The special place of Bhakti Rasamrita Sindhu among the Vedic scriptures – Hindi
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Lecture Summary
मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- भगवद गीता (आपातकालीन ज्ञान): गीता को एक ‘इमरजेंसी अप्रोच’ (आपातकालीन प्रस्तुति) बताया गया है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि भक्ति ही सर्वोच्च मार्ग है, लेकिन नवधा भक्ति (जैसे कीर्तन, नृत्य आदि) का विस्तृत वर्णन इसमें नहीं है। यह मुख्यतः अर्जुन को कर्तव्य-पथ पर लाने के लिए कही गई थी।
- रामायण और मर्यादा: वाल्मीकि रामायण में भगवान राम को ‘स्वयं भगवान’ के बजाय एक ‘आदर्श मानव’ के रूप में अधिक प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य धर्म और कर्तव्य की शिक्षा देना है। इसी कारण शबरी के ‘जूठे फल’ खाने जैसे शुद्ध और अंतरंग भक्ति के प्रसंगों पर वाल्मीकि रामायण में ज़ोर नहीं दिया गया है।
- महाभारत और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष: महाभारत का केंद्र भगवान कृष्ण नहीं, बल्कि पांडव और भरत वंश हैं। यह ग्रंथ मुख्यतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिखाता है। इसमें अनन्य भक्ति (केवल कृष्ण की पूजा) के स्थान पर आवश्यकतानुसार अन्य देवी-देवताओं (जैसे युधिष्ठिर द्वारा सूर्यदेव की और अर्जुन द्वारा देवी काली की पूजा) का भी वर्णन मिलता है।
- पुराणों का त्रिगुण वर्गीकरण: 18 पुराणों को सत्व, रज और तमोगुण में बांटा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि तामसिक पुराण बुरे हैं, बल्कि वे उस विशिष्ट गुण वाले व्यक्तियों के दृष्टिकोण और स्तर के अनुसार लिखे गए हैं।
- ग्रंथों के अध्ययन का सही तरीका: श्रोताओं को सलाह दी गई है कि वे आचार्यों के ग्रंथों में “नेक्टर शॉपिंग” (केवल अच्छी-अच्छी बातें ढूँढना या दिखावे के लिए पढ़ना) न करें। सबसे पहले श्रील प्रभुपाद के ग्रंथों का व्यवस्थित (Systematic) अध्ययन करना चाहिए ताकि मूलभूत सिद्धांत दृढ़ हो सकें।
- कलियुग में श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा: कलियुग में लोग आध्यात्मिक रूप से कमज़ोर हैं, इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति मार्ग को अत्यंत सुलभ कर दिया है। लेकिन इसका अर्थ नियमों से समझौता करना नहीं है। सच्ची कृपा आध्यात्मिक औषधि (हरिनाम) देना है, न कि भौतिक आसक्तियों को बढ़ावा देना।
- कल्कि अवतार का उद्देश्य: अंत में यह स्पष्ट किया गया है कि भगवान का हर अवतार ‘युगधर्म’ या ज्ञान सिखाने नहीं आता। कलियुग के अंत में आने वाले कल्कि अवतार ज्ञान देने नहीं, बल्कि चरम पर पहुँच चुके अधर्म का सर्वनाश करने के लिए अवतरित होंगे।
