Tap the power of thoughts don’t be trapped by them – Hindi
[Congregation program for Sopra Steria employees, Nodia, Delhi, India]
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Lecture Summary
- मकड़ी और रेशम के कीड़े का उदाहरण: जिस तरह मकड़ी अपना जाला बुनकर उससे अपना भोजन प्राप्त करती है, लेकिन रेशम का कीड़ा अपने ही बुने जाले में फंसकर जान दे देता है; ठीक उसी तरह हमारा मन हमारा सबसे अच्छा मित्र (हमें ऊपर उठाने वाला) या सबसे बड़ा शत्रु (हमें नीचे गिराने वाला) हो सकता है।
- दवाइयों से मानसिक शांति संभव नहीं: आज भौतिक सुख-सुविधाएं बहुत हैं, लेकिन मन अशांत है। अमेरिका जैसे देशों में ‘एंटी-डिप्रेसेंट्स’ (मानसिक तनाव की दवाइयां) का चलन बहुत बढ़ गया है। दवाइयां केवल रसायनों को बदल सकती हैं, लेकिन वे जीवन की समस्याओं का वास्तविक या स्थायी समाधान नहीं हैं।
- समस्याओं का उद्देश्य: वैक्सीन (टीके) की तरह जीवन की समस्याएं हमारी आंतरिक शक्ति (प्रतिरोधक क्षमता) को बढ़ाने के लिए आती हैं। भौतिक जगत में आने वाली हर समस्या का अंतिम उद्देश्य हमारी आध्यात्मिक प्रगति कराना और हमें भगवान के करीब लाना है।
- तीन गुणों का प्रभाव: हम किसी जानकारी या परिस्थिति पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस गुण में हैं:
- तमोगुण: व्यक्ति डर के मारे सुन्न हो जाता है (जैसे आग लगने पर कुछ न कर पाना)।
- रजोगुण: व्यक्ति घबरा जाता है और गलत कदम उठाता है (भगदड़ मचाना)।
- सत्वगुण: व्यक्ति शांत रहकर सही समाधान निकालता है (आग बुझाने का यंत्र ढूँढना)।
- अंतिम समाधान (भगवान की शरणागति): इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। जब हम अपना मन भगवान में केंद्रित करते हैं (भक्ति करते हैं), तो हमारा मन शांत होता है। भगवान पूर्ण शांति और शक्ति के स्रोत हैं। उनकी शरण लेने से हमें जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या का सामना करने का साहस और सही मार्गदर्शन मिलता है।
Full Transcriptions
विचारों की शक्ति और हमारा मन
तो हमारे विचारों की शक्ति जो है, उसको हम किस तरह से पकड़ सकें, उसको हम किस तरह से इस्तेमाल कर सकें, ना कि ये विचारों की शक्ति से हम पकड़े जाएं। निसर्ग में हमें कई उदाहरण मिलते हैं, जो मानव जीवन में हमें कुछ सीख दिलाते हैं। तो हम दो उदाहरण देख सकते हैं, एक है स्पाइडर (Spider), स्पाइडर को हिंदी में क्या कहते हैं? मकड़ी। और सिल्क वार्म (Silkworm) है, रेशम का कीड़ा। यह दो निसर्ग में हम चीजें देखते हैं, कि जो मकड़ी होती है, वो अपने मुंह से ही जाली निकालती है, और उससे वो अपना जो अन्न है प्राप्त करती है, उसे पकड़ती है। और जो रेशम का कीड़ा होता है, उसके मुंह से भी कुछ निकलता है, पर उसमें वो खुद फंस जाता है। तो हमारा मन जो है, यह वैसे ही है।
हमारे मन से अनेक विचार आते हैं, और कुछ विचार ऐसे हो सकते हैं, जो हमें ऊपर उठा सकते हैं, और कुछ विचार ऐसे हो सकते हैं, जो हमें नीचे ढकेल सकते हैं। भगवद्गीता के छठे अध्याय के पांचवे श्लोक में भगवान कहते हैं:
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भगवान कहते हैं, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः – मन यह व्यक्ति का मित्र हो सकता है। आत्मैव रिपुरात्मनः – यह मन व्यक्ति का शत्रु भी हो सकता है।
आधुनिक समाज, सुख-सुविधाएं और मानसिक अशांति
आजकल के समाज में भौतिक स्तर पर काफी प्रगति हुई है। अगर हम तीन सौ, चार सौ, पांच सौ साल पीछे देखते हैं, उसकी तुलना में तो समाज बहुत परिवर्तित है और तीस, चालीस सालों में तंत्र ज्ञान (Technology) की प्रगति भी बहुत हो रही है। तो इससे जो शारीरिक स्तर पर सुविधाएं हैं, जो कंफर्ट्स (Comforts) हैं, वो काफी बढ़ गई हैं। और इससे ऐसा लगता है कि हम सब सुख के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। वो सुविधाएं बढ़ रही हैं, पर सुविधाओं से शांति नहीं बढ़ रही है। वास्तव में हम और अशांत हो रहे हैं।
मैं भी कुछ ही समय पहले अमेरिका में था। तो मैं एक अमेरिकन कंपनी के मेडिकल हॉस्पिटल में गया था। अच्छा, ये एक मेंटल हेल्थ केयर हॉस्पिटल है। वहां पर मैं एक लेक्चर देने जाता हूँ। वहां पर जो डायरेक्टर थे हॉस्पिटल के, उन्होंने बताया कि अभी अमेरिका के पांच बड़े-बड़े हेल्थ केयर सेंटर्स साथ में आके उन्होंने एक बहुत बड़ा मल्टी-मिलियन डॉलर का ग्रांट दिया है कि माइंडफुलनेस (Mindfulness), मेडिटेशन और स्पिरिचुअलिटी से मन को कैसे शांत करें। क्योंकि वो देख रहे हैं कि लोगों का मन विचलित होते जा रहा है, होते जा रहा है और उसका कुछ हल नहीं है।
क्या दवाइयां मानसिक शांति का वास्तविक उपाय हैं?
