Overcome resentment by asking how not why – Hindi
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Lecture Summary
प्रमुख बिंदु (Key Highlights)
- मन की अवस्थाएं और उसका निग्रह: मन की पाँच अवस्थाएँ होती हैं— मूढ़ (आलसी), क्षिप्त (भटका हुआ), विक्षिप्त (एकाग्रता का प्रयास), एकाग्र और निरुद्ध। योग और सभी धार्मिक कार्यों का मुख्य उद्देश्य इसी मन को नियंत्रित कर उसे भगवान में एकाग्र करना है।
- चेतोदर्पणमार्जनम् (मन की शुद्धि): जब मन रूपी आईना साफ होता है, तब हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाते हैं कि हम भगवान के अंश हैं। तब हमें सुखी होने के लिए दुनिया की झूठी वाहवाही (Worldly approval) की आवश्यकता नहीं रह जाती है और हम भीतर से संतुष्ट हो जाते हैं।
- रथ का दृष्टांत और सही मार्गदर्शन: शरीर रूपी रथ में इन्द्रियां घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है और आत्मा रथी है। जब हम अपनी बुद्धि को भगवान के मार्गदर्शन (शास्त्रों) के अनुसार चलाते हैं, तो हमारा रथ सन्मार्ग पर चलता है। अगर भगवान से संबंध टूट जाए, तो बुद्धि का पतन हो जाता है।
- ‘क्यों’ (Why) के बजाय ‘कैसे’ (How) पर ध्यान दें: कठिन परिस्थितियों में “यह मेरे साथ ही क्यों हो रहा है?” पूछने से मन में घुटन (Resentment) और निराशा पैदा होती है। इसके बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि “इस परिस्थिति में मैं भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ?” यह सकारात्मक रवैया हमें आगे बढ़ने का मार्ग देता है।
- नियंत्रण के भाव में भक्ति न करें: अक्सर हम भगवान से प्रार्थना इस भाव से करते हैं कि “योजना मेरी है, बस आप अपनी शक्ति से उसे पूरा कर दें।” यह भगवान पर नियंत्रण करने का प्रयास है। सच्ची भक्ति समस्या (Problem-conscious) पर केंद्रित न होकर भगवान (God-conscious) पर केंद्रित होनी चाहिए।
- अनिर्णय (Indecisiveness) और जर्नलिंग (Journaling): जब हम किसी महत्वपूर्ण फैसले को लेकर उलझन में हों, तो उन विचारों को डायरी में लिखना चाहिए। इससे मन की उलझन बाहर आती है, विचारों में स्पष्टता आती है और फिर हम वरिष्ठों या गुरुओं से सही मार्गदर्शन ले सकते हैं।
- मिथ्या अहंकार और जीवन का अंतिम लक्ष्य: अंत समय में भी मनुष्य अपने मिथ्या अहंकार और सांसारिक मोह (Emotional closure) में फंसा रहता है। रामायण (शूर्पणखा) और छात्रों के उदाहरणों से बताया गया है कि हमें अपने मूल उद्देश्य से भटकना नहीं चाहिए। संसार में बहुत कुछ है देखने को, पर हमारी दृष्टि और मन केवल भगवान के दर्शन और स्मरण में लगे रहने चाहिए।
Full Transcription
स्वागत और धर्म के नियम
इसको नहीं, प्रसिद्ध पूछ रहे हैं। आपका स्वागत है। अपने मन के वाले साथ-साथ का रोधा रहे हैं। इस स्वागत में बता रहे हैं कि जो भी धर्मी कार्य होते हैं, वे साथ बता रहे हैं कि जो भी धर्मी कार्य होते हैं इसे बता रहे हैं कि आपको डरना नहीं चाहिए। वैसे अपना स्वधर्म जो अपनी परिस्थिति, आश्रमों के अनुसार, अपने वर्ण के अनुसार, वो करता है। और स्वधर्म करते हैं वेदांतियों के लिए तो प्रक्रियाएं होती हैं। यम और नियम आध्यात्मिक जीवन के लिए हैं। कुछ भी हो जाए, अलग पार नहीं हो जाएं, यम और नियम हो जाएं। ‘शुद्धे चेतसि कर्माणि सद्वृत्तानि’, फिर हम शास्त्रों का श्रवण करते हैं, अध्ययन करते हैं। हमें एक अच्छी चीज़ बताई गई है कि कैसे करना चाहिए। शुद्ध कर्म और सद्वृत्ति होता है।
मन की पांच अवस्थाएं
चित्त की अवस्थाएं होती हैं। मन के अंदर एक होता है ‘मूढ़’। मूढ़ मन की प्रैक्टिस हुई है, आलसी है, क्या हो रहा है कुछ पता नहीं है इसकी दुनिया में, मूढ़ इसके ऊपर है। फिर ‘क्षिप्त’, क्षिप्त मन रजोगुण में है। एक जगह बैठा है, पैसे नहीं हैं, मन इधर-उधर भाग रहा है पर मन एक ही ओर नहीं भाग रहा है—मैं ऐसे करूँगा, पैसे कमाऊँगा, मैं इसको करूँगा, पहले मन इधर-उधर कहीं भाग रहा है, वो क्षिप्त है। कुछ भी नियंत्रण नहीं है और दूसरी दिशाओं में कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है।
पर जो रजोगुण में होता है, एक तरह से कार्य, एक तरह से होता है अगर मुझे ये करना है, मुझे ये पैसा कमाना है, मुझे ये कार्य करना है, तो वो मन बड़ा खेल जाता है, उसको करना है। वो ऊँची चीज़ों पर मन लगाने का प्रयास कर रहा है पर मन धन-धन भाग रहा है। जब कोई विद्या की पढ़ाई करने का प्रयास कर रहा है, पर फिर जब वो कुछ बोल रहा है, वो जब से कुछ आबादार नहीं है, तो ‘विक्षिप्त’ मतलब एकाग्रता का प्रयास कर रहा है पर वो दृढ़ नहीं है। तो इस तरह करता है, तो उसके बाद में जो एकाग्रता है, ‘एकाग्र’ अवस्था आती है। एकाग्रता मतलब मन विक्षिप्त में एकाग्रता का प्रयास होता है।
और फिर उसके बाद में आता है ‘निरुद्ध’। निरुद्ध मतलब जो भौतिक दिशाओं में भागता है, वहाँ जाना पूरा बंद नहीं होता है। गीता में आता है:
