PROTECT – Seven ways Krishna protects (Hindi)
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Lecture Summary
यह प्रवचन मुख्य रूप से श्रीमद् भागवतम में कुंती महारानी की प्रार्थनाओं और संकट के समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने भक्तों की रक्षा करने के प्रसंगों पर आधारित है। वक्ता ने अंग्रेजी शब्द PROTECT (प्रोटेक्ट) के सात अक्षरों का उपयोग करते हुए यह समझाया है कि भगवान किस प्रकार अलग-अलग 7 तरीकों से अपने भक्तों का संरक्षण करते हैं:
- P – Personally (व्यक्तिगत रूप से): कभी-कभी भगवान स्वयं आकर रक्षा करते हैं। जैसे कुरुक्षेत्र के युद्ध में, जब भीष्म पितामह अर्जुन पर भारी पड़ रहे थे, तब भगवान कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर रथ का पहिया उठा लिया और अर्जुन की रक्षा के लिए भीष्म की ओर दौड़ पड़े।
- R – Representative (प्रतिनिधियों द्वारा): भगवान अधिकांशतः सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय अपने भक्तों या प्रतिनिधियों के माध्यम से रक्षा करते हैं। जैसे लाक्षागृह (वारणावत) के षड्यंत्र में भगवान स्वयं नहीं आए, बल्कि उन्होंने विदुर जी को माध्यम बनाकर पांडवों को सुरक्षित बाहर निकाला।
- O – Omnipotence (सर्वशक्तिमत्ता/चमत्कार): भगवान अपनी असीमित शक्ति से अकल्पनीय चमत्कार भी करते हैं। जैसे द्रौपदी चीरहरण के समय साड़ी को असीमित कर देना। आधुनिक समय में भी इसके उदाहरण मिलते हैं, जैसे लंदन में जॉर्ज हैरिसन (George Harrison) द्वारा ‘कृष्णा बुक’ के छपने के लिए दान देना, जो अचानक हुई एक चमत्कारी घटना (बिना मौसम बिजली कड़कना) के बाद हुआ।
- T – Teachings (शिक्षाओं द्वारा): भगवान की शिक्षाएं जीवन में एक ‘लक्ष्मण रेखा’ या सुरक्षा बाड़ की तरह काम करती हैं। इन शिक्षाओं (जैसे भगवद्गीता का ज्ञान) का पालन करना कोई बंधन नहीं, बल्कि सबसे बड़ा संरक्षण है। जो इन्हें नहीं मानता, वह विपत्ति में पड़ता है।
- E – Empowerment (शक्ति प्रदान करना): भगवान अपने भक्तों के भीतर विशेष शक्ति या क्षमता भर देते हैं। इसका उदाहरण भीम हैं, जिन्हें भगवान की कृपा से बचपन से ही अपार शारीरिक शक्ति प्राप्त थी, जिसके बल पर उन्होंने बकासुर जैसे भयानक असुर का खेल-खेल में वध कर दिया।
- C – Circumstances (परिस्थितियों का समन्वय): भगवान परिस्थितियों को इस प्रकार घुमा देते हैं कि संकट ही वरदान बन जाता है। जैसे दुर्योधन ने भीम को ज़हर देकर नदी में फेंका, लेकिन वहाँ जहरीले साँपों के काटने से दोनों ज़हर आपस में कट गए। परिणामस्वरूप भीम नागलोक पहुँचे जहाँ उन्हें हज़ारों हाथियों का बल देने वाला अमृत पीने को मिला।
- T – Time (समय की प्रतीक्षा): कभी-कभी भगवान की योजना में समय लगता है और भक्त को सब्र रखना पड़ता है। जैसे अत्यंत शक्तिशाली होने के बावजूद पांडवों को अपना राज्य पाने के लिए 84 वर्ष संघर्ष करना पड़ा। इसी तरह श्रील प्रभुपाद को भी अपनी मेहनत का फल देखने के लिए 46 वर्ष तक इंतज़ार करना पड़ा। सब्र ही सच्ची श्रद्धा का प्रमाण है।
मुख्य निष्कर्ष: प्रवचन का मुख्य संदेश यह है कि एक सच्चा भक्त कभी भगवान से अपनी रक्षा के लिए चमत्कारों की मांग नहीं करता। वह केवल एक ही प्रार्थना करता है— “हे प्रभो, चाहे कितनी भी विपत्ति आए, मुझे बस आपकी सेवा करने की शक्ति दें।” भौतिक जगत में विपत्तियां और दुख (जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु) आना स्वाभाविक है, लेकिन एक भक्त दुखों के बीच भी कृतज्ञ रहता है क्योंकि वह जानता है कि आध्यात्मिक स्तर पर भगवान सदैव उसे सुरक्षा और आश्रय प्रदान कर रहे हैं।
Full Transcription
श्रीमद् भागवतम मंगलाचरण
यशोदानन्दन व्रजजनरंजन, यमुनातीरवनचारी।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥
कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः॥
उत्तरोवाच –
पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्॥
उत्तरा ने कहा – पाहि पाहि (रक्षा करें) महायोगी (सर्वोच्च योगी) देवदेव (देवों के भी देव) जगत्पते (हे जगत के स्वामी) नान्यं (दूसरा) त्वद (तुम्हारे अतिरिक्त) अभयं (भय से रहित होने का भाव) पश्ये (देखती हूँ) यत्र (जहाँ) मृत्युः परस्परम् (इस द्वैत जगत में)।
अनुवाद तथा तात्पर्य कृष्णकृपामूर्ति श्रीश्रीमद् अभयचरणारविन्द भक्तिवेदान्त स्वामी श्रील प्रभुपाद जी के द्वारा। उत्तरा ने कहा – हे देवों के देव, जगत के स्वामी, आप सबसे महान योगी हैं। कृपया मेरी रक्षा करें क्योंकि आपके अतिरिक्त मुझे इस द्वैतपूर्ण जगत में मृत्यु के पाश से बचाने वाला अन्य कोई नहीं है। यह भौतिक जगत द्वैतपूर्ण है जबकि परम धाम एकरूप है। द्वैतपूर्ण जगत पदार्थ तथा आत्मा से निर्मित है जबकि परम जगत पूर्णतया आत्मा है, जिसमें भौतिक गुणों का लेश भी नहीं पाया जाता। इस द्वैतपूर्ण जगत में प्रत्येक व्यक्ति जन्मते ही जगत का स्वामी बनने का प्रयास करता है जबकि परम जगत में भगवान ही परमेश्वर हैं और अन्य सभी उनके सेवक हैं। द्वैतपूर्ण जगत में प्रत्येक व्यक्ति अन्य सबों से ईर्ष्या करता है और पदार्थ तथा आत्मा के द्वैत अस्तित्वों के कारण मृत्यु अनिवार्य है। शरणागत जीव के लिए भगवान ही एकमात्र अभय के दाता हैं। भगवान के चरणकमलों की शरण ग्रहण किये बिना कोई भी इस जगत में अपने को मृत्यु के क्रूर हाथों से नहीं बचा सकता है।
श्रीरूपं साग्रजं सहगणरघुनाथान्वितं तं सजीवम्।
साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्यदेवम्।
श्रीराधाकृष्णपादान् सहगणललिताश्रीविशाखान्वितांश्च॥
नमः ॐ विष्णुपादाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिवेदान्तस्वामिन् इति नामिने॥
नमस्ते सारस्वते देवे गौरवाणीप्रचारिणे।
निर्विशेषशून्यवादी पाश्चात्यदेशतारिणे॥
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥
हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते॥
तप्तकांचनगौरांगी राधे वृन्दावनेश्वरी।
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये॥
वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
भागवतम में रक्षा के तीन महा संकट
हरे कृष्णा! तो आज हम श्रीमद् भागवतम के जो दूसरा महा संकट का प्रसंग है, उस पर चर्चा कर रहे हैं। पहला प्रसंग जो था, जब अर्जुन के ऊपर ब्रह्मास्त्र आ रहा था, अश्वत्थामा ने छोड़ा हुआ, और तभी प्रार्थनाएं अर्पण करते हैं। तो अर्जुन तीन श्लोक वहाँ पे बोलते हैं और फिर भगवान से पूछते हैं कि क्या है? कृपया मुझे बताओ और मैं क्या करूँ ये बताओ। तो वह पहली विपत्ति और पहली प्रार्थनाएं थीं।
ये जो उत्तरा बोल रही हैं, ये दूसरी प्रार्थनाएं हैं। ये दोनों प्रार्थनाएं बहुत संक्षिप्त हैं। जो विस्तारित प्रार्थनाएं हैं, अभी इसी अध्याय के अठारहवें श्लोक से शुरू होंगी। अठारहवें श्लोक से बयालीसवें (42) श्लोक तक कुंती महारानी की पच्चीस (25) श्लोकों की प्रार्थनाएं हैं और यह बहुत विख्यात प्रार्थनाएं हैं। इसलिए प्रार्थनाओं के आधार पर इस अध्याय को नाम दिया है ‘कुंती महारानी की प्रार्थनाएं’।
और उसके बाद में जो विस्तारित प्रार्थनाएं वो आती हैं भीष्म पितामह की, जिसे अभी परमपूज्य महाराज चर्चा कर रहे हैं विस्तारित रूप से। तो वो प्रार्थनाएं दो विभाग में हैं। पहला विभाग जो है, जब पहले अर्जुन, युधिष्ठिर और बाकी सब पांडवों को सांत्वना देते समय भीष्म पितामह कुछ भगवान की महिमा करते हैं और भगवान के अचिन्त्य तत्व की महिमा करते हैं। फिर उसके बाद में विस्तारित उपदेश देते हैं, वो युधिष्ठिर महाराज को राजधर्म पर। राजधर्म जो है महाभारत का, महाभारत में एक करोड़ श्लोक हैं (Hundred Thousand), उसमें से लगभग-लगभग तीस हजार (30,000) श्लोक जो हैं, वो भीष्म पितामह का उपदेश है। तो हम कल्पना कर सकते हैं मृत्युशय्या पर बैठे हुए इतना विस्तारित रूप से जो भाषांतर, प्रवचन करना है कि कितना कठिन होगा वो। तो उसके बाद में इति मतिर् उपकल्पिता, भीष्म पितामह बोलते हैं कि अभी मैं मेरी चेतना सब चीजों से पीछे ले रहा हूँ और एकाग्र होकर मैं भगवान पर ध्यान करने वाला हूँ।
तो हम इन तीन प्रसंगों में देखेंगे कि जब अर्जुन पर संकट आता है, अर्जुन प्रार्थना करते हैं। उत्तरा पर संकट आता है, उत्तरा प्रार्थना करती हैं। भीष्म पितामह पर संकट क्या है? अभी बहुत दर्द हो रहा है, मृत्यु सामने है, वह प्रार्थना करते हैं। पर इन तीनों में भगवान की प्रतिक्रिया अलग-अलग होती है। जब अर्जुन प्रार्थना करते हैं, तो भगवान अर्जुन को बोलते हैं कि तुम युद्ध करो और तुम अपना ब्रह्मास्त्र निकालो। उनको मार्गदर्शन देते हैं। जब उत्तरा प्रार्थना करती हैं, तो भगवान अर्जुन को नहीं बोलते हैं, भगवान खुद स्वयं एक कवच बनकर उत्तरा के गर्भ का संरक्षण करते हैं। और जब भीष्म प्रार्थना करते हैं, तभी भगवान वास्तव में एक तरह से देखा जाए तो भीष्म देव की मृत्यु होती है। तो क्या भगवान उनका संरक्षण नहीं करते हैं? या किसी और प्रकार से करते हैं?
