PROTECT – Seven ways Krishna protects (Hindi)
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संक्षिप्त सारांश
यशोदानन्दनवरजजनरजन, यमुनातिरवनचारी नारायणं नमस्कृत्या, नरंचैवा नरोत्तमं देविं सरस्वतिं व्यासं, ततो चायमुधीरयेथ नष्टप्रायेश्वभद्रेशु, इत्यं भागवत सेवया भगवतीर्थमश्लोके, बक्तीर्भवतिनैश्टिकी कृष्णायवासुदेवाया, देवकी नंदनायचा नंदगोपकुमाराया, गोविंदायनमों महा उत्तरोवाच, पाहि पाहि महायोगी देवदेव जगत्पते, नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे यत्रमृत्यू परस्परह, उत्तरोवाच पाहि पाहि महायोगी, देवदेव जगत्पते नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे यत्रमृत्यू परस्परह, उत्तरोवाच पाहि पाहि महायोगी, देवदेव जगत्पते नान्यं त्वद अध्भयं।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
यशोदानन्दनवरजजनरजन, यमुनातिरवनचारी नारायणं नमस्कृत्या, नरंचैवा नरोत्तमं देविं सरस्वतिं व्यासं, ततो चायमुधीरयेथ नष्टप्रायेश्वभद्रेशु, इत्यं भागवत सेवया भगवतीर्थमश्लोके, बक्तीर्भवतिनैश्टिकी कृष्णायवासुदेवाया, देवकी नंदनायचा नंदगोपकुमाराया, गोविंदायनमों महा उत्तरोवाच, पाहि पाहि महायोगी देवदेव जगत्पते, नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे यत्रमृत्यू परस्परह, उत्तरोवाच पाहि पाहि महायोगी, देवदेव जगत्पते नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे यत्रमृत्यू परस्परह, उत्तरोवाच पाहि पाहि महायोगी, देवदेव जगत्पते नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे देवदेव जगत्पते नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे यत्रमृत्यू परस्परह नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे यत्रमृत्यू परस्परह देवदेव जगत्पते देवदेव जगत्पते नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे नान्यं त्वद अध्भयं पश्चे उत्रवाच उत्रा ने कहा पाही पाही रक्षा करे महायोगी सर्वोच्योगी देवदेव भूज्यों के भी भूज्य जगत्पते ए जगत के स्वामी नान्यं दूसरा त्वद तुम्हारे अतरिक्त अभयं भय से रहित होने का भाव पश्चे देखती हूं यत्र जहां वृत्यू वृत्यू परस्परं द्वईत जगत में अनुवाद अथातात्वरे कृष्ण कृपा श्रीमूति वक्तिविदान्त स्वामी श्रत्रतुपात्वरे उत्रा ने कहा ए देवों के देव जगत के स्वामी आप सबसे महान योगी है कृपया मेरी रक्षा करे क्योंंकि आपके अथिरिक मुझे इस द्वईत पूर्ण जगत में रुत्यू के पाश से बचाने वाला अन्या कोई नहीं है यह भौतिक जगत द्वईत पूर्ण है जबकि परम धाम एक रूप है द्वईत पूर्ण जगत पदार्थ तथा आत्मा से निर्मित है जबकि परम जगत पूर्ण दया आत्मा है जिसमें भौतिक गुणों का लेश भी नहीं पाया जाता इस द्वईत पूर्ण जगत में प्रत्यक व्यक्ती जूनते ही जगत का स्वानी बनने का प्रयास करता है जबकि परम जगत में भगवान ही परमेश्वर है और अन्य सद्वियों की सेवक है द्वईत पूर्ण जगत में प्रत्यक व्यक्ती अन्य सद्वोग से इरशा करता है और पदार्थता आत्मा के द्वईत अस्थित्मों के कारण मृत्यू अनिबार्य है शरणाग जीव के लिए भगवान ही एक मात्र अभय के दाता है भगवान के चरण कमलों के शरण ग्रहन किये बिना कोई भी इस जगत में अपने को मृत्यू के कुरूर हातों से नहीं बचा सकता है श्री रूपं साग्रजाता सहगन रगुनाथान्वितं तमस जीव साद्वैतं सावधूतं परिजन सहितं कृष्ण चैतन्य देव श्री राधा कृष्ण पादान सहगन ललिता श्री विशाखान्वितं शुर्थ नमा ओमिश्रिपादाय कृष्ण प्रिश्थाय भूतले श्रीमते भक्ति वेदान्तो स्वामी इति नामिन नमस्ते सारस्वती देवे गव्राणी प्रिचारिने निर्विशेष्य शुन्यवादी पास्चाक्य देश तारिने नमो महावदन्याय कृष्ण प्रेम प्रदायते कृष्णाय कृष्ण चैतन्य नामने गरत्रशे नमह एकृष्णा करुणा सिंधो दीन बंधो जगत्पते गोपेश गोपिका कांथ राधा कांथ नमस्तुते तप्त कांचिन गव्राणी राधे व्रिंदा वनेश्वली कृषभानो सुते देवी प्रणमामी हरी प्रिये वांचा कल्पतरू भस्च कृपा संधू भेवच पतिता नाम पावनेभ्यो वैश्णवेभ्यो नमो नमः जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभू नित्यानन्दः श्री अध्वैं तगताधारः श्रिवासाधि गवर मक्त व्रिंदा हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्णा तो आज हम श्मित भागवतम के जो दूसरा महा संकत का प्रसंग है उस पे चर्चा कर रहे हैं पहला प्रसंग जो था जब अर्जुन के उपर ब्रह्मास्तर आ रहा था अश्वत्था मैंने छोड़ा हुआ और तभी प्रार्थनाएं अर्पन करते हैं तो अर्जुना तीन शलोक वहाँ पे बोलते हैं और फिर भगवान से पुछते है कि क्या है कुरुपय मुझे बताओ और मैं क्या करूँ ये बताओ तो वह पहले विपद्धी और पहली प्रार्थनाएं ये जो उत्तरा बोल रही है ये दूसरी प्रार्थनाएं ये दोनों प्रार्थनाएं भावत संख्षिप्त हैं जो विस्तारित प्रार्थनाएं हैं अभी इसी अध्याय के अठ्रावे श्लोक से शुरू होगे अठ्रावे श्लोक से 42 श्लोक तक कुंति महाराणी के 25 श्लोकों की प्रार्थनाएं और यह बहुती विख्षात प्रार्थनाएं इसलिए प्रार्थनाओं के आधार पर इस अध्याय को नाम दिया है कुंति महाराणी के प्रार्थनाएं और उसके बाद में जो विस्तारित प्रार्थनाएं वो आते हैं भीश्यों पितामहा की जिसे अभी फर्मपूज्य पुत्रसावर मारा चर्चा कर रहे है विस्तारित रूप से तो वो प्रार्थनाएं दो विभाग में हैं पहला विभाग जो है जब पहले आर्जुन युधिष्टिर और बाकी से पांडवों को सार्थवना देते समये भिश्यों पितामहा कुछ भगवान की महिमा करते हैं और भगवान की अचिंद तत्व की महिमा करते हैं फिर उसके बाद में विस्तारित उपदेश देते हैं वो युधिष्टिर महाराज को राजधर्म पे राजधर्म जो है महाभारत का महाभारत में एक करोड शलोक है hundred thousand उसमें से लगबाग लगबाग तीन how do you say eighty thousand तीस हजार तीस हजार शलोक जो है वो भीश्व पितामा का उपदेश है तो हम कलपना कर सकते हैं मत्युशयया में बैठे हुए इतना विस्तारित रूप से जो बाशांतर प्रवचन करना है कि इतना कठिन होगा वो तो उसके बाद में इतिमतिर वित्रुप्ता विश्व पितामा बोलते है कि अभी मैं मेरी चेतना सब चीजों से पीछे ले रहा हूँ और एकागर होके मैं भगवान पे ध्यान करने वाला हूँ तो हम इन तीन प्रसंगों में देखेगें कि जब अर्जुन पे संकत आता है अर्जुन प्रार्थना करते हैं उत्तरा पे संकत आते हैं उत्तरा प्रार्थना करते हैं विश्व पितामा पे संकत क्या है अभी बहुत दर्ध हो रहा है वित्त्यू सामने है वह प्रार्थना करते हैं पर इन तीनों में भगवान की प्रतिक्रिया अलग अलग होती है जब अर्जुन प्रार्थना करते हैं