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
योग का आचरण करके धीरे-धीरे क्या होता है? मन जो भौतिक दिशाओं में भागता है, वो रुक जाएगा। और जब वो मन रुक जाएगा, तो मन क्या होता है, अंदर जाता है:
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।
तो शुद्ध मन के द्वारा वो अंदर देखता है। तो अंदर आत्मा देखता है, आत्मा के लिए परमात्मा देखता है। तो वो देखता है, देखने से वह संतुष्ट होता है।
चेतो दर्पण मार्जनम् और आत्म-संतुष्टि
जब ‘चेतोदर्पणमार्जनम्’, मन का आईना साफ होता है, तो हमें वास्तव में हम जो हैं वो दिखते हैं। हम दिखते हैं कि हम भगवान के अंश हैं, मैं भगवान का अंश हूँ, भगवान सबके शाश्वत हैं और उनके अंश रूप में मैं उनका शाश्वत हूँ। मुझे ये समझ आता है, I don’t need the world’s approval to be happy. मुझे सुखी होने के लिए दुनिया की सराहना की ज़रूरत नहीं है। मुझे भगवान से संबंध में जो सिक्योरिटी, जो विश्वास मिलता है, मैं उसके लिए सुखी रह सकता हूँ।
तो यह जो आता है, जब हमारा मन जो है, ये मन का जो दर्पण है, मन का जो आईना है, वो शुद्ध हो गया है। वरना वो एक विकृत प्रतिबिम्ब भी दिखाता है। विकृत प्रतिबिम्ब का मतलब क्या है? कि अगर कोई छोटा बालक है, बचपन से वो दो बालक हो सकते हैं, तो लगता है कि एक अच्छा बालक है, एक बड़ा बुद्धिमान है, और क्लास में अच्छा पहला आता है। और दूसरा क्या है, उसको इतनी अच्छी पढ़ाई नहीं है, उसको इतने अच्छे मार्क्स नहीं मिलते हैं। तो फिर अगर माता-पिता ज़्यादा परिपक्व नहीं हैं, तो वो सोचते हैं कि इस छोटे बच्चे को पढ़ाई में लगा रहे हैं। किसी और से तुलना करके माता-पिता का उद्देश्य तो अच्छा हो सकता है कि उसको और पढ़ाई में लगाएं, पर उससे क्या होता है, वो बच्चे को लगता है कि मैं काम का ही नहीं हूँ, मैं ख़राब हूँ, मैं आलसी हूँ, मैं बुद्धू हूँ। जो विकार में उसके कारण विकृत प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है, वो सब मिल जाता है।
और तब हम खुद को, जो वास्तव में कौन हैं, उसको हम देख सकते हैं और दर्शन करके हम अंदर ही संतुष्ट हो जाते हैं। और उसके बाद में क्या होता है, कभी भी हम सुखी हो सकते हैं। ऐसा नहीं है कि दुनिया की परवाह नहीं करनी है, पर अगर हम दुनिया की परवाह ही करते रहें तो हम कभी संतुष्ट नहीं होते हैं। तो इसलिए हम दुनिया से कुछ सीख भी सकते हैं, दुनिया में वैसे लोगों के लिए हमारी चिंता हो सकती है, उनसे हम कुछ समझ सकते हैं। पर हमारा जो आत्मविश्वास है, वो हम आत्मा क्या हैं, समझ कर आता है।
और फिर मैं ये चीज़ कर रहा हूँ, ये लोग कुछ पैसा नहीं देंगे, ये कुछ तारीफ नहीं देंगे, तो अगर वही तुलना कर रहे हैं हम तो फिर क्या होगा? उससे हमारा मन नियंत्रण में नहीं रहेगा। जो तुलना का भाव हम भौतिक जीवन में देखते हैं, वही तुलना का भाव हम आध्यात्मिक जीवन में लाते हैं। भौतिक जीवन में हम देखते हैं मेरे पास ऐसी गाड़ी है, उसके पास ऐसी गाड़ी है। तो फिर क्या हो रहा है? मन पे नियंत्रण नहीं, मन ही हमको नियंत्रण कर रहा है। तो इसलिए मन को समाधि में लगाना है, भगवान में ही नियंत्रण जाता है, तभी हम वास्तव में संतुष्ट होते हैं।
आत्मा, मन, बुद्धि और परमात्मा का संबंध
तो इच्छाएं आती हैं। मैंने जो उदाहरण दिया था, कैसे अंदर यहाँ पे आत्मा है और यहाँ पे मन है और यहाँ पे परमात्मा है। कि सभी आत्मा के पास जो मन है, सभी में भगवान हैं। तो तभी सवाल पूछा जाता है, तो फिर अगर ऐसा है, मन यहाँ पे है, भगवान यहाँ पे, तो बुद्धि कहाँ है? अहंकार कहाँ है? तो यहाँ अंदर जो है मन, बुद्धि, अहंकार क्या है? कैसे हम समझ सकते हैं?
तो इसके बारे में थोड़ा चर्चा करूँगा। यह थोड़ा टेक्निकल हो सकता है पर मैं इसको समझाने का प्रयास करूँगा। क्या है कि जब हम अंदर के बारे में चर्चा करते हैं—मन हो, बुद्धि हो, अहंकार हो—यहाँ क्या है? यहाँ स्थूल चीज़ें नहीं हैं। जैसे हम देखते हैं यह एक डेस्क है, एक मेज़ है, यह एक माइक स्टैंड है। तो इस तरह से यह स्थूल चीज़ें हैं। तो मैं इसको कह सकता हूँ यहाँ है। पर अगर हम देखते हैं, गीता में कहा है:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
तो अगर हम सबसे पहले जैसे भूमि, वायु, जल, अग्नि की बात करें, मेरे शरीर में भूमि, जल, वायु कहाँ नहीं है? सब जगह है। ऐसे नहीं कह सकते कि भूमि यहाँ है, जल यहाँ है, वायु यहाँ है। हार्डडिस्क में ऐसे नहीं बोल सकता। जैसे कंप्यूटर में इस जगह में ऑपरेटिंग सिस्टम है, इस जगह में वर्ड है, इस जगह में सॉफ्टवेयर है, इस जगह में ब्राउज़र है, ऐसे नहीं होता है। क्योंकि वो अलग प्रोग्राम हैं। तो उसमें कौन सा प्रोग्राम कहाँ है, उस पे हमें ज़्यादा ध्यान नहीं देना है। हमको क्या है कि ये प्रोग्राम से काम कैसे करना है?
