The Wisdom and Devotion of Queen Kunti (Hindi)
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Lecture Summary
कुन्ती महारानी की शिक्षाओं का सारांश
इस प्रवचन में श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कंध में वर्णित कुन्ती महारानी की भावपूर्ण प्रार्थनाओं और उनके गहरे आध्यात्मिक अर्थों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- विग्रह पूजा और ध्यान के स्तर: भगवान के विग्रह की पूजा केवल कम बुद्धि वालों के लिए नहीं है, बल्कि यह ध्यान केंद्रित करने का एक प्रामाणिक माध्यम है। ध्यान के क्रमिक स्तर होते हैं— बाहरी विग्रह का दर्शन (सवितर्क ध्यान), मन के भीतर भगवान का चिंतन (सविचार ध्यान), और अंततः शुद्ध भक्ति का वह स्तर जहाँ भगवान का रूप भक्त के हृदय में स्वतः प्रकट हो जाता है।
- कमल के पुष्प का उदाहरण (Lotus Effect): जिस तरह कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी उससे अछूता रहता है (जिसकी तर्ज़ पर आज ‘लोटस इफ़ेक्ट टेक्नोलॉजी’ का उपयोग इमारतों को साफ रखने में होता है), उसी प्रकार भगवान इस भौतिक जगत के कीचड़ (काम, क्रोध, लोभ आदि) में आकर भी कभी मलिन या दूषित नहीं होते।
- कुन्ती महारानी की प्रार्थनाओं के पाँच भाग: यह भागवतम् की पहली विस्तृत प्रार्थना है (श्लोक 18 से 43 तक):
- (18-22): भगवान की सर्वव्यापकता की महिमा और उन्हें प्रणाम।
- (23-27): वारणावत, द्यूतक्रीड़ा और वनवास जैसे भयंकर संकटों में भगवान द्वारा पांडवों के रक्षण का स्मरण।
- (28-31): भगवान की अचिन्त्य और विडम्बनापूर्ण लीलाओं का वर्णन, जिन्हें बड़े-बड़े ज्ञानी भी नहीं समझ पाते।
- (32-36): भौतिक जगत में भगवान के अवतार लेने के कारण।
- (37-43): भौतिक सुरक्षा की नहीं, बल्कि ‘शुद्ध कृष्ण चेतना’ और भक्ति के संरक्षण की गुहार।
- विपत्तियों का स्वागत (विपदः सन्तु ताः शश्वत्): कुन्ती महारानी का सबसे अनूठा भाव यह है कि वे भगवान से बार-बार विपत्तियां मांगती हैं। उनका मानना है कि संकट के समय भगवान का स्मरण सहज होता है। इसके विपरीत, भौतिक ऐश्वर्य, सौंदर्य और उच्च जन्म व्यक्ति में गर्व उत्पन्न करते हैं, जिससे वह भगवान को भूल जाता है।
- श्रील प्रभुपाद का आदर्श: प्रभुपाद जी के जीवन को कुन्ती महारानी के भाव का साक्षात उदाहरण बताया गया है। बिना किसी भौतिक संपत्ति के (नमोऽकिञ्चनवित्ताय), उन्होंने भगवान की सेवा के लिए अनेकों कष्ट और विपत्तियां स्वेच्छा से स्वीकार कीं। उनका यह वाक्य उनके समर्पण को दर्शाता है— “भगवान कृष्ण के लिए संघर्ष करने का आदर मुझसे कभी मत छीनना।”
- चेतना का अनवरत प्रवाह: जिस प्रकार नदियाँ (जैसे गंगा) अपना पानी पीछे नहीं रखतीं और हर बाधा को चीरते हुए सागर से जा मिलती हैं, उसी प्रकार एक शुद्ध भक्त की चेतना बिना किसी रुकावट या स्वार्थ के पूरी तरह भगवान की ओर प्रवाहित होनी चाहिए।
- भगवान की मुस्कान (मन्दं जहास वैकुण्ठो): कुन्ती महारानी के इस निस्वार्थ प्रेम और भावपूर्ण प्रार्थना को सुनकर भगवान इतने मोहित और प्रसन्न हो जाते हैं कि वे कोई उत्तर नहीं दे पाते, केवल मधुर मुस्कान बिखेरते हैं। प्रवचन का मुख्य संदेश यही है कि हमें भी अपनी सेवा से भगवान को ऐसे ही प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए।
Full Transcriptions
भगवान के रूप का ध्यान और विग्रह पूजा
हरे कृष्णा। तो आज हम कुन्ती महारानी की पाँचवीं प्रार्थना, जिसमें वो भगवान के रूप का वर्णन करने के लिए उनको प्रणाम कर रही हैं, इसके बारे में चर्चा कर रहे हैं। तो प्रभुपाद जी तात्पर्य में बताते हैं कि साधारण लोग अगर भगवान के रूप को नहीं देख पाएंगे, तो उनके लिए भगवान का विग्रह रूप है। तो मायावाद के प्रचार के कारण बहुत लोगों में ऐसी धारणा होती है कि विग्रहों की पूजा कम बुद्धि वाले लोगों के लिए है। भगवान का एक वास्तविक रूप है और उस रूप को जब यहाँ पर प्रस्तुत करते हैं, तो उस रूप के कोई परे नहीं जाना होता है।
ज़रूर एक चीज़ होती है कि पतंजलि योगसूत्र में बताया गया है कि जब ध्यान कर रहे होते हैं – सवितर्क ध्यान और सविचार ध्यान। सवितर्क ध्यान मतलब कि बाहर कोई वस्तु उपयोग करके ध्यान करते हैं, और सविचार ध्यान मतलब जब अंतर मन ही मन ध्यान करने लगते हैं। मतलब जैसे भगवद गीता में इन दो जगह पर अलग-अलग चीज़ों पर केंद्रित करने के लिए बोला है— ‘भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्’, ऐसे बताया गया है। कभी-कभी कहते हैं कि जब योगी ध्यान कर रहे हैं तो दोनों जो आँखें हैं उनकी बीच में, भ्रू में ध्यान करना चाहिए। उस जगह पर बताया गया है, ‘नासिकाग्रं स्वकं’, ऐसे बताया गया है कि गीता के छठे अध्याय में जब ध्यान योग बताया जा रहा है। पांचवें अध्याय में भगवान बोलते हैं कि आप भ्रू के बीच में ध्यान करो। छठे अध्याय में बताते हैं कि आप ‘नासिकाग्रं स्वकं दिशश्चानवलोकयन्’, और तेरहवें श्लोक में बोलते हैं कि आप नाक के अग्र पर ध्यान करो।
