Narasimha Lila – Festival Class (Hindi)
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प्रवचन का संपूर्ण सारांश (Summary)
यह प्रवचन नृसिंह चतुर्दशी के पावन अवसर पर श्रीमद्भागवतम् के सातवें स्कंध और नृसिंह पुराण में वर्णित नृसिंह अवतार एवं प्रह्लाद महाराज की कथा पर आधारित है। व्याख्यान के मुख्य विचार और जीवन दर्शन निम्नलिखित बिंदुओं में विभाजित हैं:
1. भगवान के अनंत अवतार और उनका हेतु
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असीम प्रेम: श्रीमद्भागवतम् के अनुसार भगवान के अवतार समुद्र की लहरों की भाँति अनंत हैं। वे अपनी आत्माओं के प्रति असीम प्रेम के कारण समय-समय पर अवतार लेकर भक्ति का दिव्य संदेश प्रदान करते हैं।
2. असुरी प्रवृत्ति और ‘खलनायक’ ढूँढने की मानसिकता
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असुर का अर्थ: ‘आशु’ (जल्दी) + ‘र’ (रमण/भोग) — जो बिना शुद्धिकरण के तुरंत क्षणिक आनंद चाहते हैं।
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दोषारोपण की भावना: हिरण्यकशिपु अपने भाई हिरण्याक्ष के वध का बदला लेने के लिए भगवान विष्णु को अपने दुख का कारण मानता है।
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खलनायक बनाम नायक: जब हम जीवन में समस्याओं का कारण बाहर किसी व्यक्ति में ढूँढते हैं (Searching for a villain in the plot), तब हम कभी असली नायक (भगवान कृष्ण) को नहीं पा सकते।
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दैवी बनाम असुरी सोच: असुरी व्यक्ति मानता है कि समस्या बाहर किसी व्यक्ति में है और उसे हटाकर सुख मिलेगा; जबकि दैवी व्यक्ति मानता है कि कमी अपने अंदर है और आत्म-सुधार से जीवन कल्याणकारी बनता है।
3. तपस्या का वास्तविक उद्देश्य और अमरत्व का भ्रम
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उद्देश्य का महत्त्व: कार्य केवल नाम से धार्मिक नहीं होता, उसके पीछे का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण है। हिरण्यकशिपु की तपस्या अधार्मिकता की पराकाष्ठा थी क्योंकि उसका उद्देश्य धर्म के स्रोत (भगवान) का विनाश करना था।
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आत्मा बनाम शरीर का अमरत्व: हिरण्यकशिपु जानता था कि वह आत्मा है, फिर भी वह तपस्या करके ‘शरीर’ के स्तर पर अमर होना चाहता था। शरीर के स्तर पर अमरत्व असंभव है; वास्तविक अमरत्व केवल आत्मा के स्तर पर भगवान की भक्ति से प्राप्त होता है।
4. नारद मुनि का संग और गर्भ में प्रह्लाद की शिक्षा (Pre-natal Education)
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श्रवण का महत्त्व: जब हिरण्यकशिपु तपस्या कर रहा था, तब नारद मुनि ने उसकी पत्नी कयाधु को अपने आश्रम में आश्रय दिया। गर्भ में स्थित प्रह्लाद महाराज ने नारद मुनि से कृष्ण-कथा का निरंतर श्रवण किया।
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हृदय का समर्पण: कयाधु ने केवल शारीरिक रूप से सुना और बाद में सब भूल गई, परंतु प्रह्लाद ने अपने हृदय से श्रवण किया। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि गर्भस्थ शिशु पर ध्वनियों और संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ता है (Pre-natal Education)।
5. ब्रह्मा जी का वरदान और हिरण्यकशिपु की कुटिलता
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चतुराई का भ्रम: हिरण्यकशिपु ने घुमा-फिराकर ऐसा वरदान माँगा कि उसकी मृत्यु न दिन में हो न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न अस्त्र से न शस्त्र से, और न किसी मनुष्य, पशु या देवता द्वारा हो।
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परम सत्ता की सर्वोपरिता: हिरण्यकशिपु ने सोचा कि उसने अमरत्व पा लिया है, परंतु वह भूल गया कि बुद्धि देने वाले भगवान उससे भी परे हैं।
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भक्त और भगवान का संबंध: यह लीला दर्शाती है कि स्वार्थी/कामुक भक्त (हिरण्यकशिपु) देवताओं से केवल अपनी वासना पूरी करने के लिए जुड़ता है, जबकि शुद्ध भक्त (प्रह्लाद) भगवान से निष्काम प्रेम करता है।
6. इंद्रिय निग्रह और वास्तविक सुख
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इंद्रियों की दासता: सब कुछ वश में होने और देवताओं को नौकर बना लेने के बाद भी हिरण्यकशिपु सुखी नहीं था, क्योंकि उसकी इंद्रियाँ और मन उसके वश में नहीं थे।
