Mandodari’s lament 2 – How can we transform ourselves – Hindi
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Lecture Summary
इस प्रवचन का मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि हम रावण (इन्द्रिय-तृप्ति) के मार्ग को छोड़कर हनुमान जी (भगवान की सेवा) के मार्ग पर कैसे आ सकते हैं। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. रावण की दुर्गति और इन्द्रियों का दास होना: मन्दोदरी विलाप करते हुए कहती हैं कि रावण ने अपनी इन्द्रियों की संतुष्टि के लिए सीता माता का हरण किया, जिसकी वजह से उसकी भयानक दुर्गति हुई (शरीर जानवरों का भोजन बना और आत्मा नरक में गई)। यह इस बात का प्रतीक है कि जो व्यक्ति केवल अपनी इन्द्रियों का दास बन जाता है, उसका पतन निश्चित है।
2. दुख से बचने के शॉर्टकट और व्यसन (Addiction): जीवन में समस्याएं और दुख आना स्वाभाविक है। लेकिन कई बार लोग इन दुखों या तनाव से क्षणिक राहत पाने के लिए नशे या अन्य गलत आदतों (शॉर्टकट) का सहारा लेते हैं। धीरे-धीरे यह क्षणिक राहत एक व्यसन (Addiction) बन जाती है और व्यक्ति अपनी सारी मर्यादाएँ भूलकर पतन की ओर चला जाता है।
3. कमज़ोरी (Weakness) बनाम क्रूरता (Wickedness):
- कमज़ोरी (Weakness): यह तब होती है जब कोई व्यक्ति भावनाओं के आवेश (जैसे क्रोध) में आकर कोई गलती कर देता है, लेकिन बाद में अपने विवेक के कारण पछताता है (जैसे – धृतराष्ट्र या कैकेयी)। हम सभी में कोई न कोई कमज़ोरी होती है।
- क्रूरता (Wickedness): यह सोच-समझकर, अचेतन मन से दूसरों को दुख देने की प्रवृत्ति है (जैसे – दुर्योधन या मंथरा)।
- सीख: हमें क्रूर (Wicked) लोगों की संगति से बचना चाहिए, क्योंकि अगर एक कमज़ोर व्यक्ति किसी क्रूर व्यक्ति के प्रभाव में आ जाए, तो वह भी भयानक पाप कर सकता है। गॉसिप (Gossip) या दूसरों की निंदा करना भी पतन का कारण बनता है।
4. अर्थहीन सुख vs अर्थपूर्ण जीवन: बिना किसी उद्देश्य के केवल सुख के पीछे भागने से जीवन निरर्थक (Boring) हो जाता है। असली सुख एक ‘बाय-प्रोडक्ट’ (By-product) है, जो तब मिलता है जब हमारा जीवन भगवान की सेवा और किसी उच्च उद्देश्य के प्रति समर्पित होता है।
5. जीवन में अव्यवस्था (Chaos) और भगवान की योजना: जीवन में हमेशा सब कुछ हमारे हिसाब से (Order) नहीं चलता, कई बार अचानक उथल-पुथल (Chaos) मच जाती है। लेकिन भगवान पर विश्वास रखने का अर्थ यह है कि इस ‘Chaos’ के पीछे भी भगवान की कोई बड़ी योजना (नया Order) छिपी होती है।
- उदाहरण: श्रील प्रभुपाद जब अमेरिका गए तो उनके पास कोई स्पष्ट योजना नहीं थी, उन्हें कई कष्टों (Chaos) का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने स्वयं को भगवान के हाथों की कठपुतली (“नाचाओ नाचाओ प्रभु”) मान लिया, और उसी अव्यवस्था से दुनिया भर में कृष्ण भावनामृत का प्रचार हुआ।
6. दूसरों को सुधारना (ज्ञान के साथ प्रोत्साहन): जब हम दूसरों की कमज़ोरियाँ देखते हैं या उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं, तो हमारा भाव (Disposition) अहंकार से भरा नहीं होना चाहिए। केवल दोष निकालना या सिर्फ ज्ञान (Enlightenment) देना पर्याप्त नहीं है; हमें उन्हें प्रोत्साहन (Encouragement) भी देना चाहिए, अन्यथा हमारी बातें उन्हें अव्यावहारिक (Impractical) लगेंगी।
Full Transcription
रावण और हनुमान जी की गति
हरे कृष्णा, हरे कृष्णा! तो आज हम श्रीमन्दोदरी का विलाप, इसके बारे में चर्चा कर रहे हैं। तीन श्लोक हैं, तो परसों जो मैंने श्लोक यहाँ पर लिया, उसमें मन्दोदरी कह रही हैं कि अभी आपका वध हो गया है, अभी हम सब उसके कारण बिना किसी आश्रय के रह गए हैं। और फिर कल की चर्चा शुरू की थी इस तरह से, कि वो कहती हैं कि तुमने अपनी इन्द्रियों के लिए जो अनुभव किया, आपने सीता की शक्ति नहीं समझी, और उसी कारण आपका वध हो गया है।
और अभी वो कहती हैं क्या हुआ है, कि तुम्हारे शरीर और आत्मा की, दोनों की गति बिगड़ी ही है। एक तरह से उनके शरीर की गति बड़ी दुर्गति हो गई है कि “गृध्राणाम् अन्नम्”, वो जानवर (गिद्ध) खाएंगे उनको। और आत्मा की गति नरक है। और इसके साथ-साथ जो लंका और राक्षसों की गति है, वो क्या हो गई है? विधवा। तो वो यहाँ पर ऐसे कह रही हैं कि न केवल मैं विधवा हो गई हूँ, सारी लंका विधवा हो गई है क्योंकि विधवा का कोई संरक्षक नहीं रहा है।
तो मैं चर्चा करूँगा कि किस तरह से how we can transform ourselves, जिससे जो रावण की गति है, उस गति में जाने के बजाय जो हनुमान जी की गति है, उसकी ओर हम कैसे आ सकते हैं। तो मैं तीन पॉइंट देखूँगा और हर एक पॉइंट के बाद हम थोड़ा सा पॉज़ लेंगे, अगर कोई सवाल होगा उसी पॉइंट से related, तो हम एक-दो सवाल देख सकते हैं। तो मैंने इंग्लिश में एक पॉइंट देखा था कि ज्ञान हमें एक ऐसा उद्देश्य प्रदान करता है जीवन के लिए, कि हम जीवन के दुखों के पार जा सकते हैं।
इन्द्रियों के अधीन जीवन और दुख
सबसे पहले क्या है कि हम सब हमारी इन्द्रियों के अधीन होते हैं। लेकिन हमें पता है कि हम दैवी प्रकृति के लोग हैं और आसुरी प्रकृति के लोग भी होते हैं। इन्द्रियों के लिए कहते हैं कि हमारी इन्द्रियों के कारण यह मानव जीवन जानवरों जैसा हो जाता है। जब हम कोई बहुत घृणास्पद कार्य करते हैं, तो हम सोचते हैं कि कैसे कर सकता है, कौन है, कैसे कर सकता है?