अब नाक के अग्र पर क्या विशेष ध्यान करने के लिए है? तो वास्तव में कोई नाक के अग्र पर विशेष बात नहीं है, पर मन को केंद्रित करना विशेष है, मन को एक जगह पर स्थिर करना। तो योग में ये बताया गया है कि ये एक प्राथमिक स्तर है कि व्यक्ति को एक बाहरी वस्तु चाहिए ध्यान को केंद्रित करने के लिए। और बाद में जब और प्रगतिशील हो जाएगा तो उसको कहते हैं सविचार ध्यान। योग में पतंजलि बताते हैं कि तभी व्यक्ति को बाहर कोई वस्तु पर ध्यान करने की ज़रूरत नहीं है, अंदर ही अंदर वो विचार पर ध्यान करने का है।
मान लीजिए हम बाहर भगवान के विग्रहों का दर्शन कर रहे हैं, और फिर बाद में जब हम भगवान के विग्रहों पर बार-बार ध्यान करके मन में वो चित्र लग जाता है, तो मन में हम विचार करते हैं। तो बाहर वो विग्रहों पर चिंतन करने की ज़रूरत नहीं है। और ये दोनों सम्प्रज्ञात समाधि के विभाग हैं। उसके पहले-पहले असम्प्रज्ञात समाधि है। असम्प्रज्ञात समाधि मतलब कि व्यक्ति ही विचार नहीं करता है। जैसे हम कहते हैं कि मैं संकल्पना करता हूँ, मैं सोचता हूँ, जैसे भगवान नील वर्ण हैं, कमल पुष्प पहनते हैं, तो मैं संकल्पना करने का प्रयास कर रहा हूँ। पर जो शुद्ध भक्त होते हैं, वो कभी कल्पना नहीं करते हैं, और तभी अपने आप भगवान प्रकट हो जाते हैं।
तो ये तीन स्तर हैं। एक है कि, हम इंद्रियों के स्तर पे भगवान के रूप का दर्शन करते हैं। दूसरा है कि हम मन के स्तर पे भगवान के रूप की एक तरह से कल्पना कर के उस पर चिंतन करते हैं। और तीसरे स्तर पे न इंद्रियों का कुछ कार्य होता है, न मन का कुछ कार्य होता है, आत्मा के स्तर पे भी, प्रेम के कारण भगवान का रूप अपने आप प्रकट ही होता है। तो दूसरे और तीसरे इन दोनों में फर्क क्या है? दूसरा स्तर मतलब मन में कल्पना करने का प्रयास कर रहे हैं और वो अनुचित नहीं है शास्त्र के अनुसार। अगर हम कल्पना कर रहे हैं तो अच्छी बात है कि चिंतन कर रहे हैं कि, “हाँ आज मैं दर्शन देखा था, कैसा दर्शन था, कौन से रंग का वस्त्र था, भगवान की कौन-कौन सी मालाएं उनके गले में थीं?” तो यह ऐसा कल्पना करते हैं, यह हम शुद्धि कर रहे हैं। भगवान के शास्त्र के अनुसार हम कर रहे हैं।
पर इसके परे जो शुद्ध भक्त हो जाता है – ‘स्वयमेव स्फुरत्यदः’, अपने आप भगवान का जो चित्र है, भगवान का जो रूप है, भक्त के हृदय में प्रकट हो जाता है। तो सत्य है कि यह प्रगतिशील स्तर है, जो बहुत प्रगतिशील भक्त हैं, उनको भगवान पर चिंतन करने के लिए विग्रहों की जरूरत नहीं है। पर इसका ये मतलब नहीं है कि विग्रह झूठे हैं या विग्रह केवल एक औज़ार है जिसको इस्तेमाल करके हम इस भौतिक जगत के पार जाते हैं। जो रूप हम पहले बाहर से देखते हैं विग्रहों के रूप में, वही रूप अंदर प्रकट होता है और ये दोनों एक तरह से शाश्वत ही आध्यात्मिक जगत में हैं।
तो जो प्रगतिशील भक्त हो जाते हैं, वो विग्रहों पर चिंतन किये बिना भगवान का स्मरण कर सकते हैं। पर हमें कल्पना नहीं करनी चाहिए कि मैं उस स्तर पे ऑलरेडी पहुँच गया हूँ! क्योंकि अभी हम आँखें बंद कर लेंगे तो क्रिकेट, मूवीज़ आदि सब की कल्पना मन में आ जाएगी। भगवान की कल्पना शायद ही आती है मन में, भगवान के विचार ज्यादा आते नहीं मन में। तो इसलिए विग्रहों का चिंतन बहुत जरूरी है। और जैसे कुन्ती महारानी यहाँ पे भगवान को सामने देखकर प्रार्थना कर रही हैं, वैसे हम भगवान के विग्रहों के सामने आके प्रार्थना करते हैं।
कमल के पुष्प की महिमा (Lotus Effect Technology)
और यहाँ पे भगवान की तुलना पंकज से की गई है, क्योंकि पंकज का लक्षण होता है कि वह भले ही कीचड़ में रहता है तो भी उसमें गंदगी नहीं रहती है। तो भगवान आध्यात्मिक जगत से इस भौतिक जगत में आते हैं। भौतिक जगत इस सारे कीचड़ से बना हुआ है। कीचड़ क्या है? हम सबके हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य है और उसके कारण बहुत से कार्य होते हैं इस भौतिक जगत में। पर भगवान इस कीचड़ से कभी मलिन नहीं होते हैं। तो इसलिए भगवान की कई बार तुलना कमल से की जाती है।
तो वैज्ञानिकों को भी यह पता है कि कमल का कुछ विशेष गुण होता है कि अगर उस पे गंदगी डालते हैं तो गंदगी चली जाती है और कमल ऐसे ही रहता है। तो इसलिए जो बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतें जो बनाते हैं, वो तो उसकी जो दीवारें होती हैं, वो एक स्पेशल प्रकार की तंत्रज्ञान (Technology) से बनाते हैं और उसका नाम है लोटस इफ़ेक्ट टेक्नोलॉजी (Lotus Effect Technology)। लोटस इफ़ेक्ट क्या है ये? लोटस इफ़ेक्ट कहते हैं उसको, क्योंकि क्या है? क्योंकि वो बड़ी-बड़ी इमारतें हैं 20, 30, 40, 50 मंज़िल की हैं। तो अभी सामने से लोग आएँगे जाएँगे, तो जैसे-जैसे दिन महीने जाएँगे, साल जाएँगे, गंदा हो जाएगा वो। तो 50 मंज़िल ऊपर देख के, बाहर से, सीढ़ी पे कौन उसको साफ़ करेगा? सफाई कैसे करेंगे उसकी?