अभी 1955-1960 के पहले एंटी-डिप्रेसेंट्स (Anti-depressants) नाम के ड्रग किसी को पता भी नहीं थे। और उसके पहले भी लोग जी रहे थे। पर जब से वो एंटी-डिप्रेसेंट्स, पहले उनको ट्रैंक्विलाइजर्स (Tranquilizers) बोला करते थे, कि आप बहुत विचलित हो गए, अब शांत हो जाओ। जब से वो चालू हो गए, पहले-पहले वो कुछ हॉलीवुड के सेलिब्रिटीज यूज करते थे। एक तरह से उनके चरित्र पर धब्बा माना जाता था, कि मन कमजोर है इसका। पर ये मीडिया का ऐसा प्रभाव है, कि उसको वैसी दवाई लेना, क्योंकि वो हॉलीवुड के स्टार्स लेते थे, उसको ग्लैमरस माना जाता है। कि अगर आप ऐसी लाइफस्टाइल जी रहे हो, तो आपके मन को चिंता तो होगी ही, और उसके लिए आपको ऐसी दवाई लेनी ही चाहिए।
तो अभी आजकल के जमाने में, अमेरिका में सबसे अधिक दवाई जो बिकती है, वो है एंटी-डिप्रेसेंट्स। कोई बीमारी के लिए इतने लोग पैसा खर्च नहीं करते हैं, जितने एंटी-डिप्रेसेंट्स के लिए करते हैं। और एंटी-डिप्रेसेंट्स में एक नहीं है, बहुत से अलग-अलग प्रकार की दवाइयां हैं। और कई जो फार्मा कंपनी होती हैं, उनमें से बहुत सी कंपनियां ब्रेन और माइंड मेडिसिन में चलती हैं। तो कुछ कंपनियां ऐसी हैं, जिनका जो बजट है, वो कई यूरोपियन देशों से ज्यादा है।
कुछ लोगों को राहत मिलती है, पर ये जो हैं, are the anti-depressants curing people of diseases or are they addressing created needs among people? क्या असली में लोगों को कुछ बीमारी है, जिसको वो दवाई दे रहे हैं और उसको ठीक कर रहे हैं, या लोगों को ऐसी जरूरत महसूस होने लगी है कि मुझे कुछ समस्याएं हैं, मुझे कुछ दवाई लेनी चाहिए, और इसलिए वो दवाई दे रहे हैं। इन दोनों में फर्क क्या है कि खास कर के मन की बीमारियां जो होती हैं, तो उसको हम एक व्यावहारिक स्तर पर, प्रैक्टिकल दृष्टि से कोई उसको आइडेंटिफाई (Identify) नहीं कर सकते, जांच नहीं कर सकते। अगर किसी को मलेरिया हो गया है, तो ये शारीरिक बीमारी है और हम देख सकते हैं, डॉक्टर के पास जाएगा तो डॉक्टर ब्लड सैंपल लेते हैं, या कोई ऑब्जेक्टिव टेस्ट कर सकते हैं, कि आपके शरीर में इसका जो प्रमाण है कम हो गया है, यह जंतु ज्यादा हो गया है और इसके कारण आपको यह बीमारी है।
मन की बीमारियों का सही दृष्टिकोण
