No problem is too big for God – or too small – Hindi
[Class at Sharjah, United Arab Emirates]
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Lecture Summary
इस लेक्चर का सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में दिया गया है:
- समस्याओं का वास्तविक स्वरूप: भगवान के लिए कोई भी समस्या न तो बहुत बड़ी है और न ही बहुत छोटी। मनुष्य अपनी आसक्ति और ज़रूरत के अनुसार समस्याओं को बहुत बड़ा मान बैठता है।
- सकाम भक्ति बनाम भौतिक दृष्टिकोण: जो लोग केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान के पास जाते हैं (सकाम भक्त), वे समस्याओं को भगवान से भी बड़ा समझने लगते हैं और कई बार निराशा या अविश्वास के शिकार हो जाते हैं।
- तत्वज्ञान और वास्तविकता: भगवद्गीता के अनुसार यह संसार “दुःखालय” (दुखों का घर) है। इसे अस्पताल के उदाहरण से समझा जा सकता है जहाँ दर्द का होना स्वाभाविक है, लेकिन उद्देश्य उसका निवारण करना है। वास्तविक तत्वज्ञान से जीवन के दुखों को सहने और समझने की बुद्धि मिलती है।
- मन का भ्रम और ओवरथिंकिंग: समस्याओं पर अत्यधिक विचार करने से वे मानसिक रूप से और विकराल लगने लगती हैं, जिससे व्यक्ति मानसिक शांति खो देता है। भगवान का स्मरण मन की पकड़ को ढीला करता है और शांति प्रदान करता है।
- भौतिक और आध्यात्मिक समन्वय (Dependence & Diligence): भक्ति का अर्थ केवल निष्क्रिय रूप से भगवान पर निर्भर रहना नहीं है, बल्कि भगवान पर पूर्ण श्रद्धा (Dependence on Krishna) के साथ-साथ अपने स्तर पर उचित भौतिक प्रयास और पुरुषार्थ (Diligence for Krishna) करना भी उतना ही आवश्यक है।
Full Transcription
“मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥”
भगवान कहते हैं कि “आप अगर मेरी चेतना में लीन होगे, तो जो भी समस्याएँ आएँगी, आप उसके परे जा सकते हो। और अगर आप ऐसे नहीं करोगे तो आप गुमराह हो जाओगे।” तो मैं इस विषय पे चर्चा करूँगा कि “No problem is too big for God or too small for God” (भगवान के लिए कोई भी समस्या बहुत बड़ी भी नहीं है और कोई समस्या बहुत छोटी भी नहीं है)। बहुत बड़ी मतलब कि इतनी बड़ी समस्या है कि भगवान उसका हल नहीं कर सकते, और इतनी छोटी समस्या मतलब कि भगवान उसकी परवाह नहीं करते। तो आज इसके बारे में हम चर्चा करेंगे।
भगवान के पास जाने का हमारा भाव
आज साधारणतया इस भौतिक जगत में हम सदैव अपनी इच्छाओं की पूर्ति के पीछे लगे रहते हैं। और अगर कोई व्यक्ति भगवान के बारे में सोचता भी है, वो सिर्फ इसलिए सोचता है कि शायद भगवान मेरी इच्छा पूर्ति में कुछ मदद कर देंगे। एक बार एक व्यक्ति ने लॉटरी का टिकट लिया और वो लॉटरी थी एक करोड़ रुपये की। तो फिर वो मंदिर में गया और भगवान से कहा, “हे भगवान! अगर मुझे टिकट मिल गया तो मैं पचास प्रतिशत आपको दे दूँगा, पचास लाख आपको दे दूँगा मैं।”
तो फिर वो प्रार्थना कर रहा था और उतावला था कि टिकट का रिज़ल्ट (Result) क्या होगा। और जब टिकट का रिज़ल्ट निकला तो उसको प्राइज़ मिला था और वो बड़ा खुश हो गया। और तभी देखा उसने कि उसको सेकंड प्राइज़ मिला था, सेकंड प्राइज़ था पचास लाख का। तो फिर वो मंदिर में गया और बोला, “भगवान आप तो बड़े बुद्धिमान निकले, अपना हिस्सा पहले ही ले लिया।” तो जब हम भगवान को सिर्फ अपनी इच्छा पूर्ति का एक मार्ग देखते हैं, तो फिर क्या होता है? तो जैसे कोई व्यक्ति धंधा कर रहा है, बिज़नेस कर रहा है, तो फिर उसमें व्यक्ति चालाकी करके जितना ज्यादा पैसा कमा सके, जितना कम काम कर सके, वैसे देखने का प्रयास करते हैं।
हम में से अधिकांश लोग भगवान के पास जाते हैं और जब भगवान के पास जाते हैं, तो फिर भाव क्या होता है कि, “अभी मुझे ये समस्या है, मेरी ये इच्छा पूरी नहीं हो रही है या समस्या का हल नहीं हो रहा है, तो अभी मेरे पास ये शक्ति नहीं है इसको पूरा करने की।” तो इसलिए हम, हमसे शक्तिमान किसी और व्यक्ति के पास जाते हैं। जैसे कोई छोटा बच्चा होगा, उसको वज़न उठाना है, वो वज़न उठा नहीं पा रहा है, तो फिर अपने माता-पिता के पास जाकर पिताजी को बोलेगा कि “आप ये वज़न उठा दो मेरे लिए।” उसी तरह से, अभी शक्ति अलग-अलग दृष्टि से हो सकती है। हमारे जीवन में कुछ बीमारी आ गई है, हमारी नौकरी अस्थिर हो गई है, हमारे परिवार में संबंध अच्छे नहीं चल रहे हैं, कोई समस्या है। हम अपनी क्षमता से उसका हल करने का प्रयास करते हैं, पर जब हल नहीं होता है, तो फिर हम भगवान से प्रार्थना करते हैं।
क्या समस्याएँ भगवान से भी बड़ी हैं?