तो फिर वो क्या करते हैं? वैज्ञानिकों ने संशोधन किया कि ये कमल का पुष्प कैसे होता है कि उस पे गंदगी रहती नहीं है। तो वो कमल के पुष्प का पन्ना होता है, उसमें जो रसायन होते हैं वो निकाल के जो बिल्डिंग को पेंट करते हैं, उस पेंट में डाल देते हैं। तो फिर उसके बाद में क्या होता है? जब वैज्ञानिकों को सफाई करना है तो वो सिर्फ ऊपर से पानी डाल देते हैं। तो जो मिट्टी होती है, जो गंदगी होती है वो उसको चिपकती नहीं है क्योंकि लोटस फसाड है उसका, तो सब कुछ आसानी से सफाई हो जाती है। तो यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि जो कमल है, कमल वह किसी चीज से दूषित नहीं होता है। तो उसी तरह से भगवान जो हैं भौतिक जगत में आते हैं पर कभी दूषित नहीं होते हैं। इसलिए उनकी तुलना पंकज से की गई है।
कुन्ती महारानी की प्रार्थनाओं के पाँच भाग
तो हम सारांश में भी यह जो कुन्ती महारानी की 26 प्रार्थनाएँ हैं उनके बारे में चर्चा करेंगे। यहाँ पर कुन्ती महारानी का भाव क्या है, वो समझने का प्रयास करेंगे। तो जैसे मैं पिछले हफ़्ते बता रहा था कि यह जो प्रार्थनाएँ हैं, यह भागवतम् की पहली विस्तारित प्रार्थनाएँ हैं। इसके पहले दो प्रार्थनाएँ हैं उत्तरा और अर्जुन की। तो अठारहवें श्लोक से चालू होते हैं और 43 श्लोक तक हैं। तो 26 श्लोक हैं। शायद हमारे एक श्लोक के लिए एक मिनट है तो हम कितना चर्चा कर पाएंगे हम देखेंगे।
पर इस प्रार्थना के पाँच भाग हैं। सबसे पहले जो अठारहवें श्लोक से अभी जो भाग चल रहा है, उसमें कुन्ती महारानी भगवान को नमन कर रही हैं, उनको प्रणाम कर रही हैं, अठारहवें श्लोक से ये 22 श्लोक तक। और फिर 23 श्लोक से 27 श्लोक तक वो बताती हैं कि कैसे – ‘प्रभु आपने मेरे जीवन में मेरा संरक्षण किया है।’ तो सबसे पहले कोई बहुत बड़ा व्यक्ति आता है तो उसका थोड़ा गुणगान होता है। तो उसका गुणगान करते हैं। और फिर अगर हमें किसी का परिचय देना है, तो कोई वरिष्ठ भक्त आते हैं, तो अगर किसी से हम परिचय करना है तो सबसे पहले हम बोलते हैं कि यह कितने बड़े व्यक्ति हैं। और फिर अगर हमारा उनसे कुछ परिचय है, संबंध है तो हम वो संबंध भी बोलते हैं कि ‘मैं इनसे पहली बार यहाँ पर मिला था, मैं इनसे बहुत प्रेरित हुआ, यह हुआ वो हुआ।’ तो उस तरह से 23 से 27 श्लोक में बता रही हैं कि कैसे भगवान ने मेरे जीवन में मेरा संरक्षण किया है।
और फिर 28 श्लोक से 31 श्लोक तक वो बता रही हैं कि भले ही भगवान ने बहुत बार मेरा संरक्षण किया है, तो यह भगवान की लीलाएँ समझना बड़ा मुश्किल है। कोई समझ नहीं सकता है। मैं देखा है कि वो संरक्षण किया है, पर कैसे कार्य करते हैं यह समझना बड़ा मुश्किल है। और फिर वो कहती हैं कि 32 श्लोक से 36 श्लोक तक कि भगवान इस भौतिक जगत में प्रकट क्यों होते हैं? तो भगवान ऐसे अगर बहुत विचित्र लीलाएँ करते हैं, विचित्र मतलब विडम्बनीय, जो समझने के परे हैं, ऐसी लीलाएँ करते हैं, अचिन्त्य लीलाएँ करते हैं, वो इस भौतिक जगत में प्रकट क्यों होते हैं? उसके अलग-अलग कारण बताती हैं। और फिर 37 श्लोक से 43 श्लोक तक वे भगवान से संरक्षण के लिए प्रार्थना करती हैं। पर वो क्या संरक्षण चाहती हैं? वो संरक्षण चाहती हैं शारीरिक रूप में नहीं, पर यह हमारी कृष्ण भक्ति, कृष्ण चेतना का संरक्षण है। तो इस तरह से यह प्रार्थना है। और इसका जो अंत है 43 श्लोक में देखेंगे कि प्रार्थना का परिणाम क्या होता है। वो भगवान की उसकी प्रतिक्रिया से हम देख सकते हैं।
भगवान की अचिन्त्य लीलाएँ और विडम्बना
तो कुन्ती महारानी शुरू करती हैं अठारहवें श्लोक से, कि साधारणतः कोई भी आदरणीय व्यक्ति यदि आता है तो उसको पहले नमः प्रणाम करते हैं।
“नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम्।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्॥”
हे प्रभु, आप सारी प्रकृति के परे सर्वोच्च ईश्वर हो और आप सबके स्वामी हो। पर आपको कोई समझ नहीं सकता है – ‘अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्’।
कई बार अगर हम सिर्फ वो प्रार्थनाओं को आप पढ़ेंगे शब्दशः, तो जो भाव है कि इस संदर्भ में किस भाव के साथ कुन्ती महारानी प्रार्थना अर्पण कर रही हैं, वो समझना मुश्किल हो जाएगा। तो यहाँ पर ‘अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्’, कि सब आपको देख नहीं सकते, आप अंदर हो बाहर हो, ऐसे क्यों बता रही हैं? क्योंकि उन्होंने अभी देखा था कि भगवान कृष्ण उनके साथ में थे। तो फिर भी क्या हुआ? वही भगवान ने परीक्षित के गर्भ में अंदर जाकर क्या किया? उत्तरा के गर्भ में अंदर जाकर परीक्षित का संरक्षण किया। तो आप अंदर भी हो बाहर भी हो। आप अंदर हो बाहर हो, फिर भी अलक्ष्यं, लोग आपको समझ नहीं पाते हैं। तो फिर क्यों समझ नहीं पाते हैं आपको? तो अगले श्लोक में बताती हैं:
“मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम्।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा॥”
‘मायाजवनिकाच्छन्नम्’ माया के द्वारा आवृत्त हो गए हैं। तो फिर कौन आवृत्त हो गए हैं? भगवान आवृत्त हो गए हैं? भगवान को कैसे माया ढँक सकती है? नहीं, वो वास्तव में हम आवृत्त हो गए हैं। और इसके लिए विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उदाहरण देते हैं – यही उदाहरण गजेंद्र मोक्ष के प्रार्थनाओं में भी आता है, आठवें स्कन्ध के। तो वहाँ पर बताती हैं वो, कि चक्रवर्ती पाद बताते हैं कि जैसे कोई भरतनाट्यम का नृत्य कर रहा है, तो देखने को नृत्य अच्छा लगता है। कोई हाथ हिला रहा है, पैर हिला रहा है, मुँह पे अलग-अलग भावनाएँ आ रही हैं। पर अगर किसी को पहले से पता है कि ये कौन सी लीला दर्शाई जा रही है, तो फिर वो जो नृत्य है उसका असली अर्थ समझ में आता है। देखने पर केवल वो नृत्य रहता है। तो उसी तरह से वो कहती हैं आपकी लीला तो हम देख रहे हैं, भगवान कहेंगे तुम कैसे समझ नहीं सकते, मैं क्या कर रहा हूँ मैं दिख रहा हूँ न! हाँ, पर हम जो देख रहे हैं, वो कैसे है? वो एक नृत्य करने वाला जो नट है, नाटिका है, वो जैसे नृत्य कर रही है, कार्य कर रही है, तो उसकी पृष्ठभूमि क्या है, वो समझेंगे नहीं तो समझ में नहीं आएगा। तो फिर ये कौन समझ सकता है?
“तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः॥”
हे प्रभु, वो कहती हैं कि वास्तव में परमहंस समझने का प्रयास करते हैं, ‘विधानार्थं’। वो परमहंस समझने का प्रयास करते हैं और वो भी उनको समझना मुश्किल जाता है। तो चक्रवर्ती पाद बताते हैं कि ‘आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे’। आत्माराम, परमहंस भी भगवान को समझने का प्रयास करते हैं तो वो समझने में यत्न करते हैं, कभी यशस्वी होते हैं, कभी यशस्वी नहीं होते हैं। तो ‘कथं पश्येम हि स्त्रियः’, मैं कैसे समझ पाऊँगी? तो आप मेरे सामने थे, पर फिर भी आप गर्भ के अंदर जाके आपने संरक्षण किया। तो आपने यहाँ पर परीक्षित का संरक्षण किया।
तो यहाँ पर चक्रवर्ती पाद बताते हैं, तीन उनके विडम्बनाएँ बताते हैं भगवान जो कार्य करते हैं। वो कहते हैं कि आपने व्रत लिया था कि आप शस्त्र नहीं उठाएंगे, पर फिर भी आपने शस्त्र उठा लिया। आपने यत्न किया था कि आप हमेशा जो नेक लोग हैं उनका संरक्षण करेंगे, तो भीष्म इतने नेक थे पर उनका विनाश आपके द्वारा ही हो गया। आपने यहाँ पे जो उत्तरा के गर्भ में परीक्षित हैं उनका संरक्षण किया, पर आपने जो द्रौपदी और सुभद्रा हैं, उनके पुत्रों का संरक्षण नहीं किया। तो आप कब क्या करोगे ये समझना हमारे परे है। हम समझ नहीं सकते हैं इसको।
और फिर वो बताती हैं कि वास्तव में आप इन सब से बहुत स्वतंत्र होते हैं। तो अभी वो भगवान के गुणों का गान करने आ रही हैं। तो कल का श्लोक जो था:
“कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः॥”
हम बताते हैं कि यहाँ पे भगवान का सम्बोधन जो हो रहा है – आपकी लीलाएँ जो हैं, वह इस भौतिक जगत के स्वार्थ या पक्षपात से दूषित नहीं हैं। आपकी जो लीलाएँ हैं वह निर्मल हैं। तो फिर वह जो निर्मल लीलाएँ हैं, हमें उनका कुछ वर्णन करती हैं। तो अगला श्लोक, जो श्लोक आएगा वो कहती हैं: ‘कैसे प्रभु आपने कई बार देवकी का संरक्षण किया था, तो वैसे आपने मेरा भी संरक्षण किया है।’
“अथाहृषीकेश खलेन देवकी कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता।
विमोचिताहं च सहात्मजा विभो त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात्॥”
कि आपने कई बार मेरा संरक्षण किया है। अभी कुन्ती महारानी का जो भागवतम् जो ग्रंथ है उसमें अगर हमें समझना है अच्छी तरह से, तो महाभारत की पृष्ठभूमि अगर होती है तो यह जो शुद्ध भक्ति का लक्षण हम समझ सकते हैं। कुन्ती महारानी का अगर हम जीवन देखते हैं तो बहुत सी विपत्तियों से भरा हुआ था और उसका वर्णन महाभारत में आया है विस्तार रूप से। तो वो कहती हैं कि आपने इतनी बार मेरा संरक्षण किया, फिर उसके बाद में बताती हैं:
“विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शनादसत्सभाया वनवासकृच्छ्रतः।
मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षिताः॥”
कि आपने अनेक विपत्तियों से हम सबका संरक्षण किया है। हम सबका आपने संरक्षण किया है।
पांडवों का वनवास और द्रौपदी स्वयंवर की कथा
तो कुन्ती महारानी की एक विशेषता थी कि वो हमेशा बहुत सत्यवान थीं। वो कभी किसी से झूठ नहीं बोलती थीं। यहाँ तक कि उनके जो वचन होते थे, वो भी कभी झूठ नहीं निकलते थे। तो इसलिए जब द्रौपदी के स्वयंवर के लिए सब पांडव गए थे – यह पांडव लोग पहले वारणावत में उनको जलाने का प्रयास किया गया था। तो वहाँ से जंगल में चले गए। जंगल में जब रह रहे थे उसके बाद में वे आ गए एकचक्र में, जहाँ पे भीम ने बकासुर का वध किया और फिर बाद में वहाँ से निकल पड़े। तो वहाँ एक ब्राह्मण का रूप धारण किया था। तो ब्राह्मण का रूप धारण करके वह आ रहे थे, तो तभी उन्होंने देखा कि कई ब्राह्मण किसी बड़ी संख्या में कहीं जा रहे हैं। उन्होंने पूछा, “आप कहाँ जा रहे हैं?” तो उन्होंने बताया कि वास्तव में हम जा रहे हैं द्रुपद राजा के दरबार में और वहाँ पे स्वयंवर होने वाला है, और स्वयंवर के समय बहुत दान मिलेगा। तो इसलिए हम जा रहे हैं। और उन्होंने देखा कि ये पांडवों के वस्त्र थोड़े पुराने हो गए थे, फट गए थे थोड़े, वो थे। “आप भी चलो, आपको भी बहुत दान मिल जाएगा।”
और फिर एक ब्राह्मण ने भीम और अर्जुन की ओर देखा, “आपका शरीर भी बहुत बलवान है, आप चाहो तो आप स्वयंवर में भाग ले सकते हो।” तो हँसी मज़ाक में बोल रहे थे। तो बाद में ये सब निकल पड़े। और जब, तो पांडवों ने पहले से ही द्रौपदी के बारे में सुना था। और फिर व्यास देव बार-बार उनको मार्गदर्शन करने के लिए जंगल में आते थे। तो व्यास देव ने ही भागवतम् लिखा है। पर व्यास देव भागवतम् में जैसे प्रवेश करते हैं पहले स्कन्ध के चौथे-पाँचवें अध्याय में, वैसे ही महाभारत में बार-बार वो प्रवेश करते हैं, उन्होंने ही महाभारत लिखा है। तो फिर वो भी बताते हैं कि आप ज़रूर जाओ पांचाल देश में।
जब वहाँ पर वो जाते हैं, तो द्रुपद महाराज की बहुत इच्छा होती है कि मेरी जो पुत्री है उसका विवाह अर्जुन से हो जाए। और वास्तव में उसके पहले क्या हुआ होता है कि क्षत्रियों की विचारधारा जो होती है वो विचित्र होती है, हम समझ नहीं सकते आसानी से। वास्तव में जब द्रोण ने शिक्षण दिया पांडवों को, तो पांडवों और कौरवों ने कहा कि आपको क्या गुरु दक्षिणा चाहिए? तो फिर द्रोणाचार्य ने कहा कि द्रुपद ने मेरा अपमान किया है, आपको गिरफ़्तार करके ले आओ। तो द्रोण के लिए पांडव और कौरव साथ जाने लग गए। तो अर्जुन ने कहा, “रुको आप बैठ जाओ, पहले कौरवों को जाने दो।” अर्जुन जानते थे कि कौरव जाके हार के आ जाएँगे, फिर हम जाके उनको हरा देंगे। तो कौरव बड़े गर्व से चले गए, और भले कर्ण द्रोणाचार्य के शिष्य नहीं थे, तो कर्ण भी उनके साथ गए। पर द्रुपद महाराज ने अपनी शक्ति से उनको हरा दिया और भगा दिया। और फिर पांडव सिर्फ अकेले गए, पाँच उनके। हाँ कोई सेना भी नहीं थी। पर पाँच पांडव गए और उन्होंने द्रुपद सबको हरा दिया।
और तभी जो अर्जुन की शक्ति देखी, प्रतिभा देखी, धैर्य देखा, तो उससे द्रुपद महाराज बड़े आकर्षित हो गए। और उन्होंने सोचा कि मुझे ये ऐसा योद्धा है, मुझे मेरे दामाद के रूप में ही चाहिए। और फिर बाद में बड़ा प्रसंग हो गया कि भले ही अर्जुन ने ही द्रुपद को हराया, अर्जुन ने ही द्रुपद को गिरफ़्तार किया और द्रोणाचार्य के पास ले गए। पर जो द्रुपद महाराज थे उनका क्रोध अर्जुन की ओर नहीं था। था कि अर्जुन तो एक निमित्त है, वास्तव में भेजा किसने था? द्रोणाचार्य ने भेजा। तो उसके बाद में वो सारा द्रोणाचार्य का जो द्वंद्व था उसका हल हो गया। द्रोणाचार्य ने कहा कि अभी तुम्हारा राज मेरा हो गया है, पर मैं तुम्हें आधा राज दान में देता हूँ। आप राज लेके चले जाओ आधा गोकुल। भगवान की इच्छा।
और फिर उसके आगे द्रुपद महाराज ने बड़ा यज्ञ किया। और यज्ञ में उन्होंने कहा कि मुझे एक पुत्र और एक पुत्री चाहिए। जो पुत्र है धृष्टद्युम्न, वो क्या? वो द्रोणाचार्य का वध करेगा। और पुत्री मुझे ऐसी चाहिए जो अर्जुन की पत्नी बनेगी। और फिर जब ऐसे कर रहे थे वो, तो उनको समाचार मिला कि वारणावत में अग्नि में आज वे पांडव जल के मृत्यु हो गई! बड़े हताश हो गए वो। वास्तव में तो मुझे वर मिला है कि मेरी ये पुत्री है वह अर्जुन की पत्नी बनेगी, तो कैसे असंभव हो सकता है? ये ज़रूर सत्य होगा ही। और फिर वो सोचते हैं ज़रूर ये पांडव कहीं छिपे होंगे। तो इसलिए उन्होंने ऐसी शर्त रखी स्वयंवर में, वो जानते थे कि ये शर्त अर्जुन ही पूरा कर पाएँगे। और एक-दो योद्धा और हो सकते हैं जो थोड़े पास में आ सकते हैं, पर अर्जुन ज़रूर पूरा कर पाएँगे। और अर्जुन पूरा कर पाएँगे, इसलिए इस आशा से उन्होंने ये शर्त रखी थी कि अर्जुन वहाँ पे आ जाएँगे।
और फिर जब उनका युद्ध का समय आ गया तो कोई भी क्षत्रिय उस शर्त को पूरा नहीं कर पाया। तो दुर्योधन आया, दुर्योधन ने भी अपना… तो वहाँ पर सब यादव भी थे। कृष्ण थे बलराम थे, पर उन्होंने कहा कि हम इसमें भाग नहीं देंगे। ज़रूर ये जो है… जो एक क्षत्रिय लोग बड़े गर्वीले होते हैं, क्षत्रिय लोग के गर्व का नाश करके ब्राह्मण कुल का ये गौरव बढ़ाएगा। तो ऐसे भाव से वो उसको प्रोत्साहन कर रहे थे। तो अर्जुन वहाँ पे आ गए और अर्जुन ने उनसे निवेदन किया कि धृष्टद्युम्न से कहा कि “क्या मैं, क्या इस स्वयंवर में ब्राह्मणों का सहभागी होना आपकी अनुमति है?”