पर जब मन की बीमारी हमें मानव जीवन में आती है तो उसके लिए केमिकल सलूशन (Chemical solution) नहीं करना चाहिए। हम सबको समस्याएं होती हैं। कभी-कभी हमारे करीबी कोई व्यक्ति होता है, वो गुजर जाता है, कभी-कभी हमारे करीबी का व्यक्ति होता है, वो हमें विश्वासघात करता है, कभी-कभी हमारे ही जीवन में कोई बड़ी आपत्ति आ जाती है। तो यह सब समस्याएं हैं, यह मानव जीवन में जीते हुए हम सबको समस्याएं आती हैं। तो अगर ऐसी समस्याओं की हम कल्पना करते हैं कि इसको केमिकल सलूशन से ठीक कर लेंगे, आपको दुख हो रहा है, एक दवाई ली, दुख चला जाएगा, ऐसा नहीं होता है।
ब्रिटेन में एक एक्सपेरिमेंट (Experiment) हुआ था। एक व्यक्ति जो मानसिक रूप से बिल्कुल ठीक था, उसको बताया गया कि आप बताओ कि मुझे बहुत टेंशन आता है, मुझे बहुत पसीना आता है, मुझे बहुत डर लगता है, मैं नर्वस हूँ, ऐसे दस सिम्टम्स (Symptoms) उसको बताये। और वो दस सिम्टम्स वो देके पांच अलग-अलग साइकियाट्रिस्ट्स (Psychiatrists) के पास गया। और पांचों ने अलग-अलग डायग्नोसिस (Diagnosis) दिया। वही सिम्टम्स, वही लक्षण बताया उसने, और पांचों ने अलग-अलग डायग्नोसिस दिया, और पूरा अलग-अलग ट्रीटमेंट (Treatment) दिया। क्यों? क्योंकि क्या है, कि जब वह वर्णन कर रहा था कि ये समस्या है, ये समस्या है, तो अलग-अलग डॉक्टर्स ने उसके वर्णन में किसी एक लक्षण पर जोर दिया, किसी और ने किसी और लक्षण पर जोर दिया। और वास्तव में इसको कोई भी समस्या नहीं थी, सिर्फ वो बता रहा था बताने के लिए।
तो ये कहने का मतलब ये नहीं है कि साइकियाट्रिस्ट्स चीटिंग करते हैं या किसी को साइकियाट्रिस्ट की जरूरत नहीं हो सकती है। अगर किसी को जरूरत पड़ी है, तो उसको स्टिगमेटाइज (Stigmatize) नहीं करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि किसी को अगर साइकियाट्रिस्ट के पास जाना पड़ रहा है, तो उसका मतलब ये है कि उसके चरित्र में कुछ कमी है। अगर दिमाग की रचना में, स्ट्रक्चर में, या उसमें कुछ केमिकल्स में कुछ क्लियरली बता सकते हैं, कि आपका यह केमिकल कम है, आपका यह ब्रेन का हिस्सा यहाँ पर डैमेज हुआ है, इससे आपका ऐसा हुआ है, तभी साइकियाट्रिक ट्रीटमेंट अच्छी है। नहीं तो जो भी समस्या है, किसी को थोड़ा चिंता होने लगती है, किसी को थोड़ा डिप्रेशन होता है, किसी को यह होता है, वह होता है, तो हर चीज के लिए अगर हम केमिकल ट्रीटमेंट लेने लगते हैं, तो उससे प्रॉब्लम क्या होता है?