हमको लगता है कि ये समस्या इतनी बड़ी है कि इसका हल मैं खुद नहीं कर सकता, इसलिए मुझे भगवान के पास जाना चाहिए। जब ऐसे भाव से हम जाते हैं भगवान के पास, उस समय हमारा भाव होता है कि “मैं यहाँ पे हूँ, ये समस्या इतनी बड़ी है, पर भगवान इतने बड़े हैं और इसलिए मुझे भगवान के पास जाना है।” पर कभी-कभी क्या होता है कि वो समस्या हमारे मन में इतनी बैठ जाती है कि हमको लगता है शायद यह समस्या भगवान से भी बड़ी है। शायद यह समस्या इतनी बड़ी है कि भगवान भी यह समस्या हल कर पाएंगे या नहीं, पता नहीं मुझे।
तो सातवें स्कंध में, श्रीमद्भागवतम् के एक असुर का वर्णन आता है। किसी को पता है कौन? सातवें स्कंध में भागवतम् के एक असुर का वर्णन आता है— हिरण्यकशिपु। अभी हिरण्यकशिपु, उनके परम भक्त कौन थे? प्रह्लाद। और हिरण्यकशिपु का प्रतिद्वंद्वी कौन था? विष्णु, देव। पर उसने इंद्र का राज्य छीन लिया था। तो अभी जब भगवान नृसिंहदेव आते हैं और फिर हिरण्यकशिपु का उद्धार कर देते हैं। मुंबई में भक्तों का एक हॉस्पिटल है, भक्तिवेदांत हॉस्पिटल, वहाँ पे ऑपरेशन थियेटर में नृसिंहदेव का पिक्चर लगाया है और वो हिरण्यकशिपु का शरीर फाड़ रहे हैं।
तो फिर एक बार ऐसे व्यक्ति जो भक्त नहीं थे, वो आये थे वहाँ। वो बोले, “ऑपरेशन थियेटर में ये क्या पिक्चर है?” डॉक्टर बोले, “ये पिक्चर है, डॉक्टरों को होता है, ये ओरिजिनल ऑपरेशन है। और ऑपरेशन का क्या फल हुआ? Operation successful, patient liberated (ऑपरेशन सक्सेसफुल, पेशेंट लिबरेटेड)।” तो ऑपरेशन यशस्वी हो गया और ये पेशेंट मुक्त हो गया वह। तो ये भाव है कि भगवान जब किसी का वध भी करते हैं, तो उसके द्वारा भी उसका उद्धार करते हैं।
सकाम भक्ति और निष्काम भक्ति का अंतर
पर जब ये हिरण्यकशिपु का सीन निकल गया, तो उसके बाद में अलग-अलग देवता गण प्रार्थना कर रहे थे। तो तभी इंद्र ने एक प्रार्थना की। और ये प्रार्थना कभी-कभी संस्कृत में होती है, अगर हम पढ़ते हैं तो हमें लगता है प्रार्थना चल रही है, उनका भाव क्या है, वो समझ नहीं आता है। तो इंद्र क्या कहते हैं प्रार्थना में? “हे भगवान! हम सब सुर (देवता) हैं, हम सब धर्म का पालन करते हैं। पर ये हिरण्यकशिपु इतना खतरनाक था, वो इतना जुल्म करता था कि उसके भय के कारण हम धर्म का पालन नहीं कर पा रहे थे, उसके भय के कारण हम आपकी स्मृति नहीं कर पा रहे थे। तो अभी आपने उसको निकाल दिया है, तो अभी हम शांति से आपकी स्मृति करके आपकी भक्ति करेंगे।”
इसके विपरीत प्रह्लाद महाराज की प्रार्थना देखते हैं। तो प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि, “हे प्रभु! मेरी सदैव एक ही इच्छा है कि मैं आपकी भक्ति करता रहूँ।” प्रह्लाद महाराज कभी, उनकी इतनी लंबी प्रार्थना है, चालीस श्लोक हैं उनकी प्रार्थना में, कहीं भी वो नृसिंहदेव से कहते नहीं हैं, “हे भगवान! इस हिरण्यकशिपु ने मुझे इतना परेशान किया था, उसके कारण मैं आपकी भक्ति नहीं कर पा रहा था, अभी आपने हिरण्यकशिपु को निकाल दिया, तो मैं आपकी भक्ति करूँगा।” वो कहते हैं कि, “हे प्रभु! मैं आपकी भक्ति इसलिए कर रहा हूँ कि आप मेरे स्वामी हैं, मैं आपका सेवक हूँ।”
और अगर हम उनका जीवन भी देखते हैं, प्रह्लाद महाराज का, तो प्रह्लाद एक बालक हैं, फिर भी वो कभी हिरण्यकशिपु से इतने भयभीत नहीं हुए कि वो विष्णु की स्मृति छोड़ दें। उन्होंने हमेशा विष्णु की स्मृति की। तो अभी ये फ़र्क क्यों हुआ, कि इंद्र विष्णु की स्मृति नहीं कर पाए, जबकि उसके विपरीत प्रह्लाद विष्णु की स्मृति कर पा रहे थे? क्यों? क्योंकि वो (देवता) सकाम भक्त हैं।