अगर कोई दैवी प्रकृति का है तो साधन दैवी काम आता है, आसुरी प्रकृति का है तो आसुरी प्रकृति काम आती है। पर जब हमारे जीवन में समस्याएं आती हैं, तो फिर उस समय एक प्रकार से एक घृणा आती है, एक कुंठा साथ आती है। ऐसा क्यों हो रहा है? मान लीजिए हम सादा जीवन जी रहे हैं और कोई हमें बहुत परेशान करता है बिना किसी कारण के, तो फिर अभी लगता है उसको कि मुझे इसका कुछ करना है, मतलब उसका प्रतिकार करना है। और कभी-कभी प्रतिकार करना ज़रूरी होता है, पर कभी प्रतिकार करने की मात्रा में हम बहुत ज़्यादा हो जाते हैं।
तो सबकी जीवन में बुरी चीज़ें होती हैं, ज़रूरी नहीं कि केवल दुख ही हो। लोगों को लगता है हम बहुत निराशावादी हैं, पर वहीं जीवन में बहुत उलझनें हैं, हम वो सब सहते हैं। तो ये सब जानते हैं कि जीवन में बहुत समस्याएं हैं, और ज़रूरी समस्याएं आती हैं। तो क्या होता है, हम कई बार समस्याओं से निकलने का कोई शॉर्टकट ढूँढते हैं, आसान तरीका कि कैसे निकलेंगे। और उसके लिए जो व्यक्ति होता है वो बुरी संगत में लग जाता है।
आध्यात्मिकता और व्यसन (Spirituality and Addiction)
मैं अमेरिका में था, एक Mental Health, Spirituality और Addiction के कॉन्फ्रेंस में था। वहाँ चर्चा थी कि अध्यात्म और एडिक्शन क्या है? वेस्टर्न वर्ल्ड में क्या होता है कि अगर कोई व्यक्ति बोलता है कि मित्रों का समय होता है और पार्टी में थोड़ा नशा हो, तो ठीक है। तो फिर एक-दो बार वो एक्सप्लोर (explore) करने के लिए, अनुभव करने के लिए, दूसरों का मन रखने के लिए करता है। उससे क्या होता है, मन को कुछ राहत होती है, कुछ सुकून मिलता है, कुछ अच्छा लगता है, और वहाँ मन में एक संस्कार बन जाता है। और बाद में जब कुछ परेशानी होती है, अगर कुछ बहुत तनाव का कार्य हो गया है, या फिर संबंधों में कुछ बड़ी बुरी घटना हो गई है, तो फिर मन कुछ राहत चाहता है, और फिर उसका आधार बनाकर वो बहुत ज़्यादा नशा करेंगे, बहुत ज़्यादा पियेंगे।
पर जब समस्या आ जाती है, तो अगर उसने पहले ऐसा किया है, तो मन तुरंत उसकी ओर राहत के लिए जाता है। तो पहले क्या करता है, वो अनुभव करने के लिए जाता है, थोड़ा सा अनुभव कर लिया हो गया। पर जब वो अनुभव का संस्कार हो जाता है, तो फिर वो राहत के लिए जाता है। और जब राहत चाहिए होती है, तो थोड़ा लेते हैं, थोड़ी सी राहत के लिए जाता है, तो फिर और ले लेगा, और राहत के लिए जाता है। और उस तरह से व्यक्ति जो है, सारी जो मर्यादाएं हैं, उनको पार कर देता है। फिर बाद में, वही व्यक्ति नशे के लिए इतना गिर जाता है कि जो व्यक्ति सादा रहता है, कोई झूठ भी नहीं बोलेगा, इतना अच्छा रहता है, वो नशा प्राप्त करने के लिए बहुत बड़ी-बड़ी झूठ बोलने लगता है। जो एक ऐसी जगह है, पहाड़ के किनारे, तो वो अगर बहुत ही फिसलने की जगह है, तो फिसल जाता है।
कमज़ोरी (Weakness) और क्रूरता (Wickedness)
तो इसलिए जो व्यक्ति बुरे कार्य करता है, वो ऐसा नहीं है कि व्यक्ति हमेशा बुरा होता है। पर एक बुरा कार्य होता है, दूसरा बुरा कार्य होता है, तीसरा बुरा कार्य होता है, और इस तरह से बुरे कार्य बढ़ जाते हैं। तो हम जब इसको बहुत घृणास्पद कार्य कहते हैं, तो सोचते हैं कि मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा, अधिकांश लोग सोचते हैं हम नहीं करेंगे। पर क्या है, दो चीज़ें हैं: एक है Weakness (कमज़ोरी) और एक है Wickedness (क्रूरता)। अभी Weakness मतलब कमज़ोरी, Wickedness मतलब क्रूरता। और इनमें फ़र्क क्या है?
जब Weakness होती है, मान लीजिए किसी को क्रोध आता है, वो कमज़ोरी है कि क्रोध आता है, वो चिल्लाते हैं। पर बाद में वो पछताते हैं। मतलब क्या है? उनके अंदर विवेक और बुद्धि है। बुद्धि जो है हमें एक rational (तर्क) के आधार पर बताती है कि यह नहीं करना चाहिए, और जो विवेक है, वो हमें भावना देता है कि यह अच्छा नहीं किया। तो यह हम दोनों में है। तो जिसमें बुद्धि में कमज़ोरी है, तभी वो क्रोध के वश में आते हैं, वो कुछ बुरा कार्य कर देंगे। पर बाद में जब विवेक इस्तेमाल करते हैं, तो पछताते हैं।
पर Wickedness is cold-blooded. जो Weakness होता है, वो heat of the moment में होता है। जो Wickedness होता है, तो अचेतन से दूसरों को दर्द देना है, वो सोचते हैं। तो अधिकांश लोगों में Wickedness, क्रूरता नहीं होती है। अधिकांश लोगों में Weakness होता है। पर जहाँ भी Weakness होता है, कमज़ोरी होती है, वहाँ कोई ना कोई ऐसा व्यक्ति आ जाता है जिसमें क्रूरता होती है, वो उस व्यक्ति को पकड़ लेते हैं।
जैसे धृतराष्ट्र इसमें Weakness हावी करते हैं, पर उनमें दुर्योधन जैसी क्रूरता नहीं होती है। तो उसी तरह से क्या होता है, विद्यार्थी अगर कॉलेज में ड्रग्स बेच रहे हैं, तो क्या होता है, वो बुरे नहीं हैं, पर उनमें Weakness होती है। और वहाँ पर ड्रग्स बेचने वाले ऐसे लोग हैं, जिनमें Wickedness होता है। तो हम सब में कमज़ोरियां हैं, Weakness है। पर हमें देखना है कि कम से कम यह कमज़ोरियां जो हैं, उनको हम पूरी तरह निकाल नहीं सकते, वो हैं। पर जो Weakness है, कम से कम हम किसी ऐसे व्यक्ति के चंगुल में न फंसे जिसमें Wickedness हो।
भक्तों के बीच निंदा और संगति का प्रभाव
कपटता, दुष्टता हो सकती है। कभी-कभी भक्तों के बीच होता है, कुछ लोग, बारी-सब भक्तों की निंदा करते हैं। ‘अरे इसने ऐसे किया, इसने ऐसे किया।’ जो गॉसिप (Gossip) होता है, गॉसिप का मतलब क्या है? When we hear something we like about someone we don’t like. जिसको नापसंद करते हैं, उसके बारे में ऐसा कुछ सुनते हैं जो हमें अच्छा लगता है। “हम तो अच्छा नहीं मानते हैं, उसने ऐसे किया, ऐसे किया।” तो क्या होता है? हम सब में एक थोड़ा सा भाव होता है कि किसी का इतना बड़ा गुणगान हो रहा है तो उसको थोड़ा नीचे लाएं।
पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, वो सोचते हैं कि उनकी full-time devotional service यही है कि दुनिया को भक्तों का दोष बता रहे हैं। वो सोचते हैं कि मैं सारे अज्ञानी लोगों को ज्ञान दे रहा हूँ, जिस पर आप श्रद्धा कर रहे हो, मैं आपकी श्रद्धा की बात कर रहा हूँ। अभी सब में दोष हैं और कई लोग ऐसे होते हैं, जो सोचते हैं कि उनकी सेवा ही दूसरों का दोष ढूँढना है। वो फिर क्या करते हैं, उस सेवा के लिए दूसरों का काल्पनिक दोष बनाने लगते हैं।
तो अभी हम सब में पतन करने की प्रवृत्ति होती है। पर जो लोग पतन भी करते हैं, उनके संग में आ जाएंगे, तो क्या होगा? हम भी बहुत दुष्ट हो जाएंगे। तो जब कमज़ोरी और दुष्टता साथ-साथ में आ जाएंगे, तो फिर जो अच्छा व्यक्ति है, वो भी बहुत बुरा बन जाएगा। इसलिए हमें जब संग करना है, तो ध्यान रखना है कि वहाँ रावण का उत्पाद हम ले रहे हैं। वहाँ रावण की संगति में हमें भी असुर प्रवृत्ति आ सकती है। हमें एक अच्छा संग बहुत ज़रूरी है।
कैकेयी और मंथरा का उदाहरण
और दूसरा उदाहरण देखते हैं Weakness और Wickedness का, यह है कैकेयी और मंथरा। कैकेयी बिल्कुल क्रूर नहीं थी, असली दुष्टता की नहीं थी, वो दैवीय प्रकृति की थी। वह राम को उतना ही प्रेम करती थी। पर जब वह कैकेयी मंथरा के प्रभाव में आई, तो क्या हो गया? वह Weakness, Wickedness के प्रभाव में आ गई। तो इसलिए हम सब में कमज़ोरियां हैं, और हम समझें कि ये कमज़ोरियां अगर किसी परिस्थिति में ऐसे आ जाएं और किसी दुष्ट व्यक्ति की संगति हो जाए, तो फिर हम भी बहुत ही बुरा कार्य कर सकते हैं।
इसलिए हमें चौकन्ना हमेशा रहना है। चौकन्ना रहना है कि ऐसे नहीं कि मैं यह नहीं कर सकता, हम अति-आत्मविश्वास में अपने कार्य न करें। हम इतने शुद्ध नहीं हैं कि हम कोई बुरा कार्य नहीं कर सकते। हमें एक सकारात्मक भाव होना चाहिए। संगति अच्छे से अच्छे लोगों को बुरा से बुरा कार्य भी करा सकती है क्योंकि Weakness से Wickedness की ओर जाना, कमज़ोरी से दुष्टता की ओर जाना, ये एक फिसलने वाली जगह है, वहाँ से कोई भी फिसल सकता है।
प्रश्न और उत्तर सत्र: कमज़ोरी और निर्लज्जता
(किसी का इससे कोई सवाल है?)
तो पहला सवाल है कि क्या ये जो दुष्टता है, कमज़ोरी है, क्या दुष्टता हमारे मन से भी आ सकती है? हाँ, कभी भी आ सकती है। पर साथ ही हमें कमज़ोरी है, और ये शायद संस्कार हो सकते हैं। पर अधिकांश लोगों में, जब हम भक्ति करते हैं, भक्ति में आते हैं, तो वह बहुत क्रूर दुष्ट प्रकार के संस्कार शायद नहीं होंगे। तो अधिकांश हमसे कहीं-कहीं से बाहर से प्रभाव होता है। हमारे मन में कल्पना बहुत सी आ सकती है, पर कौन सी कल्पना है जिसे हम सीरियसली (seriously) कंसीडर करते हैं? कुछ कल्पनाएँ आती हैं, पर हम उन पर अमल नहीं करते। पर अगर वही कल्पना के लिए हम बाहर किसी को करते हुए देखते हैं, कि यह समाज में स्वीकार्य है, तब हमारा मन उस बुरी कल्पना को स्वीकार करने लगता है।
और दूसरा सवाल है, तो अगर हम कहीं वो वही गलती बार-बार कर रहे हैं, तो क्या उस पर हम निर्लज्ज जैसे बन जाते हैं? शेमलेसनेस (Shamelessness) पूरी तरह हावी हो जाता है? कैसे है कि हम सब में अलग-अलग कमज़ोरियां हैं, और कभी-कभी किसी कमज़ोरी को ओवरकम (overcome) करने के लिए, उसके परे जाने के लिए हमें समय लगता है। तो अगर ऐसा है कि किसी कमज़ोरी के परे जाने में समय लग रहा है, तो दो चीज़ें हैं: निर्लज्ज होना है और दूसरा है कि वही गलती और अधिक मात्रा में करना है।
अगर कमज़ोरी है और गलती हो रही है, तो वह अनर्थ है। पर अगर वही गलती हम अधिक मात्रा में करते हैं, तो फिर क्या हो रहा है? वो एक निर्लज्जता के परे जाना है। तो कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी को कोई ज़ख्म है, खुजली होती है। उसको हम खुजली के समान करते हैं। तो खुजली चली नहीं जाती है, वो रहती है कुछ समय। पर अगर वही गलती हो रही है और उसको हम बढ़ा नहीं रहे हैं, उसी मात्रा में हो रही है, तो लिमिट होती है। गलतियों में भी लिमिट होती है। तो फिर हम देख सकते हैं कि इस अनर्थ के परे जाने के लिए कुछ समय लगने वाला है, पर हमें भक्ति नहीं छोड़नी है।
इसके दो उदाहरण देता हूँ। हर एक व्यक्ति का मन अलग होता है। किसी व्यक्ति में मान लीजिए Indulgence (भोग करना) है और Abstinence (छोड़ना) है। तो किसी व्यक्ति के लिए भोग छोड़ना बहुत आसान है। पर कोई दूसरा व्यक्ति है, उसके लिए भोग और त्याग के बीच में बड़ा पहाड़ है। जो संस्कार हैं, इतने गहरे संस्कार हैं उस व्यक्ति के लिए, कि उसके लिए यहाँ से वहाँ आना दो कदम की जगह नहीं है। तो फिर क्या है? मैं स्टैंडर्ड फॉलो नहीं कर पा रहा हूँ, मैं यहाँ पर हूँ, पर यहाँ पर रहकर भी कृष्णभावनामृत में हो सकता हूँ। तो यही भाव है: “अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्” सुदुराचारो मतलब क्या है? वो स्टैंडर्ड से बहुत नीचे है, पर फिर भी वो भगवान की भक्ति करने के भाव में लगा होता है। भगवान कहते हैं कि क्योंकि अभी वो दुराचार अच्छा नहीं है, दुराचार भगवान के लिए बुरा ही है, पर क्योंकि वो अनन्य भाव से भज रहा है, इसलिए भगवान कहते हैं कि वो उसके लिए अच्छा है, साधु माना जाता है।
भगवान की भक्ति और उद्देश्यपूर्ण जीवन
भगवद्गीता में एक श्लोक आता है 14.26, जो बहुत समय तक समझ भी नहीं आ रहा था: “मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। सगुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥” हमको वहाँ पर थोड़ा दर्द होता है (जैसे इंजेक्शन का दर्द), पर क्या है हम उसको स्वीकार करते हैं। डॉक्टर को पेशेंट देते हैं। हम जानते हैं कि ये दर्द है, इसका कुछ परपस (purpose) है, इसका कुछ अर्थ है। तो हमें दर्द अच्छा नहीं लगता है, पर दर्द हम स्वीकार कर सकते हैं जब उसका कुछ उद्देश्य समझ आता है।
