Oppenheimer movie_ Gita recited during sex scene_ Hindi
Podcast:
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Lecture Summary
ओपेनहाइमर फिल्म में भगवद् गीता के दृश्य का सारांश (Summary)
वक्ता ने हॉलीवुड फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ (Oppenheimer) के उस आपत्तिजनक दृश्य की कड़ी आलोचना की है जिसमें एक अंतरंग (intimate) दृश्य के दौरान पवित्र भगवद् गीता का पाठ किया गया है। उन्होंने अपने दृष्टिकोण को तीन ‘D’ (3 D) के माध्यम से स्पष्ट किया है:
- 1. Disgusting (घृणास्पद और निराशाजनक): भगवद् गीता दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए एक परम पवित्र और मूल्यवान धार्मिक ग्रंथ है। फिल्म निर्माताओं ने इसे एक अंतरंग दृश्य के साथ जोड़कर भारी असंवेदनशीलता दिखाई है। यह दृश्य न केवल अनुचित (inappropriate) है, बल्कि करोड़ों भारतीयों और गीता प्रेमियों की भावनाओं को आहत करने वाला है।
- 2. Dull-headed (रचनात्मकता के नाम पर नासमझी): डायरेक्टर द्वारा ‘आर्टिस्टिक लाइसेंस’ (Artistic License) या रचनात्मक आज़ादी के नाम पर ऐसे दृश्य को उचित ठहराना उनकी नासमझी है। यदि उद्देश्य ओपेनहाइमर की बुद्धिमत्ता और गीता के प्रति उनके ज्ञान को दर्शाना था, तो इसके लिए और भी कई सम्मानजनक तरीके हो सकते थे। बेडरूम की निजी गतिविधियों के साथ पवित्र ग्रंथ को जोड़ना किसी भी बायोग्राफी या रचनात्मकता से मेल नहीं खाता।
- 3. Discordant (गीता की शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत): सार्वजनिक रूप से कामुकता का ऐसा चित्रण भगवद् गीता के मूल संदेश के ही खिलाफ है। गीता (श्लोक 3.37) स्पष्ट रूप से चेतावनी देती है कि अनियंत्रित कामवासना (महाशनो महापाप्मा) एक विनाशकारी शक्ति है जो व्यक्ति की बुद्धि, नैतिकता और चरित्र को नष्ट कर देती है। पवित्र ग्रंथ को ऐसे वासना-युक्त कार्यों के साथ जोड़ने से लोगों के मन में श्लोकों के प्रति नकारात्मक और गलत छवि बनती है, जो गीता की शिक्षाओं का घोर अपमान है।
निष्कर्ष: वक्ता और कई अन्य लोगों की यह स्पष्ट मांग है कि इस आपत्तिजनक दृश्य को फिल्म से हटा दिया जाए। इस दृश्य को हटाने से फिल्म की मूल कहानी या प्रभाव पर कोई नुकसान नहीं होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि फिल्म के डायरेक्टर और भारत के सेंसर बोर्ड दोनों ही इस दृश्य की गंभीरता और इससे जुड़ी धार्मिक संवेदनाओं को समझने में विफल रहे हैं।
Full Transcription
ओपेनहाइमर मूवी और भगवद् गीता: तीन ‘D’ का दृष्टिकोण
हरे कृष्णा! ओपेनहाइमर मूवी में एक अश्लील कार्य करते हुए जो भगवद् गीता पढ़ी जा रही है, रिसाइट (recite) की जा रही है, ऐसे बताया गया है। इसके बारे में भगवद् गीता की दृष्टि से क्या दृष्टिकोण है, इसको मैं तीन ‘D’ (3 D) में बताऊंगा। और पहले ‘D’ का जो भाव है, वही तीनों ‘D’ में फरमाता है: Disgusting (घृणास्पद), Disappointing (निराशाजनक), Distressing (दुखदायक)।
फिल्मों पर मेरी टिप्पणी का उद्देश्य
तो सबसे पहली बात यह है कि जब मैं किसी मूवी पर कॉमेंट करता हूँ, तो मैं मेरे कॉमेंट को रिव्यू (Review) नहीं कहता हूँ, मैं मूवी को रिव्यू नहीं कर रहा हूँ। तो उस मूवी में अगर कोई ऐसे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक या तत्त्वज्ञानी कोई उल्लेख है, कोई सम्बन्ध है, तो उसको मैं अपने कॉमेंट में, अपने वीडियो के द्वारा कुछ इलैबोरेट (elaborate) करता हूँ, उस पर कुछ रौशनी डालने का प्रयास करता हूँ।
