Self-transformation comes by becoming conscious of the subconscious – Hindi?
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Lecture Summary
प्रवचन का मुख्य विषय
यह प्रवचन उद्धव गीता पर आधारित है, जिसमें आत्मा, मन और परमात्मा (भगवान) के बीच के संबंध को समझाया गया है। इसमें इस बात पर गहराई से चर्चा की गई है कि कैसे हमारा मन हमें भौतिक संसार से बाँधता है और कैसे सचेतन (conscious) होकर और भक्ति के माध्यम से हम इस बद्धावस्था से मुक्त हो सकते हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- आत्मा, मन और परमात्मा की स्थिति:
- हमारा शरीर एक साधन है। आत्मा शुद्ध है, लेकिन वह मन रूपी आईने में खुद को देखती है। मन हमारी भौतिक परिस्थितियों (जैसे- अमीर-गरीब, मोटा-पतला) के कारण विकृत (distorted) हो चुका है, जिससे आत्मा अपनी पहचान गलत तरीके से भौतिक शरीर से कर बैठती है।
- परमात्मा एक निष्पक्ष अंपायर (Umpire) और सच्चे मित्र की तरह आत्मा के साथ हमेशा रहते हैं। वे हमारी स्वतंत्र इच्छा में हस्तक्षेप नहीं करते, बल्कि मार्गदर्शन के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
- चेतन (Conscious) और अवचेतन (Subconscious) मन का प्रभाव:
- दिनभर में हम सैकड़ों निर्णय लेते हैं (जैसे- क्या खाना है, कहाँ देखना है), जिनमें से अधिकतर निर्णय अवचेतन स्तर (सबकॉन्शियस) पर हमारी पुरानी आदतों और बद्धावस्था के कारण अपने आप हो जाते हैं।
- बुरी आदतों को बदलने के लिए हमें अपने अवचेतन कार्यों के प्रति सचेत (जागरूक) होना पड़ेगा। बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने के बजाय विचार करके चुनाव करना आवश्यक है।
- मन की चालें और बुद्धि का सही उपयोग:
- प्रवचन सुनते समय या आध्यात्मिक कार्य करते समय मन अक्सर बहाने बनाता है (जैसे- “यह तो सुना हुआ है” या “मैं थक गया हूँ”)।
- हमें अपनी बुद्धि (Intelligence) का उपयोग करके मन को दिशा देनी चाहिए। अगर मन कहता है कि “यह सुना हुआ है”, तो हमें खुद से पूछना चाहिए कि “इसे मैंने अपने जीवन से कैसे जोड़ा है?” ज्ञान को स्मृति में रखने के लिए उसे पुरानी जानकारी और जीवन के अनुभवों से जोड़ना (Connection and Contemplation) बहुत ज़रूरी है।
- समय का सही प्रबंधन (Time Management):
- समय पैसे से भी अधिक मूल्यवान है क्योंकि पैसे को बैंक में रखा जा सकता है, लेकिन समय लगातार खर्च हो रहा है।
- एक अनियंत्रित और विक्षिप्त मन रोज़ाना घंटों समय व्यर्थ (distractions) में गँवा देता है। आध्यात्मिक साधना (जैसे कृष्ण भावनामृत) हमारे मन को एकाग्र करती है, जिससे हम अपने समय का सबसे उत्तम उपयोग कर पाते हैं।
- भक्ति की शक्ति और कमज़ोरियों पर विजय:
- भक्ति का प्राथमिक उद्देश्य भगवान से संबंध जोड़ना है, बुरी आदतों को छोड़ना इसका द्वितीय (secondary) परिणाम है।
- अगर हम बार-बार किसी कमज़ोरी या बुरी आदत से हार रहे हैं, तो हमें हताश होकर भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए। अपनी कमज़ोरियों (जैसे मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ) पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि “मैं जैसी भी स्थिति में हूँ, भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ?” भगवान से जुड़ने पर बुरी आदतें धीरे-धीरे अपने आप छूटने लगेंगी।
- शारीरिक कष्ट और भक्त:
- प्रश्न-उत्तर सत्र में यह स्पष्ट किया गया कि शरीर आत्मा के लिए एक कार (वाहन) के समान है। शुद्ध भक्त शरीर को केवल भगवान की सेवा का एक ‘अनिवार्य औजार’ मानते हैं। दर्द और असुविधा शरीर को होती है, लेकिन चूंकि भक्त शरीर से आसक्त (attached) नहीं होते, इसलिए वे सामान्य लोगों की तरह मानसिक सदमे या भारी पीड़ा (suffering) से बच जाते हैं।
Full Transcriptions
उद्धव गीता और अवंती ब्राह्मण की कथा
हरे कृष्ण! भक्तों का स्वागत है। तो आज की इस कक्षा में जो भी उपस्थित हैं, स्वागत है। और आज हम उद्धव गीता, यह उद्धव गीता का जो विभाग है, इस पर हम अपनी चर्चा कर रहे हैं। यहाँ पे जो ब्राह्मण है अवंती देश का, जिसका बड़ा अपमान हुआ है, वह विश्लेषण कर रहा है कि किस तरह से कौन उसकी परिस्थिति का, कौन उसकी दयनीय अवस्था का कारण है।
और वह दो श्लोक पहले बताते हैं, ‘मनः परमं कारणं’, अपना विश्लेषण कर रहा है कि अलग-अलग मन जो होता है, प्रकृति के गुणों के अनुसार अलग-अलग रंग से रंग जाता है। ‘मनः गुणान् सृजते बलीयः’, बड़ा बलवान होता है मन।
हमारा अंतरंग परिदृश्य (Inner Landscape) और परमात्मा
अभी जो हमारा अंतरंग इलाका, इनर लैंडस्केप (inner landscape) जो है, उसमें क्या हो रहा है, क्या-क्या है उसमें, वो बता रहे हैं इस श्लोक में। तो हम अंदर आत्मा हैं, आत्मा के साथ-साथ आत्मा के बाजू मन है और आत्मा के बाजू में परमात्मा भी हैं। अनीह आत्मा, अनीह जो भगवान हैं, वो कुछ कार्य नहीं कर रहे हैं।
‘उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु’ – भगवद्गीता के नौवें अध्याय के नौवें श्लोक में भगवान बताते हैं कि वे उदासीन भाव से स्थित हैं। वास्तव में वहाँ पर ‘उदासीनवदासीनम्’ ऐसे लगता है कि वे उदासी हैं। वास्तव में अंग्रेजी में दो शब्द हैं – एक अनइंटरेस्टेड (uninterested) और डिसइंटरेस्टेड (disinterested)। अनइंटरेस्टेड मतलब जिसको कोई रुचि नहीं है, और डिसइंटरेस्टेड मतलब जो इंपार्शियल (impartial) है, जिसका कोई स्वार्थ नहीं है। दोनों का एक अर्थ नहीं है।
अनइंटरेस्टेड मतलब अभी कोई क्रिकेट मैच चल रहा है और जो अंपायर है क्रिकेट मैच में, वो अनइंटरेस्टेड नहीं हो सकता है। अगर वो अनइंटरेस्टेड होगा तो वो अंपायर कैसे बनेगा? उसको ध्यान पूर्वक देखना है कि कहीं बैट्समैन एलबीडब्ल्यू (LBW) तो नहीं हुआ है, या कैच पकड़ा है कि नहीं। पर जो अंपायर है, उसको डिसइंटरेस्टेड होना चाहिए। अंपायर है, वो किसी एक पक्ष से नहीं होना चाहिए। उसको ये नहीं चाहिए कि ये टीम जीतना चाहिए इसलिए सब फैसले मैं इस टीम के अच्छे के लिए दूँगा, ऐसे नहीं होना चाहिए। तो जो अंपायर होता है, वह देख रहा है सब कुछ और ध्यान पूर्वक देख रहा है, तो उसका ऐसे नहीं कि उसमें रुचि नहीं है, इंटरेस्ट नहीं है। उसका क्या है, वह खेल में सहभागी नहीं हो रहा है और वह कोई पक्षपात नहीं कर रहा है।
परमात्मा हमारे मित्र हैं
तो हमारे आचार्य बताते हैं कि ‘उदासीनवदासीनम्’ बताया है – मानो वैसे उदासीन हैं, वास्तव में वो उदासीन नहीं हैं, वो अनइंटरेस्टेड नहीं हैं, वे डिसइंटरेस्टेड हैं। ऐसा नहीं है कि आत्मा को क्या हो रहा है उससे उनको कुछ लेना-देना ही नहीं है। अगर कुछ लेना-देना ही नहीं होता तो वो क्यों हमारे साथ आते? वे हमारे लिए परवाह करते हैं, इसलिए तो वो हमारे साथ आते हैं। पर ‘अनीह’ मतलब वो भौतिक स्तर पर कुछ कार्य नहीं कर रहे हैं, वो भौतिक गुणों के प्रभाव में नहीं आते हैं।
‘अनीह आत्मा मनसा समीहता’ – मन के बाजू में ही वे स्थित हैं। अभी मन जो है, बड़ा संघर्षी है। क्या संघर्ष है, हम देखते हैं। पर यह जो मन है, वह खींच रहा है आत्मा को अलग-अलग प्रकार से कार्य करने के लिए। पर इस खींच से जो परमात्मा हैं, वो प्रभावित नहीं होते हैं। क्यों? ‘हिरण्मयो मत्-सख उद्विचष्टे’ – वो दिव्य स्तर पे हैं, उनसे दिव्य ज्योति आ रही है, उसका मतलब है कि वो दिव्य स्तर पे हैं। वो भौतिक प्रभाव में नहीं हैं, वो ‘उद्विचष्टे’ हैं, उसी में स्थित हैं वो।
और वो कौन हैं? वो मेरे मित्र हैं – ‘मत्सख’। वो हमारे हित के लिए वहाँ पर हैं। तो पहले बताया था कि वे अनीह हैं, कुछ कार्य नहीं कर रहे हैं। तो कुछ कार्य नहीं कर रहे हैं तो मित्र कैसे हैं हमारे? अगर हमें कुछ मदद चाहिए हो तो कुछ कार्य करना चाहिए। “मैं तुम्हारा मित्र हूँ, नहीं कुछ नहीं करूँगा, मैं तुम्हारा मित्र हूँ”, ऐसे नहीं। तो वो बोले कैसे मित्र हैं? पर भगवान की मैत्री क्या है, वो हमारी स्वेच्छा में हस्तक्षेप नहीं करते, वो कुछ कार्य नहीं करते हैं, पर वे हमें मार्गदर्शन देते हैं।
मन: बद्ध अवस्था में आत्मा का दर्पण
तो अभी हमारी परिस्थिति क्या है? तो मतलब यहाँ पे आत्मा है, यहाँ पे मन है और यहाँ पे परमात्मा हैं। ‘स्वलिङ्गम्’ मतलब क्या है कि जो मन है, वो बद्धावस्था में आत्मा का प्रतिबिम्ब बन गया है। मतलब जो मन के आईने में दिख रहा है, आत्मा खुद को वही समझता है। अगर कोई ब्यूटी क्वीन (beauty queen) है और उसको कोई कॉन्वेक्स लेंस (convex lens) दिखाया जाए – कुछ सीधा आईना होता है और कुछ टेढ़ा आईना होता है। जो टेढ़ा आईना होता है उसमें सब चेहरा टेढ़ा लगता है। तो अगर वो खुद को बड़ी सुन्दर मानती है पर उस चेहरे में देखने से कुछ और ही होता है, तो उसको हार्ट अटैक आ जाता है। “यह क्या हो गया, मैं ऐसे कैसे दिखने लग गई हूँ?”