Full Transcriptions
वैष्णव गीत और शास्त्रों में भक्ति का स्वरूप
पहली बार जब मैं आया था तो हम चैतन्य चंद्रोदय में आपका स्वागत कर रहे थे। चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव का समय था। आज मैं सोच रहा था कि हम दूसरे विषय पर चर्चा करेंगे। जो हमारे आचार्यों ने वैष्णव गीत लिखे हैं, इसके बारे में हम सोच-चर्चा करेंगे और कुछ गीतों से, कुछ अंश देखेंगे, इससे हम जो भावनाएं हैं, इनको एक तरह से समझ सकते हैं।
तो जो भक्ति है, उसकी समझ धीरे-धीरे अलग-अलग शास्त्रों में है। अगर हम भगवद गीता में देखते हैं, तो भगवद गीता में कहीं नाचने, गाने के बारे में उल्लेख नहीं है। तो भगवद गीता के बारे में प्रभुपाद जी लिखते हैं, कि ये एक इमरजेंसी अप्रोच (Emergency Approach) है, कि ये एक ऐसी आपातकालीन परिस्थिति थी, जो इस समय में वह किताब लिखी गई है।
तो भगवद गीता का उद्देश्य यह है, कि किस तरह से कौन सा कार्य अर्जुन के लिए करना चाहिए, इसका वर्णन भगवद गीता में नहीं दिया, क्यों? क्योंकि अर्जुन इस परिस्थिति में थे, कि वहां पर भक्ति अगर करनी है, तो कैसी करनी है, ये पता है; योग अगर करना है, तो योग कैसे करना है, वो ही पता है; तो कैसे कोई मार्ग अपनाना है, वो पता है। पर स्पष्ट रूप से, यह बताया गया है कि भक्ति ही हमें करनी है, पर भक्ति कैसे करनी है, इसके बारे में ज़्यादा श्लोक नहीं हैं।
नौवें अध्याय में तेरहवें-चौदहवें श्लोक हैं। तेरहवां श्लोक भक्ति के अंतरंग लक्षण बताता है, चौदहवां श्लोक भी बहुत लक्षण बताता है— “महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥” यह महात्मा हैं, तो अंतरंग रूप से पूरी तरह से भगवान के प्रति समर्पित हैं।
रामायण और भागवत में भक्ति की तुलना
और पुराणों और इतिहासों में भी अगर हम देखते हैं, तो अलग-अलग पुराणों और इतिहासों में… अगर हम पुराण और इतिहासों में तीन किताबें लेते हैं, तो एक है रामायण और श्रीमद्भागवत। इन दोनों में कई फर्क हैं। वास्तव में अगर राम लीला के लिए या भागवत के लिए किताबें हैं, तो एक है अध्यात्म रामायण। अध्यात्म रामायण लगभग एक किताब है, जिसको चैतन्य महाप्रभु ने बताया।
राम ये भगवान हैं, उसका ज़ोर से उल्लेख वाल्मीकि रामायण में नहीं है, उसका संकेत ज़रूर है पर उसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है। और स्पष्ट रूप से ज़ोर से उल्लेख नहीं है जो रामायण की शुरुआत में है। पहले भागवतम नहीं था, सार क्या है ये समझना है तो उसकी शुरुआत में, नारद मुनि को वाल्मीकि ऋषि सवाल पूछते हैं कि आदर्श व्यक्ति कौन है? और वह सद्गुणों के बारे में उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि ये गुण दर्शाने वाला कोई व्यक्ति है?