तो यहाँ पर देखिए अर्जुन और कर्ण का भेद। कर्ण जानते थे कि मैं एक क्षत्रिय हूँ, उस समय तो उनको पता नहीं था कि वो कुन्ती का पुत्र है। तो फिर सीधा वो स्वयंवर में प्रतियोगिता में चले गए और फिर बाद में धृष्टद्युम्न, द्रौपदी ने कहा कि मैं एक सूत पुत्र से विवाह नहीं करूँगी। धृष्टद्युम्न ने उनको रोक दिया और वो अपमानित हो गए तभी। तो वास्तव में एक क्षत्रिय हैं और फिर जो सूत पुत्र है वो नीचे के स्तर पर है। पर कर्ण जो थे वो सीधा चले गए। पर अभी क्षत्रिय के ऊपर ब्राह्मण है, पर अर्जुन की जो संस्कृति है, जो विनम्रता है, वो सीधा स्वयंवर के लिए चले गए। उन्होंने कहा क्या? इजाज़त माँगी। और फिर द्रुपद ने देखा ये कौन ब्राह्मण है, बड़ा बलवान लग रहा है। उन्होंने कहा ब्राह्मण तो हमेशा क्षत्रियों के स्वामी होते हैं, हमारे लिए आदर है कि ब्राह्मण यहाँ पर आए हैं। और ब्राह्मण सहभागी होने, ज़रूर सहभागी हो सकता है।
तो सब क्षत्रिय देख रहे थे कि ब्राह्मण क्या कर पाएगा? कोई कुछ नहीं कर पाएगा। तो फिर सब के सामने आराम से अर्जुन ने उठा लिया धनुष और तीर लगाया। और जो आप जानते हैं प्रतिबिम्ब पानी था पानी। ऊपर चक्र है, चक्र गोल-गोल घूम रहा है और उस चक्र के बीच से ऊपर एक मछली है और मछली की आँख में मारना है। तो बहुत ही मुश्किल था वो। और नीचे देख कर! तो फिर अर्जुन ने एक ही तीर मारा और सीधा उसकी आँखों में लग गया। और तब ये आँखों में लग गया तो सब ब्राह्मण जयघोष करने लगे। और सब जो क्षत्रिय थे उनके मुँह नीचे गिर गए।
और फिर द्रुपद महाराज थोड़े विस्मित हो गए थे। वो एक तरह से प्रसन्न भी हो गए कि, “नहीं तो फिर क्या होता कि द्रौपदी का विवाह ही नहीं होता? तो फिर क्या होता अगर विवाह नहीं होगा?” तो इसलिए एक तरह से प्रसन्न हो गए, विवाह तो हो गया। पर वो सोचे ये कौन है, ये उसका पति कौन है? क्या ये अर्जुन हो सकता है? मेरे हृदय में अर्जुन ही है, पर अर्जुन तो मृत्यु हो गई! तो फिर उन्होंने द्रौपदी को कहा कि आप जाके माला पहना दो। जैसे माला पहना दी, तो तभी सब क्षत्रियों में हाहाकार मच गया। “ये द्रुपद ने हम सब को यहाँ पे अपमानित करने के लिए बुलाया है कि हम सब क्षत्रियों को छोड़ के ब्राह्मण को उसने अपनी पुत्री दे दी है! हम उसको ऐसा सबक सिखाएँगे आज कि पुनः किसी भी स्वयंवर में इस तरह क्षत्रियों का अपमान नहीं होगा!” और वो सब अपनी तलवार निकाल के आ गए।
तो अब इतने सारे क्षत्रिय थे, वो सब एक साथ आ गए हैं, तो द्रुपद महाराज क्या करें समझ में नहीं आया उनको। और उनके लिए सैनिक थे पर वो इतने महारथी आ गए हैं हमला कर रहे हैं। तभी अर्जुन के पास वही धनुष था जिससे उन्होंने भेद किया था, वही धनुष उनके साथ था। और उसके साथ-साथ भीम भी वहाँ पे आ गए। और भीम भी वहाँ पे आ गए तो वहाँ पे एक बड़ा साल वृक्ष था। तो तुरंत वह साल वृक्ष था, क्योंकि ब्राह्मण के पास तो शस्त्र था नहीं। तो शस्त्र तो कोई चाहिए, तो इसलिए साल वृक्ष के पास चले गए और उनके शस्त्र के लिए साल वृक्ष को उखाड़ के निकालने गए शस्त्र के लिए इस्तेमाल करने। तो तभी युधिष्ठिर महाराज ने रोक लिया। “रुक जा भीम, रुको। अगर तुम इस विशाल वृक्ष को तोड़ोगे, सब समझ जाएँगे कि तुम भीम हो। तो इसलिए आप कृपया इसको, आप कोई और साधारण अस्त्र इस्तेमाल करो।”
तो फिर उन्होंने इधर-उधर देखा तो वहाँ पे जो पंडाल था, पंडाल का एक ऐसा डंडा जैसे था वो, तो उसको उठा लिया। और फिर वो बड़े शस्त्र, वो भी बड़ा शस्त्र था। उससे युद्ध करने के लिए तैयार, तत्पर हो गए वो। ये तत्पर हो गए तो फिर तभी क्षत्रिय आ गए। और फिर अर्जुन ने सबको अपने तीरों से प्रतिकार कर लिया। और जो शल्य था, फिर इसमें भीम में युद्ध हो गया। फिर कर्ण अर्जुन में युद्ध हो गया। और कर्ण हार गया एक तरह से। भीम ने शल्य को उठा के फेंक दिया और सब क्षत्रिय विस्मित हो गए वो। फिर लगा कि वो द्रौपदी को ले गए, हमारे हाथ से चली जाएगी, छोड़ो इसको भी। तो इसलिए उन्होंने उसे भी जाने दिया।
