test
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
संक्षिप्त सारांश
हरे कृष्णा तो आज श्रीमत भागवतम के ये साथवे अध्याय से एक महत्वपूर्ण शलोक पर चर्चा कर रहे हैं तो ये जो साथवा अध्याय है इसमें भगवान श्री कृष्णा का प्रवेश श्रीमत भागवतम में पहली बार हो रहा है और शास्त्रो का प्रधान उद्धेश ये है कि हमें इस दुनिया में कार्य कैसे करना ये सिखाना जैसे हम किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर हमें बताता है आपको ऐसे खाना चाहिए, दवाई लेनी चाहिए तो डॉक्टर का प्रधान ज्ञान हमें दे जाता है वह ये कैसे हमें कारए करना चाहए, ताकि हम ठीक हो जाए उसी तरह से जब हम दुनिया में जीते हैं।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
हरे कृष्णा तो आज श्रीमत भागवतम के ये साथवे अध्याय से एक महत्वपूर्ण शलोक पर चर्चा कर रहे हैं तो ये जो साथवा अध्याय है इसमें भगवान श्री कृष्णा का प्रवेश श्रीमत भागवतम में पहली बार हो रहा है और शास्त्रो का प्रधान उद्धेश ये है कि हमें इस दुनिया में कार्य कैसे करना ये सिखाना जैसे हम किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर हमें बताता है आपको ऐसे खाना चाहिए, दवाई लेनी चाहिए तो डॉक्टर का प्रधान ज्ञान हमें दे जाता है वह ये कैसे हमें कारए करना चाहए, ताकि हम ठीक हो जाए उसी तरह से जब हम दुनिया में जीते हैं तो किस तरह से कारए करना है यहवां भगवान बपरम डॉक्टर है वो हमें शास्त्र के माध्यम से बताते हैं।
और इस जगत में कार्य कैसे करना है यह बहुत जटिल है। क्योंंकि क्योंं जटिल है? क्योंंकि एक स्थर पे तो सारे जीव जो है आहार, निद्राभ्य, मैथुन इन कार्यों में लगे रहते हैं।
जो मानाव है, मानाव को यह बुद्धी होती है कि जिससे कि वो इन शारी कारयों से उंचा और कुछ भी कर सकता है। तो जो नैतिक बुद्धी है, वो केवल मानाव हो देती है। क्योंंकि जो जानवर है, वो अपने शरीर के इच्छाएं होते हैं, शरीर के परक्रियाएं होते हैं, उनके नसार ही कारे करते हैं।
तो मानावं को क्योंंकि विवेक बुद्धी है, नैतिक चेतना है, इसलिए यह उचित है यह अनुचित है, यह समझ सकता है, और फिर उसके नसार कारे कर सकते हैं। तो इस अध्याय में बताया जा रहा है कैसे एक आदर्श भक्त जो है, जो अर्जुन, वो कैसे सारे जो पर्याय है, उनका अच्छी तरह से निछोड करके फिर एक उचित कारे चुनते हैं। तो अभी तक जो श्रिमत भागवतम में पांशव भूमी चल रही है, तो पहले अध्याय में जो है प्रार्थनाय आती है, भागवतम के महीमा बतायी गई है, और फिर उसके बाद में कैसे जो रुशीगण होते है, वो शौनकादी रुशीगण जो है, सुत्य वस्वामे को सवाल पूछते है, ये बताये गया है।
उसके बाद में दुसरे अध्याय में प्रधान प्रश्णों का जवाब है, दुसरे अध्याय में जो भगवान सरी कृष्ण सर्व अवतारों के सुरेश्ट है, जो उनके बारे में दश्यमसकंद में बागे बताये जाएगा, वो सब अवतारों के एक जलग दी गई है, और भगवान कृष्ण को सब का स्रोध बताया गया है। और फिर जो शोनकादी रुशीगन है, उनके मन में सवाल होता है, कि अगर ये महान ग्यान है भागवतम का, वो उसका उगम कैसे हुआ? तो उसका ये घ्यान तो सनातन है, और भगवान ने ब्रह्माजी को दिया, पर जो भागवतम ग्रंथ का संकलन जो है, वो चोथे से सट्वे अध्याय में उसका इतिहास बताया गया है।
मायां चिततपाश्रयं तो इसे बताया गया है, वो जब ध्यान में जाते है, ये इसी अध्याय के चोथे, पाँचमे, चाटे, साथवे शलोक में आता है उनका ध्यान, और उस ध्यान में जो दुरिष्टी मिलती है, उसके बारे में बताया गया है. तो फिर जब वे ध्यान में जाते हैं और देखते हैं, कैसे जीवात्मा माया के वश में है, और भगवान माया के परे है, तो जीवात्मा माया के परे कैसे आ सकता है, भगवान के शरन में जाके, तो भगवान यहां पे है, माया यहां पे है, जीवात्मा यहां पे है, जीव भगवान के जो पुत्र है अश्वाथामा, वह कैसे दोड रहा है, और उसको पकड़ने के लिए आर्जुन और कृष्ण उसके पीछे जा रहे हैं. तो ऐसे लगता है कि यह शुरुवात एकाएक हो रही है, उसकी पाश्व मुमी क्या है?
