Meditating on the Sanskrit and Bengali prasadam prayers – Hindi
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Lecture Summary
प्रवचन का मुख्य सारांश
इस प्रवचन में मुख्य रूप से भगवान की प्राप्ति के लिए सच्ची प्रार्थना, श्रद्धा के महत्व, इंद्रिय-निग्रह (विशेषकर जीभ पर नियंत्रण) और हरि कथा रूपी प्रसाद की महिमा पर विस्तार से चर्चा की गई है।
यहाँ इसके मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
- प्रार्थना का सही भाव (True Prayer vs. Material Begging): हम अक्सर भगवान के पास जाकर केवल अपनी भौतिक समस्याओं को दूर करने की याचना करते हैं, जो उस भिखारी के समान है जो सोने की थाली में भीख मांग रहा हो। सच्ची प्रार्थना वह है जिसमें कोई भौतिक मांग न हो, बल्कि भगवान की सुंदरता, दया और उनके गुणों का निस्वार्थ गान हो (जैसे ब्रह्मा जी द्वारा रचित ब्रह्म संहिता)।
- श्रद्धा रूपी आंतरिक स्नायु (Muscle of Faith): जिस तरह कसरत करने से शरीर के बाहरी स्नायु (Muscles) मजबूत होते हैं और हम भारी वजन उठा पाते हैं, उसी तरह निरंतर भक्ति और आध्यात्मिक कार्यों से हमारी आंतरिक श्रद्धा मजबूत होती है। यदि हमारी श्रद्धा मजबूत है, तो जीवन में आने वाली कोई भी समस्या हम पर बोझ नहीं बन पाती, क्योंकि हमें भगवान का आश्रय मिल जाता है।
- शरीर: अविद्या का जाल और आसक्ति (Trap of Ignorance & Attachment): यह शरीर अविद्या (अज्ञान) का जाल है और हमारी इंद्रियां हमें भौतिक विषयों में फँसाती हैं। जिस तरह मूवी थियेटर में फिल्म देखने वाला आसक्ति के कारण रोता है, जबकि टिकट चेक करने वाला अप्रभावित रहता है; ठीक उसी तरह संसार में आसक्ति ही हमारे दुखों का मूल कारण है। वृद्धावस्था में कृत्रिम तरीकों (दवाइयों) से विषय भोगने की लालसा मनुष्य को विनाश (जैसे हार्ट अटैक) की ओर ले जाती है।
- जिह्वा (जीभ) पर नियंत्रण और नकली भूख: सभी इंद्रियों में जीभ को जीतना सबसे कठिन है। भोजन की दो प्रकार की भूख होती है: असली भूख (जो शरीर को ऊर्जा देती है) और नकली भूख (जो केवल स्वाद और मन की लालसा के लिए होती है, जैसे आइसक्रीम की भूख)। मन की इस नकली भूख को नियंत्रित करना ही साधना है।
- महाप्रसाद से हृदय परिवर्तन: प्रवचन में अमेरिका के एक गुंडे का उदाहरण दिया गया है, जिसका हृदय किसी उपदेश से नहीं, बल्कि केवल भगवान का स्वादिष्ट और पवित्र ‘प्रसाद’ खाने से पूरी तरह परिवर्तित हो गया था।
- हरि कथा – सर्वश्रेष्ठ महाप्रसाद: भौतिक अन्न रूपी प्रसाद ग्रहण करने की शरीर की एक सीमा होती है, लेकिन हरि कथा (भगवान का श्रवण और कीर्तन) ऐसा महाप्रसाद है जिसकी कोई सीमा नहीं है। इसे बुढ़ापे या बीमारी में भी ग्रहण किया जा सकता है। जिस तरह चिलचिलाती धूप से बचकर AC (एयर कंडीशनर) वाले कमरे में जाने पर सारी तपन दूर हो जाती है, उसी तरह इस संसार के त्रितापों (दुखों) से झुलसता हुआ जीव जब ‘हरि कथा रूपी कंडीशन (AC)’ में प्रवेश करता है, तो उसे परम शांति और दिव्य आनंद की प्राप्ति होती है।
Full Transcription