और फिर पाँच पांडव द्रौपदी को साथ लेके चले गए वहाँ से। और जब जा रहे थे तो द्रुपद महाराज ने भी कहा धृष्टद्युम्न को कि “तुम इनके पीछे जाओ देखो ये कहाँ रह रहे हैं, क्या कर रहे हैं।” और जब ऐसे चल रहा था तभी कृष्ण और बलराम जी देख रहे थे और जैसे ही उन्होंने पांडवों को देखा वह पहचान गए। उन्होंने… अभी हम सोचें ये कि उस समय पांडव तो इतने प्रसिद्ध थे, तो उन्होंने कोई दाढ़ी वग़ैरह थोड़ी बढ़ाई थी, कृष्ण और बलराम जी देख रहे थे तो बाकी सब लोग उनको पहचान क्यों नहीं पाए? तो एक तरह से देखा जाये तो आजकल जो होता है ऐसे सब जगह पर लोगों के फोटो होते हैं, उस समय फ़ोटो नहीं थे। तो इसलिए सौ दो सौ साल पहले भी अगर कोई राष्ट्र के बड़े नेता होते तो उनको पहचानना मुश्किल होता था क्योंकि ऐसे चित्र नहीं होते थे। पर जो यादव थे कृष्ण और बलराम, उन्होंने देखा, “देखो, ये कृष्ण और अर्जुन ही हैं!” तो बलराम ने देखा, “हाँ ये कृष्ण अर्जुन ही हैं।” तो कृष्ण और बलराम भी पांडवों के पीछे चले गए।
तो वो पीछे गए और उनके पीछे धृष्टद्युम्न आ गए। और इधर वो जो छोटे से कमरे में रह रहे थे, छोटे से घर में, वहाँ पर जो भी ब्राह्मण उस प्रतियोगिता के लिए आये थे, उस स्वयंवर के उत्सव के लिए आये थे, तो उन सब के लिए कुछ रहने के लिए इंतज़ाम किया गया था जहाँ पर वह सब रह रहे थे। वहाँ पर कुन्ती इंतज़ार कर रही थी। काफी देर हो गया, सुबह चले गए। तो कुन्ती महारानी को हमेशा भय क्या होता था कि ये भीम जो है, कुछ युद्ध में लग जाएगा! क्योंकि भीम को युद्ध करने के लिए बहुत उत्साह होता था। तो फिर उनको एक तरह डर होता था कि मेरे पाँच पुत्रों पे कोई खतरा तो ना आ जाए! पर दूसरा डर होता था कि जो भीम है उसका खून गरम है, वो खुद युद्ध में लग जाएगा। सब लोग भयभीत हो रहे थे। तो कुन्ती महारानी को हमेशा चिंता थी कि क्या होगा मेरे पुत्रों का।
तो फिर तभी ऐसे उनको चरण कमलों की आवाज़ सुनाई दी, तो वो समझ गईं कि वो पुत्र आ गए। और युधिष्ठिर ने आके प्रणाम किया। और ये ब्राह्मण थे तो ब्राह्मण जो होता है वो कुछ पेशा नहीं करते हैं, वो कुछ कमाते नहीं हैं। वो क्या? दान लेते हैं। तो इसलिए युधिष्ठिर महाराज ने कहा, “कुन्ती, देखो माता देखो, हमने आज आपके लिए क्या लाया है।” तो कुन्ती महारानी ने, कुन्ती महारानी अपने ही विचारों में थीं और अपने विचारों में उसने कहा कि… वो अच्छी युधिष्ठिर को देखकर संतुष्ट हो गई थीं, वो चिंता चली गई थी।
बड़ा भावपूर्ण प्रसंग होता है उसके बाद में। यहाँ पे इस सारी कहानी का भाव क्या है? कि युधिष्ठिर को पता चल जाता है कि ये पांडव हैं। वो वहाँ पे पांडवों को अपने महल में बुला लेते हैं, तो पांडव समझ जाते हैं कि ये पांडव हैं। और फिर युधिष्ठिर महाराज कहते हैं कि हम सब पाँचों द्रौपदी से विवाह करेंगे। और ये वैसा भाव हो रहा है तो द्रुपद महाराज संकोच में पड़ जाते हैं। और तभी जो व्यासदेव वहाँ पर स्वयं आते हैं। व्यासदेव बताते हैं कि वास्तव में ये सब भगवान की इच्छा से है। द्रौपदी के पूर्व जन्म की कहानी बताते हैं और फिर इससे सत्य हो जाता है, पाँचों से विवाह हो जाता है।
पर यहाँ पर प्रधान बात क्या है कि द्रौपदी, कुन्ती के गुण इतने महान थे। कुन्ती जो भी वास्तव में बोलती थीं, साधारणतः धर्म के नियम के अनुसार नहीं है, पर कुन्ती के जो वचन थे वो धर्म के नियम से भी उचित हैं। और कुन्ती के वचनों को सत्य रखने के लिए जो धर्म के नियम हैं, उसको भी बाज़ू में रखना पड़े, तो रखने के लिए उचित था वहाँ पर। तो कुन्ती महारानी याद कर रही हैं कि ऐसे अनेक संकट आये थे हमारे जीवन में, उन सब संकटों में आपने मुझे बचा लिया है। और फिर अभी जो क्या आ रहा है हमारे जीवन में संकट? कि अभी आप जा रहे हो! तो कहती हैं जब भी संकट आ रहा था आप आ जाते थे। अभी संकट चला गया है, तो आप जा रहे हो। तो कहते हैं प्रार्थना करती हैं कि अभी विपत्तियां वापस आ जाएं!