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सच्ची संतुष्टि: सब कुछ अपने मनमुताबिक चलाने से सुख नहीं मिलता, बल्कि भगवान से निष्काम प्रेम और उनकी सेवा से सच्ची शांति मिलती है।
7. प्रह्लाद महाराज की निष्काम भक्ति एवं संदेश
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व्यापारिक भक्ति का त्याग: प्रह्लाद महाराज भगवान नृसिंह से कुछ भी सांसारिक वस्तु नहीं माँगते। जब भगवान नृसिंह वरदान देने का आग्रह करते हैं, तो वे केवल यह माँगते हैं कि उनके हृदय में कभी कुछ माँगने की इच्छा ही न रहे।
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शत्रु के प्रति भी कल्याण भावना: प्रह्लाद अपने क्रूर पिता हिरण्यकशिपु के लिए भी क्षमा और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
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संरक्षण की गारंटी: भगवान का सबसे बड़ा संरक्षण शरीर का नहीं, बल्कि हमारी आत्मा और हमारी भक्ति का संरक्षण है।
यहाँ नृसिंह चतुर्दशी के पावन अवसर पर दिए गए श्रीमद्भागवतम् एवं नृसिंह लीला के इस प्रवचन का पूर्ण, यथावत (Verbatim) और सुव्यवस्थित Markdown संस्करण है, जिसे आप सीधे अपनी WordPress वेबसाइट पर उपयोग कर सकते हैं।
श्रीमद्भागवतम् एवं नृसिंह लीला कथा
अरे कृष्ण! आज नृसिंह चतुर्दशी के मंगल दिन में आप सबका इस विश्व में स्वागत है। आज हम सातवें स्कंध में श्रीमद्भागवतम् की नृसिंह लीला का वर्णन सुनेंगे। नृसिंह पुराण में इसका और थोड़ा विस्तार है।
श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कंध में बताया गया है कि भगवान के अनंत अवतार हैं। और कितने अवतार हैं? जितने सागर में लहरें हैं। भगवान के अनंत अवतार क्यों हैं? क्योंकि भगवान का हमारी आत्माओं के लिए प्रेम अनंत है। क्योंकि भगवान का प्रेम असीमित है, इसलिए वे अनेक अवतारों के रूप में आकर जो दिव्य संदेश है भक्ति का, वह प्रदान करते हैं।
हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का आतंक
सातवें स्कंध के पहले अध्याय से यह वृत्तांत शुरू होता है। प्राचीन काल में दो बड़े शक्तिशाली असुर थे—हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। ये दोनों भाई सारे विश्व भर में आतंक मचाने लगे थे।
और यह भौतिक जगत का स्वभाव है कि जो भी व्यक्ति इस दुनिया में शांति से, समृद्धि से रहने का प्रयास करता है, यह भौतिक सृष्टि उस व्यक्ति को उस तरह से रहने नहीं देती है, और अशांति उत्पन्न करने वाले लोग होते हैं। तो आधुनिक जगत में जो आतंकवादी होते हैं, ऐसे ही हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु थे, पर वे बड़े शक्तिशाली थे।
तो वराहदेव जो थे, उन्होंने आकर हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके कारण जो हिरण्यकशिपु था, वह बड़ा क्रोधित हो गया और सोचने लगा कि मुझे मेरे भाई के वध का बदला लेना है। इसलिए उसने घोर तपस्या शुरू कर दी।
असुरी प्रवृत्ति और ‘खलनायक’ की खोज
जो असुर होते हैं… ‘असुर’ इस शब्द के अलग-अलग प्रकार से अर्थ बताए गए हैं। एक अर्थ है: ‘आशु’ और ‘र’। ‘आशु’ मतलब जल्दी, और ‘र’ मतलब रमण—जो जल्दी भोग चाहते हैं।
अभी आध्यात्मिक जगत में जो आनंद है, वह शुद्धीकरण के बाद प्राप्त होता है। पर जो असुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, वे तुरंत आनंद चाहते हैं। तो हिरण्यकशिपु यहाँ क्रोध से इतना आग-बबूला हो गया, तो वह सोचने लगा कि अगर मुझे विष्णु से बदला लेना है, तो फिर मुझे शक्ति प्राप्त करनी पड़ेगी।
साधारणतया जो विकृत प्रवृत्ति का व्यक्ति होता है, वह हमेशा सोचता है कि जो मेरा शत्रु है, वास्तव में उसके विनाश से मेरा कल्याण हो जाएगा। तो वह सोच रहा था कि जो विष्णु हैं, वही मेरे दुख का कारण हैं। अगर विष्णु का वध हो जाएगा, तो फिर मैं आनंदी हो जाऊँगा।
तो क्या होता है, इसको इंग्लिश में कहते हैं—Searching for a villain in the plot। इसका मतलब क्या है कि अगर हमारे जीवन में कुछ गलत हो रहा है, तो हम क्या सोचते हैं कि कौन सा खलनायक है जिसके कारण मेरे जीवन में सब परेशानी आ रही है? तो उस खलनायक की खोज में हम लगते हैं। “क्या यह व्यक्ति मेरे दुख का कारण है? क्या यह व्यक्ति मेरी समस्या का कारण है?” कभी-कभी हम अपने परिवार वालों को दोष देते हैं, तो कभी दूसरों को दोष देते हैं।
यह जो भाव है कि सब के जीवन में समस्याएँ आती हैं, तो हम अपने जीवन की कहानी के लिए खलनायक ढूँढने का प्रयास करते हैं कि किसके कारण मेरे जीवन की कहानी सब खराब हो रही है। पर जो व्यक्ति खलनायक को ढूँढ रहा है, वह कभी नायक को प्राप्त नहीं कर सकता है!