पर हमारे आचारे गन्वें समझाते हैं, कि जो भागवतम है, वह एक स्तर उपर है श्रिमत भगवत गीता के. तो भगवत गीता, श्रिमत भागवतम, और फिर चेतने चरिता अमरत. यह प्रगतीशील गंत है. तो जो भगवत गीता में बताया गया है, कैसे आर्जुन को भकति करनी चाहिए? तो ऐसे बताया गया है कि भगवत गीता में भगवान कौन है, यह बताया गया है. श्रिमत भागवतम में भगवान क्या करते है, यह बताया गया है. और चेतने चरिता अमरत में भगवान कैसे सोचते है, यह बताया गया है. तो यह एक प्रगतीशील वर्णन है. तो जो भगवत गीता का ज्यान अनुशीलन करके, अर्जुन अभी कैसे कारे करते है, यह जलक यहाँ पर दी जा रही है. तो अचारेगन बताते है, क्योंंकि दश्यमसकंद बहुत दूर है. 335 अध्याय हैं श्रिमत भागवतम में, और इन 335 अध्यायों में से 90 अध्याय दश्यमसकंद में से हैं. पर वो 90 अध्याय तक पहुँचने के लिए उसके पहले लगबग 150 अध्याय है, 175 अध्याय लगबग है. तो इसलिए 175 अध्याय बहुत दूर है, इसलिए जो व्यासदेव पहले जो दश्यमसकंद की एक चोटी से जलग दे देता है यहाँ पर. सात्वे अध्याय से पंधरवे अध्याय तक, भागवतम की जो सात्वे अध्याय से पंधरवे अध्याय है, इसमें भगवान कृष्णा और उनके भक्तों के बारे में वरनन है. और इतना वरनन भागवतम में और कहीं भी भगवान कृष्णा के बारे में नहीं है दश्यमसकंद के पहले. अब इसके बाद में जो कृष्णा के बारे में वरनन जो आएगा, वह तीसरे सकंद के दूसरे और तीसरे अध्याय में एक बार आएगा. जहांपे विदूर और उद्धव के सम्माद में भगवान कृष्णी का सम्मर्न हो रहा है. तो यहांपे जैसे कभी कोई मूवी होता है तो उसका पहले ट्रेलर देते हैं. तो वैसे यहांपे पहले जलग दे रहे हैं इन अध्यायों में. तभी क्या हो रहा है?
यहांपे भगवान उसी मुद्रा में है, उसी कार्य में है जो भगवद गीता में थे. वे अपने भक्त के सार्थी बने हुए हैं. और सार्थी बन कर वे अपने भक्त को सहयोग कर रहे हैं, मदद कर रहे हैं. और इस अध्याय का शिर्षक भहती विचार करने योग्य है. प्रवपाजी इस अध्याय को शिर्षक देते थे, कि द्रोण के पुत्र की सजा देना. द्रोण पुत्र का दन्ड. तो अभी द्रोण पुत्र का एक नाम भी है, तो द्रोण पुत्र का नाम क्योंं इस्तमाल नहीं किया गया है? अश्वत्धामा का दन्ड क्योंं नहीं बताया गया है? क्योंंकि अगर वो अश्वत्धामा एक वेक्ति होता, तो उसको दन्ड देना इतना बड़ा मुश्किल नहीं होता. कोई साधारन वेक्ति होता वो तो. उसने सोते हुए वेक्तियों को माल डाला है, तो उसको माल डालना चाहिए. पर क्योंंकि वो द्रोण पुत्र है, इसलिए उसको क्या सजा देनी है, इसके बारे में बड़ा विचार विमश करना पढ़ रहा है. तो जब कोई वेक्ति, वेक्ति कोई जो भी होता है, उसको जो संभंद होते है, वो महत्वपूर्ण है. और जब वेक्ति कोई गलत कारे करता है, ना केवल उसकी बदनामी होती है, वो जिस स्कुल में आ रहा है, जिस परिवार में आ रहा है, और अगर हम भक्त हैं, तो अगर हम कुछ गलत कारे करते हैं, तो हम जिस परंपरा में आ रहे है, उसकी भी बदनामी होती है. तो इसलिए जो अश्वत धामा का नाम न लेते हूँ, यहाँ पर द्रोण पुत्र का दंड यह बताये गए हैं, क्योंंकि वो द्रोण पुत्र था, इसलिए सो कैसे दंड देना है, यह बड़ा मुश्किल था, फैसला करना, और इसलिए ये सारा अध्याय है. और अभी इसके इन स्लोकों के तात पर में विश्वनाच चिकल ठाकुर बताते है, कि भगवान की ये आदत है, कि वे अपने भक्तों की परिक्षा लेते हैं, और परिक्षा कैसे लेते है, भगवान सदुब्देश देते है, सही ज्यान देते है, कि कैसे कारे करना है, और फ कि वो भक्त उनको उनको चुना करना पड़ता है, कि मैं वैसे कारे करना चाहूँ, करूँगा या नहीं, तो वे बताते