दवाइयों पर निर्भरता और जीवन का उद्देश्य
तीन प्रॉब्लम आते हैं। सबसे पहले यह जो है, व्यक्ति वो केमिकल्स पे बहुत डिपेंडेंट (Dependent) होने लगता है। एक बार दवाई ली, तो डिप्रेशन चला गया, फिर वापस आ जाएंगे दिन। धीरे-धीरे उस पे जो डिपेंडेंसी होती है वो एक सही मर्ज बन जाती है, और उसके बारे में किसी को कोई समाधान नहीं मिलता।
दूसरी समस्या यह है कि जो हम सबकी जीवन की समस्याएं हैं, उनका उद्देश्य होता है। इसके लिए एक कॉज (Cause) और एक पर्पस (Purpose) होता है। कॉज मतलब ये कहाँ से आया? और पर्पस मतलब ये मुझे कहाँ ले जा रहा है? हमारे जीवन में प्रॉब्लम्स के लिए एक पर्पस होता है। जो उद्देश्य इस भौतिक जगत का उद्देश्य है, वो क्या है? हम सबको एक आध्यात्मिक स्तर पर बढ़ना है।
समस्याओं के माध्यम से विकास और मार्गदर्शन
आप सब में से बहुत से लोग माता-पिता हैं। अभी जब बच्चे छोटे होते हैं, माता-पिता का कर्तव्य ही होता है कि अपने बच्चों की देखभाल करें, उनकी रक्षा करें। और अगर रक्षा नहीं करें, तो बच्चे खुद को खतरे में डाल सकते हैं। और दूसरा प्रेम है जो मार्गदर्शन करता है। तो अभी ये दोनों प्रकार के प्रेम चाहिए। अगर माता-पिता सोचते हैं कि हम हमेशा के लिए बच्चे का संरक्षण करेंगे, तो बच्चा बड़ा होने वाला है। स्कूल जाएगा, फिर कॉलेज जाएगा, फिर कहीं दूर जाके रहेगा। तो हर जगह माता-पिता तो बच्चे का संरक्षण नहीं कर सकते हैं। तो दूसरे प्रकार का प्रेम मार्गदर्शन के लिए होता है। अभी यह आपकी समझदारी है, यह ऐसा है, यह ऐसा है, आप फैसला करो क्या करना है। मार्गदर्शन देना है।
तो क्या है? कभी-कभी माता-पिता बहुत ओवर-प्रोटेक्टिव (Over-protective) बन सकते हैं। वैसे होता है कि अपने बच्चों को जगह ही नहीं देते। नहीं, तुम ऐसे मत करो, ऐसे मत करो, ऐसे मत करो। अभी माता-पिता का उद्देश्य भले ही अच्छा हो सकता है। पर क्या है? हर एक बच्चे को थोड़ा बड़ा होना है। हर एक को स्वयं बड़ा होना है, हर एक को स्वयं के फैसले करने हैं। भगवान स्वयं भगवद्गीता के अंत में कहते हैं अर्जुन को:
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।
भगवान ने अर्जुन को पूरा मार्गदर्शन दिया है, उसके अंत में कहते हैं, अभी आप चिंतन करो, और चिंतन करके आप फैसला करो, कि आपको क्या करना है। ‘विमृश्यैतदशेषेण’, जितना जरूरत है उतना आप चिंतन करो, और इसके बाद में, ‘यथेच्छसि तथा कुरु’। जैसी आपकी इच्छा है, वैसे आप करो। तो अगर अर्जुन की परिपक्वता है, ये 63वें श्लोक में भगवान बोलते हैं, और 73वें श्लोक में अर्जुन बोलते हैं:
करिष्ये वचनं तव।
जो आप बता रहे हैं, मैं वो करूँगा। तो इसमें क्या है? कई बार जिंदगी में समस्याएं जब आती हैं, वो समस्याओं के द्वारा ही व्यक्ति बढ़ता है। तो जैसे दवाई में होता है कि कई बार अगर किसी जगह पर किसी चीज़ का एपिडेमिक (Epidemic) आ गया है, कोई रोग बहुत फैल गया है, तो तभी लोगों को वैक्सीन (Vaccine) देते हैं। और वैक्सीन में क्या होता है? वैक्सीन में वही जो जंतु होते हैं, वही शरीर में दिए जाते हैं, और जंतु एक सीमित मात्रा में दिए जाते हैं। कुछ वैक्सीन अच्छे नहीं हो सकते हैं, उसके कारण कुछ परिणाम गलत हो सकता है, और कुछ वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स (Side effects) भी होते हैं। पर साधारणतः वैक्सीन का प्रिंसिपल (Principle) क्या है? तत्त्व यह है कि अगर सीमित मात्रा में जंतु शरीर में डाले जाते हैं, तो क्या होता है, शरीर में अपनी ही शक्ति है, अपनी ही क्षमता है, उसकी प्रतिकार शक्ति बढ़ेगी। और जब वो क्षमता जागृत हो जाती है, तो फिर उसके बाद में, अगर वो जंतु और बड़ी मात्रा में भी आ गए, तो शरीर ने अपना संरक्षण करने की आंतरिक क्षमता स्वयं बना ली है। तो उसी तरह से हमारे जीवन में जो समस्याएं आती हैं, उन सब का उद्देश्य है कि हमारी आंतरिक शक्ति बढ़ जाये।