जो असली नायक हैं, वे भगवान श्री कृष्ण हैं। और भगवान श्री कृष्ण की सेवा में हम भी जैसे हनुमान जी भगवान रामचंद्र के लिए कार्य किए, वैसे महान कार्य कर सकते हैं। पर जब हम खलनायक ढूँढ रहे हैं, तो हम नायक को प्राप्त नहीं कर सकते। जो हम ढूँढते हैं, वही हमको मिलेगा।
इसलिए यह जो भाव है हिरण्यकशिपु का कि “कोई दोषी है, वह विष्णु दोषी है, वही मेरी समस्याओं का कारण है, उसको अगर मैं मार डालूँगा तो मेरा जीवन सुखी हो जाएगा”—तो यह जो भाव है कि बाहर कोई समस्या है उसका हल हो जाएगा, बाहर का व्यक्ति समस्या का कारण है, यह भाव हमेशा हमें असली नायक से दूर रखता है।
हिरण्यकशिपु सोचने लगा कि विष्णु का अगर वध करना है, तो उसके लिए घोर तपस्या करनी पड़ेगी। अगर इसके विपरीत वही तपस्या वह अपने ही हृदय में जो असली नायक हैं भगवान कृष्ण, उनको खोजने के लिए करता, तो उसका परम कल्याण हो जाता।
पर यही भेद है एक असुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति में और दैवी प्रवृत्ति के व्यक्ति में:
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असुरी प्रवृत्ति का व्यक्ति सोचता है कि समस्या बाहर है, बाहर के किसी व्यक्ति में है, उसको अगर मैं निकाल दूँगा तो शायद सब ठीक हो जाएगा।
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दैवी प्रवृत्ति का व्यक्ति सोचता है कि वास्तव में कुछ कमी मुझमें है, और उस कमी को अगर मैं ठीक कर दूँगा, तो वास्तव में मेरा जीवन और अच्छा हो सकता है।
यहाँ एक बहुत ही साधारण और बहुत ही खतरनाक मानसिकता है कि हमेशा हम बाहर समस्या ढूँढते हैं, समस्या की जड़ बाहर ढूँढते हैं, और फिर बाहर बहुत प्रयास करते हैं—”इसको ठीक करो, उसको ठीक करो, उसको ठीक करो।”
हिरण्यकशिपु की क्या मजाल कि वह भगवान को दोष दे रहा है कि भगवान ही मेरी समस्या का कारण हैं! साधारण कोई व्यक्ति होगा, अगर भगवान समस्या का कारण हैं, तो सोचता है भगवान का अस्तित्व है ही नहीं, तो वह नास्तिक बन जाता है। पर हिरण्यकशिपु का क्या विचार है कि “भगवान मेरी समस्या का कारण हैं, तो मैं नास्तिक नहीं बनूँगा, मैं भगवान का अस्तित्व ही मिटा दूँगा!”