अच्छी बात है, सकाम भक्ति का मतलब क्या है? कि अभी जो समस्या होती है, वो हमको जितनी बड़ी होती है, उतनी बड़ी नहीं दिखती है, हमारी आसक्ति और हमारी ज़रूरत के अनुसार, वो चीज़ हमको बहुत बड़ी लगती है या बहुत छोटी लगती है। मनोवैज्ञानिकों ने अमेरिका में एक एक्सपेरिमेंट किया कि उन्होंने लगभग पचास छोटे बच्चों को एक डॉलर का चित्र बनाने को कहा। और उन्होंने देखा कि जो लड़के अमीर घरों से थे, और जो बच्चे गरीब घरों से थे। तो जो गरीब घरों से थे, उन्होंने उस डॉलर को और बड़ा बना दिया। जो चित्र बनाया था, जितना साइज़ था, उससे और बड़ा चित्र बना दिया। और जो अमीर थे, उनको पैसे की इतनी परवाह नहीं थी, ज़रूरत नहीं थी, तो उनका छोटा बनाया था।
तो क्या है, जो चीज़ें होती हैं, उनका हमारे मन में चित्र बनता है। वह चित्र जो बनता है, वह वो चीज़ कितनी बड़ी है, उसके आधार पर नहीं बनता है, वो हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है या हम उससे कितने आसक्त हैं, उसके अनुसार उस चीज़ की छवि हमारे मन में पड़ती है। तो अभी जो व्यक्ति सकाम भक्त है, सकाम भक्त मतलब क्या है, कि उनके लिए ये जगत और जगत की चीज़ें, जगत का भोग बहुत महत्वपूर्ण है। और इसलिए उसकी छवि उनके मन में बहुत ज्यादा पड़ जाती है। और भले ही वो भगवान की भक्ति कर रहे हों, भगवान को मानते भी हैं वो, पर भगवान की छवि उनके मन में उतनी बड़ी नहीं होती है। और इसलिए अगर कुछ समस्या आ जाती है, तो वो समस्या भगवान से भी बड़ी लगने लगती है। और तभी क्या लगता है, कि “क्या भगवान इस समस्या का हल कर पाएंगे?”
गलत धारणाएं: क्या शैतान भगवान से बड़ा है?
अभी एक जुइश रब्बी (Jewish Rabbi) थे, जुइश प्रीस्ट थे, उन्होंने एक किताब लिखी कि “अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है?” (When Bad Things Happen to Good People)। तो अभी क्या है, जो अब्राहमिक धर्म जो हैं, क्रिश्चियनिटी (Christianity), जुडाइज्म (Judaism) आदि जो धर्म हैं, इनमें पुनर्जन्म को वो मानते नहीं हैं, क्योंकि शास्त्रों में पुनर्जन्म का थोड़ा बहुत उल्लेख है, पर वो मानते नहीं हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के साथ बुरा क्यों हो रहा है, क्या पूर्व जन्म में कुछ कर्म किये होंगे, यह उनको समझ नहीं होती है।
तो हेरोल्ड कुशनर (Harold Kushner) नाम का यह जो रब्बी था, उसने एक तर्क निकाला कि वास्तव में अगर भगवान अच्छे हैं, तो हमारे जीवन में बुरा क्यों होता है? तो उसने एक तर्क निकाला, कि वास्तव में भगवान बड़े हैं, पर शैतान भी बड़ा है। और कभी-कभी शैतान भगवान को हरा देता है। और जब शैतान भगवान को हरा देता है, तो तभी भगवान चाहते हैं हमारी सुरक्षा करना, पर भगवान कर नहीं पाते। तो भगवान सबके हितचिंतक हैं, पर भगवान सर्वशक्तिशाली नहीं हैं।
तो उसका कहने का भाव क्या था? कि अगर हम भक्ति करते हैं, पर फिर भी हमारे जीवन में समस्या आती है, तो भगवान के पास शक्ति नहीं है हमारी सुरक्षा करने की। इसलिए हमें भगवान को माफ़ कर देना चाहिए। तो इंग्लिश में कहावत है, “To err is human, to forgive is divine” (गलती करना इंसान का काम है, माफ़ करना भगवान का)। हम गलती करते हैं, भगवान हमें माफ़ करते हैं, पर इसने क्या उल्टा कर दिया— “भगवान गलती करते हैं, हम उनको माफ़ कर देते हैं!”