है, उधार, वो विश्वनाच चिकल ठाकुर सारे भागोतम से उधार लेते हैं, वो कहते है, चोथे स्कंद में, पृतु के सामने जब भगवान आते ह तो ये पृतु महराज की कहानी बहुत रोचक है, कैसे होता है, कि वो एक सो यज्ज करना चाहते है, और उनना अन्वए यदो होने के बाद, उनको इंद्र व्यक्ते कर देते हैं, इंद्र रोग देते हैं, और फिर ब्रह्माजी के नवेदन पर पृतु महराज चोड़ते हम यॅुझ नहीं करेगे और उ्स से प्रसन हो जाते हे वे और जब प्रसन न है नक्योंंबिल वृम्हा जी प्रसन हो जाते भगवान्द स्वहं प्रसन होते थे भोगवान्द महां पहें आ started और जब भगवान महाँ पे आते है तो भगवान पूछते है आप कुछ वर मांगो।
तो वास्तो में अभी हमें 99 यग्य का कुछ ज़्यादा महत्व लगता नहीं है क्योंंकि हम एक भी यग्य नहीं करते हैं। तो अगर हम आजकल के विचा धारा से समझना है तो कोई क्रिकेटर है वो 99 पे नौट आउट है और तभी कैप्टन बोलते है मैं इनिंग्स को डिकलेयर करता हूँ वो कितना गुस्सा हो जायेगा भारत की इतियास में एक बहुत विख्यात क्रिकेटर था वो कुछ 194 के स्कोर पे था और कैप्टन तभी डिकलेयर कर दिया और फिर वो क्रिकेटर इतना क्रोधित हो गया और फिर वो क्रिकेटर और वो कैप्टन उसके बाद में 4 साल तक वो साथमे टीम में थे उनका कभी जमा नहीं तो क्योंं?
क्योंंकि एक ओर से किसी को कोई रेकॉर्ड कर सकता है और वो रेकॉर्ड जब मैं कोई विशेश करने का मौका मिलता है और तभी नहीं करने को दिया जाता है तो बहुत क्रोध आता है तो यहांपे जब पुरुतु महराज को ब्रह्मा जी बोला कि आप यह सववा यग्गे मत करो पर भगवान आ गए है अब भगवान बोले वर मांगो तभी पुरुतु महराज तुरंद वर मांग सकते है मुझे सववा यग्गे करने दो पर वर वो ऐसा नहीं मांगते है और चक्रवर्ति बात क्या बताते है? कि यह जो वर मांग रहा है यह भगवान के परिक्षा ले रहे है और वो बता रहे है कि मेरे भक्त जो है कभी कुछ भौतिक चीज मांगते नहीं है अभी वो समझ गए थे कि ब्रह्माजी जो बोल रहे है ब्रह्माजी भगवान के प्रतिनिदी है तो यह ब्रह्मांड के मैनेजिवन्ट में ब्रह्मांड के संस्थापन में जो अगर शांति बनाय रखनी है तो इंद्र को विच्रित नहीं करना है इसलिए वो क्या वर मांगते है भगवान से?
वो कहते है कि मुझे सदैव आपके भक्तों के संग में रहे कर आपका स्वरण ये वर दे दो ठीक उसी तरह से जो साथवे स्कंद में प्रलाद महराज को प्रसंद कर प्रसंद महराज से प्रसंद होके नरसिम्मदेव आते है तो साथवे स्कंद के नवे अध्याय में प्रलाद महराज प्रार्थना कर रहे है और सुन्दर प्रार्थना है हम जानते है कि और कोई विक्ति कितना भी महान हो उनकी प्रार्थनाओं से भगवान संतुष्ट नहीं होते है पर प्रलाद महराज की पार्थाओं से संतुष्ट होयाते है और फिर दश्वरे अध्याय में साथवे स्कंद के नहीं कुछ मांगो प्रार्थना तो मेरी एक ही इच्छा है भगवान क्या कि मेरे रुदे में आप से कुछ भी मांगने की इच्छा नरहे तो मैं बोलते है कि इस तरह से भगवान भी अलग अलग भक्तों के परिशा लेते है यहां तक कि मैं कहते है कि गोपियों की भी परिशा लेते हैं तो गोपियों की परिशा कही जगव पर होती है तो वो कहते है कि जो दसंसकंद का 46 वा 47 वा अध्याय है तो उसमें क्या होता है उसमें 46 वा अध्याय में उध्धव भगवान का संदेश देके वरंदावन आते है कि वास्तो में मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे विरह महसूस कर रही हो पर तुम मुझसे विरह मुझसे विरह असंभव है क्योंंकि मैं सर्वव्यापी हूँ और मैं सर्वव्यापी हूँ इसलिए मैं सदेव तुम्हारे साथ में हूँ तुम्हारा और मुझसे विरह कभी संभव नहीं है और यह सुनके गोपिया क्या कहती है गोपिया कहती है वो सब ठीक