यहाँ पर ओपेनहाइमर मूवी न मैंने देखा है, और ना मैं रिकमेंड (recommend) करता हूँ किसी को देखने को। मैंने भगवद् गीता पर कई लेख लिखे हैं और कई बार जो विश्व भर के अलग-अलग विचारवंत लोग हैं, उन्होंने भगवद् गीता के बारे में क्या बताया है, उसके बारे में भी मैंने एक लेख लिखा है: “भगवद् गीता विश्व”। तो उस लेख को लिखते समय मैंने काफी सालों पहले से बताया है कि ओपेनहाइमर ने भगवद् गीता से एक श्लोक बताया था जब एटम बम (Atom Bomb) का टेस्टिंग हुआ था।
दृश्यों का अनुचित और घृणास्पद चित्रण (Disgusting)
जब ये मूवी आया और जब अमेरिका में पहले रिलीज़ हुआ था ये, उसमें जब मुझे पता चला कि ये इस तरह से ये श्लोक उसमें बताया गया है, तो फिर मैंने अपना वीडियो बनाया। जैसे OMG या PK मूवीज़ थे, तो तब ही मैं वो मूवीज़ देखता हूँ। बाकी मूवीज़ देखने में ना तो मुझे ज़्यादा रूचि है ना उसके लिए मेरे पास ज़्यादा समय है। मैं मूवीज़ के रिव्यु (reviews) पढ़ता हूँ। और फिर पूछते हैं कि, “क्या ये किताब पढ़ सकते हो? पढ़ के दिखाओ मुझे,” और वो पढ़ता है।
तो अभी ये इस तरह से जो किया गया है, ये एक डिसगस्टिंग (disgusting) है। ये बहुत निराशाजनक है, ये बहुत एक तरह से घृणास्पद है, ये दुखदायक है। तो अभी लाखों-करोड़ों लोग जो हैं, भगवद् गीता को एक धार्मिक दृष्टि से बड़ा मूल्यवान ग्रंथ मानते हैं, एक सैक्रेड (sacred), पवित्र ग्रंथ मानते हैं। और जिन्होंने ये मूवी बनाया है, क्या उनको इतनी भी संवेदनशीलता नहीं हो सकती थी कि इस प्रकार के जो डिपिक्शन्स (depictions) हैं, ऐसे दिखाने से ये कितना इनएप्रोप्रियेट (inappropriate) है, कितना अनुचित है, कितना इनकम्पैटिबल (incompatible) है, बिल्कुल ये एक-दूसरे का विरोध है। जो दिखाया जा रहा है, उसके पीछे का जो भाव है, उसमें कितना विरोध है, ये वो समझ नहीं पाए। ये ना केवल दुर्भाग्य की बात है, बल्कि ये दुःख की बात है।
तो भारतीय लोग ऐसे रहते हैं जैसे नहीं कि भारत विश्व के एक कोने में है, भारतीय लोग जो हैं, बहुत प्रभावशाली भी हैं। तो उस डेमोग्राफिक (demographic) के बारे में विचार ना करना, इन लोगों के बारे में… ये एक तरह से बहुत डिस्टर्बिंग, डिस्ट्रेसिंग और डिस्गस्टिंग है।
क्रिएटिव लिबर्टी और डायरेक्टर की नासमझी (Dull-headed)
यहाँ से दूसरा पॉइंट आता है: Dull-headed (डल्ह-हेडेड)। कि जो डायरेक्टर हैं, वो बड़े विख्यात हो सकते हैं। पर इस प्रकार से जब वो कह सकते हैं कि “हमारा आर्टिस्टिक लाइसेंस है, हमारी क्रिएटिविटी के लिए हमको ये फ्रीडम चाहिए, हमको रचनात्मक कुछ दिखाना है।” पर वो जो भी आप रचनात्मकता या क्रिएटिविटी दिखाना चाहते हैं, उस क्रिएटिविटी की कम्पैटिबिलिटी (compatibility) होनी चाहिए, बाकी जो करैक्टर के बारे में बताया जा रहा है, जो चीज़ बताई जा रही है, उसके साथ। इससे मेल खाता है या नहीं, वो देखें।
तो यह डायरेक्टर ने सोचा नहीं। यह उनको दिखाना अगर है कि ओपेनहाइमर कितना बुद्धिमान है कि ना केवल वो गीता पढ़ सकता है, पर वो गीता पढ़ के वो उसको दर्शा रहा है। और वो ऐसे कार्य करते समय भी गीता पढ़ सकता है। उसकी बुद्धि दिखाने के और बहुत से माध्यम थे। और इतिहास में जहाँ तक उसकी बायोग्राफीज़ (biographies) हैं, उसमें इसने ऐसे किया है ऐसा कोई प्रॉमिनेंट (prominent) वर्णन तो नहीं आता है। तो भी व्यक्ति अपने बेडरूम में क्या करते हैं, इस आम दुनिया को बताते नहीं हैं। और अगर बताते भी हैं, तो भी उसको ऐसे डिपिक्ट करने की क्या ज़रूरत है?