तो भागवतम के इन तीन अध्यायों में, शुरुआत के ही तीन अध्याय हैं, असल भागवतम की जो कथा शुरू हो रही है, सातवाँ, आठवाँ, नवाँ अध्याय, इन तीनों में ही हम अलग-अलग प्रकार से भगवान का संरक्षण देखते हैं।
भगवान द्वारा संरक्षण के सात तरीके (PROTECT)
तो इस श्लोक में जो उत्तरा प्रार्थना कर रही हैं कि हे प्रभो, आप मेरा संरक्षण करो। आपके अलावा ‘नान्यं त्वदभयं पश्ये’, कि आपके अलावा अभय देने वाला ना अन्यत्व, कि आपके अलावा और कोई नहीं है इस जगत में संरक्षण देने वाला। तो हम आज, ये देखेंगे कैसे भगवान अलग-अलग पद्धतियों से संरक्षण देते हैं।
तो सात पद्धतियां हम देखेंगे उसके बारे में, और महाभारत से जो प्रसंग हैं, उसके बारे में हम थोड़ी संक्षेप में चर्चा करेंगे हर एक प्रसंग के लिए। तो इसका भाव क्या है, ऐसा नहीं है कि भगवान इन सात पद्धतियों से ही संरक्षण देंगे। भगवान और भी पद्धतियों से संरक्षण दे सकते हैं, पर हम इससे समझ सकते हैं कि भगवान का संरक्षण अलग-अलग पद्धति से आता है। तो ये जो सात हैं, इसको समझने के लिए जो इंग्लिश शब्द आता है – PROTECT (प्रोटेक्ट)। प्रोटेक्ट मतलब संरक्षण। तो इसके जो सात अक्षर हैं – P-R-O-T-E-C-T। तो इसके अनुसार ये सात पद्धतियां हैं जिससे भगवान संरक्षण करते हैं।
P – Personally (व्यक्तिगत रूप से संरक्षण)
तो ‘P’ है पहला – Personally (पर्सनली)। पर्सनली मतलब व्यक्तिगत रूप से। वे स्वयं आते हैं और संरक्षण करते हैं। तो कुंती महारानी जब अपनी प्रार्थनाएं शुरू करती हैं, तो उनकी प्रार्थनाएं अठारहवें श्लोक से शुरू होती हैं और चौबीसवें श्लोक में वो स्मरण करती हैं कि हे प्रभो! कितने सारे संकट आये थे हमारे जीवन में, और उन सब में आपने हमारा संरक्षण किया। ‘विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शनाद् असत्सभाया वनवासकृच्छ्रतः’। पुरुषाददर्शनाद् मतलब बड़े बकासुर आये थे जो मानवों को खा जाते थे, उनके से। तो इस प्रसंगों में अगर हम देखते हैं, कई बार भगवान ने संरक्षण कैसे किया? ‘मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो’, कि जब युद्ध हो रहा था तो अनेक बार आपने हमारा संरक्षण किया।
तो युद्ध में जैसे अभी प्रवचन में महाराज बता रहे थे कि जब द्रोण, दुर्योधन और अर्जुन को चुनाव करना था, तो दुर्योधन ने सोचा कि ये श्रीकृष्ण क्या करेंगे? वो अकेले हैं और युद्ध भी नहीं करने वाले हैं। तो फिर क्या फायदा है उसका? पर ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब भगवान भले ही अकेले हों और कुछ भी नहीं कर रहे हों, फिर भी उन्होंने बहुत कुछ किया। न केवल बहुत कुछ किया, सब कुछ किया।
तो बर्बरीक को ऐसा वर चाहिए था कि मैं देखना चाहता हूँ कि ये पूरे युद्ध को कैसे… युद्ध, क्या होता है युद्ध में। तो रणभूमि के बाजू में वो एक पहाड़ के ऊपर स्थित होकर सारा युद्ध देख रहा था। उसके बाद में उसको पूछा गया कि आपने युद्ध में क्या देखा? तो क्या हुआ, कैसे युद्ध हो गया? किसने किससे युद्ध किया, कौन सा योद्धा आपको सबसे अच्छा लगा? लोग पूछते हैं। तो उसने कहा मुझे तो सिर्फ भगवान का चक्र दिख रहा था।
तो व्यक्तिगत रूप से भगवान ने ज्यादा हस्तक्षेप नहीं किया, पर फिर भी कुछ प्रसंग हैं। जैसे भीष्म पितामह का प्रसंग था, ऐसे उन्होंने स्वयं, जब अर्जुन युद्ध नहीं कर रहे थे पूरे उत्साह के साथ, तो भगवान ने सोचा कि अभी तो मुझे ही कुछ करना पड़ेगा, नहीं तो न केवल अर्जुन का वध हो जाएगा, सारे पांडवों का वध हो जाएगा भीष्म पितामह द्वारा। तो भगवान ने क्या किया? भगवान सोचे, और फिर वो कूद गए, और कूद के दौड़ने लग गए सीधा भीष्म पितामह की ओर।
तो जब तलवार से युद्ध होता है, तो दो योद्धा आमने-सामने होते हैं, पास होते हैं। पर जब धनुष से युद्ध होता है, थोड़ा अंतर होता है दोनों में। धनुष से, तो इसलिए भीष्म के रथ में और अर्जुन के रथ में अंतर था। तो भगवान कूद के दौड़ने लग गए। तो इसी प्रसंग का भीष्म पितामह आज स्मरण करते हैं – ‘हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः’। वो कहते हैं, हरिरिव हन्तुम्, कि जैसे शेर होता है, किसी हाथी का वध करने के लिए दौड़ते हुए आता है। जब आता है तो क्या होता है, ‘गतोत्तरीयः’, तो कहते हैं, भगवान जब आ रहे थे तो आपकी जो उत्तरीय (चादर) थी, वो गिर गई।
और जब भगवान दौड़ने लग गए तो ऐसे बताया गया है कि जब भगवान जा रहे थे तेजी से, तो उन्होंने सोचा, अभी मुझे अर्जुन को बचाना है, कैसे बचाना है? तो इतना चिंता और उत्साह था कि तुरंत कूद गए वो। और फिर वो देखे कि अभी क्या लूँ मैं भीष्म पितामह का वध करने के लिए? तो फिर उन्होंने अपना खुद का सुदर्शन चक्र क्यों नहीं लाया? वो इतने भाव विभोर थे कि सुदर्शन चक्र को बुलाने के लिए भूल गए। तो क्या हो गया, उन्हें वहाँ पे एक रथ का चक्र दिख गया। चक्र शस्त्र है, चक्र के रूप में उसे उठा लिया।
और फिर भगवान की ऐसी शक्ति है कि जब भगवान ने शिशुपाल का वध किया, तो शिशुपाल के पास जाने के लिए उन्हें दौड़ने की ज़रूरत नहीं थी, सिर्फ वहीं से चक्र छोड़ दिया, चक्र जाकर सिर काट दिया। पर जब भगवान भीष्म पितामह को मारने जा रहे थे, तो उन्होंने चक्र छोड़ा नहीं, वो दौड़ते हुए उनके पास गए। और दौड़ते हुए क्यों गए उनके पास? क्योंकि भगवान को चिंता थी कि अगर ये चक्र मिस हो जाएगा, तो क्या होगा! तो इसलिए, किसी को अगर गोली मारनी हो तो पास जाओ, तो निशाना अच्छा लगता है। तो इसलिए, भगवान दौड़ने लग गए।