आध्यात्मिक प्रगति और भगवान का आश्रय
तो आध्यात्मिक रूप से बढ़ना मतलब क्या? भगवान के और करीब जाना, भगवान का आश्रय ग्रहण करना। भगवान ही हमारे परम साथी हैं। भगवान कहते हैं:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो।
हमारे जीवन में अलग-अलग संबंध हो सकते हैं, हमारे जीवन में अलग-अलग हमारी पद्वियां हो सकती हैं, हमारे जीवन में अलग-अलग हमारे पसेशंस (Possessions) हो सकते हैं, हमारे पास चीजें हो सकती हैं। इन सब चीजों से हमको संरक्षण मिलता है, हमको सम्मान मिलता है, हमको हमारी पहचान मिलती है। और यह सब व्यावहारिक स्तर पर हमें जीवन जीने के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर इनमें से कुछ भी चीज़ स्थायी नहीं है। एक भी चीज़ स्थायी नहीं है, सब कुछ अस्थायी है।
आज ही मुझे किसी ने एक न्यूज़ भेजी कि हॉलीवुड का एक बहुत बड़ा म्यूजिशियन (Musician) था, और उसकी मौत हो गई, अचानक मौत हो गई। और वो मौत क्यों हो गई? वो हॉस्पिटल में था किसी और दवाई, किसी और बीमारी का ट्रीटमेंट लेते समय। और हॉस्पिटल में नाश्ता कर रहा था, नाश्ते में उसने अंडा खा लिया, और अंडा कुछ गड़बड़ हो गया। उसके गले में चोक (Choke) हो गया। और अंडा खाते समय, उसका गला दब गया, और मृत्यु हो गई। तो एक दृष्टि से यह बहुत ट्रैजिक (Tragic) है, इस तरह से मृत्यु होना। पर दूसरी दृष्टि से हमें सीखना है कि इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है।
प्रकृति के तीन गुण और हमारी चेतना
अभी कुछ भी स्थायी नहीं है, इसका मतलब ये नहीं कि हमेशा हमको डरा हुआ रहना है। ऐसा नहीं है। एक बार मैं कुछ समय पहले ऑस्ट्रेलिया में था, तो वहां पे एक माता जी जो अभी-अभी भक्ति में आ रही थीं, वो मुझे मिलने आईं। उन्होंने मुझसे सवाल पूछा कि मुझे बचपन से मन की काफी समस्या थी, मुझे बहुत डर लगा करता था। तो मैं कुछ साइकियाट्रिक ट्रीटमेंट भी ले रही थी, साइकियाट्रिस्ट के पास भी जा रही थी। और उससे थोड़ी मदद हुई। पर बाद में जब मैं हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने लग गई, तो उससे काफी मन शांत हो गया और मुझे बहुत राहत मिल रही थी।
पर बाद में एक वक्ता आये, उन्होंने प्रचार किया और उनके प्रचार में बताया, उनका पूरा एक प्रवचन था कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। आप रस्ते पर चल रहे हो सकते हैं, आपकी गाड़ी फेल हो सकती है, ब्रेक फेल हो सकता है। आप कमरे में बैठे हो, उसका सीलिंग है, उसकी दीवारें आप पर गिर सकती हैं। आप बिस्तर में बैठे हो, आपको हार्ट अटैक आ सकता है। पूरे प्रवचन में ऐसे बताया कि कैसे अलग-अलग पद्धतियों से कभी भी मृत्यु आ सकती है।
तो माता जी बोल रही थीं, वो प्रवचन सुनने के बाद मुझे पहले जो पैरानोइया (Paranoia) कहते हैं, फियर मतलब डर, पैरानोइया हमेशा अगर किसी को लगता है कि कोई मुझ पर आक्रमण करने वाला है, कोई मुझे परेशान करने वाला है, तो मैं पूरा पैरानोइया हो गई, बहुत ही भयभीत हो गई। और फिर इतना भय से मैं परेशान हो गई तो मैं डॉक्टर के पास गई। और डॉक्टर ने बताया कि तुम ये ऐसे लेक्चर सुनोगी तो ये लेक्चर साइकोलॉजिकली डैमेजिंग (Psychologically damaging) हो रहे हैं। तो वो पूछ रही थीं मुझे कि मैं तो भगवद्गीता का प्रवचन सुन रही हूँ, तो क्या भगवद्गीता साइकोलॉजिकली डैमेजिंग है?