और फिर नारद मुनि वाल्मीकि ऋषि को बताते हैं और वही व्यक्ति है। वहां से शुरुआत होती है। तो इसलिए जो नारद मुनि ने विषय पर बताया है, जिस विषय के अनुसार वाल्मीकि ने ध्यान किया है, उसमें ज़ोर क्या है? कैसे प्रभु श्री रामचंद्र ये आदर्श मानव हैं। तो इसलिए उसमें ज़ोर नहीं दिया है रामायण में कि ये भगवान हैं। तो इसलिए जो रामायण का उद्देश्य है, वह पूरा करने के लिए प्रभु श्री रामचंद्र के दिव्य चरित्रों और मानव चरित्रों पर ज़्यादा ज़ोर दिया है।
इसलिए अगर हम रामायण पढ़ते हैं, तो रामायण में भी हम देखेंगे कि जो स्पष्ट रूप से भक्ति की भावनाएं हैं, वो हैं, पर उतनी शुद्धता से नहीं हैं कि प्रभु श्री रामचंद्र जो हैं, स्वयं भगवान के रूप में लीला नहीं कर रहे हैं, वह एक आदर्श मानव की भूमिका में हैं।
वाल्मीकि रामायण में शबरी प्रसंग का उद्देश्य
इसलिए लोग कहते हैं जो शबरी की लीला है, वह वाल्मीकि रामायण में नहीं है। वास्तव में शबरी का उल्लेख है, पर यह उल्लेख नहीं है कि शबरी ने आधे खाए हुए फल प्रभु श्री रामचंद्र को दिए। शबरी का उल्लेख है और शबरी ने फल दिए यह भी उल्लेख है, पर वह आधे खाए हुए फल थे और वह भाव भी है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में नहीं है।
क्योंकि वाल्मीकि रामायण का ज़ोर है, वह प्रभु श्री रामचंद्र को एक आदर्श व्यक्ति के रूप में दिखाना है, तो वह भगवान हैं, यह उसके ज़ोर में नहीं है। इसके कारण क्या है कि वाल्मीकि ऋषि दिखाते नहीं हैं। कैसे अगर एक आदर्श व्यक्ति हैं, तो शबरी जो है उसको भी एक स्पष्ट रूप से… बाकी जो प्रभु श्री रामचंद्र के चरित्र में आता है। तो जो रामायण है उसमें प्रभु श्री रामचंद्र अनेक चमत्कारी कार्य करते हैं और फिर उन कार्यों के कारण सारे देवी-देवता जो गुणगान करते हैं। राक्षस और विश्वामित्र भी जानते हैं कि ये भगवान हैं।
और रामायण में ऐसे वाल्मीकि जी ने बताया है कि किसी देवी-देवता ने याचना की थी कि यहां पर भगवान आएं। तो ऐसे नहीं है कि वह भगवान नहीं हैं, ऐसा वाल्मीकि का भाव नहीं है। पर जो भगवान और भक्त का संबंध है, इसमें प्रभु श्री रामचंद्र तो भगवान का रूप नहीं दिखा रहे हैं, तो उसमें ज़ोर क्या है? प्रभु श्री रामचंद्र तो कहते हैं कि मुझे मेरे पिताजी का आदेश पालन करना है, सीता कहती हैं कि मैं धर्म-पत्नी के नाते आपके साथ जाऊंगी। तो उसमें यह उल्लेख नहीं है कि ये भगवान हैं।
तो उसमें कैसे है, रामायण एक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वो क्या शुद्ध भक्ति का ग्रंथ है? पर दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए कि कर्म का आचरण है, तो वह हमें धर्मनिष्ठा सिखाता है। कैसे व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की साधना करना चाहिए। तो धर्मनिष्ठ आचरण, धर्म की सीख, और भक्ति की सीख भी है। पर वह भक्ति की सीख समझने के लिए हमें आचार्यों का दृष्टिकोण देखना चाहिए।
देवी-देवताओं द्वारा श्री राम की स्तुति
