Three levels of purification – reaction, action and inclination – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON, Punjabi Bagh, Delhi, India]
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Lecture Summary
- 1. शुद्धीकरण का असली अर्थ क्या है? जैसे प्रदूषित पानी से गंदगी निकालकर उसे उसके मूल स्वरूप में लाना शुद्धीकरण है, ठीक वैसे ही हमारी आत्मा स्वभाव से शुद्ध और आध्यात्मिक है। जब आत्मा पर भौतिक इच्छाओं, त्रिगुणों और मोह का दूषण चढ़ जाता है, तो उसे हटाकर आत्मा को उसके मूल स्वभाव में स्थित करना ही वास्तविक शुद्धीकरण है।
- 2. भौतिक जगत में चेतना का फँसना प्रवचन में एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया गया है: जैसे कोई व्यक्ति सुरक्षित घर में बैठकर हॉरर फिल्म देखता है और अपनी चेतना टीवी में लगाने के कारण व्यर्थ ही डरने लगता है, वैसे ही हमारी दिव्य आत्मा इस भौतिक जगत में अपनी चेतना फँसाने के कारण अकारण ही सुख, दुख और अनर्थों को भोग रही है।
- 3. पाप की जड़ और प्रायश्चित की गलत धारणा लोग अक्सर शुद्धीकरण का मतलब केवल ‘पाप की प्रतिक्रियाओं’ (सज़ा या दुखों) से बचना समझते हैं, जैसे कुम्भ मेले में स्नान करके पाप धोना। उदाहरण के लिए: एक शराबी शराब पीने के बाद होने वाले ‘हैंगओवर’ (प्रतिक्रिया) से बचने की दवा तो खोज लेता है, लेकिन शराब पीने की आदत (पाप की क्रिया और वृत्ति) नहीं छोड़ता। असली शुद्धीकरण केवल परिणामों से बचना नहीं है, बल्कि उस गलत काम को करने की इच्छा (Intention) को जड़ से खत्म करना है।
- 4. जप (हरिनाम) की शक्ति: एक ईसाई प्रचारक की कथा एक ईसाई प्रचारक का उदाहरण दिया गया, जिसने इस्कॉन भक्तों को देखकर ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का जप करना शुरू किया। केवल एक हफ्ता जप करने से ही उसकी सालों पुरानी सिगरेट की लत छूट गई। जप करने से व्यक्ति का आत्मबल (Willpower) बढ़ता है, जिससे अनचाही आदतें स्वतः ही छूटने लगती हैं।
- 5. बुरी आदतों के पीछे की मनोवैज्ञानिक ज़रूरतें शराब, इंटरनेट की लत या कोई भी बुरी आदत वास्तव में हमारी किसी गहरी भावनात्मक ज़रूरत (जैसे- तनाव, अकेलापन, डर, या बोरियत) को पूरा करने का एक विकृत तरीका है। कोई ‘सोशल ड्रिंकर’ सिर्फ इसलिए पीता है क्योंकि उसे समूह का हिस्सा बनना होता है।
- 6. आत्मनिरीक्षण (Introspection) और सही समाधान केवल नियमों को थोपने या बाहरी दिखावे से ये आदतें नहीं जातीं। हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए: “मेरी कौन सी ज़रूरत इस बुरी आदत से पूरी हो रही है?” जब हम अपनी उस ज़रूरत (जैसे बोरियत या तनाव) को पहचान लेते हैं, तो उसे किसी स्वस्थ और आध्यात्मिक तरीके से पूरा कर सकते हैं। जैसे— किसी अच्छे मित्र से बात करना, सत्संग करना, या हरिनाम कीर्तन सुनना।