है पर कृष्ण कब आने वाले है वो कृष्ण कब आने वाले है तो यहाँ पर विश्णाश्रो को बताते है कि भगवान देखना चाहते थे कि गोपिया तत्वग्यान से संतुष्ट हो जाती है नहीं तो जब वो देखते है कि वो सब ठीक है भगवान सर्वयापि पर भगवान कब आने वाले है तो यह जब सुनते है वो तो भगवान बहुत प्रसंद हो जाते है क्योंंकि यह एक तत्वग्यान के स्थरपे समझना भगवान सर्वयापि अच्छा उच्छा साक्षातकार है पर उससे उच्छा भगवान का विक्तिकत रूप में संग प्राप्त करना है और जो गोपिया वह संग की उत्कंठा वेक्त करती है तो उससे भगवान बहुत प्रसंद हो जाते है तो इस तरह से भगवान अपने भक्तों के परिशा लेते है देखने के लिए कि भक्तों की भक्ति कितनी शुद्ध है तो कितनी शुद्ध है तो गोपियों की भक्ति शुद्ध ही थी भगवान के अलाग कुछ नहीं चाहते थी पर वह यहां तक की भगवान का परमात्मा के रूप में या भगवान का सरव्यापी ब्रह्मा के रूप में भगवान का व्यक्तिगत भगवान स्री कृष्ण के रूप में ही हमें संग चाहिए फिर चक्रवर्ती बात बताते है इसी तरह से भगवान के भक्त भी दूसरे भक्तों की परिक्षा लेते हैं जो गुरू होते है वो शीष्य की परिक्षा लेते हैं वह कहते है इसका आउधाराण है कि परिक्षित महाराज की परिक्षा शुक्दियेव गोस्वामी लेते हैं तो दो जगह पे है चटे सकंद में एक बार है और बारावे सकंद में है चटे सकंद में पाचवे सकंद के अंत में नरक लोगों का वरन है और उसके बाद में चटे सकंद की शुरुवात में परिक्षित महाराज पूछते है ये नरक लोगों से लोग कैसे बचके निकल सकते हैं तो तभी परिक्षित महाराज की सवाल के जवाब में शुरुव देव गोस्वामी कहते है कि अगर व्यक्ति प्रायश्चित कर लेगा तो फिर उस से वो पापों के प्रतिक्रियां से मुक्त हो सकता है तो यह एक खेल प्राथमिक उत्तर है और यह महतों पुर्ण उत्तर है पर यह प्राथमिक उत्तर है तो परिक्षित महाराज की सवाल कहते है यह सब ठीक है पर प्रायश्चित भी करता है व्यक्ति तो भी क्या होता है वो पाप का फल से छूड जाएगा पर वो पाप करने की व्यक्ति पुना रहेगी तो इसलिए यह कोई उचित नहीं है यह हाथी के नहाने के समान है और पुछे आप और उंचा क्या है यह बताओ असली जवाब क्या है बताओ और फिर यहां देखे जो होता है तो उसके बाद में बताये जाता है कैसे के चित के बलया भक्त्या वासुदेव परायणा अगं धुन्वन्तिकात स्नेन निहारमिवभासकरः तभी इशुगदेव उसमें बताते है कि केवल भक्ति के माध्यम से सारे पापों का नाश विजगता है और कैसे उधान लेते हैं जैसे कोहरा होता है धन्डी के समय कोहरा होता है तो हम उसको हाथों से पीट के चीक के चिला के नहीं निकाल सकते हैं पर जब सूर्य उग जाता है तो तुरण निकल जाता है सारे पाप और पाप करने की प्रवर्त्ति सब जब भक्ति का उगम हो जाता है भक्ति एक सूर्य के समान है सूर्य उग जाता है कोहरा चला जाता है उसे तरह से भक्ति आ जाती है रुदे में तो सारे पाप चला जाता है और यहां पे वो क्या परिक्षा लेता है शास्त्रों में वास्तव में तीन परकार के मारग बता है कर्म का मारग है, ज्यान का मारग है, और भक्ति का मारग है तो यहां पे पहले कर्म का मारग बता के परिक्षित महराज की कितनी भक्ति है इसकी जाच शुक्देव वस्वामि कर रहे है और बारवे सकंद में जब सारा भागवतम खतम हो जाता है तभी परिक्षित महराज की भक्ति में कितनी श्रद्धा है यह जाचने के लिए अन्त में जो चोथा और पाछवा अध्याय है बारवे सकंद का उसमें आत्मा का घ्यान देते है परिक्षित तुम समझ लो यह तक्षक आके तुमें काटेगा भी तो वास्तो में तुम शरीर नहीं हो तुम आत्मा हो और आत्मा ब्रह्मा वास्तो में आत्मा ब्रह्मा का ही आत्मा ब्रह्मा एक तरह से समान है