तो जब जीवन में समस्याएं हमारे लिए आती हैं, तो अगर हमारा उद्देश्य कुछ अच्छा होगा, तो फिर हम समस्याओं का भी सामना कर सकते हैं। समस्या आना अपने आप में कुछ दर्द होगा, पर हम दर्द को स्वीकार कर सकते हैं। अगर हम सुख की खोज को जीवन का उद्देश्य मान लेते हैं, तो उससे दो समस्याएं आती हैं। जैसा मैंने कहा कि हम दुख से नहीं डरते हैं, अर्थहीन दुख से डरते हैं। हम केवल सुख नहीं चाहते हैं, हम अर्थपूर्ण सुख चाहते हैं।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को विनोद अच्छा लगता है। अगर कोई कह रहा है कि आपको कोई आर्थिक ज़िम्मेदारी नहीं है, कोई पारिवारिक ज़िम्मेदारी नहीं है, आप आज से ज़िन्दगी भर टीवी पर कॉमेडी देखें। कॉमेडी सबको अच्छी लगती है, पर ज़िन्दगी भर कॉमेडी देखेंगे तो बोर हो जाएंगे, मन करेगा कुछ काम करें। कॉमेडी से सुख मिलता है, पर वो अर्थहीन सुख है। तो हमें सुख चाहिए, पर अर्थपूर्ण सुख चाहिए। जो सुख अर्थहीन होता है, वो कुछ समय के लिए सुख देता है, पर बाद में उसका अनुभव बहुत कम हो जाता है।
तो यह बहुत बड़ी बात है कि हम केवल सुख नहीं चाहते, हम अर्थपूर्ण सुख चाहते हैं। Pleasure is a very cheap purpose. उसमें हमें गहराई का अनुभव नहीं होता है। अगर कोई केवल सुख की ही खोज कर रहा है, तो फिर उसका जीवन निरर्थक हो जाएगा। क्या होता है? हम अनुभव सुख चाहते हैं। जो मुझे अच्छा लगता है वही बार-बार करता हूँ, तो मुझे खुद ही अच्छा नहीं लगता। तो युधिष्ठिर महाराज के लिए कहते हैं कि कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है जबकि उसका आधार दूसरों के स्तर पर है? उसने उसका सुख दूसरों के स्तर पर ला दिया है। हाँ, और वो भोगते हैं। कि दूसरा उसका स्तर क्या है, उसके आधार पर मेरा सुख रहेगा। तो ऐसा व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता है।
क्या आपका अर्थपूर्ण उद्देश्य है? अगर आपका अर्थपूर्ण उद्देश्य है, तो फिर जब आपको कुछ समझ नहीं आता, तब भी आप टिके रहते हैं। मान लीजिए हम किसी बड़े अस्पताल में बैठे हों, वहाँ कोई व्यक्ति कुछ भी कर सकता है।
जीवन में नियमितता (Order) और अव्यवस्था (Chaos)
अभी हम सब इस प्रवचन में आए हैं। तो प्रवचन में जिस तरह से हम काम कर सकें, उसके लिए जो नियमितता (Order) चाहिए, वो ज़रूरी है। पर हमको केवल ऑर्डर नहीं चाहिए, हमको थोड़ा केओस (Chaos) भी चाहिए। केओस मतलब क्या? अगर आप प्रवचन में आते हैं और हर बार वही सुनने को मिल रहा है, तो मन थोड़ा ऊब जाएगा। हमको कुछ नए पॉइंट, कुछ नई अवधारणा सुननी है। हमको कुछ Order चाहिए, कुछ Chaos चाहिए। जब इस तरह से हम जीते हैं तो जीवन अच्छा लगता है। कुछ भी ऑर्डर नहीं है तो हम कुछ नहीं कर सकते, और कुछ भी केओस नहीं है तो पूरा जीवन बोरिंग हो जाता है।
तो ये क्यों बता रहा हूँ? हमारे जीवन में कभी नियमितता होती है, और केओस ज़्यादा होता है। कभी नियमितता कम होती है, और केओस ज़्यादा होता है। पर हम जब भगवान पर श्रद्धा रखते हैं—भगवान पर श्रद्धा रखने का मतलब केवल यह नहीं कि भगवान का अस्तित्व है, पर यह समझना है कि The universe is moving forward. भगवान इस जगत को चला रहे हैं, इसका कुछ उद्देश्य है। यहाँ पर ऑर्डर है, यहाँ पर केओस है। पर इस केओस का सामना करने के लिए हमारा अस्तित्व है, तो उसके ऊपर एक नया ऑर्डर आता है।
जब हमारे जीवन में समस्याएं आती हैं, तो यह समस्या का क्या उद्देश्य है, यह मैं अपनी बुद्धि से नहीं समझ सकता। पर जब मेरे जीवन में केओस आया है, मैं उसका सामना करूँगा, तो उससे कुछ और बेहतर ऑर्डर आएगा। हम समझते हैं कि वो वहाँ पर एक सचेतन आत्मा है। मान लीजिए किसी को भारत से अमेरिका जाना है, तो नॉर्मल प्लेन से जाएंगे। पर अगर मान लीजिए हम कोई टीवी भेजते हैं पार्सल में, तो वो सेफ रहेगा, पर अनकम्फर्टेबल (uncomfortable) हो जाएगा। कहने का मतलब यह है कि माँ के गर्भ में एक तरह का ऑर्डर है, कि वो शिशु सेफ है।
श्रीमन्दोदरी का विलाप और जीवन का उद्देश्य
हरे कृष्णा, हरे कृष्णा! तो आज हम श्रीमन्दोदरी का विलाप, इसके बारे में चर्चा कर रहे हैं। तीन श्लोक हैं, तो परसों जो मैंने श्लोक यहाँ पर लिया, उसमें मन्दोदरी कह रही हैं कि अभी आपका वध हो गया है, अभी हम सब उसके कारण बिना किसी आश्रय के रह गए हैं। और फिर कल की चर्चा शुरू की थी इस तरह से, कि वो कहती हैं कि तुमने अपनी इन्द्रियों के लिए जो अनुभव किया, आपने सीता की शक्ति नहीं समझी, और उसी कारण आपका वध हो गया है।
और अभी वो कहती हैं क्या हुआ है, कि तुम्हारे शरीर और आत्मा की, दोनों की गति बिगड़ी ही है। एक तरह से उनके शरीर की गति बड़ी दुर्गति हो गई है कि “गृध्राणाम् अन्नम्”, वो जानवर (गिद्ध) खाएंगे उनको। और आत्मा की गति नरक है। और इसके साथ-साथ जो लंका और राक्षसों की गति है, वो क्या हो गई है? विधवा। तो वो यहाँ पर ऐसे कह रही हैं कि न केवल मैं विधवा हो गई हूँ, सारी लंका विधवा हो गई है क्योंकि विधवा का कोई संरक्षक नहीं रहा है।
तो मैं चर्चा करूँगा कि किस तरह से how we can transform ourselves, जिससे जो रावण की गति है, उस गति में जाने के बजाय जो हनुमान जी की गति है, उसकी ओर हम कैसे आ सकते हैं। तो मैं तीन पॉइंट देखूँगा और हर एक पॉइंट के बाद हम थोड़ा सा पॉज़ लेंगे, अगर कोई सवाल होगा उसी पॉइंट से related, तो हम एक-दो सवाल देख सकते हैं। तो मैंने इंग्लिश में एक पॉइंट देखा था कि ज्ञान हमें एक ऐसा उद्देश्य प्रदान करता है जीवन के लिए, कि हम जीवन के दुखों के पार जा सकते हैं।
इन्द्रियों के अधीन जीवन और दुख
सबसे पहले क्या है कि हम सब हमारी इन्द्रियों के अधीन होते हैं। लेकिन हमें पता है कि हम दैवी प्रकृति के लोग हैं और आसुरी प्रकृति के लोग भी होते हैं। इन्द्रियों के लिए कहते हैं कि हमारी इन्द्रियों के कारण यह मानव जीवन जानवरों जैसा हो जाता है। जब हम कोई बहुत घृणास्पद कार्य करते हैं, तो हम सोचते हैं कि कैसे कर सकता है, कौन है, कैसे कर सकता है?