तपस्या का उद्देश्य और वास्तविक अमरत्व
विचारधारा ही इतनी विकृत है! इस तरह की विकृत विचारधारा के साथ वह बहुत घोर तपस्या करने लगा। वास्तव में देखा जाए तो तपस्या एक बहुत अच्छा कार्य माना जाता है। जैसे आज नृसिंह चतुर्दशी है, तो बहुत से भक्तों ने तपस्या की, उपवास किया। तो तपस्या साधारणतया धार्मिक कार्य माना जाता है।
पर वास्तव में कार्य धार्मिक है या नहीं, यह कार्य से नहीं, कार्य के उद्देश्य से पता चलता है। तो कार्य का उद्देश्य क्या है? हिरण्यकशिपु जो था, बड़ी तपस्या कर रहा था, पर उसका उद्देश्य धार्मिक नहीं था। अधार्मिक भी नहीं, वह अधार्मिकता की पराकाष्ठा थी! जो धर्म के स्रोत और स्वामी हैं भगवान, उनका ही विनाश करना था। यह धर्म के कार्य को लेकर धर्म की जड़ को विनाश करने का उद्देश्य था। इसलिए कार्य से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कार्य के पीछे का उद्देश्य देखना होता है।
फिर हिरण्यकशिपु बड़ी कठोर तपस्या करने लगा। आजकल के युग में हम शायद समझ नहीं पाएँगे कि कोई तपस्या करके शक्ति कैसे प्राप्त कर सकता है। आजकल लोग सोचते हैं शक्ति प्राप्त करनी है तो मुझे पैसा कमाना पड़ेगा, मुझे कोई राजनीतिक संबंध जोड़ने पड़ेंगे, या मुझे गुंडों को लाना चाहिए, उससे शक्ति मिल जाएगी।
प्राचीन युग में लोग समझते थे कि इस ब्रह्मांड में जो हम देखते हैं, उससे और बहुत कुछ भी है। और अगर इस ब्रह्मांड में जो सूक्ष्म शक्तियाँ हैं, उन तक हमें पहुँचना है, तो हमें तपस्या का मार्ग चुनना चाहिए।
तपस्या की शक्ति को समझना है तो एक सरल उदाहरण है: हम साधारणतया कुछ पढ़ रहे होते हैं, अगर एकाग्रचित्त नहीं हैं तो मन इधर-उधर घूमता है, ज़्यादा कुछ समझ में नहीं आता। जब मन एकाग्र हो जाता है तो हमारी समझने की शक्ति बढ़ जाती है। एकाग्र होना और न होना इसमें शारीरिक दृष्टि से कोई फ़र्क नहीं है, पर मानसिक दृष्टि से बहुत फ़र्क है। इसका मतलब क्या है कि शारीरिक से ऊँचा मानसिक है। तपस्या शारीरिक होती है, पर शारीरिक तपस्या के द्वारा जो सूक्ष्म शक्ति है ब्रह्मांड की, उसको प्राप्त किया जा सकता है।
अलग-अलग देवताओं की तपस्या की जाती है, तो हिरण्यकशिपु ने बड़ी घोर तपस्या की ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए।
और साधारणतया जो भी असुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, उनको एक चीज़ का बहुत बड़ा डर होता है—और वह डर है मृत्यु का! मृत्यु का डर क्यों होता है? क्योंकि इस दुनिया में अगर भोग करना है और इस दुनिया में हमारा जीवन है, तो अगर मृत्यु हो जाएगी तो भोग चला जाएगा, सब कुछ चला जाएगा। इसलिए “कुछ भी हो जाए, मृत्यु नहीं आनी चाहिए।”
मृत्यु टालने के लिए अलग-अलग प्रकार से लोग प्रयास करते हैं। आधुनिक प्रक्रिया में वैज्ञानिकों की सहायता से लोग क्या कर रहे हैं, जब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो अपने शरीर को रेफ्रिजरेटर में रख देते हैं। साधारण घर का फ्रिज नहीं होता, विशेष फ्रिज होता है, उसमें रख देते हैं। कई करोड़पति लोग हैं, अभी तक लगभग 23-24 लोग हैं, जिन्होंने अपने शरीर को फ्रिज में रख दिया है। पर क्या वास्तव में शरीर को फ्रिज में रखने से आत्मा को वहाँ पर रखा जा सकता है? जीवन का जो स्रोत है वह आत्मा है, शरीर नहीं है।
पर वही भाव है अमरत्व प्राप्त करने का। वह जो भाव है, अच्छा है एक तरह से, क्योंकि हम आत्मा के स्तर पर अमर हैं। पर उसको शारीरिक स्तर पर जब हम पूर्ण करने का प्रयास करते हैं, तो वह असंभव है।
जैसे हिरण्यकशिपु प्रयास कर रहा था। हिरण्यकशिपु वही बाद में रावण बनता है। और जो रावण होता है, वह सारे ब्रह्मांड में जाके जीत प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है।
एक बार देखता है कि वहाँ पर कोई ऋषि आ रहे हैं। सोचता है कि ऋषि को भी मार डालें। वे नारद मुनि होते हैं। तो क्या करता है, तीर मारने लगता है। सारे जो तीर हैं, नारद मुनि के शरीर पर आते हैं और कुछ भी नहीं होता है।
अभी क्या होता है, हर एक व्यक्ति अपने स्तर पर इम्प्रेस होता है। तो किसी ऋषि से रावण इम्प्रेस नहीं हुआ, पर देखा कि “अरे! मेरे तीर से इनको कुछ नहीं हो रहा है!” तो देखा नारद मुनि हैं, “आओ-आओ ज़रा बैठो, मैं आपसे बात करना चाहता हूँ।” तो नारद मुनि को बुला के बिठा लिया।
कहने लगा, “मुझे ज़रा बताओ कि मैंने इतने सारे तीर मारे, आपको कुछ कैसे नहीं हो रहा है?”
नारद जी बोले, “मेरा शरीर अमर है।”
“अच्छा! आपका शरीर अमर है? मैं भी अमर शरीर चाहता हूँ। क्या आप बता सकते हो कैसे कर सकता हूँ मैं?”