तो भगवान अर्जुन को बोलते है कि तुम युद्र करो और तुम अपना ब्रह्मास से लिकालो उनको मार्ग धर्शिन देते हैं जब उत्रा प्रार्थना करते हैं तो भगवान अर्जुन को नहीं बोलते है भगवान खुद आप स्वया में एक कवज बनके उत्रा के गर्भ का सरक्षन करते हैं और जब भीष्म प्रार्थना करते हैं तभी भगवान वास्तव में एक तरह देखा जाएं तो भिष्म देव की मृत्ते होते हैं तो क्या भगवान उनका सरक्षन नहीं करते हैं या किसी और परकार से करते हैं तो भागवतम की इन तीन अध्यायों में, शुरुवात के ही तीन अध्याय हैं असल भागवतम की जो कथा शुरु हो रही है, साथवा आठवा नवा अध्याय, इन तीनों में ही हम अलग अलग परकार से भगवान का सरक्षन देखते हैं तो इस लोख में जो उत्तरा प्रातना कर रहे हैं कि हैं प्रभो, आप मेरा सरक्षन करो आप के अलावा ना अन्यम् तद भयम् पश्चे, कि आप के अलावा अभयम् पश्चे, अभया देने वाला ना अन्यत्व कि आप के अलावा और कोई नहीं हैं इस जगत में सरक्षन देने वाला तो हम आज, ये देखे गए कैसे भगवान अलग-अलग पद्धतियों से सरक्षन देते हैं तो साथ पद्धतियां हम देखेगे उसके बारे में और महाभारत से जो प्रसंग है, उसके बारे में हम थोड़ी संख्षिप में चर्चा करेंगे हर एक प्रसंग के लिए, तो इसका भाव क्या है, ऐसे नहीं है कि भगवान इन साथ पद्धतियों से पर सरक्षन देगे भगवान और भी पद्धतियों से सरक्षन दे सकते हैं पर हम इससे समझ सकते हैं कि भगवान का सरक्षन अलग-अलग पद्धति से आता है तो ये जो साथ हैं, ये इसको समझ करने के लिए जो इंग्लिशी शब्दा आता है- प्रोटेक्ट प्रोटेक्ट मतलब सरक्षन तो इसके जो साथ अक्षर है- P-R-O-T-E-C-T तो इसके अनुसार ये साथ पद्धतिया हैं जिससे भगवान सरक्षन करते हैं तो पी है पहला परस्थनली परस्थनली मतलब व्यक्तिक तुरूप से वे स्वयम आते हैं और सरक्षन करते हैं तो कुन्ति महाराणी जब उनकी प्रातनाई शुरू करती है तो उनकी प्रातनाई अख्रावेशलोक से शुरू होती है और चौबिस विशलोक में वो स्वर्ण करती है कि हे प्रभो कितने सारे संकट आये थे हमारे जीवन में और उन सब में आपने हमारा सरक्षन किया विशान महागने पुरुशान दर्शिनाद असत्सभाया वनिवासि कुछ्रतहा पुरुशाद दर्शिनाद पुरुशाद दर्शिनाद पुरुशाद दर्शिनाद मतलब बड़ा बकासुर आये थे जो मानवों खा जाते थे उनके से तो इस प्रसंगों में अगर हम देखते हैं कई बार भगवान ने सरक्षन कैसे किया बृधे बृधे अनेक महारता अश्रुतस कि जब युद्ध हो रहा था तो अनेक बार आपने हमारा सरक्षन किया तो युद्ध में जैसे अभी परसुरे प्रवचन में महाराज बता रहे थे कि जब दुरोण, दुरदन और आर्जुन को चुनाव करना था तो दुरदन ने सोचा कि ये सक्रिशन क्या करेंगे वो अकेले हैं और युद्ध भी नहीं करने वाले हैं तो फिर क्या फाइदा है उसका पर ऐसे ने एक प्रसंग है जब भगवान भले ही अकेले हो और कुछ भी नहीं कर रहे हो फिर भी उन्होंने बहुत कुछ किया न केवल बहुत कुछ किया, सब कुछ किया तो बारबरी एक को ऐसे वर चाहिए था कि मैं देखना चाहता हूँ ये पूरे युद्ध को कैसे युद्ध, क्या होता है युद्ध में तो रणभूमे के बाजू में वो एक पहार के ऊपर स्थित होके सारा युद्ध देख रहा था उसके बाद में उसको पूछा गया कि आपने युद्ध में क्या देखा तो क्या हुआ, कैसे युद्ध हो गया किसने किससे युद्ध किया, कौसा युद्ध आपको सबसे अच्छा लगा, लोग पूछते कभी का चक्र था तो व्यक्तिगत रूप से भगवान ने ज़्यादा हस्तक्षित नहीं किया पर फिर भी कुछ प्रसंग है सिर्भीश्मपिता हमाँ का प्रसंग था, एसे उन्होंने स्वयम, जब अर्जुन युद्ध नहीं कर रहे थे पूरे उत्सहा के साथ, तो भगवान ने सोचा कि अभी तो मुझे ही कुछ करना पड़ेगा, नहीं तो न केवल अर्जुन का वध हो जाएगा, सारे पांड़ों का वध हो जाएगा भिश्मपितामा, तो भगवान ने क्या किया, भगवान सोचे, और पिर वो कूद गए, और कूद के दोड़ने लग गए सीधा भिश्मपितामा के ओर तो जब तलबार से युद्ध होता है, तो दो युद्ध सामने सामने होते हैं, पास होते हैं, पर जब तनुष्य से युद्ध होता है, थोड़ा अन्तर होता है दोने में तनुष्य से, तो इसलिए भिश्म के रथ में और आर्जुन के रथ में अन्तर था, तो भगवान कूद के दोड़ने लग गए, तो इसी प्रसंग का भिश्मपितामा आस वर्ण करते है हरिरिव अन्तुमिव गतो तरीयह वो कहते है, हरिरिव अन्तुम की जैसे शेर होता है, किसी हाथी का वत करने के लिए दोड़ते हुए आता है, जब आता है तो क्या होता है, गतो तरीयह तो कहते है, भगवान जब आ रहे थे तो आपकी जो उत्तरी थी, वो घिर गई और जब भगवान दोड़ने लग गए तो ऐसे बताये गया है, कि जब भगवान जा रहे थे तेज़िसे तो उन्होंने सोचा, अभी मुझे अर्जुन को बचाना है, कैसे बचाना है तो इतना चिंता और उत्सहा था कि तुरंद कूद गए वो और फिर वो देखे की अभी क्या लू मैं भिश्व पितामा का बत करने के लिए, तो फिर उन्होंने अपना खुदका सुरजीन चक्र क्योंं नहीं लाया वो इतने भाव विभूर सुरजीन चक्रों को बुलाने के लिए भूल गया तो क्या हो गया, उन्होंने महाँ पे एक चक्र दिख गया चक्र आस्तर है, चक्र के रूप आस्तर में उठा लिया, और फिर चक्र भगवान कैसे शक्ति है कि जब भगवान ने शिशुपाल का वद किया तो शिशुपाल के पास जाने के लिए उन्होंने दूरत नहीं थे सिर कोई चक्र छोड़ दिया, चक्र जाके सिर काट दिया पर जब भगवान जब भिशुपिता अमहां को मारा जाते थे, तो उन्होंने चक्र छोड़ा नहीं, वो दोरते हुए उनके पास गए और दोरते हुए क्योंं गए उनके पास क्योंंकि भगवान को चिंता थी कि अगर ये चक्र मिस हो जाएगा, तो क्या होगा तो इसलिए, किसी को अगर गोली बार नहीं तो पास बजाओ, तो निशर अच्छा लगता है तो इसलिए, भगवान दोड़ने लगगे और दोड़ के लगबाग, वो काफी अंतर तो चले गए, और तब आर्जुन को क्या कहो गया, भगवान ने तो वच्चन लिया था कि कभी मैं शस्त्र नहीं उठाओंगा, तो भले कि ये पह्या कोई शस्त्र नहीं है पर फिर भी लोग सोचेगे कि निन्दा करेगे भगवान की, मैं वो सहन नहीं कर सकता इसलिए, वो बोल से चिलने लगगे कि हे, भगवान कृष्ण लुग जाओ पर भगवान कृष्ण कृष्ण नहीं चल रहे थे, सिर्फ वो बीश्म को देख रहे थे और चक्र सोच रहे थे तो फिर, आर्जुन कूद गए, और आर्जुन दौडने लग गए भगवान के पिछे, पर भगवान इतना तेजल दौड रहे थे, कि आर्जुन उनके पास पहुच भी नहीं पाए थे, भगवान भी बीश्म पितामा के बहुत करीब चले गए थे तभी आर्जुन ने एक लॉंग जंप लगा दिया, जोर से कूद गए, और सीधा भगवान के पैरों पे गिर गए, और उनका पैर पकड लिया पर पैर पकड लिया पर भगवान का दोडने का प्रवाह इतना था कि आर्जुन उनके पैर में लगा हुआ वो गसीट ते गसीट ते वो दोडते चले गए हाँ फिर आर्जुन ने सुचा