अगर कोई दैवी प्रकृति का है तो साधन दैवी काम आता है, आसुरी प्रकृति का है तो आसुरी प्रकृति काम आती है। पर जब हमारे जीवन में समस्याएं आती हैं, तो फिर उस समय एक प्रकार से एक घृणा आती है, एक कुंठा साथ आती है। ऐसा क्यों हो रहा है? मान लीजिए हम सादा जीवन जी रहे हैं और कोई हमें बहुत परेशान करता है बिना किसी कारण के, तो फिर अभी लगता है उसको कि मुझे इसका कुछ करना है, मतलब उसका प्रतिकार करना है। और कभी-कभी प्रतिकार करना ज़रूरी होता है, पर कभी प्रतिकार करने की मात्रा में हम बहुत ज़्यादा हो जाते हैं।
तो सबकी जीवन में बुरी चीज़ें होती हैं, ज़रूरी नहीं कि केवल दुख ही हो। लोगों को लगता है हम बहुत निराशावादी हैं, पर वहीं जीवन में बहुत उलझनें हैं, हम वो सब सहते हैं। तो ये सब जानते हैं कि जीवन में बहुत समस्याएं हैं, और ज़रूरी समस्याएं आती हैं। तो क्या होता है, हम कई बार समस्याओं से निकलने का कोई शॉर्टकट ढूँढते हैं, आसान तरीका कि कैसे निकलेंगे। और उसके लिए जो व्यक्ति होता है वो बुरी संगत में लग जाता है।
आध्यात्मिकता और व्यसन (Spirituality and Addiction)
मैं अमेरिका में था, एक Mental Health, Spirituality और Addiction के कॉन्फ्रेंस में था। वहाँ चर्चा थी कि अध्यात्म और एडिक्शन क्या है? वेस्टर्न वर्ल्ड में क्या होता है कि अगर कोई व्यक्ति बोलता है कि मित्रों का समय होता है और पार्टी में थोड़ा नशा हो, तो ठीक है। तो फिर एक-दो बार वो एक्सप्लोर (explore) करने के लिए, अनुभव करने के लिए, दूसरों का मन रखने के लिए करता है। उससे क्या होता है, मन को कुछ राहत होती है, कुछ सुकून मिलता है, कुछ अच्छा लगता है, और वहाँ मन में एक संस्कार बन जाता है। और बाद में जब कुछ परेशानी होती है, अगर कुछ बहुत तनाव का कार्य हो गया है, या फिर संबंधों में कुछ बड़ी बुरी घटना हो गई है, तो फिर मन कुछ राहत चाहता है, और फिर उसका आधार बनाकर वो बहुत ज़्यादा नशा करेंगे, बहुत ज़्यादा पियेंगे।
पर जब समस्या आ जाती है, तो अगर उसने पहले ऐसा किया है, तो मन तुरंत उसकी ओर राहत के लिए जाता है। तो पहले क्या करता है, वो अनुभव करने के लिए जाता है, थोड़ा सा अनुभव कर लिया हो गया। पर जब वो अनुभव का संस्कार हो जाता है, तो फिर वो राहत के लिए जाता है। और जब राहत चाहिए होती है, तो थोड़ा लेते हैं, थोड़ी सी राहत के लिए जाता है, तो फिर और ले लेगा, और राहत के लिए जाता है। और उस तरह से व्यक्ति जो है, सारी जो मर्यादाएं हैं, उनको पार कर देता है। फिर बाद में, वही व्यक्ति नशे के लिए इतना गिर जाता है कि जो व्यक्ति सादा रहता है, कोई झूठ भी नहीं बोलेगा, इतना अच्छा रहता है, वो नशा प्राप्त करने के लिए बहुत बड़ी-बड़ी झूठ बोलने लगता है। जो एक ऐसी जगह है, पहाड़ के किनारे, तो वो अगर बहुत ही फिसलने की जगह है, तो फिसल जाता है।
कमज़ोरी (Weakness) और क्रूरता (Wickedness)
तो इसलिए जो व्यक्ति बुरे कार्य करता है, वो ऐसा नहीं है कि व्यक्ति हमेशा बुरा होता है। पर एक बुरा कार्य होता है, दूसरा बुरा कार्य होता है, तीसरा बुरा कार्य होता है, और इस तरह से बुरे कार्य बढ़ जाते हैं। तो हम जब इसको बहुत घृणास्पद कार्य कहते हैं, तो सोचते हैं कि मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा, अधिकांश लोग सोचते हैं हम नहीं करेंगे। पर क्या है, दो चीज़ें हैं: एक है Weakness (कमज़ोरी) और एक है Wickedness (क्रूरता)। अभी Weakness मतलब कमज़ोरी, Wickedness मतलब क्रूरता। और इनमें फ़र्क क्या है?
जब Weakness होती है, मान लीजिए किसी को क्रोध आता है, वो कमज़ोरी है कि क्रोध आता है, वो चिल्लाते हैं। पर बाद में वो पछताते हैं। मतलब क्या है? उनके अंदर विवेक और बुद्धि है। बुद्धि जो है हमें एक rational (तर्क) के आधार पर बताती है कि यह नहीं करना चाहिए, और जो विवेक है, वो हमें भावना देता है कि यह अच्छा नहीं किया। तो यह हम दोनों में है। तो जिसमें बुद्धि में कमज़ोरी है, तभी वो क्रोध के वश में आते हैं, वो कुछ बुरा कार्य कर देंगे। पर बाद में जब विवेक इस्तेमाल करते हैं, तो पछताते हैं।
पर Wickedness is cold-blooded. जो Weakness होता है, वो heat of the moment में होता है। जो Wickedness होता है, तो अचेतन से दूसरों को दर्द देना है, वो सोचते हैं। तो अधिकांश लोगों में Wickedness, क्रूरता नहीं होती है। अधिकांश लोगों में Weakness होता है। पर जहाँ भी Weakness होता है, कमज़ोरी होती है, वहाँ कोई ना कोई ऐसा व्यक्ति आ जाता है जिसमें क्रूरता होती है, वो उस व्यक्ति को पकड़ लेते हैं।
जैसे धृतराष्ट्र इसमें Weakness हावी करते हैं, पर उनमें दुर्योधन जैसी क्रूरता नहीं होती है। तो उसी तरह से क्या होता है, विद्यार्थी अगर कॉलेज में ड्रग्स बेच रहे हैं, तो क्या होता है, वो बुरे नहीं हैं, पर उनमें Weakness होती है। और वहाँ पर ड्रग्स बेचने वाले ऐसे लोग हैं, जिनमें Wickedness होता है। तो हम सब में कमज़ोरियां हैं, Weakness है। पर हमें देखना है कि कम से कम यह कमज़ोरियां जो हैं, उनको हम पूरी तरह निकाल नहीं सकते, वो हैं। पर जो Weakness है, कम से कम हम किसी ऐसे व्यक्ति के चंगुल में न फंसे जिसमें Wickedness हो।
भक्तों के बीच निंदा और संगति का प्रभाव
कपटता, दुष्टता हो सकती है। कभी-कभी भक्तों के बीच होता है, कुछ लोग, बारी-सब भक्तों की निंदा करते हैं। ‘अरे इसने ऐसे किया, इसने ऐसे किया।’ जो गॉसिप (Gossip) होता है, गॉसिप का मतलब क्या है? When we hear something we like about someone we don’t like. जिसको नापसंद करते हैं, उसके बारे में ऐसा कुछ सुनते हैं जो हमें अच्छा लगता है। “हम तो अच्छा नहीं मानते हैं, उसने ऐसे किया, ऐसे किया।” तो क्या होता है? हम सब में एक थोड़ा सा भाव होता है कि किसी का इतना बड़ा गुणगान हो रहा है तो उसको थोड़ा नीचे लाएं।
पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, वो सोचते हैं कि उनकी full-time devotional service यही है कि दुनिया को भक्तों का दोष बता रहे हैं। वो सोचते हैं कि मैं सारे अज्ञानी लोगों को ज्ञान दे रहा हूँ, जिस पर आप श्रद्धा कर रहे हो, मैं आपकी श्रद्धा की बात कर रहा हूँ। अभी सब में दोष हैं और कई लोग ऐसे होते हैं, जो सोचते हैं कि उनकी सेवा ही दूसरों का दोष ढूँढना है। वो फिर क्या करते हैं, उस सेवा के लिए दूसरों का काल्पनिक दोष बनाने लगते हैं।
तो अभी हम सब में पतन करने की प्रवृत्ति होती है। पर जो लोग पतन भी करते हैं, उनके संग में आ जाएंगे, तो क्या होगा? हम भी बहुत दुष्ट हो जाएंगे। तो जब कमज़ोरी और दुष्टता साथ-साथ में आ जाएंगे, तो फिर जो अच्छा व्यक्ति है, वो भी बहुत बुरा बन जाएगा। इसलिए हमें जब संग करना है, तो ध्यान रखना है कि वहाँ रावण का उत्पाद हम ले रहे हैं। वहाँ रावण की संगति में हमें भी असुर प्रवृत्ति आ सकती है। हमें एक अच्छा संग बहुत ज़रूरी है।
कैकेयी और मंथरा का उदाहरण
और दूसरा उदाहरण देखते हैं Weakness और Wickedness का, यह है कैकेयी और मंथरा। कैकेयी बिल्कुल क्रूर नहीं थी, असली दुष्टता की नहीं थी, वो दैवीय प्रकृति की थी। वह राम को उतना ही प्रेम करती थी। पर जब वह कैकेयी मंथरा के प्रभाव में आई, तो क्या हो गया? वह Weakness, Wickedness के प्रभाव में आ गई। तो इसलिए हम सब में कमज़ोरियां हैं, और हम समझें कि ये कमज़ोरियां अगर किसी परिस्थिति में ऐसे आ जाएं और किसी दुष्ट व्यक्ति की संगति हो जाए, तो फिर हम भी बहुत ही बुरा कार्य कर सकते हैं।
इसलिए हमें चौकन्ना हमेशा रहना है। चौकन्ना रहना है कि ऐसे नहीं कि मैं यह नहीं कर सकता, हम अति-आत्मविश्वास में अपने कार्य न करें। हम इतने शुद्ध नहीं हैं कि हम कोई बुरा कार्य नहीं कर सकते। हमें एक सकारात्मक भाव होना चाहिए। संगति अच्छे से अच्छे लोगों को बुरा से बुरा कार्य भी करा सकती है क्योंकि Weakness से Wickedness की ओर जाना, कमज़ोरी से दुष्टता की ओर जाना, ये एक फिसलने वाली जगह है, वहाँ से कोई भी फिसल सकता है।
प्रश्न और उत्तर सत्र: कमज़ोरी और निर्लज्जता
(किसी का इससे कोई सवाल है?)
तो पहला सवाल है कि क्या ये जो दुष्टता है, कमज़ोरी है, क्या दुष्टता हमारे मन से भी आ सकती है? हाँ, कभी भी आ सकती है। पर साथ ही हमें कमज़ोरी है, और ये शायद संस्कार हो सकते हैं। पर अधिकांश लोगों में, जब हम भक्ति करते हैं, भक्ति में आते हैं, तो वह बहुत क्रूर दुष्ट प्रकार के संस्कार शायद नहीं होंगे। तो अधिकांश हमसे कहीं-कहीं से बाहर से प्रभाव होता है। हमारे मन में कल्पना बहुत सी आ सकती है, पर कौन सी कल्पना है जिसे हम सीरियसली (seriously) कंसीडर करते हैं? कुछ कल्पनाएँ आती हैं, पर हम उन पर अमल नहीं करते। पर अगर वही कल्पना के लिए हम बाहर किसी को करते हुए देखते हैं, कि यह समाज में स्वीकार्य है, तब हमारा मन उस बुरी कल्पना को स्वीकार करने लगता है।
और दूसरा सवाल है, तो अगर हम कहीं वो वही गलती बार-बार कर रहे हैं, तो क्या उस पर हम निर्लज्ज जैसे बन जाते हैं? शेमलेसनेस (Shamelessness) पूरी तरह हावी हो जाता है? कैसे है कि हम सब में अलग-अलग कमज़ोरियां हैं, और कभी-कभी किसी कमज़ोरी को ओवरकम (overcome) करने के लिए, उसके परे जाने के लिए हमें समय लगता है। तो अगर ऐसा है कि किसी कमज़ोरी के परे जाने में समय लग रहा है, तो दो चीज़ें हैं: निर्लज्ज होना है और दूसरा है कि वही गलती और अधिक मात्रा में करना है।
अगर कमज़ोरी है और गलती हो रही है, तो वह अनर्थ है। पर अगर वही गलती हम अधिक मात्रा में करते हैं, तो फिर क्या हो रहा है? वो एक निर्लज्जता के परे जाना है। तो कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी को कोई ज़ख्म है, खुजली होती है। उसको हम खुजली के समान करते हैं। तो खुजली चली नहीं जाती है, वो रहती है कुछ समय। पर अगर वही गलती हो रही है और उसको हम बढ़ा नहीं रहे हैं, उसी मात्रा में हो रही है, तो लिमिट होती है। गलतियों में भी लिमिट होती है। तो फिर हम देख सकते हैं कि इस अनर्थ के परे जाने के लिए कुछ समय लगने वाला है, पर हमें भक्ति नहीं छोड़नी है।
इसके दो उदाहरण देता हूँ। हर एक व्यक्ति का मन अलग होता है। किसी व्यक्ति में मान लीजिए Indulgence (भोग करना) है और Abstinence (छोड़ना) है। तो किसी व्यक्ति के लिए भोग छोड़ना बहुत आसान है। पर कोई दूसरा व्यक्ति है, उसके लिए भोग और त्याग के बीच में बड़ा पहाड़ है। जो संस्कार हैं, इतने गहरे संस्कार हैं उस व्यक्ति के लिए, कि उसके लिए यहाँ से वहाँ आना दो कदम की जगह नहीं है। तो फिर क्या है? मैं स्टैंडर्ड फॉलो नहीं कर पा रहा हूँ, मैं यहाँ पर हूँ, पर यहाँ पर रहकर भी कृष्णभावनामृत में हो सकता हूँ। तो यही भाव है: “अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्” सुदुराचारो मतलब क्या है? वो स्टैंडर्ड से बहुत नीचे है, पर फिर भी वो भगवान की भक्ति करने के भाव में लगा होता है। भगवान कहते हैं कि क्योंकि अभी वो दुराचार अच्छा नहीं है, दुराचार भगवान के लिए बुरा ही है, पर क्योंकि वो अनन्य भाव से भज रहा है, इसलिए भगवान कहते हैं कि वो उसके लिए अच्छा है, साधु माना जाता है।
भगवान की भक्ति और उद्देश्यपूर्ण जीवन
भगवद्गीता में एक श्लोक आता है 14.26, जो बहुत समय तक समझ भी नहीं आ रहा था: “मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। सगुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥” हमको वहाँ पर थोड़ा दर्द होता है (जैसे इंजेक्शन का दर्द), पर क्या है हम उसको स्वीकार करते हैं। डॉक्टर को पेशेंट देते हैं। हम जानते हैं कि ये दर्द है, इसका कुछ परपस (purpose) है, इसका कुछ अर्थ है। तो हमें दर्द अच्छा नहीं लगता है, पर दर्द हम स्वीकार कर सकते हैं जब उसका कुछ उद्देश्य समझ आता है।