बहुत महान राम भक्त आए, उससे पहले भी राम भक्त आए, पर राम भक्तों का दृष्टिकोण देखते हैं, तो यहीं भी राम का विस्तारित वर्णन होता है और इसमें हम देखते हैं कैसे प्रभु श्री रामचंद्र की भक्ति करेंगे। प्रभु श्री रामचंद्र को लोग प्रार्थनाएं अर्पण करते हैं, भागवतम में अनेक दिव्य प्रार्थनाएं आती हैं।
तो वैसे स्पष्ट रूप से प्रार्थना का अर्पण रामायण में नहीं है, उनका गुणगान होता है। जब वो रावण का वध करते हैं, यह सब देवी-देवता आते हैं और गुणगान करते हैं। जब वो गुणगान करते हैं तो वो गुणगान किस तरह से कर रहे हैं? वो कहते हैं सारे देवी-देवताओं को रावण परेशान कर रहा था, उसको आपने मार डाला, आपने बहुत अच्छा कार्य किया है। और उसके बाद में क्या होता है? क्योंकि प्रभु श्री रामचंद्र एक मानव की लीला कर रहे हैं, तो इसलिए देवी-देवता ऐसे नहीं कहते हैं कि आप विष्णु हो और आपने हमसे अच्छा कार्य किया है। वो कहते हैं कि आपने हम देवताओं के लिए बहुत अच्छा कार्य किया है, तो इसलिए हम आपको एक आशीर्वाद देना चाहते हैं।
क्या आशीर्वाद होता है? तो इंद्र कहते हैं, हम देवताओं का जो दर्शन है वह कभी निष्फल नहीं होता है। तो इसलिए तुम्हें क्या चाहिए, तुम मांग लो। और तभी बताते हैं क्या मांगते हैं कि, ये सब वानरों ने मेरी इतनी सेवा की है, अपनी जान जोखिम में डाली है। तो वह कहते हैं, कृपया जो वानर मृत हो गए हैं, तो उन्हें जीवित कर दीजिए। तो इसलिए मेरी ओर से आप इन्हें जीवन दें।
तो यहाँ प्रभु श्री रामचंद्र देवताओं से कहते हैं। विभीषण से भी कहते हैं, विभीषण लेता है। और फिर बाद में वो कहते हैं, मैं भी चाहता हूँ कि यह वानर आज के बाद जहां भी रहें, वहां पे कभी पानी और फल की कमी न हो। ताकि वो हमेशा जहां भी हों, उन्हें वहां पे कमी न हो। तो कभी कमी महसूस न हो। यहाँ पे कहने का भाव यह है कि अगर हमें भगवान की भक्ति देखनी है, तो वह रामायण में स्पष्ट रूप से भक्ति देखनी है कि भगवान वहाँ पे धर्मनिष्ठा आदर्श के रूप में हैं।
महाभारत और हरिवंश पुराण में भगवान का केंद्र
अगर हम महाभारत में देखते हैं तो महाभारत जो है वह ग्रंथ है। रामायण और महाभारत में एक प्रधान फर्क जो है कि रामायण में भगवान केंद्र हैं पर महाभारत में भगवान केंद्र नहीं हैं। महाभारत में पांडव केंद्र हैं। और वह जो संपूर्ण कहानी पांडव के केंद्रित है, उसमें भगवान कृष्ण बार-बार आते हैं और बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।
अगर हम महाभारत का विश्लेषण करते हैं तो हम देखते हैं कि हर एक महत्वपूर्ण प्रसंग में भगवान कृष्ण की उपस्थिति है या उनका हस्तक्षेप है या उनकी कोई ना कोई भूमिका ज़रूरी है। पर फिर भी भगवान केंद्र नहीं हैं। इसलिए महाभारत के बाद में एक उसका अपेंडिक्स (Appendix) आता है, जिसे हरिवंश कहते हैं। हरिवंश नामक ग्रंथ में भगवान कृष्ण की लीलाओं की वंशावली है।
महाभारत में प्रधानतः पांडवों की वंशावली है, भगवान कृष्ण पर केंद्रित नहीं है। तो इसलिए अभी पांडव जो हैं, क्या वे भगवान के भक्त हैं? बेशक वे भक्त हैं। पर महाभारत में भी कैसे है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के शिक्षण के लिए है।