अब ऐसा भाव क्यों आया? क्योंकि जब पुनर्जन्म का विचार नहीं है, आत्मा और आध्यात्मिक चेतना की समझ नहीं है, तो क्या होता है? व्यक्ति सोचता है कि ये दुनिया और दुनिया की समस्याएँ बहुत बड़ी हैं। और इन समस्याओं का हल जब भगवान नहीं कर पा रहे हैं, मैं प्रार्थना कर रहा हूँ, भगवान से उसका हल नहीं हो रहा है, मतलब भगवान के पास शक्ति नहीं है उसका हल करने की। तो जब हम ऐसा विचार करते हैं, जब हम इस दुनिया से बहुत आसक्त होते हैं, तो फिर क्या होता है? हमको लगता है कि कभी ये दुनिया भगवान से बड़ी है, और दुनिया की चीज़ें भी भगवान से महत्वपूर्ण हैं। दुनिया की समस्या ही भगवान से बड़ी है। और उसके कारण कभी-कभी हमारी भक्ति में व्यत्यय (रुकावट) आ जाता है। क्योंकि हमें लगता है, “पहले मेरी ये समस्या सुलझ जानी चाहिए, बाद में भक्ति करनी है।”
सांस्कृतिक भक्ति बनाम तत्वज्ञान
तो अभी जब ऐसे हो जाता है, तो फिर हमें तत्वज्ञान ज़रूरी है। जैसे होता है कि हम एक सांस्कृतिक भक्ति कर सकते हैं, एक बौद्धिक भक्ति कर सकते हैं, और एक आध्यात्मिक भक्ति कर सकते हैं। अभी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक में एक हद तक समानता है। सांस्कृतिक भक्ति मतलब क्या है? कि हमारी संस्कृति ही है, हमारे पूर्वजों ने भक्ति की थी, हमारे परिवारवाले भक्ति कर रहे हैं, इसलिए हम भी मंदिर में आते हैं, हम भी भक्ति करते हैं। ये सांस्कृतिक स्तर की भक्ति है। सांस्कृतिक स्तर पर भक्ति कर रहे हैं, अच्छी बात है यह।
पर क्या है, अगर तत्वज्ञान नहीं है, बौद्धिक स्तर पर समझ नहीं है, तो फिर अगर भक्ति करते समय कुछ समस्या आ गई जीवन में, तो व्यक्ति को लगता है, “भक्ति करके क्या फायदा? भगवान तो समस्या का हल नहीं कर रहे। प्रार्थना करने से, भक्ति करने से कुछ हो नहीं रहा है, फायदा क्या है भक्ति का?”
तो बौद्धिक स्तर पर अगर हम होते हैं, तो हम क्या समझते हैं? शास्त्रों के आधार पर हम समझते हैं कि शास्त्रों में बताया ही है कि यह जगत जो है, क्या है? दुखों से भरा हुआ है। क्या श्लोक है भगवद्गीता का?
“मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्”
यह जगत जो है, यह दुख से ही भरा हुआ है। तो अगर किसी व्यक्ति को तत्वज्ञान पता नहीं है, उसके जीवन में दुख आते हैं, वो सोचता है, “भगवान मेरा संरक्षण नहीं कर रहा है, क्या फायदा है भक्ति करने का?” पर अगर किसी को तत्वज्ञान पता है, तो व्यक्ति को लगता है, “अरे, भगवान ने शास्त्रों में बताया है, वो सही है।” तो दुख भी आते हैं, तो दुख से शास्त्रों में श्रद्धा बढ़ जाती है। शास्त्रों में बताया है, वो ही सत्य है।
दुःखालयमशाश्वतम्: दुनिया एक अस्पताल है
जब मैं विश्वभर में प्रचार करता हूँ अमेरिका में, कनाडा में, आदि-आदि में, तो कई बार कोई व्यक्ति जब बात करने आते हैं, तो पता चलता है कि कोई भी इस दुनिया में सुखी नहीं है। मैं अमेरिका में डैलस (Dallas) में था। और वहाँ पे जो मंदिर है उसके जो सबसे बड़े पैट्रन (Patron) हैं, वो एक बहुत बड़ी कंपनी के सी.ई.ओ. (CEO) हैं। तो उन्होंने बाकी जो अपने ही ऐसे स्तर के सी.ई.ओ. थे, मैं उन सब के लिए, उनका सबका एक छोटा प्रोग्राम बनाया था। कुछ पंद्रह सी.ई.ओ. आये थे। और फिर वो सब एक-दूसरे को जानते थे, तो सब अपने हृदय से बात कर रहे थे।
कोई बता रहा था कि, “मेरा बेटा है, वो ड्रग एडिक्ट हो गया है।” कोई बता रहा था कि, “मेरी बेटी जो है वो बहुत डिप्रेशन में है।” एक पिता बता रहा था कि “उसका बेटा था, उसने अभी सुसाइड कर लिया था।” एक कोई बता रहा था कि “उनकी पत्नी को कैंसर है, टर्मिनल (Terminal)।” सब बता रहे थे कि, “अभी हम सब हमारे जीवन में मार्ग ढूँढने का प्रयास कर रहे हैं।” (We are trying to find our way).
अभी दुनिया की दृष्टि से देखें तो उन्होंने तो अपनी ज़िंदगी बना ली है, बड़े-बड़े महलों जैसे घरों में रह रहे हैं, बहुत नाम है उनका, समाज में बहुत बड़ी प्रतिष्ठा है, पर करीब में जाओगे, तो वास्तव में कोई भी सुखी नहीं है। तो अभी क्या होता है ये? जब हम ‘दुःखालय’ कहते हैं, इसका मतलब क्या है? इसका मतलब ये नहीं है कि जब दुःखालय है, तो तुम दुखी रहो। नहीं, वो भाव नहीं है। उसका भाव ये है, भगवान जब कहते हैं कि ये दुःखालय है, कि ये जगत एक अस्पताल के समान है। अभी अस्पताल में दर्द तो होगा ही, अस्पताल में लोग हैं इसलिए कि बीमार हैं। पर अस्पताल का उद्देश्य ये नहीं है कि लोगों को दर्द देना, फ़र्क है इसमें। Distress is a feature of the world, distress is not the purpose of the world.
दुनिया में दुख है, पर दुख ये दुनिया का उद्देश्य नहीं है। ये दुनिया का उद्देश्य क्या है? कि जैसे अस्पताल का उद्देश्य होता है, यहाँ दुख है, दर्द है, पर दर्द का निवारण करें। यह श्लोक अभी हमें पता है तो ‘दुःखालयमशाश्वतम्’। भगवान बता रहे हैं कि जो मेरी भक्ति करेंगे, वो जगत दुःखालय भले ही होता है, जगत में नहीं आयेंगे, पर वो मेरे धाम को प्राप्त कर लेंगे। मतलब भगवान इस बात पे ज़ोर नहीं दे रहे हैं कि जगत दुःखालय है। यह तो बात सही है, इस तथ्य से बता रहे हैं कि सर्वमान्य बात है, दुख तो है इस जीवन में, पर अगर आप भक्ति करोगे, तो आप इस दुखमय जीवन के परे आ रहे हो।
मनोरंजन और पेनकिलर का भ्रम
तो ये श्लोक का भाव कैसे है? कोई डॉक्टर बताता है किसी मरीज़ को, रुग्ण को, कि “अगर आप ये दवाई लोगे तो आपको ये दर्द पुनः परेशान नहीं करेगा।” तो अभी आप दर्द में हैं, ये बात इम्प्लिसिट (Implicit) है, ये बात पहले से स्वीकृत है। तो कई बार क्या होता है? लोग इतना पेनकिलर (Painkiller) ले लेते हैं कि उनको दर्द महसूस नहीं होता है। तो आजकल के ज़माने में, जीवन में, संस्कृति के लिए इतना सारा मनोरंजन है, वो क्या है? एक प्रकार का पेनकिलर है।
और ये मनोरंजन में इतना लग जाता है मन कि उनको लगता है कि दुख नहीं है। दुख तो है, पर मनोरंजन से कुछ समय के लिए हम दुख को भूल जाते हैं। वो एक पेनकिलर के समान है। पेनकिलर से दुख का निवारण नहीं होता है, दुख की सिर्फ भूल हो जाती है, दर्द की भूल हो जाती है। उस तरह से मनोरंजन है, वो क्या है? उससे सिर्फ दर्द को भूल जाते हैं कुछ समय के लिए, पर दर्द वापस लगने लगता है।
हमें लगता है कि “मैं भक्ति कर रहा हूँ, यह दुख क्यों नहीं जा रहे हैं मेरे जीवन से?” पर अगर हम बौद्धिक स्तर पर, शास्त्रों के आधार पर समझते हैं, दुख अगर आता है, तो हमें लगता है शास्त्रों में बता रहे हैं जो सही है। शास्त्रों के आधार पर भगवान के स्मरण से आपको संतुष्टि मिलेगी। पर अभी अगर कोई कितनी भी बड़ी समस्या हो हमारे जीवन में, अगर हम भगवान का स्मरण करते हैं, तो समस्या भले चली न जाये, पर समस्या की जो पकड़ है हमारे जीवन पे, हमारे मन पे, वो कम हो जाएगी। हमको शांति मिलेगी, हमको राहत मिल सकती है।
भगवान के स्मरण में मन लगाना
पर जो व्यक्ति भगवान के स्मरण में अपना मन लगा नहीं सकता है, क्योंकि भौतिक चीज़ों में बहुत आसक्ति है, वो कैसा है? वो एयर कंडिशंड (AC) कमरे के पास, घर के पास आ गया है। घर का उसने दरवाज़ा भी खोल दिया है। पर वो घर में अंदर आकर वो ठंडी महसूस करने की जगह पे वो क्या करता है? वो घर का दरवाज़ा खोलता है, पर बाहर खड़ा रहता है। “बाहर ठंडी हुई कि नहीं? गर्मी गई कि नहीं? गर्मी गई कि नहीं?” अब वो घर में तो जाये, घर में जायेगा तभी ठंडी लगेगी!