तो क्या हो गया है? आत्मा वास्तव में दिव्य है। श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कन्ध के सातवें अध्याय में व्यासदेव की दिव्य दृष्टि के बारे में बताया है – ‘अनर्थोपशमं साक्षाद् भक्तियोगमधोक्षजे।’ और ‘यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम्। परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते।।’ जीव सम्मोहित हो गया है। आत्मा यद्यपि प्रकृति के गुणों से परे है, फिर भी वो सोच रहा है कि मैं तीन गुणों के अंदर हूँ। जो मन में प्रतिबिम्ब दिख रहा है, उससे वो खुद को पहचान रहा है। और उसके कारण, ‘तत्कृतं चाभिपद्यते’, और उसके अनुसार कार्य करने के कारण वह बंधन में फँस रहा है।
पहचान का संकट और मन का प्रभाव
तो इसका उदाहरण दे सकते हैं कि मान लीजिए जो कोई छोटा बालक है घर में, टीवी पे एक हॉरर मूवी (horror movie) देख रहा है। बहुत ही भयावह कोई चित्र वो देख रहा है। और उस हॉरर मूवी को देख के भयभीत हो रहा है, काँप रहा है, चिल्ला रहा है, रो रहा है। वास्तव में वो अपने घर में बड़े ही आराम से है, वो माँ भी पास में ही है, पर क्या है? उसका ध्यान जो है, वह उस टीवी पे चला गया है। और क्योंकि टीवी में जो दिख रहा है – टीवी में मतलब शायद कोई उसमें हीरो है जिस पे कोई आक्रमण कर रहा है उस हॉरर मूवी में – तो क्या कर रहा है? वो खुद को उससे पहचान रहा है। और उससे पहचान बनाने के कारण वो सोच रहा है कि ये सब मुझ पे हो रहा है। उसको उसके कारण भयभीत होना पड़ रहा है।
तो उसी तरह से मन को ‘स्वलिङ्गम्’ – मतलब मन में जो दिख रहा है। मन को अगर हम एक आईना मानते हैं – ‘चेतो-दर्पण-मार्जनम्’, शिक्षाष्टक में बताते हैं कि चित्त जो है, मन जो है एक आईने के समान है। तो उसमे जो प्रतिबिम्ब दिख रहा है, उस प्रतिबिम्ब से वो खुद को पहचान रहा है। और उस प्रतिबिम्ब में हम मान्यता कर सकते हैं कि मैं पुरुष हूँ, मैं औरत हूँ, मैं काला हूँ, मैं सफेद हूँ।
और इस सब की पहचान के कारण क्या होता है? ‘मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान्’ – जिस प्रकार से हम खुद को पहचानते हैं मन के आईने में, उसके अनुसार हमारी इच्छाएं जाग्रत होती हैं। और फिर ‘जुषन् निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ’ – और इस तरह से हम बद्ध हो जाते हैं। अगर मैं पतला हूँ तो मुझे और वजन बढ़ाना चाहिए, मुझे और शक्ति चाहिए। अगर मैं मोटा हूँ तो मुझे मेरा वजन कम करना चाहिए। अगर मैं छोटा हूँ तो मुझे ऊँचा होना है। अगर मैं ऊँचा हूँ, उसके अनुसार हम कार्य करते हैं। ‘गुणसङ्गतोऽसौ’, इस प्रकार से आत्मा का कार्य आगे चलता है।
सत्य क्या है?
तो सत्य क्या है? कि सत्य में, वास्तव में हम आत्मा हैं। और आत्मा इस भौतिक जगत में किस परिस्थिति में है? तो हो सकता है कि कोई व्यक्ति मोटा है, कोई व्यक्ति साँवला है, कोई व्यक्ति अमीर है, कोई व्यक्ति गरीब है – ऐसा हो सकता है, पर यह हमारी पहचान नहीं है। हमारी पहचान इस सब के परे है, जो हमारी भौतिक परिस्थिति है। तो यह व्यक्ति समझता नहीं है।
कब समझता नहीं है? जब जो आत्मा है, वो भगवान की ओर नहीं देख रहा है, वो अपने मन की ओर देख रहा है। और मन की ओर देख कर खुद को पहचान रहा है। उस समय तब उसके सारे कार्य, जो मन की धारणा है, उसके अनुसार ही निर्धारित होते हैं। और यही ‘निबद्ध’ है, इससे हम सब बँध जाते हैं।
तो अभी जिस हद तक हम मन की ओर देखने के बजाय भगवान की ओर देखते हैं, तो उस हद तक क्या होता है? हम जिस परिस्थिति में हैं वह मेरे लिए अच्छी है, और ऐसा नहीं है कि ऐसे ही रहना है, पर जो मुझे कार्य करना है वो कार्य करके मैं इसको ठीक कर सकता हूँ। मतलब हम समझ जाते हैं कि अभी भी ऐसा नहीं है कि सब कुछ गलत है, सब दुनिया अभी गिर रही है, और मेरे जीवन पर कुछ आपदा आ गई है। भगवान अभी तक नियंत्रण में हैं, भगवान अभी तक मुझसे प्रेम करते हैं, मैं अभी तक भगवान के नियंत्रण में ही हूँ। तो यह सब जब जान लेते हैं, उसके बाद में हम जो कार्य करना है, वो हम धीरे-धीरे कर सकते हैं।
जीवन के हर पल में हमारे चुनाव
तो अभी इसमें क्या मतलब है? कि जब हम किसी भी परिस्थिति में जा रहे हैं तो हमें क्या करना है? वह मतलब, सोचना है कैसे? अगर हम रास्ते पर जा रहे हैं, तो रास्ते पर मान लीजिए एक सीधा रास्ता है, तो कोई चौराहा आ जाता है, तो तभी हमको सोचना है – इधर जाना है, या इधर जाना है। तो एक तरह से हमारे जीवन में हर पल पर हम एक चौराहे पर हैं।
कभी-कभी जो जीवन का चौराहा स्पष्ट रूप से दिखता है। मान लीजिए अगर मैं एक नौकरी में हूँ और मुझे दूसरी नौकरी करनी है – यह नौकरी छोड़कर कहीं और जाना है। या मैं एक घर में रह रहा हूँ, या नए घर में जाएँगे। तो तभी आपको स्पष्ट रूप से दिखता है कि अभी यह एक चौराहा है मेरे जीवन में, और मुझे दूसरे चौराहे पर जाना है, एक जगह पर मुझे कुछ चुनाव करना है।
पर हर पल पर वास्तव में हम चुनाव करते हैं। अभी अगर प्रवचन चल रहा है, तो अब अभी भी हम चुनाव कर रहे हैं। प्रवचन चल रहा है, तो मैं किस तरह से ध्यान देने वाला हूँ? मैं किस हद तक चुनने वाला हूँ? किस हद से दूसरी चीज़ों के बारे में विचार करने वाला हूँ? तो अगर हम जप कर रहे हैं, तो हम ध्यान पूर्वक जप कर सकते हैं, आराम से लेट के जप कर सकते हैं। तो ये छोटे-छोटे चुनाव हैं, पर छोटे-छोटे चुनावों से काफी फर्क होता है। तो हम सब हर पल पे चुनाव कर रहे हैं। और ये चुनाव हम कर रहे हैं, वो किस तरह से कर रहे हैं? वो अधिकांश रूप से हम, मन जो बोलता है, उसके अनुसार करते हैं। ‘मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान्’।
चेतन, अचेतन और अवचेतन निर्णय (Conscious vs Subconscious)
एक बार मनोवैज्ञानिकों ने एक संशोधन किया कि आजकल बहुत से लोगों को पाचन के सम्बन्ध में बहुत सी बीमारियां होती हैं, और उसका एक अधिकांश कारण है कि जो खाना है वो अनियंत्रित होता है। तो फिर लोगों से पूछा, संशोधन किया कि आप दिन में, साधारण दिन में अपने खाने के बारे में कितने निर्णय करते हैं? तो अधिकांश लोगों ने जवाब दिया – लगभग नहीं, बारह से पंद्रह निर्णय करते हैं। “अरे मतलब यह इतना खाना है, यहाँ पे खाना है, अरे नहीं!”
और फिर बाद में वो पूरे दिन भर सीधा बैठ के उन्होंने संशोधन किया, उन्होंने कहा कि साधारण व्यक्ति (यह अमेरिका की बात है) वहाँ पे दो सौ पंद्रह (215) निर्णय करता है! दो सौ पंद्रह निर्णय! इसलिए कहने लगे, दो सौ पंद्रह निर्णय क्या हो सकते हैं? पर मान लीजिए हमारी साधारण परिस्थिति भी अलग होगी, कि अब हम खा रहे हैं, तो अगर मेरे साथ प्लेट में राइस, दाल, सब्जी, चपाती है, तो अभी मैं और क्या लूँगा? चपाती लूँगा या राइस लूँगा, या सब्जी और लूँगा या दाल और लूँगा? यह भी एक निर्णय है। यह तो एक साधारण निर्णय हो गया।
पर जब हम रस्ते पर चल रहे हैं, तो वहाँ पर किसी चीज़ का विज्ञापन देख लेते हैं – यहाँ कोई खाने पर बुला रहा है, यहाँ कोल्ड्रिंक है। अभी यह खाना है कि नहीं? तो यह भी एक निर्णय है। अगर लेना है तो कितना लेना है? तो वास्तव में इस प्रकार से अगर हम देखें, यह तो हमारे ऊपर बहुत से निर्णयों की जिम्मेदारी आती है। खासकर क्या, आजकल विज्ञापन इतने होते हैं कि हर विज्ञापन देखने पर – “हमको लेना चाहिए, नहीं लेना चाहिए?”