शुद्ध भक्ति बनाम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
इसलिए जो पांडव हैं… अभी जैसे हमारे आचार्य, वैष्णव आचार्य हमें खास करके शुद्ध भक्ति, अनन्य भक्ति सिखाते हैं कि दूसरे कोई देवताओं की पूजा नहीं करनी है, सिर्फ भगवान की पूजा करनी है। तो उस प्रकार का जो भाव है वह हम महाभारत में नहीं देखते हैं। महाभारत में हम देखते हैं कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के स्तर पे अलग-अलग देवताओं की उपासना करनी होती है, अलग-अलग चीज़ें होती हैं।
तो इसलिए जब पांडव जंगल में होते हैं और उनके पास अन्न नहीं होता है, तो वे सोचते हैं कि हम जंगल से अन्न तो ले लेंगे पर हमारे साथ कई ब्राह्मण हैं, तो उनके लिए अन्न का इंतज़ाम कैसे हो? तो इसलिए अपने जो पुरोहित होते हैं धौम्य ऋषि, वे कहते हैं कि वास्तव में सभी जीवों को अन्न प्रदान करते हैं सूर्यदेव। तो आप सूर्यदेव की उपासना करो और सूर्यदेव की उपासना से आपको कुछ प्राप्त हो जाएगा।
और फिर युधिष्ठिर महाराज एक नदी में प्रवेश करके वहां पर तपस्या करते हैं, हाथ ऊपर सूर्यदेव की ओर देखते हैं और फिर कुछ तपस्या करने के बाद सूर्यदेव प्रकट होते हैं और उनको फिर अक्षय पात्र देते हैं। जिस तरह से भगवद गीता में भगवान ने बताया है कि आपको देवी-देवताओं की पूजा करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वे अल्प फल देते हैं। वहीं भगवद गीता के अंत में जब युद्ध चालू होने वाला होता है, तो तभी भगवान अर्जुन से कहते हैं कि जो युद्ध में विनाश होगा, वह महाकाली देवी की प्रार्थना है और तुम उस देवी की प्रार्थना करो।
इसके आशीर्वाद की तुम्हें ज़रूरत है, वे दोनों अपनी आशीर्वाद से चलते जाते हैं। तुम्हारे साथ केशव है, तुम्हें आशीर्वाद की क्या ज़रूरत है, तुम्हारी जो विजय है वह पहले से ही सुनिश्चित है। पर यहां पे कहने का भाव यह है कि भगवान की जो शुद्ध भक्ति है, शुद्ध भक्ति मतलब किसी अन्य देवता की पूजा ना करना, वह भाव हम स्पष्ट रूप से महाभारत में नहीं देखते हैं। क्योंकि महाभारत जो है वहां धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष दिखता है।
इसलिए अलग-अलग देवताओं की पूजा बताई गई है। और हम महाभारत में ये नहीं देखेंगे कि पांडव कहीं कीर्तन कर रहे हैं या हरिनाम संकीर्तन कर रहे हैं। और इसके साथ-साथ वहां पे जो भक्ति भी करते हैं… महाभारत में विग्रहों की पूजा करते हैं, मंदिरों का वर्णन है। कुछ लोग कहते हैं कि जो विग्रहों की पूजा है यह बहुत प्राचीन पद्धति नहीं है, यह कुछ सैकड़ों सालों पहले ही आई। कुछ लोग कहते हैं कि पहले जब बुद्ध धर्म आया था, उसके बाद विग्रहों की पूजा शुरू हुई। पर नहीं, बुद्ध के जीवन के पहले भी विग्रहों की पूजा थी।
पर पांडव जो भक्ति करते हैं वह हम देखते हैं, पर भक्ति कैसे करनी है उसका वर्णन विस्तारित रूप से महाभारत में नहीं है। यहां महाभारत में कैसे दर्शाया गया है कि जो भक्त हैं, जो धर्म के अनुसार जीवन जी रहे हैं, भक्ति कर रहे हैं, उनके जीवन में समस्याएं आती हैं, तो भगवान उनको कैसे मदद करते हैं इसका वर्णन है। पर भक्ति की साधना पर इसमें ज्यादा ज़ोर नहीं है।