तो जब जीवन में समस्याएं हमारे लिए आती हैं, तो अगर हमारा उद्देश्य कुछ अच्छा होगा, तो फिर हम समस्याओं का भी सामना कर सकते हैं। समस्या आना अपने आप में कुछ दर्द होगा, पर हम दर्द को स्वीकार कर सकते हैं। अगर हम सुख की खोज को जीवन का उद्देश्य मान लेते हैं, तो उससे दो समस्याएं आती हैं। जैसा मैंने कहा कि हम दुख से नहीं डरते हैं, अर्थहीन दुख से डरते हैं। हम केवल सुख नहीं चाहते हैं, हम अर्थपूर्ण सुख चाहते हैं।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को विनोद अच्छा लगता है। अगर कोई कह रहा है कि आपको कोई आर्थिक ज़िम्मेदारी नहीं है, कोई पारिवारिक ज़िम्मेदारी नहीं है, आप आज से ज़िन्दगी भर टीवी पर कॉमेडी देखें। कॉमेडी सबको अच्छी लगती है, पर ज़िन्दगी भर कॉमेडी देखेंगे तो बोर हो जाएंगे, मन करेगा कुछ काम करें। कॉमेडी से सुख मिलता है, पर वो अर्थहीन सुख है। तो हमें सुख चाहिए, पर अर्थपूर्ण सुख चाहिए। जो सुख अर्थहीन होता है, वो कुछ समय के लिए सुख देता है, पर बाद में उसका अनुभव बहुत कम हो जाता है।
तो यह बहुत बड़ी बात है कि हम केवल सुख नहीं चाहते, हम अर्थपूर्ण सुख चाहते हैं। Pleasure is a very cheap purpose. उसमें हमें गहराई का अनुभव नहीं होता है। अगर कोई केवल सुख की ही खोज कर रहा है, तो फिर उसका जीवन निरर्थक हो जाएगा। क्या होता है? हम अनुभव सुख चाहते हैं। जो मुझे अच्छा लगता है वही बार-बार करता हूँ, तो मुझे खुद ही अच्छा नहीं लगता। तो युधिष्ठिर महाराज के लिए कहते हैं कि कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है जबकि उसका आधार दूसरों के स्तर पर है? उसने उसका सुख दूसरों के स्तर पर ला दिया है। हाँ, और वो भोगते हैं। कि दूसरा उसका स्तर क्या है, उसके आधार पर मेरा सुख रहेगा। तो ऐसा व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता है।
क्या आपका अर्थपूर्ण उद्देश्य है? अगर आपका अर्थपूर्ण उद्देश्य है, तो फिर जब आपको कुछ समझ नहीं आता, तब भी आप टिके रहते हैं। मान लीजिए हम किसी बड़े अस्पताल में बैठे हों, वहाँ कोई व्यक्ति कुछ भी कर सकता है।
जीवन में नियमितता (Order) और अव्यवस्था (Chaos)
अभी हम सब इस प्रवचन में आए हैं। तो प्रवचन में जिस तरह से हम काम कर सकें, उसके लिए जो नियमितता (Order) चाहिए, वो ज़रूरी है। पर हमको केवल ऑर्डर नहीं चाहिए, हमको थोड़ा केओस (Chaos) भी चाहिए। केओस मतलब क्या? अगर आप प्रवचन में आते हैं और हर बार वही सुनने को मिल रहा है, तो मन थोड़ा ऊब जाएगा। हमको कुछ नए पॉइंट, कुछ नई अवधारणा सुननी है। हमको कुछ Order चाहिए, कुछ Chaos चाहिए। जब इस तरह से हम जीते हैं तो जीवन अच्छा लगता है। कुछ भी ऑर्डर नहीं है तो हम कुछ नहीं कर सकते, और कुछ भी केओस नहीं है तो पूरा जीवन बोरिंग हो जाता है।
तो ये क्यों बता रहा हूँ? हमारे जीवन में कभी नियमितता होती है, और केओस ज़्यादा होता है। कभी नियमितता कम होती है, और केओस ज़्यादा होता है। पर हम जब भगवान पर श्रद्धा रखते हैं—भगवान पर श्रद्धा रखने का मतलब केवल यह नहीं कि भगवान का अस्तित्व है, पर यह समझना है कि The universe is moving forward. भगवान इस जगत को चला रहे हैं, इसका कुछ उद्देश्य है। यहाँ पर ऑर्डर है, यहाँ पर केओस है। पर इस केओस का सामना करने के लिए हमारा अस्तित्व है, तो उसके ऊपर एक नया ऑर्डर आता है।
जब हमारे जीवन में समस्याएं आती हैं, तो यह समस्या का क्या उद्देश्य है, यह मैं अपनी बुद्धि से नहीं समझ सकता। पर जब मेरे जीवन में केओस आया है, मैं उसका सामना करूँगा, तो उससे कुछ और बेहतर ऑर्डर आएगा। हम समझते हैं कि वो वहाँ पर एक सचेतन आत्मा है। मान लीजिए किसी को भारत से अमेरिका जाना है, तो नॉर्मल प्लेन से जाएंगे। पर अगर मान लीजिए हम कोई टीवी भेजते हैं पार्सल में, तो वो सेफ रहेगा, पर अनकम्फर्टेबल (uncomfortable) हो जाएगा। कहने का मतलब यह है कि माँ के गर्भ में एक तरह का ऑर्डर है, कि वो शिशु सेफ है। पर जब शिशु का जन्म होता है, तो क्या होता है? केओस (Chaos) होता है। वो माँ के लिए बहुत दर्द का समय होता है, लेबर पेंस (Labor pains) काफी मुश्किल होते हैं। और वैसे ही शिशु के लिए दर्द होता है। हर चीज़ क्यों हुई, यह दर्द क्यों हो रहा है, यह बताना मुश्किल है। हम स्पिरिचुअली जानते हैं, पर हम यह समझ सकते हैं कि जो केओस आता है, वो हमेशा के लिए नहीं है।
अगर हम समझते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य भगवान की सेवा करना है, तो हम भगवान से जुड़ जाते हैं। God is not a separate entity, we are part and parcel of God. हम सब भगवान के अंश हैं। जो हम भगवान के लिए करते हैं, वो हमारे पास पुनः वापस आता है। तो अगर हम समझते हैं कि मेरे जीवन का उद्देश्य भगवान के करीब जाना और भक्ति में प्रगति करना है, तो चाहे मेरा व्यावहारिक जीवन हो, भक्ति की सेवा हो, साधना हो—हर चीज़ में हम समझ पाते हैं।
समस्याएं आ रही हैं, इनका क्या उद्देश्य है? कई बार हम नहीं समझ पाते। कारण और उद्देश्य—ये दोनों एक नहीं हैं। कारण मतलब कि क्यों हुआ? कई बार हमें कारण समझ नहीं आता। पर इसका उद्देश्य क्या है? मैं अमेरिका में एक भक्त के साथ उनके घर में था। वो बता रहे थे कि वो भारत में यात्रा के लिए आ रहे थे। ऑफिस से छुट्टी ली और लगभग 20-22 दिन बाद वापस गए, तो वहाँ पर ऑफिस ही नहीं था! वो 20 दिन में कंपनी बंद हो गई। अभी केओस कैसे आ सकता है हमारे जीवन में, हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पर जीवन का उद्देश्य यह है कि हम हर परिस्थिति में भगवान के करीब जाएं। भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ, अगर वह उद्देश्य रखते हैं तो सुख-दुख में भी हम समझते हैं: “स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥” Happiness is best experienced as a by-product of a purpose-driven life, not as a product of a pleasure-driven life. हम सब सुख चाहते हैं, पर हम सुख की खोज के लिए जीते हैं। जो असली सुख है, वह एक बाय-प्रोडक्ट (by-product) होता है जब हम अपना जीवन भगवान की सेवा के लिए जीते हैं।