कभी-कभी क्या होता है, हम भगवान का स्मरण भी करते हैं, पर हमारा भगवान के स्मरण पर ज़ोर नहीं है। हम भगवान की भक्ति कर रहे हैं, पर भगवान की भक्ति में ज़ोर नहीं है, यह समस्या जा रही है कि नहीं, इसपर ज़ोर है। जैसे कोई व्यक्ति से हमारा झगड़ा हो गया है, और फिर हम ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण’ जप कर रहे हैं। “यह व्यक्ति इतना नालायक… हरे कृष्ण हरे कृष्ण… यह व्यक्ति ऐसे कैसे कर सकता है… कृष्ण कृष्ण हरे हरे… मैं इसको निकाल दूँगा… हरे राम हरे राम…” तो हमारा क्या है? जिह्वा से एक जप चल रहा है, मन से दूसरा जप चल रहा है।
वैसे क्या होता है, कभी-कभी हमारा मन इतना समस्या वाला होता है, “यह कब हल होगा? कब हल होगा? कब हल होगा?” अभी वो समस्या का हल भी हमें चाहिए, यह ज़रूरी है। पर हमें समझना है कि Greater than the world’s power to hurt is God’s power to heal. यह दुनिया हमें बहुत दर्द दे सकती है, पर दुनिया की दर्द देने की जितनी शक्ति है, जितनी क्षमता है, उससे ज़्यादा भगवान की शक्ति है उससे हमें राहत देने की। तो इसलिए हम जब तत्वज्ञान के आधार से समझते हैं कि भगवान इस दुनिया से बहुत बड़े हैं, और भगवान के स्मरण से हमें ऐसी राहत मिल सकती है जिससे कि वो समस्या हल हो।
ओवरथिंकिंग: समस्या को बड़ा बनाना
समस्या क्या होती है? मान लीजिए अगर हम कोई वज़न उठा रहे हैं, कोई दस किलो वज़न उठा रहे हैं, बहुत मुश्किल नहीं है। पर बहुत समय तक उठाना पड़ेगा तो थक जाएँगे। पर वो दस किलो वज़न है, वो अगर मैं दस मिनट उठाऊँगा, तो भी दस किलो ही रहेगा। पर मान लीजिए वो दस किलो वज़न मैं दस मिनट उठाऊँगा और वो बीस किलो बन गया, और दस मिनट उठाऊँगा और वो तीस किलो बन गया, तो फिर हमें उठाना तो बड़ा मुश्किल हो जाएगा।
तो साधारणतया क्या होता है? हमारी समस्याएँ होती हैं, और समस्याएँ ऐसी होती हैं कि जितना हम उनके बारे में विचार करते हैं, उतनी वो समस्याएँ और बड़ी बन जाती हैं। अभी साधारणतया अगर हम समस्याओं का विचार ही नहीं करेंगे, तो फिर उसका हल भी नहीं ढूँढ पाएंगे। तो विचार तो ज़रूर करना है समस्याओं पर। पर ऐसे नहीं है कि अगर मेरे पास कोई ट्रॉली है, उसमें सामान है, मुझे उसको ढकेलना है, तो जितनी मैं शक्ति लगाऊँगा उतना वो ट्रॉली दूर जाएगी। तो उसमें कैसे है? अगर हम उसका ग्राफ बनाते हैं तो लीनियर (linear) ग्राफ होगा, जितनी शक्ति लगाऊँगा उतना दूर जाएगा।
पर जब हम समस्याओं का हल करने का प्रयास करते हैं, तो हम जितना उस समस्या का विचार करेंगे उतना अच्छा हल ढूँढेंगे, ऐसे नहीं होता है। जब समस्या होती है, तो उसमें विचार करना ज़रूरी है कि “यह करेंगे तो क्या होगा, यह करेंगे तो क्या होगा?” तो जितना हम विचार करते हैं, धीरे-धीरे उतनी हमको स्पष्टता आने लगती है, “अच्छा यह ऐसे करेंगे तो ऐसा होगा, यह ऐसे करेंगे तो ऐसा होगा।” पर और विचार अगर करते रहते हैं (ओवरथिंकिंग), तो फिर क्या होता है? वो हल नहीं होता है, हम और उसमें उलझ जाते हैं। जितना हम विचार करते हैं, उतनी वो समस्या और बड़ी लगने लगती है। और फिर व्यक्ति मायूस हो जाता है।
मन का खेल और समस्याएं