तो तुम इस ब्रह्मा पर चिंतन करके यह शरीर की आत्माओं के परे चले जाओ और जो हम घ्यान श्रीमत भगवद घिता के दूसरे अध्याय में देखते है कि आप शरीर नहीं हो आत्मा हो वो वहाँ पर बता रहे है परिक्षित महराज को शुक्देव गोस्वामी तो हम सोचे कि अभी दशम सकन में भगवान की लीलाय हो गई रास लीला हो गई उसके बाद में देहिनोसमिन यता देहें क्योंं बोलने की जरूरत है उसके बाद में आत्मा घ्यान या ब्रह्मा घ्यान देने की जरूरत क्या है पर जरूरत क्या है वो देख रहे है कि परिख्षित महाराज की भकति के बारे में समझ और शद्धा कितनी अच्छित हो गई है और उसके बाद में जो पाछवे अध्याय में भारवे सिकन्द के परिख्षित महाराज का जो की प्रतिक्रिया है वो बड़ी आदर्श है वो परिख्षित महाराज वास्तो में शिष्य कभी अपने गुरू को डाट नहीं सकते है पर शिष्य जहांप क्या है परिख्षित महाराज शुक्देव गोसमामे से आत्म ग्यान सुनके खेद विवक्त करते है बोलते है यह आत्म ग्यान आपने जो ग्यान दिया है इसके पहले जो ग्यान दिया है उससे मैं पूर्ण तया कृतक्य हो गया हूँ उससे मैं अभी मैं भगवान के स्वर्ण में लग जाओंगा भक्ति का आश्टे डे लूंगा और यह आत्म ग्यान की मुझे कोई जुरूरत नहीं है वो समझ गया है तो इस तरह से भक्तों की जब भगवान परिख्षा ले रहे हैं तो उनकी भक्ति कितनी शुद्ध है यह परिख्षा है जब परिख्षित महाराज की परिख्षा ले रहे हैं तो उनकी भक्ति की समझ कितनी उचित है कि भक्ति की सरवस्रेष्टता जो है वो समझ गया है कि नहीं वो कर्मा और ग्यान की तुलिना के द्वारा बताय जा रहा है तो उसी तरह से चक्रवर्ति पाद बता रहे है कि इस अध्याय में जो भागवतम की शुरुवात है उसी में भगवान अपने भक्तक अर्जुन है उनके भक्ति के समझ के उनके धर्मा के सूक्ष्म सद्धान के समझ की परिक्षा ले रहे है और परिक्षा कैसे ले रहे है ये परिक्षा ले रहे है ये द्रोपदी के रुदए में ये अश्वत्थामा के परती न केवल सहानु भूती पर आदर उत्पन्न करके वभाव प्रवर्त करके तो वही द्रोपदी बड़ी जो इसी अध्याय के शुरुआत में आता है कि बड़ी क्रोधित हो गई थी और वो कह रहे थी उसने बाल लिले कर दिया वो कहने लगे कि जब तक मेरे पुत्रों के हत्यारे को तुम यहां पे नहीं लेके आओंगे तब तक मैं शांती से नहीं बैठोगे वही द्रोपदी जब अश्वाथमा को देखती है तो फिर उसका जो भाव है पूर्ण परिवर्त जाती है और कई कारण बताती है कि सबसे पहले वह बताती है कि वास्तों में यह ब्रामण है और ब्रामण सदा हमारे आदर के पात्र है और वह कहते है न केवली कोई साधारन ब्रामण है यह जो ब्रामण है वह तुमारे गुरू का पुत्र है और चक्रवर्ति पात् तात्परी मताते है कि तुमारे गुरू का पुत्र है यह पताने का मरमा क्या है कि अभी तुम बड़े शक्ति और गौरों के साथ तुमने अश्वत्थामा को बांद के यहां पे ले आये हो पर यह अश्वत्थामा को बांद कर ले आने की शक्ति तुम्हे इसी के पिता से मिली है तो यह भाव है कि तुम यह तुमारे गुरू है बोलने का कि तुम अपने शक्ति से अश्वत्थामा को नहीं ले आये हो तुम्हे जो शक्ति थी जो सामर्थ है थे धनूर विद्या का वो तुमारे गुरू से मिला है तो तुम्हारे गुरू से जो सामर्थ मिला है वो तुम क्या उसी गुरू के पुतर के खिलाँफ इस्तमाल करोगे और फिर तो सबसे पहले बताते है कि तो जो द्रोपदी के जो अपजेक्शन्स है वो जो कहता क्योंं हमें ऐसे नहीं करना चाहिए अलग-अलग कारण है तो पहले बताते है कि ब्राम्मन सदा हमारे आदर के पातर है फिर बताते है कि यह साधारन ब्राम्मन नहीं वास्तब में मारे गुरू के पुतर है और फिर बताते है कैसे यह जो ब्राम्मन है यह अभी इसकी मा मा विद्वा हो गई है और अगर पुतर भी नहीं