उसी तरह से मन कहाँ है, मन क्या है, बुद्धि कहाँ है, बुद्धि क्या है, इससे ज़्यादा हमें यह देखना है कि हमें मन और बुद्धि का उपयोग कैसे करना है। तो इसके लिए शास्त्रों का ज़्यादा अध्ययन करते हैं। हम तत्वों को ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं। हम सब में देखते हैं कि हमारे अंदर में एक ऐसी चीज़ है जो हमें अच्छा करने को कहती है और दूसरी कोई चीज़ जो है जो हमको बुरा करने को कहती है। कोई अगर कुछ ऐसे बोल रहा है जिससे हमें गुस्सा आए, तो हमेशा एक आवाज़ आती है। तो आत्मा कभी मन का सुन सकता है, कभी आत्मा बुद्धि का सुन सकता है।
रथ का उदाहरण और भगवान का मार्गदर्शन
अभी आप सबको सारथी और रथ का उदाहरण पता है (कठोपनिषद)। तो उसमें रथ क्या है? शरीर है। उसमें घोड़े क्या हैं? इन्द्रियां हैं। लगाम क्या है? मन है। सारथी क्या है उसमें? बुद्धि। योद्धा क्या है? आत्मा। इसमें अहंकार क्या है? ऐसा नहीं है कि हर उदाहरण में हर एक चीज़ हो। तो फिर आपको चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है।
जब आपने भगवान की शरण ली है, इसका मतलब आपने भगवान को अपना सारथी बना दिया है। आपके रथ का सारथी भगवान को बना दिया है। मतलब क्या है? कि हमारी बुद्धि जो है, जब हम भगवान के मार्गदर्शन के अनुसार कार्य करते हैं, तो वास्तव में हमारी बुद्धि भगवान के अनुसार कार्य करती है। जब हम शास्त्र अनुसार जीवन जीते हैं, तो हमारी बुद्धि वास्तव में परमात्मा के मार्गदर्शन के अनुसार कार्य करती है। तो एक तरह से बुद्धि और परमात्मा एक हो जाते हैं। हमेशा नहीं, पर हम शास्त्र अनुसार जीवन जीते हैं तो बुद्धि और परमात्मा की आवाज़ एक होती है।
और वहीं भागवत में हम देखते हैं कि बुद्धि का पतन कैसे होता है:
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद् ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः।
जब बुद्धि का नाश हो गया, पतन हो गया। मतलब भगवान से संबंध जो हमारा जुड़ा था, वो टूट गया। भगवान से संबंध टूट गया तो फिर हम जो प्रलोभन हैं, उसके वश में आ जाते हैं और फिर गलत कार्य कर जाते हैं।
तो अंदर में क्या है? प्रधान रूप से यह सोचना है कि एक मुझे ऐसी आवाज़ है जो सन्मार्ग पर ले जाती है और एक ऐसी आवाज़ है जो कुमार्ग पर ले जाती है। तो मुझे जो सन्मार्ग पर जाने के लिए आवाज़ है, वो आवाज़ सुननी है। तो कैसे मैं पहचानूँ कि कौन सी आवाज़ सुननी है?
जितना भगवान हमको अंदर से बोलते हैं, भगवान बाहर से बोलते हैं:
योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्वन् आचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति।
जो भगवान हैं, अंदर से और बाहर से जीव में उसका अशुभ निकालते हैं। उसके जीव में जो अहंकार है वो निकालते हैं। जितना हम भगवान को दिखा रहे हैं कि मुझे आपके मार्गदर्शन की ज़रूरत नहीं है, उतना भगवान हमको मार्गदर्शन नहीं देंगे। जब हमको पता है कि ये करना है, ये करना नहीं है, उस समय अगर हम जानते हैं कि जो करना नहीं है वो हम करते हैं, तो उतना हम भगवान को दिखा रहे हैं कि मुझे आपका मार्गदर्शन नहीं चाहिए।
भगवान भी रिस्पॉन्सिव (Responsive) हैं
और जब हम दिखा रहे हैं कि भगवान का मार्गदर्शन नहीं चाहिए, तो आप जानते हैं इंटरनेट में जब गूगल होता है, उसके एडवर्टाइजमेंट रिस्पॉन्सिव होते हैं। रिस्पॉन्सिव एड मतलब क्या कि अगर हम एक चीज़ ढूँढते हैं गूगल में, तो उसमें कुछ एड आ जाते हैं। तो उसमें जब एक एड को हम क्लिक करते हैं, तो उसके बारे में और एड आते हैं। और जिस एड को हम क्रॉस करते हैं कि मुझे देखना नहीं है, तो उस बारे में गूगल एड नहीं दिखाता है।
जैसे गूगल रिस्पॉन्सिव है, वैसे भगवान भी रिस्पॉन्सिव हैं। रिस्पॉन्सिव मतलब वो रिस्पॉन्ड करते हैं जिस तरह हम कार्य करते हैं। तो अगर हम भगवान को दिखाते हैं कि मुझे आपका मार्गदर्शन चाहिए, तो वो कैसे दिखाते हैं? वो हम दिखाते हैं कि जब हमको पता है क्या करना है, तब हम वो कार्य करते हैं। अगर मन में आता है कि हम शास्त्र का अध्ययन कर रहे हैं, जप कर रहे हैं, यह अच्छे से हम करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हम जप कर रहे हैं, शास्त्र का श्रवण कर रहे हैं, हर बार मन के लिए लड़ते हैं। पर हम प्रयास करते हैं कि मन को एकाग्र करने, समझने का प्रयास करें, भगवान का स्मरण करें।