अभी कुछ साल, शायद एक साल पहले कुछ तो भी, भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच था। चैंपियंस ट्रॉफी का फाइनल था। सब अपेक्षा कर रहे थे कि भारत जीत जाएगा और भारत हार गया, बहुत बुरी तरह से हार गया। तो उसके बाद में एक विद्यार्थी आया था मुम्बई में मुझे मिलने। वो रोने लगा कि “ये मैच हार गए, तो तीन दिन रात को मैं सो नहीं पाया।” उसको मैंने बोला, “वो क्रिकेटर शायद सो गए होंगे, आप क्यों नहीं सो पाए?” वो भारत में था, क्रिकेट मैच शायद इंग्लैंड में हुई थी।
अब ये क्या है? अब वास्तव में मैच हार गए, हार गए। पर क्या है, उसका मन उसके बाद विचार करते जा रहा है, करते जा रहा है, करते जा रहा है। उसके कारण उसके लिए… आपकी नींद भी नहीं आ रही है। तो क्या हो गया? वो समस्या उसके लिए इतनी बड़ी हो गई है। यहाँ तक कि क्या है, जब श्रीलंका वर्ल्ड कप हार गया था, तो कई श्रीलंकन फैन्स ने अपनी आत्महत्या कर ली थी। “हमारी टीम हार गई, इसलिए आत्महत्या कर ली!” अब इतना बड़ा समस्या को बना दिया है? टीम हार गई, गेम है वो, इसमें इतनी बड़ी बात क्या है? पर क्या है, जो मन है, वो इतना खतरनाक हो सकता है कि वो समस्याओं को बहुत बड़ा दिखाने लगता है।
तो इसलिए, जब हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, यह ठीक है कि यह समस्या है, पर यह समस्या से बहुत बड़े भगवान हैं। और अगर मैं भगवान की प्रार्थना करूँगा, शायद यह समस्या चली जायेगी, और समस्या चली भी नहीं गई, तो भी मुझमें जो शक्ति है यह समस्या सहन करने की, मेरी जो बुद्धि है ये समस्या का सामना करने की, वो बढ़ जाएगी। इसलिए जब हम तत्वज्ञान के स्तर पे समझते हैं कि भगवान सबसे बड़े हैं। हमको एक यह भावना, हमको ऐसे लगता है, “भगवान तो सबसे बड़े हैं, पर यह समस्या बहुत बड़ी है।”
हमारा भाव तत्वज्ञान से जुड़ना चाहिए। तत्वज्ञान से हम समझेंगे अपनी पहचान कि कोई भी समस्या दुनिया में भगवान से बड़ी नहीं है। भगवद्गीता में भगवान यह दिखाते हैं तत्वज्ञान के स्तर पे, और दर्शन के स्तर पे भी वह क्या करते हैं अपना विराट रूप दिखाते हैं।
“मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि”
यदि हम भगवान का स्मरण करेंगे, तो हम वो समस्याओं के पार ही जा सकते हैं। तो मैं दो पॉइंट बोलने वाला था कि कोई भी समस्या भगवान के लिए बहुत बड़ी नहीं है, कोई भी समस्या बहुत छोटी भी नहीं है। कोई भी समस्या भगवान के लिए प्रॉब्लम नहीं है।
भौतिक और आध्यात्मिक समन्वय (Dependence & Diligence)
एक तरह से समझना है कि Material problems require material solutions (भौतिक समस्याओं के लिए भौतिक हल चाहिए)। अभी हम आध्यात्मिक हल क्या होता है? आध्यात्मिक हल वो होता है कि जिससे व्यक्ति को बुद्धि मिले कि वो भौतिक हल कैसे ढूँढे। अभी इसका मतलब क्या है? कि अभी भगवान ने भगवद्गीता का ज्ञान अर्जुन को दिया। उसके बाद में अर्जुन ने युद्ध किया कुरुक्षेत्र में। और कुरुक्षेत्र युद्ध में वो विजयी हुए। क्योंकि कुरुक्षेत्र युद्ध में जो विजयी हुए, तो भगवान ने भगवद्गीता का ज्ञान दिया उसके आधार पर हुए या जीवन भर अर्जुन ने जो धनुर्विद्या का ज्ञान सीखा था उसके आधार पर हुए?