इतिहास और पुराण: सत्व, रज और तमोगुण
तो यह हो गया हमने सबसे पहले इतिहास देखे। अब इतिहास और पुराण इन दोनों में फर्क क्या है? दोनों एक तरह से इतिहास ही हैं, पर फर्क यह है कि इतिहास—रामायण और महाभारत, इन दोनों का अगर हम ज़ोर देखें तो एक परिवार पे, एक वंश पे है। महाभारत में एक वंश पे, पांडव या भरत वंश पे है। रामायण मतलब सफर राम का, रामायण का सफर उसमें राम पे केंद्रित है।
पुराणों में अलग-अलग वंशों और विषयों पर केंद्रित है। पुराणों में अठारह पुराण हैं, छह पुराण सत्वगुण में हैं, छह रजोगुण में हैं, छह तमोगुण में हैं। तो इसका मतलब क्या है? छह पुराण तामसिक हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि पुराण बुरे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि तामसिक पुराणों में कृष्ण का वर्णन नहीं है। कृष्ण का वर्णन भी है, विष्णु का वर्णन भी है, शिवजी का भी वर्णन है।
पर उसमें जो व्यक्ति तामसिक है, वह किस दृष्टि से देखेगा और उसको क्या माहौल लगेगा, उसकी दृष्टि से वो कहानियां बताई गई हैं। मतलब अगर तीन व्यक्ति, मान लीजिए एक बस में जा रहे हैं, तीनों खिड़की की सीट में बैठे हैं। एक सत्वगुण में है, दूसरा रजोगुण में है, तीसरा तमोगुण में है। तीनों खिड़की से बाहर देखते हैं। बाहर सुंदर हरियाली है और वहां पे ठंडी हवा आ रही है, बड़ा आकर्षक वातावरण लगता है।
अगर पहला व्यक्ति सत्वगुण में है, तो वह बस में बैठे कोई ग्रंथ पढ़ रहा है। बस हिल रही है, बस में आवाज़ आ रही है और वह हरियाली को देखता है, उसे इसमें शांति मिलती है। दूसरा रजोगुणी व्यक्ति बाहर देखकर अलग प्रतिक्रिया देता है और तमोगुणी व्यक्ति अलग सोचता है।
आचार्यों के ग्रंथों का व्यवस्थित अध्ययन
आचार्यों के ग्रंथ पढ़ने चाहिए या नहीं? ज़रूर पढ़ने चाहिए। मैं नहीं पढूंगा, हम नहीं पढ़ेंगे तो कौन पढ़ेगा? तो वास्तव में पढ़ने चाहिए कि नहीं ये सवाल नहीं है, कब पढ़ना चाहिए यह सवाल है। ज़रूर हमें जो श्रील प्रभुपाद जी के ग्रंथ हैं, उनमें जो मूलभूत सिद्धांत हैं, वे स्पष्ट रूप से जब हम समझ जाएंगे, तो उससे क्या होगा? उससे हमारी समझ जो है एक तरह से स्थिर हो जाएगी।
और फिर उसके बाद… नहीं तो अभी ये कब होगा? ऐसे कोई हम नहीं कह सकते हैं कि आप चार साल किताबें पढ़ो, पांच साल किताबें पढ़ो। या फिर आप पूरा भागवतम, चैतन्य चरितामृत बार-बार पढ़ो, और इसके बाद ही अन्य आचार्यों की किताबें पढ़ो या एक बार पढ़ो। हर एक व्यक्ति को प्रभुपाद जी के शास्त्रों और ग्रंथों में अच्छी तरह से स्थिर हो जाना चाहिए।
तो अपने वरिष्ठ भक्तों से मार्गदर्शन लेकर फिर पूर्वाचार्यों के ग्रंथों को पढ़ो। अगर मुझे एक किताब को समझना है, जब मैं गीता पढ़ रहा हूँ, प्रभुपाद जी की गीता मैंने कई बार पढ़ चुकी है, मुझे गीता को और गहराई से समझना चाहिए। आचार्यों के ग्रंथों के साथ हमें नेक्टर शॉपिंग (Nectar Shopping) नहीं करनी है।
