Mahajanas 2 – Narada Muni (Hindi)
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Lecture Summary
प्रवचन का मुख्य सारांश
इस प्रवचन में मुख्य रूप से भक्त प्रह्लाद के जन्म, गुरु-शिष्य के आदर्श संबंध, भगवान की अचिन्त्य शक्ति और महान भक्तों की असीम करुणा का वर्णन किया गया है।
मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- प्रह्लाद महाराज का जन्म और गर्भ में श्रवण: गर्भाधान के समय हिरण्यकशिपु के मन में अनजाने में भगवान का स्मरण था, जिसका प्रभाव शिशु पर पड़ा। जब हिरण्यकशिपु तपस्या करने गया, तब देवताओं ने माता कयाधु को बंदी बना लिया। देवर्षि नारद ने कयाधु की रक्षा की और उन्हें अपने आश्रम में शरण दी।
- भक्ति में एकाग्रता का महत्त्व: आश्रम में नारद मुनि ने कृष्ण कथा सुनाई। माता कयाधु सांसारिक आसक्ति (पति और राज्य की चिंता) के कारण उन उपदेशों को भूल गईं, लेकिन गर्भ में पल रहे प्रह्लाद ने उसे पूरे ध्यान से सुना और जन्म से ही एक महान भक्त बन गए।
- गुरु और शिष्य का आदर्श भाव: एक सच्चा गुरु हमेशा यही चाहता है कि उसका शिष्य उससे भी अधिक महान और उन्नत भक्त बने। वहीं दूसरी ओर, एक आदर्श शिष्य हमेशा विनम्र रहता है। जैसे भगवान नृसिंहदेव के प्रकट होने पर प्रह्लाद महाराज ने अपने लिए कुछ न माँगकर, केवल अपने गुरु (नारद मुनि) की सेवा करने का वरदान माँगा।
- भगवान की अचिन्त्य शक्ति (द्वारका लीला): प्रवचन में द्वारका का प्रसंग है जहाँ नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्ति का दर्शन करते हैं। भगवान एक ही समय में 16,108 अलग-अलग महलों में, अलग-अलग रानियों के साथ मौजूद थे। इतना ही नहीं, हर महल का समय भी अलग था (कहीं सुबह, कहीं दोपहर तो कहीं रात)। यह सिद्ध करता है कि भगवान समय और स्थान (Space and Time) की सीमाओं से पूरी तरह मुक्त हैं।
- महान भक्तों की करुणा: नारद मुनि और श्रील प्रभुपाद जैसे महान भक्त असीम करुणा के सागर होते हैं। जिस प्रकार नारद मुनि ब्रह्मांड में घूमकर जीवों का उद्धार करते हैं, वैसे ही श्रील प्रभुपाद ने 70 वर्ष की आयु में पूरे विश्व का भ्रमण कर हरिनाम का प्रचार किया।
Full Transcription
भगवान का स्मरण और प्रह्लाद महाराज का आगमन
सोचना क्या कर रहा हूँ, क्या करना कुछ है, क्या करना कुछ है और तभी जब वो अपने महल में रहता है, तभी वो उसकी पत्नी होती है कयाधु, उससे संग करता है। और जब संग कर रहा होता है, तो क्या उसके मन में पक्षी के रूप में आए थे, वो नाम उसके मन में चल रहा होता है। और क्योंकि वो उस समय विष्णु का स्मरण कर रहा होता है, तो उसके कारण क्या होता है, जो प्रह्लाद महाराज, जो महान भक्त हैं, उनकी जो आत्मा है, वो उनके द्वारा… जो प्रह्लाद महाराज (यहाँ मूल पाठ में कई बार दोहराव था), जो प्रह्लाद शुद्ध भक्तों का स्मरण करते हैं, तो उससे बहुत शुद्ध कर्म होगा, उससे बहुत स्मरण होगा और ऐसा स्मरण शक्तिशाली होगा, और दीर्घकाल का स्मरण होगा।
तो इसलिए अगर महान भक्तों से हम हरि नाम का श्रवण करते हैं, तो उससे बहुत शक्ति होती है। और फिर बाद में हिरण्यकशिपु सोचते हैं कि नहीं, मुझे वापस जाके तपस्या करनी चाहिए, वापस जाके तपस्या करनी चाहिए, तो वो चले आता है।