इस भगवान को रोकना ही है तो उनके विशाल पैर थे, तो उनके पैर उठाये दोनों पैर और जोर से जमीन पे मारे जोर से जमीन पे मारे तो क्या हो गया जमीन में खड़ा हो गया और उनके पैर उस खड़े में चले गए तो भगवान दोड रहे थे, आर्जुन के पैर तभी भगवान थोड़े शान्त हो गए तो यहाँ पर हम देखते हैं प्रसन कि कैसे भगवान व्यक्तिकत रूप से आर्जुन की सरक्षा करने के लिए आ जाते हैं पर अगर हम पूरा महाभारत देखेगे तो व्यक्तिकत रूप से अधिक बार नहीं आते भगवान तो हमें ऐसे नहीं अपेक्षा करनी चाहिए कि अगर मैं कुछ परार्थना करता हूँ कोई संकत आ गया है तो भगवान को व्यक्तिकत रूप से आना चाहिए तो यह एक पद्धती है और युद्धा में एक बार भगवान ने ऐसे दिखाया है और जो दूसरा है कि परोटेक्ट में हम देख रहे हैं भी पी आर आर यहने रप्रसेंटिटिव उनके प्रतिनिधी तो भगवान कई बार जो रक्षन करते हैं वो सुवेम नहीं करते हैं अपने प्रतिनिधियों के द्वारा करते हैं और अगर हम ये शलोग देखें कुन्टी महाराणी का विशान महागने पुरुश्याद दर्शना था तो एक तरह से देखे गए तो महागनी जब वारणावर्त का युध वारणावर्त में जलाए गए तो उसमें भगवान कहीं थे नहीं एक तरह से देखा जा था कृष्णा तो द्वारका में थे उस समय और भगवान तरह सरक्षिन के लिए नहीं आये थे पर फिर कुन्टी महाराणी कह रही कि आप नहीं सरक्षिन किया तो भगतों देखते है कि किसी भी तरह से अगर मेरा सरक्षिन हो रहा है तो अंतता यह भगवान की थुपा है तो वहाँ पर उनका सरक्षिन कैसे हुआ था विदूर के मदद से विदूर बड़े चौकनत है और विदूर समझ गए कि दुरितराश्टर है उसको अपने जो पांडव के प्रती इतना स्मेह कैसे हो गया है दुरितराश्टर ने क्या बताया पांडवों को कि जो वार्णावल थे वहाँ पर बहुत सुन्दर महल है और वहाँ पर बहुत उत्सोः होने वाला है तो क्योंं ना आप जाके वहाँ पर उत्सोः में सम्मिलत होके आनन लो और जब जा रहे हो तो वहाँ पर वहाँ पर हमार जो प्रज़ा है वो भी प्रसंद हो जाएगी उनका भी कैसे राजभार चल रहा है आप निरक्षिन कर सकते हो और जो कर मिल रहा है के लिए सकते हो और आप वो आननन में भी सम्मिलत हो सकते है तो विदूर तुरण चोकन्न हो गया है तो हम सोचा कि अगर इतने आननन्द की ही बात है तो फिर दुरितराश्ट तो कभी पांड़ाओ का आनन नहीं चाहते है वह अपने ही पुद्रो का आनन चाहते है तो दुरितराश्ट को क्योंं नहीं बेज़ रहे हैं वहाँ पे तो हमने सोचा और फिर अपने विदूर के जासूस थे जासूस के लिए उनको पढ़ा चल दिया कि यहाँ पे सचारी अंतर बनाया गया है और फिर उन्होंने जो विदूर चोकन्न कर दिया ना केवल उन्होंने चोकन ना किया पर बाद में उन्होंने कई योजनाई बनाई उन्होंने ऐसे योजनाई बनाई एक बड़ा रहस्यम है उन्होंने संदेश दिया कि जो व्यक्ति जा जब जा रहे थे वो हस्टनापुर्छोड के तभी उन्होंने ऐसे संदेश दिया कि जो व्यक्ति जानता है कि जो शस्तर शरीर को काटते नहीं है उनसे भी बृत्ति होती है वहाँ सरक्षित रहेगा और जो अगनी सबको जलाती है वहाँ जो साप और जानवर जमीन के अंदर चले जाते है उनको नहीं जलाती है वहाँ सरक्षित रहेगा और ये भी उन्होंने कैसे साधार भाषा में नहीं बोला वहाँ के जो लोगों के ग्रामन भाषा थी जैसे प्राकृत भाषा कहते है उसमें बताया उन्होंने तो पुंती सोचते लगे कि क्या बता रहे है पर भी दिश्टर बुद्धी मान थी दिश्टर ब्राहमन थे पर भी राजनिती के बाद उनके द्ञान था तो समझ गए क्या होने वाला है और फिर बाद में तो विदुर ने सबसे पहले उनको चौकन ना किया और फिर बाद में विदुर ने क्या किया था एसा एक प्रशीक्षित विक्ते को भेवा था कि वो उस महल से पूरा एक गुफा बना दें और न केवल उन्हें गुफा बना या थी है वो गुफा जो वहाँ से जंगल में निकलती थे जंगल के परे जो नदी थी उस नदी में एक नावी को भी रखा था उन्हें कि जब पांड़ाव निकले गे वहाँ से तो वो नावी उनको मदद करेगा और फिर वहाँ से वो बचके निकल जाएगे तो यहाँ पर कहने का मात्रो क्या है कि यहाँ पर डैरेक्कली अगर हम देखें तो भगवान का कोई अस्तक्षिक नहीं दिखाई देता है पर कुन्टी महाराणिया देख रही है कि भगवान नहीं एकारे किया है तो अधिकांच रूप से हमारे जीवन में हमें जो सरक्षन मिलेगा वो भगवान के प्रतिनिद्धियों के द्वारा ही मिलेगा प्रभुपात जी के लिए चेतना थी कि जब वे जलदूत पर जा रहे थे तो कई लोगों ने उन्हों हतोत साहित किया और उन्हों को कहा कि आप अगर अमेरिका में जाओगे तो वहाँ पर आपको शाकहारी अन्न नहीं मिलेगा आप तो वैश्णो सन्यासी हों, वहाँ पर रहेगा कैसे आओ तो फिर प्रभुपात जी का बड़ा संकल्प था, दूरों संकल्प उन्हों ने कहा कि ठीक है, मैं से वहाँ पर सबजे खाके जीदूंगा पर जब वह नाव पर जा रहे थे, अब नाव पर क्या करेंगे तो उन्होंने, सुन्ति मोराजी तो उनके मालिक थी जलदूत की तो उन्होंने कैप्टन पांड्या को बता दिया था कि ये वैश्णो सन्यासी है इनके लिए आप परियात शाकारी अन्न रखे हैं तो प्रावपाद जी अपने डायरी में लिखते है बड़ी विशेश बात लिखते है क्या है कि मैं भगवान कृष्ण का कृतग्य हूं कि उन्होंने सुन्ति मोराजी के रुदे से उसको मारगा दर्शन किया कि ये सारी योजनायो बना दे तो वो सुन्ति मोराजी के रुदे कृतग्य है पर वो क्या देख रहे हैं सुन्ति मोराजी कैसे कर रही है भगवान की योजना के द्वारा भगवान मारगा दर्शन कर रहे हैं तो जब हमारे जीवन में कोई समस्या आती है कोई संकट आता है तो फिर अधिकान शुरुप से हमें मारगा दर्शन कहां से मिलेगा भक्तों के द्वारा मिलेगा भगवान के प्रदिंदियों के द्वारा मिलेगा और अगर हम ऐसे सुछते हैं कि नहीं नहीं नहीं भगवान डारेक्किली मेरे जीवन में आने चुई है वैसे अधिकान शुरुप से नहीं होता है आपको भी लोगों कहानी पता होगी एक बार एक जगह पूर आ गया था बाड आ गयी थी और वहाँ पे एक विक्ति बैठा था अपने घर में सब लोग दौड रहे थे अभी निकलो तो उपर से बाड इतनी उपे वो अपने चक पे चले गए थे और चक पे भी पानी भी आया लग गया थे तो उपर से एक हेलिकॉप्टर आ गया और हेलिकॉप्टर से एक रसी चिफ्टी गया थे चलो उपर से बाड आ गया थे तो उपर से बाड आ गया थे तो उपर से बा अब यहां से आपको बचना है तो यही मार गया है तो बोले नहीं मैं भगवान का भक्त हूँ भगवान मुझे बचा देखे हाँ फिर वैसे बचे थे और फिर क्या हो गया आंत में बाड आ गया है और डूबने लग गये वो बगवान आपने मुझे बचाया क्योंं नहीं तो भी आकाश्वानी भई तो बोले मैंने ही सारे तीन लोगों को भेजा था मैंने ही पहले चेताओंने देने वाले पहले लोगों को भेजा फिर नावी को भेजा फिर हेलिकॉप्ट वाले को भेजा तुम ने नहीं बोला अभी