तो अधिकांश निर्णय जो होते हैं, वह हमारी सचेत जाग्रति के नीचे होते हैं। मतलब क्या? हम कुछ बातचीत कर रहे हैं किसी से, और फिर बातचीत करते-करते हम देखते हैं कि सामने कुछ खाद्य पदार्थ होते हैं, तो क्या होता है? बिना सोचे ही वह हाथ जाग्रति के नीचे खाने लगते हैं। तो यह क्या है? हमने सोचा नहीं कि वह खाना है कि नहीं। तो यह ऐसा नहीं कि यह गलत है या सही है, पर कई बार हम ऐसे निर्णय करते हैं जो हमारी जाग्रत चेतना के नीचे के स्तर पे होते हैं, अपने आप कर लेते हैं। हम घर में हैं और माँ ला के प्लेट में खाना रख देती है, तो हम खाने लगते हैं, सोचते नहीं कि यह खाना है या नहीं खाना है, ज्यादा सोचते नहीं हम उसके बारे में।
तो ऐसे कई निर्णय हैं जो हमारी सचेत जाग्रति के नीचे के स्तर पे होते हैं – सबकॉन्शियसली (subconsciously)। उसमें तीन शब्द हैं – चेतन, अचेतन और अवचेतन। चेतन मतलब कॉन्शियस (conscious), अचेतन मतलब अनकॉन्शियस (unconscious), और अवचेतन मतलब सबकॉन्शियस (subconscious)। मतलब हम बाद में सोचेंगे तो “हाँ मैंने ऐसे किया” हमको याद आएगा। पर जब हम कर रहे हैं तब हम सोचते नहीं कि मैं ऐसे कर रहा हूँ।
हमारी बद्धावस्था और हमारी आदतें
तो हमारी जो बद्धावस्था है, बद्धावस्था हमें कई बार अवचेतन स्तर पे हमसे कुछ कार्य करा लेती है। तो मान लीजिए कोई व्यक्ति अगर कोई शराबी है, तो उसने फैसला किया कि मैं शराब नहीं पीने वाला हूँ। शराबी है पर वो शराब छोड़ने का प्रयास कर रहा है। तो चेतन अवस्था पे क्या है? उसने सोचा है कि मैं शराब छोड़ने वाला हूँ। पर अवचेतन अवस्था पे वही आदत अभी तक है। तो कुछ परेशानी आ जाती है, कुछ विपत्ति आ जाती है, तो पहला सुझाव आता है – इस समस्या से निकलने का एक हल है, पी लो। तो अब ऐसा नहीं है कि वो सोचता है मुझे ये करना है। वह एक जो बद्धावस्था होती है, आदत कह सकते हैं। जो आदत हो जाती है हमको, आदत कई बार अवचेतन स्तर पे कार्य करती है। अवचेतन स्तर पे मतलब हम उसके लिए जाग्रत ही नहीं होते हैं।
और ये जो है – आवर कंडिशनिंग्स डिटरमिन आवर सबकॉन्शियस एक्शन्स (Our conditionings determine our subconscious actions)। हमारी जो बद्धावस्था है, उसके अनुसार हमारे सारे अन्य कार्य अवचेतन होते हैं। और वो सारे अवचेतन कार्य हमारी बद्धावस्था, किस प्रकार से हमारी आदत है, किस प्रकार से हमारी बद्धावस्था है, उसके अनुसार फैसला होता है।
अवचेतन स्तर पर इच्छाओं का प्रभाव
तो वही जो खाने के बारे में संशोधन था, उसमें और एक जाँच हुई कि अगर लोगों के पास मान लीजिए, उनका काम करने के लिए कुछ टेबल पे बैठे हैं और नीचे ड्रॉर (drawer) में दो प्रकार के स्नैक्स रखे हुए हैं। एक है कुछ फल हैं, कुछ सब्जी है, हेल्दी स्नैक है, सलाद वगैरह ऐसे कुछ है। और दूसरा है कुछ हैमबर्गर है, कुछ हॉट डॉग है, ऐसे कुछ थोड़ा फैटी (fatty), ऑयली (oily), स्वास्थ्य के लिए ऐसे अच्छा नहीं है, ऐसा कुछ खाद्य पदार्थ है।
तो अगर उन लोगों ने फैसला किया है, “मैं अच्छी तरह से मेरी सेहत का खयाल रखने वाला हूँ, और जो मुझे अच्छा है सेहत के लिए वो ही खाने वाला हूँ।” तो जब भूख लगेगी तभी वो फल लेंगे या सब्जी लेंगे, सलाद लेंगे, ऐसे कुछ खाएंगे। पर अगर मान लीजिए वो किसी से फोन पर बात कर रहे हैं, कुछ नेट सर्फ (surf) कर रहे हैं और तभी पेट में भूख लगी, तभी क्या होता है? उनके बिना सोचे ही उनका हाथ बराबर वो हैमबर्गर की ओर जाएगा और वो खाने लग जाएंगे। और आधा खा कर जानेंगे क्योंकि वो पहले से आदत थी, वो एक प्रकार से बद्धावस्था है।
सचेतन (Conscious) होकर मन को दिशा देना
तो क्या? ‘मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान्’। मतलब यहां जब हम कह रहे हैं कि हमारी जो बद्धावस्था है उसको हमको छोड़ना है, मतलब कि बद्धावस्था मतलब क्या है कि हमारा एक प्रतिबिम्ब हमारे मन में बन गया है। अभी वो प्रतिबिम्ब सत्य नहीं हो सकता है, हो सकता है कि सत्य नहीं है। पर मान लीजिए किसी के पास ऐसा एक आईना है जिसमें वो व्यक्ति विकृत रूप से दिखता है। तो अभी जब भी व्यक्ति उस आईने की ओर देखेगा तो उसको विकृत प्रतिबिम्ब दिखेगा। तो “अरे ऐसे क्यों दिख रहा हूँ मैं?” तो उसको हर बार याद करना पड़ेगा कि वास्तव में मैं वैसे नहीं हूँ, वो आईना जो दिखा रहा है मुझे विकृत दिखा रहा है, वैसे नहीं हूँ मैं।
पर अगर वो कोई और सोच में है, और उसको देखते हुए कि कुछ और सोच में है और तभी वो आईने की ओर देख लेता है, ऐसे ही – “अरे मैं ऐसे क्यों दिख रहा हूँ?” तो क्या है, वो आईना बदलने का… अगर आईना बदलने का मौका नहीं है, तो आईने में देखने के बावजूद हमें खुद का विचार बदलना पड़ेगा।
तो हमारा जो मन है, उसकी बद्धावस्था का भी हम शुद्धीकरण कर सकते हैं। पर उसके शुद्धीकरण करके… मतलब वो क्या है, आईना अगर विकृत प्रतिबिम्ब दिखा रहा है तो आईने को ठीक करके वो सही प्रतिबिम्ब दिखाएंगे, वैसे भी योजना कर सकते हैं। पर जब तक वो आईना वहीं पर है, तो हमें विकृत प्रतिबिम्ब दिखने पर भी हमको समझना पड़ेगा कि “मैं ऐसे नहीं हूँ”।
ठीक उसी तरह से हमारी जो बद्धावस्था है, जो हमारी आसक्तियां हैं, वो धीरे-धीरे शुद्धीकरण से, जब हम भक्ति ध्यान पूर्वक करते हैं, तो भक्ति की शक्ति से वो धीरे-धीरे निकल जाएंगी। पर जब तक वो जाती नहीं हैं, तब तक क्या है? हमारी बद्धावस्था के कारण कुछ प्रकार के विचार अपने आप हमारे मन में आ जाएंगे, कुछ प्रकार की इच्छाएं अपने आप हमारी चेतना में जाग्रत हो जाएंगी।
तो अभी हमें यह करना है कि जब वो विचार आ जाएंगे, वो इच्छाएं जाग्रत हो जाएंगी, तभी भी उन पे कार्य नहीं करना है। “नहीं, मुझे ऐसे नहीं करना है।” तो बिना कुछ सोचे अवचेतन अवस्था में क्या होता है? वो जो खाद्य पदार्थ है, जो हैमबर्गर है वो आ जाएगा वो हाथ में और खाने लगेंगे, “मुझे यह नहीं खाना है”। उसके लिए क्या होगा? उसके लिए और चेतन होना ज़रूरी है।
क्योंकि क्या है? अवचेतन स्तर पे कार्य हो रहे हैं, तो उनको अगर हमें ‘ना’ बोलना है तो हमको खुद को और चेतन करना जरूरी है, हमको और सचेतन होना है कि मैं क्या कार्य कर रहा हूँ? मैं किस तरह से कार्य कर रहा हूँ? तो जब हम इस तरह से और सचेतन हो जाते हैं तो फिर जो हम अवचेतन स्तर पे गलत कार्य करते हैं उसको हम सही कर सकते हैं।
पर अगर हम सचेतन नहीं होते हैं, तो फिर अवचेतन स्तर पे कई कार्य ऐसे हो जाते हैं, हमको पता भी नहीं चलता है। हम अगर कोई कंप्यूटर पे या मोबाइल पे बैठे हैं, हमको कुछ काम करना है पर उसमें कुछ एक मैसेज आ जाता है, एक लिंक आ जाता है, उसको क्लिक करते हैं, उधर से एक चित्र दिखता है, उधर से कुछ न्यूज़ आ जाता है, एक स्पोर्ट्स (sports) का न्यूज़ आ जाता है, कुछ मूवीज (movies) के बारे में आ जाता है। एक, दो, तीन, चार, पांच… सचेतन रहना बहुत ज़रूरी है।
‘मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान् जुषन् निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ’ – कि जो कार्य मन… अगर मन के प्रतिबिम्ब में हम खुद को देखते रहते हैं, तो जितना हम मन के प्रतिबिम्ब में खुद को देखते हैं, उतना मन के अनुसार हम खुद को समझते हैं। तो अगर मान लीजिए कोई व्यक्ति बहुत मोटा है…
भौतिक परिस्थिति और आत्मा का वास्तविक मूल्य
उसको अपना वजन कम करना है पर वास्तव में आत्मा मोटा नहीं है। और वजन कुछ पल की अवस्था है, वजन बाद में बदल जाएगा। पर हम ऐसा सोचने लग जाएंगे, “मैं बहुत मोटा हूँ, मैं बहुत मोटा हूँ”, तो उससे क्या होता है? उससे व्यक्ति को एक इन्फिरिओरिटी कॉम्प्लेक्स (inferiority complex) आ जाता है। और वहाँ से वो चेतना कहाँ है? “मैं मोटा हूँ”, मैं… मेरा मोटापन, उस पर चेतना चली जाती है।
तो मेरा मोटापन या दुबलापन ये एक अवस्था है और मैं एक व्यक्ति हूँ, ये दोनों अलग हैं। मैं अमीर हूँ, मैं गरीब हूँ… ठीक है, गरीबी ही सत्य अवस्था है और उसको ठीक करने के लिए कार्य करना है। पर वास्तव में ‘मैं’ और ‘गरीब’ ये दो अलग चीज हैं और मैं अलग हूँ। तो हमारी खुद की जो कीमत है, वो हमारे बैंक अकाउंट में कितना पैसा है या हमारे नाम पे कितनी प्रॉपर्टी है, उसकी कीमत पे निर्भर नहीं है। भगवान हम सब को अपने प्रिय अंश के रूप में, अपने प्रिय के रूप में हम सब से प्रेम करते हैं।
तो इसलिए जो हमारी भौतिक परिस्थिति है, कुछ भी हो, हमको भौतिक स्तर पे कुछ ठीक करने के लिए कार्य करना पड़ेगा। पर उससे हमारे विचारों को हमको संकीर्ण, संकुचित नहीं होने देना है, उससे हमको बंधन में नहीं होने देना है। इसलिए जब तक ये आत्मा मन की ओर देखते रहता है, तो वो बंधन लगभग अनिवार्य ही है। क्योंकि क्या है? मन में वो प्रतिबिम्ब दिख रहा है। और अगर कोई दिखने में अच्छा है, पर वो बार-बार उस प्रतिबिम्ब में देख कर सोचने लगे कि मैं वास्तव में विकृत हूँ।
तो क्या करना है हमको? ये मन की ओर देखने के बजाय, ‘अनीह आत्मा मनसा समीहता’ – मन के बाजू में ही भगवान हैं, आत्मा के बाजू, मन के बाजू। तो हमको क्या करना है? वो ‘मत्सख’ क्यों हैं? भगवान हमारे मित्र हैं और हमें भगवान की ओर चेतना ले जानी है।