कयाधु की रक्षा और नारद मुनि का आश्रम
और फिर तभी कयाधु गर्भवती हो गई होती हैं। और तभी देवता गण सोचते हैं कि ये हिरण्यकशिपु इतना बड़ा असुर है और अगर उसका पुत्र होगा तो उसके लिए बड़ा असुर हो जाएगा। इसलिए कि हम ये कयाधु को गिरफ्तार कर लेंगे और फिर जब उसका पुत्र जन्म लेगा तो उसके लिए बड़ा असुर होगा। तो ऐसे सोच के वो आते हैं। और तभी जब वो कयाधु को गिरफ्तार कर लेते हैं वहाँ पर, क्या होता है? तो वो कयाधु को छोड़ देते हैं पर वो वास्तव में कयाधु की परिक्रमा करते हैं, प्रदक्षिणा करते हैं कि इसके गर्भ में एक महान भक्त है।
और फिर कयाधु तब भी बहुत डरी होती हैं। तो वो उनसे कहते हैं कि, नारद मुनि कहते हैं कि तुम मेरे आश्रम में आकर रहो मेरे साथ। तो फिर वो कहती हैं कि तुम्हारे आश्रम में… मेरे पति नहीं हैं और वो डरी होती हैं कि देवता वापस आकर आक्रमण कर लेंगे। “तुम मेरे आश्रम में आकर रहो।” और फिर वो कयाधु उनसे सेवा निवेदन करती हैं, तो कि मैं चाहती हूँ कि वास्तव में मेरा जो पुत्र है वह तब तक जन्म न ले जब तक मेरे पिता वापस नहीं आ जाएँ… पति वापस नहीं आ जाएँ। तो कहते हैं, नारद मुनि कहते हैं “तथास्तु।”
हिरण्यकशिपु की तपस्या और इन्द्रियतृप्ति का फल
तो नारद मुनि का आशीर्वाद वास्तव में हजारों साल तक रहता है। हिरण्यकशिपु तपस्या करते हैं। और जब तपस्या करके वापस आता है, तभी कयाधु वो वापस महल में आती हैं, तभी प्रह्लाद महाराज का जन्म होता है। और फिर जब प्रह्लाद महाराज… तभी वो प्रह्लाद महाराज से क्रोधित होकर प्रह्लाद को मारने का प्रयास करते हैं। तभी हिरण्यकशिपु… भगवान नृसिंहदेव प्रकट होते हैं और हिरण्यकशिपु का वध करते हैं।
तो क्या होता है, हिरण्यकशिपु वास्तव में हजारों साल तक तपस्या करते हैं। वो तपस्या का भोग केवल पांच साल तक करते हैं। तो इन्द्रियतृप्ति का ऐसे होता है, बहुत समय तक मेहनत करो और बाद में जो फल होता है, बहुत छोटे समय के लिए होता है।
प्रह्लाद महाराज द्वारा गर्भ में श्रवण
तभी प्रसंग है हम यहाँ पर, क्या है? नारद मुनि वास्तव में क्या सोच रहे होते हैं कि यह जो प्रह्लाद है, यह कयाधु के गर्भ में प्रह्लाद है। कयाधु को क्यों बुलाते हैं वो? वो सोच रहे हैं कि जो महान भक्त भगवान ने अपनी आत्मा भेजे हैं, तो उसको एक भक्ति मिले। तो इसलिए अपने आश्रम में बुला लेते हैं। और वहाँ पर वो कयाधु को कृष्ण कथा सुनाते हैं।
तो कयाधु जो हैं, वो पति में आसक्त हैं, अपनी राज्य का क्या होगा, मेरा क्या होगा, यह सोच रही होती हैं। “कि आप जो बोल रहे हैं वो सब सत्य है और आपके वचन जो हैं वो एक रोशनी के समान हैं। पर वो रोशनी कैसी है? जैसे आसमान में बिजली चमकती है वैसी रोशनी है। कुछ समय के लिए रोशनी आई और चली जाती है। आप जो कह रहे हैं वो सत्य है, पर मैं उसको स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि मैं बहुत आसक्त हूँ दुर्योधन (संसार) से।”