विपत्तियों का स्वागत: कुन्ती महारानी का अद्वितीय भाव
“विपदः सन्तु ताः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥”
कहती हैं 25वें श्लोक में, आ रही हैं, क्योंकि विपत्तियां आ जाएँगी तो हम भगवान का स्मरण करेंगे। कदाचित रूप से हम क्या होगा भगवान को छोड़ देंगे। आप इतनी विपत्तियां क्यों भेज रहे हैं मेरे जीवन में? तो इसलिए वास्तव में ये प्रार्थना का भाव समझना है। प्रभुपाद जी के जीवन में हम देखते हैं। प्रभुपाद जी ने भगवान से नहीं कहा कि आप मुझे समस्या दो, पर भगवान की सेवा के लिए प्रभुपाद जी ने ऐसी चुनौती ले ली कि बहुत समस्या अपने आप आ गई। कि अब अगर अमेरिका में जा के प्रचार करना मतलब विपत्ति के बाद विपत्ति आती गई। तो आज के दिन प्रभुपाद जी अमेरिका पहुंचे थे और उन्होंने जो अनेक विपत्तियों का सामना किया।
तो वास्तव में प्रभुपाद जी के जीवन से हम क्या देखते हैं? ‘सेवा-सुख-दुःख परम सम्पद, नाशे अविद्या-दुःख।’ भक्तियोग में ठाकुर का जो आत्मनिवेदन का एक गीत है, उसमें कहते हैं कि हे प्रभु! आपकी सेवा में जो दुःख आते हैं- “तोमार सेवाय दुःख हय जत, सेओ तो परम सुख।” वास्तव में यह परम सुख है। क्यों यह परम सुख है? जैसे कोई माँ होती है, कोई स्त्री होती है, तो उसको बच्चा आ जाता है, तो जो छोटा बालक होता है, और बालक से वास्तव में कितनी सारी समस्या आ जाती है! कभी भी रात को रोने लगता है, कभी भी कुछ भी लगता है, तो उससे वास्तव में जीवन की शांति चली जाती है। और क्योंकि वहाँ पर प्रेम का संबंध है, इसलिए वो माँ के लिए जो भी दुख है अपने बालक को संभालने के लिए, उसमें बड़ा आनंद होता है। तो उसी तरह से भगवान से प्रेम करते हैं, इसलिए उनकी सेवा में दुख भी बहुत सुख है।
पर इसलिए दोनों में फ़र्क है। क्या है कि जब भगवान की सेवा के लिए हम दुख लेते हैं – ‘सेवा-सुख-दुःख परम सम्पद, नाशे अविद्या-दुःख’, वास्तव में जब भगवान की सेवा के लिए हम दुख लेते हैं तो उससे जो अविद्या है, इस भौतिक जगत की वासनाएँ, भावनाएँ हैं, उससे हम शुद्ध हो जाते हैं। तो भौतिक स्तर पे भी हम दुख स्वीकार करते हैं, कभी कभी हमारी ज़िम्मेदारी के कारण और ज़िम्मेदारी के लिए आवश्यक है। तो उससे वास्तव में डायरेक्ट्ली शुद्धिकरण नहीं होता है। पर भगवान की सेवा के लिए जो चिंता लेते हैं, तो ‘आमार कि काज… पूर्व इतिहास भूलिनु सकल सेवा-सुख पेये मने।’ वो कहते हैं, अभी मेरे जीवन में पूर्व इतिहास, जो भी मैंने अच्छा किया है, बुरा किया है, सबकुछ मैं, ‘पूर्व इतिहास, भूलिनु सकल’, मैं सबकुछ भूल के ‘सेवा-सुख पेये मने’, मैं जो सेवा का सुख है, उसका आनंद लूँगा। ‘पूर्व इतिहास, भूलिनु सकल’ इसका मतलब क्या है? कि वास्तव में हम भक्ति में आने के पहले, जो हमारा जीवन है, उसमें हम कुछ सत्त्वगुणी जीवन से आये होंगे, कुछ रजोगुणी जीवन से आये होंगे, कुछ तमोगुणी जीवन से आये होंगे, तो वास्तव में जो पूर्व इतिहास है, वह उसका अभी हमारी जीवन में कुछ काम नहीं है, उसको सिलेक्ट कर दो, इरेज़ दबा दो, सब कुछ मिट जाता है। वैसे ही पूर्व इतिहास, भूलिनु सकल, तो पहले जो भी चीज़ों में मैंने आनंद लिया था, अगर मैं उसको भूल जाऊँगा ‘सेवा-सुख पेये मने’ मैं सेवा के सुख में लग जाऊँगा।
और फिर वो कहते हैं, आगे क्या है? ‘आमि तो तोमार, तुमि तो आमार, कि काज अपर धने।’ कि मैं आपका हूँ, और आप मेरे हो, तो इसके अलावा मुझे और क्या धन चाहिए? तो यही भाव कुन्ती महारानी के श्लोक में आया, वो कहेंगी इसके बाद में कैसे। यह दो श्लोक के बाद अंत करेंगे, पूरा आगे नहीं जा पाएँगे अभी। आपको कुन्ती महारानी कहती हैं कि क्यों मैं विपत्ति चाहती हूँ? क्योंकि विपत्ति अगर नहीं होती है, संपत्ति होती है तो क्या होता है? उससे गर्व आ जाता है। और गर्व आ जाता है, तो आपको पुकारना मुश्किल ही होता है।
“जल्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान्।
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्॥”
तो वो कहती हैं कि ‘जल्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिः’, पांडित्य है, संपत्ति है, उच्च कुल जन्म है, सौंदर्य है, इसलिए क्या होता है व्यक्ति को लगता है कि मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ मैं इतना महान! तो भगवान की क्या ज़रूरत है मुझे? न? जब भगवान को पुकार नहीं सकता है। फिर वो कहती हैं:
“नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः॥”
वो कहती हैं हे प्रभु! आप अकिञ्चनवित्ताय हो। कि जो व्यक्ति की कोई भौतिक संपत्ति नहीं है, आप उनकी संपत्ति हो। इसका मतलब नहीं है कि ये सब को कंगाल बन जाना है, पर भौतिक चीज़ों को संपत्ति के रूप में नहीं मानना है। बस जो हमारी सेवा के लिए ज़रूरी है उसे हम लेते हैं।
श्रील प्रभुपाद का समर्पण और भगवान की सेवा
तो वास्तव में वो अकिञ्चनवित्ताय थे। व्यावहारिक रूप से भी उनके पास केवल चालीस रुपये थे। और अमेरिका में उस समय से पहले, पिछली बार मैं बता रहा था कि कैसे उस समय कोई भारतीय थे ही नहीं अमेरिका में। तो राधानाथ महाराज एक प्रवास में बता रहे थे कि उनको पहले से भारत के लिए काफ़ी आकर्षण था, पर वो अमेरिका में बहुत दर-बदर युवक के रूप में प्रवास करते थे, पर एक भी भारतीय उनको अमेरिका में नहीं मिला। तो पहला भारतीय उनको मिला वो कौन था? वो भारत-पाकिस्तान के बॉर्डर पर था, वो जो पुलिस लोग थे, उन्होंने उनको रोक दिया, वो था पहला भारतीय। तो उसके लिए अमेरिका में कोई भारतीय थे ही नहीं। तो अगर भारतीय नहीं हैं अमेरिका में, तो उसका मतलब क्या है? भारतीय करेंसी की भी कुछ कीमत नहीं है वहाँ। तो प्रभुपाद जी चालीस रुपये लेके गए थे, ‘अकिञ्चनवित्ताय’। तो वहाँ चालीस रुपये की कुछ कीमत ही नहीं होती है। तो पहले तो चालीस रुपये ज्यादा संपत्ति है नहीं, पर वह चालीस रुपये जितनी भी संपत्ति है वो भी उसको यूज़ नहीं कर सकते हैं।