और दौड़ के लगभग, वो काफी अंतर तो चले गए, और तब अर्जुन को क्या हो गया? भगवान ने तो वचन लिया था कि कभी मैं शस्त्र नहीं उठाऊंगा। तो भले ही ये पहिया कोई शस्त्र नहीं है, पर फिर भी लोग सोचेंगे कि निंदा करेंगे भगवान की, मैं वो सहन नहीं कर सकता। इसलिए, वो जोर से चिल्लाने लग गए कि ‘हे भगवान कृष्ण, रुक जाओ!’ पर भगवान कृष्ण रुक नहीं रहे थे, सिर्फ वो भीष्म को देख रहे थे और चक्र से सोच रहे थे।
तो फिर, अर्जुन कूद गए, और अर्जुन दौड़ने लग गए भगवान के पीछे। पर भगवान इतना तेज दौड़ रहे थे कि अर्जुन उनके पास पहुँच भी नहीं पाए थे, भगवान भीष्म पितामह के बहुत करीब चले गए थे। तभी अर्जुन ने एक लॉन्ग जंप (Long Jump) लगा दिया, जोर से कूद गए, और सीधा भगवान के पैरों पर गिर गए, और उनका पैर पकड़ लिया। पर पैर पकड़ लिया, पर भगवान का दौड़ने का प्रवाह इतना था कि अर्जुन उनके पैर में लगे हुए, घसीटते-घसीटते वो दौड़ते चले गए। हाँ, फिर अर्जुन ने सोचा इस भगवान को रोकना ही है। तो उनके विशाल पैर थे, तो उनके पैर उठाये दोनों पैर और जोर से जमीन पर मारे। जोर से जमीन पर मारे तो क्या हो गया, जमीन में गड्ढा हो गया और उनके पैर उस गड्ढे में चले गए। तो भगवान दौड़ रहे थे, अर्जुन के पैर, तभी भगवान थोड़े शांत हो गए।
तो यहाँ पर हम देखते हैं प्रसंग कि कैसे भगवान व्यक्तिगत रूप से अर्जुन की सुरक्षा करने के लिए आ जाते हैं। पर अगर हम पूरा महाभारत देखेंगे, तो व्यक्तिगत रूप से अधिक बार नहीं आते भगवान। तो हमें ऐसे नहीं अपेक्षा करनी चाहिए कि अगर मैं कुछ प्रार्थना करता हूँ, कोई संकट आ गया है, तो भगवान को व्यक्तिगत रूप से आना चाहिए। तो यह एक पद्धति है और युद्ध में एक बार भगवान ने ऐसे दिखाया है।
R – Representative (प्रतिनिधियों द्वारा संरक्षण)
और जो दूसरा है कि ‘PROTECT’ में हम देख रहे हैं – ‘P’ के बाद ‘R’। ‘R’ यानी Representative (रिप्रेजेंटेटिव), उनके प्रतिनिधि। तो भगवान कई बार जो रक्षण करते हैं, वो स्वयं नहीं करते हैं, अपने प्रतिनिधियों के द्वारा करते हैं। और अगर हम ये श्लोक देखें कुंती महारानी का ‘विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शनाद्’, तो एक तरह से देखेंगे तो ‘महाग्नेः’ जब वारणावत का युद्ध… वारणावत में जलाए गए (लाक्षागृह), तो उसमें भगवान कहीं थे नहीं। एक तरह से देखा जाए तो कृष्ण तो द्वारका में थे उस समय। और भगवान सीधे संरक्षण के लिए नहीं आये थे। पर फिर कुंती महारानी कह रही हैं कि आपने संरक्षण किया। तो भक्त देखते हैं कि किसी भी तरह से अगर मेरा संरक्षण हो रहा है, तो अंततः यह भगवान की कृपा है।
तो वहाँ पर उनका संरक्षण कैसे हुआ था? विदुर की मदद से। विदुर बड़े चौकन्ने थे। और विदुर समझ गए कि धृतराष्ट्र जो है, उसको अपने जो पांडव हैं, उनके प्रति इतना स्नेह कैसे हो गया है? धृतराष्ट्र ने क्या बताया पांडवों को? कि जो वारणावत है, वहाँ पर बहुत सुन्दर महल है और वहाँ पर बहुत उत्सव होने वाला है। तो क्यों ना आप जाकर वहाँ पर उत्सव में सम्मिलित होकर आनंद लो। और जब जा रहे हो, तो वहाँ पर हमारी जो प्रजा है वो भी प्रसन्न हो जाएगी, उनका भी कैसे राजभार चल रहा है आप निरीक्षण कर सकते हो। और जो कर (Tax) मिल रहा है, वो भी ले सकते हो और आप उस आनंद में भी सम्मिलित हो सकते हो।
तो विदुर तुरंत चौकन्ने हो गए। उन्होंने सोचा कि अगर इतने आनंद की ही बात है, तो फिर धृतराष्ट्र तो कभी पांडवों का आनंद नहीं चाहते हैं, वह अपने ही पुत्रों का आनंद चाहते हैं। तो धृतराष्ट्र उनको क्यों नहीं भेज रहे हैं वहाँ पर? तो उन्होंने सोचा, और फिर विदुर के जासूस थे, जासूस के जरिये उनको पता चल गया कि यहाँ पर लाक्षागृह का षड्यंत्र बनाया गया है। और फिर उन्होंने, विदुर ने चौकन्ना कर दिया। ना केवल उन्होंने चौकन्ना किया, पर बाद में उन्होंने कई योजनाएं बनाईं।
उन्होंने ऐसी योजनाएं बनाईं, एक बड़ा रहस्य है। उन्होंने संदेश दिया कि जब जा रहे थे वो हस्तिनापुर छोड़ के, तभी उन्होंने ऐसा संदेश दिया कि – ‘जो व्यक्ति जानता है कि जो शस्त्र शरीर को काटते नहीं हैं, उनसे भी मृत्यु होती है, वह सुरक्षित रहेगा। और जो अग्नि सबको जलाती है, वह जो सांप और जानवर जमीन के अंदर चले जाते हैं उनको नहीं जलाती है, वह सुरक्षित रहेगा।’ और ये भी उन्होंने किसी साधारण भाषा में नहीं बोला, वहाँ के जो लोगों की ग्रामीण भाषा थी, जिसे प्राकृत भाषा कहते हैं, उसमें बताया उन्होंने।
तो कुंती सोचने लगीं कि क्या बता रहे हैं? पर युधिष्ठिर बुद्धिमान थे, युधिष्ठिर ब्राह्मण थे, फिर भी राजनीति के बारे में उनको ज्ञान था, तो समझ गए क्या होने वाला है। और फिर बाद में, तो विदुर ने सबसे पहले उनको चौकन्ना किया। और फिर बाद में विदुर ने क्या किया था? ऐसे एक प्रशिक्षित व्यक्ति को भेजा था कि वो उस महल से पूरा एक गुफा (सुरंग) बना दे। और न केवल उसने गुफा बनाई थी, वो गुफा जो वहाँ से जंगल में निकलती थी, जंगल के परे जो नदी थी, उस नदी में एक नाविक को भी रखा था उन्होंने। कि जब पांडव निकलेंगे वहाँ से, तो वो नाविक उनको मदद करेगा और फिर वहाँ से वो बचके निकल जाएंगे।
तो यहाँ पर कहने का तात्पर्य क्या है कि यहाँ पर डायरेक्टली अगर हम देखें, तो भगवान का कोई हस्तक्षेप नहीं दिखाई देता है। पर कुंती महारानी ये देख रही हैं कि भगवान ने ही ये कार्य किया है। तो अधिकांश रूप से हमारे जीवन में हमें जो संरक्षण मिलेगा, वो भगवान के प्रतिनिधियों के द्वारा ही मिलेगा।
प्रभुपाद जी के लिए चेतना थी कि जब वे जलदूत पर जा रहे थे, तो कई लोगों ने उन्हें हतोत्साहित किया और उनको कहा कि आप अगर अमेरिका में जाओगे, तो वहाँ पर आपको शाकाहारी अन्न नहीं मिलेगा। आप तो वैष्णव संन्यासी हो, वहाँ पर रहोगे कैसे? तो फिर प्रभुपाद जी का बड़ा संकल्प था, दृढ़ संकल्प। उन्होंने कहा कि ठीक है, मैं तो वहाँ पर सब्जी खाकर जी लूँगा। पर जब वह नाव पर जा रहे थे, अब नाव पर क्या करेंगे? तो उन्होंने… सुमति मोरारजी तो मालिक थीं जलदूत की, तो उन्होंने कैप्टन पांड्या को बता दिया था कि ये वैष्णव संन्यासी हैं, इनके लिए आप पर्याप्त शाकाहारी अन्न रखें।
तो प्रभुपाद जी अपनी डायरी में लिखते हैं, बड़ी विशेष बात लिखते हैं। क्या है? कि ‘मैं भगवान कृष्ण का कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने सुमति मोरारजी के हृदय से उनको मार्गदर्शन किया कि ये सारी योजनाएं बना दें।’ तो वो सुमति मोरारजी के प्रति कृतज्ञ हैं, पर वो क्या देख रहे हैं? सुमति मोरारजी कैसे कर रही हैं? भगवान की योजना के द्वारा, भगवान मार्गदर्शन कर रहे हैं। तो जब हमारे जीवन में कोई समस्या आती है, कोई संकट आता है, तो फिर अधिकांश रूप से हमें मार्गदर्शन कहाँ से मिलेगा? भक्तों के द्वारा मिलेगा, भगवान के प्रतिनिधियों के द्वारा मिलेगा। और अगर हम ऐसे सोचते हैं कि ‘नहीं-नहीं-नहीं, भगवान डायरेक्टली मेरे जीवन में आने चाहिए,’ वैसे अधिकांश रूप से नहीं होता है।
आपको भी वह कहानी पता होगी। एक बार एक जगह बाढ़ आ गई थी। और वहाँ पर एक व्यक्ति बैठा था अपने घर में। सब लोग दौड़ रहे थे, ‘अभी निकलो!’ तो बाढ़ इतनी ऊपर आ गई कि वो अपनी छत पर चले गए थे, और छत पर भी पानी आने लग गया था। तो ऊपर से एक हेलीकाप्टर आ गया और हेलीकाप्टर से एक रस्सी फेंकी गई। बोला गया कि ‘अब यहाँ से आपको बचना है तो यही मार्ग है।’ तो वो बोले, ‘नहीं, मैं भगवान का भक्त हूँ, भगवान मुझे बचा लेंगे।’ हाँ, फिर वैसे ही बैठे रहे। और फिर क्या हो गया? अंत में बाढ़ आ गई और डूबने लग गए वो। ‘भगवान आपने मुझे बचाया क्यों नहीं?’ तभी आकाशवाणी हुई, तो बोले, ‘मैंने ही सारे तीन लोगों को भेजा था। मैंने ही पहले चेतावनी देने वाले लोगों को भेजा, फिर नाविक को भेजा, फिर हेलीकाप्टर वाले को भेजा। तुमने नहीं सुना, अब दोष किसका है?’ तो इसलिए भक्त कभी ऐसा भाव नहीं रखते हैं कि भगवान मेरे संरक्षण के लिए कुछ चमत्कार करना चाहिए। भगवान साधारणतः अपने भक्तों के द्वारा हमारा संरक्षण करते हैं। तो यह है उनके प्रतिनिधियों के द्वारा।
O – Omnipotence (सर्वशक्तिमत्ता द्वारा चमत्कार)
और फिर जो ‘O’ है, ‘O’ इंग्लिश में हम बोलते हैं Omnipotence (ओम्निपोटेंस)। Omnipotence means सर्वशक्तिमत्ता। जो भगवान की विशाल शक्ति है, उसके द्वारा वो कभी चमत्कार भी कर सकते हैं। तो अपने चमत्कार की अपेक्षा भक्त नहीं करते हैं, पर भगवान चमत्कार करते भी हैं कभी-कभी।
और यह हम देखते हैं ‘असत्सभाया’। ‘असत्सभाया’ मतलब कि जब द्रौपदी का वस्त्र हरण हो रहा था, तो भगवान ने क्या किया? भगवान ने अपनी असीमित शक्ति के द्वारा द्रौपदी का जो वस्त्र था, साड़ी थी, उसको असीमित लंबा बना दिया। असीमित लंबा बना दिया। कभी-कभी हमारे चित्र देखते हैं तो वो उसका जो दृष्टांत जो करते हैं, दृष्टांत दिखाते हैं, वो अलग-अलग तरीके से दिखाते हैं। कभी-कभी वो दिखाते हैं कि वहाँ पर कृष्ण भगवान स्वयं हैं और हाथ ऊपर करके हँस रहे हैं और प्रसन्न मुद्रा से वो साड़ी दे रहे हैं। कभी-कभी दिखाते हैं कि वो चक्र है वहाँ पर, और चक्र से साड़ी आ रही है। कभी-कभी दिखाते हैं एक ज्योति है, वहाँ से साड़ी आ रही है।
तो वास्तव में क्या हुआ कि किसी को समझा नहीं कि कृष्ण भगवान थे। पर कभी किसी ने वहाँ पर कृष्ण को देखा नहीं। वो साड़ी कहाँ से आ रही है, किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा था। दुशासन खींचे जा रहा था, खींचे जा रहा था, खींचे जा रहा था, पर वो साड़ी कभी अंत ही नहीं हो रही थी। तो सब लोग देख रहे थे और सब आश्चर्यचकित हो रहे थे। तो यहाँ पर भगवान कभी-कभी चमत्कार भी दिखा देते हैं।
तो श्यामसुंदर प्रभु जो प्रभुपाद जी के शिष्य थे, वे बता रहे थे कि प्रभुपाद जी ने उनसे कहा कि… वो श्यामसुंदर प्रभु जो एक बड़े विख्यात संगीतकार थे, जॉर्ज हैरिसन (George Harrison), उनके मित्र बन गए थे। और उन्होंने जॉर्ज हैरिसन से, तभी लंदन मंदिर बनाने वाले थे, तो उसके ऊपर पूरा मंदिर का ऑल्टर था, पूरा वो संगमरमर (Marble) का बनाना था। तो इसलिए जॉर्ज हैरिसन से उन्होंने डोनेशन लिया था। और फिर प्रभुपाद जी ने कहा कि ‘मुझे कृष्णा बुक (Krishna Book) छापना है, अभी मुझे कृष्णा बुक छापना है और तुम जाकर जॉर्ज हैरिसन से कहो कि हमें उसके लिए पैसे चाहिए।’
तो फिर जो श्यामसुंदर प्रभु थे, उन्होंने जॉर्ज हैरिसन का विश्वास इस तरह जीता था कि ‘हम आपसे कोई पैसे नहीं चाहिए। कि बहुत से लोग आते हैं, उनसे पैसा माँगते हैं, हम आपसे पैसे नहीं माँगेंगे।’ तो ये जो मार्बल था वो भी उन्होंने बता रखा था कि ‘मैं ये मंदिर बनाने में मदद कर रहा हूँ।’ तो बोले ‘मैं क्या करूँ? क्या आप मार्बल दे सकते हैं?’
भगवान द्वारा चमत्कार: जॉर्ज हैरिसन और श्यामसुंदर प्रभु का प्रसंग
“तो अभी-अभी मैंने मार्बल का डोनेशन दिया था।” अब तो श्यामसुंदर प्रभु थोड़े हिचकिचाने लग गए। वो बोले कि, “प्रभुपाद जी, मैंने अभी उनसे मांगा है, और अब बार-बार मांगेंगे तो हमारा जो रिश्ता है, वो कम हो जाएगा।” “नहीं-नहीं”, तो प्रभुपाद जी बोले, “कोई बात नहीं, तुम नहीं मांग रहे हो। तुम जो उसका दोष है, मुझे लगा दो। तुम बोल दो कि मेरे गुरु ने बताया है कि आप ये दो।” तो श्यामसुंदर प्रभु सोचने लगे कि क्या करें। तो फिर वह उनसे मिलने गए। उनका बड़ा महल था। तो फिर जब मिले तो फिर वहाँ बातचीत हुई थोड़ी बहुत, और फिर उन्होंने कहा कि, “जो हम कृष्णा बुक (Krishna Book) छाप रहे हैं, उसके लिए कुछ डोनेशन चाहिए।”
और जब जॉर्ज हैरिसन ने सुना, तो उनका चेहरा पूरा गिर गया और वो बोले कि, “मैं नहीं सोचता था कि तुम ऐसे हो, मैंने सोचा था कि तुम ऐसे नहीं हो।” अब श्यामसुंदर प्रभु सोचने लगे कि क्या करोगे, पूरा उनका जो चेहरा था, उतर गया। और अचानक तभी क्या हो गया? तभी वातावरण पूरा बिल्कुल साधारण वातावरण था और अचानक बड़ी बिजली कड़की। और अचानक मानो ‘थड़ थड़ थड़’ तभी कुछ गिरता है आसमान से। बिजली कहीं गिरती है, एक, दो, तीन, चार, पाँच, आठ… तभी पावर चला गया, पावर चला गया। और तीन-चार-पाँच मिनट तक चला।
और उस समय बाद में वो श्यामसुंदर प्रभु बोल रहे हैं कि, “हमने तभी वेदर फोरकास्ट (Weather Forecast) चेक किया, जो भविष्यवाणी होती है वातावरण की, तो वहाँ पर कुछ बादल नहीं था, कुछ भी बिजली होने की संभावना नहीं थी।” तो पाँच मिनट तक ऐसे बिजली गिरती रही, गिरती रही और फिर पूरा अंधेरा था। और जब वापस रौशनी आ गई, तो जॉर्ज हैरिसन का चेहरा प्रसन्न हो गया था। बोले, “इसके बाद तो मुझे देना ही पड़ेगा, भगवान के संकेत के साथ।” तो फिर न केवल उन्होंने लक्ष्मी (धन) दे दी, पर वो किताब के लिए अपना फॉरवर्ड (Foreword) भी लिख दिया उन्होंने, प्रस्तावना जो होती है, वो भी लिख दी।
विद्यानगर मंदिर का चमत्कार और सेवा का सही भाव
तो कभी-कभी भगवान चमत्कार भी कर सकते हैं। और ऐसा नहीं है कि ये प्राचीन काल में चमत्कार हुए थे, आधुनिक जीवन में भी चमत्कार होते हैं कई बार। तो कभी-कभी, विद्यानगर में मंदिर है, बड़ा मंदिर है। तो मंदिर का जो प्रांगण है, वो किसी एक भक्त का घर था। वो सोच रहे थे कि हमें मंदिर बनाने की जगह चाहिए, फिर उसको बनाना है, बड़ा मंदिर कैसे बनेगा पता नहीं। तो वो जो बड़ा बंगला था उनका, उनके सपने में आ गए प्रभुपाद जी। प्रभुपाद जी ने कहा कि, “ये जो तुम्हारा बंगला है, इसे तुम मंदिर बना दो।” (तो हमें डरना नहीं चाहिए कि ऐसे हमारे सपने में भी आ जाएंगे, ये बहुत कृपा की बात है अगर आते हैं भगवान या भक्त तो)।
तो फिर उन्होंने वैसे ही कर दिया। तो भक्त सोच रहे थे कि अभी हम कहाँ से इतना फंड (Fund) लाएंगे, फिर मंदिर बनाएंगे, तो रेडीमेड (Ready-made) मंदिर मिल गया। कभी-कभी भगवान ऐसे चमत्कार भी कर सकते हैं, पर भक्त ऐसे चमत्कार की मांग नहीं करते हैं भगवान से। प्रभुपाद जी तात्पर्य में लिखते हैं कि हम सब भगवान के सेवक हैं। और सेवक का भाव क्या है? कि मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ, ना कि आप मेरे लिए क्या कर सकते हैं। तो जब हम भगवान की सेवा कर रहे हैं, और सेवा करते हुए कोई विपत्ति आ जाती है, कोई समस्या आ जाती है, तो भगवान तभी ज़रूर मदद करते हैं। पर वो अपेक्षा या वो मांग भक्त नहीं करते हैं।
प्रभुपाद जी से पूछा गया था एक बार कि हम भगवान से क्या प्रार्थना करनी चाहिए? प्रभुपाद जी बोले थे कि एक ही प्रार्थना करो कि, “हे प्रभो, आपकी सेवा करने की शक्ति प्रदान कीजिये। Please give us the strength to serve (कृपया हमें सेवा करने की शक्ति दें)। जो भी परिस्थिति आये, कितनी भी बड़ी विपत्ति आये, कितनी भी बड़ी समस्या आये, आपकी सेवा करने की हमें शक्ति दीजिये।” और वही भाव वास्तव में हम हरे कृष्ण महामंत्र के जप में करते हैं।
T – Teachings (शिक्षाओं द्वारा संरक्षण)
तो ये है भगवान की सर्वशक्तिमत्ता। ‘T’ जो है ‘PROTECT’ में हम चल रहे हैं – Teachings (टीचिंग्स), उनकी शिक्षाएं। तो शिक्षाएं, ये बड़ी महत्वपूर्ण हैं जिसके द्वारा भगवान संरक्षण देते हैं। तो साधारणतया अगर अभी हम देखते हैं कि युद्ध शुरू होने के पहले ही अर्जुन मोहग्रस्त हो गए। तो ऐसे बताया गया है, गीता माहात्म्य अलग-अलग आचार्यों ने लिखा हुआ है। तो श्री वैष्णव संप्रदाय में एक ‘श्री वैष्णव गीता माहात्म्य’ है, उसमें श्लोक आता है कि भगवान ने कैसे अपने भक्त अर्जुन की रक्षा की। वे अर्जुन के सारथी बन गए और फिर उन्होंने जो गीतामृत था, उसको प्रदान किया। इससे न केवल उन्होंने अर्जुन का कल्याण किया, पर सब लोगों का कल्याण किया। ‘लोकार्त्रयोपकाराय तस्मै कृष्णात्मने नमः’, तो ऐसे भगवान कृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ, नमन करता हूँ।
तो अभी शिक्षाओं के द्वारा संरक्षण का मतलब क्या है? अगर कोई बालक बोलता है कि मैं दसवीं मंज़िल से कूद जाऊंगा और मेरे पिताजी मेरा संरक्षण कर लेंगे। तो वास्तव में पिताजी का संरक्षण क्या है? पहले उनको बताना, शिक्षा देना कि आपको ऐसे कूदना नहीं चाहिए। जो शिक्षाएं हैं, मतलब क्या गलत कार्य पर न जाएं, यह बताना भी शिक्षा है और यह शिक्षा भी संरक्षण है। तो अगर भगवान की शिक्षाओं के रूप में जो संरक्षण है, उसका हम पालन नहीं करते हैं, तो फिर उसके बाद में अगर हमारा संरक्षण नहीं होता है, तो हम भगवान को दोष नहीं दे सकते हैं। अगर कोई बालक कूद जाता है दसवीं मंज़िल से और फिर उसके हाथ-पैर टूट जाते हैं, “पिताजी आपने मेरा संरक्षण क्यों नहीं किया?” “तुमने मेरी बात को पहले माना नहीं, इसलिए संरक्षण नहीं हुआ।”
तो अभी प्रधान रूप से हमारा संरक्षण क्या है? यह चार नियम हैं। यह वास्तव में क्या हैं? यह हमारे जीवन के संरक्षण के लिए कुंपण (Fence/बाड़) हैं। कुंपण होता है, कुंपण से कोई जानवर या कोई ऐसे खतरनाक चोर वगैरह होते हैं, उनको अंदर आने में समस्या होती है। तो यही हम देखते हैं रामायण में। लक्ष्मण चले गए राम की आवाज़ पर जब मारीच ने चीख मारी थी। तो तभी बताया गया है कि लक्ष्मण ने क्या किया? सीता माता को कहा कि आप लक्ष्मण रेखा के बाहर मत जाओ। पर लक्ष्मण रेखा के बाहर वो चली गईं, तो क्या हो गया? तो उनको अपहरण करके रावण लेकर गया।
तो भगवान की शिक्षाएं हैं, वह केवल सुनकर हँसने के लिए, तालियां बजाने के लिए, मनोरंजन के लिए नहीं हैं। वह हमारे जीवन में अमल करके संरक्षण प्राप्त करने के लिए हैं। और जितना हम इन शिक्षाओं पर अमल करेंगे, उतना हम देखेंगे कि हमारे जीवन में जो समस्याएं हैं, वो कम हो जाएंगी। कैसे कम होंगी? ऐसा नहीं है कि भौतिक जगत में सब सुखी हो जाएंगे। पर हम देखते हैं कि जितने लोग ये गलत कार्य करते हैं, नशापान करते हैं, तो फिर क्या होता है? वो भी उसके बाद में ऐसी समस्याओं में फँस जाते हैं कि जीवन बहुत दुखदायी हो जाता है उससे। पर जब इन कार्यों को छोड़ देते हैं तो क्या होता है? हमारा संरक्षण होता है।
तो हमें जो भगवान की शिक्षाएं हैं, उनको एक ऐसे बंधन के रूप में नहीं देखना है, संरक्षण के रूप में देखना है। बंधन मतलब रिस्ट्रिक्शन (Restriction), संरक्षण मतलब प्रोटेक्शन (Protection)। जैसे जब माँ अपने बालक के साथ बहुत भीड़ वाली जगह में हैं, और ऐसी भीड़ से अगर कोई जा रहे हैं, माँ और बालक जा रहे हैं, तो माँ बोलती है बालक को, “मैं तुमको अपनी गोदी में उठा लेती हूँ,” या “मैं तुम्हारा हाथ पकड़ती हूँ और फिर हम जाते हैं।” अभी इतनी भीड़ है, अगर हाथ छूट जाएगा, कहाँ गुम जाएगा पता नहीं चलेगा। तो वो बालक को लग सकता है… माँ बोलती है “मैं उठा लूँगी तुमको, तुम मेरे हाथ में रहोगे”, तो बालक को लग सकता है कि “मैं चल सकता हूँ, मुझे चलना आता है, मैं ऐसे बंधन में क्यों पड़ूँ?” पर वो बंधन नहीं है, संरक्षण है।
हमारा मन कभी-कभी बोल सकता है कि, “नहीं, ये सब कार्य करूँगा मैं, पर मैं समस्या में नहीं फँसूँगा, मैं बड़ा बुद्धिमान हूँ।” ऐसे नहीं होता है। ये तो ऐसे बोलना है कि मैं दसवीं मंज़िल से गिरूँगा, कूदूँगा, पर मेरे हाथ-पैर नहीं टूटेंगे। तो आज जो शिक्षाएं हैं, ये प्रधान संरक्षण हैं। तो हमारे जीवन में भगवान के प्रतिनिधियों के द्वारा और भगवान की शिक्षाओं के द्वारा, इन दो पद्धतियों से हमें संरक्षण मिलता है।
E – Empowerment (शक्ति प्रदान करना)
और फिर ‘E’ जो है – Empowerment (एंपावरमेंट)। एंपावरमेंट मतलब शक्ति प्रदान करते हैं भगवान। ‘विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शनाद्’, जो ‘पुरुषाददर्शनाद्’ था, जो बड़े-बड़े असुर आते थे और वे असुर जब आक्रमण करते थे। अभी जो बकासुर था (दो बकासुर हैं, एक बकासुर कृष्ण लीला में है, जो वृंदावन में था और एक बकासुर जो है, वह पांडवों के पहले वनवास में था)। पांडव दो बार वनवास में गए थे। पहला वनवास जब था, कि जब वारणावत को जलाया गया, तब वो वन में रह रहे थे कुछ समय के लिए। और दूसरी बार, जब वो जुए में हार गए, तो उसके बाद में वन में गए थे।
तो पहली बार जब वन में गए थे, तो एक बड़ा खतरनाक असुर था एकचक्र ग्राम में, जो नित्यानंद प्रभु का धाम है, वहाँ पे। और उसके साथ भीम ने बड़ा युद्ध किया। तो क्या हुआ था, वो असुर कभी भी किसी को आके मार रहा था। तो नागरिकों ने क्या योजना की थी कि हम रोज़ एक व्यक्ति को तुम्हारे लिए एक बड़ी बैलगाड़ी अन्न से भरके भेज देंगे। तो फिर जिस घर में पांडव रह रहे थे, उस घर से तभी एक व्यक्ति को जाना था। तो परिवार वाले रो रहे थे कि किसको भेजेंगे, तो कुंती महारानी ने कहा कि, “भीम तुम जाओ।” तो भीम बड़े उत्साही हो गए, क्योंकि उनमें तो क्षत्रिय भाव बहुत अधिक था, तो उनको युद्ध करने की इच्छा थी। तो वैसे उन्होंने ब्राह्मण का रूप लिया था, और ब्राह्मण युद्ध भी नहीं कर सकते हैं। तो फिर वो उत्साह से चले गए।
और फिर वो बैलगाड़ी भरके पूरा अन्न था। तो भीम ने कहा, “वैसे भी तो इसको मारने वाले हैं।” सोचा उन्होंने, “तो अगर मारने वाले हैं, तो उसके खाने के बदले मैं पहले खा लेता हूँ।” तो जाते-जाते खा रहे थे, खा रहे थे, खा रहे थे और आराम से गए। और उधर वो बकासुर भूख से तड़प रहा था। और “कौन है!” क्रोध करने लग गया, चिल्लाने लग गया। और फिर देख रहा था बार-बार, कोई आ नहीं रहा। और बाद में उसने देखा कि एक व्यक्ति आ रहा है, इतना आराम से आ रहा है, और क्या कर रहा है? मेरा अन्न खा रहा है! खाते-खाते तभी लगभग कुछ बचा ही नहीं था। इतना क्रोधित हो गया बकासुर और वो कहने लगा कि, “मैं तुम्हारी पूरी चटनी कर दूँगा।”
तो भीम ने उसकी तरफ देखा भी नहीं, सब खाते गए। वो चिल्ला के आके भीम को मारने लग गया, भीम सब खाते गए। पीठ पे मारा तो कुछ भी हुआ नहीं भीम को, भीम खाते गए। वो चिल्ला रहा था, गुर्रा रहा था, ऐसी खौफनाक आवाज़ कर रहा था। और उसको और उकसाने के लिए भीम ने क्या किया? नीचे उतर गए। पूरा खाना तो खा लिया था, अभी उतर गए और फिर उसको और उकसाने के लिए पानी लिया, पानी पिया, आराम से हाथ और मुँह धोया। और फिर अपनी सारी शक्ति से उसको मार डाला।
तो यहाँ पे जो शक्ति थी, भीम को कहाँ से मिली थी? यह भगवान की कृपा से मिली थी। भगवान की कृपा कैसे हुई थी? ऐसा नहीं है कि भगवान ने कभी भीम के शरीर पर हाथ रखा था कि “अभी मैं तुम्हारे शरीर में शक्ति प्रदान करता हूँ।” नहीं, उनको जन्म से ही शक्ति बहुत थी। और जन्म से जो शक्ति मिलती है, प्रतिभा होती है, वो कहाँ से आती है? वो वास्तव में भगवान की कृपा है।
भीम को मिली जन्मजात शक्ति और नागलोक का प्रसंग
तो इनको शक्ति मिली थी बचपन से ही। एक बार, जब पहले कुंती और पांडु जंगल में वास कर रहे थे, तो तभी एक पहाड़ के ऊपर वो बैठी थीं, कुंती और पांडु बैठे थे। और कुंती तो अभी सो गई थीं, थोड़ी सो गई थीं बैठे-बैठे। तभी पास में ही कहीं एक शेर की आवाज़ आई। तो पहाड़ के बाजू में बैठे थे, वहाँ पर जो सारा सुंदर दृश्य देख रहे थे। तो शेर के गुर्राने की आवाज़ आई, तो कुंती उठ गईं। और जब उठीं, तो उनकी गोद में से जो भीम था, वो क्या हो गया, फेंका गया और पहाड़ से नीचे गिर गया। तो कुंती चीखने लगीं, “क्या हो गया ये!” और जो पांडु थे वो भी डर गए। और पांडु तेज़ी से उस पहाड़ से नीचे दौड़ते-दौड़ते आये। और दौड़ते-दौड़ते आके देखा कि जो भीम था, एक बड़े पत्थर पर गिरा था और क्या हो गया था कि गिरने से वो पत्थर पूरा टूट गया था और भीम को कुछ भी नहीं हुआ था। तो भीम की ऐसी शक्ति थी, वो कहाँ से आयी थी? भगवान की कृपा से थी। तो कुंती महारानी देख रही हैं कि ये शक्ति जो है, भगवान की कृपा है।
और यहीं हम देखते हैं कि इसी स्कंध के बाद 15वें अध्याय में आएगा, 14-15 अध्याय में कि कैसे अर्जुन के पास इतनी शक्ति थी, पर वो चली गई। युधिष्ठिर महाराज से कहने लगे, “मेरी सारी शक्ति चली गई है।” क्यों चली गई है? क्योंकि भगवान ने दी थी शक्ति और भगवान ने जब चाहा तो शक्ति ले ली। तो इसलिए हमारी भी एक क्षमता होती है, प्रचार करने की हो, कीर्तन करने की हो, मैनेजमेंट (Management) करने की हो, जो प्रतिभा होती है, एक क्षमता होती है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि “मैं इतना प्रतिभाशाली हूँ, यह कार्य कर रहा हूँ।” वास्तव में भगवान की कृपा है।
यहाँ हम देखते हैं ‘विषान्महाग्नेः’, जब भीम को ज़हर पिलाया गया था तो क्या हुआ था? अलग-अलग परिस्थितियों का समन्वय हो गया। तो जब दुर्योधन ने उस समय जो पांडवों को आमंत्रित किया… वो तो नेक हृदय के थे। “आओ हम खाते हैं,” और फिर जब वो खाना सबको खिला रहे थे, तो दुर्योधन स्वयं गए, “मैं भीम तुम्हें खिलाता हूँ।” और भीम का जो अन्न था, उसमें पूरा ज़हर डाला था। और फिर वो खाकर हो गया, तो बोले “आओ हम खेलते हैं।”
तो अभी पानी में खेल रहे थे, दुर्योधन इंतज़ार कर रहे थे कि यह ज़हर का कुछ प्रभाव ही नहीं हो रहा है, कब प्रभाव होगा? क्योंकि भीम का शरीर इतना शक्तिशाली था कि उस ज़हर का प्रभाव होने में काफी समय लग गया। उसने ऐसा ज़हर डाला था कि व्यक्ति कुछ ही समय में मूर्छित हो जाए। तो दुर्योधन की योजना क्या थी? कि हम बोलेंगे कि हम सब खेल रहे हैं, और बाकी सब पांडव उसके बाद खेलने चले जाएंगे। भीम बोलेगा कि “अभी मुझे थोड़ा सोना है,” और जब वो सोएगा, तो वो हमेशा की नींद हो जाएगी उसकी। पर वो भीम खेल रहे थे, खेलते जा रहे थे। तो बाद में भीम थक गए थोड़े और लेट गए।
तो दुर्योधन की जो योजना थी, अपने सारे भाइयों को लाया और भीम के शरीर को बाँध दिया। और शरीर को बाँध के फिर बाद में पास में नदी थी, उसमें फेंक दिया। जब ये सब ख़त्म हो गया, जब फेंक दिया, तो उस नदी में ज़हरीले साँपों ने जब देखा, कहने लगे, “मानव हमारे इसमें कैसे आ गया है?” काटने लग गए। पर क्या हो गया था कि भगवान की योजना ऐसी थी कि दुर्योधन ने ऐसा ज़हर चुना, वो कोई भी ज़हर चुन सकता था, पर उसने ऐसा ज़हर चुना कि वो ज़हर और ये साँपों का ज़हर था, वो दोनों ने एक-दूसरे का प्रतिकार कर दिया (Antidote effect)। तो ये पहले शरीर में ज़हर था और ये दूसरा ज़हर आ गया, प्रतिकार हो गया। और फिर उसके बाद भीम होश में आ गए।
और जब ये साँप देखे… साँपों का तो डर ही चला गया। भीम ने देखा, “अच्छा चलो”, साँप को पकड़ के सब फेंकने लगे। तो साँप देखे कि किसी मानव ने ऐसा हमारे साथ किया नहीं, तो वो डर के चले गए। और नदी के अंदर जो वरुण राजा थे, नदी के राजा थे (नागलोक), उनके पास चले गए। वो बोलने लगे कि एक खतरनाक मानव आ गया है, वैसा मानव कभी देखा ही नहीं हमने। “इसको बुला के लेके आओ, आप कुछ करो।” तो जो वरुण थे, उन्होंने उनको बुला लिया। और फिर उन्होंने कहा कि, “आप हमारे अतिथि बन के आये हो, तो मैं आपको कुछ देना चाहता हूँ।” तो उन्होंने कहा कि हमारे पास जो अमृत तुल्य रस है, जैसे सोम होता है स्वर्ग में, उनके पास भी एक अमृत तुल्य रस था। “और यह द्रव्य पीने से आप बहुत शक्तिशाली बन जाओगे।”
तो फिर भीम दो चीज़ों के लिए हमेशा तैयार रहते थे – खाना और युद्ध। तो भीम को ‘वृकोदर’ कहा जाता था। तो अभी वो ज़हर का प्रतिकार हो गया था, तो फिर वो जो एक बड़ा मटका होता था, तो वरुण ने सोचा कि आप जितना पीना चाहते हैं, पी सकते हैं इसमें से। तो साधारण व्यक्ति जो होता है, या सबसे बड़ा योद्धा भी जो था, वो एक मटके से ज़्यादा नहीं पी सकता था। तो भीम ने उठाया, एक मटका तुरंत पी लिया, दूसरा मटका पी लिया, तीसरा मटका पी लिया। और सब जो नाग थे, तो देख रहे थे, “क्या चल रहा है ये! कैसे वो इतना पी सकता है?” तीन, चार, पाँच, छः, सात मटके उन्होंने पी लिए। और फिर उन्होंने कहा “अभी मुझे सोना है।” तो फिर उन्होंने अच्छा कमरा दिखाया, बिस्तर दिखाया और वो सो गए।
तो क्या, वो जो अमृत तुल्य द्रव्य था, उससे क्या होता था? एक मटका पीने से व्यक्ति के शरीर में एक हज़ार हाथियों की शक्ति आ जाती थी। तो उन्होंने सात मटके पी लिए थे। तो फिर क्या हो गया? भीम की शक्ति… शरीर तो वज्र जैसा बन गया और वो शक्ति लगभग असीमित जैसी हो गई। इसलिए जब भीम युद्ध करते थे, तो जब युद्ध होता था, तो वो कभी-कभी धनुष-बाण इस्तेमाल नहीं करते, वो शत्रु के सैनिकों के अंदर चले जाते थे। वो गदा घुमाते रहते थे, घुमाते रहते थे। और कौरवों के सैनिकों ने ऐसा कभी देखा ही नहीं था। “कोई शत्रु हमारे अंदर ये आके हमको मार रहा है ऐसे! दूर से युद्ध ठीक है।” तो उनकी इतनी शक्ति थी, ऐसा लोग वर्णन करते हैं कि बस सारा शरीर खून से भर जाता था और सारा उनका शरीर लाल हो जाता था। और लाल शरीर में सिर्फ उनकी आँखें और उनके दाँत सफ़ेद दिखते थे। तो उनको देखकर ही सब डर जाते थे।
C – Circumstances (परिस्थितियों द्वारा संरक्षण)
तो ये भगवान अलग-अलग परिस्थितियों के द्वारा भी भक्त को शक्ति दे सकते हैं। तो ‘C’ है – Circumstances (सरकमस्टान्सेस), परिस्थितियों के समन्वय के द्वारा।
T – Time (समय की प्रतीक्षा)
और जो अंतिम जो है ‘PROTECT’ में, ‘T’ यानि Time (टाइम), समय है। कभी-कभी भगवान का संरक्षण प्राप्त करने के लिए समय का इंतज़ार करना पड़ता है। तो कभी-कभी भगवान ऐसा संरक्षण देते हैं कि वो तुरंत हमें पता नहीं चलता है।
तो आप शायद जानते हो, ये एक हास्यस्पद प्रसंग है, वास्तविक नहीं है, ऐतिहासिक नहीं है, शास्त्रिक नहीं है ये, पर इससे मुझे याद आता है। तो एक बार एक व्यक्ति ने बहुत प्रार्थना की भगवान से। और जब भगवान प्रसन्न हो गए तो कहने लगा, “हे भगवान, आप तो इतने महान हो, आप शक्तिशाली हो, आप सारे ब्रह्मांडों के स्वामी हो।” मस्का लगा रहा था भगवान को। उसने कहा कि “हमारा एक पल आपके लिए क्या है?” बोले, “तुम्हारा एक पल हमारे लिए क्या है? वो हज़ारों साल है।” “आप कितने महान हो प्रभु! तो तुम्हारा एक आना (मुद्रा) हमारे लिए क्या है?” बोले, “करोड़ों रुपये है वो।” “कितने महान हो! आप एक कृपा करो मुझपे, आप आपका एक आना मुझे दे दो।” तो भगवान ने कहा, “एक पल के बाद।” तो भगवान को हम फँसा नहीं सकते हैं।
भगवान का जो समय-चक्र होता है, उनके काल के अनुसार आता है। वास्तव में अगर हम महाभारत देखते हैं, तो भगवान स्वयं थे, पांडव इतने शक्तिशाली थे, पर पांडवों को स्थायी रूप से राजा बनाने के लिए भगवान को 84 साल तक प्रयत्न करना पड़ा। 84 साल के प्रयास के बाद जो पांडव थे, राजा बने। वो कैसे है? वनवास तो 12-13 साल था, उसके पहले भी बहुत से षड्यंत्र सहने पड़े। तो उसमें कितने साल गए! और उसके बाद में कौरवों का वध हो गया, उसके बाद में वो प्रस्थापित हो गए।
तो इसलिए, हम प्रभुपाद जी के जीवन में भी देखते हैं। प्रभुपाद जी को आदेश दिया उनके गुरुदेव ने प्रचार करने का, पहली ही मीटिंग 1922 में। प्रभुपाद जी ने लगभग 1942-1944 साल में प्रचार अच्छी तरह चालू कर दिया। तो पहले साल तो बहुत कठिन था। 1966 के बाद में यश मिलने लगा, और तभी भी इतना यश नहीं मिला। उसके बाद 1968 में प्रभुपाद जी को बड़ा हार्ट अटैक आ गया था, स्ट्रोक आ गया था, और उसके कारण उनको भारत पुनः वापस आना पड़ा। पर वो जो सारा हादसा हुआ, उससे उनके जो शिष्य थे, उनको और प्रेरणा मिली कि स्वामी जी इतने वृद्ध हैं, फिर भी हमारे लिए इतना त्याग कर रहे हैं। और तभी उन्होंने प्रचार चालू कर दिया। फिर 1968 में प्रभुपाद जी जब अमेरिका वापस गए, इसके बाद में जो ‘हरे कृष्ण आंदोलन’ का विस्फोट जैसे प्रचार हो गया। तो प्रभुपाद जी को भी प्रचार का यश देखने के लिए 46 साल तक इंतज़ार करना पड़ा।
तो इसलिए हमें तुरंत यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि, “मैं आज हरे कृष्ण महामंत्र जप कर रहा हूँ, मैं कल सुबह उठूँगा तो काम, क्रोध, लोभ सब गया। मैं आज हरे कृष्ण महामंत्र जप कर रहा हूँ, कल जब मैं प्रवचन दूँगा तो सब लोग तालियां बजाएंगे।” ऐसे नहीं होता है, समय लगता है। तो एक तरह से समय, सब्र रखना। सब्र रखना यह श्रद्धा का लक्षण है। कि श्रद्धा जो होती है, “मेरी भगवान में श्रद्धा है”, मैं कैसे बोल सकता हूँ? वास्तव में श्रद्धा का लक्षण है सब्र रखना, कि हम इंतज़ार करते हैं।
जैसे मान लें हम डॉक्टर के पास जाते हैं, तो डॉक्टर में अगर श्रद्धा है हमें, तो डॉक्टर ऐसा नहीं बोलता है कि अगर तुमको बीमारी हो गई, बहुत कठिन बीमारी है, तो ऐसा नहीं कि आज दवाई लो, कल ठीक हो जाएगा। डॉक्टर बोलेगा, “एक महीना, दो महीना आप दवाई लेते रहो और फिर उसके बाद में, अंत में आप ठीक हो जाओगे।” तो जो समय लगता है, वो उसके लिए सब्र रखता है।
सेवा भाव और प्रार्थना की सही विधि
तो मेरी एक वेबसाइट है – ‘द स्पिरिचुअल साइंटिस्ट’ (The Spiritual Scientist)। उसमें मैं प्रश्नों का उत्तर देता हूँ। तो वहाँ पे एक विद्यार्थी ने सवाल पूछा कि, “ध्रुव महाराज तो छह महीने में शुद्ध भक्त बन गए। तो अगर हम तीव्रता से भक्ति करेंगे, रोज़ ध्यानपूर्वक सोलह माला जप करेंगे, तो क्या अगर छह महीने नहीं, पर दस महीने में क्या हम शुद्ध भक्त बन सकते हैं? और अगर नहीं बन सकते हैं, तो फिर क्या इस भक्ति में शक्ति नहीं है?”
तो फिर जो सेवा भाव है, भाव कहाँ रहता है? अगर हम मांग कर रहे हैं भगवान से, तो आज मैं मांग करूँगा कि “भगवान, दस महीने में मुझे आप भगवद्धाम ले जाओ।” तो फिर हम भगवद्धाम में जाके क्या करेंगे? “तो भगवान, आज आप लाल ड्रेस पहनें, आज आप ये खाओ, आज आप ये लीला करो।” तो अगर मांगने की शृंखला चालू हो जाएगी, तो मांगने की शृंखला का अंत कहाँ होगा? और फिर हम बोलेंगे, “हे भगवान, आप मेरी प्रगति कर रहे हैं अच्छी बात है, पर उसकी प्रगति मुझे मत देखने दो आप।” जब मांगने की शृंखला चालू होती है, उसका कोई अंत नहीं होता है।
तो इसलिए भक्त क्या आशा करता है कि “भगवान, हमेशा आप आपकी सेवा में मुझे बरकरार रखो। कितना भी समय क्यों न लग जाए मुझे शुद्ध होने के लिए, मुझे उसकी चिंता नहीं है। पर मुझे कभी आपका स्मरण, आपकी जो सेवा है, उससे वंचित मत करो।” कुलशेखर महाराज कहते हैं कि –
मकुन्द मूर्ध्ना प्रणिपत्य याचे, भवन्तमेकान्तमियन्तमर्थम्।
अविस्मृतिस्त्वच्चरणारविन्दे, भवे भवे मेऽस्तु भवत्प्रसादात्॥
वह कहते हैं, “हे भगवान मुकुन्द, मूर्ध्ना प्रणिपत्य याचे”, मैं मेरा सिर आपके सामने रखता हूँ और याचना करता हूँ। प्रणिपत्य याचे, क्या याचना करता हूँ? “भवन्तमेकान्तमियन्तमर्थम्”, मैं एक ही चीज़ की मांग कर रहा हूँ आपसे। क्या है? “अविस्मृतिस्त्वच्चरणारविन्दे”, कि कभी भी आपके चरणों की मुझे विस्मृति न हो जाए, कभी मैं आपको भूलूँ नहीं। “भवे भवे मेऽस्तु भवत्प्रसादात्”, वह कहते हैं कि ‘भवे भवे’, भले ही अनेक जन्म क्यों न हो जाएं, मुझे भले ही अनेक जन्म लेने पड़ें इस जगत में, वो मुझे मंज़ूर है, मुझे इसमें कोई ऐतराज़ नहीं है। ज़रूर मैं चाहता हूँ कि जल्दी-जल्दी आपके पास आ जाऊँ, पर ये मेरी मांग नहीं है। मैं कभी आपको भूलूँ नहीं, हमेशा मैं आपके चरण कमलों का स्मरण करता रहूँ।
दुख के आंसू और कृतज्ञता के आंसू (Tears of Sorrow, Tears of Gratitude)
तो इस तरह से, जब हम समझते हैं कि अलग-अलग प्रकार की पद्धति से भगवान हमारा संरक्षण कर सकते हैं, तो फिर उससे, भले ही कुछ विपत्ति आ जाए हमारे जीवन में, तो हम उससे विचलित नहीं होते हैं। क्योंकि चार-पाँच महीने पहले, जब मैं राधा गोपीनाथ मंदिर में था, तो वहाँ पर एक दुर्घटना हो गई। आठ भक्त थे, वो जा रहे थे हिमालयों में बद्रीनाथ का दर्शन करने के लिए। और वहाँ पे उनका जो हेलीकॉप्टर था, वो क्रैश (Crash) हो गया और वो सबकी मृत्यु हो गई।
तभी अमेरिका से राधानाथ महाराज पुनः भारत में आ गए थे। और फिर वो सब भक्तों के घर में गए, उनसे मिले, और उनको सांत्वना दी। तो तभी एक माताजी भक्त थीं, उनकी माँ गुज़र गई थीं, तो वो बता रही थीं बाद में, वो अपना हृदय प्रकट कर रही थीं। तो उन्होंने कहा कि राधानाथ महाराज ने मुझे कहा कि, “आप आपके आंसुओं को मत रोको। पर आपका हर एक आंसू, कृतज्ञता का आंसू होना चाहिए।”
तो कृतज्ञता कैसे रख सकते हैं अगर कोई हमारे बहुत करीब के व्यक्ति की मृत्यु हो गई है? हम समझते हैं कि इस भौतिक जगत में मृत्यु सबके लिए अनिवार्य है। पर कृतज्ञता इसलिए है हमारी, कि हम जानते हैं कि भगवान की कृपा से हमें एक ऐसा मार्ग, ऐसे संबंध, ऐसी दृष्टि मिली है जो मृत्यु के परे है। तो भक्त के जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक, दो भाग होते हैं। तो भौतिक जगत में, भौतिक स्तर पर संकट तो आते ही रहेंगे क्योंकि यह भौतिक जगत का स्वभाव ही है। पर हमें इस भौतिक जगत के परे हमारे जीवन में कुछ मिला है, और वह शाश्वत है। तो भगवान ने वो दिया है, उसके लिए हम कृतज्ञ हैं।
तो भौतिक जगत में जो दुर्घटना होती है, उसके लिए ज़रूर हम दुखी होते हैं। तो मैंने इस पर एक लेख लिखा था – “Tears of sorrow, tears of gratitude” (दुख के आंसू, कृतज्ञता के आंसू)। कि जो भौतिक जगत में अगर कुछ संकट आता भी है तो हम दुखी होंगे। जो तेरहवां दिन था, कौरवों के लिए बहुत बड़ा विध्वंस का दिन बन गया। क्योंकि तेरहवें दिन में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध हुआ था। जब तक भीष्म पितामह थे, पूरी नैतिकता से युद्ध चल रहा था। भीष्म पितामह अगर होते तो कभी अभिमन्यु का इस तरह से वध नहीं होने देते। पर उनके बाद में सब नैतिक मूल्यों को छोड़ दिया गया (दसवें दिन में भीष्म पितामह गिर गए थे)।
तो तभी जो भाव है, भौतिक स्तर पर जो होता है, उससे हम हमारी बुद्धि और प्रार्थना के द्वारा कैसे भगवान संरक्षण कर रहे हैं, ये समझ सकते हैं थोड़ा-बहुत। पर नहीं समझेंगे, तो भी हम समझते हैं कि इसके परे जो आध्यात्मिक स्तर है, उस पर भगवान सदैव मुझे आश्रय दे रहे हैं। तो इस भौतिक जगत में भूकंप आ जाए, आतंकवाद आ जाए, प्रलय आ जाए, बाढ़ आ जाए, जो भी हो जाए, बहुत कुछ हो सकता है इस भौतिक जगत में, पर हम जब हरे कृष्ण महामंत्र का जप करते हैं, भगवान का स्मरण करते हैं, तो आध्यात्मिक स्तर पर भगवान सदैव हमें संरक्षण दे रहे हैं।
तो भगवान भौतिक स्तर पर कैसे कार्य करेंगे, यह हम पहले से नहीं देख सकते हैं, क्योंकि हमारी बुद्धि सीमित है, भगवान की बुद्धि असीमित है। तो इसलिए हम समझ नहीं सकते कि भगवान किस तरह से भौतिक स्तर पर कार्य करेंगे, हमारे जीवन में क्या होगा। पर हम अगर भगवान की सेवा में लगे रहेंगे, तो हमें ज़रूर समय आने पर पता चल जाएगा।
तो जब युधिष्ठिर महाराज भी बहुत दुखी हो जाते हैं अभिमन्यु के वध के बाद में, तो तभी व्यासदेव वहाँ पर आते हैं, युधिष्ठिर को सांत्वना देते हैं कि, “भगवान की योजनाएं जो होती हैं, पहले वो सबके कल्याण के लिए होती हैं।” और ये पहली बात बताते हैं वो। और दूसरी बात बताते हैं कि “वो कैसे सबके कल्याण के लिए हैं, ये अगर आप उनकी सेवा करते रहोगे, तो काल के बाद आपको समझ में आ जाएगा।” तो इसलिए, कुछ भी हो जाए भौतिक स्तर पर, हम भगवान के चरण कमलों का स्मरण करते हुए, उनकी सेवा करते हुए रहेंगे, तो फिर ज़रूर भगवान हमारा परम कल्याण करेंगे।
श्री कृष्ण भगवान की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर भक्त वृन्द की जय!
ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
Thank you very much. Hare Krishna.