जब हमको पता है क्या करना है, उस समय हम वो चीज़ करने का पूरा प्रयास करते हैं, उससे हम भगवान को दिखाते हैं कि मुझे आपका मार्गदर्शन चाहिए। और फिर जब ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि हमको पता नहीं है कि क्या करना है, तब भगवान हमको मार्गदर्शन देते हैं। प्रभुपाद जी कहते हैं, जब व्यक्ति ‘Perplexed’ होता है। Perplexed मतलब कि व्यक्ति को पता नहीं है क्या करूँ, मैं ये करूँ या वो करूँ। और ‘Discouraged’ मतलब कुछ करने की इच्छा नहीं है, कुछ काम नहीं है, मेरी किस्मत ही फूट गई, छोड़ो सब।
तो हम सब के जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि क्या करना है, हमें ये पता नहीं होता। कई बार ऐसे होता है कि ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि मैनेजमेंट की भाषा में बोलते हैं कि जो भी करो उसमें नुकसान है। ये करो कोई समस्या है, ये करो कोई समस्या है। क्या करें कुछ पता नहीं है।
अर्जुन का विषाद और अपशकुन
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
अपनी जो भगवद गीता की शुरुआत में अर्जुन बता रहा है, कैसे अर्जुन का शरीर कांपने लग रहा था, गांडीव उसके हाथ से छूटने लग रहा था, उसकी आँखों से आंसू आ रहे थे, उसके बाल खड़े हो रहे थे। कुछ आचार्यगण बता रहे हैं कि यह सब लक्षण था कि अर्जुन भयभीत हो रहा है, मतलब कि अर्जुन के अंदर में भय आ गया था। कुछ आचार्य बता रहे हैं कि वास्तव में यही सब अपशकुन हैं, अर्जुन भयभीत नहीं हो रहा था क्योंकि अभी तो उसने देखा था कि अपने शत्रुओं को, तो उनको देखके ही ऐसा हो रहा है।
अभी तक कुछ भावनाएं अंदर नहीं आई थीं, पर कभी-कभी कुछ लोग कहते हैं कि यह अपशकुन होता है। अगर कुछ आप यह कर रहे हैं और ऐसे हो गया तो यह अपशकुन है। तो मतलब कि योद्धा युद्ध करने जा रहा है, तो तभी उसको हर जगह पर अमंगल दिखने जा रहा है, ऐसे आसमान से कुछ आंधियां चलने लग गईं, तो यह सब अपशकुन होते हैं।
तो यह जो है, जो अर्जुन को हो रहा था, वो दोनों दृष्टियों से देख सकते हैं। एक है कि अर्जुन भयभीत हो गए थे, उसके कारण यह परिणाम हो गए थे। या अर्जुन देख ही रहे थे, तो जो उधर देख रहे थे तो यह सब अपशकुन हो गए। तो अर्जुन भयभीत हो गए थे, तो अर्जुन को लग रहा था, मैं युद्ध करूँगा तो भी क्या होगा, मुझे अपने रिश्तेदारों को मारना होगा।
कैसे, न कि क्यों? (How, not Why?)
अगर मैं सोचूँ, “मैं तो पहले से भगवान की बहुत सेवा कर रहा हूँ, तो अभी मैं क्या करूँगी आपकी सेवा में?” मैं ये सोच कर चल रहा था कि ऐसे जीवन चलेगा, पर अभी सब बदल गया। अभी मैं कैसे आगे से जाऊँ? जब हम ये सवाल पूछते हैं “क्यों?”, तो हम घुटने टेकने लगते हैं। पर जब हम सोचते हैं “हाँ, कैसे? अभी मैं कैसे आगे जाऊँ?” तो बात अलग होती है।
एक आदमी एक आम के पेड़ के पास गया। वहाँ पे आम का पेड़ था, उसको वो हिला नहीं पाया, आम गिरा नहीं। भगवान मुझे भूख लगी है, मुझे खाना था। वो हिलाता गया, फिर वो आम गिरा नहीं। और उससे बीच क्या हो गया? बाजू के पेड़ से, बाजू में एक सेब का पेड़ था और सेब के पेड़ से एक सेब गिर गया। अभी उसकी अपेक्षा यह आम के लिए थी, उसने सेब को देखा भी नहीं। पर उसकी ज़रूरत क्या है? उसकी ज़रूरत आम नहीं है, उसकी ज़रूरत अन्न (भोजन) है। पर जब वो अपेक्षा क्या कर रहा था, आम की अपेक्षा कर रहा था। तो उसको जो चाहिए था वो मिल गया, पर जिस रूप में उसकी अपेक्षा थी, उसमें नहीं मिला।
तो हमारी अपेक्षा, हमारी प्रतिक्रिया। जब हम अपेक्षा करते हैं, तो अपेक्षा से हम जो देख रहे हैं, हम देखने में संकीर्ण हो जाते हैं। और कई बार हमारी समस्या में हम भगवान से प्रार्थना करते हैं। जब हम देखते हैं कैसे अभी इस परिस्थिति में क्या करूँ? जब हम ये सोचते हैं कि ‘ये ऐसा ही होना चाहिए, ये ऐसा ही नहीं करना चाहिए’, जब हम अपेक्षा इस तरह से करते हैं, तो फिर क्या होता है? भगवान जो हमको मार्गदर्शन दे रहे हैं, हम देख नहीं पाते हैं। हम देख नहीं पाते हैं क्योंकि क्या हो रहा है, हमारी जो दृष्टि है वो संकीर्ण हो गई है। हम एक ही चीज़ में प्रतिक्रिया करते हैं।
नियंत्रण के भाव में भक्ति
तो मतलब उसमें हम भगवान से प्रार्थना भी करते हैं, पर भगवान से प्रार्थना करते समय हम नियंत्रण का भाव रख के प्रार्थना करते हैं, सेवक का भाव रख के प्रार्थना नहीं करते हैं। मतलब क्या कि भगवान जी, ये करना था, अभी ये हो नहीं रहा है, तो आप क्या करो, ये समस्या मुझे निकाल कर दो। तो हम भगवान से पार्टनरशिप करना चाहते हैं पर ये पार्टनरशिप के टर्म्स क्या हैं? “My intelligence and your strength.” हम बोलते हैं कि भगवान के साथ संबंध है, पर क्या संबंध है? मेरी बुद्धि से मैंने ये योजना बनाई है और ये योजना मैं पूरी नहीं कर पा रहा हूँ, तो इसलिए आप क्या करो, आप अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके ये योजना पूरी कर दो।