श्रील प्रभुपाद जी का दृष्टांत
मैं एक प्रसंग बताकर समाप्त करूँगा। श्रील प्रभुपाद जब पाश्चात्य देश में प्रचार करने के लिए गए, तो भारत में एक प्रकार का ग्लैमर होता है कि पाश्चात्य देश जाना है। जब वो अमेरिका गए, तो उनको कोई जानता नहीं था। प्रभुपाद जी एक व्यक्ति के घर में रुक रहे थे। वहाँ बुद्धिस्ट मेडिटेशन (Buddhist meditation) होता था। उस व्यक्ति को बहुत स्ट्रेस होता था। तो क्या हो रहा था? एक महीने पहले कुछ फिक्स हो गया था। पर उस समय अचानक वहाँ पर कुछ बड़ा मेला हो गया। चूँकि अब ये केओस हुआ, वो वहाँ बैठे रहे। जब मैं क्लास दे रहा था, तो giving a class is not just a matter of speaking, it’s also a matter of disturbance. कोई उठ जाता है, कोई डिस्टर्ब कर देता है।
हम सोचते हैं भगवान की योजना से कुछ एक उद्देश्य पूरा हो सकता है। ओर्डर क्या है? हम कोई लेक्चर देने जाते हैं, लोग वहाँ पर आ रहे हैं, लेक्चर सुन रहे हैं—वो ओर्डर है। केओस क्या है? आप लेक्चर देने जा रहे हैं और कोई है ही नहीं! तो वो केओस से कौन सा ओर्डर आने वाला है, वो हम पहले से बता नहीं सकते। So, faith means to not reduce God to our expectations and our plans. हम अपनी योग्यता नहीं बढ़ाते हैं, पर हम भगवान को सीमित करते हैं। क्या होता है, हम जो चाहते हैं वो नहीं होगा, पर अगर हम सेवा भाव रखते हैं, तो वो बहुत अच्छा हो सकता है।
प्रभुपाद जी बोलते हैं कि “अनुमान है”, हम सामान्यतः कहते हैं कि भक्ति मार्ग अनुमान पर आधारित नहीं है। पर प्रभुपाद जी के शब्द थे कि भगवान की कुछ योजना होगी, पर क्या योजना है वो पता नहीं। “आपने यहाँ पे लाया है तो कोई उद्देश्य होगा। तो फिर मैं उस उद्देश्य की पूर्ति कर पाऊँ। कैसे कर पाऊँगा उसको मुझे पता नहीं है।” इसलिए प्रभुपाद जी कहते हैं “नाचाओ नाचाओ प्रभु नाचाओ से-मते” (Nachao Nachao Prabhu Nachao Se-mate)। मतलब क्या है? प्रभुपाद जी कहते हैं कि मैं आपका सेवक हूँ, पर कैसे मैं आपकी सेवा करने वाला हूँ, यह मुझे पता नहीं है। जैसे आप मुझे नचाना चाहें। पहले जो उनको रहने की जगह मिलती है, वहाँ पर उनको ‘Curiosical object’ (Curiosity object) के रूप में ट्रीट करते हैं। पर प्रभुपाद जी को वहाँ से भी मौका मिला, तो प्रभुपाद जी ने वो मौका स्वीकार किया। आगे वो जो केओस था अमेरिका में, उससे कहाँ और क्या होगा पता नहीं था। और बाद में जो केओस प्रभुपाद जी ने सहन किया, उससे दुनिया भर में कृष्ण भावनामृत फैला।
तो जब हम सेवा का भाव रखते हैं, तो कितनी भी समस्याएं आएं, हम सब समस्याएं सहन कर सकते हैं, और हमारा जीवन अर्थपूर्ण बना सकते हैं। सारांश में, यही चर्चा है कि कैसे हम खुद को ट्रांसफॉर्म कर सकते हैं, जिससे हमारा जीवन अर्थपूर्ण बन सकता है। बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा!
अंतिम प्रश्न: स्थिति और स्वभाव (Position and Disposition)
(We need to come back to you a little later if you don’t mind. It was good, we just have some questions then we will come back to you ok quickly. Prabhupada Ji Missile has started created highest automation in spirituality for human beings…)
यहाँ मंदिर में लोग आते हैं, दर्शन करते हैं। क्या जो लोगों में कमज़ोरियां हैं, तो भी उस स्तर पर अगर कमज़ोरी नहीं होती है, तो भी उसका बहुत ज़्यादा दुरुपयोग होता है। अगर हम एक टीम हैं, एक टीम के लीडर हैं, और हम ‘Indiscipline’ (अनुशासनहीनता) करते हैं, तो क्या होगा? इंडिसिप्लिन एक Weakness (कमज़ोरी) है। पर अगर हम सुधार नहीं कर रहे हैं, तो वही कमज़ोरी किसमें है, वो बड़ा महत्वपूर्ण है। जो कमज़ोर हैं, उनका शुद्धिकरण ज़्यादा आसान होता है।
जैसे नारद मुनि जब मृगारी के पास गए, तो उसने यह नहीं कहा कि तुम जानवर मारना छोड़ दो। सवाल पूछा। तो जो क्रूर हैं, उनको प्रचार करना मुश्किल होता है। हमें भी अपनी क्षमता समझनी है, हमारी लिमिट समझनी है। हम बद्ध जीव हैं, तो हमारी करुणा करने की क्षमता भी सीमित है। तो अगर ऐसे बहुत कोई दुष्ट व्यक्ति हैं, उनको हम बदलने का प्रयास करेंगे, तो कई बार उनको बदलने के चक्कर में हम भी नीचे गिर सकते हैं। इसलिए उनके लिए प्रार्थना करना ज़रूरी है।
यहाँ पर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि What is our position and what is our disposition (हमारा स्तर क्या है और हमारा भाव क्या है)। मान लीजिए अगर किसी का पोज़ीशन है कि वो टीचर है, काउंसलर है, गाइड है, पैरेंट है, तो उसे देखना है। केवल दोषदर्शी नहीं होना है। ऐसा नहीं कि हमें व्यक्ति में सिर्फ दोष ही देखने हैं। जब हमारा पद भी है तो भी हमें सुधारने के लिए कार्य करना है, अहंकार (Ego) के लिए नहीं। जब हम ईगो के लिए करते हैं तो परेशानी होती है। व्यावहारिक रूप से यह समझना ज़रूरी है कि किस व्यक्ति का किस तरह का स्वभाव और व्यवहार होता है।
वह एक शुद्ध आत्मा है और उनका जो मन है और जो शरीर है एक प्रकार से Conditioned (बद्ध) है। कई बार हम उनको Enlightenment (ज्ञान) देते हैं, पर Encouragement (प्रोत्साहन) नहीं देते हैं। सिर्फ ज्ञान देते हैं, प्रोत्साहन के बिना, तो लोगों को लगता है कि “हाँ, यह बड़ी-बड़ी सी बात बोलता है, यह तो impractical (अव्यावहारिक) है। हाँ, मैं कुछ समय के लिए यह बात कर सकता हूँ…”