भक्ति की शक्ति और आदतों में परिवर्तन
जब हम भक्ति के कार्य करते हैं, जब हम जप करते हैं, जब हम साधना करते हैं, जब हम श्रवण करते हैं, कीर्तन करते हैं। तो वास्तव में अभी दुनिया में अनेक लोगों ने देखा है, विश्व भर में जहां भी लोग भक्ति में लगते हैं, वह देखते हैं कि भक्ति के कारण… भक्ति के आचरण के कारण उनके जीवन में परिवर्तन आता है।
कई बार ऐसी आदतें होती हैं, कई बार ऐसी विचारधाराएं होती हैं, कई बार ऐसे बर्ताव होते हैं, जो वो जानते हैं कि अच्छे नहीं हैं, उनको वो छोड़ना है, पर वो छोड़ नहीं पाते हैं। और भक्ति करने लगते हैं, तो कई बार आसानी से वो आदतें छूट जाती हैं। तो अभी वास्तव में भक्ति करने से वो आदतें छूट कैसे जाती हैं? हम कहते हैं, भक्ति की शक्ति है, मान लीजिए भक्ति की शक्ति है, पर वो शक्ति कार्य किस तरह से करती है? जब हम इस तरह समझते हैं, तो फिर उस शक्ति को और कार्य में लाने के लिए हम अच्छी तरह से लग सकते हैं।
मतलब क्या है, शुरुआत में भक्ति करते हैं, तो अधिकांश रूप से परिवर्तन होता है जो बाह्य रूप से होता है। बाह्य रूप से परिवर्तन मतलब कई ऐसी आदतें होती हैं जो अच्छी नहीं हैं और वो काफ़ी स्थूल आदतें दिखती हैं – कोई व्यक्ति शराब पी रहा है, ये कर रहा है, वो कर रहा है – और फिर भक्ति करने से वो छूट जाती हैं।
पर उसके बाद में जब हम भक्ति कर रहे होते हैं, तो कई ऐसी आदतें होती हैं जो सूक्ष्म होती हैं। अब गुस्सा करने की आदतें होती हैं, या लोभ है, या काम वासना है, हवस है – अब ये सब ऐसे जो हैं, अलग-अलग प्रकार की आदतें जो हो सकती हैं, वह क्या हैं? वह सूक्ष्म हैं। और उनको छोड़ने के लिए थोड़ा समय लगता है। पर अगर हम समझते हैं कि भक्ति कैसे कार्य करती है, तो फिर हम भक्ति की शक्ति को और अच्छी तरह से हमारे स्वयं के परिवर्तन के लिए उपयोग कर सकते हैं।
श्रवण के समय मन की चालें
तो भक्ति कार्य कैसे कर रही है? हम मंदिर में आ रहे हैं, कीर्तन कर रहे हैं, जप कर रहे हैं, तो उससे परिवर्तन कैसे होता है? आत्मा जितना ही भगवान की ओर देखने लगता है, तो मन में जो प्रतिबिम्ब दिख रहा है, उससे वो इतना प्रभावित नहीं होता है।
तो हम जब भक्ति कर रहे हैं, शुरुआत में भक्ति के कार्य भी नए लगते हैं जो भी हम करते हैं। अब हम प्रवचन में आते हैं – “यह सुना है, यह सुना है, यह सब पुराना लगता है।” तो उसके कारण क्या होता है? “यह सुना है,” यह कौन बोल रहा है? यह मन बोल रहा है। तो जब हम श्रवण कर रहे हैं, पर श्रवण करते समय हम वक्ता को नहीं सुन रहे हैं, मन को सुन रहे हैं। वक्ता कुछ बोल रहा है, पर मन बोल रहा है “यह पुराना है, सुना हुआ है।” तो हम वास्तव में जब श्रवण कर रहे हैं, वो वक्ता का श्रवण नहीं कर रहे हैं, मन का श्रवण कर रहे हैं।
और अब यह हो सकता है कि हमने सुना हुआ है पहले, पर इसका मतलब ऐसे ज़रूरी नहीं है कि हर बार हमारे परिवर्तन के लिए हमको कुछ नया सुनना ज़रूरी है। नया भी सुन सकते हैं, पर परिवर्तन के लिए हमको ऐसे ज़रूरी नहीं कि हर बार कुछ नया सुनना है। अगर हम डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर बोलते हैं कि आपको यह दवाई लेनी है, तो ऐसा नहीं कि हर बार हम डॉक्टर के पास जाते हैं कि हर बार डॉक्टर को नई दवाई देनी चाहिए। सुनना है, अच्छी बात है, आपको करना है। तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ वो ही पुरानी बात है इसलिए हमको वो महत्वपूर्ण नहीं है।
इन्फॉर्मेशन डज़ नॉट हैव टू बी न्यू टू बी यूज़फुल, इट हैज़ टू बी टाइमली (Information does not have to be new to be useful, it has to be timely)। क्या है कि जो जानकारी है, हर बार हमको उसकी मदद होने के लिए नई जानकारी की ज़रूरत नहीं है। जब हमको चाहिए तभी वो जानकारी मिल जाएगी। हम देखते हैं कई बार कि हम जब प्रवचन में कुछ सुनते हैं, शास्त्र में कुछ पढ़ते हैं, “यह तो सुना हुआ है,” पर जब कार्य करना होता है तो हम उसके अनुसार कार्य नहीं करते हैं, हमारी पूरी बद्धावस्था के अनुसार कार्य कर लेते हैं।
चिंतन और पूर्व ज्ञान से सम्बन्ध जोड़ना (Connection and Contemplation)
ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि वो जो जानकारी है, वो हमारे दिमाग में है, पर वो दिमाग में पीछे कहीं तो भी चली गई है, सामने हमको मिल नहीं रही है। तो क्या है कि मन के साथ कई बार हमको हमारी बुद्धि से काम लेना पड़ता है। बुद्धि मतलब क्या? कई बार युक्ति करनी पड़ती है। तो अभी अगर मन बोलता है कि “हाँ ये सब सुना हुआ है,” तो फिर हमको उस मन को ही बोलना है, “ठीक है सुना हुआ है। कब सुना था मैंने? पिछली बार तभी मैंने सुना था, तो वो उस पर चर्चा कर रहे थे, वो ये पॉइंट बता रहे थे। पर अभी इस पॉइंट के साथ मैंने क्या सोचना है?”
तो फिर क्या होगा? हमारा मन क्या करना चाहता है कि जो भगवान की कथा है उसके बारे में सोच को बंद करना चाहता है। सोचना नहीं है भगवान के बारे में, भगवान के तत्त्व ज्ञान के बारे में, भगवान के संदेश के बारे में सोचना नहीं है। हमको क्या करना है, वही विचार लेना है। “ठीक है, अगर कोई बोलता है, यह सुना हुआ है पहले, तो कहाँ सुना था पहले?” और तो क्या? हमको वो सोच को और प्रवृत्त करना है।
रिकलेक्शन इज़ अ फंक्शन ऑफ़ कनेक्शन (Recollection is a function of connection)। कि जो भी हम याद करते हैं, हम कैसे याद कर सकते हैं? जितना हम उस चीज को सम्बद्ध कर पा रहे हैं। मतलब, अगर कोई चीज हम याद करते हैं तो ऐसे नहीं है कि हमारे दिमाग में कोई जानकारी ऐसे ही एक कोने में लटक जाती है। जो जानकारी है, वो कैसे रहती है कि अभी मैं कोई जानकारी प्राप्त कर रहा हूँ, तो वो जानकारी, जो मेरी पहले की जानकारी है, पहले से जो कुछ मैं जानता हूँ, उसके सम्बन्ध में कैसे चलती है, उसके अनुसार हम वो जानकारी को हमारे दिमाग में रखते हैं।
तो मान लीजिए, किसी को खांसी हो गई है और डॉक्टर बोलता है कि “आपने ये खाद्य पदार्थ लिया था, इसके कारण आपको खांसी हो गई है।” तो फिर अगर ये जानकारी हम पहले से कुछ जानते हैं – बचपन में, हाँ, मेरी दादी ने बताया था कि ये हमको खाना नहीं चाहिए, खाने से खांसी होगी – तो क्या होता है? वही जानकारी हम अगर हमारी पिछली जानकारी से, उससे सम्बन्ध जोड़ते हैं, तो फिर वो याद रहना आसान हो जाता है। या फिर बोलते हैं, “अरे मैं तो सोचता था कि ये खाने से कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है, इससे खांसी नहीं होगी। किसने बताया था मुझे ऐसे? वो… उसने बताया था, पर वो तो डॉक्टर नहीं है, उसकी बात पे तो इतना जोर नहीं देना चाहिए था मुझे।”
जो भी है, जब हम अभी जो भी जान रहे हैं, उसका सम्बन्ध हमारी पहले की जानकारी से जोड़ते हैं, तभी वो जो जानकारी है हमारे दिमाग के अंदर जाती है और फिर वो रहती है। वहीं अगर हम वो जानकारी को ऐसे ही… उसका सम्बन्ध नहीं जोड़ते हैं किसी पुरानी जानकारी से, तो फिर क्या होता है? वो हमारे अंदर रहती नहीं है। और फिर हमको बाद में जब ज़रूरत होती है तभी हम उसको याद भी नहीं कर पाते हैं।
तो इसलिए अगेन (again), कंटेंप्लेशन इज़ अ मैटर ऑफ़ कनेक्शन (Contemplation is a matter of connection)। जब हम सोचते हैं, किसी के बारे में बोलते हैं – आप सोचो इसके बारे में, चिंतन करो। चिंतन मतलब क्या है? चिंतन करना मतलब बेसिकली (basically) क्या है? वो सोचना, कनेक्शन (connection) जोड़ना, सम्बन्ध जोड़ना। “ठीक है, ये बात मैंने सुनी थी, पहले कहाँ सुनी थी? और मेरा खुद का इसके बारे में क्या अनुभव हो गया है? दुनिया में दूसरों के बारे में हमने क्या देखा है इसके बारे में?” जितना हम सम्बन्ध जोड़ते हैं, उतना वो जो जानकारी है, हमारे दिमाग में बैठ जाती है। और जो जानकारी दिमाग में बैठ जाती है, तो उसके बाद में जब याद करना ज़रूरी है, तब याद कर सकते हैं।
मन को युक्ति से समझाना
कई बार तो ये मन हमको फंसाने का प्रयास करता है। क्या हो रहा है? तो यहाँ पे आत्मा है, यहाँ पे मन है, यहाँ पे भगवान हैं। तो भगवान का संदेश हम सुन रहे हैं, पर मन क्या बोलता है? “सुना हुआ है!” तो फिर क्या होता है? हम बोलते हैं, “ठीक है, कहाँ सुना हुआ है?” तो यह देखने के लिए ज़रूरी है… हमारा मन हमको फंसाने का प्रयास कर रहा है, तो मन को भी हमको कुछ युक्ति से, उसको भी फंसाना है। “सुना हुआ है? कहाँ सुना हुआ था?” तो उससे हम सम्बन्ध जोड़ रहे हैं।
वैसे ही कई बार, जब माँ छोटे बच्चे के साथ होती है… तो अभी बच्चों के साथ कैसे बर्ताव करना है इसके लिए कोई मैन्युअल (manual) नहीं आता है। अभी बच्चा रोने लग गया तो वहाँ क्या करें? तो कई बार माँ को युक्ति करनी पड़ती है – ये करो, वो करो। तो क्या होता है वहाँ… एक बार मैं एक वीडियो क्लिपिंग देख रहा था। तो उसमें दिखाया था कि वो बच्चा रो रहा था। और सब रिश्तेदार क्या कर रहे थे, कुछ भी कर रहे थे, रोना रुक नहीं रहा था। बच्चा रो रहा था और अचानक माँ उससे भी जोर से रोने लग गई। तो वो देख के बच्चा चुप हो गया!