भगवद् गीता की शिक्षाओं के विपरीत (Discordant)
और उससे तीसरा पॉइंट आता है: Discordant (डिसकॉर्डेन्ट)। इस प्रकार से सेक्सुअल एक्टिविटी (sexual activity) का पब्लिक में डिपिक्शन करना, उसको दिखाना, यह भगवद् गीता की शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है। भगवद् गीता कहती है कि जो काम वासना होती है, वो अनियंत्रित होने की संभावना बहुत होती है। जब वो अनियंत्रित हो जाती है, तो फिर वह एक बहुत ही भयावह राक्षस के समान बन जाती है जो सब कुछ ग्रहण कर सकती है, सब कुछ भक्षण कर सकती है। जो हमारी मानवता, हमारी नैतिकता, हमारी बुद्धि, हमारा अध्यात्म, हमारा चरित्र, सब कुछ विनाश कर सकती है।
इसलिए भगवद् गीता (३.३७ और ३.४१) में कहा गया है:
“महाशनो महापाप्मा” (यह काम महान अशन/भक्षक और महान पापी है), और
“तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य” (हमें शुरुआत में ही इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए)।
इसका मतलब क्या है? व्यक्ति को इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए, पर समाज को भी ऐसे दृश्य दर्शाने में नियंत्रण करना चाहिए। ऐसे कार्य को नहीं…
क्या ऐसे दृश्य गीता की पवित्रता कम करते हैं?
उसके ऊपर से अगर हम देखते हैं कि ये जो बताया जा रहा है, वह एक पवित्र चीज़ को बताया जा रहा है। तो भी कोई कहेगा कि अगर कोई भगवद् गीता पढ़ता है, भगवद् गीता सुनता है, कहीं भी सुनता है, क्या उसके लिए अच्छा नहीं है? क्या भगवद् गीता पवित्र नहीं है? क्या उसको पवित्र नहीं बना सकती है? क्या ये भगवद् गीता की पवित्रता इतनी कम है, कि ऐसे कार्य करते समय पढ़ने से भगवद् गीता की पवित्रता कम हो जाएगी? नहीं, ये भगवद् गीता की पवित्रता कम होने की बात नहीं है।
और कहेंगे कि अभ्यास स्मरण करता है, तो भगवद् गीता का तो अच्छा ही है। पर जब ऐसे स्मरण दिखाया जाता है, तब लोगों के मन में पवित्र स्मरण नहीं आता है। उनके मन में उसके द्वारा जो बहुत एक निंदनीय कार्य किया जा रहा है, उसका स्मरण आता है। और फिर उसकी छवि भगवद् गीता के साथ मिल जाती है। तो वो एक नकारात्मक प्रभाव हो सकता है उसका। तो इसलिए ये डिसकॉर्डेन्ट (discordant) है, ये जो है भगवद् गीता की शिक्षाओं के विपरीत है।
निष्कर्ष और मांग
और कई लोगों ने याचना की है, ये डिमांड (demand) की है, मांग की है कि ये जो सीन्स हैं उस मूवी से निकाल दिए जाएँ। और वास्तव में ये मूवी को कोई लॉस (loss) नहीं है अगर वो सीन्स निकाल दिए जाएँ। जो उसकी कहानी है, जो उसमें पात्र हैं, उसके बिना भी आगे बढ़ सकते हैं उन चित्रों से।
तो हम आशा करते हैं कि वो सीन्स को निकाल देंगे। आशा करने में कुछ गलत नहीं है। वो डायरेक्टर नहीं समझा, भारत के सेंसर बोर्ड ने नहीं समझा, वो डल्ह-हेडेड (dull-headed) हैं। और ऐसा कार्य करना और ऐसा ख़ास करके एक पवित्र ग्रंथ के साथ ऐसा कार्य करना, ये गीता के शिक्षाओं के डिसकॉर्डेन्ट (discordant) है। आशा करने में कुछ गलत नहीं है।