और वास्तव में 1968 में जब प्रभुपाद वापस भारत में आये, तो वह तभी एरोप्लेन से आये। और जब एरोप्लेन से जब आये तो फिर वह हवाई अड्डे से जहाँ पे वह थे, दिल्ली में एक मंदिर था आश्रम वहाँ पे। तो वहाँ पे जब आये वह तभी उन्होंने वही चालीस रुपये निकाले और वह रिक्शा वाले को दिए। तो वास्तव में तो प्रभुपाद जी के पास कुछ, कुछ भी संपत्ति नहीं थी। पर क्या था? भगवान परम संपत्ति – नमोऽकिञ्चनवित्ताय। वो जो भगवान की संपत्ति थी और क्या हुआ उनके भक्ति के कारण, आज इतनी बड़ी इस्कॉन (अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ) है और उससे जुड़े हज़ारों-हज़ारों की संख्या में भक्त हैं, वो सब प्रकट हो गए। तो यह भगवान हैं सबसे बड़ी संपत्ति। प्रभुपाद जी के जीवन से हम देखते हैं कि जो कुन्ती महारानी प्रार्थना यहाँ अर्पण कर रही हैं, वो प्रभुपाद जी ने अपने जीवन में दर्शाया है कि उन्होंने इतनी सारी विपत्तियां स्वीकार की भगवान की सेवा के लिए।
तो एक बार मैंने सुना अंतिम प्रसंग है। प्रभुपाद जी की तबियत काफ़ी खराब थी और तभी क्या? प्रभुपाद जी को उस समय बहुत से लोग निवेदन करते थे कि आप यहाँ पे आ जाओ, आप अमेरिका में आ जाओ, आप फ्रांस में आ जाओ, आप साउथ अमेरिका में आ जाओ। तो प्रभुपाद जी तभी विश्राम, थोड़ा उनकी तबियत ठीक नहीं थी इसलिए विश्राम के लिए जाने वाले थे। और तभी उनको यूरोप से निवेदन आ गया कि हम रथयात्रा उत्सव कर रहे हैं कृपया आप वहाँ पे आ जाओ। और प्रभुपाद जी ने तुरंत बोला कि मैं चला जाऊँगा वहाँ पे। तो प्रभुपाद जी के वाले शिष्य साथ में थे और प्रभुपाद जी को बोले थे कि आप मत जाओ। तो उस समय इस्कॉन का न्यूयॉर्क में बहुत, बहुत भव्य मंदिर था, लगभग 11 मंज़िल का मंदिर था, पूरा इस्कॉन से ही भरा हुआ था। तो ऊपर के मंज़िल में प्रभुपाद जी थे और वो एलिवेटर से, लिफ्ट से नीचे आ रहे थे। और लिफ्ट से नीचे आ रहे थे तो उनके कुछ 3-4 घनिष्ठ शिष्य थे प्रभुपाद जी के। बोले थे “प्रभुपाद जी आपको विश्राम करना चाहिए कृपया आप ये रथयात्रा के लिए मत जाओ।”
तो प्रभुपाद जी ने सबके आँखों में देखा और प्रभुपाद जी ने कहा कि, “भगवान कृष्ण के लिए संघर्ष करने का आदर आप मुझे कभी भी मुझसे छीनना मत!” भगवान कृष्ण के लिए संघर्ष करने का आदर मुझसे आप कभी भी छीनना मत! सत्स्वरूप महाराज लीलामृत में लिखते हैं कि, दीज़ वर्ड्स बर्नड फॉरएवर इन टू आवर हार्ट्स (These words burned forever into our hearts), कि हमारे हृदय में एक जल के मानो एक निशाना हो गए। जब सुना कि भगवान कृष्ण के लिए संघर्ष करना यह आदर है। और यह आदर जो है प्रभुपाद जी कहते हैं कि कभी मुझसे आप छीनना मत। और प्रभुपाद जी ने अपने जीवन से यही दिखाया है। तो कई बार हमारे जीवन में आती हैं समस्याएँ, सेवाएँ आती हैं तो आपको बहुत बोझा लगता है। व्यावहारिक रूप से हो सकता है कि बहुत सी सेवाएँ हैं तो हमें व्यावहारिक रूप से उसको हल करना पड़ेगा। पर जो सेवा है यह वास्तव में आदर है और उसके लिए संघर्ष करना यह शुद्धिकरण का मार्ग है।
पर कुन्ती महारानी जानती हैं यह उनके अनुभव से, इसलिए कह रही हैं कि हमको यह बड़ा राज्य मिल गया है, पर अगर राज्य के कारण आपका संग चला जाए, आपकी भक्ति चली जाए तो हमको नहीं चाहिए। हमें केवल आप ही चाहिए – ‘नमोऽकिञ्चनवित्ताय’।
चेतना का प्रवाह: गंगा और सागर का उदाहरण
और जो अंतिम प्रार्थना कुन्ती महारानी करेंगी, वो एक प्रार्थना आती है, कि जैसे गंगा सागर की ओर जाती है, वैसे मेरी चेतना आपकी ओर जानी चाहिए – ‘त्वयि मेऽनन्यविषया’। तो चक्रवर्ती पाद इसके उदाहरण बताते हैं कि गंगा का उदाहरण क्यों दे रही हैं। और बताते हैं कि जब नदी सागर की ओर जाती है, तो उसके दो गुण होते हैं। पहला गुण होता है कि नदी जो होती है, कुछ भी पानी पीछे नहीं रखती है। ऐसे नहीं सोचती है कि सारा पानी नदी का सागर में चला गया तो क्या होगा मेरा! और तो अंदर से, वो स्वयं से कुछ पीछे नहीं रखती है। और दूसरा, बाहर से अगर कोई बाधा आती है, तो उससे भी रुकना नहीं है। तो इसलिए बताते हैं, ‘प्योर डिवोशनल सर्विस इज़ अनरिज़र्व्ड और अनऑब्सट्रक्टिव’। तो जब शुद्ध भक्ति करते हैं, तो अंदर से हम कुछ पीछे नहीं रखते हैं। जितनी क्षमता है, जितनी शक्ति है, उससे सारी सेवा करते हैं। और बाहर से भी समस्या है, तो कहीं न कहीं से भी मार्ग निकाल के आगे चलते हैं।
और उस प्रार्थना के बाद में कुन्ती महारानी कहती हैं, वो भगवान का गुणगान करती हैं आखिर की जो प्रार्थना है:
“श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनीध्रु-
ग्राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य।
गोविन्द गोद्विजसुरार्तिहरावतार
योगेश्वराखिलगुरो भगवन्नमस्ते॥”
तो वास्तव में वो पहले तो इच्छा करेंगी ‘प्रभु आप मत जाओ’, वो बाद में सोचती हैं कि ऐसी कामना नहीं करनी चाहिए। आपको जाना है तो आप जाओ, पर कृपया मेरी चेतना से मत जाओ। कृपया आप मेरी चेतना में हमेशा विद्यमान रहो। और फिर यह प्रार्थना हो जाती है।
तो उसके बाद में भगवान क्या कहते हैं? पर वास्तव में भगवान कुछ भी नहीं कहते हैं:
“मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया॥”
भगवान एक छोटा सा स्मित करते हैं। और जैसे कि भगवान वास्तव में कुन्ती महारानी की प्रार्थना से इतना प्रसन्न हो जाते हैं ‘मोहयन्निव मायया’, कि माया से वो मानो मोहित हो गए। जैसे कोई बहुत प्रेम व्यक्त करता है तो फिर क्या होता है? और इतना भावुक हो जाते हैं कि वो क्या बोलें समझ में नहीं आता है। तो विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद बताते हैं कि भगवान कैसे प्रसन्न हो गए हैं कुन्ती महारानी से। इतना प्रेम व्यक्त किया है, निस्वार्थ प्रेम व्यक्त किया है कि ये भगवान क्या बोलें वो सोच नहीं पाते हैं। इसलिए भगवान कुछ नहीं बोलते हैं और स्मित कर देते हैं और फिर वहाँ पर प्रस्थान हो जाती है।
तो वास्तव में ‘मन्दं जहास वैकुण्ठो’, हम जो भी सेवा कर रहे हैं, प्रभुपाद जी कहते थे कि अगर आप भगवान को प्रसन्न करते हैं और भगवान आप पर स्मित करते हैं, तो फिर आपका जीवन परिपूर्ण हो जाएगा। तो यही कुन्ती महारानी यहाँ पे करती हैं। क्या करती हैं? उनका सुन्दर प्रार्थना से भगवान को प्रसन्न कर देती हैं। तो हम भी कुन्ती महारानी और प्रभुपाद जी के उदाहरणों के पद कमलों पे चल सकते हैं और यही आशा रखते हैं कि हम भी भगवान की सेवा करते रहें कि भगवान हमसे प्रसन्न होके हम पर भी स्मित करेंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद। ग्रंथराज श्रीमद्भागवतम् की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्तवृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल!