The mind is a monkey, don’t let it make you a donkey – Hindi
[Prerana youth meeting at Nigdi, India]
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Lecture Summary
यह प्रवचन मानव मन की प्रकृति, उसकी चंचलता और उसे नियंत्रित करने के व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक उपायों पर गहराई से चर्चा करता है। पूरे प्रवचन के मुख्य बिंदुओं का सारांश नीचे दिया गया है:
1. मन की प्रकृति: बंदर और टीवी का उदाहरण
- खिड़की से टीवी बनना: सामान्य स्थिति में मन को एक ‘खिड़की’ की तरह काम करना चाहिए जिससे हमारी आत्मा बाहरी दुनिया को देख सके। लेकिन मन अक्सर अचानक एक ‘टीवी’ बन जाता है, जहाँ वह अपनी ही कल्पनाएं, पुरानी यादें और भ्रांतियां दिखाने लगता है, और हम असलियत से कट जाते हैं।
- बंदर जैसी चंचलता: जिस तरह बंदर एक जगह टिक नहीं सकता, वैसे ही हमारा मन हमेशा नई चीज़ों (जैसे टीवी चैनल या इंटरनेट सर्फिंग) की तलाश में एक विचार से दूसरे विचार पर कूदता रहता है। मन हमेशा कल्पना करता है कि अगली चीज़ में ज़्यादा सुख मिलेगा, पर वह सुख क्षणिक होता है।
2. मन जब हमें ‘गधा’ और ‘गुलाम’ बना देता है
- व्यसन (Addiction) का जाल: जब मन किसी एक चीज़ (जैसे शराब या कोई बुरी आदत) से आसक्त हो जाता है, तो वह व्यक्ति को गधे की तरह अपना गुलाम बना लेता है। मन की लालसा पूरी करने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक जा सकता है, यहाँ तक कि वह खतरनाक अपराध भी कर सकता है।
- रिज़ेंटमेंट (Resentment): अतीत की कमियों या घटनाओं को स्वीकार न कर पाना और हमेशा असंतुष्ट रहना (जैसे- “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”) हारी हुई लड़ाई को फिर से लड़ने के समान है। यह ज़िद्दीपन व्यक्ति की सारी मानसिक ऊर्जा नष्ट कर देता है।
3. मन को नियंत्रित करने के तीन अचूक उपाय
मन रूपी बंदर को शांत करने के लिए तीन मुख्य बातें आवश्यक हैं:
- दृढ़ संकल्प (Intention): सबसे पहले यह स्वीकार करना और इच्छा होना कि “मुझे अपने मन को अनुशासित करना है और बदलाव लाना है।”
- सतर्क बुद्धि (Alert Intelligence): सत्संग और भगवद-गीता जैसे शास्त्रों के अध्ययन से बुद्धि को इतना तेज़ करना कि जब भी मन हमें भटकाए (टीवी बने), तो हम तुरंत सतर्क हो जाएं।
- सकारात्मक प्रवृत्तियां (Positive Habits): खाली समय में मन हमेशा अपनी पुरानी आदतों (ऑटो-कम्प्लीट) की तरफ भागता है। छोटी-छोटी सकारात्मक आदतें डालकर मन की इस सेटिंग को बदला जा सकता है।
4. भक्ति का ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ (Multiplier Effect)
- दुनिया के अन्य उपाय (जैसे मनोविज्ञान) मन को कुछ समय के लिए शांत (Painkiller की तरह) कर सकते हैं, लेकिन भगवान की भक्ति मन को जड़ से ‘शुद्ध’ (Medicine की तरह) करती है।
- भगवान परम शुद्ध हैं। जब हम अपना ध्यान भगवान या आध्यात्मिक कार्यों में लगाते हैं, तो उनकी शक्ति से हमारे मन का ‘सॉफ्टवेयर’ बहुत तेज़ी से बदलता है। इसे मल्टीप्लायर इफेक्ट कहा गया है, जिससे अवसाद (Depression) जैसी गंभीर स्थितियों से भी बाहर निकला जा सकता है।
5. प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A) के प्रमुख सूत्र
- छोटे और स्पष्ट लक्ष्य (Finite Goals): जीवन भर के बड़े संकल्प लेने के बजाय छोटे समय (जैसे एक महीना) और छोटे कार्यों (जैसे रोज़ 6 मिनट पढ़ना) का संकल्प लें। इससे निरंतरता (Consistency) और आत्मविश्वास बढ़ता है।
- भोजन का प्रभाव: हम जैसा अन्न खाते हैं, उसका हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मांसाहार में जानवर की मृत्यु का भय और क्रोध (वाइब्रेशन्स) होता है, जो हमारे मन को अस्थिर करता है। सात्विक भोजन मन को शांत रखने में मदद करता है।
- भावनाओं का इंतज़ार न करें: कोई भी अच्छी आदत शुरू करने के लिए ‘प्रेरणा’ या ‘अच्छी भावना’ का इंतज़ार न करें। पहले कार्य शुरू करें (समर्पण), भावनाएं धीरे-धीरे अपने आप आ जाएंगी।
Full Transcriptions
मन: एक बंदर जो हमें गधा बना देता है
हरे कृष्णा। आप सबका आज के इस कार्यक्रम में स्वागत है। आज मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि किस तरह से मन एक बंदर के समान है और वह हमें एक गधा बना लेता है। वह मन है और मन हमारे भीतर बैठा हुआ है। तो मन एक बंदर रूपी हमको गधा बना सकता है।
तो मैं इस प्रवचन की शुरुआत एक प्रसंग से करूँगा। मैं जब लगभग 10-11 साल का था, तभी मुझे एस्ट्रोनॉमी (Astronomy) में काफी रुचि थी। तो मेरा कुछ टेलीस्कोप था और टेलीस्कोप से मैं हमारे घर के टेरेस में जाके तारों को देखा करता था। और उस समय ग्रहण होने वाला था। तो ग्रहण का बहुत उत्साह था। मैं और मेरे कुछ और मित्र थे जिनकी इसमें वैसे ही रुचि थी। तो हम सब उसकी अपेक्षा कर रहे थे।
और जब वो ग्रहण का समय आ गया था, हमने सारे टेलीस्कोप लगाए थे, तैयार कर रहे थे। और फिर मैं देख रहा था। और तभी जब मैं देख रहा था, बड़े उत्कंठा से इंतज़ार कर रहा था, पर तभी मन में कुछ विचार आ गया। और फिर बाद में, मेरा मित्र बोला, “कितना सुन्दर था वो।” और तब मैंने देखा, कि वो ग्रहण खत्म हो रहा था। और फिर तभी, एक तो गुस्सा आ गया कि कैसे मेरा ध्यान चला गया, और मैंने इस ग्रहण को देखा नहीं।
पर उसके बाद में, मेरे मन में विचार आया, कि वो बाहर इतना आकर्षक सुन्दर ग्रहण है, जिसमें मुझे भी रुचि है देखने में। पर ये अंदर, मन में ये क्या शक्ति है, कि हमारे विचार हमको इस तरह से खींच सकते हैं, कि बाहर जो भी आकर्षक है, वो भी हमको दिखता नहीं है। तो ये मन वास्तव में है क्या, और ये कैसे कार्य करता है, कैसे हमारी चेतना को ये खींच लेता है? तो तब से वो सवाल मेरे मन में आते थे, और मैं मन को समझने का प्रयास करता था।
मन वास्तव में क्या है?
अभी जो मन है, उसके बारे में हम दो प्रधान रूप से गुण देखेंगे—कैसे वो बंदर के समान चंचल है, और कैसे वो हमको किसी एक चीज़ के पीछे लगा देता है, तो गधे जैसा काम करने लगा देता है।
तो अब सबसे पहले, मन वास्तव में है क्या? अभी अलग-अलग लोगों की अलग-अलग परिभाषा है मन के बारे में। जैसे बता रहे थे परिचय में, मैं भी कुछ समय पहले स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में लेक्चर दे रहा था, तो तभी वहाँ पर ‘लोगोस’ (Logos) का अर्थ किसी को पता है? ‘लॉजी’ (Logy) जब भी आता है, उसका अर्थ होता है अभ्यास, उस विषय का अभ्यास। साइकी (Psyche) मतलब क्या है? मन। तो विषय का अभ्यास, मन का अभ्यास।
पर जैसे विज्ञान का प्रभाव और बढ़ने लग गया, लोग किताब देखते रह जाते हैं, पर उनका ध्यान कहीं और होता है। कोई दूसरा आकर बोलता है, “आपने किताब उल्टा पकड़ा हुआ है।” तो क्या होता है? मतलब, जो मन है, हमारी आँखें यहाँ पे हैं, वो चीज़ यहाँ पे है, पर हम जो देखते हैं, केवल हमारी आँखों से नहीं देखते हैं, हमारा मन वहाँ पे होना चाहिए।
तो मन यह क्या है? यहाँ, अगर विज्ञानी दृष्टिकोण से देखेंगे, तो अलग-अलग थ्योरीज़ (Theories) हैं उसकी। पर उसको एक स्पष्ट रूप से समझने का कोई आधार नहीं है, क्योंकि विज्ञान जो देखता है, उन चीज़ों से शुरुआत करता है, और फिर मन दिखता नहीं है उनको।
मानव व्यक्तित्व: शरीर, मन और आत्मा
तो जो भगवद-गीता है, वो एक आध्यात्मिक ग्रंथ है, वो हमको बताता है कि मन वास्तव में क्या है। और भगवद-गीता का जो मॉडल है, हमारे Human Personality का, मानव के व्यक्तित्व का, वह हमें अच्छी तरह से, खुद कैसे जीना है, ये समझा सकता है। भगवद-गीता कहता है कि हमारा जो अस्तित्व है, तीन स्तर पे है: शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक।
आत्मा, मन, और शरीर—ये तीन चीज़ें, इन सबको मिलके अभी हम बनते हैं। और इसके उदाहरण के लिए हम कह सकते हैं, एक कंप्यूटर है। कंप्यूटर में जो है, एक हार्डवेयर होता है, सॉफ्टवेयर होता है, और यूज़र होता है। तो जो हार्डवेयर है, वो किसके समान है? शरीर के समान। सॉफ्टवेयर? मन के समान। और जो आत्मा है, वो? यूज़र के समान, यस (Yes)।
तो अभी क्या है? जब हम खुद को समझते हैं, तो सिर्फ ‘मैं आत्मा हूँ’, ये समझना ही ज़रूरी नहीं है—वो समझना तो ज़रूरी है, पर उसके साथ-साथ, आत्मा किस तरह से शरीर में अभी नियुक्त हुई है, वो समझना भी ज़रूरी है।
आँखों से देखने के लिए मन की आवश्यकता
तो मैं बता रहा था, मैं उस दिन ग्रहण देखने का प्रयास कर रहा था। तो तभी क्या हुआ था? मेरी आँखें यहाँ थीं, वो ग्रहण वहाँ था, पर वो दिखा नहीं। क्योंकि क्या हुआ? जब हम देखते हैं, तो तीन चीज़ें साथ में आनी चाहिए—जो हैं आत्मा, मन और आँखें। ये तीन जब साथ में आती हैं, तो ही बाहर की चीज़ हमको दिखती है।
आँखें बंद होंगी, तो बाहर की चीज़ें क्या हैं, दिखेंगी नहीं। अगर व्यक्ति की मृत्यु हो गई है, अगर आत्मा नहीं है, तो आँखें खुली भी होंगी, तो कुछ देख नहीं रहा होगा। तो आत्मा चाहिए, आँखें भी चाहिए, पर उसके साथ-साथ क्या है? मन भी चाहिए। अगर मन वहाँ पर नहीं है, मन कहीं और भटक रहा है, तो क्या होगा? हाँ, वो हमारी आँखों से रोशनी जो आएगी, वो किरण आएगी, वो जानकारी आएगी, पर हम तक पहुँचेगी नहीं। तो इसका मतलब मन क्या है? ये मन अंदर एक सॉफ्टवेयर के समान है।
मन: एक खिड़की या टीवी?
और कैसे है, ये मन दो पद्धति से कार्य करता है। मैं अमेरिका में, कैलिफोर्निया में था, एक भक्त के घर में। बड़ा घर था, और वहाँ पर हम बात कर रहे थे। तो उनका घर था, बाजू में एक खिड़की थी। बाजू में ऐसे कांच का, जहाँ से रोशनी आती है, कुछ बड़ा था वो।
वो क्या था? मुझे समझ में आता, पहले लगा खिड़की है वो। और वो खिड़की लग रहा था, क्योंकि बाहर जो अच्छी ग्रीनरी थी, कुछ झाड़ियां थीं, कुछ आसमान था। मैं उनसे बात कर रहा था, और अचानक मैंने देखा, कि वो खिड़की से, एक बड़ा गोरिल्ला आ रहा था! और तेज़ी से आ रहा था। शायद आपने ‘प्लैनेट ऑफ द एप्स’ (Planet of the Apes) जैसी कोई मूवी देखी होगी, वैसा बड़ा गोरिल्ला था। और वो तेज़ी से आ रहा था, जो एप (Ape) था, उसी तरह से आ रहा था।
और फिर आके उसने अपने हाथ उठा लिए, और जोर से वो कांच को तोड़ के अंदर आ रहा था। तो वो देखा तो मैं सहम गया। फिर मैंने अपने मित्र को देखा, और वो थोड़ा हँस रहा था। क्या हुआ? फिर मैंने वापस देखा, उसके हाथ में कुछ था। और हाथ में क्या था देखा, तो हाथ में रिमोट था। और फिर रिमोट दबाया, और वो जो गोरिल्ला गायब हो गया!