गुद्धोष किसका है तो इसलिए भक्त कभी ऐसा भाव नहीं रखते है कि भगवान मेरे सरक्षन के लिए कुछ चमतकार करना चाहिए कि भगवान साधारंते आप अपने भक्तों के लिए हमारे सरक्षन करते है तो यह है उनके पत्मे दियों के लिए और फिर जो ओ है ओ इंग्लीश में हम बोला है Omnipotence Omnipotence means सर्वशक्तिमत्ता जो भगवान के विशाल चक्ति है उसके द्वारा वो कभी चमतकार भी कर सकते हैं तो अपने चमतकार के बेक्षा भक्त नहीं करते हैं पर भगवान चमतकार करते भी है कभी कभी और यह हम देखते है असथ सभाया असथ सभाया मतलब कि जब द्रोपदी का वस्तर हरण हो रहा था तो भगवान ने क्या किया भगवान ने अपनी अलसीमित चक्ति के द्वारा द्रोपदी का जो वस्तर था सारी थी उसको अलसीमित लंबा बना दिया अलसीमित लंबा बना दिया कभी कभी हमारा तचितर देखते है तो वो उसका जो दुरिष्टान जो करते है दुरिष्टान दिखाते है वो अलग-अलग बने से दिखाते है कभी कभी वो दिखाते है कि वहाँ पर कृष्ण भगवान स्वयम है और हाथ उपर करके हस रहे है और प्रसन नविद्रा से वो सारी दे रहे है कभी कभी दिखाते है वो चक्र है वहाँ पे और चक्र से सारी आ रही है कभी कभी दिखाते है एक जोती है वहाँ से सारी आ रही है तो वास्तव में क्या हुआ कि किसी को समझा नहीं तो क्रिशन भगवान थे पर कभी किसी दे वहाँ पे क्रिशन को देखा नहीं वो सारी कहां से आ रही है किसी को समझ में नहीं आ रहा था क्या हो रहा था तभी वास्तव में दुश्यासन खिच जा रहा था खिच जा रहा था खिच जा रहा था पर जो सारी कभी अंति नहीं हो रहे थे तो उतना ही देख रहे थे सब और सब आश्चर जगत हो रहे थे तो यहां पे भगवान कभी कभी चमतकार भी दिखा देते हैं तो शामसुन दर्पूर प्रवापाद जी का शिष्च थे वे बता रहे थे कि प्रवापाद जी ने उनसे कहा कि मुझे वो शामसुन दर्पूर जो एक बड़े विख्षात संगीत कार थे जॉर्ज हरेसन उनके मित्र बन गए थे और उनने जॉर्ज हरेसन से तभी लंडम मंदिर बनाने वाले थे तो उसके ऊपर पूरा मंदिर का अल्टर था पूरा वो संग मार्वल का बनाना था तो इसलिए जॉर्ज हरेसन से उनने डोनेशन लिया था और फिर प्रवापाद जी ने कहा कि मुझे कृष्णा बुक चापना है भी मुझे कृष्णा बुक चापना है और तुम जाके जॉर्ज हरेसन से कहो कि हमें उसके लिए पैसे चाहिए है तो फिर जो इसराम सुन्दर पहुँ जो थे वो जॉर्ज हरेसन का विश्वास इस तरह जीता था कि हम आपसे कोई पैसे नहीं चाहिए आपको कि बहुत से लोग आते हैं उनको पैसा मांगते हैं हम आपसे पैसे नहीं मांगेगे तो ये जो मार्बल था वो भी उन्होंने बता रहा था कि मैं ये मंदिर बनाने में जनद कर रहा हूँ तो बोले मैं क्या करूँ क्या आप मार्बल दे सकते हैं तो अभी-अभी मैं मार्बल का डोनेशन दिया था अब तो शामसंदर वो थोड़ी हिच किचा रहे लग गये वो बोले कि प्रहुपाजी मैं अभी उससे मांगा है और अब बार-बार मांगेगे तो हमारा जो रिष्टा है उससे कम हो जाएगा नहीं-नहीं तो प्रहुपाजी बोले कोई बात नहीं तुम नहीं मांग रहे हो तुम जो उसका दोश है मुझे लगा दो तुम बोल दो कि मेरे गुरू ने बताया है कि आप ये दियो तो शामसुदर बोले क्या करें लगे तो फिर वह उनसे मिलने गए उनका बड़ा महल था तो फिर जब मिले तो फिर वह बात चीत होई थोड़ी बहुत और फिर वहने कहा कि कि जो हम कृष्णा वोग चाप रहे है उसके लिए कुछ अटिमेशन चाहिए और जब वो जॉय हर से सुना तो उनका चेहरा पुरा गिर गया हो और तो बोला के मैं नहीं तोड़ा कि तुम ऐसे हैं थे मैंने तुछे था कि तुम ऐसे हैं थे तो वह बोला ए शामसुदर बोले क्या करोगे पुरा उनका जो सियाता उताला हो गया और अच्छानक तभी क्या हो गया तभी वातावरण पुरा बिल्कुल साधारन वातावरण था और अच्छानक बड़ी बिजली हो गई और अच्छानक मानो थार थार थार तभी कुछ गिरता है आस्मान से बिजली कहीं गिरती है एक दो तीन चार पाँच आठ तभी पावल चला गया पावल चला गया और तीन चार पाँच मिलेट तर चला और उस समय बाद में वो शाम्समे बोल रही है हमने तभी वेदर फोरकास्ट बग़ा चेक किया जो भविश्वानी होती है वातावरण की तो वहाँ पर कुछ भादल नहीं था कुछ भी बिजली होने का संभावारा नहीं था तो पाँच मिलेट तर ऐसे बिजली गिरते रही गिरते रही और फिर पूरा अंधेरा था और जब वापस लश्णे आ गई तो जौर्ज हैडल का छेहरा प्रसंद हो गया था बोले उसके बाद तो मुझे देना ही पड़ेगा भाविश्वान के साथ तो फिर न के बाद उन्होंने लक्ष्मी दे दी पर वो किताप के लिए अपना फोरवर्ड भी लिग दिया उन्होंने पस्ताव न हो दे वो भी लिग दी तो कभी कभी भगवान चमतकार भी कर सकते हैं और ऐसे नहीं है कि ये आध्व ये प्राचीन काल में चमतकार हुए थे आध्वनित जीवन में भी चमतकार होते हैं कई पार तो ये चमतकार तो कभी कभी विद्यानगर में मंदिर है बड़ा मंदिर है तो मंदिर का पांगण है वो किसी एक भक्त का घर था वो तो किंद्र था वो सोच था कि हमें मंदिर बनाने का जगा चाहिए फिर उसको बनाना है बड़ा मंदिर कैसे बनेगा पता नहीं तो वो जो बड़ा बंगला था उनका उनके सपने में आ गए प्रभुपाजी प्रभुपाजी ने कहा कि ये जो तुम्हारा बंगला है तो मंदिर बना दो और फिर तो हमें डरना नहीं चाहिए कि ऐसे हमारे सपने में भी आ जाएगे ये ऐसा बहुत कृपा की बात है अगर कोई आते है बगवान तो तो फिर उन्हें वैसे कर दिया तो भक्त सोच रहे थे कि अभी हम घा से इतना पंड़ लेगे फिर बंदिर बनाएगे तो ready made बंदिर मिल गया कभी कभी भगवान ऐसे चमतकार भी कर सकते है पर भक्त ऐसे चमतकार की मांग नहीं करते हैं बगवान से भगवान जी पात परें लिखते है कि हम सब भगवान के सेवक हैं और सेवक का भाव क्या है कि मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ना कि आप मेरे लिए क्या कर सकते हैं तो जब हम भगवान की सेवा कर रहे हैं और सेवा करते हैं कोई व्यत्ते आ जाता है कोई समस्य आ जाती है तो भगवान तभी ज़रूर मदद करते हैं पर वो अपेक्षा या वो मांग भक्त नहीं करते हैं भक्त कहते हैं कि ब्रावपाजी को पूछा गए था एक बाद कि हम भगवान से क्या प्राथना करने चाहिए ब्रावपाजी को बोले थे कि एक ही प्राथना करो कि ये प्रभो आपकी सेवा करने की शक्ति कुण दिजिये Please give us the strength to serve जो भी परस्तिति आये कितनी भी बड़ी विपत्ति आये कितनी भी बड़ी समस्य आये आपके सेवा करने का हमें शक्ति दिजिये और वही भाव आस्तमें हम हरे कुछ महा मंतरी जब में करते हैं तो ये है भगवान के सरवशक्ति मत्ता टी जो है प्रोटेक्ट में हम चल रहे है टीचिस उनकी शिक्षाएं तो शिक्षाएं ये बड़ी महतुपूर्ण हैं जिसके के धारा भगवान संक्षिन देते हैं तो साधारन तया अगर अभी हम देखते हैं कि युद्ध शुरू होने के पहले ही आर्जुन मोह