तो वास्तव में भगवद्गीता साइकोलॉजिकली डैमेजिंग नहीं है। पर क्या है कि जो भी हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, हमारी जो मन की चेतना है, उसके अनुसार उस ज्ञान का हमें प्रभाव होता है। मैं पहले एक दूसरा उदाहरण लेता हूँ फिर इस विषय पर आता हूँ। अभी वही चीज़ बतायी है कि ये जीवन अस्थायी है, जो हमारे जीवन में जवानी का समय है वह कुछ ही क्षणों के लिए है। तो अभी आध्यात्मवादी लोग हमें बोलेंगे कि जवानी जो है ज्यादा समय के लिए नहीं है, इसलिए इस जवानी के जोश में तुम अपनी अयाशी में समय मत गंवाओ। अपनी जवानी का इस्तेमाल अच्छी तरह से आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए करो। तो भौतिकवादी लोग बोलेंगे जवानी बहुत कम समय के लिए है, जब है तो भोग कर लो, बाद में नहीं मिलने वाला समय। मैं अभी कुछ समय मायापुर गया था, कलकत्ता में एक एडवरटाइजमेंट देखा था मैंने, “Enjoy before you become thirty years old”, वरना आप बूढ़े हो जाओगे कुछ कर नहीं पाओगे, उसके पहले आप भोग कर लो।
तो अभी क्या है, वही चीज बताई है कि आपकी जवानी है कुछ ही समय के लिए। पर उससे भौतिकवादी लोग और आध्यात्मिक लोग बिल्कुल विपरीत निष्कर्ष निकाल रहे हैं। कहने का मतलब क्या है कि जानकारी एक ही है, उस जानकारी का प्रभाव हम पर क्या होगा, वह अलग-अलग हो सकता है। क्या वह हमारी विचारधारा पर है? तो भगवद्गीता में बताए गए हैं कि तीन प्रकार के गुण होते हैं। कौन-कौन से गुण हैं किसी को पता है? सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण गुण मतलब क्या है वास्तव में? कि ये ऐसी सूक्ष्म शक्तियां हैं जो हमारी विचारधारा पे प्रभाव करती हैं।
साधारण उदाहरण देता हूँ। अगर कोई व्यक्ति सत्वगुण में है, रजोगुण में है, तमोगुण में है। अगर व्यक्ति मान लीजिये कोई सिनेमा देख रहे हैं, मूवी थिएटर में गए हैं, अचानक आग लग जाती है। तो तमोगुण का व्यक्ति होगा, डर के मारे वहीं पे स्थिर हो जाएगा, पेट्रिफाई (Petrify) हो जाएगा। पर जो रजोगुण में व्यक्ति है वो क्या हो जाएगा, वो पैनिक (Panic) हो जाएगा और उसके कारण स्टैंपीड (Stampede) हो जाएगा। तो क्या ये रजोगुण का प्रभाव है? मतलब तमोगुण में होते हैं तो हम कुछ भी नहीं कर पाते हैं। तो हम बिना विचार किये जो भी मन में आये तुरंत कर देते हैं। आग लगी है, ये एक ही कारण है, पर उसकी तीन अलग-अलग प्रतिक्रिया है। सत्वगुण का व्यक्ति शांत होकर फायर एक्सटिंग्यूशर ढून्ढेगा।
मृत्यु कभी भी आ सकती है, यहाँ एक चीज हम चर्चा कर रहे हैं। तो अभी व्यक्ति सत्वगुण में है, रजोगुण में है, तमोगुण में है। इससे यही एक जानकारी से व्यक्ति पे अलग-अलग प्रभाव हो जाता है। भय ये बुरी चीज़ नहीं है। वास्तव में भय ये हमें मानसिक स्तर पे खतरे की चेतावनी देता है। अगर मैं एक सौ मंजिल ऊंचे, सौवें मंजिल पे हूँ, और वहाँ से खिड़की से नीचे देखता हूँ, तो क्या है? थोड़ा तो डर लगेगा मुझे। अभी वो डर अच्छा है, क्योंकि मैं बिना किसी कारण खुद को खतरे में नहीं डालूंगा। पर अगर मैं मेरे घर में बैठा हूँ, तभी मैं सोचूं, मैं सौवें मंजिल पे था, तो जब खतरा नहीं है, और तभी भय रहता है, तो क्या है, वो प्रतिकूल है।
समस्याओं का वास्तविक समाधान: भगवान की शरणागति
आध्यात्मिक प्रगति मतलब हम हमारे मन को भगवान पे केंद्रित करते हैं। भगवान कहते हैं:
मय्यासक्तमनाः पार्थ।
अगर हमारा मन भगवान में आसक्त हो गया तो हम प्रगतिशील हो गए। तो इससे क्या होता है? ऐसा नहीं है कि हम समस्याओं से भाग रहे हैं। समस्याओं का सामना करना है। जैसे मैं बता रहा था कि कभी-कभी समस्या है ही नहीं पर हम उसकी कल्पना करते हैं। कोई घटना घट गई है फिर भी हम उसका विचार कर रहे हैं। उदाहरण दिया है मेंढक का और दूसरा है क्रिकेट मैच का। तो कई बार अगर हमारे जीवन में देखेंगे हम, जब विचलित हो रहे हैं तो विचलित क्यों हो रहे हैं? इसलिए नहीं है कि वो समस्या अभी मेरे सामने है। वास्तव में कुछ घटना घटी है, उसी में मन अटका रहता है जो हमें दुख देती है। कि उसने मेरे सामने ऐसा क्यों किया? क्यों किया वो उसने मेरे साथ? मन विचार करता रहता है। और हम उसमें अटक जाते हैं।
ऐसे में क्या होता है? भगवान आश्वासन देते हैं:
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
भगवान कहते हैं कि अगर आप मेरा चिंतन करते हो, ‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि’, जो भी समस्या आपके जीवन में है उसको मैं आपको उनके पार ले जाऊंगा। मेरी कृपा के द्वारा आप उनके पार जा सकते हो। अब कैसे व्यावहारिक रूप से उसके पार जाएंगे हम? वो हर एक व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग पद्धति से होने वाला है। क्योंकि हम सबकी मानसिकता अलग है, परिस्थिति अलग है, पूर्व जन्म के कर्म अलग हैं। पर एक चीज़ सबके लिए सही है कि सबके साथ भगवान हैं। सबको भगवान आश्रय देने के लिए तत्पर हैं। हमें बस उनका आश्रय ग्रहण करना है। अगर हम उनका आश्रय ग्रहण कर लेंगे तो कितनी भी समस्या क्यों न आए, भगवान में मन लगा के हम उस समस्या का सामना कर सकते हैं।
और यहाँ भगवान का आश्वासन है। कोई कहेगा कि अगर कोई समस्या है उसको बोलो चिंता मत करो, यह आसान नहीं है। समस्या आएगी, चिंता तो होगी। पर क्या कर सकते हैं? जितना हमारी परिस्थिति में, जितना हमारा मन पे नियंत्रण है, उतने नियंत्रण के साथ हम भक्ति में लग सकते हैं। अगर उतनी क्षमता के साथ हम भक्ति में लगेंगे तो क्या होगा, हमारा मन बड़ा वजन उठाने के लायक हो जाएगा। तो सही तरीका क्या है? अगर हमारे जीवन में बड़ी-बड़ी समस्याएं हैं और बड़ी-बड़ी शंकाओं का सामना करने की मन में क्षमता नहीं है, तो इतना बड़ा वजन उठाना इतना आसान नहीं। पर क्या है, हम जितना हमारे मन की अभी क्षमता है नियंत्रण करने की, अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं, तो वो क्या है? वो लीवर को सही दबाने के समान है। जितना मन इधर लगा देंगे भगवान में, उतना हम देखेंगे कि वो जो उन परिस्थितियों में क्रोध आता था मुझे, भय होता था, चिंता होती थी, वो कम होने लगती है।
तो क्या है? भगवान की शक्ति हमें मदद करेगी हमारे मन की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए। और स्थिरता आएगी। हम जो हमारी भक्ति के द्वारा न केवल भगवान के करीब जाएंगे, पर बहुत सी योजनाओं से जो हमें दुनिया में सेवाएं करनी हैं, वो कर पाएंगे। जो भी हमें समस्याओं का सामना करना है, उन सब को भी और अच्छी तरह से हम कर पाएंगे।
निष्कर्ष: मन की शांति और भगवान का आश्रय
तो सारांश में हमने आज चर्चा की कि किस तरह से हम जो मन की शक्ति है, उसको हमारे जीवन में इस्तेमाल कर सकते हैं, न कि मन की शक्ति द्वारा हम दबोचे जाएं। हमें तंत्र ज्ञान (Technology) के स्तर पे बहुत सी सुविधाएं आजकल के समाज में मिली हैं। उससे सुविधाएं हैं पर मन संतुष्ट और सुखी नहीं है, मन और विचलित है। इसके लक्षण के लिए जो नाम की दवाई पहले पता भी नहीं थी लोगों को, एंटी-डिप्रेसेंट्स, जो आज दुनिया में कई देशों में सबसे ज़्यादा पैसे उसी पे खर्च होते हैं। तो यहाँ पे क्या हो रहा है कि कई बार जो लोग मन की दवाइयां लेते हैं, तो अगर मन की रचना में या कुछ रसायनों में कुछ स्पष्ट रूप से समस्या है, तो फिर उसके लिए मन की दवाइयां ठीक हैं। पर नहीं तो हर किसी को चिंता हो रही है, दुख हो रहा है, डिप्रेशन हो रहा है, उसके लिए दवाइयां लेने लगते हैं, तो क्या कर रहे हैं हम? हम रसायनों में जीवन जीते हैं। जो समस्याएं आती हैं, उनका रसायनों में कोई हल नहीं है।
हमारी समस्याओं के अलग-अलग कारण हो सकते हैं, पर उन सब का एक उद्देश्य है, उद्देश्य क्या है? हमारी आध्यात्मिक प्रगति। हमारे मन को भौतिक परिस्थिति से, भौतिक चेतना से आध्यात्मिक चेतना तक उठाना। यह भौतिक जगत का उद्देश्य है और भौतिक जगत की सारी समस्याओं का भी यही उद्देश्य है। और भौतिक स्तर पर हमें समस्याएं आती हैं, तो भौतिक हल ढूंढ सकते हैं और उनसे कुछ आश्रय मिल सकता है, पर यह सब अस्थायी है। कभी भी यह सब छीना जा सकता है हमसे।
तो हमने देखा कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। यह जो तथ्य है, इसका व्यक्ति अगर तमोगुण में होगा तो पूरा भयभीत हो जाएगा। रजोगुण में होगा तो बोलेगा जल्दी भोग कर लो। सत्वगुण में होगा तो सोचेगा, ठीक है इस मृत जगत के परे और कुछ है क्या जो शाश्वत है। शुद्ध सत्व में होगा तो भगवान का आश्रय ग्रहण कर लेता है। हमारी विचारधारा के अनुसार जो भी हम सुनते हैं उसका प्रभाव अलग-अलग होता है। सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण के लिए मूवी थिएटर में अगर कोई होगा, तमोगुण में होगा तो भयभीत होके कुछ भी नहीं कर पाएगा। रजोगुण में होगा तो स्टैंपीड कर लेगा। सत्वगुण में होगा तो फायर एक्सटिंग्यूशर ढून्ढेगा। तो अलग-अलग प्रतिक्रियाएं होती हैं।
तो जब हम तत्वज्ञान भी सुनते हैं तो हमें देखना है कि वो जो पॉइंट हम सुनते हैं, तो फिर मृत्यु के बारे में डरना नहीं चाहिए। कोई घटना घट गई है पहले, जैसे क्रिकेट मैच खत्म हो गया है, फिर भी उसके बारे में विचार करके विचलित होते रहता है मन। या कल्पना करता है कोई समस्या है, जैसे कि मेरे पेट में मेंढक है। और इस तरह से व्यक्ति का मन हमें बहुत विचलित कर देता है। अगर हमारे मन को हम भगवान में केंद्रित करेंगे तो फिर इस तरह से जो मन विचलित कर रहा है वो शांत हो जाएगा। जैसे कि कोई बहुत गर्मी से कोई एयर कंडीशन रूम में आ जाता है तो उसको राहत मिल जाती है। फिर इस तरह से भगवान का आश्रय ग्रहण करने से समस्याएं बाहर चली जाएंगी।
हमारा मन जो है समस्याओं में अटक के जो हमको और विचलित करता है वो कम हो जाएगा। अगर एक प्रोग्राम कंप्यूटर में फंस जाता है तो वो प्रोग्राम तो काम नहीं करता है पर बाद में कोई और प्रोग्राम भी काम नहीं कर पाता है क्योंकि सारी शक्ति उसमें फंस जाती है। तीसरा है कि उस समस्या के स्तर से अपनी चेतना को ऊपर उठा सकता है, भगवान का आश्रय ग्रहण कर सकता है। जब हम भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं तो फिर उससे क्या होता है, हमें शांति और शक्ति मिलती है क्योंकि भगवान जो हैं सम्पूर्ण शांति और शक्ति के स्रोत हैं। वो जितना हम उनका आश्रय ग्रहण करते हैं तो उससे हमारे मन को शांति मिल जाती है। फिर हम सोचते हैं अच्छा ये समस्या है, कैसे हल कर सकता हूँ मैं? व्यावहारिक रूप से हम उसका हल ढूंढ सकते हैं।
तो जब हम सबसे पहले समस्या का हल ढूंढने की जगह पे हम एक आदत बना लें हमारे मन को भगवान से आसक्त करने की, वो साधना भक्ति का उद्देश्य है। उसके द्वारा जो भी समस्या हमारे जीवन में आएगी तो हम भगवान के आश्रय ग्रहण करके उस समस्या को हल कर सकते हैं। और यह समस्या का अंतिम उद्देश्य जो है, हमारी आध्यात्मिक प्रगति कराना, उसमें हम यशस्वी हो जाएंगे। तो भगवान आश्वासन देते हैं कि कोई भी समस्या आपके जीवन में आएगी, आप मेरी चेतना में आ जाओगे तो उस समस्या के पार मैं आपको ले जाऊंगा। कैसे होगा? वो हर एक व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग पद्धति से होता है, पर भगवान का यह आश्वासन है।
और मैं एक विचार से अंत करता हूँ कि हमें भविष्य में क्या आने वाला है पता नहीं है, पर भविष्य किसके हाथ में है? वो हमें पता है। भगवान भविष्य के नियंत्रक हैं और जो भी आएगा भगवान की मदद से हम न केवल सामना कर सकते हैं, और इसके द्वारा हम प्रगति कर सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण। हरे कृष्ण। धन्यवाद, धन्यवाद। किसी का कोई सवाल है?