Full Transcriptions
शुद्धीकरण का वास्तविक अर्थ और भागवतम् का प्रसंग
हरे कृष्णा! आज मैं कृतज्ञ हूँ आप सब के बीच में, इसमें भागवतम् की चर्चा करने का मौका मिला है। यहाँ पर भागवतम् के नवम स्कन्ध में परशुराम, जो भगवान के योद्धा अवतार हैं—परशुराम। राम मतलब जो आनंद देते हैं, परशुराम मतलब जो परशु चलाने में आनंद देते हैं, उनका नाम है परशुराम। तो ऐसे जो भगवान के अवतार हैं, उनकी लीला का कथन हो रहा है। और यहाँ पर उन्होंने जो अहंकारी क्षत्रिय थे, जो राज्य कर रहे थे और अहंकार से अधर्म कर रहे थे, उनसे पृथ्वी को मुक्त कर दिया है।
और उनको मुक्त कराने के बाद, अभी जब उनके पिताजी उनको बता रहे हैं कि वास्तव में अगर आप जो राजा हैं, जो सम्राट हैं, उनका अगर आप वध करते हो, तो फिर वह बहुत ही पापमय कार्य है और इसके लिए आपको प्रायश्चित करना चाहिए। और यहाँ बता रहे हैं, ‘तीर्थ संसेवया अच्युत चेतना’। दो चीज़ें बता रहे हैं—आप जाओ तीर्थ स्थानों में, न केवल तीर्थ स्थानों में जाओ, भगवान की चेतना में रहो और इससे आप शुद्ध हो जाओगे। तो आज के प्रवचन में मैं ‘शुद्धीकरण’ इस विषय पर चर्चा करूँगा कि शुद्धीकरण वास्तव में उसका अर्थ क्या है? शुद्धीकरण कैसे होता है? और हमारे जीवन में शुद्धीकरण हो रहा है या नहीं हो रहा है, उसकी हम जाँच कैसे कर सकते हैं?
चेतना का दूषण और आत्मा की स्वाभाविक वृत्ति
तो शुद्धीकरण, इसका व्यावहारिक रूप से अगर हम अर्थ देखते हैं, तो कई बार होता है आजकल पानी बहुत प्रदूषित हो जाता है। जो पानी में, पानी से अलग जो भी आ गया है, उसको निकाल देना, जो पानी का स्वाभाविक कार्य है, स्वाभाविक वृत्ति है, स्वाभाविक धर्म है, जो उसका स्वभाव है, उसके विपरीत जो भी उसमें आ जाता है, उसे निकालना शुद्धीकरण है। आत्मा की चेतना शुद्ध है, पर इस आत्मा की चेतना में अलग-अलग प्रकार के दूषण आ जाते हैं। और जब इस प्रकार के दूषण आ जाते हैं, तो फिर उनको निकालने की जो वृत्ति है, उसको शुद्धीकरण कहते हैं।
“यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम् ।
परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते ।।”
श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कन्ध में जब नारद-व्यास का संवाद हो जाता है (नारद-व्यास का संवाद जो है चौथा, पांचवां, छठा अध्याय है), उसमें नारद जी व्यासदेव को बताते हैं कि आप भगवान का अनुसरण करो और भगवान का अनुसरण करके उनका गुणगान करो। तो उसके लिए व्यासदेव चिंतन में बैठते हैं और जब वे चिंतन में बैठते हैं, तभी उनको एक दृष्टि आती है, दिव्य दृष्टि। इसमें देखते हैं कि जीव जो है, ‘यया सम्मोहितो जीव’—जीवात्मा मोहित हो गया है। इस श्लोक में, इन चार श्लोकों में जहाँ पर आते हैं, भागवतम् का सार क्या है, सारा इस दृष्टि से, इस दिव्य दृष्टि से उद्गम हुआ है, विस्तारित हुआ है।