ग्रस्त हो गए तो ऐसे बताए गया है धारा भगवान गीता महात्में अलग अलग आचार्यों ने लिखा हुआ है तो श्री वैश्ण संपर्णाय में एक श्री वैश्णो गीता महात्में है उसमें श्लोग आता है कि भगवान ने कैसे अपने भगता अरजुन के रक्षा की वे आरजुन के सार्थी बन दे और फिर वोने जो गीतामृत था उसको प्रदान किया इससे न केवलों ने आरजुन का कल्यान किया पर सब लोगों का कल्यान कर रहा लोकर्त्र योपकाराय तस्मही कृष्णात्मने नमः तो ऐसे भगवान कृष्ण को मैं प्रनाम करता हूं, नमन करता हूं तो अभी शिक्षाओं के दारा सरक्षन का मतलब क्या है अगर कोई बालद बोलता है कि मैं दस्वी मंजल से कूठ जाओंगा और मेरे बिताजी मेरा सरक्षन कर लेगे तो वास्तव में बिताजी का सरक्षन क्या है पहले उनको बताना शिक्षा देना कि आप ऐसे पूछना नहीं चाहिए जो शिक्षाए है मतलब क्या गलत कारे पे न जाए यह बताना भी शिक्षा है और यह शिक्षा भी सरक्षन है तो अगर भगवान के शिक्षाओं के रूपे सरक्षन है उसका हम पालन नहीं करते है तो फिर उसके बाद में अगर हमारा सरक्षन नहीं होता है तो हम भगवान को दोश नहीं दे सकते है अगर कोई बालक खूद जाता है दस्वी कुंजिल से और फिर उसके हाथ पैठों जाता है किताजी आपने मेरा सरक्षन क्योंं नहीं किया तुमने मेरे मात को पहले माना नहीं इसलिए सरक्षन नहीं हुआ तो अभी प्रधान रूप से मारा सरक्षन क्या है यह चार नियम है यह वास्तो में क्या है यह हमारे जीवन के सरक्षन के लिए कुंपन है कुंपन होता है कुंपन से कोई जानवर या कोई ऐसे खतरनाक चोर वगेरे होते है उनको आने में समस्य होती है तो यही हम देखते हैं रामायान में लक्ष्मन चले गए राम के आवाज में जब मारीच चीख मारे थी तो तभी बताये गया है कि लक्ष्मन ने क्या किया सीता माता को कहा कि आप लक्ष्मन देखा के बाहर मत जाओ तो लक्ष्मन देखा के बाहर चले गई तो क्या हो गया तो उनको अपहरन करके रामायान लेके गए तो भगवान की शिक्षाय है वह केवल सुन के हसने के लिए तालिया बजाने के लिए, मनोरंजन के लिए नहीं है वह हमारे जीवन में अमल करके सरक्षिय प्राप्थ हरने के लिए है और जितना हम ये शिक्षायों का अमल करेंगे उतना हम देखें कि हमारे जीवन में जो समस्याय है वो कम हो जाएगे कैसे कम होगी ऐसे नहीं है कि बहुती जगत में सुखे हो जाएगे पर हम देखते है कि जितने लोग ये कारे करते है नशा पान करते है तो फिर क्या होता है वो भी उसके बाद में ऐसी समस्याओं में फ़स जाते हैं कि जीवन बहुत जगती हो जाता है उससे पर ये जब कारे को छोड़ देते हैं तो हम क्या होता है हमारे सवरक्षन होता है तो हमें जो भगवान के शीक्षाएं हैं उनको एक ऐसे बंधन के रूप में नहीं देखना है सवरक्षन के रूप में देखना है बंधन मतलब रस्ट्रिक्षन सवरक्षन मतलब प्रोटेक्षन कि जब मा अपने जब कोई बड़े बहुत भीड ऐसे जगा में हैं और ऐसे भीड से अगर कोई जा रहे है मा और बालल जा रहे तो मा बोलते है बालल को मैं तुमको अपने गोदी में उठा लेते हूँ मैं अपने हाथ में पकर दी हूँ और फिर हम जाते हैं अगर बालल बोलता है तो अभी इतनी भीड है अगर हाथ छूर जाएगा कहां गुम जाएगा पता नहीं चलेगा तो वो बालल को लग सकता है कि मैं मा बोलते हूँ मैं उठा लूँगी तुमको मैं तुमारे हाथ में रहोगे तो बालल को लग सकता है कि मैं चल सकता हूँ, मैं चलना आता है मैं कैसे बंधन में क्योंं पड़ू, पर बंधन नहीं है, सवरक्षन है हमारा मान कभी कभी हम बोल सकता है कि नहीं, ये सब कारे करूंगा मैं पर मैं समस्या में नहीं फ़सूँगा, मैं बड़ा बुद्धिवान हूँ, ऐसे नहीं होता है तो ऐसे बोलना है कि मैं डस्वी वंजल से गिरूंगा, खुदूंगा, पर मेरा हाथ पेर नहीं तूटेगा तो आज तो शिक्षा है जो है, ये परधान सवरक्षन है तो हमारे जीवन में भगवान के प्रतियों नहीं लिए और भगवान के शिक्षा है, ये दो प्रतियों से हमें सवरक्षन मिलता है और फिर ये जो है एंपावर्मेंट, एंपावर्मेंट मतलब शक्ति प्रदान करते हैं भगवान विशान महाग ने पुरुशाद धर्शना था जो पुरुशाद धर्शना था, जो बड़े बड़े असुर आते थे और वे असुर जब आक्रवन करते थे, अभी जो बकासुर था, दो बकासुर है, एक बकासुर कृष्णलीला में है, जो वृंदावन में थे और एक बकासुर जो है, वह पांडव के पहले वनवास में थे, पांडव दो बार वनवास में गए थे पहला वनवास जब था, कि जब वारणावत को जलाया गया, तब वो वन में रह रहे थे कुछ समय के लिए और दूसरे बार, जब वो जुए में हार गए, तो उसके बार में वन में गए थे तो पहले बार जब वन में गए थे, तो एक बड़ा खतरनाक आसुर था एक चक्र ग्रां, जो रित्यानन्प्रू का धाम है, महाँ पे और उसके साथ भीम ने बड़ा युद्धर किया तो क्या हुआ था, वो आसुर कभी भी किसी को आके माल रहा था तो नागरी को ले क्या यूजणा की थी, कि हम रोज एक व्यक्ति को तुम्हारे लिए एक बड़ा, जो बैल गाड़ी है, उससे भरे वो अन्नाके साथ भीज देते तो फिर जिस घर में पांड़ाव रहे थे, उस घर से तभी एक व्यक्ति को जाना था तो अगर परिवार वाले रो रहे थे, कि अगर किसको भिजेगे, तो कुंटी माहरानी कहा कि भीम तुम जाओ, तो भीम बड़े उत्साही हो गए, क्योंंकि उनको तो जो शत्रिय भाव बहुत अधिकत तो उनको युद्ध करने की इच्छा थी तो उससे वोने ब्रामभन का रूप लिया था, तो ब्रामभन युद्ध भी नहीं कर सकते है तो फिर वो उत्साहाँ चले गए, और फिर वो बैल, गाड़ी भरके पूरा अन्ना था तो भीम ने कहा, वैसे भी तो इसको मारने वाले है, सुचा उनने तो अगर मरने वाले है, तो उसको खाने के उदर मैं पहले खा लेता हूँ तो जाते जाते खा रहे थे, खा रहे थे, खा रहे थे और आराम से गए, और उदर वो भकास और भूँक से तडब रहा था और कौन है, कुछी करने लग गया, चिलने लग गया और फिर देख रहा था बार बार, कोई आ रहा नहीं, और बाद में उसने देखा की कि विप्ति आ रहा है, इतना आराम से आ रहा है, और क्या कर रहा है मेरा अन्न खा रहा है, खा रहा था और तबी लगबग कुछ बचा ही नहीं था इतना क्रोईज हो गया पकास और वो कहने लगा कि मैं तुम्हारी पूर चत्मी कर दूंगा तो भीम उसको देखा भी नहीं, सब खाते गए और चिला आके आके भीम को मारने लग गया, भीम सब खाते गए पीट पे मारा तो कुछ भी हुआ नहीं भी, भीम खाते गए चिला रहा था, गुर्रा रहा था ऐसा खाफनाग आवाज कर रहा था और उसको और उक्साने के लिए भीम ने क्या किया उतर गए, फुरा खाना तो खा लिया था भी उतर गए और फिर उसको और उक्साने के लिए पानी लिया, पानी पिया, आराम से हाथ और मुझ दिया दोया और फिर उसके और मुझे और फिर अपनी सारी शक्ति से उसको मार डाला तो यहाँ पे जो शक्ति थी भीम को कहा से मिली थी यहाँ भगवान की कृपा से मिली थी भगवान की कृपा कैसे हुई थी?
ऐसे नहीं है कि भगवान ने कभी भीम के शरीर पर हाथ रखा था अभी मैं तुम्हारे शरीर में शक्ति पदावान करता हूं नहीं, उनकी जनम से ही शक्ति बहुत थी और जनम से शक्ति मिलती है, प्रतिभा होती है, वो कहां से आती है? वो बासता में भगवान की कृपा है तो इनकी शक्ति मिल थी बच्चपन से ही एक बात, जब पहले कुंटी और पांडु जंगल में वास कर रहे थे तो तबी एक पहाड के उपर वो बैठी थी, कुंटी और पांडु बैठे थे और कुंटी तो भी सो गई थी, तो थोड़ी सो गई थी बैठे बैठे तबी पास में ही कही एक शेर का आवाज आया तो पहाड के बाजी में बैठे देखो, महाँ पर जो सारा सुंदर देख रहे थे तो पहाड का शेर का गुराने का आवाज आया, तो कुंटी उट गई और उट गई, तो उनके गोद में एक जो भीम था वो क्या हो गया, फिका गया और पहाड से नीची गिर गया वो, तो कुंटी चीखने लगे, क्या हो गया ये और जो पंडु थे वो भी डर गये, और पंडु तेजी से वो पहाड से नीची दोरते दोरते आने और दोरते दोरते आके देखा, कि जो भीम था, एक बड़े पत्थर पर गिरा था और क्या हो गया था, कि गिरने से वो पत्थर पुरा तूट गया था, और भीम को कुछ भी नहीं हो गया था तो भीम के ऐसी शक्ति थी, वो कहां से आयी थी, भगवान के कुरपा से थी तो कुंटी महाराजी देख रही है कि ये शक्ति है, भगवान के कुरपा है और यहीं हम देखते हैं, कि इसी स्कंदर के बाद 15 अध्याय में आएगा, 14-15 अध्याय में कि कैसे, आर्जुन के पास इतनी शक्ति थी, पर वो चले, वान्चितों हम महाराजा कहने के मेरे सारी शक्ति चले गई है, क्योंं चले गई है, क्योंंकि भगवान ने देदी शक्ति, और भगवान ने जब चाहा तो शक्ति देली है तो इसलिए हमारे भी एक शम्ता होती है, प्रचार करने की हो, खीरतन करने की हो, मैनेज्बिन करने की हो, जो पृतिभा होती है, एक शम्ता होती है, ऐसे मैं इनहीं सोचना चाहिए कि यह, मैं इतना पृतिभा चाहिए हूँ, यह कारे कर रहा हूँ, बासता भगवान की कु यहाँ हम देखते हैं, बिशान, जब दुरधन को जहर पिलाया गया था, तो क्या हुआ था, अलग-अलग परस्तित्यों का समन्वए हो गया, तो जब दुरधन ने, उस समय, जो पांडु के पितर थे पांड़ाओ, वे उनको, वो तो नेक उद्धाय के थे, और वो दुर तो आओ, हम आया था, हम सब खाते हैं, और फिर, जब वो खारे सबको खिला रहे थे, तो उन्होंने स्वयम क्या किया, दुरधन ने, वो गए स्वयम, मैं भीम तुम्हे खिराता हूँ, और भीम के जो अनने था, उसमें पूरा जहर डावा था, और फिर वो खाके हो गया, और भीम के जो आओ, हम खेलते हैं, तो अभी, क्या, वो पानी में खेलने थे, दुरधन इत्सार कर रहे थे, यह जहर का कुछ प्रभाव ही नहीं हो रहा है, कब प्रभाव होगा?
क्योंंकि भीम का शरी इत्ता शक्तुशाली था, कि उस प्रभाव होने को काफी समय लग गया है, उन्हें ऐसा जहर डाला था, कि खुछी समय से नहीं, व्यक्ति मूर्चित हो जाएगा, तो उनकी योजना था, कि क्या थी, कि दुरधन के लिए थी, कि हम बोले कि हम सब खेलत रहे हैं, और बाकी सब पांड़ा उसके खेलने चले गाएगे, भीम बोलेगा कि आभी मुझे थोड़ा सोना है, और जब वो सोना सोतेगा, तो वो हमेशा की निन हो जाएगी उसकी, पर वो भीम खेल रहे थे, खेल दे जा रहे थे, तो बाद मुझे थक गए थोड़े भ और लेड गए थोड़ो धन के थोड़ो दियोजना थी, अपनी सारे भाईयो को लाया, और सारे शरीर को बांद दिया, और शरीर को बांद के फिर बाद में, बास में नदी थी उसमें फेक दिया, जब ये ख़टब हो गया से कुछ, जब फेक दिया, तो उस नदी में जहरी सापों ने, जब देखा कह रही है, मानो हमारे इसमें कैसे आ गया है, ताक, ताक, ताक, ताक, काटने लग गया है, पार क्या हो गया था, कि भगवान की योजना ऐसी थी, कि दुर्योदन ने ऐसा जहर छुना, भाँ से जहर छुन सकता था वो, पर उसने ऐसा जहर छुना, कि वो जहर, और ये सापों का जहर था, और वो दोनों ने एक उसे पतिकार कर दिया, तो ये पहले शरीब में जहर था, और ये दूसरा जह आ गया, पतिकार हो गया, और फिर उसके बाद में भी होश में आ गया, और सब ये साप देखे, दादाड हो गया, ये साप दर जाएगा, भी में ने देखा, अच्छो चलो, साप को पकड़ के, सब फेकने लगे, तो साप देखे, किसी बानों ने ऐसे हमेरे साथ किया नहीं तो वो दर के चले गए, और नदी के अंदर जो वरुन के राजा थे, नदी के राजा थे, उनके पास चले गए, वो लगे कि एक खतरणाक बानों आ गया है, वो ऐसा बानों कभी देखा ही नहीं हमने, इसको बुला के लेके आओ, तो आप कुछ करो, तो उसके मंतरी थे, व वरुन ने उनको बुला लिया, और फिर उन्हें कहा, कि आप मारे अतिती बन के आए हो, तो मैं आँको कुछ देना चाहता हूँ, तो उन्हें कहा कि हमारे पास जो अमरुत जैसे तुल्ले, जैसे सौम होता है स्वर्ग में, उनके पास भी एक अमरुत तुल्ले जैसे था, और यद्राव्य पीने से आप बहुत शक्तिशाली बन जाओंगे।
तो फिर, भीम दो चीज़ों के लिए हमेशा त्यार रहते थे, खाना और युद्धा, तो उनको भीम कर्मा अबृको तरखा था, तो अभी वो जहर का पतिकार हो गया था, तो फिर वो जो एक बड़ा मटका होता था, और वो जो वरोले सोचा, कि आप जितना क्योंं पिना जाते हैं, पी सकते हैं इसमें से, तो साधारल लेक्ति जो होता है, उनके से सबसे बड़ा युद्धा भी था, वो एक मटके से जाधा नहीं पी सकता था, तो भीम ने उठाया, एक मटका तुरंद पी लिया, दूसरा मटका पी लिया, तीसरा मटका पी लिया, और साब जब अरुड गए था, तो देख रहे थे क्या चल रहा है ये, कैसे वो इतना पी सकता है, थीन, चार, पाँच, शै, साथ मटके उन्होंने पी थे, और फिर उन्होंने अभी मुझे सुना है, तो फिर उन्होंने अच्छा कमरा दिखा रहे थे, उसे बिस्तर दिखा रहे थे, और उन्होंने सुन वहे, तो क्या वो जो अमरुत पुले जो द्रोबे था, उससे क्या हो था, जो शरीर था, वो एक मटका पीने से विक्ति के शरीर में एक हजार हातियों की शक्ति आ जाते थे, तो उन्होंने साथ मटके पीने थे, तो फिर क्या हो गया, भीम की शक्ति, शरीर तो बझरो जैसे बन गया, और वो शक्ति की लगबग आसीमित जैसे हो गयी, इसलिए जब भीम युद्धा कर दे थे, तो जब युद्धा हो था, तो वो भी कभी कभी धनुशे बाण इस्त शत्रू के, वो शत्रू के सैनिकों के अंदर से ले जाते हैं, उन्होंने गधा गुमाते रहते थे, गुमाते रहते थे, और वो, औरों के सैनिकों ने ऐसे कभी देखा ही नहीं था, कुई शत्रू हमारे अंदर ये आँगे हमको मार रहा है ऐसे, दूर से युद्धा ठीक ह है, तो उनकी इसे इतनी शक्ति थी, तो ऐसा लोगा वाज़ करते हैं, बस सारा शरीर जो था, खुण से बढ़ जाता था, और सारा उनका शरीर लाड़ जाता था, और लाड़ शरीर में, सिर्फ उनकी आखे और उनका दाद सफेध था, तो उनको देखके ही सब दर जा तो ये भगवान अलग अलग परस्तितियों के द्वारा भी भगत को शक्ति दे सकते हैं तो ये है परस्तितियों के द्वारा, सरकंस्टन्स कॉंबिनेशन के द्वारा और जो अंतिम जो है प्रोटेक्ट में, टी अने टाइम, समय है कभी-कभी भगवान का सरक्षन प्राप करने के लिए समय का इंतिजार करना पड़ता है तो कभी-कभी भगवान ऐसा सरक्षन देते हैं, कि वो तुरंथ हमें पता नहीं चलता है तो आप चाहिए जानते हो, ये एक आस्यास्वित प्रसंग है वास्तविक नहीं है, एधियातिक नहीं है, शास्ट्रिक नहीं है ये, पर इससे मुझे आता है तो एक बार ये व्यक्ति ने बहुत प्रारथना की भगवान से और भगवान से मुझे कहा, जब भगवान पसंग हो गए तो नहीं भगवान, आप तो इतने महान हो, आप शक्तुशाली हो, आप सारे ब्रह्मांडो के स्वामी हो मस्का लगा रहे थे भगवान को मुझे कहा, कि हमारा एक पल आपके लिए क्या है?
होले, तुमारा एक पल हमारे लिए क्या है? तो, वो अजारों साल है, आप कितने महान हो तुम, तो तुमारा एक आणा हमारे लिए क्या है? होले, क्रौल रुपए है वो, कितने महान हो, आप एक रुपा करो मुझे, आप आपका एक आणा मुझे देते हो, तो भगवान कहा, एक पल के बाद तो, भगवान को हम फसा नहीं सकते हैं, भगवान का सर्कल होता है, उनके काल के अनुसार आता है, वास्तो में अगर हम महाभारत देखते हैं, तो भगवान स्मयम थे, पांडव इतने शक्तिशाली थे पर, पांडवों को राजा विश्व, को स्थायी रूप से राजा वनाने के लिए, भगवान को 84 साल तक प्रेतन करना पड़ा हो, 84 साल के बाद, 84 साल के प्रयास के बाद, जो पांडव थें राजा बने, वो कैसे है, वनवास तो 12-13 साल था, उसके पहले भी, बहुत से शड करना पड़ा है, तो हमें से कितने साल गए, और उसके बाद में, पांडव कोरो का बद हो गया, उसके बाद में, वो प्रस्थापित हो गया तो इसलिए, हम प्रभुपाद जी के जीवन में भी देखते हैं, प्रभुपाद जी को आदेश दिया, उनके गुरुदेवी प्रचार करने का, पहले भी मीटिंग, 1922 में, प्रभुपाद जी ने लगबग 1942-1942 साल में प्रचार अच्छी तो चालू कर दिया, तो पहल साल तो बहुत कठीन था, 1966 के बाद में यश मिल नहीं लगगा, और तभी भी इतना यश नहीं मिला, उसके बाद 1968 में, प्रभुपाद जी को बड़ा अटैक आ गया था, स्ट्रोक आ गया था, और उसके प्रारण उनको भार दुना वापसाना पड़ा, पर वो जो सारा हाथसा हा वा, उससे उनके जो शिष्य थे, उनको और प्रेणा मिली के, कि स्वामी जी इतने वृद्ध है, फिर भी हमारे लिए इतना त्याग कर रहे है, और तभी उन्हें प्रचार चालू गर गया, फिर 1968 में, प्रभुपाद जी जब अमेरिका में गया, इसके बाद में, जो हरे कृष्णा अंदर्म का विस्पोर्ट जैसे प्रचार हो गया, तो प्रभुपाद जी को भी प्रचार करने के लिए, 46 साल तक इंदिजार करना पड़ा, तो इसलिए, हमें तुरंद नहीं अपेक्षा करने चाहिए, कि मैं आज हरे कृष्णा महामंतर जब कर रहा हूँ, मैं कल सुबह उठूँगा, तो काम, क्रोध, लोग सब गया, मैं आज हरे कृष्णा महामंतर जब कर रहा हूँ, कल जब मैं प्रवचन दूगा, साब लोग तालिया बजागे, तालिया, तालिया, तालिया, ऐसे नहीं होता है, समय लगता है, तो एक तरह से समय, सम्र रखना, सम्र रखना यह श्रद्धा का लक्षन है, कि श्रद्धा जो होती है, मेरे बगवान में श्रद्धा है, मैं कैसे बोल सकता हूँ, वास्तव में श्रद्धा का लक्षन है, सम्र रखना, कि हम इन्तिसार करते हैं, जिसे मान लें हमें डॉक्टर हैं, तो डॉक्टर में अगर श्रद्धा हैं हमें, तो डॉक्टर ऐसे नहीं बोलता है, कि अगर तुमको बिमारी हो गए, बहुत कठी बिमारी है, तो ऐसे नहीं कि आज दवाई दो, कल ठीक हो जाएगा, डॉक्टर बोलेगा एक मेहना, दो मेहना, आप दवाई दे दे रहो, और फिर उसके बाद में, अंत में आप ठीक हो जाएगे, तो जो समय लगता है, वो उसके लिए सब्रक्त है, तो मेरा एक वेब साइट है, बिस्पिन साइन्टेस, उसमें मैं आप प्रश्णों का ओप्तर देता हूँ, तो वहाँ पे एक विद्ध्यारती ना सवाल पूछा, कि गुरु महाराज को छे महने में, वो शुद्ध भक्त बन गए, तो अगर हम ठीवरल से भक्ति करेंगे, रोज ध्यान, पुरुख, सोला माला जब करेंगे, तो क्या अगर छे महने नहीं, पर दस महने में क्या हम शुद्ध भक्त बन सकते हैं, और अगर नहीं बन सकते हैं, तो फिर क्या ये भक्ति में शक्ति नहीं है, तो फिर जो सेवा भाव है, भाव कहा रहता है, अगर हम मांग कर रहे हैं बगवान से, तो आज मैं मांग करूँगा कि बगवान, दस महने में मुझे आप भगवतदाम ले जाओ, तो फिर हमें बगवतदाम में जा किया, तो भगवान, आज आप लाल ड्रेस पहनें, आज आप ये खाओ, आज आप ये लीला करो, तो जिज़ो, अगर मांगने का संक्ला चालू हो जाएगा, तो मांगने का संक्ला का अंत कहां होगा, तो वास्तव में है, और फिर हम बोले, ये भगवान, आप मेरी प्रगती कर रहे हैं, अच्छी बात है, पर उसकी प्रगती मुझे मतरे दो आप, जब मांगने का संक्ला चालू होती है, उससा कोई अंत नहीं होता है, तो इसलिए भगवान क्या आशा करता है, कि भगवान हमेशा आप, आपकी सेवा में मुझे बरकरार रखो, कितना भी समय नहीं लग जाए, मुझे चुद्ध होने के लिए, मुझे उसकी चिंदा नहीं है, पर मुझे कभी आपका समय, आपकी जो सेवा है, उससे वांचित मत करो।
कुणशीकर महाराज कहते है, कि कुंद मूर्धा प्रणिपत्याचे भवन्तमेकांतमियंतमर्थम अविस्मतिस्त्वचर्णारुविंदे भवेभवेमेस्तुभवत्मसादात मैं कहते है, है भगवान हुकुंद, मूर्धा प्रणिपत्याचे, मैं मेरा सिर आपके सामने रखता हूँ, और याचना करता हूँ, प्रणिपत्याचे, क्या याचना करता हूँ, भवन्तमेकांतमियंतमर्थम मैं एक ही चीज़ मांग कर रहा हूँ आपसे, क्या है, अविस्मतिस्त्वचर्णारुविंदे कि कभी भी आपके चरणा की मुझे विस्मति न हो जाये, कभी मैं आपको भूलू नहीं हूँ, और भवे भवे में स्तुभव प्रसांदात। वह कहते हैं, कि भवे भवे, भले ही अनेक जन्म क्योंं न हो जाये, मुझे भले ही अनेक जन्म लेने पड़े इस जगत में, वो मुझे मनसूर है, मुझे इसमें कोई आइतराज नहीं है, जरूर मैं जाहता हूँ कि जल्ले जल्ले आपके पास आजाओं, पर ये मेरी मांग नहीं है, कभी मैं आपको भूम लेगी, कभी हमेशा मैं आपको चलान कमलो का समय करते हूँ, तो इस तरह से, जब हम समझते हैं, कि अलग अलग प्रकार पंधति से बगवान हमारा सरक्षिन कर सकते हैं, तो फिर उससे, भले ही कुछ विपत्ति आ जाए हमारे जीवन में, तो हम उससे विचलत नहीं होते हैं, क्योंंकि चार-पाँच मेहने पहले, जो राधा कुपिनाथ मंदे में जब वहाँ था, तो हाँपे एक दुरघतना हो गई, कई आट भक्ते थे, वो जा रहे थे, हिमालेयो में बद्रिनाथ का दर्शन करने के लिए, और वहाँ पे उनका हेलिकॉप्टर था, वो क्राश हो गया, और वो सबकी मृति हो गई, तबी अमेरिका से राधा हाथ महाराज पुना भारत में आ गए थे, और फिर वो सब भक्तों के घर में आ गए उनसे मिले, और उनको सांत्वना दिये, तो तबी, वो एक माता जी भक्ति, उनकी मां गुजर गई थी, तो वो बता रहे थी, बाद में, वो अपना रुदे पदर करे थी, तो उनने कहा, कि राधा हाथ महाराज में मुझे कहा, कि आप आपके आशों को मत रोखो, पर, आपका हरे एक आशों, खुटग्यता का आशों होना जाये, तो खुटग्यता कैसे रख सकते हैं, मगर कोई हमारा बहुत करीब के व्यक्ति का विप्ट्य हो गईंगे, हम समझते हैं कि इस भोते जगत में, रुत्यू सब के लिए अनिवारी है, पर खुटग्यता इसलिए है हमारी, कि हम जानते हैं कि भगवान के कुरुपा से, हमें एक ऐसा मारग, ऐसे संवंद, ऐसी दुश्टी मिली है, जो वुर्त्यू के परे हैं, तो भकत के जीवन में भौतिक और आध्यात्मी, दो भाग होते हैं, तो भौतिक जगत में, भौतिक स्थर्पे, संकट तो आते ही रहे हैं, क्योंंकि ये भौतिक जगत का स्वभाव ही है, पर हमें इस भौतिक जगत के परे, हमारे जीवन में कुछ मिला है, और वह शाश्वत है, तो भगवान में वो दिया है, उसके लिए हम कुछ तग्गे हैं, तो भौती जगत में जो दुरघटना आओती है, उसके लिए सरूर हम दुखी होते हैं, तो मैंने इसमें एक लेक लिखा था, tears of sorrow, tears of gratitude, कि जो भौती जगत में, अगर कुछ संकट आता भी है, तो हम दुखी होगे, भगवान के लिए, जो तेरावा दिन था, बहुत भौती, कौरों के लिए विद्धन्स का दिन बन गया हुँ, बारावे दिन में, अर्जुन अभिमन्यू का वद हुआ था, जब तक भीश्म पितामा थे, तूरा नैतिकता से उद्ध चल रहा था, बिश्म पितामा अगर होते तो, कभी अभिमन्यू का इस तरह से, वो वद नहीं होने देते, पर उनके बाद में सब नैतिक मिल्यों को छोड़ दिया गया, कि दस्वे दिन में बिश्म पितामा घिर गये, तो तभी, जो भाव है, हम भौतिक स्थर पर जो होता है, उससे हम हमारे बुद्धी और प्राथना के दुआरा, कैसे भगवान सरक्षन कर रहे हैं, इस समझ सकते हैं चोड़ा बहुत, पर नहीं समझेगे, तो भी हम समझते हैं, कि इसके पर जो आध्यात्मिक स्थर है, उसपे भगवान सदाइवे मुझे आश्रे दी रहे हैं, तो इस भौतिक जगर में भुकाम्प आ जाये, आतंकवाद आ जाये, प्रलय आ जाये, डाम बढ़ जाये, जो भी हो जाये, बहुत कुछ हो सकता है इस भौतिक जगर में, पर हम जब हरे कुष्ण महावंत्र का जब करते हैं, भगवान का समन करते हैं, तो आध्यात्मिक स्थर पर भगवान सदाइवे हमें सरक्षिन दे रहे हैं, तो भगवान आ भौतिक स्थर पर कैसे कारे करेंगे, यहां हम पहले इसको नहीं देख सकते हैं, क्योंंकि हमारी बुद्धी सीमित है, भगवान की बुद्धी असंदित है, तो इसलिए हम समझ नहीं सकते कि भगवान किस तरह से भौतिक स्थर पर कारेंगे, हमारे जीवन में क्या होगा, पर हम अगर भगवान की सेवा में लगे रहेंगे, तो हमें ज़रूर समय में पता चल जाएगा, तो जब यूदिश्टिन भी बहुत दुखे हो जाते हैं अभिमन्यू की वत के बाद में, तो तभी व्यास दे वहाँ पर आते हैं, यूदिश्टिन को सांसवा देते हैं, कि भगवान की, दो आपके हैं, पहले वो सब के कल्यान के लिए होती हैं, और ये पहली बाद बताते हैं वो, और दूसरी बाद बताते हैं, कि वो कैसे सब के कल्यान के लिए हैं, ये अगर आप उनकी सेवा करती रहोगे, तो काल के बाद आपको समझ में आजाएगा, तो इसलिए, कुछ भी हो जाए भावतिक सर पे, हम भगवान के चलन कमलों में, उनकी समझ करते हुए, उनकी सेवा करते हुए रहेगे, तो फिर जरूर, भगवान हमें, हमारा परण कल्यान दे दे गए, श्रीप कृषिण भगवान की, शिल्य प्रभुपाद की, गौर भक्त व्रिंद की, ग्रंथराज श्रीमध भागतम की, निताई गौर प्रेमानन्दने।
Thank you very much. Hare Krishna.