मतलब है कि आप से महान और कोई हस्ती है अगर वो हस्ती है तो कृपया आप मुझे उनके बारे में आप बताओ और फिर जब ये वर्णन आता है तब ये इस श्लोक से अपना उत्तर ब्रह्माजी शुरू करते हैं अब ब्रह्माजी का उत्तर कई अध्यायों तो जाता है और वो कहते हैं कि हे नारद मुनि वो जो परम पुरुषोत्तम भगवान है उनकी माया के प्रभाव में तुम आ गए हो इसलिए तुम मुझे परम भगवान कह रहे हो तो वास्तव में कह रहे है क्या तस्मै नमो भगवते वासुदेवाय धीमहि मैं वासुदेवा भगवान को प्रणाम करता हूँ उनका चिंतन करता हूँ धीमहि मतलब चिंतन करता हूँ और क्या है उनकी विशेषता यन माया दूरजय नारद मुनि तुम तो इतने महान व्यक्ति हो पर वो भगवान की माया कितनी दूरजय है कि तुम भी उस माया के प्रभाव में आ गए हो और क्या करेंगे माया के कारण मां वलन्ती जगत गुरु तुम सोच रहे हो कि मैं जगत गुरु मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ पर ऐसा नहीं है वास्तव में वो जो परम पुरुषोत्तम भगवान से कृष्ण है वही सर्वश्रेष्ठ है तो यहाँ पर नारद मुनि जानते है कि कृष्ण ही भगवान है पर वह एक शिष्य की भूमिका ले रहे है हमें दिखाने के लिए कैसे हमें शिष्य की पादना चाहिए और ब्रह्मा जी एक आदर्श गुरु की भूमिका लेते हैं और हम पूछते क्या आप भगवान हैं तो बोलते हैं नहीं नहीं मैं भगवान नहीं हूँ पर लोग मानते हैं हमको भगवान मानने दो अज्ञानी है तो अज्ञानी हैं तो ज्ञान देना चाहिए तो वास्तव में ब्रह्मा जी क्या बोलते हैं कि जो मुझे भगवान मानते हैं वो मुर्ख हैं वो माया के प्रभाव में आ गए हैं
तपस्या और भगवान की शरणागति
प्रभुपाद जी कभी कई बार ऐसा होता था कि लोग आते थे और बोलते थे कि मेरे जो गुरु है वो भगवान है प्रभुपाद जी बोलते हैं शास्त्रों में बताया गया नहीं नहीं नहीं मैंने बहुत चमत्कार देखे क्या चमत्कार देखे बोलते हैं कि जब मेरे गुरु मेरे सिर्फ हाथ रखते हैं तो मेरे शॉक में जाता है सारा इलेक्ट्रिक करंट मेरे चेहरे से जाता है तो प्रभुपाद जी बोलते हैं वो सामने इलेक्ट्रिक सॉकेट है उसमें हाथ लगाओ शॉक मिल जाये क्या गुरु का गुरु या भगवान का उद्देश्य शॉक देना नहीं है शॉक से बचाना है तो वास्तव में लोगो भगवान क्या है ये पता ही नहीं है और थोड़ा कोई चमत्कार दिख जाता है तो उसको भगवान कह लाने लगते हैं पर जो सही में महान जस्ती होते हैं वो क्या कहते हैं मैं भगवान नहीं हूँ वास्तव में परमपुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण है एक बार इस्कॉन में भी ऐसे हुआ 1968 में कि कुछ इस्कॉन के भगत प्रभुपाद अमेरिका में इस्कॉन शुरुआत किया और कुछ भगत अब अपने शिष्यों को भारत में लेकर आए तो भारत में जब आए तो इस्कॉन के भगत बाकी सब धर्म के लोगों बाकी सब संस्थाओं के लोगों से मिले और वो देखा कि सब संस्थाओं में जो लोग हैं वे अपने गुरु को भगवान बता रहे हैं तो इसलिए कुछ भगत अमेरिका चले गए और उन्होंने अमेरिका में क्या किया उन्होंने वो बड़ा बहुत शो चल रहा था वहाँ पर बता दिया कि वास्तव में प्रभुपाद ही कृष्ण है और हम इतने मूर्ख हैं कि आज तक हम समझ नहीं पाये प्रभुपाद ही कृष्ण पर अभी तो हमें मूर्खता का अंत करना सके और हमें समझ ना देखे तापव तपव तपव मतलब तपस्या करो तो फिर वो तपस्या करने लग गए तो इस तरह से अनेक सालों तो तपस्या की सैकड़ो सालों तो तपस्या की वो नहीं और जब तपस्या कर रहे थे तभी भी वही भीषण हवा चालू हो गए पर तपस्या की शक्ति से क्या हो गया उनके तपोबल से वो इतने शक्तिशाली बन गए कि जब तपस्या कर रहे थे तपस्या भंग होने लग गए तो तभी उन्होंने सिर्फ अपना मुँह खोला और जब तूफानी हवा आ रही थी निगल दिया उन्होंने और सारा तूफान थम गया तो क्या होता है तपस्या में बड़ी शक्ति होती है तो वास्तव में कई बार हमारे जीवन में ऐसे प्रसंग आते हैं कि हम शारीरिक रूप से इस चारों अंधकार में नहीं होगा पर क्या करे क्या न करे समझ में नहीं आता ऐसे तो वह भी एक प्रकार का अंधकार ही है जीवन में क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए तो बुद्धि की एक परिभाषा है intelligence means to know what to do when we don’t know what to do कि जब पता नहीं है क्या करना तब क्या करना अगर ये पता हो जाए तो बुद्धि कहते हैं तो अगर पता नहीं है क्या करना तो क्या करना चाहिए भगवान की शरण लेने चाहिए तो जिसे ब्रह्माजी ने तपस्या की आत्म समर्पण की है वैसे जो हम हरे कृष्ण महामंत्र का बोलते हैं हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे तो हरे कृष्ण महामंत्र का भाव क्या है हे भगवान आप मुझे आपकी सेवा में लगाओ आपकी सेवा में लगाओ तो मुझे सेवा कैसे करनी है पता नहीं है पर अगर हम भाव रखते हैं कृपया आप मुझे आपकी सेवा में लगाओ तो फिर भगवान बुद्धि देते हैं हमारे लिए तपस्या उपवास करके तूफान को सहन करना नहीं है हमारा तूफानी मन उसको सहन करके जप करते रहना है तो उससे क्या होगा? उससे बुद्धि जागृत हो जाएगी और फिर इससे से तपस्या करते रहे दृढ़ संकल्प से तपस्या करते रहे और फिर बाद में स्वयं भगवान उनके सामने प्रकट हो गए ना केवल भगवान प्रकट हुए भगवान के साथ उनकी सारी शक्तियां, उनके सारे पार्षद, सारा आध्यात्मिक जगत प्रकट हुआ और फिर ये तीसरे स्कंध के आठवें अध्याय में इसका वर्णन है और फिर उसके नौवें अध्याय में ब्रह्माजी उनको प्रार्थना करने लगते हैं इतना विशाल आपने मुझे सेवा दिए, सारे ब्रह्मांड की सृष्टि करना तो मुझे दो भय है एक भय है कि ये सृष्टि कैसे कर पाऊंगा मैं और उससे बड़ा भय है कि सृष्टि मैं कर लूंगा तो उससे मैं गर्वित हो जाऊंगा क्यों क्या है कि उन्होंने आध्यात्मिक जगत की झलक देख रही है और जो आध्यात्मिक जगत की सौंदर्य या आध्यात्मिक जगत की शाश्वत्ता उसका सुख देखने के बाद इस भौतिक जगत में लगना और उसमें बंधना उसका उन्हें भय लग रहा है तो इसलिए बोलते हैं कि मैं ये सृष्टि करूँगा तो उससे गर्वित नहीं होना चाहता हूँ तो वास्तव में कभी-कभी हम भी जब मंदिर में आते हैं यात्रा को जाते हैं धाम में जाते हैं तो हमें एक आध्यात्मिक जगत की झलक मिलती है कि भगवान के नाम संकीर्तन करना श्रवण करना दर्शन करना उसमें एक दिव्यानंद मिलता है पर उसके बाद में हमें वापस हमारा कर्तव्य होता है उसमें लगना पड़ता है तो उसमें बंधन में कैसे ना पड़े इसके लिए भगवान ब्रह्माजी का उपदेश देते हैं और ब्रह्माजी बोलते हैं कि वास्तव में तुम हमेशा याद रखो कि तुम्हारी शक्ति है वो मुझसे आ रही है और ऐसे नहीं है कि इसके बाद में तुम सृष्टि करोगे उसकी शक्ति मुझसे आ रही है अभी तक तुम्हें तपस्या की है वो तपस्या की शक्ति भी मुझसे ही आ रही है तो अगर याद तुम स्मरण रखोगे तो कभी तुम माया में नहीं पढ़ोगे और फिर भगवान ब्रह्माजी को चतुःश्लोकी भागवतम का उपदेश देते हैं और फिर उस पे मनन करते हुए उस पे चिंतन करते है ब्रह्माजी की सृष्टि की शुरुआत करते हैं और इस तरह से सृष्टि की शुरुआत करते हैं ब्रह्माजी मोहों की चीज़ों में होते हैं ब्रह्माजी अज्ञान में होते हैं तब क्या करना है पता नहीं है और हरेक जीवात्मा की सृष्टि होती है जब जीवात्मा जन्म लेता है बहुते। तो क्या करता है? लोग कहता है हैप्पी बर्थडे,
ब्रह्माजी की भूमिका और श्रीमद्भागवतम: बारह महाजनों में द्वितीय भाग
तो वह हैप्पी नहीं होता है। वह रोता है कि अज्ञान में पता नहीं है क्या करना है। और एक प्रकार का अज्ञान है जो पता नहीं है कि क्या करना है। दूसरा प्रकार का अज्ञान है, उसमें पता नहीं है कि अज्ञान में है। कि दूसरा प्रकार का अज्ञान तो जो छोटा बालक होता है, वो पहले प्रकार के अज्ञान में है। हम सब दूसरे प्रकार के अज्ञान में हैं। क्या है दूसरे प्रकार का अज्ञान, कि हमें अज्ञान में हैं, यह पता ही नहीं है। हमें लगता है कि मैं बुद्धिमान हूँ, मेरे यह नौकरी है, मेरा यह घर है, मैं बड़ा अच्छी तरह से जीवन जी रहा हूँ।
चतुर्थ स्कंध में ब्रह्माजी और दक्ष यज्ञ का प्रसंग
चौथा स्कंध भागवतम का, उसमें ब्रह्माजी अभी कार्य में लग गए हैं। अभी तक सृष्टि की शुरुआत हो गई है, पर अभी चौथा स्कंध जब आ गए हैं सृष्टि पूरी हो गई है, सृष्टि में सारे जीव जंतु आ गए हैं और सृष्टि का कार्य चल रहा है, और उसमें फिर ब्रह्माजी का योगदान करते हैं, उनका कार्य होता है तो ब्रह्माजी की प्रधान भूमिका है चौथे स्कंध के छठे अध्याय में और उन्नीसवें अध्याय में आ गए हैं। तो छठे अध्याय में क्या है ब्रह्माजी शिवजी के पास जाते हैं और शिवजी को प्रार्थना करते हैं। तो उसकी पार्श्वभूमि क्या है कि जो सती है सती कौन है शिवजी की पत्नी है तो लंबी कहानी आप सबको पता होगी कि दक्ष प्रजापति के अपमान के कारण सती आत्महत्या कर लेती हैं और इससे जिससे जो शिवजी बड़े क्रोधित हो जाते हैं और शिवजी क्रोधित होके क्या करते हैं अपने ही एक विस्तारित रूप बनाते हैं वीरभद्र के रूप में और उससे सारे दक्ष के यज्ञ को अपर्नाश कर लेते हैं दक्ष को मार डालते हैं और चारों ओर हाहाकार मच जाता है।
तो तभी क्या होता है जब ब्रह्माजी देखते हैं तो अब ब्रह्माजी सोचते हैं कि अब शिवजी क्रोधित हो गए हैं उनको शांत करना भी कोई और नहीं कर सकता है तो मुझे यही करना पड़ेगा। तो इसलिए ब्रह्माजी आते हैं कैलाश धाम में और भागवतम में कैलाश का वर्णन प्रधान रूप से इस छठे अध्याय में आया है और उसमें बड़े-बड़े वृक्ष हैं और हजारों-हजारों लाखों-लाखों शिवजी के वहाँ भक्त हैं, शिवजी का गुणगान करते हैं। वहाँ पे ब्रह्माजी जाते हैं और ब्रह्माजी प्रार्थना करके उनको संतुष्ट करते हैं, शिवजी संतुष्ट होते हैं प्रार्थना से और फिर वे कहते हैं कि जो मैंने गलतियाँ की हैं उनको मैं माफ कर देता हूँ। तो वास्तव में जो ब्रह्माजी जो होते हैं वह यह सृष्टि में कोई समस्या होती है, समस्या को व्यक्त करते हैं, समस्या का हल करने का प्रयास करते हैं।
पृथु महाराज और इंद्र का प्रसंग
तो कैसे होता है कि अगर मान लीजिए दो बच्चे हैं वो झगड़ा कर रहे हैं तो क्या होता है फिर माता या पिता आते हैं फिर दोनों बच्चों को समझाते हैं। तो वैसे ही चौथे स्कंध के उन्नीसवें अध्याय में वर्णन आता है कि इंद्र और पृथु इन दोनों में युद्ध होने लगता है। पृथु महाराज बड़ा यज्ञ कर रहे हैं और उनको इच्छा है कि सौ यज्ञ करें। पर पृथु महाराज को एक पुत्र होता है, वह फिर इंद्र को तीर लेके मारने ही वाला होता है और जब मारने ही वाला होता है तो तभी क्या होता है स्वयं ब्रह्माजी आते हैं वहाँ पे और ब्रह्माजी कहते हैं रुको-रुको-रुको तुम तो यज्ञ कर रहे हैं और यज्ञ में प्रधान एक महत्वपूर्ण देवता है इंद्र जिसके लिए तुम यज्ञ कर रहे हैं उसको ही मार डालोगे?
