Reflections on the last verse spoken by Krishna in the Gita – Hindi
[Bhagavad-gita class on 18.72 at ISKCON, Kurukshetra, India]
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Lecture Summary
- इस व्याख्यान में भगवद्गीता के अंतिम श्लोक—“कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ…”—के आधार पर गीता के मुख्य संदेश को समझाया गया है। भगवान कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि क्या उन्होंने गीता के ज्ञान को एकाग्रचित्त होकर सुना और क्या उनका अज्ञान तथा सम्मोह नष्ट हुआ।
- वक्ता बताते हैं कि अज्ञान का अर्थ वास्तविकता को न जानना है, जबकि सम्मोह का अर्थ किसी चीज़ को गलत समझना है। भगवद्गीता का ज्ञान व्यक्ति को इन दोनों से मुक्त करके वास्तविक धन प्रदान करता है। यहाँ धनञ्जय नाम का विशेष अर्थ बताते हुए कहा गया है कि असली धन भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि ऐसा ज्ञान है जो अज्ञान और मोह का नाश करता है।
- आज के समाज में वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के बावजूद लोग मनोरंजन, इंटरनेट और तकनीक में अत्यधिक डूबकर एक काल्पनिक दुनिया में चले जाते हैं। मनोरंजन अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन जब वह जीवन में अत्यधिक महत्व प्राप्त कर लेता है, तो वह व्यक्ति को वास्तविक आनंद से दूर कर सकता है। वास्तविक और स्थायी आनंद भगवान की भक्ति और उनके चरणों में प्राप्त होता है।
- इसके बाद श्रवण और एकाग्रता का संबंध समझाया गया है। योग में मन की विभिन्न अवस्थाओं—मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरोध—का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि भगवद्गीता का श्रवण और स्मरण चेतना को एकाग्र करने में सहायता करता है।
- गीता के छठे अध्याय के श्लोकों के आधार पर योग की परिभाषा बताई गई है—दुःख के साथ संयोग से वियोग ही योग है। योग की उच्च अवस्था में व्यक्ति ऐसा आंतरिक आनंद प्राप्त करता है जो इंद्रियों से मिलने वाले अस्थायी सुख से कहीं ऊपर है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
- वक्ता श्रील प्रभुपाद के जीवन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उन्होंने भगवान कृष्ण के संदेश को पूरे विश्व में फैलाने के बाद किसी अन्य भौतिक उपलब्धि की इच्छा नहीं रखी। इससे यह समझाया गया है कि जब व्यक्ति को सर्वोच्च आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो जाता है, तो उसे उससे अधिक किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता महसूस नहीं होती।
- अंत में वक्ता बताते हैं कि भगवद्गीता केवल एक ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवंत ग्रंथ है। यदि हम उसके श्लोकों का नियमित रूप से श्रवण, स्मरण और पाठ करते हैं तथा उनके संदेश को जीवन में लागू करते हैं, तो आवश्यकता के समय उचित ज्ञान स्वयं हमारी चेतना में प्रकट हो सकता है।
- इस बात को समझाने के लिए अमेरिका के airport का एक अनुभव साझा किया गया है, जहाँ उनके crutches में explosive alert आने पर उन्हें चिंता और क्रोध होने लगा। उसी समय उन्हें “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे…” श्लोक स्मरण हुआ और उन्हें विश्वास हुआ कि भगवान हर परिस्थिति में उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। बाद में पता चला कि उनके crutches में वृन्दावन की रज के कारण security alert आया था।
- मुख्य संदेश:
भगवद्गीता का श्रवण और अनुशीलन हमारी चेतना को मूढ़ता और विक्षेप से एकाग्रता तथा निरोध की ओर ले जाता है। इससे अज्ञान और सम्मोह का नाश होता है और व्यक्ति स्थायी आनंद, कृष्ण-प्रेम और वास्तविक आध्यात्मिक धन प्राप्त कर सकता है।
Full Transcription
श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम श्लोक पर चिंतन
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
गुरुपदमेरे पीछे धोराये। ये एक प्रार्थना है भगवान श्रीकृष्ण से, जिन्होंने गीता का ज्ञान दिया था।
प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः॥
बहुत कुछ कहूँगा आज आप सबके बीच में, कुरुक्षेत्र के इस पावन धाम में आया हूँ। भगवान कृष्ण का जो संदेश है, ये इतिहास भर सबको व्याप्त करता है। सब लोगों के लिए संदेश है।
तो जो गीता का आखिरी श्लोक है, जो आखिरी वचन भगवान बोलते हैं, भगवान कृष्ण अर्जुन से, उस वचन के आधार में कुछ गीता के सार के वाले मूल्यने का प्रयास करूँगा।
अठारहवें अध्याय का 72वाँ श्लोक जो है, वहाँ भगवान एक प्रश्न पूछते हैं। संपूर्ण गीता शुरू होती है और आगे बढ़ती है। अर्जुन कृष्ण से सवाल पूछते हैं। पहला सवाल जो अर्जुन पूछते हैं:
“पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।”
क्योंकि मैं आपको पूछना हूँ, धर्म क्या है?