तो ऐसे करना नहीं है… यहाँ पर भाव है कि वो बच्चे को कैसे शांत करना है, उसके लिए कोई फॉर्मूला (formula) नहीं है। तो अलग-अलग प्रकार से युक्ति करनी पड़ती है। तो वो बच्चा बड़ा आवाज़ कर रहा था, कोई और उससे भी ज्यादा आवाज़ करने लग गया, तो वो देखने लग गया, “ये क्या हो रहा है?” और वह देखने में रोना भूल गया।
ठीक उसी तरह से जो मन होता है, तो मन के साथ अलग-अलग प्रकार से युक्ति करनी है। अलग-अलग प्रकार से वो हमको भगवान से दूर रखने का प्रयास करता है। तो हमें क्या करना है? माइंड नीड्स ट्रिक्स (Mind needs tricks)। मन की युक्ति के पार जाने के लिए हमको कुछ एक युक्ति करनी है। कई बार हम कथा सुनते हैं, तो “ये तो बेसिक (basic) पॉइंट है, ये सब नए लोगों के लिए है, मेरे लिए नहीं।” हो सकता है मन बोलता है, “ये सब नए लोगों के लिए है।” तो हम… वापस क्या कर रहा है? हम मन को सुन रहे हैं।
उसको सुनने के बजाय हम बोल सकते हैं, “ठीक है, यह नए लोगों के लिए है।” हम वह मन को ट्रिक (trick) कर सकते हैं, मन को युक्ति से बोलते हैं – “ठीक है, अगर मुझे नए लोगों को बोलना होगा तो मैं किस तरह से यह पॉइंट को बोलूँगा? मैं इसके लिए क्या उदाहरण दे सकता हूँ? मैं इसके लिए क्या अनुभव बोल सकता हूँ?” तो उससे क्या कर रहे हैं हम? अगर हम मन की बात को सुन लेते हैं कि “ये नए लोगों के लिए है,” हम उसमें कुछ सम्बन्ध नहीं जोड़ रहे हैं, कुछ कनेक्शन (connection) नहीं जोड़ रहे हैं। हम उसमें कुछ चिंतन नहीं कर रहे हैं, कंटेंप्लेशन (contemplation) नहीं कर रहे हैं।
पर अगर हम सोचते हैं, “ठीक है, नए लोगों के लिए पॉइंट है यह, तो नए लोगों को ये पॉइंट मैं किस तरह से समझाऊँगा? ये वक्ता जो है इस तरह से समझा रहा है, क्या मैं भी इसी तरह से समझाऊँगा? या मेरे पास कुछ अपना साक्षात्कार है, कुछ ख़ुद का अनुभव है, कुछ और उदाहरण है?” तो इस तरह से क्या होगा, वही पॉइंट पे वही मन वही बात बोल रहा है, उसको हम क्या कर सकते हैं? वो लेके, उसको लेके हम अलग पद्धति से सम्बन्ध जोड़ सकते हैं, जो हम जानते हैं, जो हम अनुभव कर चुके हैं, जो हम देख चुके हैं उससे।
सतर्क बुद्धि और मन की थकान का बहाना
और इस तरह से, जब हम सक्रिय हो जाते हैं भगवान की कथा, भगवान के बारे में, उस हद तक क्या होता है? कि मन हमारे बाजू में है ही। क्योंकि मन हमारे बाजू में है, तो इसलिए हम मन को निकाल नहीं सकते, मन अंदर ही रहने वाला है। और मन को हम परिवर्तित कर रहे हैं, और मन परिवर्तित भी हो जाएगा। पर मन के परिवर्तन के लिए समय लगने वाला है। और जब तक मन परिवर्तित अभी तक नहीं हुआ है, तो उस समय में हमें क्या करना है?
उस समय में हमको जो मन बोलता है, उसको… अभी उसको मन को पूरा ऐसे बंद भी नहीं कर सकते। मन बोलने वाला है तो बोलने वाला है। तो हमें क्या करना है? उसी की बात को लेकर, किसी तरह से बुद्धि से उसी चीज़ को और भगवान की भक्ति में लगने के लिए इस्तेमाल करना है। और ऐसा जब हम करते हैं, तो उससे हम देख सकते हैं कि धीरे-धीरे हम भक्ति में और लग जाएंगे। जितना भक्ति में और लग जाएंगे, तो मन परिवर्तित हो जाएगा।
तो मन जो बोल रहा है, वह बोलते रहेगा। हम उसके बोलने से उसकी बोलती तो बंद नहीं कर सकते। कुछ बोलने वाला है तो बोलने वाला है। पर हम उसके बोलने के अनुसार कार्य नहीं करते हैं। उसके बोलने पर हम कुछ विचार हमारी बुद्धि से बोलते हैं और उसके अनुसार कार्य करते हैं। और इसके लिए हमें हमारी बुद्धि को सतर्क रखना है। “यह मैं ऐसे करने लग गया हूँ, करना है क्या?”
ऐसा नहीं है कि हर बात जो मन बोलता है वो बुरी बोलता है। कभी-कभी मन अच्छी चीज़ें भी बोलता है। पर हमें खुद को, हमको खुद को हमारी बुद्धि से जाँच करनी है कि मन क्या बोल रहा है? सही बोल रहा है या गलत बोल रहा है? तो कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि हम जप कर रहे हैं और बहुत थकावट हो गई है – “मैं सो लूँगा, आधे में जप करूँगा।” तो कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि वास्तव में हम बहुत थके हुए हैं।
पर कई बार ऐसा होता है कि जो थकावट है, ये एक आलस का नकाब है। मतलब वास्तव में हम जो कार्य कर रहे हैं उसमें रुचि नहीं है। और रुचि नहीं है इसलिए कि हम बोर (bore) हो गए। और जब मन बोर हो जाता है, तो क्या होता है? वो आलस से थकावट का बहाना कर जाता है – “ये नहीं करना है!” तो क्या करना है? समझाते हैं… तो कई बार ऐसा होता है कि हमारी जो शक्ति होती है, जैसे हम कोई गाड़ी चला रहे हैं, कार चला रहे हैं, तो कार का पहले टैंक (tank) होता है। तो वो बोलता है कि अब आपका फ्यूल (fuel) कम हो गया है, आपका पेट्रोल कम हो गया है।
तो उसके बाद में भी वो टैंक में कई बार रिज़र्व (reserve) में काफी फ्यूल होता है। तो ऐसा नहीं कि वो अभी फ्यूल ख़त्म हो गया है मतलब पूरा ख़त्म हो गया है। फ्यूल इंडिकेटर (fuel indicator) जब दिखाता है कि अभी फ्यूल प्रॉब्लम (problem) है, तो फिर भी काफी रिज़र्व में फ्यूल होता है। वैसे ही हमको यह लगता है कि “मैं थक गया हूँ,” मन बोलता है “अभी तुम थक गए हो।” तो कई बार क्या होता है? हम में अभी तक रिज़र्व एनर्जी (reserve energy) होती है, कर सकते हैं हम कार्य, पर तभी मन बोलता है “मैं थक गया हूँ।”
तो फिर क्या होता है? हम जो कार्य करना है वो करते नहीं हैं। मैं जो बोल रहा हूँ कि ऐसा हर बार नहीं है कि मन गलत ही बोलता है। तो एक चीज़ है कि मन हमेशा सही बोलता है, जो भी मन बोलता है हम करते हैं। और दूसरा है कि मन हर बार गलत बोलता है। कई बार ऐसा हो सकता है कि मन भी सही बोल रहा है। पर हमको जाँच करने के लिए हमारी बुद्धि सतर्क होनी है, हमें सचेत होना है।
सचेत रहने की आदत और समय का प्रबंधन
और जितना हम भक्ति के कार्यों में सचेत हो जाते हैं, जब जप कर रहे हैं, श्रवण कर रहे हैं, तो जितना हम तभी सचेत रहते हैं, तो वो सचेत रहने की एक आदत बन जाती है। और वो सचेत रहने की आदत जो होती है, वो बाकी समय में भी हमको मदद करती है। तो जितना हम भक्ति के कार्यों में अचेत रहते हैं – जप कर रहे हैं, पर जिह्वा जप कर रही है और जो चेतना है वो सारी दुनिया का भ्रमण कर रही है – तभी हम अचेत रहते हैं। तो वो अचेत रहने की, एक विक्षिप्त रहने की आदत बन जाती है। और उसके कारण क्या होता है? वही आदत हमारे बाकी कार्यों में लग जाती है।
और जो व्यावहारिक कार्य हैं उसके लिए हम सचेत रहते हैं, पर खास करके जो स्वयं को परिवर्तित करना है, खुद की आदतों को बदलना है, उसके लिए जो चेतना लगती है, उसके बारे में सचेत होना इतना आसान नहीं है। जितना हम भक्ति के कार्यों में सचेत रहते हैं, उतना हम खुद के बारे में सचेत हो जाते हैं – क्या ये करना है, ये नहीं करना है। और उसके बाद में जो नहीं करना है वहाँ हम चुनाव कर सकते हैं।
कई बार हमारा चुनाव करने के पहले ही फैसला हो जाता है। मतलब जैसे मैं बता रहा था कि वो फल खाना है या हैमबर्गर खाना है, ये सोचने के पहले ही हैमबर्गर मुंह में चला गया। वो कैसे हो गया? क्योंकि चेतना नहीं थी, सचेत नहीं था व्यक्ति। जितना हम सचेत बनने की आदत लगाते हैं, उतना हम ये ऐसे फैसले सोच-समझ के कर सकते हैं।
तो फिर वास्तव में… जैसे बताया गया है, जो इससे पॉइंट स्पष्ट करता हूँ कि… एक अध्ययन कहता है कि आजकल की दुनिया में साधारण जो लोग होते हैं, वो लगभग दो घंटे डिस्ट्रैक्शन (distraction) में गंवाते हैं। दो घंटे रोज़ के दिन में डिस्ट्रैक्शन कैसे हो जाता है? वो कि हम रस्ते पे चल रहे हैं, तो हम कुछ अच्छा विचार कर सकते हैं, पर यहाँ पे क्या है, वहाँ पे क्या है वो देखते हैं। और ऐसा नहीं कि ‘यहाँ पे क्या है’ देखना बुरा है, पर उसमें हमारा विचार इधर चला जाता है, उधर चला जाता है।