और वे कहते हैं कि तुम यज्ञ कर रहे हो तो सौ यज्ञ करने क्या ज़रूरत है? और फिर वे स्वीकार कर लेते हैं पृथु महाराज। वह स्वीकार करना बड़ा मुश्किल है क्यों मुश्किल है मान लीजिए कोई क्रिकेट मैच चल रहा है और बैट्समैन 99 पे है और कैप्टन बोलता है मैं डिक्लेर कर लेता हूँ तो वह बैट्समैन जाएगा और वह क्रिकेटर कैप्टन को डिक्लेर कर देगा उसको बोलेगा, उसको क्रोध हो जाएगा वहाँ पर, पर वास्तव में क्या है पृथु महाराज की बात को ब्रह्माजी समझाते हैं और पृथु महाराज मान लेते हैं तो उससे क्या होता है बीसवें अध्याय में वर्णन आता है कि स्वयं विष्णु प्रकट होते हैं और विष्णु प्रकट होके पृथु महाराज को आशीर्वाद देते हैं, उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं, स्वयं दर्शन देते हैं और पृथु महाराज का परम यश है वह प्राप्त होता है।
कभी-कभी क्या होता है हमारे जो गुरुदेव होते हैं वो हमें कभी-कभी ऐसा उपदेश देते हैं कि उसको पालन करना बड़ा मुश्किल लगता है, उसको बड़ा कटु लगता है, पर उस आदेश का यदि हम पालन करते हैं तो उससे भगवान प्रसन्न होते हैं, उससे हम भक्ति में प्रगति करते हैं।
प्रभुपाद जी का स्मरण और रूस में प्रचार
प्रभुपाद जी जब 1976-1977 में थे, उनके एक सेक्रेटरी हरि केस प्रभु नाम है तो वो उनकी सेक्रेटरी की सेवा कर रहे थे। प्रभुपाद जी बोले कि तुम यहाँ पर बैठ के टाइपिंग क्यों कर रहे हैं, तुम जाओ रशिया में और प्रचार करो। तो वास्तव में यह रशिया जो था, उस समय में वह सोवियत यूनियन नाम था और वहाँ पे जो पूरा धर्म जो था, उसको गैरकानूनी बताया गया था, वह नास्तिक राज्य था और जो सोवियत यूनियन में वास्तव में जो भी धर्म का प्रचार करने का प्रयास करते थे उनको न केवल जेल में डालते थे और उनको कभी-कभी मार डालते थे। तो प्रभुपाद जी ने कहा तुम यहाँ बैठकर टाइपिंग क्यों कर रहे हो, तुम वहाँ पे जाकर प्रचार करो। तो उन्होंने कहा कि मैं जा नहीं सकता। तो वे सोच रहे थे क्या करूँ, पर प्रभुपाद जी चाहते थे तुम जाकर प्रचार करो। और फिर वहाँ पे जाकर प्रचार चालू किया और अभी उसके बाद में प्रभुपाद जी स्वयं गए, प्रभुपाद जी पाँच दिन के लिए रशिया में थे। और फिर अभी जो रशिया में इतना विस्तार से प्रचार हो रहा है, तो वो सारे की शुरुआत कैसे हुई? वो प्रभुपाद जी ने एक आदेश दिया कि तुम जाके प्रचार करो और जाके प्रचार में बहुत यश मिल गया।
पाँचवें स्कंध में प्रियव्रत की कथा
फिर पाँचवें स्कंध में एक और प्रकार से—तो अभी ब्रह्माजी सृष्टि चालू हो जाती है तो इसमें ब्रह्माजी ब्राह्मण के रूप में ध्यान देते हैं, आदेश देते हैं। तो उसमें वर्णन पाँचवें स्कंध में प्रियव्रत की कहानी है। तो प्रियव्रत जो होते हैं वे बहुत शक्तिशाली राजकुमार होते हैं, पर वे जाते हैं जंगल में तपस्या करने के लिए और तपस्या करने जाते हैं और वे आते ही नहीं है। पर जो महाराज उत्तानपाद, उनके वंश में कोई पुत्र नहीं होता है इसलिए राजा बनने के लिए उनको वापस आना होता है। तो वे कहते हैं मैं अभी जंगल से वापस नहीं आऊँगा। तो उनके पिताजी आते हैं मनु, बोलते हैं मैं नहीं आऊँगा जंगल से वापस। तो स्वयं ब्रह्माजी वहाँ पे आते हैं और कहते हैं कि वास्तव में जंगल में रहना है या घर में रहना है, महत्वपूर्ण क्या है कि भगवान की सेवा करनी है। और अगर भगवान की सेवा करने के लिए घर में आना है, राज्य स्वीकार करना है तो तुम राज्य स्वीकार करो। और ये सुनते हैं तो प्रियव्रत महाराज स्वीकार कर लेते हैं उनसे और प्रियव्रत महाराज बहुत महान राजा बनते हैं।
छठे स्कंध में देवताओं की संकट स्थिति और बृहस्पति का प्रसंग
तो ये छठे स्कंध में जो ब्रह्माजी का वर्णन आता है, वह दो-तीन जगह पे आता है और महत्वपूर्ण क्या होता है ब्रह्माजी साधारणतया ध्यान करते हैं, ब्रह्माजी जो ब्रह्मांड का मैनेजमेंट है, एडमिनिस्ट्रेशन है, उसमें डायरेक्टली वहाँ तक्षिप नहीं करते हैं और जो देवतागण भी होते हैं, उनको अगर पहले कुछ समस्या होती है तो उनके पुरोहित कौन है? बृहस्पति। सबसे पहले बृहस्पति के पास जाते हैं। पर यहाँ पे क्या छठे स्कंध में बताया गया है, सातवें-आठवें अध्याय में कि एक बार इंद्र बृहस्पति का अपमान कर देते हैं और फिर इसलिए बृहस्पति गायब हो जाते हैं वहाँ से और फिर तभी देवताओं पे असुर आक्रमण कर देते हैं और फिर देवता डर जाते हैं, वे अपने घर छोड़के भागने लगते हैं, मैदान छोड़के भागने लगते हैं, जाते हैं सीधा ब्रह्माजी के पास।
तो ब्रह्माजी एक दर्जे गुरु के गुरु हैं, उनके बृहस्पति साधारण गुरु हैं। बृहस्पति नहीं है तो फिर ब्रह्माजी उनको बताते हैं कि वास्तव में तुमने बड़ी मूर्खता की है कि तुमने अपने जो गुरु हैं बृहस्पति का अपमान किया और अगर तुम्हें भी कल्याण करना है तो तुम्हें गुरु की जरूरत है। अब बृहस्पति उनसे नाराज हो गए हैं तो किसी और ब्राह्मण के पास जाओ, उनकी सेवा आप करो और उससे आप शक्ति वापस प्राप्त करो। तो इंद्र पूछते हैं कि किसके पास जा रहे हैं? तो बोलते हैं कि जो विश्वरूप है, वो त्वाष्ट्र ब्राह्मण हैं, उनके पुत्र हैं, उनके पास आप जाओ। और फिर वो विश्वरूप को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करते हैं।
सातवें स्कंध में हिरण्यकशिपु का प्रसंग
तो अभी तक जो ब्रह्माजी का वर्णन है, कि यह सारा सकारात्मक है, पर सातवें स्कंध में पहली बार ब्रह्माजी का जो वर्णन आता है, एक नकारात्मक पद्धति आता है। नकारात्मक पद्धति मतलब क्या? सातवें स्कंध में वर्णन आता है तीसरे और चौथे अध्याय में कि हिरण्यकशिपु बहुत तपस्या करते हैं और किस लिए तपस्या करते हैं? ब्रह्माजी से कहते हैं कि मुझे आप वर दो कि मुझे अमर बनना है। और जब ऐसा वर मांगते हैं तो ब्रह्माजी कहते हैं—अलग-अलग प्रकार के जो शर्त के साथ—कि इस समय में मेरी मृत्यु नहीं होगी, इस तरह से मेरी मृत्यु नहीं होगी, वो सब शर्त मान लेते हैं। पर उससे क्या होता है, उससे वो हिरण्यकशिपु एक आतंकवादी बन जाता है और सारे ब्रह्मांड में आतंक करने लगता है।
और तभी क्या होता है सब देवतागण ब्रह्माजी के पास जाते हैं, ब्रह्माजी बोलते हैं आपने क्या वर दे दिया? तो ब्रह्माजी बोलते हैं क्या करूँ, मुझे वर तो देना मेरा कर्तव्य है, कोई तपस्या करता है तो वर देना है मुझे। और फिर बाद में प्रह्लाद महाराज उनका हिरण्यकशिपु का प्रतिकार करते हैं और फिर नौवें अध्याय में क्या होता है, आठवें अध्याय में हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए नृसिंहदेव प्रकट होते हैं। और फिर ब्रह्माजी सोचते हैं क्या करना है, सब देवतागण ब्रह्माजी से बोलते हैं, पहले तुमने हिरण्यकशिपु को वर दिए उससे इतनी परेशानी हो गई, पर अभी एक परेशानी है—हिरण्यकशिपु की परेशानी का अंत हो गया, पर अभी ये भगवान इतने क्रोधित हैं, उनको शांत कौन करेगा?
तो ब्रह्माजी शांत नहीं कर पा रहे, बाकी सब देवतागण प्रार्थना करते हैं, कोई भी शांत नहीं कर पा रहे। तो ब्रह्माजी सोचते हैं मैं क्या करूँ, मेरी जिम्मेदारी है, प्रह्लाद तुम जाके प्रार्थना करो। वास्तव में तुम बिल्कुल अपने भक्ति में टस से मस नहीं हुए। और फिर ब्रह्माजी के कहने पे प्रह्लाद जाके प्रार्थना करते हैं और फिर प्रह्लाद महाराज की प्रार्थनाओं से जो नृसिंहदेव हैं, संतुष्ट हो जाते हैं। और फिर नृसिंहदेव प्रह्लाद महाराज को आशीर्वाद देते हैं और फिर बाद में ब्रह्माजी से कहते हैं कि ऐसे जो मूर्ख असुर हैं, उनको तुम वर मत दो, इस तरह से ऐसे वर दोगे तो सारे ब्रह्मांड में उत्पाद मच जाएगा।
आठवें स्कंध में वामनदेव और बलि महाराज की लीला
फिर आठवें स्कंध में ज़्यादा ब्रह्माजी का उल्लेख दो जगह पे आता है। एक और बार ग्यारहवें अध्याय में देवी-देवता को आपस में युद्ध हो जाता है और भगवान के प्रभाव से इंद्र बलि महाराज को बेहोश कर देते हैं और बाकी सब असुरों को मार डालते हैं। और जब असुरों के सेनापति को मार डालते हैं, तो फिर सारे देवी-देवता और उनके सैनिक जो हैं सब असुरों पे प्रहार करते हैं। तब ब्रह्माजी वहाँ पे आते हैं और ब्रह्माजी कहते हैं—वास्तव में देव और असुर जो हैं वो चचेरे भाई हैं, वास्तव में क्या हैं? सौतेले भाई हैं। तो वास्तव में कश्यप जो हैं, दिति और अदिति—दिति के पुत्र हैं असुर और अदिति के पुत्र हैं देव। तो वो युद्ध करते रहते हैं और युद्ध करते रहते हैं तो क्या है? ब्रह्माजी की योजना से देवताओं को ऊपर का लोक दिया गया है, असुरों को नीचे का लोक दिया गया है, पर असुरों की इच्छा क्या होती है कि हमको ऊपर का लोक चाहिए इसलिए बार-बार आक्रमण करते हैं वो।
फिर वामनदेव की लीला में, जब भगवान तीन पग भूमि मांगते हैं, तो पहले दो पगों से ही सारे ब्रह्मांड को वे नाप लेते हैं और फिर वे बलि महाराज से कहते हैं कि तुमने अपना व्रत पूरा नहीं किया है इसलिए मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूँ। और गरुड़ जी आके बलि महाराज को बांध देते हैं और जब बांध देते हैं तो बलि महाराज कैदी बन गए अपने सारे राक्षसों के सामने ही। और फिर सब राक्षसों को आक्रमण करने लगते हैं वामनदेव पे। तो फिर क्या होता है जो सब भगवान के पार्षद हैं, जो उनके सैनिक हैं वो सब असुरों को धकेल लेते हैं, उनको आक्रमण कर लेते हैं और तभी बलि महाराज अकेले रहते हैं वहाँ पे और बलि महाराज बंधे हुए हैं और भगवान वामनदेव क्रोधित लग रहे हैं।
और तभी ब्रह्माजी वहाँ पे आते हैं और ब्रह्माजी कहते हैं—हे भगवान! आप अलग-अलग भक्तों की अलग-अलग परीक्षा लेते हैं, पर इनकी कितनी परीक्षा आप ले रहे हैं? कि साधारण व्यक्ति अगर आपको सिर्फ एक तुलसी दल अर्पित कर देता है तो उससे भी आप संतुष्ट हो जाते हैं, इसने तो अपना सारा राज्य आपको अर्पण कर दिया है और फिर भी आप संतुष्ट नहीं हो रहे हैं? क्यों आप इसकी इतनी परीक्षा ले रहे हैं? और तभी प्रह्लाद महाराज वहाँ आते हैं और बहुत सुंदर वहाँ पे वार्तालाप होता है। तो यहाँ पर हम देखते हैं कि कैसे होता है कि अगर भगवान बहुत परीक्षा लेते हैं किसी भक्त की, तो गुरुदेव जो होते हैं वो भक्त के वास्ते से हस्तक्षेप करते हैं—भगवान! आप इसमें थोड़ी कृपा करो, इतनी तीव्र परीक्षा आप मत लो।
नौवें और दसवें स्कंध में ब्रह्माजी की भूमिका
फिर नौवें स्कंध में ब्रह्माजी का उल्लेख एक ही बार आता है। क्या होता है? एक बार दो देवताओं में युद्ध हो जाता है—सोमदेव और बृहस्पति। उनमें युद्ध हो जाता है, लंबी कहानी है। और फिर सोमदेव देवता हैं, पर उनके पक्ष में सब असुर आ जाते हैं और बृहस्पति के पक्ष में इंद्र आ जाते हैं और फिर बड़ा युद्ध होने लगता है उनमें।
और जब दसवें स्कंध में भगवान कृष्ण की लीला होती है, तो भगवान जब गोवर्धन लीला या बाल लीला करते हैं, तो दसवें स्कंध के चौदहवें अध्याय में ब्रह्माजी की मोह लीला हो जाती है। ब्रह्माजी अज्ञान में होते हैं जब क्या करना है पता नहीं है। जब ब्रह्माजी देखते हैं कि कृष्ण क्या कर रहे हैं, उस दिन कृष्णा भी प्रसाद लेने वाले हैं। जब प्रसाद लेने वाले होते हैं तो उनका एक मित्र होता है—मधुमंगल। तो मधुमंगल क्या होता है, वह सोचता है—मधुमंगल एक ब्राह्मण है, बाकी सब कृष्णा वे वैश्य के परिवार में जन्म लेते हैं, तो ब्राह्मण साधारणतया गरीब होते हैं क्योंकि ब्राह्मण धन सामग्री ज़्यादा एकत्रित नहीं करते हैं। तो इसलिए मधुमंगल अपने घर से प्रसाद लेके आया, डिब्बा लेके आया उसमें क्या है? सिर्फ एक छाछ है और छाछ बड़ी साधारण छाछ है।
तो क्या होता है जब सब प्रसाद साथ में लेते हैं तो क्या करते हैं कृष्णा सब के प्रसाद के डिब्बे से थोड़ा-थोड़ा अन्न लेते हैं और अपना अन्न वे भी सबको देते हैं। तो मधुमंगल सोचता है कि मैं जो लाया हूँ वो ये छाछ है, बड़ी साधारण है, एक कृष्णा के लिए उचित नहीं है। तो इसलिए वो क्या करता है मधुमंगल अपना जो मटका होता है छाछ का वो लेकर चले जाता है और एक पेड़ के बीच जाकर छुपता है। और भगवान कृष्ण तो सर्वज्ञ हैं, देखते हैं अरे मधुमंगल कहाँ है? और मधुमंगल सोचते हैं कहाँ गया? भगवान मित्र से कहते हैं आप बैठो मैं आता हूँ और वो देखते हैं कि मधुमंगल क्या अकेले खा रहे हो? पकड़ लिया तुमको!
और मधुमंगल देखते हैं कि भगवान आ रहे हैं, पी रहे हैं, पी रहे हैं तो सोचते हैं क्या करें? तो सोचते हैं क्या जल्दी पी लेते हैं, तो पी लेते हैं तो क्या होता है? अगर हम बहुत पानी एक साथ पी लेते हैं तो क्या होता है मुँह फूल जाते हैं, तो सारा मधुमंगल का मुँह फूल जाता है। पर वो क्या होता है मटका खत्म हो जाता है इसलिए कि मैंने भी पी लिया, अब कृष्ण कुछ नहीं कर सकते हैं। पर कृष्ण सबसे बड़े बुद्धिमान हैं, तो क्या करते हैं वो कृष्ण आते हैं, मधुमंगल का मुँह ऐसा फुला हुआ है कि मुझे मारते हैं, तो क्या होता है सारा जो छाछ है उनके मुँह से निकल जाता है और छाछ जो मुँह से निकलता है तो भगवान कृष्ण के हाथ पे शरीर पे गिरता है, भगवान क्या करते हैं उसको उठा कर पीने लगते हैं।
तो जब ब्रह्माजी ये देखते हैं तो उनको कल्चर शॉक हो जाता है! क्या है ये? क्या है ये? एक तो वास्तव में कैसे किसी का किसी का जूठा खाना भी अच्छा नहीं है, महान भक्त का जूठा खाना अच्छा है, पर ये तो क्या है एक ग्वाल का लड़का है और जूठा एक चीज़ है, किसी के मुँह से निकला हुआ खाना वो तो बहुत है, ये कैसे भगवान हो सकते हैं? तो ये कैसे भगवान हो सकते हैं, वो कृष्णा उनको दिखाते हैं उसके बाद। तो वास्तव में क्या है जो ब्रह्माजी वागीश हैं, वो सरस्वती देवी के स्वामी हैं, पर वे भी अगर प्रत्यक्ष प्रमाण से देखते हैं तो क्या होता है? वो समझ नहीं पाते हैं। और फिर ब्रह्मविमोहन लीला हो जाती है और उसके बाद में अंत में ब्रह्माजी समझते हैं—मैंने क्या किया? मैंने मेरे प्रभु की ही परीक्षा लेने का प्रयास किया, कृपया मुझे माफ कर दो।
ग्यारहवें और बारहवें स्कंध में समापन
और फिर ग्यारहवें स्कंध के छठे अध्याय में वापस ब्रह्माजी का वर्णन आता है। उसमें बताया गया है कैसे यदुवंश का अंत हो जाता है और फिर ब्रह्माजी भगवान से निवेदन करते हैं कि हे प्रभो! अभी आप इस भौतिक जगत में आए, आपने अपनी लीला की और सारे ब्रह्मांड को आपने कृतज्ञ किया, तो अभी आपकी जो कार्य था वो अभी खत्म हो गया है। तो अगर आपकी इच्छा है तो कृपया आप भगवधाम लौट जाओ। और जब ऐसे कहते हैं तो भगवान कहते हैं कि हाँ, आपने जो कहा उचित है, अभी मैं जल्दी ही भगवधाम लौट जाऊँगा।
और फिर इसके बाद में बारहवें स्कंध में वर्णन आता है चार प्रकार के प्रलय का और उसमें बताया है कैसे कि ब्रह्माजी के जो अनेक प्रकार के प्रलय होते हैं, पर ब्रह्माजी का जो धाम है, बहुत ब्रह्माजी का जो लोक है उसका कभी अंत नहीं होता है जब तक ब्रह्मांड का अंत नहीं होता है। और फिर ब्रह्माजी वहाँ पर बोलते हैं कि वास्तव में जो मेरे स्वामी हैं वह भगवान श्री कृष्ण हैं और मैं उनका चिंतन करता हूँ।
इस तरह से ब्रह्माजी अपने जीवन से हमें दिखाते हैं कैसे हम अलग-अलग तरह से भगवान श्री कृष्ण की अलग-अलग प्रस्तुतियों में सेवा कर सकते हैं।
प्रभुपाद जी एक बार जब वृंदावन में थे, तो जगन्नाथपुरी में आप जानते हैं कि अभी तक ऐसे उनकी पॉलिसी है मंदिर की कि जो भारत में जन्म लिया है हिंदू कुल में, उनको ही वे मंदिर में प्रवेश देते हैं। तो कितने भी महान भक्त हों, उनको अगर प्रवेश चाहिए तो जन्म लिया है तो उनको प्रवेश नहीं देते हैं। तो प्रभुपाद जी एक बार शिष्यों को बोले कि आप जाके उनसे मिलो, उनको बोलो कि हम ये चार नियमों का पालन करते हैं, सोलह माला जप करते हैं, इतनी तीव्रता से कौन भक्ति कर रहा है? हम सारे विश्व भर में जगन्नाथ जी का प्रचार कर रहे हैं, तो फिर आपको प्रवेश देना चाहिए। तो उन्होंने कहा—नहीं-नहीं, आप ऐसे ही भक्ति करते रहो, अगले जन्म में आपका भारत में जन्म होगा और भारत में आपका ब्राह्मण कुल में जन्म हो जाएगा तो आप जगन्नाथ जी की अत्याचार (आराधना) कर सकते हैं।
तो फिर प्रभुपाद जी ने कहा कि वो कह रहे हैं कि भारत में जन्म होना चाहिए आपका, पर उनको कहना चाहिए कि जो सबसे पहले ब्राह्मण हैं, ब्रह्माजी, उनका भी जन्म भारत में नहीं हुआ था! तो ब्रह्माजी का तो इस पृथ्वी से परे जन्म हुआ है। तो वास्तव में ये संकीर्ण भाव था। तो फिर प्रभुपाद जी कहा करते थे कि वो उनका नाम जगन्नाथ है, पर उनको आप भारतनाथ बना रहे हो। वो भगवान का दर्शन करते हैं तो वे ब्रह्मसंहिता के श्लोक आते हैं और ब्रह्मसंहिता भक्तिसिद्धांता ठाकुर बताते हैं कि ये वास्तव में श्रीमद्भागवतम का सार है और इस ब्रह्मसंहिता के श्लोकों में सारे सृष्टि का संबंध भगवान से कैसे है वो ब्रह्माजी बताते हैं और उसके अंत में बोला है—गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि। ब्रह्माजी कहते हैं कि सारे सृष्टि, मेरा सारे सृष्टि के सारे देवता उन सबके स्वामी आप हैं और मैं आपका भजन करता हूँ।
श्रीब्रह्माजी की, श्रीगोविन्द देव की, ग्रंथाश्रीमद्भागवतम् की, शीलप्रभुपाद की, जय गोविंद प्रेमानंदे!
Thank you very much, हरे कृष्णा।