अब इस धर्म और इस शब्द के अलग-अलग अर्थ होते हैं। अगर हम बहुत विस्तृत रूप से इसका अर्थ देखने का प्रयास करेंगे, तो इसका अर्थ होता है कि जो नेचर में जो स्वाभाविक पद्धति है, जिसे सब कुछ कार्य करता है, तो वो पद्धति अगर हम समझ पाएँगे और उसमें हम स्वाभाविक हो जाते हैं, तो हम अपने और तुम्हारे लिए कार्य करेंगे।
तो आप इस तरह से अलग-अलग सवाल अर्जुन पूछते हैं और अंत में भगवान अर्जुन से सवाल पूछते हैं। आज वो पूछते हैं सवाल:
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
“कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ”—हे पार्थ, क्या आपने ये ध्यानपूर्वक सुना है? कच्चिदेतत् श्रुतम्—आपने सुना है। “त्वयैकाग्रेण चेतसा”—आपने अपने चेतना को एकाग्र करके क्या आपने इस ज्ञान को सुना है? और अगर ऐसा आपने किया है, तो क्या होगा?
“कच्चिदज्ञानसम्मोहः”—अज्ञान और उससे जो सम्मोह होता है।
अब अज्ञान और सम्मोह में फर्क है। अभी अगर कोई चीज़ सामने है, अगर मुझे अच्छी तरह दिखती है, तो वो ज्ञान है। अगर मुझे वो दिखती ही नहीं है या समझती ही नहीं है, तो वो अज्ञान है। पर अगर मैं उस चीज़ को गलत समझता हूँ, तो वो सम्मोह है।
अगर एक साँप सामने है और मैं देखता हूँ और ये साँप है, खतरनाक है, तो ये ज्ञान है। अगर मैं देख रहा हूँ और समझता हूँ कि साँप खतरनाक है, तो मैं भाग जाऊँगा—साँप के बारे में यह ज्ञान है। पर मैं एक साँप को अगर एक रस्सी समझ लेता हूँ, तो वो सम्मोह है।
“कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।”
प्रनष्टस्ते क्या? इसका नाश हो गया है? धनञ्जय। हे अर्जुन!
अर्जुन के अनेक नाम हैं। जो आखिरी नाम भगवान कृष्ण इस्तेमाल करते हैं अर्जुन को संबोधित करने के लिए, वहाँ है धनञ्जय। क्योंकि आपने जो धन अर्जित किया था, तो भगवद्गीता अर्जुन को ज्ञानरूपी धन प्रदान कर रही है।
से अर्जुन कहते हैं, कुछ लोग बुद्धिमान होते हैं और कुछ लोग उसके विपरीत होते हैं। तो यह बुद्धि होती है, यह क्या बुद्धि है?
बुद्धि वास्तव में एक संपत्ति होती है। आजकल के समाज में हम एक व्यावहारिक रूप से देख सकते हैं। अगर कोई बहुत पढ़ा-लिखा है—अच्छा, आजकल ज्ञान मतलब लोग technical knowledge समझते हैं। Engineering degree है, software का ज्ञान है—तो फिर उस व्यक्ति को बहुत अच्छी तनख्वाह की नौकरी मिल जाती है।
तो इस तरह से कह सकते हैं कि ज्ञान से संपत्ति मिलती है। पर जिस ज्ञान के भगवान बता रहे हैं, उस ज्ञान से भगवान अर्जुन को धनवान कर रहे हैं।
अर्जुन, आप धनञ्जय हो। अगर आप इस ज्ञान को प्राप्त कर लेते हो, तो आप वास्तव में धनवान हो जाते हैं।
और वह धन क्या है? असली धन वो है जो हमें अज्ञान और मोह से परिमुक्त करता है।
अज्ञान और मोह
अज्ञान और मोह जो है, आजकल के समाज में बहुत बढ़ गया है। हमारे आधुनिक समाज में वैज्ञानिक प्रगति बहुत हुई है। जो technology और ज्ञान आया है, वह काफी अद्भुत है।
कुछ ही साल पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि हम बहुत अच्छी तरह से एक-दूसरे से connected होंगे। हम बाहर से इतने connected हो गए हैं दूसरों से, जबकि अपने से, जब हम खुद से ही बस connected हों।
थाईलैंड में एक लड़का था। वो internet में browsing कर रहा था। और करते गया, और browsing करते-करते इतना उसमें खो गया कि 72 घंटे continuously वो browsing कर रहा था और खाना भूल गया, पीना भूल गया और वहीं पर बेहोश किया गया। और फिर उसका दोस्त बाजू के room में था, वो आ गया, उसको बचा गया था, अस्पताल में लेकर गया।
तो क्या हुआ है यहाँ पर? Technology अच्छा, अच्छे के लिए उपयोग हो सकता है, पर technology से ही मोह बहुत बढ़ सकता है। हम एक काल्पनिक दुनिया में चले जाते हैं और उसमें हम जो सत्य है, उससे दूर हो जाते हैं।
आजकल के समाज में सबसे ज़्यादा पैसा कौन कमाते हैं? सबसे ज़्यादा पैसा कौन कमाते हैं? Lawyers, doctors, और कोई? Engineers, और कोई? Government, और कोई? Businessmen, और कोई? Actors.
खास करके actors, sportsmen, cricket players, entertainers, जो मनोरंजन प्रदान करते हैं, वह सबसे ज़्यादा पैसा कमाते हैं।
तो एक भारत की एक female boxer थी। उसके जीवन पर एक movie बनाया गया। तो जो Bollywood actresses ने movie बनाया है, उस movie से उसने इतना पैसा कमाया है जो boxer ने अपनी ज़िंदगी भर नहीं कमाया था, एक movie के आधार पर।
अभी IPL का auction हुआ था। करोड़ों की मात्रा में लोग पैसे देते हैं cricketers को।
तो अभी, what a society values reflects its values.
एक समाज किस चीज़ के लिए बहुत पैसा देने के तैयार है, उससे हम समझ सकते हैं कि वो समाज क्या चीज़ महत्वपूर्ण मानता है।
तो आजकल के समाज में लोगों को मनोरंजन इतना ज़रूरी लगता है कि लाखों-करोड़ों की मात्रा में पैसे उसको खर्च करने के तैयार हैं।
मनोरंजन और भौतिक जगत
और मनोरंजन इतना ज़रूरी क्यों है?
क्योंकि the material world—भौतिक जगत—ये basically एक boring जगत है।
भौतिक जगत में हम सब born हो जाते हैं। तो क्या है? ये भौतिक चेतना है, ये भौतिक जगत है, ये आध्यात्मिक जगत है। तो भौतिक जगत में कोई व्यक्ति इतने समय तक रह नहीं सकता है।
सुख नहीं, शान्ति नहीं मिलती।
तो अगर आध्यात्मिक ज्ञान मिलता है, अगर भगवान का ज्ञान मिलता है, तो हम भौतिक चेतना से आध्यात्मिक चेतना की ओर जाते हैं।
पर जब आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता है, तो फिर क्योंकि भौतिक जगत में, भौतिक चेतना से कोई आध्यात्मिक जगत तक रहने जाता है। दुख आते रहते हैं। दुख नहीं होते हैं तो कुछ भी रोचक नहीं होता है, तो बोर हो जाते हैं।
तो लोग काल्पनिक दुनिया में जाते हैं। लोगों के मन में इतना तनाव है, इतना असंतुष्टता है कि वो किसी भी कीमत पर असलियत के जगत से काल्पनिक जगत में जा रहे हैं।
तो अज्ञान क्या है?
तो अज्ञान ये है कि हमें इस भौतिक जगत के बारे में पता है थोड़ा बहुत, पर इसके परे जो आध्यात्मिक जगत है, जहाँ हमारी शान्ति, सुख, प्रेम की कामनाएँ पूरी हो सकती हैं, क्या आकांक्षाएँ पूरी होती हैं—उसके बारे में अज्ञान है।
तो वो अज्ञान जब बढ़ जाता है, तो अज्ञान से क्या होता है? सम्मोह।
तो सारा मनोरंजन कर लेते हैं। मनोरंजन बुरी चीज़ नहीं है। सभ्यता से हर समाज में मनोरंजन होता ही है। पर कोई भी चीज़ अगर अधिक मात्रा में आ जाती है, तो फिर वह नाशात्मक बन जाती है।
ऐसे शरीर में कोई चीज़ अंग बढ़ना, शरीर का अंग बढ़ना भी स्वाभाविक है। Cancer भी क्या होता है? वो भी शरीर की ही अंग है, शरीर की ही cells हैं। वो बढ़ रहे हैं। पर वह बहुत अधिक मात्रा में जाएँ तो कोई भी चीज़, बहुत ही अधिक मात्रा में उस पर ज़ोर दिया जाए, तो वो विनाशकारी बन जाती है।
तो मनोरंजन एक जीवन का एक अंग हो सकता है। पर जब एक व्यक्ति समाज उसके इतना ज़ोर दे रहा है कि लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं, तो इसका मतलब ये है कि वो अज्ञान से सम्मोह में चला गया है।
कि हमें असली आनंद कहाँ मिलने वाला है, वो पता नहीं है। तो फिर हम अलग-अलग प्रकार से technology इस्तेमाल करके नए-नए प्रकार के मोह निर्मित करते हैं और उससे कुछ आनंद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
पर भगवद्गीता का जो ज्ञान है, वहाँ हम समझते हैं कि इस तरह के मनोरंजन के जीवन में, इस तरह के भौतिक जीवन में जो आनंद है, वो अस्थायी है।
जो स्थायी आनंद है, वो भगवान के चरणों में है। भगवान की भक्ति में है।
श्रवण और एकाग्रता
जब हम श्रवण करते हैं, तो फिर उस श्रवण से क्या होता है?
तो ये जो श्लोक है, इसके अलग-अलग प्रकार से हम अर्थ देख सकते हैं। एक अर्थ सरल अर्थ है कि क्या आपने एकाग्रता से श्रवण किया है?
इसका दूसरा अर्थ ये भी हो सकता है कि श्रवण से आप एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं।
जो योग पद्धति है, उसमें मन के अलग-अलग स्तर बताए गए हैं। इसकी पाँच अवस्थाएँ हैं—मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्रता और निरोध।
क्षिप्त मतलब कुछ भी सोच नहीं पाता है। वृत्ति—क्या हो रहा है? इधर हो रहा है, इधर हो रहा है। अपनी कल्पना में जगत पर जी रहा है।
विक्षिप्त मतलब व्यक्ति एक चीज़ करना चाहता है, पर उस एक चीज़ का बहुत ही उसके दिमाग पर हावी हो गया है।
So, क्षिप्त मतलब हम कहते हैं distraction, बहुत ही विचलित है, किसी भी चीज़ पर ज़ोर नहीं दे पाता है।
विक्षिप्त मतलब व्यक्ति एक चीज़ से पागल जैसा हो गया है। विक्षिप्त मतलब विक्षिप्त बुद्धि से जुड़ी है। तो फिर उसके बाद में सबसे सर्वोच्च, श्रेष्ठ स्तर जो है, उसके पहले का एक स्तर है—एकाग्रता।
तो तमोगुण में हम मूढ़ में होते हैं। रजोगुण में हम क्षिप्त में होते हैं। सत्त्वगुण में हम एकाग्र होने का प्रयास कर रहे हैं।
कुछ लोग हैं, वो चीज़ें करते हैं—मुझे ऐसे करना है, मैं यह करूँगा, आप यह करो, आप यह करो। वो सत्त्वगुण में होता है।
रजोगुण में लोग करने का प्रयास करते हैं, पर एक चीज़ करने का प्रयास करते हैं, पर सोच नहीं पाते हैं—इससे यह हो सकता है, उससे वो हो सकता है। तो एक चीज़ चालू कर देते हैं, उससे दस चीज़ हो जाती हैं। नहीं, यह क्या हो गया?
तमोगुण में क्या चल रहा है, कुछ भी पता नहीं होता है।
तो भगवद्गीता के श्रवण से ही हमारी चेतना एकाग्रता की तरफ आ सकती है।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
तो हम भगवद्गीता के श्लोक हैं, उसको हम अगर recite करते हैं, उसको understand करते हैं, उसको स्मरण करते हैं, तो इसके द्वारा हमारी चेतना एकाग्रता की तरफ आ जाती है।
और एकाग्रता में सुधार आने से—thing is happened—अज्ञानसम्मोहः प्रनश्यति।
अज्ञान और सम्मोह का क्या होता है? नाश होता है।
जिस तरह से अर्जुन के अज्ञान और सम्मोह का नाश हो गया, वैसे गीता का संपूर्ण शिक्षण है हर एक व्यक्ति के अज्ञान-सम्मोह का नाश कर सके।
और ऐसा जब नाश हो जाता है, धनञ्जय, जो असली धन है, वो व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।
असली धन की परिभाषा
अभी धन की परिभाषा अलग-अलग संस्कृतियों में, अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग-अलग मनःस्थितियों में अलग होती है।
स्वामी पद्मावली नाम का एक ग्रंथ, श्लोकों का संग्रह, उसमें बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति बहुत भूखा है, तो उसके लिए बहुत मूल्यवान चीज़ पैसा नहीं है, अन्न है।
मान लीजिए पूरा काल है, रेगिस्तान में कोई है और उसके पास बड़ी धन-संपत्ति है, पर न अन्न है, न खाना है, न पानी है। वो धन-संपत्ति से क्या करेगा?
उस परिस्थिति में उसके लिए सबसे मूल्यवान चीज़ क्या है? अन्न और पानी है।
कोई व्यक्ति बहुत रुग्ण है, बहुत बीमार है, उसके पास आज बहुत सी धन-संपत्ति है, पर उसके लिए सबसे मूल्यवान चीज़ उस समय क्या है? दवाई है।
कोई व्यक्ति अँधेरे में है और किसी से टकरा रहा है, गिर रहा है, चोट खा रहा है, उस समय उसके लिए सबसे मूल्यवान चीज़ क्या है? रोशनी है।
तो जो महत्वपूर्ण चीज़ है, वो परिस्थिति, मनःस्थिति और संस्कृति—इन तीनों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
कोई व्यक्ति बहुत चिंता में है, तो उस समय अगर उसको जो शान्त कर सकता है, तो वही उसके लिए सबसे मूल्यवान है।
पाश्चात्य देशों में जो दवाई सबसे ज़्यादा लोग लेते हैं, कौन-सी दवाई है, किसी को पता है? Tranquilizers.
Tranquilizers मतलब—मैं विचलित हूँ, विचलित हूँ, मैं शान्त करता हूँ।
वास्तव में कोई दवाई से हम चिंता का पूरा निवारण नहीं कर सकते हैं। वो थोड़ा सा निवारण हो जाता है, पर पुनः चिंता हो जाती है।
ये कैसे है कि बाहरी रूप से सांत्वना देना कभी-कभी ज़रूरी हो सकता है, पर वो पर्याप्त नहीं है।
अगर मान लीजिए कोई घर में मेहमान आए हैं, कोई घर में छोटा बच्चा है, तो उससे खेलने के लिए वो कभी मेहमान आकर उसको गुदगुदी करते हैं। उसको जब गुदगुदी करते हैं, तो शायद वो बच्चा हँसने लगेगा।
अगर वो बच्चा हँसने लगेगा, तो क्या ये गुदगुदी से उत्पन्न जो हँसी है, क्या वहाँ सुख है?