“हाँ जरूर, बड़ा आसान है—राम नाम! ये लो।”
“सफ़ा हो जाओ यहाँ से! राम नाम मैं कभी नहीं लूँगा! इसके अलावा अगर कोई पद्धति है तो बताओ।”
नारद मुनि बोलते हैं कि इसके अलावा और कोई पद्धति नहीं है।
जो अमरत्व की इच्छा है, उसकी पूर्ति हो सकती है आत्मा के स्तर पर। पर जो मार्ग है उसको छोड़के हर प्रकार का दूसरा मार्ग ढूँढने का प्रयास करना, यह असुरी प्रवृत्ति का भाव है।
जैसे खाना खाने के लिए सीधे मुँह से न खाकर पीछे से खाने का प्रयास करना—आत्मा के स्तर पर कोई भी व्यक्ति भक्ति के माध्यम से अमरत्व प्राप्त कर सकता है, पर शरीर के स्तर पर प्राप्त करना यह असुरी प्रवृत्ति का भाव है।
हिरण्यकशिपु का ज्ञान और कयाधु-नारद संवाद
हिरण्यकशिपु क्या सोचता है? हिरण्यकशिपु के पास भी आत्मा का ज्ञान है। जब तपस्या शुरू करता है, तब वह क्या सोचता है? उसके सारे असुर साथी बोलते हैं कि “आप जो तपस्या करना चाहते हो, उस तपस्या को बहुत समय लग जाएगा। कैसे कर पाओगे तुम यह तपस्या?”
तो वह बोलता है, “तुम चिंता मत करो, मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ। और आत्मा अमर है। इसलिए भले ही तपस्या करते हुए मेरी मृत्यु हो जाए, पर आत्मा को अगला शरीर मिलेगा, अगले शरीर में मैं तपस्या करूँगा। और जितना ज़रूरत है, उतना समय तक मैं तपस्या करूँगा, और फिर मैं अमर हो जाऊँगा!”
देखिए, यह कितना विचित्र और विकृत दोनों है कि व्यक्ति जानता है “मैं आत्मा हूँ”, और जानता है कि आत्मा अमर है, अगला शरीर मिल जाएगा। पर वह आत्मा के स्तर पर अमरत्व न प्राप्त करके, अगले जन्म में तपस्या करके शरीर के स्तर पर अमर होना चाहता है!
जब हिरण्यकशिपु तपस्या करने जाता है, तो नारद मुनि कयाधु (हिरण्यकशिपु की पत्नी) को अपने आश्रम ले जाते हैं। जब कयाधु निवेदन करती है कि “मैं चाहती हूँ कि मेरा जो पुत्र है, उसका जन्म तभी हो जब मेरे पति हिरण्यकशिपु वापस आएँ।” नारद मुनि कहते हैं—”तथास्तु।”
और नारद मुनि उसके कल्याण के लिए… और वे जानते हैं कि प्रह्लाद जो उनके गर्भ में है, वह परम भक्त है। तो वे सोचते हैं कि इस भक्त का मैं संग चाहता हूँ। और वैष्णव की सोच को जानिए कि भक्त कैसे संग करते हैं—भक्त सोचते हैं कोई दूसरा भक्त है और वह कृष्ण कथा करता है, तो मैं सुनूँगा। और अगर कोई कृष्ण कथा नहीं कर रहा है, तो मैं कृष्ण कथा करूँगा। और अगर कोई नहीं है, तो मैं भगवान के गीत गुनगुनाऊँगा। हमेशा भगवान का स्मरण करना है।
तो नारद मुनि सोचते हैं कि यह प्रह्लाद भक्त है, पर वह गर्भ में है, इसलिए वह कुछ बोल नहीं सकता है। पर भक्त है, तो कृष्ण कथा करनी चाहिए। इसलिए वे कृष्ण कथा करते हैं और प्रह्लाद सुनते हैं। कयाधु भी सुनती है।
तो इस तरह से जितने हज़ारों साल तक वास्तव में हिरण्यकशिपु तपस्या कर रहा होता है, तब नारद मुनि और प्रह्लाद गुरु-शिष्य का घनिष्ठ संबंध बनाकर भक्ति के रस का आनंद आस्वादन करते हैं।
अभी कयाधु जो है, वह भी वहाँ पे है, पर वास्तव में वह भौतिक चेतना में है। भौतिक चेतना क्या है? “हिरण्यकशिपु कब आएगा, फिर मेरा पुत्र होगा, फिर क्या होगा?” वह भी कथा सुनती है, पर जैसे ही हिरण्यकशिपु वापस आता है, वह सब कुछ भूल जाती है।
तो वास्तव में हम कितना श्रवण करते हैं, यह महत्त्वपूर्ण है; और उससे अधिक महत्त्वपूर्ण है कि श्रवण करते समय हम अपना हृदय वहाँ डाल रहे हैं या हृदय कहीं और रख रहे हैं। अगर हम श्रवण कर रहे हैं और सोच रहे हैं कि बाहर कोई मेरी चप्पल चोरी कर लेगा, या सोच रहे हैं कि घर में क्या हो रहा है, या IPL में आज किसका क्रिकेट मैच है—ऐसे विचार रहते हैं तो क्या होता है? हम भगवान को अपना शरीर देने आए हैं, पर भगवान हमारा हृदय चाहते हैं!