मतलब मेरी बुद्धि पर आपकी शक्ति, इसलिए हमारी जोड़ी बनी है। पर भगवान से जोड़ी ऐसे नहीं बनती है। जब हम सोचते हैं कि मेरी बुद्धि के साथ ये योजना बनाई है, उसमें जो बाधा आई है, वो भगवान को निकालनी चाहिए, तो उस अपेक्षा के साथ जब हम भगवान की भक्ति करते हैं, तो क्या है? हम भक्ति कर रहे हैं पर हम भक्ति नियंत्रण के भाव में कर रहे हैं। मैं जो भक्ति कर रहा हूँ, उससे कुछ हो नहीं रहा है, पर ऐसा नहीं कि भक्ति से कुछ नहीं हो रहा है। भक्ति का जो उद्देश्य है, योग का उद्देश्य है कि मन को भगवान में एकाग्र करना, हम वो होने ही नहीं देते हैं।
मतलब क्या है कि जब कोई समस्या इतनी बड़ी है कि मैं इसको निकाल नहीं पा रहा हूँ, तो वास्तव में हमारा केंद्र भगवान पे नहीं है, हमारा मन भगवान पे नहीं है, हमारी समस्या पे है। तो हम God conscious नहीं हैं, हम Problem conscious हैं। और Problem conscious होने से हमारी चेतना क्या है, वो समस्या में ही फंसी है। हमारा केंद्र भगवान नहीं, समस्या है।
पर कम से कम भगवान के पास जा तो रहे हैं हम, पर फिर भी वो सही अपेक्षा से नहीं जाते हैं। तो हम जब भगवान मदद करते हैं, हम उनकी मदद को देख नहीं पाते हैं, हम उनकी मदद को स्वीकार नहीं करते हैं।
अगर हम सोचते हैं कि ठीक है, मैं भगवान से बात करता हूँ। अगर हम भगवान का स्मरण करते हैं तो वो मन जो घुटन में लगता है, वो भगवान में लगता है। All the mental energy that is choked by resentment, ये भगवान में लगती है। मन की घुटन कम हो जाती है तो हमारा विचार स्पष्ट होता है। हम ऐसे भी कर सकते हैं, हम एक-एक कदम आगे बढ़ सकते हैं और धीरे-धीरे हम आगे जा सकते हैं। अगर हम 85-100 कदम आगे नहीं देख पा रहे, तो मैं भगवान से प्रार्थना कर सकता हूँ।
कोर्स करेक्शन (Course Correction) और परिस्थिति का सामना
मैं कर सकता हूँ, यह बढ़िया है, यह अच्छा नहीं है, बुद्धि से इसकी जांच करता हूँ। और धीरे-धीरे अंधेरा हो गया है, पावर नहीं है, तो हर फैसला यह सही या गलत ही होगा। कि अगर उस प्लेन को ऐसे जाना है, तो प्लेन ऐसे जाना गलत नहीं है। कभी-कभी हवा के प्रवाह से वो ऐसे जाना चाहते हैं, तो बाद में पता चलता है। जब मैं सोचता था अगर यह एक फैसला गलत होगा, तो मैं पूरा जीवन खराब कर सकता हूँ। एक कदम गलत होगा, यह उसको सीवर कर सकता है। जीवन एक कदम आगे है, आओ और अगर कुछ गलत भी होगा, तो हम Course correction कर सकते हैं। उसके लिए जब हम बढ़ेंगे तो हम क्या होगा, हम धीरे-धीरे जीवन में आगे बढ़ते हैं।
और जब ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि उसका कुछ हल है ही नहीं। अगर किसी को कुछ बीमारी हो गई, इसका कुछ हल है ही नहीं, तो उसके साथ जीवन जीना है। तो तभी क्या होता है? अगर हम भगवान से अपेक्षा करते हैं कि आप ये परिस्थिति को बदल दो, तो फिर अगर भगवान परिस्थिति को बदलते नहीं हैं, तो हम सोचते हैं ये भक्ति का क्या फायदा है? भगवान हैं भी या नहीं? भगवान परवाह करते हैं या नहीं करते हैं? कुछ पता नहीं। हमको ऐसे लगता है कि इससे क्या बुरा है। तो अगर मैं अच्छा जीवन जी रहा था, अब मुझे फ्रैक्चर हो गया और मैं चल नहीं पाऊँगा, तो क्या हो गया, स्वाभाविक रूप से यह बुरा हो रहा है।
पर अगर हम देखते हैं कि ‘बन्धुरात्मात्मनस्तस्य’, जो भी कार्य कर रहा है, उसमें हमारा उद्देश्य क्या है कि मन को मित्र करना। कभी-कभी ऐसी परिस्थिति आती है जिसका भौतिक स्तर पर कोई हल नहीं है। तो फिर उससे मन बहुत घुटन करता है, ऐसे क्यों है, ऐसे क्यों होगा? पर अगर हम देखते हैं कि मैं मन को निग्रह करूँ, तो बाहर से कुछ परिस्थिति बदलेगी नहीं, पर मन को निग्रह करने में हम बहुत बड़ी जीत प्राप्त कर सकते हैं। तो ऐसी परिस्थिति में जब बाहर से बड़ी समस्या आ गई है और उसको हम हल भी नहीं कर सकते हैं, उस समय यदि हम मन को निग्रह कर लेते हैं, वैसे हम बड़ी जीत प्राप्त कर सकते हैं।
क्यों जीत प्राप्त कर सकते हैं? जो मन का स्वभाव था घुटन में लगे रहना और शिकायत करते रहना, उस प्रवृत्ति पर हम नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं। और भविष्य में भी ऐसी परिस्थितियां आएं, कुछ गलत हो जाएगा, तो अगर इतनी बड़ी परिस्थिति में हम मन को निग्रह कर पाएंगे, तो वो समस्या में भी मन का सामना करना हम बहुत अच्छी तरह से कर सकते हैं। पर कभी कोई ऐसे समस्या है कि कुछ सीखने के लिए हैं।
Pointless problems—जब कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है, ऐसे तरह से बर्ताव करता है, कुछ करता है…
मन का नियंत्रण और सेवा भाव
कि यह ऐसा बर्ताव क्यों करता है? क्यों मुझे ऐसे बोलता है? क्यों ऐसे करता है? तो उस समय हम क्या समझ सकते हैं कि ऐसे समय में मन का स्वभाव है शिकायत करना, बोझ होना। पर मैं ऐसे करूँगा तो क्या है, मेरा मन नियंत्रण में नहीं जाएगा। पर अगर ऐसे नहीं करूँगा, मैं मन को नियंत्रण करने का प्रयास करूँगा, तो भले ही वो प्रयास का स्वभाव हो जाता है, पर फिर भी मैं मेरे मन के नियंत्रण में यहाँ से होता हूँ। और उसके द्वारा भविष्य में भी समस्या आए, एक नियंत्रण बनाऊँगा, तो मैं और बहुत से कार्य कर सकता हूँ।
तो इसलिए जब हम भक्ति करते हैं, तो भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण है कि हम हमारा मन भगवान में केंद्रित करते हैं। और जितना हम भगवान में मन केंद्रित करते हैं, उतना क्या होता है, हम जो भी कार्य कर रहे हैं उसको और अच्छी तरह से कर सकते हैं। तो हम देखेंगे कदाचित गीता में ही भगवान उनको ज्ञान देते हैं कि “मैं उनको बुद्धि दूँगा जिससे कि आपको मार्गदर्शन होगा, जिससे कि आप मेरे करीब आ सकोगे।” इसलिए सेवा भाव रखना महत्वपूर्ण है, कि मैं आपकी सेवा कैसे करूँ, यह भाव रखना। हमारे जीवन में कितना भी बड़ा अंधकार या मंज़र हो, उसमें हमको रोशनी देगा और हमें मार्ग दिखाएगा। संसार में हमने चर्चा की, आज शास्त्र जो यहां बता रहा है, अलग-अलग प्रकार के धार्मिक कार्य कर रहे हैं, उन सब का उद्देश्य है मन को नियंत्रण करना और मन को भगवान में एकाग्र करना, समाधि में लगाना।
सांख्य, बुद्धि और भगवान की आवाज़
उस समाधि में, हमें योग शास्त्रों में जो मन के नियंत्रण के अलग रास्ते और ध्यान दिखाए गए हैं। हमको सांख्य में बहुत जाना नहीं है। क्योंकि हमारा जो है, वेदांत और भक्ति हमारा उद्देश्य है। जैसे किसी को फिजिक्स में पीएचडी करनी है, किसी को बायोलॉजी में पीएचडी करनी है, किसी को फिजिक्स के लिए बहुत जानकारी ज़रूरी है। जब हम सांख्य में देखते हैं कि जो मन, बुद्धि, अहंकार ये सब क्या है, इसको हमें हर दृष्टिकोण से देखना है, पर सब कुछ जानने की ज़रूरत नहीं है। जैसे कंप्यूटर में काम करते समय हर चीज़ उसके हार्डवेयर से कैसे काम करती है, ये नहीं देखते हैं।
हम इतना समझते हैं कि अच्छा करने के लिए वो बुद्धि की आवाज़ है, और अच्छा करने के लिए वो भगवान की आवाज़ है। जब हम इतनी बुद्धि करते हैं, तो उतना हमारी बुद्धि के द्वारा भगवान की आवाज़ आती है। और फिर भगवान की आवाज़ हम अंदर से कैसे सुन सकते हैं? तो जब हम बुद्धि की आवाज़ सुनते हैं, तो भगवान हमको अंदर से मार्गदर्शन करते हैं।
घुटन की स्थिति और भगवान से प्रार्थना
और जब ऐसे करते हैं तो क्या करना है हमको समझ नहीं आता है, हर तरह से ऐसे लगता है सब कुछ भी निष्फल होने लगता है, सब कुछ भी बुरा होने लगता है, तभी मन घुटन करने लगता है। और उससे ऐसे लगता है, तो अर्जुन की भी ऐसी ही परिस्थिति मिलती है गीता की शुरुआत में। तो गीता के ज्ञान से भगवान उसको घुटन से बचा रहे हैं।
तो जब ऐसे लगता है कि हर परिस्थिति में क्या करें समझ में नहीं आ रहा है, जब घुटन होने लगती है, तो हमें यहाँ क्या करना है? हमारे स्वभाव को देखना है। कैसे? ‘क्यों है ऐसा?’ ऐसे वह बोलेंगे तो कई बार उसका तुरंत जवाब नहीं है। और तभी कैसे बचना है? ‘भगवान मैं आपका सेवक हूँ, मैं आपकी सेवा कैसे करूँ?’ तो जो घुटन करने वाली परिस्थिति हो सकती है, वो हमारे शरीर से, मन से आ सकती है, लोगों से आ सकती है या निसर्ग से आ सकती है। अगर नहीं कर पाएंगे, हम उससे बहुत बड़े होंगे तो विचलित नहीं कर पाएंगे। क्योंकि तभी हमें जो सेवा भाव का टॉर्च है—’हे भगवान, इस परिस्थिति में आपकी सेवा कैसे करूँ?’ यह हम जब कर रहे हैं, भक्ति कर रहे हैं, उसका उद्देश्य है कि हम भी सेवा भाव जाग्रत करें।
नियंत्रण के भाव में भक्ति
सेवा भाव जाग्रत करना मतलब क्या है कि जिस भी परिस्थिति में हूँ, मैं इसमें आपकी सेवा करता हूँ। कभी-कभी हम भक्ति भी कर सकते हैं, भक्ति की विधियां कर सकते हैं, पर हम भक्ति नियंत्रण के भाव में करते हैं। मतलब हम भगवान से अपेक्षा कर रहे हैं कि ‘मुझे यह विधान चाहिए, मैंने यह विधान किया है, इसके लिए आप इस विधान को पूरा करने की समस्या को आप नियंत्रण करें।’ तो नियंत्रण के भाव में भक्ति करते हैं, तो हम भक्ति क्या करते हैं? क्योंकि हम भगवान के बारे में विचार नहीं करते हैं, समस्या के बारे में विचार करते हैं।
तो भगवान को समस्या से जोड़ना है। हमारी भगवान की शक्ति ऐसे नहीं होती है। इस तरह से हर परिस्थिति, कितनी भी बड़ी विपत्ति के बाद, वो हमें एक मन में नियंत्रण और भगवान की ओर प्रगति करने के लिए एक मौका है। और इस तरह सकारात्मक भाव से हम देखते हैं, तो हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। बहुत कुछ करने के लिए एक परिस्थिति है।
अनिर्णय की स्थिति और जर्नलिंग (Journaling)
कुछ लोग Indecisive (अनिर्णायक) होते हैं, निर्णय नहीं ले पाते हैं। तो ये जो समस्या है, ये मन के लिए हो सकती है या गुणों के लिए हो सकती है। पहले सत्व, रज, तमोगुण का उदाहरण कर सकते हैं। मन के लिए एक डायलॉग होता है। तमोगुण में क्या होता है, पहले कार्य होता है, बाद में विचार उसके बारे में होता है। रजोगुण में कई बार पहले कार्य होता है, बाद में विचार होता है, पहले बोलते हैं ‘ऐसे क्यों बोल दिया?’ सात्विक में विचार पहले होता है, कार्य बाद में होता है।
तो अगर व्यक्ति में फैसला नहीं करने की प्रवृत्ति है, तो एक हो सकता है व्यक्ति सात्विक है, बहुत सोच समझ के कार्य कर रहा है। पर दूसरा हो सकता है व्यक्ति तामसिक है। तो हमें देखना है कि व्यक्ति बाकी जीवन में कैसे कार्य करता है। तो अगर व्यक्ति सात्विक है पर इस परिस्थिति में व्यक्ति का मन बहुत फंसा है, तो हमें कुछ समझना है कि व्यक्ति सात्विक है या तामसिक। तो अलग-अलग कारण होते हैं, पर महत्वपूर्ण है कि सबसे पहले जो विचार मन में घूम रहे हैं, उनको मन से बाहर लेकर आएं।
तो अगर कोई महत्वपूर्ण फैसला है जो हम नहीं कर पा रहे हैं, तो उसको अच्छा है कि एक डायरी में लिख लें। जब जर्नल में हम लिखते हैं, तो Thoughts inside the mind (मन के विचार) बाहर आते हैं। उसके बारे में जर्नल में लिखना अच्छा है। ठीक है, ये बहुत ख़राब है, पर कम से कम कुछ क्लैरिटी मिलती है कि उसके बारे में क्या फैसला लेना है। तो उसको हम एनालाइज कर सकते हैं, उसकी जांच कर सकते हैं और फैसला करना है तो ‘ऐसे करते हैं तो ऐसे होता है, ऐसे करते हैं तो ऐसे होता है।’
और फिर बार-बार उसी के बारे में विचार करते नहीं रहना है। अगर विचार आ गया है, तो सब कुछ उसी के बारे में विचार नहीं करना है। ये विचार आ गया है, उसको वहाँ लिख दो। जब महत्वपूर्ण फैसला है, तो हम हफ्ते में एक बार आधा-एक घंटा विचार करते हैं। और हफ्ते में जो बार-बार सोचा है, वो सब वहाँ लिख दिया है।
वरिष्ठों से मार्गदर्शन
और फिर ऐसे अगर हम एक महीना, दो महीना कर सकते हैं। अगर महत्वपूर्ण फैसला है तो छह महीना कर सकते हैं। और छह महीने के बाद हम देखते हैं कि दृष्टिकोण से मेरे विचार सही नहीं जा रहे हैं। ये पर्याय अच्छा रहा है, ये पर्याय अच्छा नहीं रहा है। तो मतलब क्या है इसका? कि वो जो विचार धारा है, वो केवल एक फ्रस्ट्रेटेड (Frustrated) मन का रिस्पांस नहीं है, वो एक बड़ा निश्चित पैटर्न हो गया है। इसके लिए बोला ‘ये किसी बॉस के लिए बहुत परेशानी है, मैं छोड़ देता हूँ।’ ये समस्या हमेशा रहनी है, तो क्या मैं दूसरा मार्ग निकाल सकता हूँ? या मुझे कौन से आश्रम में जाना है, गृहस्थ आश्रम में जाना है? तो मुझे क्या फैसला करना है?
ऐसे नहीं है कि हमें दूसरों को पसंद नहीं आना, पर फैसला करना है। तो इसलिए अगर हम लिख के रखते हैं उसको, तो फिर हम उसके बारे में स्पष्टता रख सकते हैं। और अगर कई महीनों तक हम देखते हैं विचार वैसे ही रहता है, तो फिर हम समझ सकते हैं कि यह एक पासिंग फेज़ (Passing phase) नहीं है। मन की ऐसे ही इच्छा है, यह पासिंग में नहीं है कि मुझे ऐसे ही कार्य करना है। तो उस पर से हम फैसला कर सकते हैं।
और जब हम इस तरह से हमारे विचार लिख कर बाहर लाते हैं, उसके बाद में हम वरिष्ठों से बात कर सकते हैं। कभी-कभी इस तरह से हम पूछते हैं, हमारे विचारों की क्लैरिटी के बिना जब वरिष्ठों के पास जाते हैं, हमारे खुद के विचार हम बता नहीं पाते हैं। उसके बाद क्या होता है, हम उनके विचार लेकर आते हैं, हम उनका ही समझ करते हैं। वरिष्ठों के पास हमारे विचार लेकर जाते हैं। अगर कोई पेशेंट डॉक्टर के पास जाता है, तो अपनी बीमारी बताता है, वैसे ही हम मार्गदर्शन के लिए जाते हैं। तो हम इस तरह से एक निष्कर्ष पर आ सकते हैं कि ‘ठीक है, मुझे फैसले करने हैं’, तो इस तरह से फैसले कर सकते हैं।
और वो कैसे प्रक्रिया होगी, हर व्यक्ति पर थोड़ा प्रभाव हो सकता है। कुछ व्यक्ति को काफ़ी समय तक रुकना पड़ेगा। हर एक व्यक्ति को ‘मैं मेरे मन और बुद्धि के साथ कैसे जीवन जी सकता हूँ? मेरा मन, बुद्धि, शरीर, इसके साथ कैसे जीवन जी सकता हूँ?’ वो मुझे सीखना है। मुझे सीखना होगा मेरे मन के साथ मुझे जीवन जीना है। मुझे पता है कि मन ऐसे कर सकता है, पर मेरा मन कैसा है, मेरे मन के साथ मुझे कैसे रहना है, यह मुझे ही सीखना है।
रामायण का दृष्टांत: शूर्पणखा और रावण
अकम्पन नाम का एक राक्षस था जो खर-दूषण के युद्ध में था, जो बच के आ गया। अकम्पन ने बताया कि राम ने अपनी शक्ति से सबको मार दिया, तो उसने रावण को सलाह दी कि राम से वैर नहीं लेना था। पर बाद में शूर्पणखा आई। शूर्पणखा ने देखा कि रावण बदला लेने को तैयार नहीं है अकम्पन की बात सुनकर। तो इसलिए शूर्पणखा ने क्या किया? उसने पूरी अपनी ही कहानी बता दी।
क्या बताया उसने? राम ने उसको भगा दिया। ‘तुम उनके पास गई क्यों? तुमने उनको छेड़ा है, इसलिए उन्होंने प्रतिकार किया, तो उनको क्यों दोष देती हो?’ रावण ऐसा सोच सकता था। क्योंकि जब शूर्पणखा उसको शिकायत कर रही है, तो उस भरी सभा में शिकायत करती है, तो रावण उसको तुरंत लक्ष नहीं करता है। तो इसलिए कुछ तरह करके वो रावण को भड़काने का प्रयास करती है ताकि उसकी जो सभा है वो सोचे कि वो युद्ध नहीं करना चाहते हैं।
शूर्पणखा ने उनको बताया कि ‘मैं वास्तव में वहाँ गई थी (सीता को लाने)।’ शूर्पणखा ने बताया कि ‘मैं वहाँ गई थी क्योंकि सीता बहुत सुंदर थी, और मैं सोच रही थी कि सीता तुम्हारे पास आ जाएगी। तुम्हारे लिए मैं ये कर रही थी और तुम्हारे लिए सीता को लाना चाहती थी।’ जब शूर्पणखा ने कहा कि ‘मैं तुम्हारे लिए सीता को लाना चाहती थी, वो तुम्हारे पास जाएगी’, तो रावण प्रभावित हो गया।
जीवन का उद्देश्य और भटकाव
अगर आपके बच्चे कॉलेज में जाते हैं, स्कूल में जाते हैं। तो कॉलेज में कई बार विद्यार्थी जाते हैं, वो विद्यार्थी नहीं होते हैं, वो कामार्थी होते हैं। कोई रोमांस करने के लिए आते हैं, कोई बच्चों के साथ अफेयर करने के लिए आते हैं, तो बहुत कुछ करने आते हैं। तो कैंपस में ऐसे बहुत कुछ चल रहा होता है। तो अगर कोई विद्यार्थी कॉलेज कैंपस में जाएगा और देख रहा है कि ‘यह ऐसे कर रहा है, वो ऐसे कर रहा है’, कैंपस में बहुत कुछ चल रहा होता है। तुम किस लिए आए हो, वो देखो। जैसे हम अगर हमारे बच्चों को बोलते हैं कि ‘आप पढ़ने के लिए जा रहे हो’, तो आपको कुछ पढ़ने के लिए जाना चाहिए।
मृत्यु, मिथ्या अहंकार और भगवान का दर्शन
तो अगर कोई व्यक्ति बहुत बीमार हो गया है, तो उस समय तो मन बहुत परेशान करता है। तो तभी कैसे हम उस परिस्थिति का सामना कर सकते हैं? तो साधन के लिए यह वास्तव में जब कोई व्यक्ति को फेटल डिजीज (Fatal disease) हो गया है, बहुत बीमार हो गया है, तो उसके बारे में बताया गया है। पर वही जो विश्लेषण है, हम बहुत सी स्थितियों में मिला सकते हैं। जब ऐसे कोई चीज़ होती है जो बहुत बुरी हो गई है, तो उस समय हमारा मन अलग-अलग दशाओं से गुजरता है। अंत में आता है एक्सेप्टेंस (Acceptance)। एक्सेप्टेंस मतलब है कि ‘ठीक है, जो हो गया, हो गया।’
जो व्यक्ति मृत्यु की शय्या पर होता है, डॉक्टर बोलते हैं कि इनकी कोई आशा ही नहीं है, पर फिर भी वो आत्मा शरीर नहीं छोड़ता है। उनकी इच्छा होती है बच्चे, परिवार, वो बहुत समय से बिछड़े हैं। तो उनकी इच्छा होती है कि ‘मुझे एक इमोशनल क्लोजर (Emotional closure) चाहिए।’ बेटा पूना में है तो बॉम्बे चला आए। और मान लीजिए अगर ऐसा कुछ हो कि ऐसी कोई परिस्थिति या ऐसा कोई यंत्र हो, जिससे कि वो बच्चे की शक्ल सिर्फ वो टीवी स्क्रीन पर देखते हैं। मतलब उसको देखने की क्षमता तो है, पर उसकी दृष्टि उसमें ही बंध जाती है। तो वो जो ऐसा क्लोजर कहते हैं जो उसकी आँखों को सीधा उस टीवी स्क्रीन पर ले जाता है। तो वो जो है, वो मिथ्या अहंकार है। मतलब आत्मा को दूसरी चीज़ों के बारे में जानने की शक्ति है, पर जब मिथ्या अहंकार होता है, तो वो अपनी शक्ति भूल जाता है।
तो इसलिए हमें मन, चित्त को भगवान में लगाना है। इसका मतलब क्या है कि इस भौतिक जगत में हमें बहुत कुछ दिख सकता है, पर इस भौतिक जगत में अगर हम भगवान की भक्ति के बारे में सोचते हैं, तो इसके बारे में चिंतन कर सकते हैं। हम हमारे कंप्यूटर पर कुछ भी देख सकते हैं, या हम भगवान का दर्शन देख सकते हैं। तो अगर हम भगवान का दर्शन देख सकते हैं, तो क्या होगा? इसलिए दूसरी चीज़ें न देखो। तो हमारे मन को भगवान में लगाना, हमारे मन से भगवान का दर्शन करना ही लक्ष्य है।