तो कयाधु जो होती हैं, बड़ी आसक्त होती हैं। वो आसक्त होती हैं, उसके कारण नारद मुनि से उपदेश सुनती हैं पर कुछ उसका श्रवण करती हैं पर स्मरण में नहीं रहता है। पर इसके विपरीत जो उनके गर्भ में प्रह्लाद होते हैं, तो प्रह्लाद श्रवण करते हैं। और ध्यान पूर्वक श्रवण करते हैं और पूरा सीख लेते हैं। जब गर्भ से ही बाहर निकलते हैं तो महान भक्त बनके निकलते हैं। और क्या होता है? जब वो इस तरह से भक्ति कर महान भक्त निकलते हैं, तो बाद में षण्ड और अमर्क के गुरुकुल में जाके सारे जो असुर पुत्र थे उन सब को भक्त बना देते हैं। और वो पूछते हैं कि अरे तुमको यह सब सिखाया किसने? तो वो कहते हैं कि नारद मुनि ने सिखाया। नारद मुनि ने सिखाया? नारद मुनि तुम्हें कहाँ मिले थे? वो वास्तव में भागवत में वर्णन है। वो बोलते थे कि वो ऐसे जगह में मिले नहीं थे, और मैंने मुनि से श्रवण किया।
गुरु का गुणगान और शिष्य का भाव
और फिर यहाँ पे नारद मुनि हर एक लीला में कैसे होता है, किसी भक्त का गुणगान होता है। वो जब नृसिंहदेव की लीला चल रही है, तो उसमें प्रह्लाद महाराज का गुणगान हो रहा है। तो इसलिए भागवत में बताया जा रहा है कि हिरण्यकशिपु जब सारे ब्रह्मांड में अत्याचार कर रहा होता है, तो तभी कोई भी उसके अत्याचार का विरोध करने के लिए तैयार नहीं होता है। और नारद मुनि यह कथा सातवें स्कन्ध में युधिष्ठिर महाराज को बता रहे हैं। और नारद मुनि कहते हैं कि, यहाँ तक कि मुझे भी हिरण्यकशिपु को प्रणाम करना पड़ा था, मुझे भी हिरण्यकशिपु के अधिकार को स्वीकार करना पड़ा था। तो ऐसी शक्ति थी वह!
तो जब… तो क्या इसका मतलब है, तो नारद मुनि के शिष्य हैं प्रह्लाद महाराज। तो प्रह्लाद महाराज हिरण्यकशिपु से तो भयभीत नहीं हैं, तो नारद मुनि क्या प्रह्लाद महाराज से भयभीत हो गए? वो भयभीत नहीं हुए। पर हर एक व्यक्ति को हर एक लीला में, कि अगर एक भक्त का गुणगान कर रहे हैं कोई, तो आपने इतनी अच्छी सेवा की है, सब भक्त उनका गुणगान कर रहे हैं। तो हमारे मन में सोचते हैं, मैंने भी सेवा की, तुमको पता नहीं है क्या? तो क्या होता है, हमारे मन में कभी कभी लगता है, दूसरों का गुणगान हो रहा है, तो मेरा गुणगान क्यों नहीं हो रहा है? पर जो नारद मुनि हैं, जब वो देखते हैं कि भगवान की इच्छा है कि प्रह्लाद की अद्वितीय भक्ति का गुणगान हो, तो वो भी उसमें सहभागी होते हैं। नारद मुनि भी क्या होता है, वो कहते हैं कि मैं भी हिरण्यकशिपु के अधिकार का स्वीकार करता हूँ। तो इसलिए क्या होता है कि मतलब हिरण्यकशिपु के अधिकार का विरोध करने वाले तो वो भी क्या होता है।
और जो भाव होता है कि ये ऐसे कहते हैं, शिष्य जो होता है, गुरु वास्तव में ऐसे शिष्य का क्या चाहते हैं? कि ऐसे कोई पिता होता है, और कोई पिता पुत्र से क्या चाहते हैं? पिता पुत्र से चाहते हैं कि आप बहुत अच्छे व्यक्ति बनो, आप मुझसे बड़े बनो। माता पिता पुत्र से कहते हैं कि जो मुझे नहीं मिला है, मैं आपको देना चाहता हूँ। तो वैसे ही गुरु की इच्छा होती है कि जो शिष्य है, मुझसे बड़े भक्त बनें। शिष्य नहीं सोचते हैं कि मैं मेरे गुरु से बड़ा भक्त बनूँगा, पर गुरु की इच्छा होती है कि शिष्य महान भक्त बने, मुझसे बड़े भक्त बनें।
गुरु-शिष्य का आदर्श संबंध