हम अगर कुछ अख़बार पढ़ रहे हैं, तो अख़बार पढ़ने में कुछ जानकारी होना ज़रूरी है, पर हम एक चीज़ पढ़ने लगते हैं – यह पढ़ना, वो पढ़ना, वो पढ़ना। और खास करके आजकल फोन्स (phones) में इतने सारे प्रलोभन आते हैं जो हमको विक्षिप्त कर सकते हैं।
तो हमारे पास… सब के पास समय की कमी है, पर किसी के पास भी दुनिया में 24 घंटे से अधिक हैं क्या एक दिन में? तो दुनिया में कितना भी अमीर व्यक्ति हो, वह अपने दिन में 24 घंटे से अधिक नहीं ला सकता है। सब के पास उतना ही समय मिल रहा है। तो अभी जो व्यक्ति का मन विक्षिप्त है, जो व्यक्ति के मन पे चेतना नहीं है, उसको दिन भर भी कुछ काम नहीं हो, फिर भी वो बोलेगा “मेरे पास समय नहीं है।” क्योंकि वो मन उसको बिजी (busy) रखेगा – ये करना है, वो करना है, वो करना है, वो करना है।
तो जिस व्यक्ति का मन पे नियंत्रण है, वह व्यक्ति का कितना भी काम हो, वह अगर कोई ज़रूरी चीज़ है, उसके लिए समय निकाल सकता है। क्यों? क्योंकि वो जानता है कि समय न होना ये समस्या सबको है, सबकी समस्या है ये। पर जितना हमारा मन अनियंत्रित है, उतना कितना भी समय हो हमारे पास, वो कम ही रहेगा। और जितना हमारा मन नियंत्रित रहेगा, उतना हम हमारे समय को और अच्छी तरह से मैनेज (manage) कर पाएंगे। और हम जो महत्वपूर्ण चीज़ें हैं उनको समय दे पाएंगे। और क्या महत्वपूर्ण नहीं है, यह हम समझ के उसको नहीं करेंगे या उसको बाद में हम कर सकते हैं।
तो भक्ति कार्यों के लिए जब हम समय निकालते हैं, उससे क्या होता है? हमारे मन के नियंत्रण में मदद आती है। जितनी मन के नियंत्रण में मदद आती है, उसके बाद में हमें जो भी कार्य करना है, कौन सा कार्य महत्वपूर्ण है…
समय का प्रबंधन और सचेतन निर्णय
कौन-सा कार्य पहले करना है, कौन-सा कार्य बाद में करना है, कौन-सा कार्य करना ज़रूरी नहीं है, वह समझते हैं। कई बार जब मन पे नियंत्रण नहीं होता है तो हम वही कार्य करते हैं – उसमें ध्यान नहीं लगता है, वह कार्य कुछ गलत कर देते हैं, और फिर वह गलत कार्य करने के कारण, वही कार्य दूसरी बार करना होता है। मान लीजिए हम कहीं जा रहे हैं, हमारा मन विचलित है। तो हम निकलते हैं घर से और हम जा रहे हैं, जा रहे हैं। बाद में मुझे उस इंटरव्यू (interview) के लिए जाना था – “अरे जो फॉर्म (form) था, फॉर्म ही नहीं लिया मैंने!” तो वापस जाओ भई घर में। तो उसमें क्या है? हमारा ध्यान नहीं था, उसके कारण समय वो चला गया है।
तो ये तो एक बहुत स्थूल उदाहरण है। पर ऐसे कई… जैसे हम जब चेतन नहीं रहते हैं तो कई जगह पे हमारा समय चला जाता है, जो हमको पता ही नहीं चलता है। तो जितना हम चेतन हो जाएंगे, तो हमारा समय कहाँ जा रहा है और वहाँ पर जाना ज़रूरी है कि नहीं, इसके बारे में हम पिछली… इसके बारे में विचार करके फिर चुनाव कर सकते हैं।
अगर हम चुनाव करने की आदत नहीं डालते हैं… और समय तो जाने ही वाला है। कई बार हम कहते हैं कि समय पैसे के समान है। वास्तव में समय पैसे के समान नहीं है। क्यों? दोनों मूल्यवान हैं, उस तरह से वो समान हैं। पर फर्क क्या है? कि पैसा हम चुन सकते हैं – खर्च करना है कि नहीं। पर हम समय का चुनाव नहीं कर सकते हैं, वो खर्च होने ही वाला है। हम पैसे को बैंक (bank) में रख सकते हैं, समय को बैंक में नहीं रख सकते हैं, समय जाने ही वाला है। तो हम इतना ही चुन सकते हैं कि समय को मैं किस तरह से… हम किस तरह से उसको इस्तेमाल कर रहे हैं या उसको व्यर्थ गंवा रहे हैं।
तो इसलिए हम जब पैसा खर्च करते हैं तो कितना सोच-समझ के खर्च करते हैं – “यहाँ पे खर्च करना है या नहीं करना है?” इसलिए हमारा समय कहाँ जा रहा है, उसमें भी हमें सोच डालनी चाहिए और उसके लिए सचेतन होना बहुत ज़रूरी है। और इसलिए प्रभुपाद जी ने जो संस्था बनाई, उसका नाम था ‘कृष्ण भावनामृत संघ’ (Krishna Consciousness)। हमको सचेतन होना है। और जितना हम कृष्ण कॉन्शियस (Krishna conscious) होंगे, उतना हम कॉन्शियस (conscious) भी हो पाएंगे। जितना हम कृष्ण भावना… हमारी चेतना को कृष्ण भावना में लगाने का प्रयास करेंगे, हमारी चेतना के बारे में हम सचेत हो जाएंगे और फिर हम उस तरह से हमारी चेतना को उचित कार्य में लगाने के लिए हम हमारे जीवन का उत्तम उपयोग कर सकते हैं।
सार: बद्धावस्था, मन का आईना और परमात्मा
तो सार में नया चर्चा… किस तरह से ये भिक्षुगीत के गीत में बताया गया है कि हमारी परिस्थिति क्या है? हम आत्मा, हमारे अंतरंग इलाके में आत्मा के बाजू में मन है जो बद्ध है और हमको बद्ध करता है। और उसके बाजू में ही भगवान हैं, परमात्मा हैं। तो परमात्मा क्या हैं? वे ‘उदासीनवदासीनम्’ हैं। मतलब क्या है? वो अनइंटरेस्टेड (uninterested) नहीं हैं। वो ऐसा नहीं है कि हमारी परवाह नहीं करते, पर वो पक्षपात नहीं करते। जैसे क्रिकेट मैच में कोई अंपायर (umpire) होता है। तो हमें… वो मतलब क्या करते हैं, वो बद्ध नहीं हैं, पर वो भौतिक गुणों से प्रभावित नहीं होते हैं। पर वो हमारे मार्गदर्शन के लिए, हमें सुझाव देने के लिए, हमें विचार देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
पर हम उनकी ओर देखने के बजाय हम मन की ओर देखते हैं। तो मन क्या है? एक आईना है, जो कि एक विकृत आईना है। और जैसे कोई सुन्दर व्यक्ति भी एक विकृत आईने में विकृत दिखता है, वैसे जो आत्मा शुद्ध है, आत्मा दिव्य है, वो मन के आईने में देखकर खुद को अलग-अलग तरह से पहचानने लगता है – मैं मोटा हूँ, मैं काला हूँ, मैं गरीब हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ। और जिस तरह से बद्ध हो जाता है, उस धारणा के अनुसार वो कार्य करता है।
कोई बच्चा घर में बैठा हुआ है, पर घर में बैठे-बैठे वो एक हॉरर मूवी (horror movie) देख रहा है तो भयभीत हो जाता है। भले ही वास्तव में भयभीत होने की ज़रूरत नहीं हो, पर उसकी चेतना जो है वो टीवी में चली गई है। तो इस तरह से हम कई बार भयभीत हो जाते हैं, विचलित हो जाते हैं। वो क्यों हो रहा है? क्योंकि आत्मा तो शुद्ध ही है, आत्मा तो सुरक्षित ही है, पर क्योंकि आत्मा वो मन के आईने में प्रतिबिम्बित होकर देख रहा है, उसके कारण वो विचलित हो रहा है।
सचेत, अचेत और अवचेतन कार्य
तो हमें… हम जब कार्य करते हैं तो अधिकांश रूप से जो मन की बद्धावस्था के कार्य करते हैं। मतलब कई चीज़ें… कुछ चीज़ें हैं हमारे जीवन में हम सोच के करते हैं। हम सचेत रूप से ये करना है कि नहीं करना है, उसके बारे में विचार करते हैं। जैसे रस्ते पे चल रहे हैं, कोई चौराहा आ गया तो इधर जाना है या उधर जाना है। पर हमारे जीवन में वास्तव में हर पल पे चौराहा है, और उस चौराहे पे हम कौन-सा मार्ग चुनते हैं, वहाँ कई बार उसके बारे में सचेत नहीं होते हैं।
तो किस तरह सचेत, अचेत और अवचेत? तो अवचेत पर जो हम कार्य करते हैं, जैसे कि बिना विचार के कोई व्यक्ति कुछ हैमबर्गर (hamburger) खाने लगता है, वो कार्य कैसे होते हैं? वो हमारे मन में जो प्रवृत्तियां आ गई हैं, मन में जो आदतें लग गई हैं, उसके अनुसार होती हैं। तो कई बार आदतों को परिवर्तित करना है तो हमें जो अवचेत स्तर पर जो कार्य करने हैं, उसके बारे में हमको सचेत होना है।
अच्छे लोगों को लग रहा था कि हम बारह-पंद्रह चुनाव करते हैं खाने के बारे में हर दिन में, पर वास्तव में दो सौ पंद्रह चुनाव करते हैं। तो जितना हम सचेत रहेंगे, उतना हम हमारे मन को… जो हमारी आदतें हैं, उनको हम बदल सकते हैं। उसके लिए कार्य कर सकते हैं। मन हमारे… काम पे हमारा फैसला नहीं करेगा।