तो वो दिव्य दृष्टि क्या थी? ‘यया सम्मोहितो जीव’—जीव सम्मोहित हो गया है। सम्मोहित हो गया, मतलब क्या हुआ है? ‘आत्मानं त्रिगुणात्मकम्’—आत्मा जो है तीन गुणों के परे है, आत्मा आध्यात्मिक है। ‘परोऽपि मनुतेऽनर्थं’—पर अनर्थों को उसने स्वीकार कर लिया है। और वो अनर्थों को स्वीकार करने के कारण क्या हुआ है? ‘तत्कृतं चाभिपद्यते’—और उसके अनुसार कार्य करना शुरू कर दिया है। तो आत्मा दिव्य है, पर तीन गुणों के कारण, भौतिक इच्छा है, भौतिक विचारधारा है, भौतिक संकल्पनाएं आ गई हैं, और भौतिक कार्य करना ही यहाँ मोह है।
टीवी का उदाहरण और चेतना का भौतिक जगत में फँसना
उदाहरण, साधारण उदाहरण कर सकते हैं। कोई लड़का है, वो एक टीवी देख रहा है और टीवी में हॉरर मूवी चल रही है। तो अभी वह तो अपने घर में बड़ा शांति से, सुख से, सुरक्षित रूप से बैठा हुआ है। पर जितनी उसकी चेतना उस हॉरर मूवी में चली गई है, उतना वो भयभीत हो रहा है। तो अभी क्या हो गया है? उसकी चेतना उस टीवी में चली गई है, उसके कारण वह भयभीत हो गया है। और चेतना उस टीवी में नहीं जाएगी, तो वो भयभीत नहीं होगा।
इस तरह से, ये भौतिक जगत जो है, उसमें हमारी चेतना चली गई है। आत्मा दिव्य है, पर जो हमारी चेतना भौतिक जगत में चली गई है, उसके कारण हम अलग-अलग प्रकार के सुख-दुख का अनुभव कर रहे हैं।
“कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।।”
ये दूषण है। जो चीज़ शराबी को शराब से बांध देती है, वह उसकी अशुद्धता है। उसी तरह से अलग-अलग प्रकार की हम सब में अशुद्धताएं हैं।
“आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ।।”
सैकड़ों-सैकड़ों इच्छाओं के पाश से आत्मा शरीर से बंध गया है। और शरीर से आगे कुछ अलग-अलग इंद्रियों, विषयों से बंध गया है।
समाज में बुरी आदतें और अनर्थों से मुक्ति
आजकल के समाज में जो एक बहुत बड़ी समस्या है, वो है एडिक्शन। लोग बुरी आदतों से बंध जाते हैं। वो नशा लेना हो, या ड्रग्स लेना हो, सिगरेट पीना हो, या आजकल हो गया इंटरनेट एडिक्शन हो सकता है, डिवाइस एडिक्शन हो सकता है। अलग-अलग प्रकार के बंधन बन गये हैं। वो लोग उसके बिना रह ही नहीं सकते हैं, बड़े उतावले हो जाते हैं। तो यह अनर्थ है। अभी जब शुद्धीकरण करना है, मतलब क्या है? शराबी को शराब से छुड़ाना है। आत्मा को जो आत्मा से अलग जो भी चीज़ें हैं, जिसके लिए उसमें आसक्ति है, उससे उसको मुक्त कराना है।
तो यहाँ पर साधारण लोग शुद्धीकरण बोलते हैं, तो यहाँ पर तीन चीज़ें हैं: सिन्फुल रिएक्शन (Sinful Reaction), सिन्फुल एक्शन (Sinful Action), और सिन्फुल इंटेंशन (Sinful Intention)। तीन चीज़ें हैं। क्या हैं? कि हमारे जो पाप हैं, उनकी प्रतिक्रिया, और दूसरा है पाप की क्रिया, और तीसरा है पाप करने की वृत्ति या इंटेंशन।