प्रह्लाद गर्भ में हैं, प्रह्लाद के पास शरीर भी नहीं है, पर जो आध्यात्मिक ध्वनि है, वह शारीरिक स्तर पर निर्भर नहीं रहती है। इसलिए भले ही गर्भ में हैं, नारद मुनि जो बोल रहे हैं वह आध्यात्मिक ध्वनि है और प्रह्लाद एक महान भक्त हैं, उनकी चेतना आध्यात्मिक है। तो उस आध्यात्मिक संग का प्रह्लाद महाराज गर्भ में ही बड़ा आनंद ले रहे हैं।
आजकल वैज्ञानिक समझने लगे हैं कि जो गर्भ होता है माँ के पेट में… जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, बुद्धि विकसित होती है, फिर बुढ़ापे में कम हो जाती है। पर जिस प्रकार की ध्वनि और वाइब्रेशन गर्भवती स्त्री को मिलते हैं, उसका प्रभाव बालक पर भी होता है। इसको अभी विज्ञान में एक विशेष नाम दिया गया है—Pre-natal Education (जन्म से पूर्व की शिक्षा)।
पर यहाँ महत्त्वपूर्ण बात क्या है कि यह कोई कल्पना नहीं है। प्रह्लाद पूरा श्रवण कर रहे थे और श्रवण करके न केवल सीख रहे थे, बल्कि आनंद भी ले रहे थे। इसीलिए बचपन से ही, जब जन्म होता है तब से ही वे अद्भुत भक्ति प्रदर्शित करते हैं। वे पहले से ही महान भक्त हैं, और नारद मुनि के संग से उनकी भक्ति और प्रज्वलित हो जाती है।
ब्रह्मा जी का वरदान और हिरण्यकशिपु की कुटिलता
यह सब जब हो रहा है, तो नारद मुनि के आश्रम में हो रहा है, और हिरण्यकशिपु घोर तपस्या कर रहा है। तो तभी ब्रह्मा जी जब सुनते हैं देवताओं से कि हिरण्यकशिपु का ऐसा उद्देश्य है, तुरंत वहाँ जाते हैं।
ब्रह्मा जी देखते हैं तो उनको कहीं हिरण्यकशिपु दिखता ही नहीं है! जो आँच आ रही है, गर्मी आ रही है, वह कहाँ से आ रही है? वास्तव में हिरण्यकशिपु ने इतनी तपस्या की है कि उसके शरीर को चींटियों और कीड़ों ने खा लिया है।
शास्त्रों में बताया जाता है कि हमारा जो प्राण होता है, जैसे-जैसे युग बदलते हैं, तो प्राण के रहने की जगह नीचे-नीचे आती है। जो सत्ययुग में होता है, प्राण हड्डियों में रहता है। अभी कलयुग में प्राण अन्न में रहता है। इसीलिए कलयुग में अगर अन्न व्यक्ति नहीं खाता है, तो तुरंत अशक्त हो जाता है।
सत्ययुग में प्राण हड्डियों में था, इसलिए हिरण्यकशिपु का शरीर अभी तक जीवित था। पूरा शरीर चला गया था, पर प्राण हड्डियों में था इसलिए वह जीवित था।
फिर ब्रह्मा जी जब देखते हैं कि इतनी तपस्या की है, तो अपने कमंडलु से जल छिड़कते हैं। जैसे ही वे कमंडलु से जल छिड़कते हैं, हिरण्यकशिपु तुरंत एक शक्तिशाली और आकर्षक शरीर में प्रकट हो जाता है।
प्रकट होते ही देखता है कि ब्रह्मा जी सामने ही हैं, तो प्रणाम करता है और प्रार्थना अर्पण करने लगता है। अभी हिरण्यकशिपु इतना चालाक है, चापलूसी में बड़ा निपुण है। चापलूसी मतलब क्या कि अगर खुद को कुछ चाहिए, तो दूसरे व्यक्ति को मक्खन लगाना और मक्खन लगाकर जो चाहिए माँग लेना!
तो वह जो ब्रह्मा जी का गुणगान कर रहा है, तो ऐसे गुणगान करता है कि “आप ही परम पुरुष भगवान हो, आप ही सर्वश्रेष्ठ हो, आप ही तीनों लोकों के स्वामी हो, आप ही सब कुछ के स्रोत हो।”
ब्रह्मा जी कहते हैं, “तुमने जो तपस्या की है, वह अद्वितीय है। माँगो, क्या वर चाहिए?”
हिरण्यकशिपु सोचता है कि अगर मैं सीधे अमरत्व माँगूँगा, तो शायद ब्रह्मा जी ना बोल दें। मुझे ऐसा कुछ माँगना चाहिए जिससे अमरत्व मिल जाए। सीधे नहीं, तो घुमाकर! तो वह अपनी पूरी बुद्धि चलाता है कि किन-किन परिस्थितियों में मृत्यु हो सकती है, उन सबको टाल दिया जाए:
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मृत्यु दिन में हो सकती है या रात में? तो “मुझे वर दो कि मेरी मृत्यु न दिन में हो, न रात में।”
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मृत्यु ज़मीन पर हो सकती है या ऊपर? “न ज़मीन पर हो, न ऊपर आकाश में।”
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मृत्यु अस्त्र-शस्त्र से हो सकती है? “किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु न हो।”
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मृत्यु कौन कर सकता है? “कोई मानव, कोई पशु, कोई देव या असुर मेरी मृत्यु न कर सके।”
वास्तव में सब जो जीव हैं, जिनकी ब्रह्मा जी सृष्टि कर रहे हैं, वह कहता है, “ब्रह्मा जी! आपने जिसको भी बनाया है, वह कोई भी मेरा वध न कर सके।”
इस तरह से जितना दिमाग चला सकता था, चलाता है। वह सोचता है कि अब मैं अमर बन गया! पर वह दिमाग चला रहा है, तो यह नहीं समझता कि दिमाग चलाने वाले से भी बड़ा कोई है! उसका दिमाग वह खुद नहीं चला रहा, भगवान ने उसको दिमाग दिया है।
तो जब वह विचार कर रहा है कि दिन में नहीं, रात में नहीं—तो वह यह नहीं सोचता कि दिन और रात के बीच में संध्या भी होती है! वह सोचता है कि घर के अंदर नहीं, घर के बाहर नहीं—तो दोनों के बीच चौखट भी होती है!
वास्तव में भौतिक स्तर पर कितनी भी योजनाएँ बना लें, वह योजना कभी पर्याप्त नहीं होने वाली।
पर ब्रह्मा जी कहते हैं, “ठीक है, तुमने जो वर माँगा है बड़ा मुश्किल है, पर तुमने बड़ी कठिन तपस्या की है, इसलिए मैं तुम्हें यह वर देता हूँ।”
शुद्ध भक्त एवं कामुक भक्त का अंतर
यहाँ पर जो ब्रह्मा जी की भूमिका है… पहले देवता उनको बोलते हैं कि “यह आपके जैसी तपस्या करके आपका ही पद प्राप्त करना चाहता है।” और बाद में वह ब्रह्मा जी को “आप ही भगवान हो” ऐसा गुणगान भी करता है।
वास्तव में आचार्यगण बताते हैं कि हर एक लीला का एक उद्देश्य होता है। ब्रह्मा जी इस लीला में हमें दर्शाना चाहते हैं कि शुद्ध भक्त और भगवान का संबंध, तथा कामुक भक्त और देवता के संबंध में क्या भेद है:
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हिरण्यकशिपु और ब्रह्मा जी का संबंध: स्वार्थी और कामुक। हिरण्यकशिपु अपनी कामना पूरी करने के लिए ब्रह्मा जी की झूठी स्तुति करता है।
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प्रह्लाद और विष्णु का संबंध: निष्काम और शुद्ध भक्ति।
ब्रह्मा जी भी भगवान के महान भक्त हैं। वे स्वयं को भगवान नहीं मानते। भागवत के द्वितीय स्कंध में जब नारद मुनि पूछते हैं, “ब्रह्मा जी, क्या आप भगवान हैं?” तो वे कहते हैं, “नहीं-नहीं, मैं भगवान नहीं हूँ, वास्तविक भगवान तो विष्णु हैं।”
पर इस लीला का उद्देश्य एक तुलना दिखाना है कि भगवान का शुद्ध भक्त और भगवान में क्या संबंध है, और एक स्वार्थी कामुक भक्त और देवता में कैसा संबंध है। इसलिए ब्रह्मा जी इस लीला में हिरण्यकशिपु के अनुचित विचारों को अनदेखा करके उसे वर दे देते हैं।
हिरण्यकशिपु का अत्याचार एवं मन का भ्रम
जैसे ही वर मिल जाता है, हिरण्यकशिपु, जिसने सैकड़ों सालों से अपने हृदय में क्रोध दबाकर रखा था, वह ज्वालामुखी के समान फट पड़ता है और सब जगह विध्वंस करने लगता है।
अब शक्ति मिल गई है, लगभग अमरत्व मिल गया है, तो वह सब देवताओं पर आक्रमण करता है, देवताओं को हरा देता है। उनको अपना नौकर बना लेता है! रावण भी देवताओं को नौकर नहीं बना पाया था, पर हिरण्यकशिपु ने देवताओं को अपना नौकर बना लिया—”इधर आओ, यह करो, वह करो!”
साधारणतया लोग सोचते हैं कि मुझे सुख प्राप्त करना है, तो कैसे होगा? “मेरे मन के अनुसार अगर सब कुछ होगा तो सुख प्राप्त होगा। मेरे परिवार वाले, मेरा शरीर, मेरी क्रिकेट टीम, मेरे नेता सब मेरे मन मुताबिक चलें, तो मैं सुखी हो जाऊँगा।”
पर सबसे पहली बात—हमारे मन के अनुसार दुनिया चलती नहीं है! हमारा मन ही हमारे वश में नहीं चलता, तो दुनिया कहाँ से चलेगी?
और उससे भी महत्त्वपूर्ण बात कि भले ही हमारे मन के अनुसार सब कुछ चलने लगे, फिर भी हम सुखी नहीं होंगे! क्योंकि मन स्वयं नहीं जानता कि सुख प्राप्त कैसे होता है। यह हिरण्यकशिपु के उदाहरण से दिखता है।
हिरण्यकशिपु के मन के अनुसार सब कुछ चल रहा था। इस भौतिक जगत में कितना भी शक्तिशाली व्यक्ति बन जाए, वह सूरज की रोशनी, बादल या बारिश को नियंत्रित नहीं कर सकता।
आज अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। पर वहाँ भी कई जगह तूफ़ान आते हैं, बाढ़ आती है, पानी की कमी होती है। कभी-कभी बादल आसमान में होते हैं पर बारिश नहीं होती। तो वे कृत्रिम रूप से क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) करते हैं ताकि बादल उनके क्षेत्र में बरसे। इसके लिए कोर्ट केस तक हो जाते हैं जिन्हें Cloud Property Rights कहा जाता है!
कहने का मतलब यह है कि दुनिया का कितना भी बड़ा देश हो, वह प्रकृति को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। पर हिरण्यकशिपु का इतना नियंत्रण था कि वह बादलों के देवता को भी नियंत्रित कर रहा था! उसके मन के अनुसार सब कुछ चल रहा था, फिर भी वह सुखी नहीं था।
श्रीमद्भागवतम् बताता है कि इसका क्या कारण है? क्योंकि उसकी इंद्रियाँ नियंत्रित नहीं थीं!
हम सोचते हैं कि इंद्रियों का नियंत्रण करने की क्या ज़रूरत है? पर असली संतुष्टि दुनिया को अपने मन के अनुसार चलाने से नहीं आती, असली संतुष्टि प्रेम के आदान-प्रदान से आती है!
प्रह्लाद महाराज की निष्काम भक्ति एवं भगवान नृसिंह का प्राकट्य
असली संतुष्टि कब आती है? जब प्रह्लाद महाराज जैसा भाव हो। प्रह्लाद महाराज कहते हैं, “हे प्रभु! मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। मैं कोई व्यापारी नहीं हूँ कि भक्ति के बदले आपसे कुछ माँगूँ। मैं आपकी भक्ति केवल आपकी सेवा के लिए कर रहा हूँ।”
भगवान नृसिंह कहते हैं, “प्रह्लाद! तुम कुछ तो माँगो, मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ।”
प्रह्लाद महाराज कहते हैं, “हे प्रभु! अगर आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो मैं एक ही चीज़ माँगूँगा कि मेरे हृदय में कुछ भी माँगने की इच्छा ही न रहे!”
फिर भगवान के आग्रह करने पर प्रह्लाद क्या माँगते हैं? वे कहते हैं, “मेरे पिता बड़े क्रूर थे, उन्होंने आपके प्रति अपराध किए हैं। कृपा करके आप उन्हें क्षमा कर दीजिए।”
यह भक्त का हृदय होता है! वे हिरण्यकशिपु के दबाव में अपनी भक्ति का त्याग नहीं करते, पर फिर भी हिरण्यकशिपु से नफ़रत नहीं करते, उसका कल्याण चाहते हैं।
प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि अगर हम भगवान को आत्मसमर्पण करते हैं, तो भगवान सबसे परम संरक्षण देते हैं। वह केवल शरीर का संरक्षण नहीं है, हमारी भक्ति का, हमारी आत्मा का संरक्षण है ताकि हम भगवद्धाम जा सकें।
और यही संदेश देने के लिए श्रील प्रभुपाद जी ने अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (ISKCON) की स्थापना की है। इसमें हम सबको हरे कृष्ण महामंत्र के जप द्वारा और भक्तों के संग द्वारा, नृसिंह लीला का जो मूल उद्देश्य है—भगवान की भक्ति में लगकर भगवान के परम आशीर्वाद को प्राप्त करना—उसका अवसर दिया है।
आइए, अब हम भगवान नृसिंहदेव को प्रणाम अर्पण करके इस प्रवचन का अंत करें। मेरे पीछे दोहराएँ:
नृसिंहो महा-सिंहो दिव्य-सिंहो महा-बलः।उग्र-सिंहो महा-देवः स्तम्भ-जाश्चोग्र-लोचनः॥
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श्री नृसिंहदेव की जय!
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श्री नृसिंह चतुर्दशी महा महोत्सव की जय!
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श्री प्रह्लाद महाराज की जय!
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श्रील प्रभुपाद की जय!
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निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!