नेक्टर शॉपिंग मतलब क्या? ये किताब उठाओ, कुछ अच्छा ज्ञान मिलता है क्या देख लो। वो क्या होता है? उस भाव से जब हम सीखते हैं, उससे क्या होता है? उससे आचार्यों के वचनों की हम सेवा नहीं कर रहे हैं, आचार्यों की सेवा नहीं कर रहे हैं। इसमें हम हमारे मन को उत्तेजित करने के लिए क्या कर रहे हैं? हम सिर्फ खुद के मन को उत्तेजित करने के लिए और दूसरों को दिखाने के लिए कि ‘मैं कितना पंडित हूँ’, हम सिर्फ आचार्यों के शास्त्रों से कुछ ढूँढना चाहते हैं। तो वो भाव उचित नहीं है। तो ज़रूर आचार्यों के ग्रंथ पढ़ने चाहिए, पर उससे पहले प्रभुपाद जी के ग्रंथों को सिस्टमैटिकली (Systematically) पढ़ना चाहिए।
वैदिक ज्ञान का संकलन और श्रील व्यासदेव
यह विषय समझना है इसलिए मैं इस किताब को अच्छे से पढूंगा, इसमें कौन सा ज्ञान दिया है। ब्रह्मा जी का वास्तव में यह जो उल्लेख आता है, यह हमारे आचार्यों के भागवत में है, उसके बारे में उल्लेख नहीं है। वह जो है, अगर हम तीसरे स्कंध के आठवें-नौवें अध्याय को पढ़ते हैं, तो वहां पे संक्षेप रूप में ब्रह्मा जी प्रार्थना अर्पण करते हैं।
सृष्टि की शुरुआत में भगवान ने ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया है। उसके बाद में जो पुराण होते हैं, वहां सृष्टि की शुरुआत में ब्रह्मा जी प्रार्थना अर्पण करते हैं। भगवान बताते हैं कि ‘मैंने ये ज्ञान पहले सृष्टि की शुरुआत में दिया है।’ गीता में बताते हैं कि ‘मैंने विवस्वान को पहले बताया है।’ तो भगवान ने ये ज्ञान विवस्वान को बताया होगा, तो मैंने ये शुरुआत में नहीं बताया होगा, वह संदर्भ के अनुसार है।
तो इसलिए जो संदर्भ होता है वह सनातन नहीं होता है। इसलिए जो भागवतम का सार है, वह ब्रह्मा जी को भी दिया गया हो। और फिर बाद में जो अलग-अलग कथाएं हैं, उनका संकलन जो है वह व्यासदेव जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से किया है। व्यासदेव जी ने पहले के लोगों के लिए इन सबका संकलन किया।
पर जो वैदिक संस्कृति जो थी, तब भी अधिकांश लोग धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ही करते थे, शुद्ध भक्ति नहीं करते थे। भागवत में वर्णन आता है वृत्रासुर के लिए, कि उस समय में भी: “मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥” भगवान के परायण मुक्त आत्माएं सुदुर्लभ थीं। तो मतलब क्या? जो धीमा मार्ग है, इसको ही अधिकांश लोग अपनाते थे। वैदिक शास्त्रों के समय में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष है। और उस समय भी लोग तेज़ मार्ग अपनाते थे पर वो कम थे।
कलियुग में भगवान की विशेष कृपा
जीवात्मा इस भौतिक जगत में भोग करने के लिए आया है। पर कलियुग और पूर्व युगों में फर्क क्या है? कलियुग में जो माया आती है, वो पाप के रूप में आती है। पूर्व युगों में माया आती थी, वो पुण्य के रूप में आती थी। मतलब पुण्य करो और पुण्य के कारण भक्ति से दूर रह जाओ, अच्छा हो रहा था। कलियुग में पाप के कारण लोग भक्ति से दूर रह जाते हैं।