रहेगा तो वह असहाय हो जाएगी पुरुद्धर से और फिर अभी ऐसी शलोक आज की शलोक में बता रहे है कि जो महान कुल है उसके परती हमें सदाइबा आदर रखना चाहिए अगले शलोक में बता रहे है कि वास्तो में अगर हम ऐसा आदर नहीं रखेगे तो उसकी परती करिया बड़ी भीशन होगी और उस परती करिया से हम सबका नाश हो जाएगा तो इस तरह से अलग-अलग कारण बता के द्रोपदी कह रही है कि हमें इसका वद नहीं करना चाहिए और पर इसके बाद में आप द्रोपदी के वचन सुनके बागी सब मान जाते हैं पर भीम नहीं मानते है भीम कहते है इसने तो ये केवल लाम का ब्राम्मन है ब्राम्मन जैसे कारे इसने कदापी नहीं किया है तो भीम जो है थोड़े ख्रोधी पर उत्त के वक्ती है तो वास्तो में भीम यहां तक कहते है कि वास्तो में द्रोण भी ब्राम्मन नहीं है वो कहते है जो ब्राम्मन होता है तो भीम क्रोध हो जाते है यहां पर कहते है कि नहीं तो कहते है कि हम इसका वद नहीं करना चाहिए और फिर भगवान अर्जुन की ओर देखते है कहते है कि आप अभी दोनों को सन्तुष्ट करो कि एक तरह से द्रोपदी है और द्रोपदी की वच्चिनों से युधिष्ठी, नकुल, सहधे, साथ्यकी सब मान जाते है कि हाँ इसका वद नहीं करना चाहिए भीम कहता है वध करना चाहिए और फिर जब अर्जुन की सामने वो समस्या आती है तो अर्जुन क्या करते है?
उच्छित उसका हल निकालते है वो कहते है कि हमें इसके शरीर का वद नहीं करना चाहिए इसके शरीर का वद नहीं करना चाहिए इसलिए क्या करना चाहिए? पर इसको जो गलतकारे की है उसका दन तो दरूर देना चाहिए इसलिए वो क्या करते है? हम जानते हैं उसका जो मनी है जिससे शक्ति मिल रहे है वो मनी निकाल देते है और फिर उसके जो बाल है काट देते है और फिर उसको चले जाने को बोल देते है और फिर भगवान भी उसको बोल देते है कि तुम अभी तुमारे पस कोई शक्ति नहीं रहेगी और फिर वो चले जाता है तो यहाँ पे जो महत्वपूर्ण भाव यह बात यह है कि जो उचित कार्य कैसे करना है उसके लिए बहुत सोच विचार करना पड़ता है और सोच विचार करके उचित कार्य करना यह रजोगुण या तमोगुण में संभाव नहीं है सत्वगुण में आता है तब ही संभाव होता है रजोगुण में जैसे वासनाया आजाएगे वैसे ही व्यक्ति कारे करने लगता है हमारे जीवन में कई बारे से समस्यां आती है कोई व्यक्ति कुछ कर बोल देता है तो तब मुझे क्या करना चाहिए हमारे जीवन में कैसे कारे करना है इसके लिए शास्त्र हमें मार्गदर्शन देते पर मार्गदर्शन कैसे है वो मार्गदर्शन एक आदर्श दिखाते है और अदर्श के अनुसार हमें हमारे जीवन में उचार करके फिर वो हमारे जीवन में उतारना है तो ऐसा कोई फॉर्मिला नहीं है ऐसा कोई सूत्र नहीं है कि हमें ऐसा ही कारे करना चाहिए ऐसा ही कारे करना चाहिए ऐसा ही कारना करना चाहिए अलग अलग समय पे यो परिस्थिती होती है उसके अनुसार हमें देखना होता है कि भगवान की सेवा सबसे उचित पढ़धती से कैसे कीजा सकती है और उसके अनुसार हमें कारे करना होता है हम प्रभुपा जी के जीवन में देखते हैं कि प्रभुपा जी ने अलग अलग जगह पे अलग अलग तरह से कारे किया जैसे भारत में जो वैदिक संस्कृति अभी काफी हद तक है कुछ हद तक तो है और खास करके जोहाँ पे भी धार्मिक कारे होते हैं वहाँ पे ब्रामण अपनी बात अपना जोर बहुत लगाते हैं कि आ ये उचित नहीं कर रहे है ये उचित नहीं कर रहे है ये ऐसे नही तो इसलिए हम देखते हैं कि प्रवापाद जी जब बाश्चात देशों में उन्हें जब विग्रहों की स्थापना की तो वहाँ पे उन्हें देखा कि जो सब पुरुष हो स्तृरी हो सब उत्साही है कि बगवान की भक्ति करने के लिए तो उन्हें कहा कि जो माताय है वो पर जब भारत में संस्कृतिक रूप से कैसे है कि जो पुजारी होते हैं साधार विग्रहों की पूजा करते हैं वो केवल पुरुष करते हैं तो जब प्रवापाद जी भारत में आयें तो उन्हें कहा कि हमें यहां के लोगों ज़्यादा विचलित नहीं करना है और भक्ति सांस्राकूर ने भी वही किया भक्ति सांस्राकूर बड़े जोर से कहते थे कि जो वैश्णव होता है वास्तव में जनम से नहीं होता है गुण से होता है पर जो स्मार्थ ब्रामभन थे वायापूर में तो वो कहते थे कि नहीं जो वैश्णव है वो केवल जनम से ही होता है और बाकी अगर कोई वो हरिनाम जब कर सकते पर वो वास्तव में वैश्णव नहीं है और वो कभी ब्रामभन नहीं बन सकते ब्रामभन केवल जनम से होता है ब्रामभन दिक्षा से नहीं होता है तो बक्तिसान चाकुर ने ब्रामभन दिक्षा भी बहुत लोगों को दी पर फिर भी जब वे मायापूर में विग्रहों की पूजा हो रही थी तो उन्होंने कहा कि यहां पे हमें मायापूर के बक्त है वो भी एक प्रकर से बक्त है उनकी कुछ धारणा थोड़े अनुचित होगी तो उनके मन को विश्णत करने की जुरूत नहीं है इसलिए उन्होंने कहा कि वहां पे मायापूर में जो हमारे मंदेर में पूजा होगी वह जो ऐसे ब्राम्मण हैं जो ब्राम्मण वैश्णाव जो ब्राम्मण कुल में जन्म है वो ही उनकी पूजा करेंगे बाकी सब भारत के मंदेरों में उन्होंने कहा कि आप साब वक्त पूजा कर सकते हैं विग्रोह के तो क्या है दबुद्धिभेदं जनयेद अज्ञानां कर्मसंगिनां जोशेयेद सर्वकर्माणी विद्ध्वान युक्त समाचरन रादा गोकलान भगवान की चार तो नबुद्धिभेदं जनयेद लोके मन को विच्रित नहीं करना चाहिए तो मैं यहाँ पे उधारन देया था कि प्रभुपार जी भी वो एकी सिध्धान थे कि सबको भगवान की भक्ति का मौका देना है तो यहाँ पे कहेंगे कि नहीं वो मायापूर में जो ब्रामण जन्मन नहीं किया है उनको भक्ति का मौका क्योंं न दिया जाए उनको भगवान की विग्रहों की पूजा का मौका क्योंं न दिया चाहिए नहीं उनको मौका देना चाहिए पर उससे क्या होगा अगर ऐसा करेगे तो बाकी जो लोग है तथाकति को प्रामण मानते हैं वो इतने विच्चत हो जाएगे कि वो भगवान और भगवान के भक्तों के परती अपराद करेगे और उससे उनके भक्ति का मौका चला जाएगा तो फिर किसको भक्ति का मौका देना है यह आचारेगन अपने देश काल पात्र के नुसार फैसला करते हैं तो हमें इतने बड़े फैसले करने नहीं होते हैं पर हमारे जीवन में हमें भी कई बार फैसला करना होता है कि अभी ऐसी परिस्थिति आ गए इसमें कैसे कारे करूं मैं यह व्यक्ति ऐसा बरताव कर रहा है तो इसका कोई फार्मिला नहीं है पर शास्त्रों में आदर्श है और आदर्श से प्रेर्णा लेके फिर हम भगवान से प्रार्थना करके भगवान का और भगवान के भक्तों का मारग देशन लेके फिर हम फैसला कर सकते हैं तो एक अंतिक मुधारण के साथ मैं अंत करूंगा कि वास्तव में भगवान परिक्षिया क्योंं लेते हैं कभी कभी परिक्षिया अलग अलग प्रकार से होते हैं कभी कभी हारे मन में अलग अलग प्रकार से परलोबना आते हैं ये जो परिक्षा मैं उधारण दे रहा हूँ इसमें कोई भी कारे अनैतिक नहीं था सब अभी कर्मकारण भी उचित कारे हैं और यहां पे अश्वत्थामा को अगर सजा भी दी जाती है तो वो अनुचित नहीं है पर परिक्षा क्या थी कि अलग अलग प्रकार के धार्मिक कारे है उन में से सरवोच्य धार्मिक कारे कौन सा है सबसे उचित, सबसे उत्कुष्य धार्मिक कारे कौन सा है तो हमारी जीवन में कभी कैसे परलोबन आता है कोई एक कारे उचित है, दूसरा कारे अनुचित है काम, क्रोध, लोब, ये सब हमें मोहित कर लेते हैं तो उस समय भी है, जैसे मोहा होता है हमको जब परलोबित हो जाता है, तो वो भी एक परकार के परिक्षा है और उस परिक्षा से निकलने के लिए हमें भगवान का आश्रेगरहन करना पड़ता है पर वो परिक्षा क्योंं आती है?
वास्तव में, एक तरह से देखे गए तो हमारे मन में काम, वास्ना आती है, क्रोध आता है, लोब आता है वो भी एक तरह से भगवान की योजना से ही आ रहा है जो हम कुछ चित्र देख लेते है, कोई व्यक्ति कुछ बोलता है, उससे कुछ देख लेते है वो भी भगवान की इच्छा से ही हो रहा है एक तरह से तो क्या भगवान हमें प्रलोबित करके हमारा पतन करना चाहते है? नहीं, पर जो परीक्षा है, उससे हम उच्छे स्थर पर भोगते हैं जिससे कि अगर कोई विद्यार्थी है, वो परीक्षा दे रहा है तो परीक्षा कभी-कभी अलग-अलग परकार परीक्षा होती है, तो कभी-कभी एक लंबा उत्तर लिखना होता है और कभी-कभी कई परियाय होते है, उनमें से एक उचित परियाय चुनना होता है तो अभी पाँच परियाय है, उनमें से चार परियाय गलत है, एक परियाय सही है तो अभी अगर विद्यार्थी कोई परियाय अपने आप चुन लेता है बिना पढ़ाई किये, बिना विचार किये, तो क्या होगा?
अधिकांश रूप से उसके उत्तर गलत आजाएगे और जब गलत उत्तर आएगे, तो फिर क्या होगा? वो कहेगा, कि जब उसको फेल हो गया, तो टीचर कहे, तुम फेल हो गया होगा? और तुमने ही वहाँ पर गलत पढ़ाई रखे थे, तो तुमने जो पढ़ाई रखे थे, वही चुने मैंने. तो क्या ये तरक उचित होगा?
टीचर कहके, हाँ, मैंने ही पढ़ाई रखे थे, पर वो पढ़ाई रखने के पहले, मैंने तुमको सिखाया भी था, तुमने ध्यान क्योंं नहीं दिया, जब मैंने पढ़ाई दी थो? तो दुतराश्टर यही बोलता है, दुतराश्टर क्या बोलता है? जब युद्धा आता है, और उसको बतायाते हैं विदुर, कि अगर तुम्ही युद्धा को नहीं रोकोगे, तो सारे कुरुवंश का विनाश हो जाएगा. तो दुतराश्टर क्या कहते है, अगर ये नियती की इच्छा है, कि कुरुवंश का विनाश हो जाएगे, तो मैं तो एक छोटा सा जीव हूँ, मैं कौन हो नियत को रोकने वाला. तो तभी विदुर क्या कहते है, हे दुतराश्टर, नियती हमारे कर्म के फल को चुनती है, हमारे कर्म को नहीं चुनती है. नियती हमारे कर्म के फल को चुनती है, कर्म को नहीं चुनती है. मतलब विद्यारती पढ़ाई करने के बाद भी कभी कभी मार्क्स नहीं मिलते हैं. कभी कभी जो एक्जामिनर होता है, वो एक्जामिनर उसके पत्नी से जगडा करके फिर पेपर चेक करने को बैठ जाता है, तो कम मार्क दे देता है. तो यहाँ कर्म का फल है. पर अगर वो विद्यारती पढ़ाई नहीं करता है, और बोलता है क्या है, नियती थी मेरा फेल होना, वो नियती नहीं थी, तुम्हारी मूर्खता थी. तो उसी तरह से जो टीचर अलग-अलग परियाए देते हैं, वो क्योंं देते हैं?
वो परियाए इसलिए देते हैं कि वो विद्यारती अच्छिदर से पढ़ाई करें. कभी-कभी हमारे वन में काम आ जाता है, क्रोध आ जाता है, लोब आ जाता है, तो हमें यह नहीं सोचा है कि भगवान की इच्छा है कि मैं पतित हो जाओंगु. भगवान नहीं परलोबन भेजे है, नहीं, भगवान ने परलोबन भेजे है कि उसके पहले हमें घ्यान भेजा है भगवान ने, और घ्यान के दारा भगवान हमारी परिशा कर रहे है कि हम क्या चुनेगे? और अगर हम सही परियाय चुनते हैं तो उसके दारा हम प्रगती करके भकती में अग्रशील होते हैं. तो सारांश में हमने आज चर्चा की कैसे?
कि ये ग्रंथरा श्रिमत भागवतम में ये अध्याय में डश्वंसकंत का एक जलग दिया जा रहा है. और फिर खास करके इस अध्याय का भाव क्या है? कि कैसे भगवान परिक्षा लेते हैं? गुरू शिष्य की परिक्षा लेते हैं?
तो इसके लिए हमने पुर्थो महाराज, परलहात महाराज, गोपियो का उधारन देखा. और फिर शुक्देगो स्वामी, परिक्षित महाराज का कर्मा और ग्यान के संबन उधारन देखा. और फिर यहां पर अर्जुन कैसे इस समस्या का निवारण करते हैं?