प्रवचन में स्वागत और प्रार्थना का विषय
प्रवचन के इस सत्र में आपका स्वागत है। आज हम जो भगवान की प्रार्थना है अपने प्रवचन के लिए, उसकी बारे में आज चर्चा करेंगे। तो ये एक प्रार्थना हम जो जीवन में कई बार कर रहे हैं। जो है भगवान की प्राप्ति के लिए प्रार्थना, शरीर रोग के आधार पर। तो इसके बारे में हम चर्चा करेंगे। हम चर्चा करेंगे जिस भाव में करेंगे।
जो प्रधान अंग है इस प्रवचन का, उसमें हम जो प्रार्थना है, यहाँ पर तुम्हें कुछ दिखाई जाएगी। तो उसमें हम थोड़ा चर्चा करेंगे तो इसकी चर्चा करेंगे। अलग-अलग प्रार्थना है, प्रार्थना का स्तर और प्रार्थना की चेतना।
इसके बारे में चर्चा करेंगे। नाम चिंतामणि, नाम ब्राह्मणी वैष्णवे, ‘विश्वासो नैव जायते’। प्रार्थना का स्तर और प्रार्थना की चेतना, विश्वासो नैव जायते। प्रार्थना का स्तर और प्रार्थना की चेतना, विश्वासो नैव जायते। श्रद्धा की चेतना, विश्वासो नैव जायते। यह ऐसे नहीं है कि हम बदलना नहीं चाहते हैं।
श्रद्धा रूपी आंतरिक स्नायु (Muscle)
तो जो व्यक्ति कसरत करता है, अच्छा खाना खाता है, अच्छी तरह शरीर की देखभाल करता है, तो क्या है, उसकी शक्ति है, उसका स्वास्थ्य जो अच्छा है, स्नायु (Muscles) आ जाएं। तो जैसे शरीर के स्नायु होते हैं, जिसके द्वारा हम कार्य कर सकते हैं, हम बोझा उठा सकते हैं, उसी तरह से यह बाहरी स्नायु है।
जो हमारे आंतरिक स्नायु हैं, वो है श्रद्धा। जो श्रद्धा का स्नायु है, उससे हम आंतरिक बोझा उठा सकते हैं। अगर श्रद्धा का स्नायु नहीं है, तो जो दुनिया में समस्या आती है, वो भी बोझ है, व्यक्ति पर भारी पड़ता है।
तो क्या होता है, श्रद्धा है, तो हम समझते हैं, कि ये समस्या का सामना करने के लिए मैं अकेला नहीं हूँ। भगवान खड़े हैं, भगवान कहते हैं कि यदि आप मेरा स्मरण करते हो, मुझ पर श्रद्धा करते हो, तो तुम्हारी समस्त समस्या जो है, भगवान हर लेंगे। वो छुपने की जगह नहीं देते, यह नहीं कि आज छुप जाओ, समस्या है, ऐसी बात है। समस्या है, पर उसका हमें ऐसा आश्रय देते हैं, जिससे कि मैं तुरंत शक्ति देता हूँ। इतनी समस्या है, समस्या आई है, पर वो मुझे समस्या नहीं लगती। यहाँ इतनी समस्या आई है, पर वो मुझे समस्या नहीं लगती, इतनी समस्या नहीं है, इस तरह से।
जीवन की रेलगाड़ी और निरन्तर अभ्यास
अगर हम कोई रेलगाड़ी से जा रहे हैं, तो कभी-कभी, गाड़ी स्टेशन पर जाती है, कोई ट्रेन रुक जाती है, और फिर बाद में जाती है। तो हम जब प्रवास करते हैं, जो स्टेशन आता है, हमारी गाड़ी जो है आगे चलेगी। ठीक उसी तरह से हमारे जीवन की गाड़ी में कई स्टेशन आते हैं। कुछ सुख के स्टेशन होते हैं, कुछ दुःख के स्टेशन होते हैं। पर तुम्हारी जीवन की गाड़ी आगे चलती रहती है। तो तुम्हारे जीवन की गाड़ी में जब स्टेशन आता है, तो उससे हम इसको बहुत थोड़ी समझते हैं, उससे हमें जीवन में आगे बढ़ना है।
और वो कैसे बढ़ाते हैं? जिन कार्यों से हमें श्रद्धा मिलती है, वो कार्य हम निरंतर करते रहें। जैसे अगर हमारे स्नायु कमजोर हैं तो कोई वजन नहीं उठा पाएंगे, कोई कसरत करेंगे, इसलिए श्रद्धा बढ़ जाए। जो कार्य हम करते हैं, जिनसे हमारी आंतरिक श्रद्धा बढ़ती है, अगर वो कार्य हम निरंतर करेंगे तो श्रद्धा बढ़ जाएगी। वो कार्य भक्त करते हैं, भक्त निरंतर करते हैं।
महाप्रसाद की महिमा और हृदय परिवर्तन
एक बार हम प्रसाद बाँट रहे थे। अमेरिका में भक्त प्रसाद बाँटते थे, और जब प्रसाद बाँटते थे तभी एक गुंडा वहाँ आया था। और वहाँ भक्तों को आके, तंग करने में उसे मज़ा आ रहा था। तो भक्त प्रसाद बाँटते थे और भक्त क्या हैं, भक्त कोमल लगते हैं। वो ज़्यादा शिकायत नहीं कर रहे थे, तो सब कोमल लगते हैं। तो उस गुंडे ने प्रसाद खाया। प्रसाद खाके ही इतना आकर्षण हो गया था उसको प्रसाद में। और भक्त प्रसाद दे दें, मुट्ठी में दे दें, स्वादिष्ट प्रसाद दे दें, तो क्या हो गया? अभी इसका हृदय तो परिवर्तित हो गया!
पर फिर भी, अभी वो तो एक बात आता था, सबको दिखाने कि मैं बदल गया हूँ, वो अच्छे के लिए बदल गया। अभी क्या हो गया था, वहाँ पर भक्तों को परेशान करने के लिए कोई और गुंडा आ गया। और क्या हो गया, भक्तों को कुछ भी बिना बताए, वो पुराना गुंडा उस नए गुंडे को ले गया था। तो फिर वो भक्त कहते हैं, आप इतने अच्छे हैं, आप इतना अच्छा कार्य कर रहे हैं, आप कहाँ जाएं, उसको मंदिर में लेके जाएं। क्या हो गया था? कोई प्रवचन नहीं हुआ, प्रसाद के बाद ही हृदय परिवर्तन हो गया, प्रसाद के बाद आत्मा शुद्ध हो गई।
शुरुआत कैसे करें: फ्रैक्चर का उदाहरण
अगर हम ये करेंगे तो इससे श्रद्धा बढ़ जाएगी। पर शास्त्रों में बताया है कि ‘विश्वासो नैव जायते’—यानी कि अगर हमारा पुण्य कम है तो इनमें विश्वास नहीं होगा। तो अगर विश्वास नहीं होगा तो हम करेंगे कैसे? और अगर करेंगे नहीं तो श्रद्धा आएगी कैसे? तो ये ऐसा लगता है कि श्रद्धा नहीं है तो इसलिए हम सब नहीं करते हैं। इस स्तर में हैं।
इसलिए हम शुरुआत से, अगर कोई हड्डी का बड़ा फ्रैक्चर हो जाता है और हाथ टूट गया और डॉक्टर ने हाथ जोड़ दिया है, तो डॉक्टर कहेंगे कि आपको अभी हाथ हिलाना नहीं चाहिए, उससे आपका बाद में सेहत अच्छा हो जाएगा, पहले तो आपको आराम करना है। पर अगर बिल्कुल हाथ हिलाएंगे नहीं तो जो हाथ है वो निष्क्रिय हो जाएगा और बाद में सड़ जाएगा।
तो अभी आपका फ्रैक्चर ठीक हो गया है तो आपको थोड़ा हिलाना चाहिए। मेरा हाथ हिला रहे हैं तो हिलाना चाहिए। और आप कहें नहीं ठीक करते हैं, मैं तो बीमार हूँ, मैं बीमार हो गया हूँ, मैंने बात नहीं मानी तो क्या होगा? तो आपको हिलाना चाहिए, जितना हिला सकें उतना हिलाना चाहिए। तो कहते हैं कि हाथ हिलाने के लिए पुली (Pulley) लाओ। पूरी उंगली हिलाओ, तो सिर्फ उंगली का अगला भाग हिलाओ।
भौतिक याचना और शुद्ध प्रार्थना (ब्रह्म संहिता)
प्रार्थना के लिए हम जो याचना करते हैं वो बहुत नीची होती है। अगर कोई भिखारी है, तो अगर भिखारी भीख मांगता है, और वो भिखारी याचना करता है, तो उसके हाथ में ही सोने की प्लेट है। मैं भ्रमित हो जाता हूँ, विषादग्रस्त हो जाता हूँ।
पर असली प्रार्थना क्या है? भगवान आप कितने कृपालु हैं, आप कितने दानशील हैं, आप कितने महान हैं, वह बताते हैं। भगवान ने कहा, आपके बारे में सोचना है। ब्रह्माजी गाते हैं, ब्रह्मसंहिता पूरी प्रार्थना गाते हैं, उसमें कोई भी याचना नहीं होनी चाहिए।
वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षं बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम्। कन्दर्पकोटि कमनीयविशेषशोभं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥
आप बता रहे हैं, गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि, आपकी जो आँखें हैं, वो खिले हुए कमल की पंखुड़ी के समान हैं, आपके सिर पे सुंदर एक मोर का पंख है, आपके शरीर का वर्ण तो असिताम्बुद (नए बादल) की तरह है, मतलब जो नया बरसात के समय बादल निकलता है, उसी समान है। और आपका सुंदर रूप यही है। तो मैं कुछ उपमा दे रहा हूँ, पर क्या है आपका सुंदर वर्ण? कन्दर्प कोटि कमनीय विशेष शोभं—करोड़ों कामदेवों के समान सुंदर हैं।
तो एक भक्त अमेरिका से आये हैं, पहली बार यहाँ मंदिर में आये, तो पहले दूसरे धर्मों में थे। और वहाँ पर क्या होता है? वहाँ पर वे याचना करते हैं भगवान से, कि बीमारी दूर हो जाए, ये सब प्रार्थना वे करते थे। और यहाँ पूरी ब्रह्मसंहिता, इतनी प्रार्थना, परम कृष्ण की, सुनकर आश्चर्यचकित रह गए। कि मुझे देखने को मिला, यहाँ पे मुझे समझ आया, कैसे प्रार्थना करते हैं, प्रार्थना के लक्षण क्या होते हैं।
अगर हम कहते हैं, भगवान से प्रेम है, तो अच्छा है भगवान से मांगने के लिए, पर भगवान के लिए हृदय में क्या है? उससे हमारा भगवान का प्रेम नहीं दिखता है। प्रेम का अर्थ क्या है? निस्वार्थ प्रेम दिखता है, आत्मिक प्रेम दिखता है। भगवान के लिए आत्मिक प्रेम दिखता है। हम ‘विश्वासो नैव जायते’ के स्तर पर हैं।
शरीर: अविद्या का जाल और मानसिक प्रवृत्तियाँ
तो यह आसक्ति है, तो इसका उदाहरण है, जैसे कोई मूवी थियेटर (Movie Theater) में जाते हैं। तो मूवी थियेटर में कोई जाता है, और मानसिक प्रवृत्तियों से व्यक्ति फंस जाता है। तो अविद्या जाल, शरीर कहते हैं जाल है, क्योंकि शरीर अलग-अलग प्रकार की मानसिक प्रवृत्तियों का निर्माण करता है और जिससे व्यक्ति भक्ति के लिए, भगवान के लिए आकर्षित नहीं होता है। शरीर अलग-अलग प्रकार की मानसिक प्रवृत्तियों का निर्माण करता है तो उससे क्या होता है, भक्ति अस्पष्ट हो जाती है। अंत में जो वृद्धावस्था आती रहती है, वो चिंता बढ़ाती है।
वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः। तो वास्तव में वृद्धावस्था चिंता क्यों बढ़ाती है, क्योंकि शरीर में कार्य करने की शक्ति नहीं रहती, उससे चिंता करते हैं। कि मेरा कोई नहीं है, जीवन में कोई नहीं है। शरीर हर दशा में मोह निर्माण करता है, जिसके कारण व्यक्ति भगवान की ओर आकर्षित नहीं होता है। तो यह शंकराचार्य जी ने बताया है। बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः।
पर अभी कलियुग ने बहुत प्रगति कर ली है। तो कलियुग की प्रगति का क्या परिणाम हुआ है? विज्ञापन की इंडस्ट्री है। अच्छे लोग क्रिकेट देखते हैं, और उसमें एडवर्टाइजमेंट (Advertisement) चलता है।
तो मैं एक कांफ्रेंस (Conference) में गया था, तभी वहाँ भारत की प्रगति के बारे में बहुत सुना जा रहा था, और उस पर वहाँ अलग-अलग लोग क्रिकेट के बारे में कुछ बता रहे थे। तो वहाँ पर एक सवाल जो आया था, कोई बता रहा था कि क्रिकेट में इतना पैसा आता है, आईपीएल (IPL) है, इतना पैसा मिल रहा है। वह पैसा जो आता है, अब ये आईपीएल या क्रिकेट टूर्नामेंट में, वह बड़े-बड़े कंपनी एडवर्टाइजमेंट करते हैं, पैसा कमाने के लिए। और उसमें साधारण लोगों का पैसा आता है, लोग खर्च करते हैं टिकट लेने के लिए।
और दूसरी तरफ जो लोग क्रिकेट मैच देखते हैं, जो चलता है, तो लोग अपना काम बंद करते हैं, और बोलते हैं कि जो क्रिकेट मैच होती है… कभी-कभी कोई राजनीतिक… समाज में ह्रास होता है। यहाँ पर कोई एंटी-क्रिकेट (anti-cricket) चर्चा नहीं चल रही है। तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः… कि एक आसक्ति करता था, क्योंकि जो बाह्य गति थी उसमें आसक्त हो जाते हैं।
मानसिक चिंता: एक रॉकिंग चेयर की तरह
मैं पुष्टि से, आत्मिक पुष्टि से, मैं आपको इस मार्ग पर ले जाने के लिए अभ्यास कर रहा हूँ। इसके बारे में इतनी चिंता नहीं थी और यह चिंता ऐसी होती है कि वास्तव में इसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता। अभी हम, आप में से कुछ चेयर (Chair) पर बैठे हैं, कुछ नीचे बैठे हैं, इस चेयर पर बैठे हैं।
तो मान लीजिए कोई चेयर होता है, रॉकिंग चेयर (Rocking chair) होता है, जो हिलता रहता है। तो कभी-कभी वो चेयर हिलता रहता है, तो सोचने की बात है, वो हिलने से क्या फायदा है? पर यह जो चिंता है, यह क्या है? यह एक मेंटल रॉकिंग चेयर (Mental blocking chair) है। यह मानसिक स्तर पर आपको हमेशा हिलाते रहती है। पर यह जो चेयर है, इसमें कोई आगे बढ़ना नहीं है, इससे सिर्फ तुम्हारी शक्ति जल जाती है। इसका और कुछ फायदा नहीं होता है।
तंत्रज्ञान, वृद्धावस्था और कृत्रिम भोग
और वृद्धावस्था चिंता बढ़ाती है। सबसे बड़ी बात क्या है, शास्त्रों में कहते हैं—’वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः’ (वृद्धावस्था चिंतामग्न होती है)। जब बूढ़े लोग होते हैं, तो वो खेलकूद को देखने में रुचि रखते हैं। वास्तव में, भगवान की प्रगति, भगवान की प्राप्ति करने में एक आत्मा का उद्देश्य होना चाहिए। पर शरीर से वृद्धावस्था में व्यक्ति उतना कर नहीं सकता है।
यहाँ आधुनिक तंत्रज्ञान (Technology) का कमाल देखिए। तंत्रज्ञान से क्या होता है? लोगों के बूढ़े (वृद्धावस्था) शरीर में भी भोग करने की शक्ति आ जाए, इसलिए तंत्रज्ञान अलग-अलग प्रकार की दवाइयाँ निर्माण करता है। प्रभुपाद जी शास्त्रों के संदर्भ में कहते हैं, यह क्या होता है? जो वैज्ञानिक हैं, वे एक बंदर के अंग निकालते हैं और मानव में डालते हैं ताकि मानव भोग कर सके। प्रभुपाद कहते हैं कि एक बंदर अपना भोग छोड़ता है ताकि दूसरा बंदर भोग कर सके। यह सब क्या है?
तो अमेरिका में एक बार ऐसा हुआ, जब व्यक्ति वृद्ध हो जाता है तो शरीर में भोग करने की शक्ति नहीं रहती है। तो वैज्ञानिकों ने कुछ दवाई निकाली जिससे कि वो शरीर पूरा नौजवान हो जाए। बहुत से लोगों को वो ड्रग (Drug) दे दिया गया। आज हमें पता है कि इन ड्रग्स के बहुत से साइड इफेक्ट (Side effects) होते हैं।
उसका एक सबसे खतरनाक दुष्परिणाम यह था कि जिन लोगों को पहले से हृदय (Heart) का प्रॉब्लम था, उनको हृदय का दौरा (Heart Attack) आ जाएगा। तो लोग उत्साह में ड्रग लेते थे कि भोग करना है, और भोग करने की उत्तेजना में हार्ट रेट बढ़ जाता था और उनकी मृत्यु हो जाती। ऐसे सैकड़ों-सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गई। सरकार ने कहा—क्या करें इसके लिए? तो हम दवाई को बैन (Ban) करते हैं। जब सरकार ने दवाई बैन की, तो सामने लोग खड़े हो गए और कहने लगे, “जिन लोगों को हृदय की बीमारी है उनको मना करो, हमको मना क्यों कर रहे हैं, हमको भोग करने दो!”
तो फिर वास्तव में देखा जाए तो सबको हृदय की बीमारी है (व्यंग्य)। सरकार ने नियम निकाला कि ये दवाई हम तभी देंगे जब व्यक्ति सर्टिफिकेट (Certificate) देगा कि मुझे हृदय की कोई समस्या नहीं है। लोग इतने उत्तेजित थे कि उनका अपना नॉर्मल डॉक्टर, जिसे उनके हृदय की बीमारी पता है, वो तो सर्टिफिकेट देगा नहीं। तो क्या करते? एक नए डॉक्टर के पास जाते थे और उसे झूठ बोलते थे कि “मुझे हृदय की बीमारी नहीं है”, ताकि वो सर्टिफिकेट दे दे। वो सर्टिफिकेट लेते थे, दवाई लेते थे और दवाई लेके उत्तेजित होते ही हार्ट अटैक से मर जाते थे। यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। वृद्धावस्था में विषय भोग की लालसा अत्यंत दयनीय है।
शरीर: अविद्या का जाल और मूवी थियेटर का उदाहरण
इस तरह से नरोत्तम दास ठाकुर ने कहा है—‘शरीर अविद्या जाल, जड़ेंद्रिय ताहे काल’। यह शरीर अविद्या का जाल है। शरीर मृत्यु और अविद्या निर्माण करता है और अविद्या में ही फँसाता है। तो इस प्रकार के अविद्या जाल से हम कैसे निकल सकते हैं? निकलना बड़ा मुश्किल है। इसमें जो इंद्रियां हैं, ये सारी इंद्रियां काल (विनाश) के समान हैं। ये विनाश के उद्देश्य से, मृत्यु के उद्देश्य से हमें फँसाती हैं। वास्तव में हमारी जो इंद्रियां हैं, वे हमें भौतिक चीजों का रस लेना सिखाती हैं।
जितना हम भौतिक चीजों का रस लेना सीखेंगे, उतना हम भौतिक चेतना में फँसेंगे। और जितना हम भौतिक चेतना में रहेंगे, उतना भौतिक दुःखों से हम पीड़ित होंगे।
अगर इसको समझना है तो मैं पहले एक मूवी थियेटर (Movie Theater) का उदाहरण दे रहा था। मूवी थियेटर में कोई शो चल रहा है। तो जो व्यक्ति थियेटर के अंदर शो देख रहा है, जहाँ कोई हीरो है, कोई हीरोइन है, जो पर्दे पर आ रहे हैं। तो उसमें क्या होगा? वह व्यक्ति पूरे भाव से उसमें आसक्त हो जाएगा, फिल्म वालों को दुःख होगा तो इसे भी दुःख हो जाएगा, ये रोने लगेगा। पर वहीं थियेटर के बाहर जो टिकट चेक करने वाला है, उसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ रहा होगा। क्यों? क्योंकि उसकी कोई आसक्ति नहीं है वहाँ पर।
जिसमें आसक्ति है, उतना ही दुःख है। तो हमारी इंद्रियां हैं, जो हमें भौतिक विषयों से आसक्त करती हैं, और उसी के कारण हमें दुःख और विनाश आता है। भौतिक दुःख तो सबको आता है, पर अनासक्त व्यक्ति को इस दुःख का असर नहीं होता।
जिह्वा का नियंत्रण: असली भूख और नकली भूख
पर कलियुग में ऐसा हो गया है कि लोग विषय सागर में डूब रहे हैं। नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं—‘जीवे फेले विषय सागरे’ (जीव को विषय सागर में डाल देते हैं)। आगे बताते हैं—‘ता’र मध्ये जिह्वा अति, लोभमय सुदुर्मति, ता’के जेता कठिन संसारे’।
हमारी जीभ (जिह्वा) अति लोभी है, और इस संसार में जीभ को जीतना बहुत कठिन बताया गया है। जीभ को जीतना इतना कठिन क्यों है? क्योंकि हमारी इंद्रियां अलग-अलग प्रकार के विषयों की मांग करती हैं, पर पूरे शरीर को शक्ति अन्न से मिलती है। शरीर का पालन अन्न से होता है, पर जब हम अन्न पेट के लिए नहीं खाते, शरीर के लिए नहीं खाते, बल्कि केवल जिह्वा (जीभ के स्वाद) के लिए खाते हैं, तब समस्या आती है।
डॉक्टर कहते हैं कि दो प्रकार की भूख होती है: एक असली भूख और एक नकली भूख। असली भूख का मतलब क्या है? वो कहते हैं कि जब आपको भूख लगती है और आप खाते हैं, तो उससे आपका शरीर और इंद्रियां पुष्ट होती हैं। असली भूख होती है तो पेट में हमें महसूस होता है।
पर अगर कोई कहता है कि “मुझे आइसक्रीम के लिए भूख लगी है” या “मुझे पाव भाजी के लिए भूख लगी है”, तो वो नकली भूख होती है। वो भूख शरीर की आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि किसी वस्तु के स्वाद के लिए होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको प्रसाद नहीं खाना चाहिए, पर हमें इन दो प्रकार की भूख में फर्क पता होना चाहिए। अधिकांश लोग जो खाते हैं, वो नकली भूख को मिटाने के लिए खाते हैं। नकली भूख शारीरिक नहीं होती, वह मानसिक होती है। मानसिक मतलब वह मन की तृष्णा है, जिसको शांत करने के लिए हम खा रहे हैं, और वो तृष्णा कभी शांत नहीं होती।
भगवान का प्रसाद और कृतज्ञता
‘कृष्णा बड़ो दयामय, कोरिबारे जिह्वा जय, स्वप्रसाद-अन्न दिलो भाई’। भगवान क्या कृपा कर रहे हैं! हमारी जिह्वा को नियंत्रित करने के लिए भगवान अपना प्रसाद देते हैं। शास्त्रों में धर्म बताया गया है कि हमें भगवान जब अन्न देते हैं तो उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। भगवान ही अन्न देकर हमें जीवन देते हैं। अगर अन्न नहीं मिलेगा तो हमारी मृत्यु हो जाएगी। इसलिए दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिनको भूख से तड़पना पड़ता है।
जिन लोगों को अन्न मिलता है, उन्हें भगवान के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। यह नीति की बात है, मानव धर्म की बात है। पर जो वैदिक शास्त्र हैं, हमारे आचार्य जो सिद्धांत बताते हैं, वो बड़े ऊंचे स्तर के सिद्धांत हैं। शरीर का पालन करने के लिए केवल भगवान से भौतिक याचना या प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है, असली प्रार्थना शुद्ध होनी चाहिए।
जब हम अलग-अलग पाठशालाओं में जाते हैं, तो देखते हैं कि गरीब लड़के भी वहाँ भोजन के लिए जाते हैं। तो पहले मुझे विद्यार्थियों से डर था कि विद्यार्थियों को क्या खिलाएंगे? पर जब से यह प्रसाद का प्रभाव पता चला है, तो विद्यार्थियों को भी प्रसाद का समभाव पता चल गया है।
नियम पालन बनाम भगवान की कृपा
प्रसाद अद्भुत काम कर रहा है! चैतन्य चरितामृत में दर्शाया जा रहा है कि जब चैतन्य महाप्रभु यह देखते हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। महाप्रभु कहते हैं कि “आज मेरे अवतार का उद्देश्य पूरा हो गया है, आज मैंने तीनों लोकों को जीत लिया है। आज सारे लोग प्रसाद की शक्ति में श्रद्धा रख रहे हैं।”
प्रसाद की शक्ति में श्रद्धा का मतलब क्या है? जो मायावादी लोग होते हैं, वो भगवान को मानते नहीं हैं, इसलिए वे अपनी प्रगति स्वयं के बल पर करते हैं। तो प्रगति कैसे करते हैं? वे दृढ़ता से नियम पालन करते हैं। उनका मानना है कि अगर नियम पालन नहीं करेंगे तो प्रगति नहीं होगी। इसलिए उनकी श्रद्धा केवल नियम पालन में होती है। और अगर उनको प्रसाद भी मिल जाये तो कहते हैं, “पहले नियम पालन करेंगे, पहले संन्यास के नियम करेंगे, फिर प्रसाद पाएंगे।”
तो यहाँ पे महाप्रभु इस लीला से क्या दर्शाते हैं? कि नियम पालन से अधिक भगवान की कृपा और प्रसाद में श्रद्धा होनी चाहिए। नियम पालन ज़रूर करना है, पर नियम पालन के साथ-साथ हमारी भगवान की कृपा में अगाध श्रद्धा होनी चाहिए।
हरि कथा का प्रसाद और दिव्य आनंद
भगवान की कृपा केवल भोजन के प्रसाद से नहीं आती है, बल्कि भगवान के नाम और लीलाओं से भी आती है। भगवान का स्मरण हृदय को परिवर्तित करता है। हरि नाम है, हरि कथा है—यही साक्षात् भगवान का प्रसाद है।
खाने का प्रसाद और हरि कथा के प्रसाद में फर्क क्या है? जो खाने का प्रसाद है, हम चाहें तो भी हमेशा नहीं खा सकते हैं। शरीर की जो सीमा है, वह हमें रोक लेगी। पर जो हरि कथा का प्रसाद है, हरि श्रवण का प्रसाद है, उसे हम सदैव ग्रहण कर सकते हैं। चाहे हम बुढ़ापे में हों या बीमारी में हों, तभी भी हम कथा श्रवण कर सकते हैं और तभी भी हम सुखी रह सकते हैं।
भगवद्गीता (10.9) में भगवान कहते हैं:
‘मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥’
शुद्ध भक्तों के प्राण मुझमें ही बसे हैं। जब भक्त हरि कथा का श्रवण करते हैं, तो क्या होता है? वे कैसे आश्रय प्राप्त करते हैं? इस दुनिया में अलग-अलग त्रिताप (ताप) लोगों को सता रहे हैं, पर जिनकी चेतना भगवान में है, वे हरि कथा श्रवण करके आनंदित होते हैं।
यह कैसे होता है? देखिए, आजकल बाहर धूप बहुत है, गर्मी बहुत है। तो अगर हम धूप से किसी ऐसे रूम में आ जाते हैं जहाँ एयर कंडीशन (Air Condition) है, तो क्या होता है? बाहर धूप तो है, पर जब हम एसी रूम में आ जाते हैं, तो धूप और गर्मी से हम बच जाते हैं।
ठीक उसी तरह से, इस भौतिक जगत में त्रिताप (दुःख) हैं, पर जब हम भगवान की कथा का श्रवण करते हैं और अपनी चेतना को ‘कृष्ण कंडीशन’ (Krishna Conscious) में रखते हैं, तो भगवान के श्रवण से एक दिव्य आनंद आता है, जिससे हम सारे भौतिक तापों से बच जाते हैं।
इस तरह से, हमारे भीतर जितनी श्रद्धा है, उस श्रद्धा के साथ हमें भक्ति कार्य में लग जाना चाहिए। इस अविद्या जाल से निकलकर हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। जब हम भगवान की प्राप्ति की ओर बढ़ते हैं, तो उस दिव्य स्थिति को प्राप्त करके दूसरों को भी भगवान की प्राप्ति के मार्ग में लगा सकते हैं। और हर पल, इस जगत में रहते हुए भी हम भगवान का सच्चा आनंद प्राप्त कर सकते हैं।