क्या हुआ? मैंने उससे पूछा, तो क्या था? वो जो उन्होंने खिड़की इस तरह से बनाई है, कि वो एक समय खिड़की के रूप में कार्य करेगी, और दूसरे समय वो टीवी के रूप में कार्य करेगी। और एक बटन दबाएँगे, तो फिर क्या है? उन्होंने एक एनिमेटेड मूवी लगा दी थी, जिसमें वो गोरिल्ला आ जाता है। और अभी उनको पता था कि ये सिर्फ टीवी पर दिख रहा है, पर जिसको पता नहीं होता है कि वहाँ पर ये गोरिल्ला आ गया, वो व्यक्ति डर जाएगा।
जब मन खिड़की से टीवी बन जाए
तो हमारा मन भी वैसे ही होता है। अभी मन साधारणतया काम करने के लिए, हमें कुछ काम करना है सकारात्मक रूप से, तो मन को एक खिड़की के रूप में कार्य करना चाहिए। आत्मा अंदर हो यहाँ पर, फिर मन यहाँ पर है, आँखें यहाँ पर हैं। तो आप मुझे देख रहे हैं, मैं आपको देख रहा हूँ, तो मन खिड़की समान कार्य कर रहा है।
पर किसी भी पल, एकाएक मन खिड़की से टीवी बन जाता है। और जैसे ही वो टीवी बन जाता है—”अरे इसने ऐसे बोला था,” “वो ऐसे वहाँ पर हुआ था,” “वो मैंने उस दिन वो देखा था,” और “ये ऐसे हुआ है।” और ये कब टीवी बन जाता है, हमको पता ही नहीं चलता है। और जो वहाँ पर दिख रहा है, वो देखने लगते हैं। उसको देखने में इतना लग जाते हैं, कि हम भूल जाते हैं कि हम कहाँ हैं, हम क्या कर रहे हैं।
मानसिक अस्थिरता और असलियत का भ्रम
और अभी कुछ लोगों को हम पागल कहते हैं। अभी पागल लोग मतलब क्या होते हैं? ऐसे मैं एक New Jersey, New York के पास New Jersey है, वहाँ पर जो Mental Health Care Provider होते हैं, Mental Health Care Center—इसको अगर आपको हिंदी में बोलना है, तो आप उसको कह सकते हैं ‘पागल खाना’। पर ऐसे नहीं है वो, वहाँ पर बहुत बुद्धिमान लोग होते हैं।
एक व्यक्ति था उस Mental Health Care Center में। वास्तव में उसने IVY League (जैसे भारत में IIT होते हैं, जैसे अमेरिका में IVY League होते हैं—प्रिंसटन, येल, स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, मैसाचुसेट्स, सब टॉप यूनिवर्सिटी जो अमेरिका के हैं), तो उसने उनमें से एक यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट किया था। पर वहाँ पर उसका मन इतना अस्थिर हो गया था, कि वहाँ पर वह एडमिट हो गया था।
तो जब ये पागल लोग होते हैं (जिन्हें हम बहुत पागल कहते हैं), तो उनका क्या होता है? उनके लिए जो मन दिखा रहा होता है टीवी पर, वो असलियत से ज़्यादा असली लगने लगता है। और फिर क्या होता है? उनका सारा जीवन, वो जो टीवी में दिख रहा है, उससे ही आदान-प्रदान करने में, उसका ही सामना करने में, उसमें ही उनका सारा जीवन चला जाता है। और फिर असली जीवन जो है, उसका सामना करने के लिए, उनके पास कुछ शक्ति, कुछ बुद्धि, कुछ ध्यान रहता ही नहीं है।
तो इसलिए, अगर यह परिभाषा समझेंगे हम, तो क्या है पागलपन? यह केवल एक ऐसी दशा नहीं है, पागलपन एक स्लोप (Slope) है। सब लोग, अलग-अलग लोग इस पागलपन के स्लोप पे, अलग-अलग स्तर पे हो सकते हैं।
ख्यालों में जीना: क्रिकेट का नशा
अभी कुछ महीनों में क्रिकेट वर्ल्ड कप आ रहा है, तो सारे भारत में क्रिकेट का नशा छा जाता है। तो अगर आप गाड़ी में कहीं जा रहे हैं और देखते हैं, तो कुछ युवक होते हैं, वो हाथ से बॉलिंग कर रहे होते हैं, कोई बैटिंग कर रहा होता है। रस्ते में चल रहे होते हैं और कल्पना कर रहे हैं—”मैं विराट कोहली हूँ, मैं ये हूँ, मैं वो हूँ।”
फिर क्या होता है उसमें? अभी वो रस्ते में चल रहे हैं, पर क्या है? उनके मन में टीवी चल रहा है। मन एक टीवी के रूप में चल रहा है। और वो अभी हाथ-पैर भी कैसे हिला रहे हैं? वो जहाँ पे हैं उसके आधार पर नहीं हिला रहे हैं, वो मन में जो टीवी दिख रहा है, उसके आधार पर हिला रहे हैं।
तो अभी कोई अगर भारत में पहली बार आएगा, तो सोचेगा क्या कर रहे हैं लोग? हम भारतीयों के लिए नॉर्मल है, हाँ लोग करते हैं ऐसे। पर अगर हम एक एनालिटिकल विश्लेषण (Analytical Analysis) के रूप से देखते हैं, तो देखते हैं क्या कर रहा है? उसके सामने कुछ भी नहीं है, बैट नहीं, बॉल नहीं, क्या हाथ घुमा रहा है ऐसे!
अनगिनत चैनलों वाला मन
तो जो हमारा मन होता है, यह किसी भी पल एक खिड़की से टीवी में रूपांतरित हो जाता है। और जैसे ही वो टीवी में रूपांतरित हो जाता है, तो उस टीवी पे ऐसा नहीं है कि एक चैनल है। अब कुछ 10-15 साल पहले, 20 साल पहले, दूरदर्शन एक ही चैनल था। अभी कितने चैनल्स हैं, इतने हैं कि उनकी संख्या भी पता नहीं है। और कितने चैनल्स हैं उससे फर्क भी नहीं पड़ता है। आजकल इंटरनेट है, तो इंटरनेट पे तो हम जहाँ से चाहें जो भी देख सकते हैं।
तो वैसे ही हमारा मन है। वो ऐसा टीवी नहीं जिसमें एक चैनल है, वो ऐसा टीवी है जिसमें अनेक चैनल हैं। और न केवल मन खिड़की से टीवी बन जाता है, पर टीवी का चैनल भी बदलते रहता है—एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे। कभी-कभी पूरा पिक्चर भी आने लगता है, मूवी भी आने लग जाती है। इसने ऐसे किया, उसने ऐसे किया, वो वैसे हुआ, वैसे हुआ।
और इस तरह से जब हम मन में फँस जाते हैं, तो जैसे बंदर होता है—एक चीज़ से दूसरी चीज़ पे (Distracting from one thing to another) भागता रहता है, एक जगह नहीं टिकता है। इसी तरह से हमारा मन है, इधर से उधर, उधर से उधर बदलता रहता है। अभी ये चित्तवृत्ति, अभी ये विचार दिखा, उसने वो ऐसे किया था, अभी ये भावना, अभी ये इच्छा… ये हमेशा आते रहता है।
विचारों के ‘टीवी’ को मिनिमाइज़ (Minimize) करना
अभी वो जो प्रसंग बताया मैंने, जो कैलिफोर्निया में हुआ था। मैं यहाँ पर बैठा था, वो यहाँ पर बैठा था। हम दोनों वही चीज़ देख रहे थे, पर वो चीज़ देख के मैं सहम गया, वो सहमा नहीं। उसको कुछ नहीं हुआ, क्यों? ये फर्क क्यों था? वो सावधान था, ठीक है, बात सही है। पर उसके साथ-साथ जानकारी थी! क्या जानकारी थी? कि ये काल्पनिक है। ये जो चित्र है, ये खिड़की के बाहर का नहीं दिखा रहा है, ये टीवी के रूप में काल्पनिक है।
तो उसी तरह से हम जो आज प्रवचन देख रहे हैं—कि मैं जिस भूमिका में था कि मन जो दिखा रहा है उसको सही मानना, और वो जिस भूमिका में था कि जो दिख रहा है उसको सही नहीं समझना—हम इस जगह से, उस जगह पे कैसे जा सकते हैं, ये समझने का प्रयास करेंगे। कि जब मन टीवी के रूप में कुछ दिखाने लगता है, तो फिर वो टीवी शो देखने की जगह पर समझ जाना, “अच्छा, ये टीवी चल रहा है। रुक जाओ, इसको देखना ज़रूरी नहीं है। इसको मैं बंद कर दूँगा।”
अगर हम उसको बंद भी नहीं कर सकते हैं, तो क्या कर सकते हैं? उसको मिनिमाइज़ (Minimize) कर सकते हैं। ठीक है, वो है, उसको छोटा कर दो। अगर मुझे कोई दूसरी फाइल खोल के पढ़ना है, या कुछ काम करना है, तो हम क्या कर सकते हैं? अगर हम समझ जाते हैं कि अब ये मन टीवी के समान काम कर रहा है, तो फिर हम उसपे पूरा ध्यान नहीं देंगे। हम क्या करेंगे? उसको मिनिमाइज़ करते हैं। और फिर मिनिमाइज़ करके, छोटा करके, फिर हम दूसरी ओर ध्यान दे सकते हैं। ऐसा करने के लिए सबसे पहले जानना है कि मन किस तरह से कार्य करता है।
चेतना का भक्षण करने वाला बंदर
बंदर की असल उपमा इसलिए है कि कोई बंदर शांत रूप से बहुत कम बैठा रहता है। इधर से उधर, उधर से उधर, कूदते रहता है। और बंदर में जितनी शक्ति है, उससे ज़्यादा इधर-उधर कूदने की शक्ति हमारे मन में है।
अभी बंदर तो ज़्यादा खतरनाक नहीं होता है। अभी कुछ समय, एक-दो ढाई हफ्ते पहले मैं वृन्दावन में था। तो वृन्दावन में अभी कुछ जगह पे बंदर हैं। और कुछ जगह पे जो बंदर होते हैं वो बड़े शांत होते हैं। मथुरा में जाते हैं तो बंदर शांत होते हैं। पर वृन्दावन में जाते हैं तो बंदर वहाँ पे होते हैं। वो अगर आ गए वहाँ पे तो फिर क्या होता है, वो चश्मा खींच लेते हैं। कुछ आपका पर्स है, खींच लेते हैं, या कुछ वॉलेट है। अपने हाथ में जो भी है वो खींच लेते हैं। तो फिर जब ऐसे बंदर होते हैं तो सबको चौकन्ना रहना पड़ता है कि क्या हो रहा है। कहीं से बंदर आ जाएगा तो बोलते हैं चश्मा निकाल लो। हालाँकि बंदर तो चश्मा पहनने वाले नहीं हैं, उनको चश्मा क्यों चाहिए?
तो लोग कहते हैं कि हम यहाँ काम करने आये हैं, कुछ देखने आये हैं, और बंदर बीच में आ रहे हैं। वास्तव में बंदर हमारे इलाके में नहीं आ रहे हैं, हम बंदरों के इलाके में चले गए हैं। इसलिए अभी वो क्या करते हैं, जो मथुरा में लोग बंदरों को काफ़ी कुछ खिला देते हैं तो फिर बंदर हिंसक नहीं बन जाते हैं। पर वृन्दावन में थोड़े वो हिंसक हैं, हिंसक नहीं हैं पर छीन लेते हैं। और फिर कुछ उनको केला दो, तो वो चीज़ लौटा देते हैं।
पर इसमें क्या है कि बंदर बहुत ज़्यादा खतरनाक नहीं होते हैं। हमने कहीं अख़बार में नहीं सुना कि बंदर ने किसी को खा लिया। शेर खा सकता है, कोई जानवर खा सकता है, पर बंदर खाता नहीं है। पर जो मन है, वो ऐसा बंदर है जो हमारी पूरी चेतना को भक्षण कर लेता है! और जब मन चेतना को भक्षण कर लेता है, तो उससे क्या होता है? वो चेतना पूरी उसी चीज़ में लग जाती है।
अगर कोई जानवर, शेर, किसी हिरन को खा लेता है, तो हिरन का अस्तित्व नहीं रहता है। पर मन जब अपनी चेतना को खा लेता है, तो हमारा अस्तित्व तो रहता है, पर फिर उसके बाद में हम वो मन का गुलाम बन जाते हैं। मन कल्पना करता है कि, “अरे इस चीज़ में बहुत सुख है! ये देखो, ये खाओ, इसको स्पर्श करो, ये करो, वो करो।” तो मन कल्पना करता है इसमें बहुत सुख है। पर जो सुख होता है, वास्तव में वह कल्पना में ज़्यादा होता है। जब वास्तव में अनुभव करते हैं, तो उसमें कुछ इतना सुख नहीं होता है। कुछ समय के लिए आता है सुख और चला जाता है। क्योंकि इस भौतिक जगत में जो भी चीज़ हमें सुख देती है वो क्षणिक है।
सुख की कल्पना और सेल्फी का मोह
मैं अभी कुछ समय पहले, एक-दो ढाई साल पहले कैनेडा में पहुँच गया था। तो हम नायग्रा फॉल्स के पास गए थे। वहीं पे मेरा एक क्लास था, तो कुछ युवक थे, उनको हम वहाँ पर ले गये थे। नायग्रा फॉल्स अभी सारे विश्व में एक प्रसिद्ध जगह है। सब लोग देखने जाते हैं। तो वहाँ पर जब जाते हैं, तो मैं देख रहा था वहाँ पर, लोग वो नायग्रा फॉल्स को देख रहे थे। और अधिकांश लोग नायग्रा फॉल्स को नहीं देख रहे थे। वो क्या कर रहे थे? वो सेल्फी ले रहे थे ताकि दूसरों को दिखा सकें कि मैं नायग्रा फॉल्स गया था।
तो क्या है? अभी नायग्रा फॉल्स सुंदर है और देखने में भी अच्छा है। पर कुछ समय के लिए देखो, बाद में क्या करें? कोई कलाकार है, कुछ कला करना चाहता है, तो ठीक है। पर एक, दो, तीन मिनट, पाँच मिनट देख लिया, तो उसके बाद में, अभी और क्या करना है? अभी क्या करना है? दूसरों को दिखाना है। तो मन को इच्छा होती है—मुझे देखना है, मुझे देखना है, मुझे देखना है। पर क्या होता है, मन कल्पना करता है कि इसमें बहुत सुख है। पर जब वो चीज़ मिल जाती है, वो बोलता है, “अभी आगे क्या करना है? अभी आगे क्या करना है?”
विज्ञापनों का मनोविज्ञान और चैनल सर्फिंग
अभी मेरे एक मित्र हैं, वो डिग्री कर रहे हैं अमेरिका में, Psychology of Advertising पर। कि जो विज्ञापन होते हैं, उसमें मनोविज्ञान का कैसे इस्तेमाल होता है? तो वो बता रहे थे मुझे कि जब वो टीवी का रिसर्च करते हैं, तो जब लोग टीवी देखते हैं, तो सबसे ज़्यादा ध्यान लोग कब देते हैं? क्या जब कोई कार्यक्रम चल रहा होता है, उस पर ध्यान देते हैं? बोले, “नहीं।”
जब एक चैनल से दूसरे चैनल सर्फिंग कर रहे होते हैं—और वो भी ऐसे फास्ट सर्फ, ऑटो सर्फ होता है—यह कार्यक्रम, यह कार्यक्रम, ठक ठक ठक जाते रहो। तो जब ऐसे सर्फिंग हो रहा होता है, तभी लोग ज़्यादा ध्यान देते हैं। “यह देखो, यह देखो, यह देखो… क्या होता है, कहीं न कहीं तो कुछ तो मनोरंजक मिल जाएगा।” यह देख रहा है, इतना मनोरंजक नहीं है। यह देख रहा है, इतना मनोरंजक नहीं है। यह देख रहा है, इतना मनोरंजक नहीं है।
मैं एक भक्त के घर में गया था, तो उनके घर में एक ऐसा बड़ा टीवी था, उसमें चार स्क्रीन थे। मैंने बोला, “चार स्क्रीन क्यों हैं आपके पास?” वो बता रहे थे कि, “मेरे बच्चे हैं, मेरे रिश्तेदार हैं।” वो काफी अमीर हैं, तो उनके चार कमरों में चार टीवी हैं। हर टीवी में चार चैनल्स एक साथ आते हैं। तो हर एक व्यक्ति क्या है, एक चैनल देखे, बोले दूसरा देखो, तीसरा देखो, चौथा देखो। हज़ार चैनल हो सकते हैं, पर मन अपेक्षा कर रहा है—उस चैनल पर कुछ अच्छा होगा, उस चैनल पर कुछ अच्छा होगा, उस चैनल पर कुछ अच्छा होगा। और कुछ अच्छा होगा भी, पर कुछ समय के लिए अच्छा रहता है, बाद में “चलो, कुछ और देखो, कुछ और देखो।”
तो यह जो है, मन का जो भोग होता है, मन को इच्छा बदलने में क्या समय लगता है? इसमें सुख मिलेगा, इसमें सुख मिलेगा, इसमें सुख मिलेगा। पर कोई भी चीज़ क्यों न हो, वो सुख कुछ समय के लिए रहता है, बाद में चला जाता है। तो मन क्या होता है, उसके बाद में उतावला हो जाता है—”मुझे और कुछ मिलेगा, और कुछ मिलेगा, और कुछ मिलेगा।” तो इस तरह जैसे तंत्रज्ञान (टेक्नोलॉजी) में हम देख सकते हैं कि लोग टीवी देखने में लग जाते हैं, नेट सर्फिंग में लग जाते हैं कि “और कुछ, और कुछ, और कुछ।” वैसे ही, टीवी हो या नेट सर्फिंग न हो, फिर भी हमारा मन भी वैसे ही है। “ये करो, ये करो, ये करो, ये करो।”
ये बंदर के समान चलता रहता है, कूदते रहता है। नेट सर्फिंग कर रहे हैं, तो ठीक है, एक बटन दबाओ, यहाँ से उस चैनल में चले गए। टीवी देख रहे हैं, एक बटन दबाओ, एक चैनल से दूसरे चैनल में चले गए।
जब मन हमें गुलाम बना लेता है
पर कभी-कभी क्या होता है, मन कुछ ऐसी चीज़ों से आसक्त हो जाता है, जिनको प्राप्त करना बड़ा मुश्किल होता है। तो जब प्राप्त करना बड़ा मुश्किल हो जाता है, तो क्या होता है, उसमें बड़ा खतरा आ सकता है। मान लीजिये आप गाड़ी में बैठे हो। अभी अमेरिका में गूगल ‘सेल्फ-ड्रिवन कार्स’ (Self Driven Cars) बना रहा है। तो क्या है, मतलब आपको ड्राइवर के रूप में ड्राइविंग कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, गूगल खुद ड्राइविंग कर लेगा कार का। तो गूगल डिटेक्ट करेगा कि कहाँ से आ रहा है, आपको यहाँ से कहाँ जाना है, कितना ट्रैफिक है। तो अगर वो किया है, तो ज़्यादा एक्सीडेंट नहीं हो रहा है, पर वो मैकेनिकल है, हो सकता है वो एक्सीडेंट करे।
पर अब मान लीजिए कोई कार है, वो ऑटोमैटिक चलती है। जैसे फ्लाइट होता है, मेरा एक मित्र पायलट है, वो बताता है कि जब वो हवाई जहाज़ चला रहे होते हैं, तो जब वो एक ऊंचाई पर ले जाते हैं, तो वो ऑटो-पायलट में डाल देते हैं। वो अपने आप पायलट मोड में डाल देते हैं।
तो इसी तरह से मन हमको एक गधे के रूप में बदल देता है। What the mind craves for, it makes us slave for. (जिन चीज़ों की मन लालसा करता है, वो उसके लिए हमें गुलाम बना देता है)। कि जब वो किसी एक चीज़ से आसक्त हो जाता है, तो उसके पीछे वो इस तरह से लग जाता है, कि वो व्यक्ति को अपना गुलाम बना सकता है।
यहाँ आपकी आवश्यकता के अनुसार पूरी तरह से सुधारे गए (Verbatim Corrected) और वर्डप्रेस के लिए मार्कडाउन (Markdown) फॉर्मेट में तैयार किए गए ट्रांसक्रिप्ट का दूसरा भाग दिया गया है।
आपके निर्देशानुसार, जो पंक्तियाँ लगातार रिपीट हो रही थीं, उन्हें हटा दिया गया है, लेकिन मूल रूप से बोले गए हर एक शब्द को जस-का-तस रखा गया है।
शराब की लत और कमज़ोर इच्छा शक्ति
मेरे मित्र बता रहे थे कि उनका भाई शराबी था। तो अभी जब कोई शराबी होता है, तो गैर ज़िम्मेदार है, कुछ आत्म नियंत्रण नहीं है, कुछ कमज़ोर आत्मशक्ति है, विलपॉवर (Willpower) उसका बहुत वीक (Weak) है, ऐसा कहते हैं, पर ऐसा है और उतना ही नहीं है। आजकल के समय लोग क्या कहते हैं, पाश्चात्य देशों में या भारत में, कि ‘drink but don’t become drunk’ (आप शराब पियो पर शराबी नहीं बनो)।
इसका मतलब क्या है? पहाड़ के तट पर जाओ, नीचे झुक के देखो पर गिरो मत। क्यों जाना है पहाड़ के तट के बाजू में? जो अगर शराब पीने लग जाएगा, तो फिर शराबी न बनना, यह आसान नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग शराब थोड़ा-बहुत पीते हैं, और शराबी नहीं बनते हैं। पर क्या है, जब वो आदत बन जाती है, तो फिर जब भी समस्या आ जाएगी जीवन में, तब वो शराब पीने लग जाएंगे।
तो ये भक्त बता रहे थे कि उनका भाई शराबी बन गया था। और ऐसे नहीं कि शराबी मतलब जो लोग होते हैं, वो कुछ रस्ते पे बेहोश हो गए, हिल जाते हैं। ये अच्छा व्यक्ति था और बड़ा ही सुशिक्षित था, बड़ा ही धनवान था, धनवान परिवार से था। पर वो नशे के लिए इसमें आ गया, तो फिर क्या? इस तरह से आसक्त हो जाता है, इस तरह से पागल हो जाता है व्यक्ति शराब के लिए, तो क्या होगा?
अभी वो भी चाहता है कि उसे शराब छोड़ना है, पर क्या होता है? कभी ऐसे इच्छा होती है, “नहीं, मुझे नहीं करना है”, “नहीं, मुझे करना ही है”, वो ऐसे झगड़ा, जैसे अंदर में द्वंद्व चलते रहता है। तो उसका एक कार था, तो एक बार उसने कार से फोन किया और बताया कि “मेरी कार अगर काम नहीं कर रही है, तो मुझे एक टो (Tow) भेजो।” तो फिर दूसरा एक ट्रक आया, टो करके उनको घर में लेकर आ गया। फिर घर में आ गए और चले गए। शाम हो गई, फिर वो सो गए।
अगर जो कोई शराबी होता है, तो उसके आजू-बाजू में जो लोग होते हैं… वो उठ के गया, फिर क्या किया उसने? वो अपनी कार के पास हो गया। तो ये कार तो चल नहीं रहा था, तो कार का क्या कुछ था, उसने क्या किया था, उसके हाथ में कुछ था। और फिर उसने क्या किया? वो कार का टैंक खोला। और फिर उसके हाथ में क्या था? एक लंबा ट्यूब था। और फिर उनको समझा, कि क्या किया था उसने? वो कार के टैंक में शराब भर दिया था।
और फिर अभी ट्यूब डाल के उससे शराब पीने का प्रयास कर रहा था। तो अभी इतनी दयनीय अवस्था हो जाती है। मन अगर किसी चीज़ से आसक्त हो जाता है, तो उसके लिए वो कुछ भी कर सकता है। वो व्यक्ति को एक गधा बना लेता है। वो शराब पीना है, अभी कितना उसको दिमाग लगाना पड़ता है। पहले उसने कार के पेट्रोल टैंक में से उसके लिए पेट्रोल निकाल दिया, फिर उसके बाद में कहीं से शराब लाये, फिर उसके बाद में डाला, फिर किसी को फोन किया, कि टो लेके आ जाओ। अभी रात को उठ के ऐसा ट्यूब ढूंढ रहे हैं, स्ट्रॉ (Straw) ढूंढ रहे हैं, पाइप ढूंढ रहे हैं, कि उसके ज़रिये से शराब निकालें।
तो क्या? तभी उनको, वो बोले कि तब तक उनको लग रहा था, कि ये इतना गैर ज़िम्मेदार है, ये इतना कम इच्छा शक्ति वाला है, कम विलपॉवर वाला है। पर तभी उनको लगा कि, वास्तव में, वह नहीं है। कितना बेरहमी से, उसको मन परेशान कर रहा होगा, कि इतनी परेशानी तक हो गया है, कहीं न कहीं से उसको शराब पीना है। तो क्या है, कि मन कभी-कभी हमको एक गधा बना देता है।
मन का पागलपन और व्यसन (Addiction)
गधा बना के, किसी एक चीज़ के पीछे इतना दौड़ाता है—”ये चाहिए मुझे, ये चाहिए मुझे, ये चाहिए मुझे, ये चाहिए मुझे!” और वो इतना दौड़ाता है उसके पीछे, कि हम पागल हो जाते हैं। अभी वो पागलपन कैसे है? एक पागलपन ऐसे है, कि जो हमको दिखता है, कि ये दुनिया में, एक कुछ चल रहा है, उसके मन में कुछ चल रहा है, वो ऐसे किसी भी मौक़े पर उठता है, हाथ पैर उठा देता है, तो एक प्रकार का पागलपन है।
पर दूसरा प्रकार का पागलपन जो है, the mind reduces reality to just one thing. क्या करता है, मन जो है, पूरा हमारे जीवन का जो सत्य है, वो एक चीज़ तक रोकता है। जो शराबी होता है, उसको दुनिया में शराब के अलावा कुछ और दिखता ही नहीं है। एक अमेरिका के ऑथर (Author), एक ब्रिटिश ऑथर हैं, ऑस्कर वाइल्ड (Oscar Wilde), वो कहते हैं… वो एक लेखक थे, वो सिगरेट पिया करते थे। और फिर उनके मित्र बोलते हैं, “आप सिगरेट छोड़ दो।” तो वो बोले एक बार, “सिगरेट छोड़ना बहुत आसान है, मैंने आज तक सौ बार उसको छोड़ा। तो वापस पकड़ लिया, मैंने वापस उसको छोड़ दिया, वापस उसको पकड़ लिया।”
तो क्या है, कि इससे छूटना हमें लगता है उतना आसान नहीं है। अभी कुछ व्यसन वगैरा होते हैं, कुछ कोई शराबी है, कोई बहुत सिगरेट पीता है, तो इस प्रकार के जो एडिक्शन (Addiction) होते हैं, वो हमको स्पष्ट रूप से दिख जाते हैं। कि व्यक्ति पूरा अपने मार्ग से गुमराह हो रहा है। पर कभी-कभी मन में भ्रांत धारणाएं आ जाती हैं। ऐसी धारणाएं आ जाती हैं कि “मुझे ये चाहिए और यही चाहिए। और ये मुझे किसी न किसी तरह से प्राप्त करना ही है।” और वो प्राप्त करने के लिए मन कभी-कभी हमको पागल बना जाता है।
तो अभी बहुत सी चीज़ें हमारे जीवन में ऐसी हैं, अभी कुछ उद्देश्य होना वो अच्छा है। पर अगर कोई चीज़ नहीं मिलती है, तो हमें आगे बढ़ना है। “ठीक है, नहीं मिला, मैं आगे क्या कर सकता हूँ? नहीं मिला, तो आगे क्या कर सकता हूँ?” अगर हम ऐसे नहीं करेंगे, तो क्या होता है? हम भूतकाल में ही फँस जाते हैं। भूतकाल में फँस जाने का मतलब क्या है, कि हम जो भविष्य में हैं, “यह ऐसे क्यों नहीं मिला मुझे?”, “यह ऐसे क्यों नहीं हुआ?”, “यह ऐसे क्यों नहीं हुआ?” वो ऐसा ही मन फँसा रहता है।
असंतुष्टि और रिज़ेंटमेंट (Resentment)
इसको इंग्लिश में कहते हैं ‘रिज़ेंटमेंट’ (Resentment)। रिज़ेंटमेंट मतलब, हिंदी में क्या बोलेंगे उसको? घृणा नहीं, घृणा इसे अवर्शन (Aversion)। असंतुष्टता नहीं, इसको डिसेटिस्फेक्शन (Dissatisfaction) है। वास्तव में, रिज़ेंटमेंट मतलब, जो हुआ है… आप गूगल ट्रांसलेट करना चाहते हैं। विद्वेष, इसका ट्रांसलेशन लगेगा चिड़चिड़ा होना, नाराज़गी होना, क्रोध करना। कैसे है, ये सब तीर निशाने के पास जा रहे हैं, निशाने पे कुछ भी नहीं जा रहे हैं।
पर रिज़ेंटमेंट का अर्थ मैं बोल देता हूँ, क्या है उसमें? कि अगर जो हुआ है हमारे साथ, वो हम स्वीकार नहीं कर पाते। “ऐसे क्यों हुआ मेरे साथ? मुझे यह चाहिए था, पर यह मुझे मिला नहीं, यह मुझे मिला नहीं, यह मुझे मिला नहीं।” तो ऐसा जब होता है, तो उस तरह से जब घृणा करते हैं, नफरत करते हैं, क्रोध करते हैं, तो वह सब जो होता है, मन किसी चीज़ में पड़ जाता है।
दो-तीन उदाहरण ले सकता हूँ इसके। मैं जो बता रहा था, कि आपने परिचय में सुना होगा, कि मुझे बचपन में, जब एक साल का था, तो मुझे पोलियो हो गया। तो मैं कभी-कभी ऐसे जो, जिनको जो स्पेशल नीड्स (Special Needs) हैं, हम भारत में कहते हैं फिजिकली हैंडीकैप्ड (Physically Handicapped), पर पाश्चात्य देशों में, वो थोड़ा और यूफेमिज़्म (Euphemism) यूज़ करते हैं। वो बोलते हैं कि ये लोगों को स्पेशल नीड्स हैं, क्योंकि कुछ विशेष ज़रूरतें हैं। तो ऐसे स्पेशल नीड्स वाले जो लोग होते हैं, उनको भी मैं कभी लेक्चर्स (Lectures) वगैरा देता हूँ।
तो इसके बाद में जब बात करता हूँ, मुझे एक चीज़ तुरंत खटकती है वो, कि ये सब लोग, उनमें से अनेक लोग ऐसे हैं, they are fighting battles that they have already lost. वो ये युद्ध लड़ रहे हैं, जो वो पहले ही हार चुके हैं। मतलब क्या? कि अगर बचपन में कुछ हो गया, किसी का कुछ हाथ कट गया है, किसी की आँख चली गई है, किसी का पैर खराब हो गया है, किसी को कुछ परमानेंट स्कार (Permanent Scar) आ गया है चेहरे पे, कुछ कमज़ोरी आ गयी है, तो अभी वो पहले ही हो चुका है, कि उसके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं।
पर “क्यों हुआ? क्यों हुआ? ये नहीं होना चाहिए था, उसने ऐसे क्यों किया? इसने ऐसे क्यों किया? ये ऐसे क्यों हुआ?” वो क्या है? वो ऐसा है, कि वो जो युद्ध है, वो हार चुके हैं। और वो युद्ध अगर लड़ते रहे हैं, तो कुछ भी नहीं कर पाएंगे, पर वो स्वीकार ही नहीं कर पाएंगे। वो जो रेज़ेंटमेंट होता है, वो आपको फँसा के रखता है, व्यक्ति को फँसा के रखता है।
कमियों को स्वीकार करना
तो मैं जब बचपन में देखता हूँ, तो मुझे कभी ऐसे याद नहीं आया कि, मुझे इतनी रेज़ेंटमेंट हुआ करता था, इतना नकारात्मक भाव था। फिर मैंने विचार किया, ऐसे क्यों है? तो तभी मुझे ध्यान आया, कि मेरे माता-पिता जो थे बचपन से, उन्होंने मुझे स्वीकार किया। कभी मुझे ऐसे लगने नहीं दिया, कि मेरा एक पैर बोझ है, या मैं उन पे कोई बोझ हूँ। और उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया। तो उन्होंने मुझे स्वीकार किया, इसलिए मैं भी खुद को स्वीकार कर पाया।
और अभी मुझे जब भी चलना पड़ता है, तो क्रचेस (Crutches) यूज़ करने पड़ते हैं। जो अगर कोई मुझे पहली बार देखता है, तो सबसे पहले उनको क्रचेस दिख जाते हैं। पर मेरे लिए ये क्रचेस जो हैं, ये ग्लासेस (Glasses) के समान हैं। और फिर हमारी सारी शक्ति वहीं चली जाती है। और ये जो गधा होता है, बहुत मेहनत करता है, और उस मेहनत से उसे कुछ मिलता नहीं है। हमारा मन ही वैसा होता है, कि बहुत ज़िद्दी हो जाते हैं, “ये ऐसे क्यों है? नहीं ये बदलो, ये बदलो, ये बदलो।” पर वो बदलने की सम्भावना है ही नहीं, वो उसको स्वीकार करना है।
मैंने एक पुनर्जन्म गीता पर लिखा है, Demystifying Reincarnation (डिमिसटिफाइंग रीइंकारनेशन), तो मैं उस पर लेक्चर दे रहा था। तो अलग-अलग सवाल पूछते हैं, तो एक जगह पर एक यूथ मीटिंग था। उसमें एक युवक ने सवाल पूछा मुझे, कि “मुझे एक पुनर्जन्म गीता सम्बन्धी सवाल है।” तो ज्ञान का सवाल होगा, उसका सवाल क्या था? कि “मैं एक लड़के से प्रेम करता हूँ, पर हम शादी नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि हमारे माता-पिता जो हैं, वो बिल्कुल खिलाफ हैं। तो क्या आप मुझे बता सकते हैं, कि मुझे क्या कर्म करना चाहिए, जिससे कि अगले जन्म में मैं उससे शादी कर सकूँ?”
तो, कई लोग ऐसे सवाल पूछते हैं, सोल मेट (Soulmate) के बारे में, क्या हम सबका एक सोल मेट होता है? तो मैं बताता हूँ कि “ठीक है, आप मेट पे इतना ज़ोर मत दो, सोल को पहले समझो।” तो, अभी क्या हो गया इसमें? कि ठीक है, अगर कुछ सम्बन्ध नहीं हो पाया, तो नहीं हो पाया, हमें आगे बढ़ना है जीवन में। पर उसी रिकॉर्ड को बार-बार, बार-बार प्ले करते रहते हैं, तो हाँ, हम उसी में फँस जाते हैं।
और मन इस तरह से हमको कई पद्धतियों से गधा बना देता है। गधा क्यों? मतलब क्या है? बहुत मेहनत करवाने में लगाता है, और उससे कुछ होता ही नहीं। तो, अगर जो हुआ है हमारे भविष्य, भूतकाल में, उसको स्वीकार करना है।
तो, मन चंचल है। इधर से उधर, उधर से उधर, उधर से आते रहता है। पर मन किसी एक चीज़ को पकड़ लेता है, तो फिर जैसे बंदर होते हैं, वो बंदर अगर किसी चीज़ को पकड़ लेते हैं, छोड़ते नहीं हैं उसको। तो इसलिए, वो उसको पकड़ लेता है और उसके पीछे हम जाते हैं, तो हम गधे से बन जाते हैं। तो जब इस तरह से कोई व्यक्ति गधा सा बन जाता है, तो अपना पूरा जीवन, वो बस किसी एक चीज़ के पीछे—”ये क्यों नहीं मिला, ये क्यों नहीं मिला, क्यों नहीं मिला, ये मुझे मिलना चाहिए, मिलना चाहिए, मिलना चाहिए”—ऐसे ही वो फँस जाता है।
लत और अपराध (Addiction and Criminality)
और गधा ही नहीं, ये मन व्यक्ति को कोई बड़ा खौफनाक जानवर बना सकता है। जब कोई नशा करने लगता है, जब कोई ड्रग्स लेने लगता है, तो क्या होता है? मैं एक डी-एडिक्शन कॉन्फ्रेंस (De-addiction Conference) में गया था, अमेरिका में, कनेक्टिकट (Connecticut) के पास में था वो। तो वहाँ पे मैंने स्पिरिचुअलिटी और एडिक्शन (Spirituality and Addiction) के बारे में बताया था, अध्यात्म और एडिक्शन के बारे में।
तो वहाँ पे जो कुछ डी-एडिक्शन एक्सपर्ट्स (De-addiction Experts) आये थे, वो भी सेमिनार में डिस्कशन कर रहे थे। वो बता रहे थे, कैसे? कि the strongest predictor of criminality is addiction (अपराध का सबसे बड़ा पूर्वानुमानक व्यसन है)। अगर कोई, किसी बुरी आदत का शिकार बन जाता है, व्यसनी बन जाता है, तो उससे हम भविष्यवाणी कर सकते हैं, कि इसको अगर ये बुरी आदत है, अगर किसी ने एक गुनाह कर दिया है, तो अभी वो दूसरा गुनाह करेगा कि नहीं? क्योंकि क्या है? उसके आधार पर वो फैसला करते हैं, उसको कितनी बड़ी सजा देनी है। पर वो कैसे पता करेगा, कि वो दूसरा गुनाह करेगा कि नहीं?
तो वो कहते हैं, कि यह समझने का सबसे अच्छा तरीका है, कि जो गुनाह कर रहा है, उसकी आदत क्या है? क्या उसकी कोई बुरी आदत है? अगर बुरी आदत है उसकी, तो फिर अगर वो शराब लेता है, नशा करता है, ड्रग्स लेता है, तो फिर क्या है? ज़रूर, वो उसकी पूर्ति के लिए फिर दूसरा गुनाह करेगा, और तीसरा गुनाह करेगा, चौथा गुनाह करेगा। तो वहाँ पे, अमेरिका में बता रहे थे। तभी मुझे पता चला कि वो शायद भारत में, पंजाब में ड्रग्स की समस्या बहुत है। और कोई बॉलीवुड की मूवी भी आयी थी, क्या? उड़ता पंजाब, उड़ता पंजाब।
तो वहाँ पे, वो बता रहे थे, कैसे ड्रग्स की समस्या पूरे भारत, पूरे विश्व भर में है। और उन्होंने मुझे बताया कि यह भारत में कितनी बड़ी समस्या है, यह इस मूवी में भी दिखा रहा था। तो इसमें पॉइंट यह है, जो समस्या होती है, उसमें वो साधारण व्यक्ति भी गुनेहगार बन जाता है, हत्यारा भी बन जा सकता है। इसलिए क्या है, न केवल मन हमको बंदर के समान… जो हमको गधा बना सकता है, वो एक बहुत खौफनाक जानवर के समान भी बना सकता है। और व्यक्ति पागल के समान कार्य कर सकता है। इसलिए मन को संभालना यह बहुत ज़रूरी है।
मन को नियंत्रित करने के तीन तरीके
तो अभी आखिरी विभाग में तीन चीज़ें बताऊँगा, कि मन को हम कैसे संभाल सकते हैं। तो मन जब पागल हो जाता है, तो हमारे शरीर से दूर जाके कहीं और दौड़ा-दौड़ी करने लगता है। तो हमें मन को नियंत्रण करना है, तो तीन चीज़ें हैं।
सबसे अच्छा है मन को नियंत्रण करने के लिए, कि हम वो मन भगवान में लगाएं। पर भगवान में लगाने से क्या होता है? कि हमारा जो मन है, वह अस्थिर होता है, इधर जाता है, उधर जाता है, इधर जाता है, उधर जाता है। पर भगवान जो हैं, अगर हम भक्ति करते हैं, तो उसके द्वारा मन को एक आश्रय मिल जाता है। मन की जो तेज़ रफ़्तार है, उसको कुछ पकड़ने को मिल जाता है।
अगर मान लीजिये कोई सागर की लहरें आ रही हैं, और लहरों से एक व्यक्ति है, जो उन लहरों में इधर-उधर फेंका जा रहा है। अगर उसको कुछ नाव मिल जाती है, तो नाव में थोड़ा सहारा मिलेगा। और नाव को एक लंगर से जोड़ लिया जाएगा, तो और आश्रय मिल जाएगा उसको। तो उसी तरह से क्या है, जो नाव है, अभी ये तीन चीज़ें जो हैं, उस उदाहरण के आधार में बताऊँगा।
1. संकल्प (Intention) सबसे पहला है कि व्यक्ति अगर सागर की लहरों में फेंका जा रहा है, वैसे हमारे मन में लहरें आती हैं—”ये खाओ, ये ऐसे करो, ये मुझे ये चाहिए, ये ऐसे क्यों हो रहा है”, और उस तरह से हम इधर-उधर फेंके जाते हैं। सबसे पहले हमें इंटेंशन (Intention), इंटेंशन मतलब कि मैं अभी इस तरह से, I want a better life (मुझे एक बेहतर जीवन चाहिए)। मैं इस तरह से इधर-उधर फेंका जा रहा हूँ, मैं आज ये कर रहा हूँ, मैं कल वो कर रहा हूँ, परसों वो कर रहा हूँ, मुझे अच्छी तरह से ज्ञानपूर्वक, मुझे कुछ करना है। सबसे पहले इंटेंशन चाहिए, कि मुझे इसको छोड़ना है, मुझे इसको परिवर्तित करना है।
अगर सागर की लहरों में कोई फेंका जा रहा है, उसको अच्छा लग रहा होगा, “मैं इधर देख रहा हूँ, उधर देख रहा हूँ, इधर से पानी आ रहा है, उधर से पानी आ रहा है।” अच्छा लग रहा होगा, पर बाद में एक ऐसी लहर आ सकती है, जो इतना ऊपर उठाएगी, नीचे गिराएगी, कि व्यक्ति डूब भी सकता है।
तो कभी-कभी मन की लहरों में घूमना अच्छा लगता है। पर जब हमारे जीवन में समस्या आती है, जब हमें कुछ ज़िम्मेदारी का कार्य करना पड़ता है, तब फिर हमको मन करने ही नहीं देगा। तो सबसे पहले क्या चाहिए? इंटेंशन, कि मुझे कुछ मेरे मन को नियंत्रण करना है, अनुशासन करना है। I want to change (मैं बदलना चाहता हूँ), यह ज़रूरी है। अब वो अगर होगा, तो उसके बाद में क्या है?
2. सतर्क बुद्धि (Alert Intelligence) दूसरी चीज़ है, जो अगर किसी को नाव मिल जाती है, वो नाव है, वो हमारी बुद्धि है। जितनी हमारी बुद्धि सतर्क हो जाएगी, तो उस बुद्धि से क्या होगा? जैसे ही मन खिड़की से टीवी के रूप में बदल जाएगा, तो हमको समझ आ जाएगा, अब यह मन खिड़की नहीं दिखा रहा है, यह टीवी दिखा रहा है। यह मुझे सत्य नहीं है, यह कुछ कल्पना दिखा रहा है।
जितनी हमारी बुद्धि सतर्क होगी, उतना हम समझ पाएंगे। जितनी बुद्धि हमारी शक्तिशाली नहीं है, सतर्क नहीं है, उतना हम मन के साथ चले जाएंगे। अभी बुद्धि सतर्क कैसे होती है? वो शास्त्रों के अध्ययन से होती है, वो सत्संग से होती है। जितना हम भगवद-गीता का ज्ञान समझेंगे, उतना हम समझेंगे कि मैं और मेरा मन अलग है। और ये मन पर ध्यान रखना मुझे ज़रूरी है।
जितनी हमारी बुद्धि सुदृढ़ हो जाएगी, उतना जब मन इधर-उधर भागेगा, तो हम उतना जल्दी उसको समझ जाएंगे, उतना जल्दी उसको हम वापस नियंत्रण में ले आएंगे। तो मुझे सुनना है इसके बारे में, जानना है इसके बारे में।
3. सकारात्मक आदतें (Positive Habits/Inclination) तो ये क्या है? उसी तरह से हमारे मन की प्रवृत्तियां होती हैं। तो जैसे हमारे फोन में ऑटो-कम्प्लीट (Auto-complete) होता है, जैसे ही ‘B’ आ गया, तो Bollywood.com दिखा लेगा। तो वैसे ही हमारे मन की भी प्रवृत्तियां होती हैं। मतलब, अगर कोई शराबी व्यक्ति है, तो उसको लगेगा, “मैं बहुत परेशान हूँ, परेशान हूँ, मुझे थोड़ी राहत चाहिए, मुझे थोड़ा सुख चाहिए”, तो ‘शराब पियूं’, वो एकदम ऑटो-कम्प्लीट आ जाएगा।
तो शराब से थोड़ी राहत चाहिए, सुख चाहिए, इसके लिए कितने सारे चीज़ें कर सकते हैं। कोई हमसे प्रेम करता है, उससे कुछ बात कर सकते हैं, हम कुछ अच्छे ग्रंथ पढ़ सकते हैं, कुछ अच्छा संगीत सुन सकते हैं, बहुत सी चीज़ें कर सकते हैं। पर उनके लिए तुरंत वो ऑटो-कम्प्लीट (शराब) आ जाएगा।
तो वैसे ही हमारा मन का इंक्लिनेशन (Inclination) होता है। अभी हमारे मन की अभी प्रवृत्ति क्या है, वो समझने के लिए आप देख सकते हैं, कि what do we do when we have nothing to do (हम तब क्या करते हैं जब हमारे पास करने को कुछ नहीं होता)। जब आपके पास कुछ भी करने के लिए नहीं है, सबसे पहले आप क्या करते हैं? अधिकांश लोग, क्या कुछ भी करने के लिए नहीं है? फोन उठाओ। और फिर फोन में कुछ मेसेज आया है क्या, कुछ फेसबुक पे क्या आया है, क्या वो आया है, क्या वो आया है, वो देखो।
वो एक प्रकार है, पर हम देखते हैं कि हम किस चीज़ के बारे में विचार करते हैं? क्या मैं क्रिकेट के बारे में विचार करता हूँ? मैं इसके बारे में विचार करता हूँ, इसके बारे में विचार करता हूँ? तो वो अभी हमारा इंक्लिनेशन बन गया है। तो यह जो प्रवृत्ति होती है, कभी-कभी बहुत खतरनाक हो सकती है, थोड़ी डिस्ट्रैक्टिंग (Distracting) हो सकती है।
तो जब यह अंदर की प्रवृत्ति बदल जाएगी, मान लीजिये, कोई एक बॉलीवुड बहुत बार देखता है। पर अभी उसको भगवद-गीता में रुचि आ जाती है, और एक दिन Bhagavadgita.com पर जाता है, दूसरे दिन Bhagavadgita.com पर जाता है, ऐसे बार-बार Bhagavadgita.com पर जाता है वो। तो उसके बाद में जैसे ही ‘B’ टाइप करेगा तो क्या आएगा? तो Bhagavadgita आ जाएगा। तो क्यों आया?
जब हम एक सकारात्मक प्रवृत्ति चुनते हैं, एक सकारात्मक कार्य चुनते हैं, तो वो हर कार्य जो हम करते हैं, उसकी हमारे मन पर छवि हो जाती है। और वो छवि जो हो जाती है, वो अगली बार हमको उसकी ओर प्रवृत्त करेगी। तो छोटी-छोटी चीज़, कि “मुझे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना है, मैं भगवद-गीता का एक श्लोक रोज़ पढूँगा, मैं सज्जनों का कुछ प्रवचन है, मैं सज्जनों का कुछ सुनूंगा।” हम इतना-इतना, जितना हम कर सकते हैं, आसानी से, बिना किसी मुश्किल के, उससे हम शुरुआत करें।
छोटे संकल्प और निरंतरता (Consistency)
तो कभी-कभी हम सोचते हैं कि मैं परिवर्तन करने वाला हूँ, पूरा मेरा जीवन परिवर्तन करूँगा। मैं आज के बाद कभी ये नहीं करूँगा और रोज़ ये करूँगा। तो ऐसे क्या होता है? वो इच्छा अच्छी होती है, पर कभी-कभी उसको बरकरार रखना बड़ा मुश्किल होता है।
अभी कुछ समय पहले, एक महीने पहले, नया साल शुरू हो गया है। तो लोग नया साल आते ही क्या करते हैं? हाँ, New Year Resolution (नए साल का संकल्प) लेते हैं। तो एक मनोवैज्ञानिक हैं, साइकोलॉजिस्ट हैं, उन्होंने संशोधन किया है, कि लगभग लोगों के, 85 परसेंट, 85 परसेंट New Year Resolutions जो होते हैं, वो New (नए) नहीं होते हैं!
वो रेज़ोल्यूशन, पिछले साल और उसके पिछले साल, उसके पिछले साल में लिए होते हैं। पर वो अगर नहीं कर पाए, अगर इस साल कर पाए तो ऐसा होगा। इसका मतलब क्या है, कई-कई रेज़ोल्यूशन बहुत बड़े लेते हैं। पर एक-एक बड़ा परिवर्तन करना है, तो छोटी सी चीज़ से शुरुआत करें। छोटी सी चीज़ मतलब, मुझे भगवद-गीता पढ़नी है, अच्छा है, रोज़ मैं एक श्लोक पढूँगा। एक श्लोक तो पढूँगा।
छोटी-छोटी सी चीज़ से शुरुआत करते हैं, तो क्या होता है, हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है कि मैं कर सकता हूँ। और मन के लिए, क्या है? अभी मन पे अगर छवि बनानी है हमको, तो मन के लिए, छोटी और बड़ी चीज़ में उतना फर्क नहीं है। मन के लिए, ‘क्या किया’, वो फर्क है। अगर मैंने भगवद-गीता उठा ली, और रोज़ मैंने पाँच मिनट के लिए पढ़ ली, तो वो कार्य करने से क्या होता है? मन पे एक छवि हो जाती है।
और अगर मैं रोज़ पाँच मिनट पढ़ता हूँ इस तरह से, तो क्या आएगा? वो भगवद-गीता पढ़ेगा। नहीं तो मन का अपना इंटरनल अलार्म आ जाएगा, “आज भगवद-गीता पढ़ी नहीं तुमने, आज पढ़ी नहीं तुमने, आज पढ़ो, आज पढ़ो, आज पढ़ो।” तो उससे क्या होगा? तो हमको सबसे महत्वपूर्ण है, regularity (नियमितता)। Quantity is good but regularity is even more important. हम कितना करते हैं वो महत्वपूर्ण है, पर उससे महत्वपूर्ण है कि हम कितनी रेगुलरली करते हैं, कितनी बार हम करते हैं।
हर बार जो करेंगे, उसकी एक छवि हमारे मन में छपेगी। और जब छवि बनती है, तो उससे क्या होता है? उससे परिवर्तन हो जाता है, अंदर का इंक्लिनेशन बदल जाता है।
भगवान से जुड़ने का ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ (Multiplier Effect)
तो अभी मन यों ही चंचल है, इधर भागता है, उधर भागता है। मन हज़ार जगह भागता है, पर जहाँ पे हमें सबसे ज़्यादा आसक्ति है, उसके लिए ज़्यादा भागता है। उसकी वह प्रवृत्ति है। पर जब हम सकारात्मक आदत डालते हैं, तो मन की छवि वैसी बन जाती है, मन की प्रवृत्ति वैसी बन जाती है, मन उसका हो जाता है।
और इसमें कोई भी अच्छी सकारात्मक आदत डाल सकते हैं। कोई कह सकता है कि “मुझे भगवद-गीता ही क्यों पढ़नी है? मैं कोई अच्छा ग्रंथ पढ़ सकता हूँ।” वो भी अच्छा है। पर यहाँ पे क्या है? जब हम भगवान के सम्बन्ध में कुछ पढ़ते हैं, तो उसमें एक Multiplier Effect (मल्टीप्लायर इफेक्ट) होता है। मल्टीप्लायर इफेक्ट मतलब क्या?
कि हम जब हमारे मन की छवि को बदलने का प्रयास कर रहे हैं, तो केवल हम प्रयास कर रहे हैं। मन ऐसे आ रहा है, तो मुझे ऐसे लाना है मन को। पर जब वो मन को भगवान की ओर ले जाते हैं, तो उसमें क्या होता है? उसमें हमको थोड़ा प्रयास करना पड़ता है। पर क्योंकि भगवान सबसे शक्तिशाली हैं, भगवान परम शुद्ध हैं, परम पवित्र हैं, उनके संग से हमारा मन शुद्ध और तेज़ हो जाता है।
मान लीजिये, अगर आपके फोन में ऐसे है कि ‘Bollywood.com’ ऑटो-कम्प्लीट में आ गया है, और अभी आपको भगवद-गीता पर जाना है, और वो ऑटो-कम्प्लीट नहीं सही है, तो क्या कर सकते हैं आप? आप वो ब्राउज़र की सेटिंग में जा सकते हैं, और उसको अगर फेवरेट में डाल दिया है, तो जो ‘B’ डालें, तुरंत भगवद-गीता आ जाएगा।
तो अभी शायद हमारे कंप्यूटर में, अगर हम उतने एक्सपर्ट हैं, हमको उतना कंट्रोल है सॉफ्टवेयर पर, तो हम वो बदल सकते हैं। पर हमारे मन के सॉफ्टवेयर में, यह हम नहीं बदल सकते हैं, यह भगवान बदल सकते हैं।
यहाँ आपके निर्देशानुसार ट्रांसक्रिप्ट का तीसरा और अंतिम भाग दिया गया है। इसे वर्डप्रेस पर आसानी से पोस्ट करने के लिए मार्कडाउन (Markdown) फॉर्मेट में तैयार किया गया है।
जितने भी शब्द या वाक्य तकनीकी खराबी के कारण लगातार रिपीट हो रहे थे (जैसे ‘निष्कर्ष मतलब जो हम…’ या ‘परवाल…’), उन्हें हटाकर वाक्यों को सुचारू कर दिया गया है। साथ ही, मूल अर्थ और बोले गए हर शब्द को वैसा ही रखा गया है।
सकारात्मक छवि और मल्टीप्लायर इफेक्ट (Multiplier Effect)
क्या है? कि जो हमारे मन में ऑटो-कम्प्लीट (Auto-complete) आ जाता है, वह एक मैकेनिकल पद्धति से कार्य करता है कि “मैं वहाँ पर सौ बार गया था, अभी मैं यहाँ पर सौ बार जाऊँगा।” तो फिर यह छवि उसकी इतनी शक्तिशाली है, उसकी आदत शक्तिशाली हो जाएगी। सही है, पर अगर हम भगवान के सम्बन्ध को जोड़ते हैं, तो क्या होता है? वह भगवान की शक्ति उसमें आ जाती है, तो पूरा सेटिंग (Setting) बदल जाता है।
और कितने सारे लोगों से जो मैं दुनिया भर में मिला हूँ… एक व्यक्ति था, इसी कहानी के साथ मैं अंत करूँगा। कि जब मन की वृत्ति बदल जाती है, मन की वृत्ति जो बदल जाती है, तो व्यक्ति भगवान की कृपा से कुछ परिवर्तन कर देता है।
मैं कई साल पहले, कई सालों से मैं अभी अमेरिका जा रहा हूँ। वहाँ पे स्टूडेंट्स को मैं लेक्चर्स देता हूँ। तो मैं जब अमेरिका में गया था, तो एक यूनिवर्सिटी में, मिड-वेस्ट में एक यूनिवर्सिटी है वहाँ, वहाँ पे मैंने एक लेक्चर दिया। किस पर? Regulate your mental diet (रेगुलेट योर मेंटल डाइट)। जैसे हम शरीर में क्या खाते हैं, उसको हम ध्यान देते हैं, वैसे मन में हम क्या डाल रहे हैं, उसको भी हमें ध्यान देना चाहिए।
उसके बाद में एक अमेरिकन विद्यार्थी आया, उसने बताया कि “मुझे आपसे अकेले में कुछ बात करनी है।” क्या हुआ? बोला कि, “मैं इस क्लास के पहले ही आत्महत्या करने के बारे में सोच रहा था।” क्या हुआ? तो उसने बताया कि, मेरा किसी लड़की से सम्बन्ध था, और अच्छा रिलेशन (Relation) चल रहा था। तो वो रिलेशन का ब्रेकअप (Breakup) हो गया और इसका ब्रेकडाउन (Breakdown) हो गया।
तो अभी वो इतना हताश हो गया था कि मैं सोच रहा था… ऐसे हताश हो के कैंपस (Campus) में घूम रहा था। और तभी मैं सोच रहा था कि शायद “मुझे इस जीने का मतलब क्या है?” और तभी मैंने ये पोस्टर (Poster) देख लिया, जो मेरा प्रोग्राम था, कि सोच रहा था तो मैंने “चलो देखते हैं कि क्या है इसमें?” तो बोला कि, “अभी मैं यहाँ पर आया, तो मैंने समझा कि वास्तव में मैं आत्महत्या नहीं करना चाहता, मेरा जो मन है, वो बोल रहा है तुम आत्महत्या करो, आत्महत्या करो, आत्महत्या करो!”
क्या हो गया है? तो मैंने उसको बताया कि “तुमने जीवन बचाने के लिए, तुमको ऐसी समझ हो गयी है।” तो मैंने उसको बताया कि वहाँ पर भक्तियोग क्लब (Bhakti Yoga Club) होता है, वहाँ पर आप जा सकते हैं। उसको भगवद-गीता पढ़ने के लिए एनकरेज (Encourage) किया। मेरी एक वेबसाइट है Gita Daily (गीता डेली), इसमें मैं रोज़ भगवद-गीता के आधार पर, थोड़ा सा 300 शब्दों का एक लेख लिखता हूँ।
तो उसके बाद में, जब भी मैं वहाँ पर जाता हूँ, सीनियर्स से बात करता हूँ। तो अभी पिछले साल, पिछले साल जब मैं वहाँ पर गया था, तो वापस वो लड़का मुझे मिला। और उसने कहा कि, “पुनः मेरे जीवन में वैसे ही प्रसंग आ रहा था। कि मैं एक स्टेडी रिलेशनशिप (Steady Relationship) में था।” अभी उनके लिए, ख़ास करके अमेरिका में कैसे है, कि अगर कोई रिश्ता है, कोई रिलेशनशिप, अगर दो-तीन महीने से ज़्यादा चला, तो उसको बहुत ‘स्टेडी रिलेशनशिप’ कहा जाता है। क्योंकि ब्रेकअप्स ऐसे होते रहते हैं, इतने सारे ब्रेकअप्स होते रहते हैं।
हताश होके उसने कमरे में अपना दरवाज़ा बंद कर लिया, खिड़कियां बंद कर लिया, उसमें कर्टन (Curtain) डाल दिया, सारी अंदर लाइट बंद कर दी। और अभी इतने समय से वो भक्तियोग क्लब में वहाँ पे आ रहा था, और उसको थोड़ा संगीत में रुचि थी, तो वायलिन (Violin) बजाया करता था। तो जब कीर्तन होता था तो वायलिन प्ले करते हुए, कीर्तन में साथ बजाया था।
तो जब ऐसे हो गया, पूरा उसने अंधेरा कर लिया अपने रूम में। और फिर अचानक उसको कुछ विचार आया, और उसने अपना वायलिन उठा लिया। और वायलिन उठा के वो हरे कृष्णा कीर्तन करने लग गया। वो छह घंटे तक अकेला उस अंधेरे में हरे कृष्णा कीर्तन कर रहा था। और छह घंटे का मैंने कीर्तन किया, तो तभी चारों ओर अंधेरा था, पर मुझे लग रहा था कि मेरे हृदय में एक रोशनी है। मुझे ऐसे लग रहा था कि भगवान ने मुझे अलाइन (Align) कर लिया है।
मन का साथ और समय की बचत
परिवर्तित हो जाएगा, तो फिर हमें जो भी कार्य करना है हमारे जीवन में—आपकी पढ़ाई हो, आपकी नौकरी हो, आपके परिवार की ज़िम्मेदारी हो, जो भी है—हमारा जो मन है, हमारे साथ रहेगा। हमारा मन साथ में नहीं होता है, तो जो पाँच मिनट का काम है, उसको एक घंटा लग सकता है, उसको पाँच घंटे लग सकते हैं, पाँच दिन लग सकते हैं, क्योंकि हम इधर-उधर उसको मन भटकाते रहेंगे। पर अगर मन साथ में रहेगा, मन नियंत्रण में रहेगा, तो पाँच मिनट का काम पाँच मिनट में कर लेंगे और आगे बढ़ सकते हैं।
हाँ, हम सबके पास समय की कमी है। पर हमें समझना है कि हमारे जीवन के कार्य ही हमारा समय नहीं लेते हैं, हमारा मन भी हमारा समय लेता है! तो हमारे क्लासरूम में बैठे, एक लेक्चर सुन रहे हैं। और एक घंटा वो मन “इसने ऐसे क्यों बोला, उसने ऐसे क्यों किया, उसने ऐसे क्यों किया…” तो हमारे क्लासरूम में तो होगा कि एक घंटा मैं एक लेक्चर में बैठा था। पर वास्तव में उस एक घंटे में मैं कुछ भी पढ़ाई नहीं कर पाया, कुछ भी समझ नहीं पाया। और वही एक घंटा जो मैं समझ नहीं पाया, बाद में शायद मुझे 3-4 घंटे लगाने पड़ेंगे समझने के लिए।
तो क्या है, हमारा मन हमारे शेड्यूल (Schedule) के अंदर से ही बहुत सा हमारा समय खा लेता है। हमको लगता है मैं एक समय, एक चीज़ पर ज़ोर दे रहा हूँ, पर वो मन वो समय खा लेता है सीक्रेटली (Secretly)। तो जो इस तरह से मन हमारा समय खा लेता है, वो समय सारा बच जाएगा। जो भी कार्य करना है, हमारा मन नियंत्रण में है, तो हम कार्य ध्यानपूर्वक कर पाएंगे। इसलिए आध्यात्मिकता आपका टाइम वेस्ट (Waste Time) नहीं करती है। कभी-कभी जानबूझ के कर देते हैं, कभी-कभी अनजाने में हो जाते हैं, हम समझ नहीं पाते हैं, एक वेस्ट हो रहा है।
छोटी शुरुआत और चमत्कारी परिवर्तन (Evolutionary Process)
तो इस तरह से जो भक्ति से हमारे जीवन में ट्रांसफॉर्मेशन (Transformation) हो जाएगा, जो परिवर्तन हो जाएगा, वह छोटे-छोटे कार्यों से बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाएगा। तो Process of Devotion is Evolutionary (भक्ति की प्रक्रिया विकासवादी है)। कि इवोल्यूशनरी, छोटा-छोटा-छोटा परिवर्तन है। यह उसकी पद्धति है। आप थोड़ा जप करते हैं, थोड़ा भगवद-गीता पढ़ते हैं, थोड़ा सत्संग में आते हैं, पर छोटा-छोटा-छोटा करेंगे तो क्या होगा? इससे एक चमत्कारिक परिवर्तन हो जाएगा।
ऐसा परिवर्तन हो जाएगा, जिससे कि आप जीवन में जो भी करना है, वो और ज़िम्मेदारी से, और सक्षमता से, और यशस्वी पद्धति से हम कर पाएंगे।
सारांश (Summary)
तो सारांश में, आज मैंने चर्चा की किस विषय पे? क्योंकि मन एक बंदर है, उसे हमें एक गधा न बनाने दें। तो मैंने चार मुख्य पॉइंट पहले चर्चा की कि मन क्या है? मनोविज्ञान को पता नहीं, मनोविज्ञान कहता है कि, मनोविज्ञान मन का अध्ययन करके बर्ताव का अध्ययन करता है। तो हमें विज्ञानी दृष्टि से मन क्या है पता नहीं है, आध्यात्मिक विज्ञान से हम देख सकते हैं, मन क्या है? शरीर और आत्मा के बीच का लिंक (Link) है। तो अगर मन कहीं और चला गया, तो हम किसी भी चीज़ के लिए ध्यान नहीं दे सकते हैं। तो मन एक सॉफ्टवेयर के समान है, जो हार्डवेयर और यूज़र के बीच काम करता है। हार्डवेयर शरीर है, मन सॉफ्टवेयर है, आत्मा यूज़र है।
तो जैसे ये सॉफ्टवेयर पे, कभी वो एक सॉफ्टवेयर खिड़की के रूप में काम कर रहा है, या वहीं टीवी के रूप में काम कर रहा है। तब बदल जाता है, व्यक्ति मोहित हो जाता है। तो हमारा मन एक बंदर के समान है, जो कभी ये टीवी पे दिखा रहा है—”ये कार्यक्रम दिखा रहा है, वो कार्यक्रम दिखा रहा है, वो कार्यक्रम दिखा रहा है,” और उस तरह से हम पागल जैसे हो जाते हैं। जो वास्तव में पागल लोग होते हैं, वो टीवी पे जो दिखा रहा है, उसको जो सत्य है, उससे ज़्यादा सत्य मान लेते हैं। पर हम भी उसी दिशा में कभी-कभी चले जाते हैं। तो मन बंदर समान होता है, तो हम विचारों में खो जाते हैं, बहुत सा समय चला जाता है, कुछ कर नहीं पाते।
पर मन जब हमको गधा बना लेता है, तो मतलब क्या होता है? वो किसी एक चीज़ से इतना आसक्त हो जाता है, कि हमारी सारी मानसिक, शारीरिक शक्ति उसी में चली जाती है। तो उसमें रेज़ेंटमेंट (Resentment) के बारे में चर्चा की। जो हो गया, कोई दो चर्चा की मैंने, एडिक्शन (Addiction) और रेज़ेंटमेंट। जो युद्ध हार गए हैं, उसको पुनः-पुनः करते रहते हैं। सारा समय भूतकाल में खुद को फँसा देते हैं। तो हमको स्वीकृति करनी है, “जो हो गया है, ये हो गया है, अभी मैं आगे क्या कर सकता हूँ?”
पूरा मन, आपकी मानसिक शक्ति कुछ गधे के समान, जिद्द बहुत है। मन हमें गधा बना सकता है, हमको खूंखार जानवर भी बना सकता है। जो गुनाह करके, जो एडिक्टेड लोग होते हैं, कोई गुनेहगार हत्यारे भी बन जाते हैं। तो मन कैसे बंदर है, कैसे हमको गधा बनाता है, ये दो पॉइंट हैं।
तो तीसरा पॉइंट ऐसा किया, कि इसको हम परिवर्तन कैसे कर सकते हैं? तो उसमें ये तीन पॉइंट में देखा:
- सबसे पहले परिवर्तन की इच्छा होनी चाहिए (संकल्प)।
- उसके बाद बुद्धि को सतर्क करना है, जिससे कि हम मन से न देखें, और उसके पहले मन को देखें। बुद्धि से हम चौकन्ने हो जाते हैं।
- इंक्लिनेशन (Inclination) मतलब क्या? कि जो मन की प्रवृत्ति है, उसको बदलने का प्रयास करते हैं। जो Bollywood.com आ रहा है, बार-बार भगवद-गीता पे जाएंगे, तो Bhagavadgita.com आ जाएगा। तो अभी हमारे मन की प्रवृत्ति जो भी हो, तो फिर भी अगर हम बार-बार सकारात्मक कार्य करते रहें, तो सकारात्मक प्रवृत्ति आ जाएगी।
और आखिरी पॉइंट जो देखा, कैसे अगर हम भक्ति करते हैं, तो Multiplier Effect होता है। केवल हम परिवर्तन करने का प्रयास नहीं कर रहे, भगवान की शक्ति के द्वारा होता है, उसके सेटिंग (Setting) से चेंज हो जाते हैं। एक पल में सेटिंग बदल देते हैं, भगवान कर सकते हैं।
इसमें विद्यार्थी का उदाहरण बताया, जो आत्महत्या करने के लिए निकला था, पर भगवान की भक्ति की तो उससे क्या हो गया? तो भगवान का आश्रय ग्रहण कर लिया। और फिर वो बच गया, पर वो और परिवर्तित हो गया उससे। He felt enriched instead of depressed (वह उदास होने के बजाय समृद्ध महसूस कर रहा था)।
और अगर हमको लगता है कि हमारे पास भगवान के लिए समय नहीं है, तो हमें देखना चाहिए कि हमारा मन हमारा कितना सारा समय खा रहा है। और हमारा आध्यात्म ही हमारा काम का समय लेके नहीं जाएगा, हमारा जो गवाया हुआ समय है, वो हमसे बचा लेगा, वो दे देगा, और उससे हमको और समय आ जाएगा। तो इस तरह से हम मन की प्रवृत्तियां अगर बदल लेते हैं, मन को नियंत्रित कर लेते हैं, तो मन हमारा मित्र बन जाएगा। जो भी चीज़ हम करना चाहते हैं, वो और ध्यानपूर्वक, और सकारात्मक पद्धति से, और यशस्वी पद्धति से हम कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा। कोई पूछ रहा है? अच्छा, आप हैं।
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A Session)
प्रश्न: अच्छी आदत कैसे डाल सकते हैं? और कोई यशस्वी हुआ है, कैसे कोई शेयर कर सकते हैं?
उत्तर: एक बार तीन फ्रॉग्स (मेंढक), वो एक कुएं के तट पर बैठे हुए थे। तो उनमें से दो मेंढकों ने फैसला किया कि वो कुएं में कूदने वाले हैं। तो कितने मेंढक बच गए? एक या तीन? तीन। हाँ तीन! फैसला करने से कुछ नहीं होता है, करना पड़ता है। दो मेंढकों ने फैसला किया कूदने का।
तो वैसे क्या है, अच्छी आदतें कैसे लगानी हैं? करना है शुरू! तो ऐसे कुछ नहीं है कि आदत मतलब कोई चमत्कारिक चीज़ है। जब इसे करने लगते हैं, तो करने से… कई बार हमें लगता है कि “मुझे जब इच्छा आ जाएगी, प्रेरणा आ जाएगी, उसके बाद मैं ये कार्य करूँगा।”
कभी कोई ऐसे हो सकता है, पर अधिकांश रूप से, हम सोचते हैं मुझे जब प्रेरणा आएगी तब मैं करूँगा। तो अच्छा है, हम सबको मोटिवेशन (Motivation) चाहिए। पर क्या है कि हमारी जो भावना है, वो ऐसे रिलायबल (Reliable) नहीं है। आज अच्छा लगता है, कल बहुत उतना अच्छा नहीं लगता है। इसलिए अगर हम पहले ‘भावना चाहिए, फिर मैं कार्य करूँगा’ सोचेंगे, तो फिर कुछ नहीं होगा। लगता है कि कार्य गिर जाएगा।
पर डेडिकेशन (Dedication), समर्पण का मतलब क्या है? पहले कार्य, फिर भावना। मुझे लगे या नहीं लगे मैं यह करूँगा, और वो करूँगा। तो क्या होता है, करने लगते हैं, तो धीरे-धीरे भावना भी आ जाती है। तो इसलिए हम फैसला कर लें, “करो, करना है!” और शुरू कर लें। जो सकारात्मक कार्य हम करना चाहते हैं, तो शुरू कर लें।
और इसमें यश के बारे में कुछ अच्छी बात बताऊँ। पिछले चार-पाँच सालों से मैं काफी ट्रैवल (Travel) कर रहा हूँ, पाश्चात्य देशों में बहुत जा रहा हूँ। तो सात-आठ महीने मैं साल में बाहर रहता हूँ। इससे ट्रैवल बढ़ गया है, तो मेरी राइटिंग (Writing) काफी कम हो गई है। तो मैं ‘गीता डेली’ तो लिखता हूँ रोज़, पर मुझे बाकी और ग्रंथ लिखने हैं, बड़े लिखने होते हैं, समय नहीं मिल रहा था।
तो फिर तब मैंने फैसला किया… कई बार मैं सोचता “समय मिलेगा तो मैं पूरा ग्रंथ लिख दूँगा।” पर वो समय मिलता ही नहीं है। तो मैंने ये फैसला किया कि “मैं रोज़ कम से कम 6 मिनट लिखूंगा!”
और 6 मिनट इतना भी कम नहीं कि कुछ नहीं लिख सकते हैं, और इतना भी बड़ा नहीं है कि “अरे, 6 मिनट क्या लिखूंगा मैं?” मेरा साधारण नियम है कि 6 मिनट में कम से कम, नहीं लिख सकता हूँ तो कभी-कभी 2500 शब्द लिख सकता हूँ, कभी कोई आईडिया होगा तो 333 शब्द लिख सकता हूँ। वो फाइनल नहीं है, पर वो कम से कम कुछ तो आगे बढ़ेगा।
तो जब से मैंने चालू कर दिया है ये, तो मैं देख रहा हूँ कि लिखते जा रहा हूँ, लिखते जा रहा हूँ, लिखते जा रहा हूँ। और फिर अभी कभी-कभी होता है, जैसे ही समय मिल जाता है, मैं नॉर्मल (Normal) लिखता हूँ कंप्यूटर पर। पर अभी जब भी ये समय मिलता है, मैं कहीं फ्लाइट का इंतज़ार कर रहा हूँ, बोर्डिंग गेट पर बैठा हूँ, खड़ा हूँ, तो तभी मैं ये फोन निकाल लेता हूँ। और फोन पे 6 मिनट के लिए लिखता हूँ।
तो जैसे ही वो 6 मिनट की आदत डाल दी मैंने, तो क्या होता है? जैसे ही समय मिल जाता है, उसकी ओर मन प्रवृत्त होता है। तो उस तरह से, हमको छोटी सी आदत अगर हम डालते हैं, तो उन छोटी-छोटी आदतों का भी बड़ा प्रभाव हो सकता है। तो हम सबको शुरुआत करनी है। हम विचार बहुत करते हैं। अगर अच्छा इरादा है, अच्छा इंटेंशन है, तो शुरुआत करें। और कर देंगे तो भावनाएं आ जाएंगी।
अगर आपका कुछ सवाल है? मैक (Mic) कहाँ है? अच्छा। उधर भी मैक है? हाँ, आपके पास रखें। बोलिए।
प्रश्न: हमारा मन जो चंचल रहता है, हमारे भोजन से प्रभाव होता है क्या? हम जो अन्न लेते हैं, अलग-अलग प्रकार के…
उत्तर: वाइब्रेशन्स (Vibrations)। दुनिया में कहते हैं वाइब्रेशन्स होते हैं, सूक्ष्म विचार होते हैं। भगवद-गीता में कुछ सत्वगुण, कुछ तमोगुण की बात है। जब जानवर को मारा जा रहा है, तो अधिकांश लोग जो जानवर को मारते हैं, वो पहले उनको बेहोश करने के लिए नहीं मारते हैं। क्योंकि बेहोश करने को भी दवाई देनी पड़ती है, उसका खर्चा आ जाता है। तो वो नहीं करते हैं, वो सेडेट (Sedate) नहीं करते हैं, डायरेक्टली (Directly) उनको मार रहे होते हैं।
तो क्या होता है, उनको बहुत क्रोध आता है, “क्यों मुझे ये मार रहे हैं?” और भय होता है, “ये मुझे मार रहे हैं।” तो वो सारी जो भावना होती है, वो उस जानवर के न केवल शरीर में होती है, न केवल मन में होती है, पर शरीर में भी उसका प्रभाव आ जाता है। जैसे हम देखते हैं, गुस्सा आ गया तो क्या? हमारा हृदय पैल्पिटेट (Palpitate) करने लगता है। तो हमारी भावना का शारीरिक स्तर पर प्रभाव होता है, एक सूक्ष्म स्तर पर।
वो जो जानवर की चेतना होती है मृत्यु के मरने के समय, वो चेतना हमारे मन में आ जाती है। तो हम देखेंगे कि अगर हम मांस खाना कम कर देंगे, मांस खाना बंद कर देंगे, तो हमारे मन को शांत करना आसान हो जाता है। जितना हम सात्विक अन्न खाते हैं, ऐसा अन्न खाते हैं जो हमारे अंदर ज़्यादा वासनाएं जागृत नहीं करेगा, तो उस समय मन को शांत करना आसान हो जाता है।
प्रश्न: तो मन कैसे फैसला करता है क्या अच्छा है क्या बुरा है? क्या पूर्व यादों के आधार पर है, पूर्व अनुभवों के आधार पर है?
उत्तर: हाँ, ज़रूर। अभी मन ये शब्द जो है, इसके अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं। पर अभी हम कहते हैं, अगर हमारे अंदर मन है और बुद्धि है, दो चीज़ें हैं। तो मन सब भावनाओं पर जाता है—”क्या मुझे अच्छा लगता है, ये मुझे अच्छा नहीं लगता है।” और वो किस आधार पर होता है? कि जो चीज़ उसने पहले अनुभव की है और अच्छा लगा है—”ये अच्छा है, ये पहले अनुभव किया है तो अच्छा है, ये अच्छा नहीं है।” तो क्या है, मन भावनाओं पर जाता है। बुद्धि विचार करती है, सवाल पूछती है, ध्यानपूर्वक विश्लेषण करती है।
तो कई बार जो हमारे मन को अच्छा लगता है, वो केवल भावनाओं पर जा रहा है, पूर्व अनुभव आये हैं, उसकी यादों पर जा रहा है। मन कैसे है, एक तरह से मैकेनिकल है। मान लीजिये अगर हम पहले किसी साइट पर गए थे और उस साइट ने हमारे कंप्यूटर को खराब कर दिया। पर फिर भी अगर वो साइट वहाँ पर रिकॉर्ड हो गया है, तो अगली बार वो साइट का नाम अपने आप आ जाएगा। अगर कोई एंटी-वायरस वगैरा डाला नहीं हमने, तो साइट तुरंत ऑटो-कम्प्लीट में आ जाएगा।
पर अगर एंटी-वायरस डाला है, तो वो उसको रोक लेगा। हमारा मन केवल स्मृतियों और अनुभवों के आधार पर चलता है। जो शराबी होता है, जब शराब पीता है, तो वो कुछ समय के लिए अच्छा रहता है। और उसके बाद में अगले दिन उठ जाता है तो हैंगओवर (Hangover) होता है, सरदर्द होता है। तो मन को जब अगली बार शराब पीना होता है, तो हैंगओवर याद नहीं आता है, वो शराब का सुख याद आता है।
इसलिए “Not only is the mind a creature of emotion, but the mind is a creature of selective emotion.” उसको वो जो आसक्ति के अनुकूल जो भावना है, वो याद रहती है। आसक्ति के प्रतिकूल जो भावना है, वो याद नहीं रहती है। तो इसलिए हमें बुद्धि को सुदृढ़ बनाना चाहिए। तो मन भावना के साथ “कोई अच्छा है, ये बुरा है” कहेगा, पर हमें बुद्धि को सुदृढ़ बनाना चाहिए कि, “क्या सही में ये अच्छा है? सही में ये बुरा है?” तो जज (Judge) करेंगे तो फिर हम उचित फैसला कर पाएंगे।
प्रश्न: हम शुरू करते हैं पर बीच में रुक जाते हैं, तो हम हमारा रिज़ॉल्यूशन (Resolution) कैसे बनाएं? शुरू में जो नहीं कर सके, हम फ्रस्ट्रेट (Frustrate) हो सकते हैं।
उत्तर: कि “मैं रोज़ करूँगा।” तो ये क्या है? अगर जैसे हम मन को बोलते हैं, “I will do this lifelong” (मैं इसे ज़िंदगी भर करूँगा)। The mind says it is too long (मन कहता है यह बहुत लंबा है)। मैं ज़िंदगी भर करूँगा? बाप रे, ज़िंदगी भर! वो मन बोलेगा एक दिन भी मत करो, बहुत हो गया।
तो इसलिए ज़िंदगी भर की बात ये बहुत बड़ी हो जाती है। कभी-कभी उससे प्रेरणा मिल सकती है, पर अधिकांश रूप से ज़िंदगी भर बहुत लंबा लगता है। तो इसलिए हम ऐसे जो ध्येय हैं, टैंजिबल (Tangible) ध्येय रखें। बहुत बड़ा ध्येय रखते हैं, तो फिर क्या होता है? हमारा मन इतना धूर्त है, अगर हम ऐसा उद्देश्य रखते हैं कि “मैं इसे ज़िंदगी भर करने वाला हूँ,” तो फिर क्या है? अगर हमने छह महीने भी किया वो, तो भी क्या लगता है, छह महीने के बाद एक दिन नहीं किया, तो हमको यश की भावना नहीं होती है, हमको पराजय की भावना होती है। और मन कहता है, “देखो तुम पूरा नहीं कर पाए, नहीं कर पाए, छोड़ दो तुम इसको!”
तो इसलिए क्या है, कि हम एक फाइनाइट गोल (Finite Goal) रखते हैं, कि “मैं यह एक महीने के लिए ऐसे करूँगा।” पर एक महीने के लिए अगर हम ध्यानपूर्वक करते हैं, तो उसके बाद में क्या होता है, “अच्छा, मैंने किया यह, अच्छा लगा, मुझे यह फायदा हुआ, यह फायदा हुआ, इतना मुश्किल नहीं था, कर पाया… एक और महीने करूँगा, एक और महीने करूँगा।”
जो भले ही उद्देश्य ज़िंदगी भर करने का हो, पर जब हम दर्शन काल देते हैं, तो ज़िंदगी भर के उस पर ज़ोर देते हैं, तो होता नहीं है। तो इसलिए, Finite Goals, and repeat those Finite Goals. “इस समय के लिए करूँगा, फिर मैं देखूँगा, कैसे इससे फायदा हुआ मुझे, कैसे मुझे अच्छा लग रहा है, क्या-क्या परिणाम हुआ इसका, और फिर एक और महीने करूँगा।”
और कभी अगर कोई चीज़ नहीं भी हुई, तो भी ऐसे नहीं कि एक दिन अगर हार हो गई, तो ऐसे नहीं कि ज़िंदगी भर का वो सारा पानी फिर गया उसपे। हमने जितने समय तक वो किया, उससे फायदा ही होने वाला है। फिर छोड़ दिया, छोड़ दिया… पुनः चालू कर सकते हैं! इसको कहते हैं रेज़िलियन्स (Resilience), मतलब “मैं गिर गया, पुनः उठ जाऊँगा मैं।”
मेरे एक मित्र पायलट हैं, वो बता रहे थे मुझे कि जब कोई फ्लाइट जाता है, मान लीजिये जब मुम्बई से न्यूयॉर्क फ्लाइट जा रहा है, तो 90% समय ये फ्लाइट ऑफ कोर्स (Off Course) रहता है! तो फिर वो न्यूयॉर्क पहुँचता कैसे है? क्योंकि बार-बार वो पायलट जो है, रिओरिएंट (Reorient) करता है फ्लाइट को। हवा के दबाव के कारण, वातावरण के कारण फ्लाइट दूर जाता है, पुनः ऑन कोर्स (On Course) करता है।
तो ऐसा ही हमारा होता है। हम सीधा एक लकीर के समान नहीं जा पाएंगे अधिकांश रूप से। आगे चले गए, कहीं जाते गुमराह हो गए, वापस आ जाएंगे। तो वो प्रक्रिया है। तो ठीक है, गुमराह हो भी गए, तो खुद को पीटो मत कि “क्यों हो गया, ऐसे नहीं। इस समय तक तो मैं जा पाया, वापस जा पाऊँगा।” खुद के प्रति हमें क्षमाशील होना चाहिए, खुद को उत्साहित करना है, हतोत्साहित नहीं करना है।
प्रश्न: भगवद-गीता भगवान ने बोली है, इसका क्या सबूत है?
उत्तर: अगर मैं आपको पूछता हूँ कि अभी न्यूयॉर्क में टाइम क्या है? तो मैं बताऊँगा शायद 8:34 है। अभी आप नहीं मानोगे 8:34। मैं चेक कर सकता हूँ गूगल पे या किसी को न्यूयॉर्क में फोन कर सकता हूँ टाइम क्या है। तो टाइम क्या है इसका प्रूफ (Proof) जो है वो एक पद्धति से प्राप्त होता है आपको।
अगर मैं आपको पूछता हूँ, “क्या आपकी माँ आपसे प्रेम करती हैं?” हाँ, ऑफ कोर्स। क्या सबूत है उसका? “उसका सबूत है मैं जब जाता हूँ, मेरी माँ मुझसे बात करती हैं, अच्छे स्नेह से देखभाल करती हैं।” नहीं, मुझे एक क्वांटिफायबल (Quantifiable) सबूत दिखाओ! तो उसका सबूत अलग पद्धति से होता है।
तो अभी अलग-अलग चीज़ों में सबूत जो है, अलग-अलग पद्धति से होता है कि वो सबूत ही है। पर जो सबूत है, जिस प्रकार का जो ऑब्जेक्टिवली (Objectively) जो सबूत हम दिखा सकते हैं कि “यहाँ का समय यह है” या “मेरे शरीर का टेम्परेचर यह है”, उस प्रकार का सबूत हम इसके लिए नहीं दे सकते कि “मेरी माँ मुझसे प्रेम करती हैं।” वो भी सत्य है और वास्तव में वह हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण सत्य है। तो अलग-अलग सत्यों के लिए अलग-अलग प्रकार के सबूत होते हैं।
तो अभी भगवद-गीता यह भगवान ने बोली है, इसका हम सबूत चाहते हैं, तो क्या सबूत चाहिए? क्या हम चाहते हैं कि भगवान हमारे सामने अभी यहाँ पे आएं और भगवद-गीता बोलें, और तभी हमको लगेगा कि भगवान ने बताया है? तो जो ऐतिहासिक चीज़ें हुई हैं, उनका सबूत हमेशा कैसे आता है? इंफरेंस (Inference) मतलब जो जानकारी है, जानकारी से हम एक निष्कर्ष निकालते हैं।
आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी (Archaeoastronomy) जो आर्कियोलॉजी (Archaeology) से सम्बंधित है, भूतकाल में क्या हुआ उसका संशोधन किया है और देखा कि बराबर लगभग 5000 साल पहले वो वास्तव में आसमान में ऐसे ही ग्रहण हुए थे जैसे महाभारत में बताये गए। तो इससे अलग-अलग ऐतिहासिक निष्कर्ष हम निकाल सकते हैं।
पर सबसे महत्वपूर्ण हमारा निष्कर्ष ये है कि अगर मान लीजिये भगवद-गीता एक ‘Manual for Life’ (जीवन का मैनुअल) है, वो हमारे जीवन के लिए मार्गदर्शन का एक ग्रंथ है। तो हम देख सकते हैं कि उसके मार्गदर्शन से मेरे जीवन में क्या फर्क पड़ता है। अगर हमारे पास कोई डिवाइस (Device) है और ये उसका मैनुअल (Manual) है। तो अभी हम कैसे बता सकते हैं कि ये इसी डिवाइस का मैनुअल है, ये किसी और का मैनुअल नहीं है? हम देख सकते हैं कि ये मैनुअल पढ़के मुझे डिवाइस जो है और अच्छा समझ में आता है—”अच्छा, ये बटन का ये काम है, ये दबाया तो अच्छा होता है।” तो मैनुअल से हम वो डिवाइस को अच्छा समझ सकते हैं।
और दूसरा, मैनुअल के अनुसार अगर हम काम करते हैं, तो वो डिवाइस से अच्छा काम होता है। तो उसी तरह से हम भगवद-गीता की भी जांच कर सकते हैं। कि अगर भगवद-गीता मैं पढ़ता हूँ, उससे मैं जीवन को और अच्छे से समझ सकता हूँ, खुद को और अच्छे से समझ सकता हूँ, दुनिया को और अच्छे से समझ सकता हूँ। और फिर भगवद-गीता में जो बताया है उसके अनुसार अगर मैं जीवन जीता हूँ, तो मेरे जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है, मैं शांत हो जाता हूँ, और संतुष्ट हो जाता हूँ, और सुखी हो जाता हूँ। मेरी जो वासनाएं कम हो जाती हैं।
तो यह इस प्रकार से हमको एक प्रायोगिक (Practical) सबूत हो सकता है कि यह मैनुअल इसलिए है, यह भगवान का दिया हुआ मैनुअल इसलिए है क्योंकि इसके अनुसार जीने से मेरे जीवन की क्वालिटी (Quality) और बढ़ सकती है। तो इसलिए जो उचित प्रकार का सबूत है—क्या सबूत ऐतिहासिक चीज़ के लिए होगा, क्या सबूत एक दिव्य चीज़ के लिए होगा—वो उचित प्रकार का सबूत क्या है, समझ लेंगे हम तो फिर हमको हमारे जीवन में ही भगवद-गीता की दिव्यता का सबूत मिल सकता है। हरे कृष्णा।
प्रश्न: क्या स्पिरिचुअलिटी (Spirituality) ही इकलौता मार्ग है मन के सुधार की?
उत्तर: नहीं। अभी क्योंकि मन को नियंत्रण करने के लिए अनेक पद्धतियां हैं। पर मैंने बताया कि अध्यात्म में, ख़ास करके भक्ति मार्ग में क्या है, उसमें Multiplier Effect (मल्टीप्लायर इफेक्ट) है। बाकी सब जो पद्धतियां हैं, उसमें मल्टीप्लायर इफेक्ट नहीं होगा। आप एक साइकोलॉजिस्ट (Psychologist) के पास जाओगे और उसको बताओगे मेरा मन ऐसे जा रहा है, वो बताएगा, उससे भी फायदा हो सकता है।
पर दो चीज़ें हैं—एक है मन को शांत करना, दूसरा मन को शुद्ध करना है। मन को नियंत्रित करने के लिए प्यूरिफिकेशन (Purification) और प्यूरिफाइड (Purified) मन चाहिए। तो हम अलग-अलग पद्धतियां हैं, सात्विक है, राजसिक है, तामसिक है। सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण हैं। तो सत्वगुण में जो भी चीज़ें हमको लाती हैं उससे भी मन शांत हो जाता है। तो बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो हमारे मन को शांत कर सकती हैं। और उनका भी फायदा है, पर शांति ये केवल कुछ समय के लिए रहेगी। पुनः मन अशांत हो जाएगा। पर अगर मन शुद्ध हो जाएगा, तो शांति स्थिरता से रहेगी।
तो जैसे बीमारी होती है, तो बीमारी है और दर्द है उसको, दर्द हो रहा है बहुत उसको। तो फिर वो डॉक्टर के पास जाएगा, तो डॉक्टर उसको एक पेनकिलर (Painkiller) देंगे, और कुछ दवाई मिल जाएगी। तो अभी जो पेनकिलर है, उससे शायद तुरंत राहत मिल जाती है, पर पेनकिलर से बीमारी ठीक नहीं हो रही है। दवाई है, दवाई से ठीक होती है।
अगर व्यक्ति को बहुत दर्द हो रहा है, तो डॉक्टर पेनकिलर भी दे सकता है। पर पेनकिलर से क्या होता है, वो पेनकिलर से दर्द से इतना राहत मिल जाता है कि वो दवाई अच्छे से ले सके। और दवाई से वो ठीक होता है। तो जो आध्यात्म के अलावा, जो भी मन को नियंत्रित करने के लिए जो मार्ग हैं, वो सब पेनकिलर के समान हैं। वो राहत देंगे हमको।
पर वो जो मन को विचलित करने का प्रधान कारण क्या है, वो केवल “ये समस्या आ गई, ये वो समस्या आ गई, ये ऐसे हो गई”—वो नहीं है। वो मन में जो अशुद्धता है, वो प्रधान कारण है। और मन की अशुद्धता को निकालने के लिए, जो परम शुद्ध भगवान हैं, उनका संग करना, उनके साथ में जाना, उनके सानिध्य में जाना, यही सबसे अच्छा मार्ग है। तो दूसरे मार्गों से भी मन शांत हो सकता है, पर भक्ति से मन शुद्ध हो जाएगा।
बाजू में एक क्वेश्चन था, लास्ट क्वेश्चन हो जाएगा।
प्रश्न: हाँ, तो हम यहाँ मन की बात कर रहे हैं, concentration और distraction की बात कर रहे हैं। मैं एक example लेता हूँ कि मैं दिन में 3 घंटे काम करता हूँ, और बाकी 3 घंटे movies देखता हूँ। तो जो मैंने 3 घंटे movies देखे, उसकी वजह से मेरे काम में भी disturbance होता है। तो मुझे 3 घंटे का काम, 4 घंटे और more than that लगेगा। तो अभी आपने बोला कि, time को भगवान की भक्ति में लगाओ। तो लेट से, मैं 3 घंटे जो movies देखता था, उसमें से मैंने 2 घंटे भगवान की पूजा में लगाए। और एक घंटे movie देखता हूँ। तो ऐसा भी तो हो सकता है, जो मैं 3 घंटे काम कर रहा हूँ, उसमें मुझे distraction हो रही है, उस भक्ति की वजह से! मैं उस 3 घंटे काम करने के टाइम भी, भगवान के बारे में सोच रहा हूँ। इसके इफेक्ट नहीं हैं?
उत्तर: इसके लिए आप भक्ति के बारे में सोच रहे हैं। तो वो भक्ति की परिभाषा पूर्ण नहीं है। मैं जो हूँ, यह भगवान के लिए अंश हूँ। मैं जो काम करता हूँ, वो मैं भगवान को भेंट दे रहा हूँ। इस भाव से हम कार्य करते हैं, तो हमारा जो काम भी है, हम भक्ति भाव से करेंगे। और फिर हम वास्तव में और ज़िम्मेदारी से करेंगे।
अब पहले हमारी कोई भौतिक ज़रूरत है, “मुझे नौकरी चाहिए, मुझे पैसे चाहिए”—काम कर रहे हैं। या हमारा अहंकार है, “मुझे दिखाना है, मैं कितना बड़ा, कितना अच्छा हूँ, कितना यशस्वी हूँ”—उसके लिए कर रहे हैं। पर जब भक्ति भाव से करते हैं, वो और उच्च उद्देश्य हो जाता है। “मैं भगवान की प्रसन्नता के लिए कर रहा हूँ, मैं ये दुनिया को दिखाना चाहता हूँ, मैं धर्म की प्रस्थापना के लिए कर रहा हूँ।”
जितना उच्च उद्देश्य हो जाएगा, उतनी उच्च प्रेरणा भी हो जाएगी, और उससे हम वो कार्य अच्छे से कर सकते हैं। तो अगर हम भगवान का स्मरण करते हुए सोच रहे हैं कि “काम में ध्यान न देना और भगवान का स्मरण करना”—वो भगवान के स्मरण की उचित परिभाषा नहीं है। भगवान का स्मरण ही किस तरह से होता है, कि भगवान की सेवा के भाव से होता है, पूरा ध्यान उसी में हो।
तो उसी तरह से भक्ति के द्वारा हमारा वास्तव में डिस्ट्रैक्शन नहीं होगा, हमारा अब्सॉर्प्शन (Absorption) और बढ़ जाएगा, कि हमारे काम में जो हम मगन हो जाएंगे, उसके लिए हमें और उच्च उद्देश्य मिलेगा।
बहुत-बहुत धन्यवाद। श्रील प्रभुपाद की जय, गौर भक्त वृंद की जय, निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!