अगर वो सुख होता, तो हम सब अपना-अपना एक गुदगुदी का machine बना लेते हैं और जब हमको सुख चाहिए, हमको अपना perpetual machine tickle करो और सुखी हो जाओ।
और क्या है ये? ये केवल हँसी है। इससे अंतरंग सुख नहीं है।
तो उसी तरह से जो अधिकांशतः technology जो है, इससे मनोरंजन मिलता है, जिससे लोग राहत प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वो क्या है? Technology—इससे tickle करो, इससे tickle करो, उससे tickle करो, गुदगुदी करो।
तो मन को stimulate करके, उत्तेजित करके कुछ तो भी रस प्राप्त करो। पर जो रस है, बहुत ही क्षणभंगुर है।
पर जो हम खुद को भगवान के संपर्क में आकर stimulate कर सकते हैं, उसमें असली आनंद है।
योग की सर्वोच्च अवस्था
तो जो भगवान ने योग का संदेश भगवद्गीता में दिया है, जो मैं बता रहा था कि एकाग्रता, एकाग्रता के ऊपर योग-साधना में निरोध जो होता है, तो गीता के छठे अध्याय के 20वें से 24वें श्लोक में उस अलग-अलग योग अवस्था के बारे में कहा गया है:
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्॥
यहाँ भगवान योग की परिभाषा बता रहे हैं। वे कहते हैं—योगसंज्ञितम्।
योग की परिभाषा क्या बता रहे हैं? दुःखसंयोगवियोगम्।
तो हम सबका इस भौतिक जगत में दुःख से संयोग हो जाता है। दुःख हमारे सबके जीवन में आता है। जब दुःख से वियोग हो जाता है, उससे जब हम दूर चले जाते हैं, तो उसको योग कहलाते हैं।
और यहाँ यह योग कैसे प्राप्त होता है?
बाहरी स्तर पर तो दुःख होते ही रहेगा।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
योग की साधना का अनुशीलन करके हम क्या करते हैं? निरोध के स्तर पर आ जाएँगे।
भगवद्गीता का श्रवण आधे-अधूरे हम करेंगे, तो हम एकाग्रता के स्तर पर आ जाएँगे। पर भगवद्गीता का अनुशीलन करेंगे हम अपने जीवन में, तो हम निरोध स्तर पर आ जाएँगे।
निरोध मतलब, the mind will become materially inert.
बहुत एक चीज़ों से वह उत्तेजित नहीं होगा। फिर वह जो मन है, आध्यात्मिक चीज़ों के और आसानी से आकर्षित हो जाता है।
जब ऐसे आकर्षित हो जाता है वो, तो वो जो चेतना अंदर पड़ी है, आत्मा स्वयं को पहचानता है और अंदर आनंद प्राप्त करता है।
कैसा आनंद है ये? सर्वोच्च आनंद है।
हम साधारणतः इंद्रियों से आनंद प्राप्त करते हैं—सुन्दर चीज़ों को देखना, स्वादिष्ट चीज़ों को खाना—पर यह इंद्रियों का क्षणिक आनंद है।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
जो हमारी बुद्धि स्थिर हो जाती है आध्यात्मिक सत्य में, तभी आत्यन्तिक सुख प्राप्त हो जाता है।
और इस आत्यन्तिक सुख का क्या स्वभाव है?
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।
अगर यह प्राप्त हो गया, तो इससे छोड़कर बुद्धि कभी नहीं आएगी।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
जब प्राप्त हो जाता है—यं लब्ध्वा—व्यक्ति उसमें रहता है। इससे परे कुछ और कुछ नहीं चाहिए। इससे बढ़कर और कोई चीज़ है ही नहीं।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।
और इस तरह से स्थित हो गया, दुःखेन गुरुणापि न विचाल्यते। कितना भी बड़ा दुःख हो ना आ जाए, उससे व्यक्ति विचलित नहीं होता है।
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
इसको भगवान कहते हैं—यह योग की परिभाषा है। योग का सर्वोच्च स्वरूप है।
श्रील प्रभुपाद और सर्वोच्च लाभ
श्रील प्रभुपाद जी, जिन्होंने भगवद्गीता का संदेश सारे विश्व में प्रचारित किया।
जब वो अपने अंतिम समय में वृन्दावन आए, उन्हें पूछा गया, यहाँ पर कुछ इच्छा है? तो उनकी कोई इच्छा नहीं थी।
उनकी एक तरह से बहुत इच्छा थी, बहुत सी थी, पर प्रभुपाद जी जानते थे कि कृष्ण का एक plan है।
एक संसार के उद्धार की योजना होती है और उसमें अलग-अलग पीढ़ियों में, अलग-अलग सदियों में, अलग-अलग युगों में भगवान अलग-अलग संतों के द्वारा, अलग-अलग निमित्तों के द्वारा अपने संदेश का प्रचार करते हैं।
तो प्रभुपाद जी ने बहुत शक्ति के साथ, वह दृढ़ संकल्प—चार शक्ति नहीं, पर आंतरिक शक्ति के साथ—दृढ़ संकल्प से सारे विश्व भर भगवान कृष्ण के संदेश का प्रचार किया।
पर जब अंत में कुछ इच्छा नहीं है, क्यों?
भगवान कृष्ण का संदेश प्रचार करने को मिला था, मैंने कर दिया है।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
जो मैंने अभी यहाँ प्राप्त किया है, इसके अलावा और मुझे कुछ ही नहीं चाहिए।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।
बहुत ही बड़ा दुःख भी अचानक आ जाए, उससे नहीं होता है।
तो अगर हम कितना भी धन प्राप्त कर लें इस जगत में, या कोई व्यक्ति कह सकता है कि अभी मुझे और कुछ प्राप्त नहीं करना है—सबसे अलग चीज़ प्राप्त होने है? नहीं, ऐसे नहीं होता है।
जितना भी प्राप्त हो, और प्राप्त करने की इच्छा रहती है।
और कितना भी धन प्राप्त कर लो, कोई भी व्यक्ति ऐसे नहीं कह सकता है कि अभी उन्हें कोई दुःख नहीं आ सकता है।
पर अगर हम भगवान कृष्ण में हमारी चेतना एकाग्र कर लेते हैं, भगवान कृष्ण का प्रेम प्राप्त कर लेते हैं, तो ये जो दोनों हैं, हमें प्राप्त हो जाते हैं।
कि ऐसी प्राप्ति होती है, उसके बारे में और कुछ भी नहीं चाहिए।
और ऐसी प्राप्ति होती है, वो कभी नहीं—आपसे कोई दुःख छीन नहीं सकता है।
तो भगवद्गीता यही भेंट हमें दे रही है।
और एक पवित्र जगह है, जहाँ पर यह भेंट भगवान कृष्ण ने सनातन काल से सारे विश्व को प्रदान की थी।
आप सब बहुत सौभाग्यवान हैं कि इसी धाम में आपका वास है। और यही तरह आप सब भगवान कृष्ण की शरण में आए हुए हैं।
और आप सब की सेवा में, और आप सब कुछ भी अच्छा कार्य करने के लिए, भगवान कृष्ण के संदेश के बारे में कुछ शब्द आज कहें।
और जो इस प्रकार के संदेश के श्रवण के द्वारा हम सब एकाग्रता के स्तर पर जा सकते हैं, और इसके अनुशीलन के द्वारा हम निरोध के स्तर पर जा सकते हैं, और अंततः परम आनंद, सुख, कृष्ण-प्रेम को प्राप्त कर सकते हैं।
इसलिए कि हम सब भी धन्य हो सकते हैं, जो असली धन है वो प्राप्त करके अज्ञान-सम्मोह का नाश कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्रीमद्भगवद्गीता की जय!
इसके कोई सवाल या कोई टिप्पणी हैं?
प्रश्न: आपका सबसे प्रिय श्लोक कौन-सा है?
प्रभुजी, मैं पूछना चाहता हूँ कि आपका सबसे प्रिय श्लोक कौन-सा भगवद्गीता का है?
यंत्र है। इस यंत्र पर हम बैठे हुए हैं। हम जो भ्रमण कर रहे हैं, उसको वो direct कर रहे हैं, उसको मार्गदर्शित कर रहे हैं।
तो अमेरिका में जब मैं Denver में था, मैं airport में जा रहा था, flight catch करने के लिए। तो तभी security clearance होता है।
Security clearance में जब मेरे crutches, कुबड़ियाँ अंदर चली गईं, तो अचानक high explosive alert आ गया।
और लगभग 2-3 मिनट में 10-12 American security officers अपने gun point करके मेरे ओर आ गए हैं।
एक कोई बोला, “आपके crutches में explosives हैं, वो देखो।”
और फिर मैं बोला, “मेरे crutches में कहाँ से explosives?”
वो बोले कि हमको न केवल explosive detect हुआ है, पर high explosives है। तो हमको ये crutches तोड़ने पड़ेंगे।
अगर ये crutches तोड़ देंगे तो मैं चलूँगा कैसे?
तो शायद वो जो security officer था, गुस्से में था। उसने अपने partner से झगड़ा करके आया हो। अपने—“यह नहीं है मेरे problem, यह तुम्हारे problem है। अगर तुम्हारे crutches टूट गए तो फिर वो मेरी समस्या है।”
“नहीं, आपकी समस्या है।”
तो जब मैं हमेशा try करता हूँ कि भगवद्गीता के श्लोक recite करते रहा हूँ, तो जब हम recite करते रहते हैं श्लोक, तो तभी कभी-कभी अचानक अलग-अलग परिस्थितियों में श्लोक याद आ जाते हैं।
तो पहले तो मैं थोड़ा late हो गया था airport में पहुँचने के लिए। मुझे flight catch करना था। तो मैं अब सोचता हूँ security जल्दी clear हो जाएगा और हम निकल जाएँगे।
तो अब यहाँ पर security जल्दी clear हो जाएगा, तो clear ही नहीं हो रहा है। ऐसे लग रहा था।
तो पहले तो गुस्सा आ गया मुझे, पर बाद में थोड़ी चिंता होने लगी कि ये जब clearance करते हैं security का, तो कई बार बहुत लोगों को भय होता है terrorism का। तो उस भय में कभी लोग overreact भी कर देते हैं।
तो तभी मेरे मन में यह श्लोक आ गया। तो मुझे चिंता हो रही थी, थोड़ा गुस्सा आ रहा था—
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
तब मैं सोचना लगा कि कितने जन्मों से इस भौतिक जन्म में मैं भ्रमण कर रहा हूँ और भगवान ने उन सब परिस्थितियों में मेरा मार्गदर्शन किया है।
हर परिस्थिति में कितनी सारी चीज़ें गलत हो सकती हैं। हम flight catch कर सकते हैं, हम शायद… पर मैं—car breakdown हो सकता है। कितनी सारी चीज़ें हर परिस्थिति में गलत हो सकती हैं।
वो अभी तक गलत नहीं हुईं, तो इतने सारे जन्मों में, इतनी सारी परिस्थितियों में भगवान ने मेरा मार्गदर्शन किया है, तो इस परिस्थिति में भगवान मार्गदर्शन कर देंगे।
तो जैसे ही श्लोक मन में आ गया, ये विचार आ गया, शांत हो गया मैं।
और तब मैं सोच रहा था क्या करूँ।
और तभी, पहले मेरे मन में विचार आ गया था, पर वो मुझे बोलने नहीं दे रहा था ना कि ये आपको crutches तोड़ने की ज़रूरत नहीं है। ये crutches openable है। पर वो सुनने को तैयार नहीं था।
तो तभी जब मैं श्लोक का स्मरण करके भगवान को शरण मन में ही ले लिया, तभी उस security officer का boss आ गया।
वह बाहर trouble में हैं। “क्या हुआ?”
तो उसको wave कर दिया और बोला कि “क्या problem है?”
तो उसने वो बहुत ही अच्छा रहता था, समझदार रहता था।
और फिर मैं उसको बोला कि कुछ problem है। आपको तोल सकते हैं? इसको तोड़ने की ज़रूरत नहीं है।
“ठीक है, आप खोल देंगे उसको।”
तो उसने खोला।
और खोला तो क्या हुआ था कि मैं अमेरिका जाने के पहले वृन्दावन गया था। और जो मेरे crutches होते हैं, उसके नीचे rubber padding होता है, तो वो rubber padding निकल गया था।
तो rubber padding निकल के जब मैं वृन्दावन में चल रहा था, तो वृन्दावन में कुछ coastal area है। वहाँ पर जो soil है, उसमें high metal content होता है।
तो वो जो व्रज का रज था, वो मेरे crutch के अंदर चला गया था।
तो वृन्दावन का जो रज वास्तव में explosive ही है, वो हमारे बहुत एक आसक्तियाँ हैं, उनको explode कर देता है।
तो गीता जो एक ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं है, वो एक जीवंत ग्रंथ है।
और अगर हम गीता का स्पंदन करते हैं, उसको अपने जीवन में चिंतन करने का प्रयास करते हैं और खास करके गीता को recite करते हैं, तो फिर असली जब हमारी ज़रूरत पड़ जाएगी, तभी हमें गीता के उचित श्लोकों का स्मरण आ जाएगा।
और उसके द्वारा हम जो है—विचलित, क्षिप्त, मूढ़—मूढ़ से हम एकाग्रता के स्तर पर आ सकते हैं।
बहुत धन्यवाद।
श्रीमद्भगवद्गीता की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर भक्तवृन्द की जय!
हरि बोल! गौर प्रेमानन्दे!