आपको क्या लगता है? (श्रोता: भगवान की कृपा)। भगवान की कृपा, वो ठीक है, कृपा बात सही है। कृपा बात सही है, उनको मार्गदर्शन दिया, दिशा दी, प्रेरणा दी। और उसका जो अमल करना था, वो अमल कैसे किया उन्होंने? धनुर्विद्या के ज्ञान से। तो अपनी विद्या और अपना ज्ञान बहुत ज़रूरी है। भौतिक और आध्यात्मिक ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। आध्यात्मिक ये भौतिक की जगह नहीं लेता है। कभी-कभी भौतिक चमत्कार हो जाता है तो भी हो जाता है। पर अधिकांश रूप से… अभी प्रभुपाद जी ने विश्वभर में प्रचार किया, तो वो एक जलदूत (Jaladuta), एक जहाज़ से अमेरिका गए। वो हवा में उड़ते हुए चमत्कार की तरह से नहीं गए।
तो जो भौतिक पद्धति है और आध्यात्मिक चेतना है, दोनों का समन्वय बहुत ज़रूरी है। तो कभी-कभी अगर हम ऐसे उनको बोलते हैं, लोगों को ऐसे बोलते हैं कि “आप आध्यात्मिक भक्ति करो, भौतिक समस्या का हल अपने आप आ जाएगा।” ये अपने आप नहीं है। उनको भौतिक स्तर पर भी प्रयास करना है। मैं जब 20-25 साल पहले, सबसे पहले मैं प्रवचन वगैरह देने लगा, एक वरिष्ठ भक्त ने हमको कुछ गाइडलाइन दी, दस पॉइंट बताए थे कि ऐसे आपको पब्लिक में बोलना चाहिए। आखिरी पॉइंट था: Depend on Krishna (भगवान पे निर्भर रहो)। क्योंकि हमें भी हमारी क्षमता के लिए सब प्रयास करना है।
सच्ची शरणागति का अर्थ
तो इसलिए भक्ति में दो चीज़ें हैं। इसको मैं इंग्लिश में कहता हूँ: Dependence on Krishna (कृष्ण पर निर्भरता) और Diligence for Krishna (कृष्ण के लिए परिश्रम)। कि भक्ति के दो अंग हैं: भगवान पे निर्भरता और भगवान के लिए सक्षमता। भगवान के लिए हम ज़िम्मेदारी ले के कार्य करते हैं। तो दोनों महत्वपूर्ण हैं। अगर हम सिर्फ एक चीज़ पे ज़ोर देते हैं कि सिर्फ भगवान पे निर्भर रहो, तो वो भाव पर्याप्त नहीं है। हमें देखिए शरणागति करनी है। शरणागति का एक प्रतीक है। जब भगवान की शरणागति आ रहे हैं तो हम कैसे शरणागत होते हैं साधारणतया? “पूरी तरह से निर्भर होके शरण चले जाओ। हाथ ऊपर करके शरण चले जाओ।” हाथ ऊपर करके वो भगवान के शरण कर लिया।
भगवद्गीता के अंत में अर्जुन को भगवान बोलते हैं, “मेरी शरण में आ जाओ।” भगवान की शरण में आने के लिए क्या अर्जुन भी अपने हाथ ऊपर कर लेते हैं? नहीं! अर्जुन अंत में क्या करते हैं? अर्जुन अपना धनुष उठा लेते हैं, भगवान के लिए युद्ध करने के लिए। अर्जुन की शरणागति क्या है? भगवान के लिए गांडीव उठाने के लिए। द्रौपदी की शरणागति क्या है? Dependence on Krishna (कृष्ण पर निर्भरता)। और अर्जुन की शरणागति है Diligence for Krishna (कृष्ण के लिए परिश्रम)। तो ये दोनों जो हैं, शरणागति के ही भाव हैं।
इसलिए अभी हम शायद सक्षम नहीं हैं लोगों को समस्या का भौतिक हल बताने के लिए। पर उनको ऐसे नहीं बोलना चाहिए कि “भौतिक हल आप ढूँढो ही मत।” हम यहाँ झूठा प्रॉमिस करने के लिए नहीं हैं। ऐसे नहीं बोलना है कि अगर किसी के हाथ फ्रैक्चर हो गया है, तो उनको बोलें कि “तुम जप करो और हाथ ठीक हो जाएगा।” नहीं। आप जप करो, जो दर्द है आपको सहने की शक्ति मिलेगी, हाथ तो डॉक्टर के पास जाकर ही ठीक हो जाएगा।