तो अधिकांश लोग सोचते हैं, शुद्धीकरण मतलब क्या? वो सोचते हैं कि अगर मैंने कुछ पाप किये हैं, उसका फल मुझे मिलेगा, वो दुख होगा मुझे। तो वो दुख नहीं चाहिए मुझे, इसलिए मैं शुद्धीकरण करता हूँ, मुझे शुद्धीकरण करना है। तो अगर कुम्भ मेला होता है, तो करोड़ों की मात्रा में लोग आते हैं, तो कुम्भ में लोग स्नान करते हैं। और यह उनका भाव होता है कि अगर उस समय मैं स्नान करूँगा तो मैं शुद्ध हो जाऊंगा।
हैंगओवर का उदाहरण: प्रतिक्रियाओं से बचना समाधान नहीं
तो अभी यह शुद्धीकरण मतलब वो क्या अपेक्षा कर रहे हैं? जो लोगों को थोड़ा बहुत पाप और पुण्य का ज्ञान है, और जो लोग सोचते हैं कि यह शुद्धीकरण कराना है, वो अधिकांश लोग सोचते हैं शुद्धीकरण मतलब क्या है? जो पाप की प्रतिक्रियाएं हैं, उनसे मुक्त हो जाऊंगा। यह ज़रूरी है कि पाप की प्रतिक्रियाएं जो आती रहती हैं, हमें दुख भुगतना पड़ेगा। पर वह मूल अशुद्धता नहीं है। पाप की प्रतिक्रिया जो है, वो पाप करने के कारण आई है, गलत कार्य करने के कारण उसके परिणाम आए हैं। अगर वो सिर्फ परिणामों को किसी तरह से निकाल दें, तो उससे क्या है? वो गलत कार्य करने की प्रवृत्ति तो जाने वाली नहीं है।
मैं अमेरिका में था, एक-दो महीने पहले, तो वहाँ पर डेनवर में एक भक्त हैं, जो अलग-अलग एडिक्ट लोग होते हैं, उनको वो लेक्चर वगैरह देते हैं। तो मैं भी वहाँ पर एक कार्यक्रम के लिए गया था। तो जब उनसे बात कर रहा था, तो अभी क्या है, कई बार लोग शराब पीते हैं, तो उसके बाद में उनको हैंगओवर आता है। बड़ा सरदर्द… तभी तो अच्छा लगता है, पर बाद में जब वो सो जाते हैं, होश में आते हैं, तो बड़ा सर का दर्द होता है, तभी उल्टी होती है और बहुत समस्याएं आती हैं।
तो अभी क्या है, अभी कुछ वैज्ञानिकों ने, कुछ कंपनियों ने ऐसी दवाई निकाली है, या ऐसा ड्रिंक निकाला है जिससे आपको हैंगओवर न हो। आप शराब पी लो, पर आपको हैंगओवर नहीं होगा। तो अभी कुछ शराब पी लो, बाद में वो पूरी चेतना में आता है तो उसे पता चलता है, बहुत दर्द होता है। तो उस दर्द से बचने के लिए हम कुछ मार्ग निकालते हैं। पर उससे हुआ क्या है? लोगों को पहले तो कम से कम डर था, शराब पी लूँगा तो यह हैंगओवर आ जाएगा, मैं कल काम पर नहीं जा पाऊंगा, यह हो जाएगा। तो अभी क्या हो गया? पहले वो शराब से एडिक्टेड थे, अभी वो हैंगओवर से बचने की जो दवाई होती है उससे एडिक्ट हो गए। शराब का एडिक्शन चला नहीं गया, उल्टा एक और एडिक्शन आ गया।
तो अगर कोई अनुचित कार्य हम करते हैं और उसका जो फल है, किसी पद्धति से हम उस फल से बच जाते हैं, तो वास्तव में हम सुरक्षित नहीं हो रहे हैं। उल्टा हम वही गलत कार्य करने के लिए और प्रवृत्त हो जाते हैं। एक तरह से वो जो हैंगओवर आदि प्रतिक्रिया है, वो हमें चौकन्ना करती है कि इसे नहीं करना चाहिए। पर अगर उससे सिर्फ बच गए, तो फिर वो कार्य हम और करते रहेंगे।
एक क्रिश्चियन व्यक्ति की कहानी और जप का प्रभाव
तो उसको भगवद गीता समझ बहुत नहीं आई, तो उसको भगवद गीता के लिए गूगल करने लग गया। तो उसको तभी मेरी जो साइट है ‘गीता डेली’, वो मिल गयी। तो फिर उसने गीता डेली सब्सक्राइब किया, पढ़ने लग गया। तो जब वो मुझसे मिलने आया, तो वो बोला कि जब मैं गीता डेली पढ़ने लग गया, तो 90% आप जो बोलते हैं, उससे मैं सहमत हूँ, I agree with it। और धीरे-धीरे उसके द्वारा क्या हो गया कि वह भगवद गीता के लिए आकर्षित हो गया।
और फिर वह इस्कॉन मंदिर में गया और उसने देखा हमेशा भक्तों के हाथ में बीड बैग (Bead bag) होता है। तो यह क्या करते हैं? पता चला कि जप करते हैं। और वो सोलह माला जप करते हैं! डेढ़-दो घंटा बहुत ज्यादा हो गया, हम कभी इतना करते नहीं हैं। तो फिर उसने बोला, क्या मिलता है इन भक्तों को? इसलिए तो मैं इसको ट्राई करके देखता हूँ।
तो क्या होता था, उसको उसके साथ-साथ कुछ स्मोकिंग की आदत थी, और स्मोकिंग के कारण उसको कुछ हेल्थ इशू आ रहे थे। स्मोकिंग छोड़ने का प्रयास कर रहा था, वो छूट नहीं रहा था। तो उसने जब चालू किया और टेस्ट के लिए कहा, “एक महीना जप करूँगा।” और एक महीना जप करने लग गया। और एक हफ्ता जप करने के बाद उसका स्मोकिंग छूट गया। पर उसको इन दोनों में कोरिलेशन (Correlation) समझ में नहीं आया कि जप के कारण मेरा विलपॉवर (Willpower) बढ़ गया, उसके बाद छोड़ दिया।
तो एक महीना जप करने के बाद उसको जप से कुछ फायदा नहीं लगा, जप करने के बाद कुछ आनंद नहीं मिला, जप करने के बाद कुछ रुचि नहीं हुई। उसके बाद में एक महीने के बाद जप छोड़ दिया। और जप छोड़ने के 3-4 दिन के बाद वापस वो स्मोकिंग करने की इच्छा इतनी बढ़ गई। “क्या हो गया? मेरा विलपॉवर वापस कम हो गया!” वो समझ में नहीं आया उसको। इच्छा शक्ति कम हो गई मेरी, ड्रास्टिकली कम हो गई। फिर बाद में उसको लगा कि जप के कारण ऐसा हुआ क्या? तो फिर उसने वापस जप चालू किया, वापस छूट गया, इच्छा ही चली गई उसकी।
प्रचार, पेशा और व्यावहारिक निर्णय
तो अभी तो वो मुझसे मिलने आया था, बात कर रहा था। वो है एक बहुत क्रिश्चियन प्रीचर (Christian Preacher)। तो अभी वो सोच रहा था कि मैं अंतरंग रूप से… और उसने देखा है कि मेरे जीवन में परिवर्तनों में भक्ति की साधना से क्या हुआ है। तो वो हरे कृष्ण महामंत्र जप करता है। तो वो सोच रहा था कि मैं अभी क्या करूँ? क्या मैं अभी पूर्णतया से भक्त बन जाऊं? पर उसको क्या है कि वो गृहस्थ है और उनका एक तरह से बाइबल टीचिंग करना ही प्रोफेशन (Profession) है। तो अभी वापस वो प्रोफेशन दूसरा क्या ढूढ़ेंगे? वहीं वो बचपन से… उनके पिताजी भी वैसे एक टीचर थे, तो वो भी टीचर बन गए हैं। वैसे उनका वही प्रोफेशन है।
तो मैंने उनसे बात की, कई वरिष्ठ भक्तों से मैंने बात की, और उन्होंने फैसला किया है कि वो अंतरंग रूप से कृष्ण भक्ति करेंगे, बाहरी रूप से वो क्रिश्चियन प्रीचर रहेंगे। अब यह ऐसे क्यों? क्योंकि न केवल उनके लिए वो पेशा है, वो उनका प्रोफेशन है, और साथ-साथ वो बाइबल के लिए बात करते हैं, बल्कि मैंने कहा कि वो लोगों के लिए बात कर सकते हैं कि बाइबल में भी वेजिटेरियनिज्म (Vegetarianism), कैसे शाकाहार की ओर कैसे जाना है, उसके बारे में उल्लेख है। और कैसे वीगन मूवमेंट (Vegan Movement) यह अमेरिका में बहुत बढ़ गया है, यूरोप में भी लोग उसके लिए अनुकूल हैं।
तो अगर वो वहाँ पर रहकर हजारों लोगों को, शायद वो और उनकी चेतना, मांसाहार से शाकाहार की तरफ ला सकते हैं। अगर वो बाह्य रूप से भक्त बन जाएंगे, तो वो उनका कर्म छोड़ देंगे, तो वो जो प्रभाव वो कर सकते हैं, वो प्रभाव नहीं कर पाएंगे। और वो प्रभाव, क्रिश्चियन लोगों को, हमारे भक्तों में कितने भी बड़े प्रचारक हों कि “तुम तो अलग धर्म के प्रचारक हो, तुम्हारी बात मैं सुनने वाला नहीं हूँ।”
तो क्या है, कभी-कभी हमारी परिस्थिति ऐसी हो सकती है। हमारे भक्तों में कितने भी बड़े प्रचारक हों प्रचार करने के लिए, हमारे अंदर जो उत्साह है, मेरी यही प्रार्थना है… मुझे इसमें तो अच्छा सहाय मांगते हैं। सेवा करने के लिए, आपसे उम्मीद है, प्रार्थना की जाए, कि मैं भी मेरा सारा time भगवान की सेवा में लगाऊँ और उसको वेस्ट नहीं करूँ। बहुत कुछ नहीं। थैंक्यू।
आदतें और हमारी वास्तविक आवश्यकताएं
जो वासना, अशुद्ध आदतें हैं, वो वास्तव में हमारी कोई ज़रूरत है, वो ज़रूरत का विकृत रूप है। एक उदाहरण दूँ, आपको समझाने के लिए। कुछ लोग शराब पीते हैं, मान लीजिए। अभी कुछ लोग शराब पीते हैं, कहते हैं उनको सोशल ड्रिंकर्स (Social Drinkers)। सोशल ड्रिंकर्स मतलब क्या? वो लोग पार्टी में जाएंगे, सब लोग पी रहे हैं, तो सब लोगों से अलग हटके नहीं रहना है मुझे। तो इसलिए वो पीते हैं, तो मैं भी पीता हूँ।
तो जो लोग सोशल ड्रिंकर्स होते हैं, अगर वो भक्तों के संग में आ गए, भक्तों के संग में कोई नहीं पीता है, तो उनका पीना छूट जाएगा। क्या है? क्योंकि उनको एक तरह से कोई आदत नहीं थी। उनकी ज़रूरत क्या थी? उनकी ज़रूरत यह थी कि, “मैं एक ग्रुप के लिए पीता हूँ। मुझे किसी समूह में शामिल होना है।” तो वो समूह में शामिल होने के लिए, अगर शराब पीना पड़ेगा, तो मैं शराब पी लूँगा।
जब उनके जीवन में समस्याएं आती हैं, समस्याओं से राहत प्राप्त करने के लिए, वो एक पद्धति बन गई होगी। जब टेंशन आ गया, जब चिंता आ गई, जब भय आ गया, जब अकेलापन आ गया, अलग-अलग प्रकार की नकारात्मकता जीवन में आ गई, तो उससे राहत पाने के लिए वो शराब पीते हैं। तो अभी वह ऐसा व्यक्ति अगर भक्तों के संग में भी आ जाएगा, तो शायद उसकी वो शराब की लत नहीं जाएगी। क्योंकि क्या है, संग हो या जप हो या कीर्तन हो या कथा हो, केवल उसके द्वारा जो राहत पाने की पद्धति है, वह अपने आप बदलेगी नहीं।
आत्मनिरीक्षण और सही समाधान की खोज
तो उसको खुद का आत्मनिरीक्षण करके देखना पड़ेगा कि मैं, जब मुझे कोई समस्या आती है, कोई नकारात्मकता होती है, तो मैं राहत कैसे प्राप्त कर सकता हूँ, अच्छी तरह से, इन अ मोर हेल्दी वे (in a more healthy way)। तो शायद कोई बहुत घनिष्ठ मित्र होगा, तो उससे बातचीत करके, तो हृदय का बोझ कम हो जाता है, तो फिर शायद उससे मैं राहत प्राप्त कर सकता हूँ। या मुझे कोई कीर्तन, कोई हरे कृष्ण ट्यून बहुत अच्छा लगता है।
या फिर, कुछ लोग होते हैं, कुछ गलत कार्य करते हैं। अभी मोबाइल से क्या है, सारी दुनिया का हमको एक्सेस (Access) होता है। मैंने एक लेक्चर दिया था, ‘इंटरनेट इन थ्री मोड्स’ (Internet in three modes), जो तीन गुण होते हैं, तो इंटरनेट भी तीनों गुणों में हो सकता है। सत्त्व गुण में हम कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, रजो गुण में कुछ मनोरंजन देखते हैं। मैं बोर हो गया हूँ, बोर्डम (Boredom) से बचना है मुझे, बोर्डम से राहत चाहिए, तो कुछ चैनल देखो, ये पढ़ो, वो करो, ये देखो। तो ऐसे होता है।
तो उस व्यक्ति को, आप कितने भी लेक्चर सुनाओ, “आप ये ऐसे साइट्स मत देखो, ये मत करो,” लेकिन उसे बोर्डम से राहत चाहिए। तो कई ऐसी आदतें होती हैं हमारी, जो भक्ति के द्वारा अपने आप से दूर होती हैं। पर कुछ-कुछ वृत्तियाँ होती हैं, वो जल्दी जाती नहीं हैं। तो हमें थोड़ा उसके लिए आत्मनिरीक्षण करना पड़ेगा कि—What need of mine is this particular mentality or habit fulfilling? मेरी किस ज़रूरत को ये पूरी कर रहा है? वास्तव में वो पूरी नहीं कर रहा है।
अगर कोई बोर होके कुछ ये-वो देखने लगता है, और वो देखने के बाद, बाद में और फ्रस्ट्रेट (Frustrate) हो जाता है, बोर्डम जाता नहीं है, वो क्या होता है और फ्रस्ट्रेट हो जाता है। पर उसे लगता है कि बोर्डम चला गया है। तो उसको और अच्छी तरह से मैं कैसे राहत दिला सकता हूँ, और बोर्डम से मैं कैसे मुक्त हो सकता हूँ? वो जब पता चलता है मुझे और वो उसकी आदत लगाता है, तो फिर इससे मैं मुक्त हो सकता हूँ।
तो इसलिए क्या है, कभी-कभी हमें सिर्फ भक्ति की विधि का निम्न स्तर पर पालन पर्याप्त नहीं है। भक्ति में कोई एक विशेष विधि की ज़रूरत पड़ेगी हमको, जो हमारी उस ज़रूरत की पूर्ति कर सकती है, पूर्ति कर सकता है। और जब वो ज़रूरत हम… कभी-कभी इसको समझने के लिए समय लगता है। जब कोई… अगर हम भक्ति अच्छे से कर रहे हैं, भक्ति करने का प्रयास कर रहे हैं, और उसमें कोई एक विशेष चीज़ है जो गलत हो रही है, तो उसको बहुत बड़ी बनाने की ज़रूरत नहीं है। वो एक चीज़ है, पता चलेगा क्यों हो रहा है, कैसे उससे मुक्त होना है, पता चल जाएगा हमें धीरे-धीरे। तो हमें क्या करना है?