Rama Katha – 4 lessons from the abduction of Sita Hindi
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Lecture Summary
राम कथा का सारांश: सीता हरण और आध्यात्मिक शिक्षाएं
1. जटायु का शौर्य और बलिदान जब रावण माता सीता का अपहरण करके ले जा रहा था, तब वृद्ध होते हुए भी जटायु ने सीता माता की रक्षा के लिए रावण से भीषण युद्ध किया। रावण ने उनके पंख काट दिए, जिससे वे मृत्यु शय्या पर पहुँच गए। जटायु का यह कृत्य सिखाता है कि भगवान की सेवा में किया गया कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
2. परम गति (भगवद्धाम) की प्राप्ति बाह्य दृष्टि से ऐसा लगा कि जटायु युद्ध हार गए और उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन वास्तव में उन्होंने माया से युद्ध जीत लिया था। जीवन रूपी इस ‘मैराथन’ या ‘प्रतीक्षा गृह (Waiting Area)’ में जटायु ने भगवान श्री राम की गोदी में प्राण त्यागे। भगवान ने स्वयं उनका अंतिम संस्कार किया, जो दशरथ महाराज को भी प्राप्त नहीं हुआ। उन्हें सर्वोच्च गति (भगवद्धाम) प्राप्त हुई।
3. ज्योतिष और विन्द काल रावण के ज्योतिषी ने उसे ‘विन्द काल’ में अपहरण करने से मना किया था, क्योंकि इस काल में चुराई गई वस्तु टिकती नहीं है। जटायु यह बात जानते थे, इसलिए उन्हें विश्वास था कि श्री राम सीता को अवश्य वापस पा लेंगे।
4. शबरी की शुद्ध भक्ति (भगवान भावग्राही हैं) कबंध राक्षस के उद्धार के बाद भगवान राम शबरी के आश्रम पहुँचते हैं। शबरी ने भगवान को केवल उत्कृष्ट और मीठे फल देने की इच्छा से फलों (बेर) को चख-चख कर दिया। यद्यपि दुनिया की नज़र में जूठा भोजन देना अपराध है, लेकिन भगवान ‘भावग्राही’ हैं। उन्होंने शबरी की शुद्ध भक्ति और प्रेम को देखा और वे जूठे बेर सहर्ष स्वीकार किए।
5. क्रोध पर नियंत्रण: लक्ष्मण का उपदेश सीता को न पाकर जब भगवान राम अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं और पूरी सृष्टि का विनाश करने के लिए अपना धनुष उठा लेते हैं, तब लक्ष्मण जी उन्हें शांत करते हैं। वे राम को उन्हीं के द्वारा दिए गए उपदेशों (क्रोध के वश में न होने) की याद दिलाते हैं। यह रामायण का वह दुर्लभ प्रसंग है जहाँ लक्ष्मण राम को उपदेश देते हैं।
6. हनुमान जी से भेंट और सुग्रीव से संधि किष्किंधा पहुँचने पर भगवान राम की भेंट ब्राह्मण वेशधारी हनुमान जी से होती है। हनुमान जी राम और लक्ष्मण को अपने कंधों पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले जाते हैं। राम और सुग्रीव अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता (संधि) करते हैं।
7. शकुन शास्त्र (शारीरिक शकुन) इस संधि के होते ही रावण, वाली और सीता की बाईं आँख/बायाँ हाथ फड़कने लगता है। शकुन शास्त्र के अनुसार, पुरुष का बायाँ अंग फड़कना अमंगल (रावण और वाली के लिए) और स्त्री का बायाँ अंग फड़कना मंगलकारी (सीता माता के लिए) होता है।
8. रामायण का आध्यात्मिक स्तर (प्रश्नोत्तर) अंत में बताया गया है कि बाह्य रूप से (कर्मकांड के अनुसार) रामायण ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ के स्तर की कथा प्रतीत होती है। लेकिन जब हम यह मानकर लीलाओं का श्रवण और विश्लेषण करते हैं कि श्री राम स्वयं परम भगवान हैं, तो यह ‘शुद्ध भक्ति’ के स्तर पर आ जाती है। जीवों को उनकी चेतना के अनुसार ही अलग-अलग लोकों (स्वर्ग या भगवद्धाम) की प्राप्ति होती है।
Full Transcription
सीता अपहरण और जटायु का आगमन
हम जो राम कथा की कल चर्चा कर रहे थे, हमने कल सीता जी के अपहरण के बारे में चर्चा की थी। तो इसको हम आगे बरकरार रखेंगे अभी। तो जैसे मैंने बताया था कि भगवान प्रभु श्री राम चंद्र जी जो हैं, वे जब दंडकारण्य में आये थे, तो जब प्रवेश किया था तो जटायु ने कहा था कि मैं आपकी सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहूँगा, बहुत ज़रूरत पड़ेगी। तो वैसे ही यहाँ पर लक्ष्मण, राम और सीता रह रहे थे, और पास में ही जटायु भी थे।
जब सीता को रावण खींच के ले जा रहा था, तो तभी सीता चीख रही थीं, चिल्ला रही थीं, वो श्री राम चंद्र को पुकार रही थीं। पर वो राम काफी दूर थे। तो तभी जब वो खींच के लेके जा रहा था, पहले सीता रावण की पकड़ से छूट के पेड़ को जा के उन्होंने पकड़ लिया। पर रावण ने अपनी शक्ति से उनको खींचा और फिर अपने रथ में चढ़ गया। वो यहाँ पर पुष्पक विमान में नहीं आये थे, अपने रथ में आये थे। और जब वो जा रहे थे, तभी पास में एक पेड़ में जटायु विश्राम कर रहे थे। और जटायु ने देखा कि सीता जा रही हैं, सीता को वो खींच के लेके जा रहा है, अपहरण हो रहा है।
जटायु और सम्पाती का परिचय
तो जटायु रावण को जानता था पहले से, क्योंकि जटायु और सम्पाती ये दोनों भाई हैं। सम्पाती की कहानी सुंदरकाण्ड में आती है, जो सागर के तट पर जब वानर पहुँचते हैं, तभी सम्पाती जो जटायु का बड़ा भाई होता है, वो बताता है कि सीता इस सागर के परे है। तो सम्पाती और जटायु ये दोनों सारे ब्रह्मांड का भ्रमण कर रहे थे। वो इतने शक्तिशाली पक्षी थे कि वे न केवल पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे, पर आसमान में उड़के वे दूसरे ग्रहों के पास भी जा सकते थे। तो इसलिए उनको कौन सी जगह में कौन रहता है, क्या करता है, इसके बाद राजा है, उसको पता था। तो इसलिए जटायु ने जब से ही देखा तो वो पहचान लिया कि ये रावण है।
रामायण के पशु-पक्षियों में मानवीय चेतना
और जटायु जो है, वह केवल कोई साधारण गिद्ध नहीं है, गिद्धों के लिए राजा के समान है। और वह पहले रामायण में ऐसे बताया गया है कि हम देखते हैं, वानर हैं, गिद्ध हैं, भालू हैं और ये सब जो हैं, वह मानवों जैसे ही बोलते हैं, मानवों जैसी ही भावनाएं होती हैं। तो हम कह सकते हैं कि ये कैसे संभव है?
कुछ लोग कह सकते हैं ये सब काल्पनिक है, पर वास्तव में हमें बताया गया है, शास्त्रों में कि जो मानव है, ये केवल एक शारीरिक आवरण नहीं है, ये एक चेतना का स्तर है। वो तो इसलिए कोई-कोई मानव भी हो सकते हैं जो कि बिल्कुल पशुओं की चेतना में हो सकते हैं। और जैसे कि जड़भरत, हम देखते हैं वह जड़भरत, भागवतम् के पाँचवें स्कंध में कहानी आती है कि जब एक हिरन से आसक्त हो जाते हैं तो वो हिरन बन जाते हैं। पर वो हिरन में मानवों जैसी चेतना होती है। वो समझते हैं कि मुझे आत्म-कल्याण में और अध्यात्म में प्रगति करनी है।
तो शास्त्रों में बताये गए हैं कि जो रामायण में वानर बताये गए हैं, वह वानर इस दुनिया के साधारण बंदरों के समान नहीं हैं। वो वानर की योनियों में भी श्रेणियां होती हैं। जैसे हम देखते हैं कि कुत्ते होते हैं, कुत्तों में भी श्रेणियां होती हैं, क्योंकि वो शारीरिक स्तर पर श्रेणियां होती हैं। कोई छोटे कुत्ते होते हैं, कोई बड़े कुत्ते होते हैं, कोई पालतू कुत्ते होते हैं, कोई रस्ते पे रहने वाले कुत्ते होते हैं। पर अगर पुलिस को किसी चोर को ढूँढना है और उसको सूंघना है तो कोई रस्ते का कुत्ता नहीं ले सकते। तो उसके लिए विशेष प्रकार के कुत्ते लगते हैं।
तो यहाँ पर कहने का भाव यह है कि कुत्तों में भी चेतना का अलग-अलग स्तर होता है। तो वैसे ही जो वानर हैं, इन वानरों में भी चेतना का अलग-अलग स्तर है। और यह जो वानर थे, वह साधारण बंदर नहीं थे, वह बहुत शक्तिशाली थे और उनकी चेतना जो थी, वह मानवों के समान ही चेतना थी। और उसके कारण यह न केवल मानवों जैसे बोलते थे, पर मानवों जैसी विचारधारा भी थी और समझ भी थी उनकी।
तो अभी वैज्ञानिक भी अनुसंधान करते हैं तो वे जानते हैं कि जानवरों में संवाद करने की शक्ति होती है। यह संवाद किस तरह से करते हैं? पक्षी जब ची ची ची ची करते हैं तो उनकी भाषा नहीं होती है, पर वह किस प्रकार से ची ची करते हैं उससे कुछ प्रकार का संवाद हो जाता है, संवाद हो जाता है उसमें। पर जितना प्रगतिशील हैं, जितनी बुद्धि विकसित है, जितने मानवता के स्तर के आप करीब आ रहे हो, तो उतना वह मानवीय और आध्यात्मिक चीज़ समझ सकते हैं। तो इसलिए हम जटायु देखते हैं या जाम्बवान देखते हैं जो कि भालू हैं या फिर सुग्रीव, हनुमान ये देखते हैं, ये वानर हैं, पर इन सब में मानव जैसी ही चेतना है और मानव जैसे ही वो बोलते हैं।
युगों का प्रभाव और लुप्त योनियाँ
और इस प्रकार के जानवर जो हैं, वह अभी हमें कलियुग में दिखते नहीं हैं। क्योंकि ये अलग-अलग युगों के अनुसार अलग-अलग… हर एक युग जो है एक वातावरण के समान है और अलग-अलग वातावरण में जैसे हम अलग-अलग शरीर पहनते हैं, शरीर के साथ कपड़े पहनते हैं। अगर ठंडी का वातावरण होगा तो हम स्वेटर पहनते हैं, तो दुकान में अलग-अलग स्वेटर दिखेंगे आपको, पर गर्मी होगी तो ज्यादा स्वेटर दिखेंगे नहीं। तो जो युग है, ये वातावरण के समान है, मौसम के समान है ये। और कुछ-कुछ युगों में कुछ-कुछ योनियां प्रकट नहीं होती हैं।
तो वैज्ञानिक लोग कहते हैं कुछ-कुछ योनियां अभी लुप्त हो गई हैं। जैसे वो कहते हैं डायनासोर नाम का एक विशाल जानवर हुआ करता था, और उस पर कई चित्रपट (फ़िल्में) भी बन गए हैं, क्योंकि ऐसे बड़े-बड़े जानवर हैं। तो फिर जब प्रभुपाद जी को पूछा गया, ‘क्या डायनासोर वास्तव में था?’ प्रभुपाद जी बोले, ‘कहाँ इसको डायनासोर कह रहे हैं, कृष्णलीला में अघासुर है, तो वो भी एक लंबा जानवर है, लंबा सांप है वो।’ तो वास्तव में ये एक तरह से… शास्त्रों में कुछ बताया है तो कहते हैं उसको काल्पनिक है, पर फिर लोग अपनी कल्पना बना लेते हैं और कहते हैं ये पहले था अभी नहीं है पर भूतकाल में था ऐसे।
तो क्या है, इस सृष्टि में इतनी विविधता है कि हम हमारे इतिहास को देखते हैं, वैज्ञानिक इतिहास को, तो समझ है बहुत कम समय के लिए। जो इतिहास है, वो 2-3000 साल के लिए है। उसके पहले क्या हुआ था, बहुत अस्पष्ट है। और वैसे ही हम भूगोल को देखते हैं या ब्रह्मांड को देखते हैं तो पृथ्वी हम थोड़ी बहुत समझ सकते हैं, पर इतने सारे ग्रह हैं और वहाँ पर क्या-क्या हो रहा है, हमें पता नहीं है। तो यहाँ पर जो सारे बुद्धिमान जानवर जो यहाँ पर दिखते हैं इस लीला में, ये सब वास्तव में श्रेणियां, योनियां हैं जो योनियों के अलग-अलग श्रेणी के अनुसार उनका अस्तित्व है, भले ही अभी हमें न दिखते हों।
जटायु का रावण को उपदेश और युद्ध का आरंभ
तो जो जटायु है, वह भी धर्म को जानता है। और इसलिए पहले जब वो रावण को इस तरह से बड़ा ही घृणास्पद कार्य करते हुए देखता है कि रामचंद्र की धर्मपत्नी सीता का वह अपहरण कर रहा है, तो पहले वो उसको सदुपदेश देके रोकने का प्रयास करता है। और वो कहता है कि “तुम तो एक राजा हो, तुम राक्षसों के राजा हो और इस तरह से घृणास्पद कार्य कैसे कर रहे हो तुम? किसी और की पत्नी का अपहरण करना बिल्कुल अनैतिक है।”
और रावण कुछ ध्यान नहीं दे रहा है। और ये सब संवाद ऐसे नहीं हैं कि दोनों अपने आसन पर बैठ कर संवाद कर रहे हैं। रावण अपने रथ से जा रहा है और उसके बाजू में जटायु जो है, उड़ रहा है और उड़ते हुए उसको बोल रहा है। तो रावण कुछ ध्यान भी नहीं देता है उसके लिए। तो जटायु कहने लगता है कि… वास्तव में जटायु देखता है कि कोई, हम बात कर रहे हैं और कोई सुन नहीं रहा है, तो क्रोध आता है। तो फिर हम क्या करते हैं? ज़ोर से कुछ बोलते हैं। कैसे? पहले हम सीधे से बात करते हैं, सुनता नहीं, तो ज़ोर से बोलते हैं। ज़ोर से बोलते हैं सुनता नहीं, तो फिर हाथ-पैर पर आ जाते हैं।
तो वैसे ही पहले वो चिल्लाने लगता है। जटायु कहता है कि “तुम तो एक कायर हो। जैसे कोई यज्ञस्थली में यज्ञ में अर्पण करने के लिए जो अन्न सामग्री है, जब वहाँ यज्ञ का ब्राह्मण नहीं है, तो कुत्ता आके वो लेके जाता है। उसी तरह से जब राम चंद्र नहीं हैं, तो तुम एक कायर के समान सीता को ले जा रहे हो।” रावण काम वासना से इतना उन्मत्त हो गया था कि उसने कुछ ध्यान नहीं दिया। और जब इस तरह से जटायु ने देखा कि रावण सुन नहीं रहा है, तो जटायु ने आक्रमण करने का फैसला किया।
और अभी तक सीता को पकड़ के रखा था रावण ने, और सीता जटायु से चिल्लाने लग गईं कि “तुम इस पर आक्रमण मत करो। तुम जाके तुरंत प्रभु श्री राम चंद्र को बता दो।” क्योंकि सीता समझ गई थीं कि ये रावण… सीता भी क्षत्रिय की रानी हैं, क्षत्राणी हैं, तो क्षत्राणी समझ गई थीं कि जटायु भी वृद्ध हो गए हैं। “तो तुम युद्ध नहीं कर पाओगे, तुम जाके तुरंत राम को संदेश दे दो, क्योंकि मेरा इस घृणास्पद व्यक्ति ने अपहरण कर लिया है।” जटायु ने सीता की बात सुनी पर वो सोचने लगे कि “मेरे जीवन में जब तक प्राण हैं, कैसे मेरी आँखों के सामने मैं सीता का अपहरण सहन कर सकता हूँ? तो जो सीता ने मुझे निवेदन किया है, मैं तो उसको ज़रूर पूरा करूँगा, पर उसके अलावा भी मैं इसे रोकने का प्रयास करूँगा।” तो इसलिए जटायु ने रावण पर आक्रमण कर दिया।
रावण और जटायु का भीषण संग्राम
और अभी रावण के पास अपने शस्त्र थे। और पहले तो उसको लगा, “ये कौन पक्षी है, क्या रोक सकता है मुझे?” वो ध्यान नहीं दे रहा था। पर जटायु ने ऐसा भीषण आक्रमण किया, वो उड़ रहा था, उसको आगे से आकर अपने दाँतों से, अपने पंखों से मारने लगा। उसको अपने नाख़ूनों से मारने लगा। और फिर बड़ा भीषण युद्ध होने लगा। फिर रावण ने अपनी तलवार उठाई, और जटायु उसके पीछे से आक्रमण करने लगा। उसने पीछे से आकर उसके बालों को पकड़ लिया। और बालों को पकड़ के उसको घसीटने लगा।
अभी रावण अपने हाथ घुमा रहा था पीछे से, पर जटायु तक पहुँच ही नहीं पा रहा था। और उसको ऐसा घसीटा पीछे, पीछे पकड़ लिया, फिर उसके जो हाथ थे, हाथ को पकड़ के खींच लिया। तो जटायु की इतनी शक्ति थी कि उसके हाथ ही पूरे खींच के बाहर आ गए। और फिर जटायु ने नाख़ूनों से उसके सिर को पकड़ लिया और उस सिर को खींच लिया। और उसकी शक्ति इतनी थी कि वास्तव में सिर निकल आया, हाथ निकल आया, पर जो ब्रह्मा जी का वर था, उससे वो पुनः हाथ उत्पन्न हो गए और पुनः सिर उत्पन्न हो गए।
और रावण बड़ा क्रोधित हो गया था। रावण को पहले लगा था कि यह कोई ऐसा साधारण पक्षी है, इसको अभी थोड़ा सा मारूँगा तो चला जाएगा। तो अपने हाथ-पैर से मारने लगा और फिर वो अपने शस्त्र उठाने लगा। तो जटायु बड़ी दक्षता से जो भी आक्रमण हो रहा था उसको टाल रहा था। पर जैसे युद्ध चल रहा था, रावण के पास अभी कई फायदे थे, कई सुविधाएं थीं, एक तो रथ पे था। तो जटायु ने पहले क्या किया, उसके रथ पे आक्रमण करके जो उसके रथ को चलाने वाले घोड़े थे, उनको अपने प्रहारों से वध कर दिया। और फिर उसके बाद में उस रथ को भी उध्वस्त कर दिया। और रथ को उध्वस्त कर दिया तो रावण नीचे आ गया।
और रावण अभी युद्ध करने आ गया, अभी तक उसने सीता को पकड़ के रखा था, तो सीता को छोड़ दिया उसने और फिर वो जटायु से युद्ध करने आ गया। और जो राक्षस होते हैं, उनमें ऐसी शक्ति होती है, उनकी यौगिक सिद्धियों से वास्तव में वो उड़ भी सकता था। तो जटायु हवा में था, वो भी हवा में आ गया उड़ने पर। फिर युद्ध करने लगा। तो इससे सीता वहाँ से दौड़ के कुछ पेड़ों के पास में जाके छुप गईं और यह सब देख रही थीं। और जटायु और रावण में बहुत भीषण युद्ध हो गया।
और जैसे युद्ध चल रहा था, तो तभी क्योंकि जटायु वृद्ध था, तो उसकी शक्ति कम हो रही थी और वो पूरी शक्ति से युद्ध कर रहा था। पर वो थकान के कारण, जब रावण ने प्रहार किया, तो जटायु का पहला एक पंख कट गया। और फिर भी जटायु बड़ी शक्ति से आक्रमण कर रहा था तो दूसरा भी पंख कट गया। और जैसे दोनों पंख कट गये, जटायु नीचे गिर गए।
जब सीता ने देखा कि जटायु इस तरह से बड़ी भयानक रूप से घायल हो गया है, तो तुरंत जटायु के पास में आ गईं। और जटायु उनके दशरथ महाराज के समान थे (पिता के समान थे), तो उनके सामने आ गईं जो घायल हो गए थे जटायु। अभी उसके प्रहार के कारण लगभग बेहोश जैसे हो गए थे। और रावण ने सीता को खींच लिया और फिर अपनी शक्ति से रावण उड़ते हुए वहाँ से निकल गया।
ज्योतिष शास्त्र और विन्द काल का रहस्य
तो अभी जब रावण निकला था, तो ऐसे होता है कि जो असुर हैं, वो असुर भी जानते हैं कि हमसे ऊँची इस सृष्टि में कुछ शक्तियां हैं। पर वो सोचते हैं कि ‘इनसे बड़ी शक्ति को मैं हरा सकता हूँ या उससे मैं अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता हूँ।’ तो इसलिए रावण के पास… हम बाद में देखेंगे रामायण में कि रावण के पास भी अपने राक्षसों के लिए ब्राह्मण थे, उनको यातुधान कहा करते थे। और रावण का भी अपना ज्योतिषी था।
तो उसने ज्योतिषी से पूछा था कि “मैं सीता का अपहरण करूँगा अभी।” (ज्योतिष शास्त्र का भी उपयोग किसलिए करना है? ऐसे चीज़ के लिए करना है, अधार्मिक चीज़ के लिए!) तो उसको बताया था कि “पूरी तरह से सोच लीजिए कि यह जो कार्य कर रहे हैं, यह बड़ा अधार्मिक कार्य है, तो नहीं करना चाहिए ऐसे।” तो उसके ज्योतिषी ने बताया कि यह जो काल है, उसको ‘विन्द’ नाम का काल होता है। जैसे हम जानते हैं कि अलग-अलग नक्षत्र होते हैं, तो वैसे काल भी होते हैं अलग-अलग। तो इस काल में अगर तुम अपहरण… “इस काल में कोई व्यक्ति किसी चीज़ को प्राप्त करता है, तो वो उसको संभाल के रख पाएगा, पर उसके बाद के काल में अगर वो प्राप्त करता है तो वो चीज़ उसके पास नहीं रहेगी।”
तो अभी हम बाह्य रूप से देखेंगे, तो जटायु ने… जटायु ने उससे युद्ध किया, वो लगभग रामायण में बताया है कि काफी समय तक, घंटों तक युद्ध चल रहा था वो। क्योंकि जब मैं बता रहा था पहले कि लगभग प्रभु श्री राम जब वे जंगल में गए तो एक घंटे जा रहे थे और जटायु उसके साथ-साथ जा रहा था, तो दोनों काफी अंतर तक चले गए थे। तो इसलिए अभी तक राम और लक्ष्मण खोज नहीं पाये थे। तो उसका जो युद्ध चल रहा था इस समय में, वो ज्योतिषी के साथ-साथ जटायु भी जानता था।
तो जटायु को संतुष्टि क्या थी कि जिस काल में वो सीता का अपहरण हुआ है, वो काल रावण के लिए विपरीत है। और उसके कारण जटायु भगवान श्री रामचंद्र को कहते हैं कि “आप ज़रूर सीता को वापस प्राप्त कर लोगे।” और इसके अलावा भी, तो भगवान की सेवा में जो भी करते हैं, वो कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
भगवान की रक्षा और आध्यात्मिक दृष्टिकोण
पर इसके अलावा ये… भगवान अपने भक्तों का हमेशा संरक्षण कर सकते हैं और करते भी हैं। पर हमेशा वो शारीरिक स्तर पर संरक्षण करें, ऐसा नहीं है। तो यहां पर हम कह सकते हैं कि “भगवान ने जटायु को क्यों नहीं बचाया?” पर भगवान कभी-कभी हमें अलग-अलग शिक्षाएं देना चाहते हैं। एक शिक्षा यह है, हम जब भगवान की सेवा करते हैं, तो भगवान भगवद्गीता में कहते हैं:
“कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति”
कि ‘मेरे भक्तों का हमेशा संरक्षण होता है।’
पर यह भगवान ने भगवद्गीता में बताया है। और उसके बाद में हम देखते हैं कि महाभारत के युद्ध के बारहवें दिन में अभिमन्यु का वध हो जाता है। और अभिमन्यु भी अर्जुन का एक पुत्र है, और वो भी कृष्ण भक्त होता है। तो फिर क्या उसका रक्षण नहीं हुआ? तो वास्तव में महाभारत में व्यासदेव बताते हैं कि भगवान जो भी करते हैं, वो सबके कल्याण के लिए करते हैं। पर किस तरह से वो कल्याण है किसी का, वो हम उस समय समझ पाएं, यह संभव नहीं है। जब हम सब्र रखते हैं, भगवान की सेवा में लगे रहते हैं, तो फिर हमें धीरे-धीरे समझ में आ जाता है।
तो बाह्य रूप से भले यह ऐसा लगा हो कि जटायु परास्त हो गया, उसकी मृत्यु हो गई, पर यह केवल एक शारीरिक स्तर पर देख रहे हैं। और शारीरिक स्तर पर सब की मृत्यु होने ही वाली है कभी न कभी। तो शारीरिक स्तर पर हम देखेंगे तो हम पूर्ण चित्र नहीं देख पाते हैं। जैसे अगर कोई डॉक्टर किसी पे ऑपरेशन कर रहा है, तो अगर हम सिर्फ बाह्य रूप से देखें तो डॉक्टर क्या कर रहा है? काट रहा है शरीर को। पर वो काट के शरीर के अंदर जो कुछ खराब हुआ है, कुछ जंतु आ गया है, कुछ टूट गया है, वो अंदर जो ठीक कर रहा है, वो हम बाह्य रूप से देख नहीं सकते हैं। तो शारीरिक स्तर पर जो है, वहाँ हम पूर्ण चित्र नहीं देखते हैं।
इसलिए हम देखते हैं कि यहाँ पे इस प्रसंग का अंत क्या होता है? कि इसलिए इतने सारे सृष्टि के इतिहास में, अभी भी इस पृथ्वी में इतने सारे गिद्ध हैं, सृष्टि में इतने सारे गिद्ध हो चुके हैं। पर अभी जो गिद्ध की योनि है, वह भी बहुत पूज्य योनि नहीं है। अगर आप कैसे किसी को कहेंगे… “आप गिद्ध जैसे सुंदर हैं” किसी को कहेंगे हम? तो कहेंगे अपमान है यह तो किसी को हम कहेंगे। पर फिर भी यहाँ पर हम देखते हैं कि एक गिद्ध की योनि में जो जटायु थे, उनका क्या हुआ? बाद में उनका उद्धार हो गया। जटायु को भगवद्धाम प्राप्त हो गया।
यह संसार एक प्रतीक्षा गृह (Waiting Area) है
तो हम इस भौतिक जगत में संघर्ष कर रहे हैं बहुत चीज़ें प्राप्त करने के लिए, पर वो सब अशाश्वत है। भगवद्धाम की प्राप्ती है, वो शाश्वत है। और यह भौतिक जगत जो है, यह एक वास्तव में… अगर कोई हवाई अड्डे में जाता है, या कोई रेलवे स्टेशन में आता है, तो वहाँ पे वेटिंग एरिया होता है। तभी वेटिंग एरिया का उद्देश्य क्या है कि हमारी ट्रेन आएगी, या हमारी प्लेन आएगी और उससे हमें जिस जगह में जाना है, वहाँ पे हम जाएंगे। तो उसी तरह से यह भौतिक जगत वास्तव में एक वेटिंग एरिया है।
पर इस वेटिंग एरिया में जो हम रह रहे हैं, प्रतीक्षा गृह में हम रह रहे हैं, तो यहाँ पे कुछ लोग यहाँ से पहले जाते हैं, कुछ लोग बाद में जाते हैं, पर सबको जाना ही है। और वो यहां से कहां जाते हैं यह महत्वपूर्ण है। कब जाते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है, कहां जाते हैं यह महत्वपूर्ण है। तो अगर कोई भगवद् चेतना में है, भगवान का स्मरण कर रहा है, तो भले ही वो युवा अवस्था में हो या वृद्धा अवस्था में हो, उससे फर्क नहीं पड़ता है। वह भगवद् चेतना में है तो वह भगवद्धाम ही जा रहा है।
यहां पर हम भौतिक स्तर पर अगर देखेंगे, तो अगर कोई व्यक्ति सिर्फ उस प्रतीक्षा गृह को ही देख रहा है और सोचता है कि प्रतीक्षा गृह ही पूरा अस्तित्व है और उसके अलावा और कुछ है ही नहीं, तो जो प्रतीक्षा गृह से चला गया मतलब उसका विनाश हो गया। ऐसे। पर वास्तव में इससे बड़ा और भी जगत है।
“परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।”
भगवान बताते हैं भगवद्गीता के आठवें अध्याय के बीसवें श्लोक में कि इस जगत के परे आध्यात्मिक जगत है और वहाँ पे कभी भी विनाश नहीं होता है, वहाँ पे शाश्वत अस्तित्व है।
जटायु का धैर्य और राम का आगमन
तो जटायु बेहोश हो जाते हैं, पर जो सीता माता ने उनको निवेदन किया होता है कि “आप मैं कहां हूँ, ये संदेश राम को दीजिए”, तो वहाँ उसका स्मरण करके, किसी न किसी तरह से बहुत ही घायल होते हैं, तो जटायु फिर भी उसे स्मरण रखते हैं। और रावण सोचता है कि दोनों पंख कट गए हैं, तो ज़रूर उसकी मृत्यु हो गई होगी, तो इसलिए वह आक्रमण नहीं करता है। जटायु बुद्धिमान होते हैं, अपनी शक्ति से युद्ध करने का प्रयास करते हैं, पर जब देखते हैं कि अब युद्ध नहीं कर पाएंगे, तो फिर इस तरह से वो कार्य करने लगते हैं कि रावण को लगता है कि उसकी मृत्यु हो गयी है। इस तरह से कार्य, बिल्कुल हिलना डुलना पूरा बंद कर देते हैं। और फिर रावण चला जाता है वहाँ से।
और फिर प्रभु श्री राम चंद्र इधर सीता को ढूँढते-ढूँढते कुटिया में आते हैं। वैसे लक्ष्मण और राम, दोनों को भय होता है, वैसे ही वह देखते हैं जिसका भय कर रहे थे। वैसे ही सत्य होता है कि वहाँ पे सीता नहीं हैं। और वह जब कुटिया की ओर देखते हैं, तो वहाँ पे वह सीता के पदचिन्हों को देखते हैं, और फिर किसी दो बड़े पदचिन्हों को देखते हैं…
यहाँ आपकी रामायण कथा के दूसरे भाग का शुद्ध, व्याकरण-संशोधित और पठनीय संस्करण दिया गया है। इसे आपकी वर्डप्रेस वेबसाइट के लिए Markdown फॉर्मेट में तैयार किया गया है। इसमें आपके शब्दों और वाक्यों की संख्या को सुरक्षित रखा गया है, केवल लिप्यंतरण की गलतियों को सुधारा गया है।
राम का विलाप और जटायु से भेंट
…और समझ जाते हैं कि वहाँ पे ज़रूर कोई संघर्ष ही हुआ है और किसी ने सीता का अपहरण कर लिया है। वे पदचिन्हों की मात्रा से समझ जाते हैं कि यहाँ पे कोई राक्षस ज़रूर आया होगा। और फिर क्योंकि रावण ने अपना जो रथ रखा था, वह पहले अदृश्य रखा था और फिर उसको दृश्य में लाके उसमें जा रहा था। तो क्या है, वे कहाँ गए, वहाँ उसके पदचिन्ह नहीं थे, वे उड़ रहे थे हवा में। सिर्फ कुटिया के आजू-बाजू पदचिन्ह थे, पर और कहीं पदचिन्ह नहीं थे।
तो अभी कहाँ ढूँढें? ‘सीता, सीता’ प्रभु श्री राम चंद्र चिल्ला रहे थे और ढूँढ रहे थे इधर-उधर। (राधा गोकुलानंद भगवान की जय!) तो कहाँ ढूँढें? इस तरह से वे यह सोचते-सोचते बड़े क्रोधित हो गए थे, उदास हो गए थे, भयभीत हो गए थे और सब ओर दौड़ने लग गए। तो अब जिस दिशा से आये, उस दिशा में तो सीता नहीं हैं, तो दूसरी दिशा में जाने लग गए।
और जैसे ही जा रहे थे, ढूँढते-ढूँढते तो काफी समय के बाद उन्होंने देखा कि एक जगह पे वापस कोई संग्राम के लक्षण हैं। वहाँ पे झाड़ियाँ थीं, वहाँ पे टूट गई थीं और खून गिरा हुआ था। और जैसे ही देखा उन्होंने वहाँ पे कि एक बड़ा सफेद रंग का कुछ गिरा हुआ है, तो प्रभु श्री राम चंद्र ने सोचा कि यही वो असुर है और यही राक्षस है जिसने सीता का न केवल अपहरण कर लिया है, पर सीता का भक्षण कर लिया है, उसको खा लिया है।
यह सोच के प्रभु श्री राम चंद्र इतने क्रोधित हो गए कि उन्होंने अपना धनुष उठा लिया और वे उस पर आक्रमण करने लग गए। और जैसे ही वे आक्रमण कर रहे थे, तो उन्होंने सुना “राम, राम, राम”। और जैसे ही ‘राम’ सुना तो आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने अपना धनुष नीचे रख दिया। और फिर वे आगे पास में गए, देखा कि वास्तव में जटायु ही हैं। तो तुरंत जटायु को आलिंगन कर लिया। और जटायु क्या हो गए थे? जटायु पूरे मृत्यु की शय्या में आ गए थे।
जटायु का शरीर त्याग और परम गति
और प्रभु श्री राम चंद्र को संदेश देने के लिए अपनी जान बचाए हुए थे। और उसने फिर किसी न किसी तरह से, जितनी भी शक्ति बची थी, उससे बताया कि “वो जो कायर और क्रूर रावण है, उसने सीता का अपहरण कर लिया है और वह दक्षिण दिशा में गया है। और मैंने अपनी पूरी शक्ति से युद्ध किया, पर क्योंकि मैं वृद्ध था, इसलिए उसने मुझे घायल करके, मृत मान के छोड़ के चला गया है। और मैं आपके इंतज़ार में ही अब तक रुका था।” और उसने फिर बताया कि “मुझे पूरा विश्वास है कि आप सीता को पुनः ज़रूर प्राप्त कर लोगे।”
और इस तरह से संदेश देकर, प्रभु श्री राम चंद्र को देखते हुए… प्रभु श्री राम चंद्र ने अपने हाथों में उनको पकड़ लिया था, यह प्रभु श्री राम चंद्र की गोदी में ही जैसे थे वो। और राम चंद्र का स्मरण करते हुए जटायु ने अपना शरीर त्याग दिया।
तो यह जो है, शास्त्रों में बताया है कि जिस तरह से भीष्म पितामह की, भगवान श्री कृष्ण का दर्शन करते हुए मृत्यु हुई; जैसे हरिदास ठाकुर की मृत्यु श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करते हुए हुई; वैसे ही जटायु की मृत्यु भगवान श्री राम चंद्र का दर्शन करते हुए, उनकी ही गोदी में, उनके आलिंगन में हुई। वह बहुत भाग्यवान हैं। यह जो भाग्य है बहुत ही दुर्लभ है और ऐसा भाग्य बहुत ही कम लोगों को मिलता है, तो जटायु को मिला।
और हम देखते हैं जटायु का भाग्य इतना है कि ऐसा भाग्य दशरथ महाराज को भी नहीं मिला। कि दशरथ महाराज भी प्रभु श्री राम चंद्र का स्मरण कर रहे थे, पर वे दर्शन नहीं कर पाए जब उनकी मृत्यु हुई। और इतना ही नहीं, प्रभु श्री राम चंद्र ने स्वयं दशरथ महाराज का अंतिम संस्कार नहीं किया क्योंकि वे जंगल में थे। पर यहाँ पर जटायु ने अपना शरीर त्यागा तो प्रभु श्री राम चंद्र ने कहा कि “जो दुख का सागर था, जिसमें मैं डूब गया था, वही दुख का सागर आज पुनः मेरे जीवन में आ गया है जटायु की मृत्यु के कारण।” और इसलिए जटायु प्रभु श्री राम चंद्र की गोदी में अपना शरीर त्याग देता है, उनका दर्शन करते हुए। तो फिर प्रभु श्री राम चंद्र स्वयं उसका अंतिम संस्कार करते हैं अपने हाथों से, और उसे परम गति प्रदान करते हैं।
जीवन का मैराथन और जटायु की विजय
और वास्तव में यह जीवन का परम लक्ष्य है। इस भौतिक जीवन में कैसे है… कभी-कभी आप देखते हैं ओलंपिक्स होते हैं, खेलकूद में मैराथन होता है। तो मैराथन में क्या होता है, एक गोल-गोल चक्र में घूमना होता है। यह उसको ‘लैप’ (Lap) कहते हैं इंग्लिश में, कि उसको एक बार गोल घूमो, दूसरी बार गोल घूमो, तीसरी बार गोल घूमो। दस, पंद्रह, बीस, तीस बार गोल-गोल घूमना होता है। एक बार गोल घूमना चार-पाँच सौ मीटर का होगा, तो अगर आपको जाना है तो लगभग दस-बीस बार या पचास बार गोल-गोल घूमना होता है।
तो वैसे ही हम इस भौतिक जगत में भ्रमण कर रहे हैं। तो जब गोल घूमते हैं कोई स्टेडियम में, तो क्या होता है? जब शुरुआत होती है, शुरुआत से जब अंत आ जाता है, तो अंत में वापस पुनः नई शुरुआत हो जाती है। तो सर्कल घूमते-घूमते जाते हैं। तो जो एक स्टार्टिंग लाइन होती है, फिर फिनिशिंग लाइन जो होती है, वहाँ पे पुनः नई शुरुआत हो जाती है। तो वैसे ही हम भौतिक जगत में जो हैं, जन्म से शुरुआत होती है, फिर घूमते-घूमते जाते हैं, मृत्यु पर आते हैं, तो फिर से नई शुरुआत हो जाती है। तो इस तरह से हम घूमते-घूमते जाते हैं, इस भौतिक जगत में भ्रमण करते हैं।
पर अगर कोई व्यक्ति, जितने भी चक्कर घूमने हैं, उतना घूमने के पहले ही अगर उसको कोई बोलता है कि “अभी आप पूरा उत्तीर्ण कर चुके हो और आप अभी अंतिम गति तक पहुँच गए हो, और आप ये पदवी या जो पदक है, जो बख्शीश है, वो जीत चुके हो,” तो फिर वो उसका भाग्य है। अभी इस साधारण गिद्ध की योनि से मानव की योनि तक आने के बाद, फिर आध्यात्मिक प्रगति करके फिर मुक्ति प्राप्त करना, ये बहुत लंबा-चौड़ा ‘बहूनां जन्मनामन्ते’ की श्रृंखला है। पर उसी एक योनि में बड़े भाग्य के साथ जटायु ने अपनी परम गति प्राप्त कर ली। तो रावण से भले ही वो एक बाजी हार जाते हैं, पर जो माया से युद्ध है, भौतिक अस्तित्व में युद्ध है, उसको वो जीत जाते हैं। तो इस तरह से वो परम गति प्राप्त कर लेते हैं।
कबंध उद्धार और शबरी प्रसंग
और फिर प्रभु श्री राम चंद्र उसके बाद में पुनः खोज करने लगते हैं। और इस तरह से खोज करते-करते दक्षिण की ओर जाते हैं। जटायु ने बताया है कि “आप दक्षिण की ओर जाओ और जितना दक्षिण में जाओगे तो आपको ज़रूर सीता प्राप्त होंगी।”
तो इस तरह से जा रहे होते हैं। तो फिर अभी, जैसे बताया है कि रावण के जो सहभागी थे, उनमें से जो खर और दूषण हैं, उनका जब वध हो जाता है, तो रावण के सारे सहभागी इलाका छोड़ के चले जाते हैं। और अभी कोई राक्षस रावण के सहभागी में से नहीं होते हैं। तो दूसरा एक राक्षस होता है, कबंध। ‘कबंध बाहुच्छेदनम्’ – कबंध नाम का एक बड़ा राक्षस होता है।
कबंध उनसे पूछता है, तो लक्ष्मण कहते हैं कि “मैं लक्ष्मण हूँ और ये दशरथ-नंदन प्रभु श्री राम चंद्र हैं, जो अयोध्या के राजा हैं, राजकुमार हैं।” तो फिर जब वो सुनता है इस तरह से, तो वो कहता है कि “वास्तव में मैं आप ही का इंतज़ार कर रहा था।” वह स्वर्ग लोक का एक गंधर्व होता है और उसको शाप मिला होता है, जिसके कारण वह एक असुर बन गया होता है। वो कहता है कि “मैं यहाँ पर आप ही के इंतज़ार में था और मैं आपको ज़रूर मदद करूँगा, पर पहले आप मुझे शाप से मुक्त कीजिए।”
तो वे देखते हैं, उसके दोनों हाथ काट देते हैं, फिर भी उसकी मृत्यु नहीं होती है। तो फिर वो कहता है कि “वास्तव में जब मैं शरीर से मुक्त हो जाऊँगा, तो मैं आपकी मदद करूँगा। मेरी मृत्यु इस तरह से नहीं होगी, पर जब आप मुझे इस ज़मीन में गाड़ दोगे, तो फिर मैं इस शरीर से मुक्त हो जाऊँगा।” अब प्रभु श्री राम चंद्र वैसे ही लक्ष्मण को कहते हैं, दोनों कर देते हैं। जैसे ही वो शरीर से मुक्त हो जाता है, तो गंधर्व कहता है कि “आप आगे जाओ, आप दक्षिण में जाओ। और वहाँ पे आपको सुग्रीव मिलेगा, और सुग्रीव जो है, वानरों का राजा है। और उसकी मदद से आप ज़रूर सीता को पुनः प्राप्त कर लोगे, रावण को हरा कर आप सीता को प्राप्त कर लोगे।”
और फिर भगवान राम आगे जाते हैं। और एक दिशा से जा रहे हैं, तो वहाँ पे जो शबरी हैं, उनका आश्रम होता है। तो शबरी जो होती हैं, यह एक आदिवासी स्त्री के समान होती हैं। भक्त अपेक्षा करता है भगवान के दर्शन की, पर माँग नहीं करता है। अपेक्षा मतलब हम उत्साहित हैं, हमें इच्छा है, हम ज़रूर चाहते हैं वो। पर उसकी माँग नहीं करते हैं, उसके बिना भी हम सेवा करने के लिए तैयार रहते हैं। प्रभुपाद जी हमेशा अपेक्षा करते थे कि जो प्रचार है, बहुत से लोग आएं, भक्त बनें, मंदिर बनें। पर ऐसे नहीं है कि कभी उन्होंने भगवान से माँग की कि ‘अगर लोग नहीं आए तो मैं प्रचार करना छोड़ूँगा, अगर मंदिर नहीं बनेगा तो मैं प्रचार करना छोड़ूँगा।’ नहीं, भक्त अपेक्षा करते हैं पर माँग नहीं करते हैं।
तो इसी तरह से शबरी अनेक सालों तक सेवा कर रही होती हैं। और ऐसे ही एक दिन वहाँ सेवा के लिए तैयार होती हैं। जब शबरी आती हैं वहाँ पे, तो क्या देखती हैं कि प्रभु श्री राम और लक्ष्मण वहाँ स्वयं आ गए हैं, तो बड़े आदर-सत्कार से स्वागत करती हैं। और जो बेर वो रोज़ लाके रखती हैं, वो अभी प्रभु श्री राम चंद्र को अर्पण करने वाली हैं। और फिर उनके मन में विचार आता है कि “प्रभु श्री राम चंद्र की बार-बार सेवा करने का मौका तो मुझे मिलने वाला नहीं है। तो जो सेवा करने का मौका है मुझे एक ही बार मिलना है, तो उत्कृष्ट रूप से सेवा करनी चाहिए। और अगर उत्कृष्ट रूप से सेवा करनी चाहिए, तो अभी मेरे पास जंगल में केवल लाए हुए फल ही हैं। तो सबसे अच्छे फल जो हैं, मैं भगवान को देना चाहती हूँ।”
तो अभी अच्छे फल हैं, यह कैसे पता कर सकते हैं? हम कभी-कभी फल खरीदते हैं जो दुकान से लाते हैं तो क्या करते हैं? स्पर्श करके देखते हैं, कैसा है फल, यह कोमल है, यह कोमल नहीं है। तो उससे हम थोड़ा-बहुत स्पर्श करके अंदाज़ा लगा सकते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि जो प्रसाद है उसको हम चार लक्षणों से समझ सकते हैं। सबसे पहले जो है, प्रसाद को देखने के पहले उसकी सुगंध होनी चाहिए, कि सुगंध से बड़ा आकर्षण होना चाहिए। फिर उसके बाद में, दृष्टि से भी बड़ा आकर्षण होना चाहिए। फिर उसके बाद में, स्पर्श के लिए उचित होना चाहिए। मतलब कोमल होना चाहिए। और स्वाद होना चाहिए उसका।
तो अभी जो फल हैं, अगर हम देखते हैं, तो हम उनको कुछ पकाते नहीं हैं। तो फिर हम सोचते हैं कि स्पर्श से हम अंदाज़ा लगाते हैं कि ये फल अच्छा होगा या नहीं होगा। पर क्या होता है, स्वाद कैसे पता कर सकते हैं? तो फिर वो सोचती हैं कि खुद ही चखना चाहिए, और कोई वहाँ पर तो है नहीं। तो फिर वो क्या करती हैं? वो स्वाद चख के खाती हैं। और फिर जो फल अच्छे हैं स्वाद में, वह निकाल के भगवान को अर्पण करती हैं। और जो फल अच्छे नहीं हैं, उनको बाजू कर लेती हैं।
तो अभी अगर कोई साधारण व्यक्ति इस तरह से करने लगेगा, तो फिर यह भगवान के प्रति बड़ा अपराध है, कि हम पहले अपना जूठा किसी को दें। किसी और को देना यह उचित नहीं है, और भगवान को देना तो पूरी तरह से अनुचित है। पर यहाँ पर भगवान जो हैं, भावग्राही हैं। तो भगवान क्या देखते हैं कि ये शबरी इतनी उत्सुक हैं कि उत्कृष्ट रूप से सेवा करें। और उस भाव को देखकर, वह जो भी फल प्रदान करती हैं, उसको वे स्वीकार करते हैं। और जब वह देखती हैं कि भगवान राम इतने सारे उनसे फल खा लेते हैं, तो उससे पूर्णतया संतुष्ट हो जाती हैं। और फिर वे शबरी को आशीर्वाद देते हैं। और शबरी सोचती हैं कि “अभी मेरे गुरु की जो इच्छा थी, गुरु का आशीर्वाद था, वह पूर्ण हुआ।”
राम का क्रोध और लक्ष्मण का उपदेश
यह भौतिक आसक्ति का लक्षण नहीं है। यह भगवान का अपने भक्तों के साथ जो आदान-प्रदान है, अपनी भार्या सीता देवी के साथ जो आदान-प्रदान है, उसका लक्षण है। तो वे व्याकुल हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि “इस विशाल जंगल में… इस विशाल जंगल में सीता कहाँ होगी? कैसे ढूँढ पाऊँगा उसको? और ढूँढेंगे तो कब मिलेंगे? तो अभी तक सीता जीवित भी होगी या नहीं होगी, पता नहीं है।”
और फिर इस तरह से जब प्रभु श्री राम चंद्र सोचते हैं, तो वे कहते हैं कि “अगर सीता जीवित नहीं होगी, अगर इन राक्षसों ने कुछ किया है सीता को, तो मैं इन सारे राक्षसों का वध करूँगा!” भगवान अपना धनुष उठा लेते हैं। वे कहते हैं कि “ये सारे देवी-देवता जो थे, वह सब कुछ देख रहे थे। उन्होंने सीता के अपहरण को रोका क्यों नहीं? उन्होंने इस प्रकार के अन्याय को कैसे होने दिया? ये सारे जो देवी-देवता हैं, सारा ब्रह्मांड जो है, उसने ऐसे अन्याय को होने दिया है। मैं सारी सृष्टि का विनाश कर दूँगा!”
और भगवान अपना भयंकर तीर उठा लेते हैं। और जैसे वो तीर को उठा लेते हैं, तो क्रोधावस्था में आसमान में अचानक गड़गड़ाहट होने लगती है और सब जगह अमंगल दिखने लगता है। तो तभी लक्ष्मण जो हैं, वह भगवान के हाथ को पकड़ लेते हैं। वे कहते हैं कि “वास्तव में आप ही ने तो मुझे सिखाया है कि क्रोध के वश में नहीं आना है। और आप ही ने जो मुझे सिखाया है, वो आज आप कैसे भूल सकते हो? कि साधारण व्यक्ति क्रोध के वश में आके कुछ अनुचित कार्य करेगा, तो वो भी बराबर नहीं है। पर अगर आप जैसे जो आदर्श व्यक्ति हैं, जो क्षत्रिय राजा हैं, वह अगर क्रोध के वश में आके कुछ विनाश कर देंगे, तो वह तो लोगों के लिए बड़ा ही अहितकर होगा। वास्तव में मैं आपको उपदेश देने के लिए पात्र नहीं हूँ, तो जो आप ही ने मुझे सिखाया है, उसी की मैं आपको स्मृति दिला रहा हूँ।”
तो इस तरह से यह एक ही प्रसंग आता है जहाँ पे पूरे रामायण में, लक्ष्मण प्रभु श्री राम चंद्र को उपदेश देते हैं। कई जगह उनमें थोड़ा वाद-विवाद होता है, पहले जब उनका वनवास में जाना होता है, तो लक्ष्मण और राम, उनमें बहस जैसी होती है। फिर बाद में सीता की अग्नि परीक्षा में वैसी बहस होती है। पर यहाँ पर बहस नहीं होती है, यह एक जगह है जहाँ पर लक्ष्मण प्रभु श्री राम चंद्र को उपदेश देते हैं।
और फिर लक्ष्मण कहते हैं कि “हम सीता को, हमारी जितनी भी शक्ति है, शक्ति से ढूँढने का प्रयास करेंगे। और फिर अगर हम नहीं ढूँढ पाए सीता को, तो फिर आप ज़रूर अपना जो क्रोध है, इस सारे ब्रह्मांड पे डाल सकते हैं।” तो फिर जब इस तरह से बताते हैं, तो फिर प्रभु श्री राम चंद्र शांत हो जाते हैं।
किष्किंधा में आगमन और हनुमान से भेंट
और सब यहाँ ढूँढ रहे हैं। तो ढूँढते हुए वे किष्किंधा में पहुँच जाते हैं। तो सुग्रीव अपने वानरों के साथ किष्किंधा के पहाड़ पे रह रहा होता है। और जब इस तरह की आहट सुनता है, तो तुरंत अपने पहाड़ के ऊपर जाता है। तो वहाँ पे हनुमान और उसके सारे जो दूसरे वानर होते हैं, कुछ ही वानर होते हैं, और वे सुग्रीव से कहते हैं, “इसमें भय की क्या बात है? यह तो दो मानव हैं, इनसे डरने की कोई बात नहीं है।” सुग्रीव कहता है, “आप ठीक तरह से देखो, यह मानव हैं, इन्होंने मुनि का वेष पहना हुआ है, पर वे मुनि दिखते नहीं हैं शरीर से। क्योंकि उनका शरीर बड़ा शक्तिशाली है, और साथ-साथ उनके पास शस्त्र भी हैं। तो इस तरह से मुझे लगता है कि यह वाली के ही जासूस हैं, वाली ने भेजा है हमारा वध करने के लिए।”
तो हनुमान और बाकी सब वानर देख रहे होते हैं, वह कहते हैं कि “तुम खामखां भयभीत हो रहे हो, वास्तव में इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।” तो सुग्रीव हनुमान से निवेदन करते हैं कि “आप जाके पता करके आओ।” तो हनुमान जी कहते हैं “ठीक है।” हनुमान जी तुरंत वहाँ से कूद के नीचे आते हैं।
हनुमान जी ब्राह्मण रूप में कहते हैं, “कि आप इस प्रकार से इस जंगल में क्यों आए हो? और आप यहाँ पे क्या करना चाहते हो? आप इतने उदास क्यों लग रहे हो?” और वे उनसे इतना सुंदर संभाषण करते हैं कि प्रभु श्री राम चंद्र उनके वचनों से ही प्रसन्न हो जाते हैं। वह संभाषण बड़ा ही विस्तारित है रामायण में। यहाँ प्रभु श्री राम चंद्र कहते हैं कि “क्या व्यक्ति इतना सुंदर बोलता है, कि अगर कोई शत्रु अपने शस्त्र को उठाके भी आएगा आक्रमण करने के लिए, तो इसके वचनों से शांत हो जाएगा और शस्त्र को बाजू में रख देगा।”
तो लक्ष्मण फिर जवाब देते हैं। तो हम देखते हैं कि जब परिचय करना होता है, तो अगर कोई वरिष्ठ व्यक्ति है, और कोई कनिष्ठ व्यक्ति है, तो जो कनिष्ठ व्यक्ति होता है, वो वरिष्ठ व्यक्ति का परिचय कराता है कि “ये व्यक्ति यह हैं, मैं उनका सेवक हूँ।” साधारणतः यही शिष्टाचार होता है।
तो इसलिए, अलग-अलग भक्त अलग-अलग भूमिका में, अलग-अलग समय में सहयोग करते हैं। तो इसलिए अभी तक जो हनुमान हैं, उनका ज्यादा कोई उल्लेख रामायण में नहीं आया। पर इसके बाद में हम देखते हैं कि हनुमान जी की बहुत ही प्रधान भूमिका हो जाती है। अगर हम उनका पूर्व इतिहास देखेंगे, तो जब भगवान विष्णु अवतार ले रहे होते हैं, तो देवताओं से कहते हैं कि “आप भी अवतार लो और भगवान के लिए मदद करो।” तो तभी जो इंद्र होते हैं, वह वाली बनते हैं। सूर्य जो होते हैं, वह सुग्रीव बनते हैं। और हनुमान जी जो होते हैं, वह वास्तव में शिवजी का रूप होते हैं और शिवजी की शक्ति होते हैं। वह शिवजी की शक्ति वायु द्वारा, जो अंजनी होती हैं, उनमें स्थापित होती है।
तो शिवजी जो हैं, वह प्रभु श्री राम चंद्र के महान भक्त हैं, ‘वैष्णवानां यथा शम्भुः’। इसलिए हनुमान जी भी राम चंद्र के बहुत बड़े भक्त हैं। पर अभी तक वे पहले देखते हैं, वो पहचान नहीं पाते। वह उनको प्रणाम करते हैं और अपना परिचय करते हैं कि “मैं सुग्रीव का सेवक हनुमान हूँ, आपका भी सेवक हूँ।” और इस तरह से जो परिचय कराते हैं, यहाँ पर हम देखते हैं कि हनुमान जी पहले सुग्रीव के संशय को दूर करते हैं। और कहते हैं कि “मैं सुग्रीव का सेवक हूँ।”
तो प्रभु श्री राम चंद्र बड़े प्रसन्न हो जाते हैं। वह कहते हैं कि “हम तो सुग्रीव को ही ढूँढने आये थे।” तो फिर वह कहते हैं “ठीक है, तो ज़रूर मैं आपको सुग्रीव के पास ले जाता हूँ।” तो “कहाँ है सुग्रीव?” तो वो पहाड़ दिखाते हैं, “इस पहाड़ में ऊपर है, तुरंत हम जाते हैं।” प्रभु श्री राम चंद्र और लक्ष्मण पहाड़ की ओर जाने लगते हैं, तो हनुमान जी कहते हैं कि “आप पैदल क्यों जाना चाहते हैं? मैं आपको ऊपर लेके जाऊँगा।” तो अभी तक ये सब में हनुमान जी अपने साधारण ब्राह्मण रूप में हैं। “कि तुम कैसे लेके जाओगे मुझे?” तो फिर हनुमान जी कहते हैं “मैं दिखाता हूँ।” और अपना रूप बड़ा विशाल बना लेते हैं।
प्रभु श्री राम और लक्ष्मण जी से कहते हैं कि “आप मेरे कंधे पे बैठ जाओ।” तो एक कंधे पे राम और एक कंधे पे लक्ष्मण। आपने चित्र देखा होगा कई बार। तो वास्तव में ये दो बार इस तरह के प्रसंग आते हैं कि वो दोनों लक्ष्मण और राम को उठा के ले जाते हैं। हम रामायण के चित्र में देखते हैं कि अंतिम युद्ध के समय में, और इसके कुछ समय पहले भी, जब प्रभु श्री राम चंद्र को युद्ध करना होता है, तो हनुमान जी उनके रथ के समान बनते हैं। जब रावण युद्ध करने आता है अपने रथ पे, तो तभी हनुमान जी उनका रथ बनते हैं।
पर एक ही समय में एक कंधे पे राम और एक कंधे पे लक्ष्मण, ये दो समय होता है। ये पहला मौका होता है। और दूसरा मौका तब होता है, जो अहिरावण नाम का एक रावण का भाई होता है, और वह जब पाताल पुरी में उनका अपहरण करके ले जाता है दोनों राम और लक्ष्मण को, तो उनको जब वापस लेके आते हैं, तभी प्रभु राम और लक्ष्मण उनके कंधे पे बैठ के आते हैं।
तो अभी हनुमान जी तो वायु पुत्र हैं, और वो वायु के समान उड़ सकते हैं। पर वो सोचते हैं कि “प्रभु राम मेरे कंधे पे रखे हुए हैं, उनके चरण कमलों का स्पर्श करने का मौका बार-बार मिलेगा या नहीं पता नहीं।” तो धीरे-धीरे जाते हैं। और प्रभु राम चंद्र का वो दर्शन करते हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनके चरण कमलों का स्पर्श करते हैं। और उठा के फिर वो सुग्रीव के पास ले जाते हैं। सुग्रीव जब देखता है कि इस तरह से हनुमान जी बड़े आदर से उनको लेके आ रहे हैं, तो पेड़ का आसन होता है और वो उन्हें बिठा देता है।
सुग्रीव से मैत्री और शकुन विज्ञान
और सुग्रीव बताते हैं कि “जब मैं यहाँ पे था, तो मैंने कुछ समय पहले देखा कि एक सुंदर स्त्री को एक राक्षस लेके जा रहा है। और उसने देखा कि हम नीचे हैं, हवा के मार्ग से जा रहा था वो, तो उसने कुछ चीज़ें नीचे फेंक दी थीं।” तो प्रभु राम चंद्र कहते हैं कि “क्या आप मुझे दिखा सकते हैं?”
तो सुग्रीव तुरंत अपनी गुफा में जाते हैं और अंदर से वो आभूषण लेके आते हैं। और वो जो आभूषण होते हैं, जब देखते हैं तो प्रभु राम चंद्र उनको पकड़ते हैं, अपने सीने पर लगाते हैं। “वो सीता के ही आभूषण हैं और सीता इसी दिशा में गई है।” तुरंत वो सुग्रीव से पूछते हैं, “कहाँ गई वो सीता? क्या आप जानते हैं कहाँ गई?” “मुझे पता तो नहीं है पर दक्षिण दिशा में गई है, इतना पता है। और अगर मेरे वानरों की सेना मेरे साथ में होती, तो मैं सारी वानरों की सेना को तुरंत भेज देता और मैं सबको, सीता कहाँ हैं, पता करवाता।”
तो जब प्रभु राम सुनते हैं, “मुझे तो बताया गया था कि आप वानरों के राजा हो?” “नहीं, मैं राजा नहीं हूँ वानरों का। वाली वानरों का राजा है। और मैं उसके भय के कारण यहाँ पर रह रहा हूँ।” जब सुनते हैं तो आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि “वाली? तो तुम उनके भाई हो, तो तुम उनके भय में क्यों रहते हो?” फिर वो पूरी कहानी बताते हैं। आप सब कहानी जानते हैं संक्षिप्त रूप में। वो दोनों के बीच कुछ मतभेद हो गया होता है, गलतफहमी हो जाती है और उसके कारण वह इस परिस्थिति में आ जाते हैं। उसके बारे में हम चर्चा भविष्य में करेंगे।
पर यहाँ पर महत्वपूर्ण बात यह है कि हनुमान जी की योजना से क्या होता है, अभी वे राम और सुग्रीव की संधि करा देते हैं। और वो कहते हैं कि “ये संधि बना ली है तो हम क्या करेंगे? साथ में सहयोग करेंगे।” और वे तुरंत यज्ञ की अग्नि जलाते हैं। यज्ञ की अग्नि जलाके फिर उसकी परिक्रमा करते हैं। तो इस तरह से जब दोनों संधि बना लेते हैं… हम साधारणतः देखते हैं कि एक-दो मित्र मिल जाते हैं तो हाथ मिला लेते हैं। तो उसमें वो एक स्नेह का लक्षण है। पर जब कोई धार्मिक स्तर पे कोई संधि होती है, तो उसमें एक ऊँची शक्ति भी आ जाती है।
और इसके कारण क्या होता है कि जब इस तरह से वो संधि कर लेते हैं, तो रावण, वाली और सीता, इन सबके शरीर में एक प्रकार का विकार होने लगता है। जो उनका बायाँ हाथ है, बाईं आँख है, वो फड़कने लगती है।
तो कैसे होता है? इसमें बताया गया है, जो शकुन होते हैं… यह एक विज्ञान के समान है। कि ब्रह्मांड, सृष्टि में क्या होने वाला है, कब होने वाला है, उसको जानना हम सबके लिए संभव नहीं है। पर उसके कुछ लक्षण होते हैं, जिससे हम समझ सकते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है। जैसे वैज्ञानिक बताते हैं कि जो चींटियां होती हैं, वो समझ जाती हैं कि भूकंप कब होने वाला है। इसलिए, लगभग एक दिन पहले वो समझ जाती हैं कि यहाँ पर भूकंप आने वाला है, यहाँ से हमें दूर जाना चाहिए। तो फिर यह वैज्ञानिकों ने भी ढूँढ के निकाला है।
तो उसी तरह से, शकुन जो होते हैं, वो दिखाते हैं हमें कि भविष्य में क्या होने वाला है। तो तीन प्रकार के शकुन होते हैं। एक होते हैं जो हमारे शरीर में शकुन होते हैं। दूसरे होते हैं कि हमारे आजू-बाजू के वातावरण में शकुन होते हैं। और तीसरे, आसमान में शकुन होते हैं। तो शारीरिक शकुन भी… मैं एक साधारण तरह से बता रहा हूँ, इसकी और भी विशेषता है, और बहुत कुछ हो सकता है। पर यहाँ महत्वपूर्ण क्या है कि ये एक विज्ञान है। कोई व्यक्ति कहेगा कि “मेरा हाथ हिल रहा है, उससे हार्ट अटैक क्यों होगा? हाथ का और हृदय का संबंध क्या है?” पर वो संबंध समझने के लिए विज्ञान होता है।
तो शकुन जो होते हैं, ये लक्षण होते हैं शारीरिक स्तर पर जो होते हैं। और ये शकुन जो होते हैं, अपशकुन हो सकते हैं, या शुभ शकुन हो सकते हैं। तो अगर पुरुष के शरीर का बायाँ हाथ फड़कता है, तो वो पुरुष के लिए अमंगल है, पर स्त्री के लिए जो बायाँ हाथ फड़कता है, तो वो मंगल है। तो इसलिए रावण और वाली का जो बायाँ हाथ फड़कता है, तो क्या है? उनके लिए अमंगल है। पर सीता के लिए जो होता है, वो मंगल है।
और इस तरह से जो संधि हो जाती है, तो उसको किस तरह से वो संशय को निवारण करते हैं, और किस तरह से वाली का उद्धार होता है, इसकी चर्चा हम भविष्य में करेंगे। यहीं पे हम आज के विषय को विराम देंगे। किसी का कोई सवाल है? यस।
प्रश्नोत्तर (Q&A)
प्रश्न: तो जैसे भागवतम् जो है, शुद्ध भक्ति का स्तर बताता है, महाभारत धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का स्तर बताता है, तो रामायण किस स्तर पे आता है?
वास्तव में, ऐसा नहीं है कि महाभारत केवल धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का स्तर बताता है। उसमें भी शुद्ध भक्ति के बारे में बताया गया है। जैसे भीष्म पितामह की भक्ति है, वो कैसे भगवान के दर्शन करते हैं, वो शुद्ध भक्ति के बारे में बताया गया है। पर अधिकांश रूप से धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के बारे में है।
तो रामायण भी अधिकांश रूप से जो है, वह अगर हम प्रभु श्री राम चंद्र के जीवन को देखते हैं, तो वह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के स्तर पे है। हम देखेंगे प्रभु श्री राम चंद्र जो हैं, वह अलग-अलग प्रकार के यज्ञ करते हैं, कहीं बताया गया है कि शिव जी की पूजा कर लेते हैं, और वह अलग-अलग प्रकार के यज्ञ करते हैं, धार्मिक कार्य करते हैं। जैसे कि वहाँ पे वह अपने पिता के आदेश का पालन करने पर बहुत ज़ोर देते हैं। तो यह सब जो धार्मिक है, पर यह सर्वोच्च धर्म नहीं है।
तो अगर हम प्रभु श्री राम चंद्र के जीवन को देखते हैं, वाल्मीकि रामायण के आधार पर, तो फिर वह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का ही स्तर है। पर जब हम समझते हैं कि प्रभु श्री राम चंद्र स्वयं भगवान हैं, और उस दृष्टि से हम उनकी लीलाओं को देखते हैं, तो फिर जो भी उनके सहयोगी हैं, वह शुद्ध भक्त हैं।
तो इसलिए रामायण और महाभारत में फर्क ये है कि महाभारत में कृष्ण केंद्र नहीं हैं, महाभारत में पांडव केंद्र हैं, और कृष्ण जो हैं, वह पांडवों के सहयोगी हैं। पर रामायण में प्रभु श्री राम चंद्र ही केंद्र हैं। तो जो राम कथा है, उसमें प्रभु श्री राम चंद्र क्या कार्य करते हैं, उसको देखेंगे और उसका विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे, तो अधिकांश रूप से वो धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के स्तर पे हैं।
और उसके कारण, जब सारा युद्ध हो जाता है, तो सारे इंद्र आदि देवता आते हैं। तो प्रभु श्री राम चंद्र कहते हैं, इंद्र से वो वर माँगते हैं कि “आप मुझे वर दो, कि सारे वानर जहाँ भी रहेंगे, बड़ी समृद्धि में रहेंगे।” और वो कहते हैं कि “अगर किसी वानर की मृत्यु हो गई है, तो उनको भी आप जीवित कर दो।” तो देवताओं से वर माँगने की ज़रूरत तो नहीं है, पर क्यों दिखाया है? क्योंकि वो उस स्तर पर दिखाते हैं कि वे मानव हैं और देवताओं से नीचे हैं।
पर जब हम आचार्यों के तात्पर्य के आधार पर देखते हैं, और सिर्फ भगवान राम के कार्यों को नहीं देखते हैं, पर हम उनके स्तर को समझते हैं, तो फिर उन कार्यों पर चिंतन करना और उन कार्यों का विश्लेषण करना, वह भक्ति के स्तर पर है। तो मतलब ये रामायण को हम दो स्तर पर समझ सकते हैं। कि सिर्फ अगर वो कार्यों को देख रहे हैं – “उन्होंने इस समय ऐसा कार्य किया, ऐसा क्यों किया?” – तो वो अधिकांश रूप से धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के स्तर पर है। पर जब हम समझते हैं कि वे स्वयं भगवान हैं, उनका स्मरण करते हैं, कीर्तन करते हैं उस भाव से, तो फिर वो शुद्ध भक्ति है। स्पष्ट है?
प्रश्न: कई बार ऐसे होता है कि अलग-अलग ऋषि, अलग-अलग धामों, अलग-अलग लोकों में जाते हैं, पर भगवद्धाम में नहीं जाते हैं। ऐसा क्यों है?
तो वास्तव में, अपने-अपने स्तरों के अनुसार उनको प्राप्ति होती है। ऐसा नहीं कि जो हर एक ऋषि जंगल में रह रहा है, वह शुद्ध भक्त ही है। उनकी चेतना ऐसी हो सकती है कि उन्हें इस भौतिक जगत के, मृत्युलोक के दुखों से मुक्ति प्राप्त करनी है, या स्वर्ग लोक प्राप्त करना है, तप लोक प्राप्त करना है। तो जो व्यक्ति की चेतना है, उसके अनुसार उनको प्राप्ति होती है।
तो इसलिए ऐसा नहीं है कि जो सब ऋषिगण हैं, वो शुद्ध भक्त हैं। सब ब्राह्मण जो हैं, वो ऐसे नहीं है कि वो भक्त हैं। कुछ ब्राह्मण जो होते हैं, वो भगवान के खिलाफ भी यज्ञ करते हैं। तो सिर्फ जंगल में ही रहना, या ऋषि होना, या भक्त होना एक नहीं है। भक्त जो हैं, वो दुर्लभ होते हैं। तो जिनमें भगवान की भक्ति की चेतना है, उनको भगवद्धाम की प्राप्ति होती है।
तो कलियुग में कैसे है, कि अगर आपको ब्रह्मांड की तुलना करनी है, तो वैसे है कि ये मृत्युलोक है, नीचे के लोक हैं, स्वर्ग लोक है, और उसके परे भगवद्धाम है। तो कलियुग में स्वर्ग में जाने वाले लोग लगभग हैं ही नहीं। क्योंकि स्वर्ग में जाने के लिए सिर्फ ‘स्वर्गवासी’ या ‘कैलाशवासी’ नहीं बनता है वो, वास्तव में उसको भक्ति करनी चाहिए। पर कलियुग में अधिकांश लोग नरक में जा रहे हैं, या कुछ भक्ति करके भगवद्धाम जा रहे हैं। पर पूर्व युगों में पुण्य के अनुसार, अलग-अलग पात्रता के अनुसार, अलग-अलग धाम में लोग जा सकते थे।
ठीक है? बहुत-बहुत धन्यवाद। श्री राम चंद्र भगवान की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!