पर अभी कलियुग में कैसे हो गया है? कलियुग में भगवान हमेशा उदार चित्त के होते हैं। मान लीजिए कोई बहुत उदार चित्त का व्यक्ति है, तो कोई भिखारी उसके पास कुछ मांगने आता है, तो वो दान देता है। दान क्यों देता है? ऐसा नहीं है कि उस व्यक्ति ने उसके लिए कुछ किया है। उस व्यक्ति ने वहां पर भूकंप सहा है, तो इसलिए भगवान हमेशा ही दिव्य ज्ञान देते हैं।
क्योंकि कलियुग में जो लोग हैं, वह आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ही कमज़ोर हैं, बहुत कम बुद्धि के हैं, कम प्रवृत्ति के हैं। इसलिए भगवान की करुणा भारी मात्रा में है। इसलिए भगवान चैतन्य ने भक्ति बहुत आसान कर दी है। आसान ज़रूर हुई है जितना पहले था, फिर भी आसान होने का मतलब क्या है? जो कहते हैं कि ‘भक्ति इसमें आसान है, तो भी चार नियमों का पालन करना बहुत मुश्किल है, इसलिए भक्ति आसान है।’
आसान का मतलब ये क्या है कि अगर एक जगह पे बहुत ही बीमारी का एपिडेमिक (Epidemic) फैल गया है, महामारी आ गई है, तो वहां पे अगर कोई बहुत उदार व्यक्ति है तो वो क्या करेगा? सबको मुफ्त दवाई दे देगा और जो भी सुविधा लगती है ठीक होने के लिए वो दे देगा। पर यह जो है, ये उदारता है। पर अगर वो कहे, ‘मैं इतना उदार हूँ कि बीमार व्यक्ति को फैसला करने दूँ कि आप ठीक होगे या नहीं,’ तो वह कोई कृपा नहीं है।
तो क्या है? ये एक डिफरेंस (Difference) है कि कौन मर्सीफुल (Merciful) है और कौन कॉम्प्रोमाइज (Compromise) कर रहा है। ऐसे नहीं है कि हम भौतिक चीजों में आसक्त रहें और हम सोचें कि चैतन्य महाप्रभु की बड़ी कृपा है इसलिए अभी मैं उनकी कृपा से उद्धार हो गया हूँ।
कल्कि अवतार का उद्देश्य
तो यह कलियुग में क्या है? एक तेज़ मार्ग ऊपर जाने का है या एक तेज़ मार्ग नीचे जाने का है, धीरे-धीरे ऊपर जाने का मार्ग ये है ही नहीं। तो इसलिए भगवान की कृपा लेंगे तो हम ऊपर जाएंगे और वातावरण के प्रभाव में आ जाएंगे तो नीचे चले जाएंगे। भक्ति का ही मार्ग है।
ऐसा नहीं था कि भक्ति का ज्ञान पहले युगों में था ही नहीं। जो स्पष्टता से उसका वर्णन है, वह नहीं था। वह भक्ति का मार्ग ज़रूर था। नारद मुनि ने भक्ति की, ब्रह्मा जी ने भक्ति की, इतने सारे महान भक्तों ने भक्ति की। वह ज्ञान स्पष्टता से उपलब्ध था, मार्ग था। पर चैतन्य महाप्रभु के रूप में बहुत लोग उनके पास शुद्ध रूप से आ रहे हैं। तो जो स्पष्टता से वर्णन था, वह उतनी स्पष्टता से पहले नहीं था। ज्ञान तो ज़रूर था।
तो अगर हम कह रहे हैं कि ऐसे उत्क्रांति हो रही है, तो फिर चैतन्य महाप्रभु के बाद कल्कि आएंगे, तो क्या कल्कि और उच्च ज्ञान ही लाएंगे? हो सकता है ज़रूर, पर हर एक अवतार का उद्देश्य बताया गया है। और जो कल्कि अवतार हैं, वो ज्ञान देने नहीं आते हैं, वो तो संहार करने आते हैं।
तो ऐसे नहीं है कि हर अवतार जो है वह युगधर्म सिखाता है। कल्कि अवतार युगधर्म नहीं सिखाते हैं। वो तो युग के अंत में आएंगे, वो युगधर्म क्या सिखाएंगे? वो तो युग का अंत होता है, तो सतयुग का प्रारंभ होता है। हर एक अवतार धर्म सिखाते हैं ऐसा नहीं है। कल्कि अवतार जो आते हैं, वह इस भौतिक जगत में जो अधर्म बहुत प्रबल हो जाता है, तो उस समय उस अधर्म का विनाश करेंगे।
श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!