एक बार एक भक्त, एक प्रभुपाद जी के शिष्य कहते हैं कि वास्तव में जो भी मैंने किया है, उनकी कृपा से किया है। शिष्य नहीं सोचते हैं कि मैं गुरु से बड़ा बन गया हूँ। और यह भाव हम देखते हैं प्रह्लाद महाराज के दृष्टांत में, जब नृसिंहदेव उनसे कहते हैं कि एक वर माँगो, तो वो क्या कहते हैं कि वास्तव में मुझे एक वर चाहिए कि मुझे अपने नारद मुनि की सेवा दो। मैं जब प्रह्लाद के रूप में था, मैं जब असुर कुल में जन्मा हूँ, तो इसलिए नहीं तो नारद मुनि का संग मिल रहा है। कि वास्तव में वो कहते हैं कि मैं असुर कुल में जन्मा था और मैं भी ऐसे कार्य करता था जिससे कि मैं नर्क में जाता था, पर नारद मुनि ने मुझे बचाया है। उन्होंने मुझ पर इतनी कृपा की है, पर मैंने उनकी कुछ भी सेवा नहीं की है। कि मैं तो असुर कुल में जन्मा था और मैंने कुछ उनका संग भी नहीं लिया। तो कृपया मुझे उनकी सेवा का मौका दीजिये।
तो यहाँ गुरु और शिष्य का आदर्श सम्बन्ध है। गुरु कभी भी अपने शिष्य के यश में बड़े आनंदित होते हैं, सहभागी होते हैं अपने शिष्य के यश में। और जो शिष्य होते हैं वो सोचते हैं कि मुझे मेरे गुरु की और सेवा करनी चाहिए।
तो यही जो मधुवन यहाँ पर है, वहाँ पर जो जब ध्रुव महाराज भगवद्धाम जा रहे थे, तो वह क्या कहते हैं कि वो अपनी माँ को भगवद्धाम ले जाना चाहते हैं और इसलिए कहते हैं कि मेरी माँ नहीं आएँगी मैं भी नहीं जाऊँगा। तो उस किताब पर प्रभुपाद जी लिखते हैं कि मेरी इच्छा है कि मेरे शिष्य हैं, वो इतने महान भक्त बन जाएँगे कि वो जब भगवद्धाम जाएँगे और वो प्रार्थना करेंगे मेरे लिए, तो फिर मैं भगवद्धाम चला जाऊँगा। वास्तव में प्रभुपाद जी इतने महान भक्त हैं, उनके कारण ही बाकी सबको भगवद्धाम के बारे में पता है। उनके बिना भगवद्धाम क्या है, यह पता भी नहीं हो पाता है। तो भगवद्धाम चला जाऊँगा, तो भगवद्धाम चला जाऊँगा।
नारद मुनि और द्वारका की लीलाएँ
वहाँ पे नारद मुनि आते हैं, इसका विस्तृत वर्णन है गोपाल चम्पू में। जब गोपाल चम्पू जो है, जीव गोस्वामी ने एक ग्रंथ लिखा हुआ है। नारद मुनि बताते हैं, नारद मुनि बताते हैं कि वास्तव में अभी आपकी वृन्दावन लीला का अंत करने का समय आ गया है। और आप अभी जाओ मथुरा और वहाँ पे जाके आप कंस का वध करोगे। नारद मुनि बताते हैं वहाँ पे वास्तव में कि क्या क्या करोगे आप, वो सब बता देते हैं। मैं कल आपको यहाँ पे आते हुए देखूँगा, उसके बाद मैं इनका वध करते हुए देखूँगा, उसके बाद मैं यह करते हुए देखूँगा और मुझे बड़ा आनंद मिलेगा इन सब के लिए। और प्रभु आपने आके यहाँ पे सबका कल्याण किया है, इसके लिए हम सब भक्तों के लिए आप बहुत कृतज्ञ हैं।
तो नारद मुनि का एक और महत्वपूर्ण प्रसंग आता है, कई बार आता है भागवत में। तो उसका जो उनहत्तरवाँ (69th) अध्याय है उसमें क्या होता है, भगवान द्वारका में रह रहे हैं। द्वारका में रह रहे हैं, तब नारद मुनि आते हैं। तो भगवान ने तभी सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियों से विवाह किया है, और उनका सब के लिए एक-एक महल बनाया उन्होंने। और सब को महल बनाके वहाँ पर वह रह रहे हैं। तो जब इस तरह से रह रहे होते हैं, तो नारद मुनि सोचते हैं कैसे संभव है यह, मैं देखना चाहता हूँ।
जब देखना चाहते हैं वो, तो दशम स्कंध में वर्णन है उसका। विस्तृत वर्णन जीव गोस्वामी ने कृष्ण सन्दर्भ में किया है। वो कहते हैं कि नारद मुनि एक घर में आते हैं, तो वहाँ देखते हैं कि भगवान श्री रुक्मिणी के साथ बैठ के बैठे हैं। जैसे नारद मुनि आते हैं उनका आदर से सत्कार करते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनके चरण वंदन करते हैं और फिर उनको प्रसाद खिलाते हैं। और फिर दूसरे महल में आते हैं, तो सत्यभामा के साथ वहाँ पे वो घर में कुछ कार्य कर रहे हैं। तो जैसे नारद मुनि, आप कब आये? तो ऐसे पता ही नहीं है यहाँ भी कृष्ण हैं, दो अलग ही व्यक्ति हैं।
और इसलिए हर एक घर में आते हैं, तो किसी एक घर में भगवान सुबह की प्रातःकाल की साधना कर रहे हैं, पूजा कर रहे हैं। दूसरे घर में आते हैं, तो भगवान कैसे होता है, जो गृहस्थ होते हैं, तो उनको अगर वो बड़े हो गए, तो उनके पुत्र पुत्रियां बड़े हो गए, कहीं वो कुछ ब्राह्मणों को दान दे रहे होते हैं। कहीं वो जो अपने मंत्री हैं उनके साथ राज्य का संचालन है, उसके बारे में विचार कर रहे हैं। तो यहां पे हर घर में कृष्ण अलग अलग रूप में हैं। अलग अलग कृष्ण का एक विस्तार है।
भगवान की अचिन्त्य शक्ति और समय-स्थान से परे होना
और यहां बताते हैं जीव गोस्वामी कि ऐसे नहीं है कि सिर्फ कृष्ण एक अलग अलग व्यक्ति के रूप में हैं, मतलब यहां पे कृष्ण हैं, दूसरे एक महल में कृष्ण हैं, इतना ही नहीं है। पर जब एक महल से दूसरे महल में जब नारद मुनि जाते हैं, तो वहाँ पे हर एक महल में समय भी अलग है। एक महल में सुबह चल रही है, दूसरे महल में दोपहर चल रही है, तीसरे महल में शाम चल रही है, चौथे महल में रात चल रही है, पाँचवे महल में प्रातःकाल चल रहा है।
और ऐसे नहीं कि नारद मुनि जाते हैं यहाँ एक महल से दूसरे महल में जाना है, पैदल चलते हुए जाना है, पंद्रह मिनट लग गया, आधा घंटा लग गया, एक घंटा लग गया, नहीं। नारद मुनि इच्छा से जाते हैं, वहाँ भी जाते हैं। तो क्या कहते हैं कि भगवान न केवल जगह की सीमा से मर्यादित नहीं हैं, वह समय की सीमा से मर्यादित नहीं हैं। मतलब क्या है कि अगर आप अगर इस समय यहाँ पर प्रवचन के लिए बैठे हो, तो हम सब भगवान की कथा कर रहे हैं। अब हम सब अपने अपने घर में इस समय नहीं हो सकते हैं। पर उतना ही नहीं कि अगर यहाँ पर ढाई बजा है तो अपने घर में भी ढाई बजा है। अगर वो भारत में ही है, अमेरिका में है तो समय थोड़ा अलग होता है। पर अगर बेलगाम में ही घर है तो समय एक ही होता है। पर भगवान के सब महल द्वारका में ही थे, पर एक महल में सुबह थी, दूसरे महल में दोपहर थी, दूसरे महल में रात थी और चौथे महल में बिल्कुल प्रातःकाल था।
तो यह कैसे संभव है? नारद मुनि जब यह देखते हैं तो कहते हैं कि भगवान आपकी शक्ति जो है यह अचिन्त्य है कि आप समय और जगह, इस सब की पाबंदी से बिल्कुल मुक्त हो। और आपकी स्वेच्छा से जो भी आप करना चाहें कर सकते हो। और जो मैं देख रहा हूँ यह आश्चर्यजनक है, पर फिर भी यह आश्चर्यजनक नहीं भी है। क्योंकि यह आश्चर्यजनक इसलिए है, कोई साधारण व्यक्ति यह कर नहीं सकता है। पर यह आश्चर्यजनक इसलिए नहीं है क्योंकि वास्तव में आपके लिए क्या संभव है? तो आपकी जो लीला है यह इस विश्व के, इस ब्रह्मांड के, इस सृष्टि के इतिहास में अद्वितीय है। ऐसी न पहले कभी हुई थी, न पहले इसके बाद हुई। और आपने ऐसी लीला किसलिए की है जिससे की आप सारे ब्रह्मांड को आपका स्मरण करने के लिए प्रेरित कर रहे हो। और इससे जब आपका स्मरण करेंगे आपका, तो उन सबका उद्धार हो जाएगा। नारद मुनि इस तरह भगवान को प्रणाम कर रहे हैं, बहुत सुंदर गुणगान करते हैं। और फिर वो दृष्टि से ओझल हो जाते हैं।
महान भक्तों की करुणा और स्तुति
तो यह नारद मुनि हैं। वे प्रभुपाद जी कहा करते थे कि नारद मुनि की विशेषता क्या है? वो बहुत प्रचार करने में माहिर हैं। सब जगह जाते हैं, इधर जाओ, उधर जाओ, जहां पर भी जाते हैं। नर्क में जाकर प्रचार करते हैं, नर्क से उसका उद्धार करते हैं, विस्तृत कहानी है वो। पर महत्वपूर्ण यह है कि नारद मुनि का करुणा का जो भाव है, वो बहुत अद्वितीय है। और प्रभुपाद जी जो थे वह उनका वही भाव था कि जो करुणा का भाव था जो सत्तर साल की उम्र में वो प्रवास करने लग गए और चौदह बार सारे विश्व का भ्रमण किया उन्होंने। कि जैसी नारद मुनि की अथांग करुणा थी, वैसे उनकी भी करुणा थी। आप वो सोच के देखें भगवान की भक्ति का ज्ञान देने के लिए सब का उद्धार हो जाए।
तो अभी हम एक प्रार्थना है जो भगवान के महान भक्तों के लिए आती है। तो ये नारद मुनि के लिए उल्लेखित है प्रार्थना साथ-साथ ये प्रभुपाद जी के लिए उल्लेखित है, सब महान भक्तों के लिए। मैं प्रार्थना का अर्थ पहले बोलता हूँ, फिर हम प्रार्थना दोहराएंगे, फिर हम प्रवचन को विराम देंगे। तो ये प्रार्थना है:
संकीर्तनानन्द-रस-स्वरूपाः संकीर्तनानन्द जो भगवान के कीर्तन का आनन्द है, वह महान भक्तों के लिए, इस आनन्द का रस-स्वरूप हैं वह। इसके मूर्तिमान रूप हैं। वही आनन्द ले रहे हैं और ये आनन्द बाँट रहे हैं।
प्रेम्ना प्रदाने खलु शुद्ध-चित्ता: वह क्या करते हैं? प्रेम प्रदान करते हैं सबको। खलु, खलु मतलब जरूर। उनका चित्त जो है शुद्ध है, उनकी और कोई इच्छा नहीं है। सबको उनको प्रेम प्रदान करके उद्धार करना है। और ऐसे एक भक्त नहीं, जो परंपरा में अनेक गुरु हुए हैं, लंबी परंपरा है, बहुत से महान भक्त हुए।
सर्वे महान्तः ये सब महान भक्त हैं।
किल कृष्ण-तुल्याः कितने महान हैं? कृष्ण-तुल्या। जो आशीर्वाद भगवान कृष्ण के संग से मिल सकते हैं, वे सारे आशीर्वाद महान भक्तों के संग से मिल सकते हैं।
और वो क्या करते हैं? सारे ब्रह्मांड में भ्रमण करके, संसार-लोकान् परितारयन्ति परितारयन्ति, सबका वो उद्धार करते हैं। तो आप मेरे पीछे दोहराइए:
सर्वे महान्तः किल कृष्ण-तुल्याः। सर्वे महान्तः किल कृष्ण-तुल्याः। संसार-लोकान् परितारयन्ति। संसार-लोकान् परितारयन्ति।
संकीर्तनानन्द-रस-स्वरूपाः प्रेम्ना प्रदाने खलु शुद्ध-चित्ता:। सर्वे महान्तः किल कृष्ण-तुल्याः। संसार-लोकान् परितारयन्ति।
नारद मुनि की जय! द्वादश महाजन की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे!
Thank you very much.