श्रवण में सचेतनता और युक्ति
और जितना हम भक्ति में अवचेतन रहते हैं, तो फिर उतना… मतलब भक्ति के समय, कार्य के समय भी हम भगवान का चिंतन नहीं कर रहे हैं, हम मन का चिंतन कर रहे हैं। और ये कैसे होता है और इसको कैसे टालना है, इसके लिए हमने कई उदाहरण दिये। तो मन कई युक्तियां करता है हमको भगवान से दूर रखने के लिए, तो हमें भी कुछ युक्ति करके मन को… मन की बात को अनसुनी करना है। हम उसको… हम उसकी बोलती बंद नहीं कर सकते, पर उसको सुनके उसके अनुसार ही कार्य करना ज़रूरी नहीं है।
तो अगर मन बोलता है “ये बहुत बार सुना है”, तो हमें क्या करना है? “ठीक है, पहले कहाँ सुना है?” तो हमको क्या करना है? जो जानकारी है, वो नई होना ज़रूरी नहीं है, समय पर हमको याद आनी चाहिए तो हमको उससे फायदा होता है। समय पर याद कब आएगी? जितना उस जानकारी का हम सम्बन्ध जोड़ रहे हैं दूसरी चीज़ों से जो हम जानते हैं, उससे। तो इसलिए जो भी जानकारी हमको मिल रही है उसको हम सम्बन्ध कैसे जोड़ सकते हैं, उस तरह से हमको सोचना है।
मन हमको फंसाने का प्रयास करता है – “ये तो नए लोगों के लिए पॉइंट है।” ठीक है, हम क्या बोल सकते हैं? “नए लोगों को अगर मुझे बोलना है तो मैं किस तरह से बोलूँगा?” तो जब मन हमको फंसाने का प्रयास करता है तो हमको मन को कुछ युक्ति बना के फंसाना है। मन एक बालक के समान है, तो बालक रोने लगता है तो माँ अलग-अलग योजना बनाने लगती है, और फिर समझदार बन जाता है। वैसे ही जो मन है, वह भी समझदार बन जाएगा, शुद्ध हो जाएगा। वो भक्ति के कार्य करेंगे तो धीरे-धीरे शुद्ध हो जाएगा। उसके बीच में वो मन हमारे भक्ति के कार्य में विघ्न बन सकता है और उसको न बनने देने के लिए हमको सचेत होना ज़रूरी है।
समय प्रबंधन और मन का नियंत्रण
और सचेत होने के सम्बन्ध में हमने देखा कि अंत में हम सब कई… ऐसा नहीं कि सिर्फ भक्ति कार्य में अचेत रहते हैं। अगर हम भक्ति कार्य में अचेत रहते हैं तो वो आदत बन जाती है, और बाकी कार्य में भी अचेत रहते हैं। और साधारणतया लोग आजकल के ज़माने में लगभग 2 घंटा विक्षिप्त अवस्था में, डिस्ट्रैक्टेड (distracted) परिस्थिति में गंवा देते हैं।
तो सब के पास उतना ही समय है और अगर हम… जिसके पास जिसका मन विक्षिप्त है, पूरा दिन भी उसके पास हो, फिर भी उसको काम करने के लिए समय नहीं मिलेगा क्योंकि मन उसको काम पे लगा के रखेगा – अपने काम में, उसके काम पे नहीं, मन के काम पे लगा के रखेगा।
तो इसलिए हमको मन को अगर केंद्रित करते हैं, हम एकाग्र करते हैं, तो फिर हमको बहुत काम भी होगा तो भी अगर कोई और महत्वपूर्ण काम आ जाता है, उसके लिए हम समय निकाल सकते हैं – “यह बाद में करूँगा, यह मैं किसी और को बोल सकता हूँ, यह करने की ज़रूरत नहीं है,” ऐसे हम फैसला कर सकते हैं। तो इसलिए हम यह नहीं कह सकते हैं कि “समय नहीं है मेरे पास।” हमको हमारे मन को नियंत्रित करने में अगर हम समय डालते हैं, तो उससे हमारे समय को हम अच्छी तरह से और मैनेज (manage) कर सकते हैं।
और मन पैसे के समान ही मूल्यवान है, पर मन अलग भी है क्योंकि पैसा हम सोच सकते हैं, चुनाव कर सकते हैं खर्च करना है पैसा। मन जो है… समय जो है, व्यतीत होने ही वाला है। तो अगर हम सचेत रह कर चुनाव नहीं करते हैं समय को कैसे व्यतीत करना है, तो मन फैसला करके हमारे समय को व्यर्थ गंवाएगा। सचेत होके जब कार्य करेंगे, तो हम जीवन का उत्तम उपयोग कर सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तर (Q&A)
प्रश्न: किसी का कोई सवाल है? हमें एक सवाल आज है, इसके लिए एक नया क्लास होने वाला है। जितने लोग कृष्णा… भागी थे आप उसका… कर सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद करना है। जब हम… जपते हैं या मन… चीज़ करते हैं, इसको बहुत सचेत हैं आप। सब… वही विश्वास करते हैं। हम सब विश्वास करते हैं। तो यहाँ भी एक प्रश्न है। हम गीता में पढ़ते हैं कि शरीर से आत्मा अलग है, लेकिन हम बड़े-बड़े आचार्यों को देखते हैं। शरीर और आत्मा जब अलग हैं, तो फिर महान प्रगतिशील अध्यात्मवादी जो हैं, उनको भी शरीर की पीड़ा क्यों सताती है?
उत्तर: यहाँ पे हमें… शरीर और आत्मा अलग है यह एक तत्त्वज्ञान का सत्य है और उसका एक व्यावहारिक अनुशीलन है। तो कैसे है कि अगर मान लीजिए मुझे कहीं कार्यक्रम को जाना है। तो अगर मैं कार से जा रहा हूँ, अगर वो कार पंचर हो गई, तो अभी कार पंचर होना यह एक समस्या है। अगर मान लीजिए मैं जा रहा हूँ और मुझे फ्रैक्चर हो गया, यह दूसरी एक समस्या है। अभी दोनों समस्या है, दोनों अलग-अलग स्तर की हैं – कार का पंचर होना और मेरा फ्रैक्चर होना, यह अलग-अलग स्तर पे है। पर दोनों समस्या ही हैं।
तो दोनों से, अगर मुझे कार्यक्रम जाना है, उसमें विघ्न हो सकता है। अगर कार भी पंचर हो जाएगी, उससे भी समस्या आएगी। मान लीजिए अगर कोई व्यक्ति है वो अपनी कार से बड़ा आसक्त है। और उसको कार को थोड़ा, उसको स्क्रैच (scratch) भी आ जाता है – “क्या किया तूने!” – चिल्लाने लगता है। क्यों? वहाँ पर क्या है? अभी कार पर स्क्रैच हुआ है, व्यक्ति को कुछ भी नहीं हुआ है। पर क्योंकि आसक्ति है, तो उसके… मान लीजिए उसके दिल पर एक दौरा पड़ गया है – “मेरी कार पर स्क्रैच हो गया!” क्यों? क्योंकि आसक्ति है वहाँ पर।
तो उसी तरह से अभी जो हमारा शरीर है, ये आत्मा के लिए कार के समान है। तो शुद्ध भक्त भी होंगे तो भी उनके लिए… तो अभी कार का उदाहरण उचित है और अनुचित भी है। उचित कैसे है कि अगर मेरी कार पंचर हो गई तो मैं दूसरी कार में जा सकता हूँ। पर हमारा जो आत्मा है वो एक शरीर में है, तो वो शरीर इस जीवन में बदल नहीं सकता है। तो अगर मेरी कार पंचर हो गई, दूसरी कार कोई है नहीं, तो उसी पंचर को ठीक करके मुझे जाना पड़ेगा। तो फिर काफी समस्या है।
तो ठीक उसी तरह जो शुद्ध भक्त भी होते हैं, उनके लिए भी शरीर है ये, एक औजार है। वो खुद को शरीर से पहचानते नहीं हैं, पर ये शरीर एक औजार है। और औजार नहीं है, वो अनिवार्य औजार है, आवश्यक और अनिवार्य औजार है। उसके बिना वो कार्य नहीं कर सकते हैं।
हमारे लिए हम जब आसक्त होते हैं – जैसे कि अगर कोई व्यक्ति आसक्त है अपनी कार से, तो कार पर थोड़ा-सा स्क्रैच भी आ जाएगा तो वो आसक्ति में कार पर स्क्रैच आ जाएगा, यह असुविधा कह सकते हैं, और उसके लिए वो वेदना ही नहीं, वो एक हादसा है बड़ा, वो बड़ा ही सदमा… हादसा नहीं सदमा है उसके लिए। क्यों? क्योंकि उसकी आसक्ति है वहाँ पर। तो उसी तरह से जितना हम शरीर से आसक्त हैं, उतना शरीर को जब समस्या आती है, उतना हम उससे और पीड़ित होते हैं। हम शरीर से आसक्त नहीं हैं, तो उससे हम शरीर की समस्या से पीड़ित नहीं होते हैं। पर फिर भी असुविधा तो होती है।
तो हमें… हम जब कहते हैं कि आत्मा शरीर से अलग है, इसका मतलब यह नहीं है कि आत्मा और शरीर का लेना-देना ही नहीं है। जब तक हम इस शरीर में हैं तो यही शरीर हमारा आवश्यक और अनिवार्य औजार है। इसलिए उसकी देखभाल करना बहुत ज़रूरी है। और जब मैं बुधवार को जो प्रवचन हुआ था, मैं संवेदनशीलता और असंवेदनशीलता पे बात करने वाला हूँ। तो ऐसा नहीं है कि अगर किसी को बिमारी आ गई है तो उस व्यक्ति को बिमारी है तो वो सोच सकते हैं कि ये मेरे बुरे कर्मों के अनुसार हुआ है। पर हमें नहीं सोचना, “अरे तुमने बुरे कर्म किए इसलिए तुमको ऐसे हुआ था।”
हमको अगर किसी वैष्णव को कोई समस्या हो रही है तो हमें देखना है कि मुझे एक वैष्णव की सेवा करने का मौका है। तो हमें क्या देखना है कि जो भी व्यक्ति है हमको सेवा भाव रखना है। और कोई भक्त पीड़ा में है तो वो कोई समस्या में है, असुविधा में है जो भी है, तो हमें क्या करना है? हमें उनकी मदद करके उनकी सेवा करने का भाव रखना चाहिए। तो मन और शरीर और आत्मा अलग है, पर आत्मा के लिए शरीर ज़रूरी सुविधा है। इसलिए शरीर में कोई समस्या आती है तो वो काफी बड़ी असुविधा हो सकती है।
अचेतन और अवचेतन में अंतर
प्रश्न: वास्तव में अचेतन और अवचेतन इन में फर्क क्या है? वास्तव में अनकॉन्शियस (unconscious) और सबकॉन्शियस (subconscious)।
उत्तर: वास्तव में अनकॉन्शियस मतलब जब हम सोए हुए हैं तभी हम कुछ सचेत ही नहीं हैं। या हम सचेत भी हो सकते हैं पर कई बार हम कुछ चीज़ को देखते ही नहीं। मतलब क्या है? कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि अवचेतन के स्तर पे जो कार्य होता है, मतलब एक तरह से हमको पता है हम कर रहे हैं, पर नहीं, हम जाग्रति… किसी चीज़ चाहिए… जैसे कि कोई व्यक्ति मान लीजिए वह संस्कृत जानता ही नहीं है, यही कक्षा में खाली आता है, तो उसको कुछ लिखा हुआ दिखेगा ही नहीं क्योंकि क्या है? उसको वो एक भाषा है, ठीक है, जब कुछ लिखा हुआ है उसको पता ही नहीं चलता।
तो साधारणतः क्या होता है? अचेत मतलब जब हमारी चेतना है ही नहीं। हम अचेत होते हैं… खास करके सो रहे होते हैं, सपने देख रहे होते हैं तब हम अचेत होते हैं। पर जब हम जाग्रत होते हैं, मतलब जब हम जगे हुए हैं, तभी हम कुछ कार्य सचेत परिस्थिति में करते हैं या कुछ कार्य अवचेत परिस्थिति में करते हैं। तो जब हम जाग्रत अवस्था में होते हैं तो हम कुछ चीज़ें हैं जिसके प्रति हम सचेत होते हैं, और कुछ चीज़ें हैं जिसके प्रति हम अवचेत होते हैं।
भक्ति में शक्ति और कमज़ोरियों से लड़ना
प्रश्न: हम जब इस मार्ग में प्रयास करते हैं, वो… और हम उस भाव पर पहुंच जाते हैं कि कुछ चीज़ें हैं जिससे हम लोग हमें… इतना कंडीशनिंग (conditioning) उसमें है कि इतने सारे फ्रिक्शन (friction)… हम उसमें डेलिजेर (deliger) होते हैं। और हम लोग कुछ स्पेस (space) ऐसा होता है कि हम उसमें कुछ सक्सेस (success) मिला करते हैं। तो हम जीत जाते हैं और आसानी से हम उसमें प्रगति कर रहे होते हैं। तो जिन चीज़ों में हम बार-बार हार रहे हैं उसके बारे में हम क्या कर सकते हैं?
उत्तर: तो एक चीज़ महत्वपूर्ण है हमें समझना कि भक्ति में प्रधान जो है वो है भगवान से सम्बन्ध जोड़ना। हमारे जो बंधन हैं, आसक्तियां हैं उनको छोड़ना ये द्वितीय है। वो होना चाहिए, वो होगा, पर उस पे हमें केंद्र नहीं देना है।
हमें पिछले हफ्ते भी इसी सवाल… मैंने इसका जवाब दिया था। पर यहाँ पर मैं दूसरी दृष्टि से उसका जवाब दूँगा। हमें सबसे पहले देखना है कि मुझे भगवान से सम्बन्ध तो जोड़ के रखना है, कुछ भी हो जाए। और हम सबके कुछ स्ट्रेंथ्स (strengths) हैं, कुछ वीकनेसेस (weaknesses) हैं, कुछ चीज़ों में हम अच्छे हैं, कुछ चीज़ों में हम कमज़ोर हैं। तो हमें हमारी कमज़ोरियों के बारे में सावधान रहना है, पर उसके बारे में हमें अपनी चेतना नहीं रखनी है।
अगर मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ – हम अगर ऐसा सोचते रहते हैं, तो क्या है? हम भगवान के बारे में कहाँ सोच रहे हैं? हम सोच रहे हैं मेरे बारे में और मेरी आसक्ति के बारे में। भगवान के बारे में चेतना कहाँ है? तो इसलिए, मैं जैसा भी हूँ, मैं भगवान की सेवा कर सकता हूँ। पर मैं भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ, उस पे हमें ज़ोर देना है। और जब हम उस पे ज़ोर देते हैं, तो कुछ युद्ध ऐसे हो सकते हैं, जिसमें हमको जीतना नामुमकिन लगता है। तो हम ऐसा फैसला भी कर सकते हैं कि मैं ये युद्ध लड़ना ही नहीं चाहता हूँ।
मतलब क्या है? ऐसा नहीं कि मतलब वो जो आसक्ति है, वो जैसे भी होगा मैं करते रहूँगा। वो भाव नहीं है। पर उसके बारे में ज़्यादा विचार नहीं करूँगा मैं। कहते हैं कि अगर कोई रण में युद्ध कर रहा है और एक बार किसी दूसरे योद्धा ने उसको तलवार से मारा और उसको ज़ख्मी कर दिया। तो अगली बार अगर वो फैसला करता है – “मैं इसके बाद भविष्य में कभी भी तलवार के प्रहार से ज़ख्मी नहीं होऊँगा।” अभी ऐसा आश्वासन कैसे रख सकता है? कभी आक्रमण कहाँ से भी हो सकता है।
वो अगर ये योजना करता है कि मैं और खुद के संरक्षण के लिए और सक्षम बनूँगा, मैं और सतर्क बनूँगा, मैं और… सीखूँगा। तो फिर क्या है? दूसरे… मैं और शस्त्रों में निपुण हो जाऊँगा, तो फिर क्या होगा? वो तलवार के प्रहार से भी बच सकता है और दूसरी चीज़ों से भी बच सकता है। अगर उसकी चेतना है – “मुझे तलवार से बचना है, तलवार से बचना है, तलवार से बचना है”, और युद्ध के लिए इतना सक्षम हो जाएगा वो, तो तलवार से भी बचने में सक्षम हो जाएगा। वो तलवार से सक्षम होना ही उसका प्रथम उद्देश्य नहीं है।
कुछ ऐसी बद्धावस्थाएं होती हैं, जिसमें हम बार-बार खा जाते हैं, जिसमें हम ज़ख्मी हो जाते हैं। तो हमें क्या करना है? उसके बारे में ही बार-बार सचेतन नहीं रहना है, उसके बारे में विचार नहीं करना है हमें। “ठीक है, भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ?” उसके बारे में हम सोचते हैं और भगवान की सेवा में लग जाते हैं। तो फिर भले उस आसक्ति के कारण हम थोड़ा गिर भी जाते हैं, थोड़ा समस्या आ भी जाती है, तो पुनः उठ जाओ और पुनः कार्य में लग जाओ।
तो अगर हम इस तरह से भगवान की सेवा में लगे रहते हैं, और अगर एक प्रलोभन से एक लड़ाई में हम हार गए, तो वो प्रलोभन से लड़ाई में हारने से हमारे भक्ति के युद्ध में हार-जीत का फैसला नहीं होता है। भक्ति का युद्ध बहुत बड़ा है। और भक्ति के युद्ध में हमको युद्ध करते रहना है। तो उस युद्ध में अगर हम करते रहते हैं, तो भले एक किसी प्रलोभन से एक लड़ाई में हम हार गए, कई लड़ाई में भी हार गए, फिर भी हम भक्ति के युद्ध में अग्रसर रहते हैं। और धीरे-धीरे भक्ति के युद्ध में अग्रसर रहने से क्या होगा? कि हम और शक्तिशाली बन जाएंगे, और शुद्ध बन जाएंगे।
तो उस एक प्रलोभन में, उस एक युद्ध में हारने के कारण अगर हम हताश हो जाते हैं, तो हताश होके हम भक्ति का युद्ध भी नहीं करेंगे। तो मान लीजिए अगर मैं ये करने वाला नहीं था, कर लिया मैंने – “ठीक है अभी हो गया।” तो उसके बाद में अभी हम जप कर सकते हैं – “जप कर रहे हैं, मैंने वो क्यों किया, क्यों किया, क्यों किया… वो किया तो अभी जप मैं छोड़ दूँ?” ऐसा नहीं है।
तो क्या है? हमें भले ही वो एक युद्ध में हम हार गए, फिर भी हमें भगवान की भक्ति में अग्रसर रहना है। भगवान की भक्ति में अग्रसर रहते हैं तो धीरे-धीरे उस जो लड़ाई में भी हम जीतने के लिए सक्षम हो जाएंगे। पर कुछ लड़ाइयां ऐसी हो सकती हैं कि उनको जीतने के लिए काफी समय लग सकता है।
क्या अलग-अलग लोगों की अलग-अलग प्रकार की आसक्तियां होती हैं। तो कुछ ऐसी आदतें हो सकती हैं जो व्यक्ति को छोड़ना बड़ा मुश्किल हो सकता है। “ठीक है वो छोड़ नहीं पाया।” पर भक्ति में छोड़ने से महत्वपूर्ण जोड़ना है। हमको भगवान से जोड़ना है। उसके लिए कुछ चीज़ें छोड़नी ज़रूरी हैं, पर वह द्वितीय है। प्राथमिक है भगवान से जोड़ना है। तो हम अगर भगवान से जुड़ जाते हैं तो धीरे-धीरे वो चीज़ें छूट जाएंगी। और वो छोड़ने पे हमको ज़ोर नहीं देना है, जुड़ने पे ज़ोर देना है। इस तरह से हम अग्रसर रह सकते हैं। हरे कृष्णा!
हम बाद में बात कर सकते हैं। बहुत धन्यवाद! ग्रन्थराज श्रीमद्भागवतम् की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल!