Three reflections on our mind-body mechanism Misidentification Utilization Purification – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में जीव की बद्धावस्था (भौतिक संसार में फँसाव) और इन्द्रियों के सही उपयोग पर चर्चा की गई है। इसे मुख्य रूप से तीन भागों में समझा जा सकता है:
1. मिस-आइडेंटिफिकेशन (गलत पहचान / मोह)
- आत्मा को इस संसार में कार्य करने के लिए शरीर और मन रुपी ‘सॉफ्टवेयर’ की आवश्यकता होती है।
- समस्या तब शुरू होती है जब हम शरीर के ‘उपयोग’ (Function) के साथ-साथ उसमें मिलने वाले ‘भोग’ (Pleasure) से आसक्त हो जाते हैं।
- यह आसक्ति इतनी गहरी हो जाती है कि हम खुद को ही यह शरीर मान बैठते हैं (जैसे अमेरिका में कुत्ते से या दक्षिण भारत में हाथी के तिलक से अत्यधिक आसक्ति का उदाहरण)। इसे ही सबसे बड़ा ‘मोह’ कहा गया है।
2. यूटिलाइजेशन (सकारात्मक उपयोग)
- भक्ति मार्ग इन्द्रियों को त्यागने या उन्हें बुरा मानने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि उन्हें भगवान की सेवा में लगाने (यूटिलाइजेशन) पर ज़ोर देता है।
- जब हम अपनी कला, वाणी, दृष्टि या किसी भी क्षमता का उपयोग भगवान के लिए करते हैं, तो हम यह महसूस करने लगते हैं कि “मैं इस शरीर और कार्य से अलग हूँ, मैं केवल भगवान का सेवक हूँ।”
- कार्य से आसक्त होने के बजाय, सेवा के उद्देश्य (भगवान) से आसक्त होना भक्ति में प्रगति का लक्षण है।
3. प्यूरिफिकेशन (शुद्धिकरण)
- जब इन्द्रियों को लगातार भगवान की सेवा में लगाया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से हृदय का शुद्धिकरण होता है।
- शुद्धिकरण का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट या तपस्या नहीं है, बल्कि काम, क्रोध और मोह जैसे अनर्थों का नष्ट होना और भगवान के प्रति आकर्षण का बढ़ना है।
- जो इन्द्रियाँ मोह का कारण बनती हैं, वही इन्द्रियाँ भक्ति में लगकर मुक्ति का साधन बन जाती हैं।
💡 प्रश्नोत्तर के मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways from Q&A):
- सेवा में अहंकार की जाँच: सेवा के बाद यदि मन में यह विचार आए कि “मैंने कितना अच्छा किया, लोग मेरी तारीफ करें” तो यह भौतिक चेतना है। यदि भगवान की सुंदरता और कृपा का स्मरण हो, तो वह आध्यात्मिक चेतना है।
- नम्रता: कर्तापन के भाव से बचने के लिए, हमें कभी-कभी ऐसी सेवाएँ भी करनी चाहिए जिनमें हम बहुत निपुण नहीं हैं, और दूसरों की सेवा भावना का सम्मान करना चाहिए।
- आसक्ति बनाम उत्साह: आसक्ति में व्यक्ति वस्तु के बिना निराश और हताश हो जाता है (जैसे दुर्योधन)। जबकि आध्यात्मिक उत्साह (जैसे श्रील प्रभुपाद में था) में तीव्र इच्छा होती है, लेकिन परिणाम न मिलने पर भी व्यक्ति भीतर से पूर्णतः शांत और संतुष्ट रहता है।
Full Transcriptions
बद्धावस्था और इन्द्रियों का मोह
हरे कृष्णा! तो आज सुबह हमने भौतिक जगत का और खासकर जीव की जो बद्धावस्था में स्थिति है, उसका विश्लेषण हो रहा है। तो यहाँ पे कैसे इन्द्रियों के द्वारा जीव जगत के साथ आदान-प्रदान करता है, इसके बारे में वर्णन है। तो मैं इसको तीन विभागों में खोलूँगा, कैसे? मिसाइडेन्टिफिकेशन (Misidentification), प्यूरिफिकेशन (Purification) और यूटिलाइजेशन (Utilization)। कि हमारी जो इन्द्रियाँ हैं, वो हमें कैसे मोह में डालती हैं, कैसे हमें इन्द्रियों का उपयोग करना है, कैसे हमें इन्द्रियों को शुद्ध करना है।
अभी क्या है कि हमारा जो आत्मा भौतिक जगत में होता है, वह उसके लिए इस भौतिक जगत में कार्य करने के लिए शरीर अनिवार्य है। और शरीर अगर अनिवार्य है, तो शरीर के जो भाग हैं, जैसे आँखें हैं, कान हैं, वह भी अनिवार्य हैं। इनके बिना हम काम नहीं कर सकते हैं। मन भी अनिवार्य है, क्योंकि मन यह आत्मा को और शरीर को जोड़ता है। शरीर के साथ आत्मा काम नहीं कर सकती है अगर मन नहीं है। इससे अगर कंप्यूटर का हम उदाहरण देते हैं, तो कंप्यूटर में हार्डवेयर होता है, सॉफ्टवेयर होता है। तो सॉफ्टवेयर के बिना अगर कोई प्रोग्राम नहीं है, नया फोन आया, नया कंप्यूटर आएगा, उसका कुछ काम नहीं कर पाएगी। तो इसलिए सबसे पहले यह है, जैसे सॉफ्टवेयर ज़रूरी है कंप्यूटर में, वैसे ही हमारे लिए मन ज़रूरी है। मन और शरीर ज़रूरी है भौतिक जगत में कार्य करने के लिए, कोई भी कार्य करना है।
तो जब इस तरह से हम कार्य कर रहे हैं, तो वास्तव में क्या होता है कि जो शरीर और मन हैं, वह हम हमारे उद्देश्य से कार्य करते हैं, करना चाहते हैं। पर उसके अलावा शरीर और मन में, बहुत कुछ चलते रहते हैं। जब कुछ पढ़ना चाहते हैं, कुछ खबर हमने सुनी है कहीं पे, उसके बारे में हम जानना चाहते हैं, या तो कुछ यह हो गया, वह हो गया। जब हम वो पढ़ने जाते हैं, तो वो एक खबर तो होती है, पर उसके साथ और 10-15 लिंक्स होते हैं। फिर यह पढ़ो, यह पढ़ो, यह पढ़ो, और फिर उसमें हम गुमराह हो सकते हैं।
तो वैसे ही क्या है, शरीर और मन को हम अगर केवल एक यंत्र के रूप में देखते हैं, तो उसका हम उपयोग अच्छे से कर सकते हैं, पर हम उसको केवल यंत्र के रूप में देखते नहीं हैं। मतलब क्या है कि अगर हम कई बार उदाहरण देते कि यह शरीर जो है, यह गाड़ी के समान है और आत्मा उसके लिए ड्राइवर है, तो यह सही है। पर क्या है कि अगर कार में हमको पेट्रोल डालना है, तो वो एक केवल फंक्शनल, वो एक कार को चलाने के लिए ज़रूरी होते हैं, पूरी केवल तो गाड़ी के लिए चलेगी। पर जब हम इस शरीर में पेट्रोल डालते हैं, हम अन्न डालते हैं, तो न केवल उससे शक्ति मिलती है पर उसमें आनन्द भी मिलता है। और उसके कारण क्या होता है, कि अगर हमें जीवन का उच्च उद्देश्य पता नहीं है कुछ, तो हम इस शरीर से जो भोग मिलता है, उसी को हमारे जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं।
हमारे जीवन में हमारी ये ऐसी परिस्थिति है, कि प्लेज़र (pleasure) और फंक्शन (function) हमारे जीवन का उद्देश्य बन जाते हैं। कि शारीरिक स्तर पे सुख और ज़रूरत या कार्य, इसे खाना ये शरीर के लिए ज़रूरी है, पर उसमें सुख भी है। तो जो कोई भी योनि इस भौतिक जगत में जी रही है, तो उसके लिए उसको खुद को रिप्रोड्यूस (reproduce) करना है, तो उसके लिए उसको पुनः चलाना है उस योनि को आगे, तो फिर संतति उत्पत्ति करना ज़रूरी है। पर उस कार्य में जो एक तरह से अस्तित्व के लिए ज़रूरी है, खाना हो, संतति करना हो, जो भी है, पर उसमें कुछ भोग भी है, उसमें कुछ आनन्द भी है।
और इसके कारण क्या होता है, कई बार वो आनन्द का ही, जो सुख मिलता है उसमें, उससे ही हम इतना आकर्षित हो जाते हैं, कि जो दूसरा उसका उद्देश्य है, वह हम भूल जाते हैं। तो अभी मान लीजिए कोई बोल रहा है कि कोई सुबह जल्दी उठता है, और अपनी गाड़ी निकालता है बाहर, अगर आज कल ठंडी है काफी, ठंडी में गाड़ी चलाने निकल रहा है। “कहाँ जा रहे हैं?” “मैं गाड़ी में पेट्रोल भरने जा रहा हूँ।” “अच्छा ठीक है, उसके बाद में कहाँ जाना है?” “नहीं, उसके बाद में एक और जाके मैं पेट्रोल भरूँगा।” “उसके बाद में एक और जाके मैं पेट्रोल भरूँगा।” “तुम जाना कहाँ चाहते हो?” “मैं पेट्रोल भरने जा रहा हूँ।” उसके बाद में क्या? अभी कोई गाड़ी चलाने का उद्देश्य, पेट्रोल भरना यह नहीं होगा, कोई गाड़ी चलाने का उद्देश्य।
क्योंकि क्या होता है हमारे जीवन में, हमारे शरीर के स्तर पर, जो फंक्शन (function) है, फंक्शन इज़ वॉट इन हिंदी (function is what in Hindi)? कर्तव्य, कार्य। कार्य इज़ एक्टिविटी (activity)। आप जानते हैं फंक्शन, जो उसका उपयोग है। जो उपयोग है और जो भोग है, यह दोनों, जो उपयोग के लिए ज़रूरी है और जिससे भोग मिलता है, और उसके कारण मोह होता है। अगर शरीर में खाना डालना, यह केवल एक गाड़ी में पेट्रोल डालने के समान कार्य होता, तो उसके पीछे कोई मोहित नहीं होता था।
पर क्योंकि इसमें जो उपयोग के लिए ज़रूरी है, और जो इसमें भोग मिलता है, दोनों साथ में हो गए हैं, इसके कारण आत्मा का शरीर से जो सम्बन्ध हो जाता है, वह केवल उपयोग के लिए नहीं रहता है, वह भोग के लिए बन जाता है। और जब वो भोग के लिए बन जाता है तो वो इतना उससे आसक्त हो जाता है, इतना उससे पहचानने लगता है कि व्यक्ति फिर सोचता है कि, इतना कि ये शरीर मेरे लिए एक वाहन है पर ये शरीर मेरा है और मैं ये शरीर हूँ।
मिस-आइडेंटिफिकेशन (गलत पहचान) और मोह
तो ये मिस-आइडेंटिफिकेशन (Misidentification) जो मोह… एक बात है पर मिस-आइडेंटिफिकेशन मतलब गलत पहचान यह उससे भी बड़ा मोह है। मतलब क्या है कि अगर हम देखें तो हम इस भौतिक जगत में दो प्रकार के मोह में हो सकते हैं। एक है कि मान लीजिए कि रेगिस्तान में किसी जानवर को कहीं पानी दिख रहा है पर वो एक मृगजल है, वहाँ पे तो पानी है नहीं वो, केवल मृगजल। तो वो एक मोह है कि वहाँ पे जल नहीं है पर जल देखना, तो वो इस प्रकार का मोह है।
ज़रूर हम सब को है इस दुनिया में। बहुत सी चीज़ें आकर्षक दिखती हैं पर उनमें इतना कुछ आनन्द नहीं, जितना दिखता है उतना तो नहीं है। श्रीमद्भागवतम् के ग्यारहवें स्कन्ध में वर्णन है क्षुद्रं सुखं और उरु तृष्णा। कि जो सुख है बहुत छोटा सा है पर उसके लिए यह तृष्णा है हमारी, जो इच्छा है वो बहुत बड़ी है। और यह बड़ा क्यों है क्योंकि हमको लगता है कि यह सुख बहुत बड़ा है। तो एक प्रकार का मोह है कि जहां थोड़ा सुख है वो उसको बहुत बड़ा सुख मान लेना।
पर वो जो मोह है वो उतना बड़ा नहीं है। हमारा मूलभूत मोह क्या है? वो प्रकार का मोह नहीं है… यह प्रकार का मोह है मिस-परसेप्शन (Misperception) मतलब जो पानी नहीं है उसको पानी देखना। पर मिस-आइडेंटिफिकेशन (Misidentification) मतलब खुद को ही शरीर मान लेना, कि वह जो है वो मूल मोह है। और इस मोह के कारण बाकी सब मोह आ जाते हैं। तब जब इन्द्रियों से हम कार्य करते हैं, इन्द्रियों से भोग करते-करते ऐसे हो जाता है कि हम खुद को इन्द्रियों से, इन्द्रियाँ जिस शरीर से बनी हुई हैं, जुड़ी हुई हैं, उससे हम पहचानने लगते हैं।
अभी जब जो मनोवैज्ञानिक हैं, उन्होंने इन्फेंट डेवलपमेंट (Infant Development), छोटा बालक होता है, शिशु होता है, नवजात शिशु वो जैसे बढ़ता है, वो कैसे विचारधारा करता है, कैसे उसकी विचारधारा बढ़ती है उसके बारे में काफी संशोधन किया है। तो उसके बारे में अलग-अलग थ्योरीज़ (theories) हैं। पर एक चीज उसमें बताई गई है कि जब वो नवजात शिशु बड़ा होने लगता है तो सबसे पहले तो वो ऐसे सिर्फ चेतना है पर “मैं क्या हूँ, मैं कहाँ हूँ”, मैं कुछ भी पढ़ा नहीं है सिर्फ अस्तित्व है और रोने लगता है। तो फिर बाद में उसको माँ उठाती है फिर माँ अपने स्तन से दूध पिलाती है तो उसको अच्छा लगता है पर क्या हो रहा है कुछ भी उसको समझ भी नहीं आता है।
जैसे कभी हम बहुत गहरी नींद से उठ जाते हैं और मान लीजिए हम कहीं सफर कर रहे हैं, कहीं ट्रेवल (travel) कर रहे हैं तो उठ जाते हैं तो पहले “कहाँ हूँ मैं, कहाँ हूँ मैं”, कुछ समझ भी नहीं आता है पहले तो। फिर बाद में, अगर हम बहुत ट्रेवल कर रहे हैं, “कहाँ हूँ”, फिर बाद में, “क्या मैं कर रहा हूँ, यहाँ पर होना चाहिए”। तो उसमें थोड़ा समय लगता है। तो जो हमको शायद पाँच मिनट, दो मिनट, एक मिनट लगेगा सुबह उठने के बाद में, “कहाँ हूँ” समझने के लिए, जो नवजात शिशु होता है, उसको कई दिन या कई हफ्ते लग जाते हैं।
तो पहले तो उसको ये भी समझता नहीं है कि ये मेरी माँ है। लगता है कुछ अच्छी चीज है, यहाँ से कुछ अच्छी चीज आती है जो मेरे आ जाती है मुझे, अच्छा लगता है मुझे। तो फिर, तो उसमें क्या होता है लगता है कि ये नवजात शिशु होता है धीरे-धीरे हम कहते हैं अन्नमय कोष जो होता है, प्राणमय कोष, अलग-अलग कोष होते हैं। तो अन्नमय कोष जो पहले होता है, क्या कि सारी दुनिया की पहचान शिशु अपनी जिह्वा से करता है। इसलिए जो भी मिलता है, सबसे पहले उठाता है, मुँह में चखता है, अपनी उंगली चखता है, अपने पैर चखता है, कोई चीज़ उठा के उसे चखता है। तो इसमें क्या हो रहा है कि वो खुद की पहचान करने का प्रयास करता है। कि ये मेरा शरीर है, ये समझना ज़रूरी है। पर “मैं शरीर हूँ”, ये समझना मोह है।
और ये मोह क्यों होता है? जितना हमें आसक्ति होती है, उतना हमें मोह होता है। किसी चीज में हमारी भावनाएं जुड़ जाती हैं, तो भावना जितनी हमारी उस चीज में अटक गई है या हमने डाली है, उतना हम उससे कुछ मोह करते हैं। तभी कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं कि बड़ी छोटी चीज पर बड़ा झगड़ा होने लगता है। बहुत बड़ा झगड़ा होने लगता है छोटी-छोटी चीजों पर, क्यों? क्योंकि वो लोगों की जो भावना है उस चीज में अटक गई है।
भावनाओं की आसक्ति और इसके परिणाम
जब किसी चीज में किसी की भावना बहुत जुड़ जाती है तो फिर क्या होता है कि अमेरिका में जो लोग हैं, पाश्चात्य संस्कृति जो बहुत अकेली संस्कृति है, लोग बहुत अलोन (alone) हैं। और कहीं खासकर कैलिफोर्निया में लॉस एंजिल्स हो, सैन फ्रांसिस्को हो वहाँ पे जो परिवारों में जितने बच्चे हैं उससे ज़्यादा कुत्ते हैं। सीरियस बात है, जोक (joke) नहीं है। क्यों? लोगों को बच्चों को पालन करना, बड़ा करना, उनको अनुशासित करना उनको बड़ा मुश्किल लगता है। पर क्या हर मानव में ऐसे ज़रूरत होती है किसी का पालन करना, किसी का पोषण करना यह ज़रूरी है। तो क्या होता है अब पालन करना है पर बच्चे की देखभाल करने के लिए समय नहीं है, सब्र नहीं है, उतनी क्षमता नहीं है। तो क्या है? कुत्ते को पालना।
तो अभी एक अमेरिका में कोर्ट केस हो गया था कि अगर एक परिवार है, पति-पत्नी हैं और उनका कुत्ता है तो फिर वो दोनों का अगर डिवोर्स हो गया तो कुत्ता किसके पास जाएगा? तो जैसे अगर पति-पत्नी का डिवोर्स हो जाता है तो फिर क्या होता है? कि अगर एक परिवार में कुत्ता है और दोनों उस कुत्ते से स्नेह करते हैं तो कुत्ता पत्नी के पास जाएगा या पति के पास जाएगा? और अभी उसमें अलग-अलग प्रकार से विचार करते हैं वो अभी कुत्ता किसको चाहता है? तो क्या करो, दोनों को सामने खड़ा करो, तो कुत्ते को एक कमरे में लेकर, कुत्ता जिसके पास जाएगा उसके पास लेकर जाओ। पर दो बार ऐसे किया तो कुत्ता एक बार इसके पास, दूसरी बार उसके पास चला गया। तो अभी करेंगे क्या उसके पास के बारे में?
तो यहाँ पर हुआ क्या है क्योंकि वो कुत्ते में इतनी भावना आ गई है तो वो दोनों पति और पत्नी का भी इतना बड़ा केस हो गया है। मतलब क्या है पैसे तो डाल रहे हैं लॉयर जो होते हैं, अटॉर्नीज़ (attorneys) को पैसे देने पड़ते हैं तो दोनों पैसे डालने को तैयार हैं, लाखों-लाखों डॉलर्स में डाल रहे हैं वो क्योंकि कुत्ते में इतनी आसक्ति हो गयी है। तो उससे क्या होता है जब किसी चीज़ से आसक्ति हो जाती है तो फिर हम बाकी सब कुछ भूल जाते हैं कि किसी न किसी तरह से मुझे कुत्ता प्राप्त करना है।
अभी क्या होता है कि ये ऐसे नहीं कि ये अमेरिका में ही हो रहा था। ये दक्षिण भारत में भी जो श्री वैष्णव संप्रदाय था उसमें वो एक हाथी का बड़ा केस हो रहा था। हाथी पर जो तिलक डालते हैं, श्री वैष्णव में दो मार्ग हैं। ये एक है… क्या हो रहा था एक वेदान्त देशिक के अनुयायी हैं, वो अदर (other) हैं। तो उसमें रामानुजाचार्य के बाद दो गुट हो गए थे। तो फिर अभी वो जो हाथी भगवान के दर्शन करने को आता है विष्णु के सामने, वो हाथी पर कौन से ग्रुप का तिलक डालना है उसमें बहस हो गया और वो सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। और जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में हीरिंग (hearing) होने वाला था उस दिन वो हाथी मर गया!
तो अभी क्या होता है यहाँ पे कि जब किसी चीज के ऊपर बड़ी आसक्ति हो जाती है तो उससे हम उसको आइडेंटिफाई (identify) कर लेते हैं और उसमें इतनी भावना डाल देते हैं कि न केवल यह मेरा है, यह मैं ही हूँ। जैसे किसी माता को लगेगा कि अपना शिशु उससे, बच्चा दूर ले गया है तो माता को लगता है कि यह केवल मेरा बच्चा नहीं है, मेरे शरीर का एक अंग है, तुम इससे दूर कैसे ले जा सकते हो। तो वो ऐसे ही कुत्ते के ऊपर भी लग सकता है।
तो क्या है कि जो आत्मा का शरीर से जो सम्बन्ध है यह केवल कार्य, उपयोग के लिए नहीं, कार्य के लिए नहीं है, वो एक पहचान बन गई है। और पहचान क्यों बन गई है? क्योंकि उसमें भावनाएं उतनी चली गई हैं। भावनाएं उतनी चली क्यों गई हैं? क्योंकि उतना उससे हमको भोग मिला है या उतना हमको भोग मिलने की उससे आशा है। तो अभी यह पहला है कि हम क्योंकि शरीर से कार्य करते समय हम पहचान लेते हैं शरीर से, उसके लिए उससे आसक्ति बढ़ जाती है और यह सबसे मूलभूत मोह है कि उससे हम मिस-आइडेंटिफिकेशन करते हैं।
इन्द्रियों का प्यूरिफिकेशन (शुद्धिकरण) और यूटिलाइजेशन (उपयोग)
दूसरा बताया था मैंने कि जो अभी इन्द्रियाँ हैं, इनको भक्ति में दो चीज़ें करते हैं। भक्ति में हम उनको प्यूरिफिकेशन (Purification) और यूटिलाइजेशन (Utilization)। भक्ति ऐसे है कि हमारी इन्द्रियों को हम बुरा नहीं मानते हैं। जो इन्द्रियाँ हैं, कई खासकर के ऐसे जो आध्यात्मिक मार्ग हैं जो संसार को छोड़ देने की बात करते हैं, संसार को ठुकरा दो और आध्यात्मिकता में प्रगति करो। उसमें कहते हैं इन्द्रियाँ बहुत मोह और माया के कारण हैं, बाधक बताया जाता है। पर हम देखते हैं शास्त्रों में कई बार ऐसे श्लोक आते हैं कि, “हे भगवान मैं चाहता हूँ कि मैं आँखों से हमेशा आपके ही दर्शन करता रहूँ।”
दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम्।
अम्बरीष महाराज कहते हैं, नलकूबर और मणिग्रीव कहते हैं:
वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायाम्।
कि मैं जिह्वा से आपके गुणगान करना चाहता हूँ। मैं आँखों से आपका दर्शन करना चाहता हूँ, आपके भक्तों का दर्शन करना चाहता हूँ।
उपयोग किस तरह से करते हैं कि हम भौतिक जगत में कार्य तो करने हैं पर इस तरह से कार्य करें जिससे कि हम आध्यात्म के करीब जा सकें। तो व्यावहारिक रूप से तो हमें कार्य करना ही पड़ेगा, हमें कुछ नौकरी करनी है, हमें कुछ घर का काम करना है वह तो हम करेंगे, पर वह सब अगर भक्ति भाव से करेंगे तो क्या है, उससे हम इस शरीर का इस्तेमाल करेंगे पर शरीर से हम बंधन में नहीं फसेंगे, शरीर के मोह में नहीं फसेंगे।
यह एक बहुत महत्वपूर्ण चीज है कि जब किसी चीज को भौतिक भावना से कार्य करते हैं, आध्यात्मिक भावना से कार्य करते हैं तो क्या होता है कि किसी भी चीज को हम भौतिक चेतना से इस्तेमाल करते हैं तो उससे हमारा मोह बढ़ता है, उससे हमारा इल्यूज़न (illusion) बढ़ता है, उससे हमारा अटैचमेंट (attachment) बढ़ता है, हमारा इन्फैचुएशन (infatuation) बढ़ता है। पर हम आध्यात्मिक भावना से करते हैं तो उससे हमारा रियलाइज़ेशन (realization) बढ़ता है।
अगर मान लीजिए कि किसी को अच्छा बोलने की क्षमता है, अच्छा गाने की क्षमता है, अच्छी डेकोरेशन (decoration) करने की क्षमता है। तो अभी अगर कोई व्यक्ति वही भौतिक कार्य के लिए करता है मतलब बॉलीवुड के गाने गाता है या कोई जैसे भौतिक भाषण देता है या कोई जैसे भौतिक डेकोरेशन करता है, कोई वेडिंग प्लानिंग (wedding planning) होगी या किसी का बुटीक होगा, कोई ब्यूटी सैलून (beauty saloon) होगा जो भी होगा, आप ऐसे करता है तो हम उस कार्य से और उस कार्य की सुविधा से और आसक्त हो जाते हैं।
तो उसके विपरीत जब हम भगवान के लिए ऐसे कार्य करते हैं, तो फिर भी हम कोई किसी का प्रवचन देने की, किसी गाने की, अच्छे गीत गाता है कोई, तो उसको भी उसके जिह्वा से, उसकी वाणी से, एक तरह से उसकी कीमत समझेंगे, ज़रूर उसको वैल्यू (value) करेगा। पर क्या होगा? भक्ति के द्वारा हम समझेंगे कि हाँ, ये मेरे लिए ज़रूरी है, महत्वपूर्ण है, मूल्यवान है, पर जितना हम भक्ति में इसको इस्तेमाल करेंगे उससे हम धीरे-धीरे समझेंगे कि मैं इससे अलग हूँ।
कि हाँ, मैं… कि जो भौतिकवादी संगीतकार होगा जितना उसको संगीत से आनंद मिलेगा उतना उसको सोचो कि “मैं संगीतकार हूँ”, बाकी जीवन, बाकी जो कुछ भी भूल जा रहे हैं। पर भक्त जो है, जो हम किसी चीज़ को सेवा भाव से इस्तेमाल करते हैं भगवान की सेवा में, तो हम ज़रूर उसको ध्यानपूर्वक करते हैं, पर क्या होता है, उतना ही करने से हमको समझता है कि वास्तव में, मैं ये गा रहा हूँ, बोल रहा हूँ, ये डेकोरेशन कर रहा हूँ पर मैं इससे अलग हूँ।
क्यों? क्या होता है, कि अभी हम यहाँ पे हैं। हम जिस चीज़ को इस्तेमाल कर रहे हैं, वो यहाँ पे है और इसके परे कुछ उद्देश्य है। तो अभी क्या होता है, भौतिक जगत में, जो उद्देश्य भी होता है, भौतिक होता है। पर जब हम भगवान की सेवा कर रहे हैं, तो हम यहाँ पे हैं आत्मा के रूप में, हमारे पास यह एक क्षमता है और फिर इसके परे जो हैं, हम यहाँ पे भगवान हैं। तो फिर क्या होता है, जितना हम यहाँ पे भगवान की सेवा कर रहे हैं, भगवान को अर्पित करते हैं यह, तो उसके द्वारा हम बीच में जो हमारी जो चीज हम अर्पण करने के लिए है उसका हम मूल्य समझते हैं, पर समझते हैं कि इसके परे भी कुछ है। तो यह, जो है साक्षात्कार जो होता है, वह बहुत महत्वपूर्ण है।
सेवा और सेवा के उद्देश्य के प्रति आसक्ति
और अगर हम समझ सकते हैं, अगर हम… एक है अटैचमेंट टू सर्विस (attachment to service) और दूसरा है अटैचमेंट टू द ऑब्जेक्ट ऑफ सर्विस (attachment to the object of service)। कि सेवा से आसक्ति और सेवा के उद्देश्य से आसक्ति। तो अभी सेवा से आसक्ति भी अच्छी ही है कि किसी न किसी तरह से हम भगवान से जुड़ जाते हैं। अगर हम सेवा से आसक्त हैं, कि यह सेवा करना मुझे बहुत अच्छा लगता है, तो बाकी कुछ नहीं करें, किसी व्यक्ति को कीर्तन अच्छा लगता है, गाना अच्छा लगता है तो फिर अच्छी बात है, कम से कम वो सेवा तो ध्यानपूर्वक करेगा, अच्छी तरह से गाने का प्रयास करेगा।
पर क्या है, कि सेवा से आसक्ति से धीरे-धीरे हमें प्रगति करने के लिए क्या करना है? सेवा के उद्देश्य से आसक्ति करनी है। जो हम कहते हैं भक्ति के भाव, भक्ति के लक्षण होते हैं:
आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्ति… (आदौ श्रद्धा, साधु संग, भजन क्रिया, फिर उसके बाद अनर्थ निवृत्ति, फिर निष्ठा, रुचि और आसक्ति।)
तो अभी रुचि और आसक्ति में यह फर्क है। रुचि में हमको सेवा में रुचि आती है, सेवा में ही आनंद मिलता है, पर आसक्ति में जो सेवा के उद्देश्य हैं, जो भगवान हैं, उनके प्रति आसक्ति हो जाती है। तो यह जो है, उसमें समय लग सकता है। पर क्या है, कि अगर कोई व्यक्ति सेवा से ही इतना आसक्त हो जाता है तो फिर क्या होता है, वो सेवा भाव धीरे-धीरे कम होने लगता है।
एक भक्त थे एक मंदिर में, वो बहुत अच्छा कीर्तन करते थे। और फिर उनकी इच्छा थी कि मुझे स्पेशल (special) कुछ ट्रेनिंग प्राप्त करना है। कैसे? जैसे पहले पारंपरिक पद्धति से, हम गौड़ीय वैष्णव हैं, तो बंगाल में जैसे नरोत्तम दास ठाकुर के समय से कीर्तन हुआ करता था, कैसे लोग, कैसे वो गाते थे, कैसे वो वाद्य बजाते थे, वो सब मैं सीखना चाहता हूँ। तो उन्होंने अपने गुरु से इजाज़त ली और फिर वे गए बंगाल में और दो-तीन सालों तक वहीं पर सब सीखा और बड़े निपुण हो गए। पर उसके बाद में जब वो आ गए मंदिर में, तो फिर वो कीर्तन करते थे। और जब भी कीर्तन होता था, वो कीर्तन करते थे, बड़ा सुन्दर कीर्तन करते थे।
पर उसके बाद में जब कोई कीर्तन करता था, तो वो कहते थे “तुम ये बराबर नहीं गा रहे हो, तुम ये बराबर नहीं बजा रहे हो, तुम ये बराबर नहीं बजा रहे हो।” फिर बाद में एक दिन वो मंदिर के मैनेजर के पास गए और कहे “इस मंदिर में किसी को कीर्तन आता ही नहीं है, इसलिए आज से जो भी कीर्तन होगा मैं ही करूँगा।”
अभी ये बात, वो फिर मैनेजर ने उनसे कहनी थी कि, “देखिये यहाँ पे हम सिर्फ कीर्तन करने के लिए नहीं आए हैं, हम भगवान की भक्ति करने के लिए आए हैं। और तुम अपनी कीर्तन मंडली बनाओ, जहाँ पे तुम बहुत अच्छा कीर्तन कर सकते हो, पर जो मंदिर में हैं, सब अलग-अलग भक्त अपने सेवा भाव से कीर्तन करेंगे और भगवान को भक्ति भाव महत्वपूर्ण है।” तो अब क्या हो गया, उस सेवा से अगर आसक्ति इतनी हो गई है, कि हम दूसरों का सेवा भाव देख ही नहीं रहे और दूसरों के… जो अच्छी तरह से मैं कर नहीं सकता, उतना कर नहीं सकते, इसलिए उनकी निंदा करते रहते हैं, तो वो अच्छा नहीं है। पर अगर हम सेवा भाव से करेंगे, तो क्या होगा, कि हम समझेंगे, “हाँ, यह बहुत महत्वपूर्ण है मेरा गाना, पर मैं गा किसके लिए रहा हूँ? भगवान के लिए गा रहा हूँ।”
प्यूरिफिकेशन: कार्य से आत्मशुद्धि
प्यूरिफिकेशन, प्यूरिफिकेशन मतलब क्या होता है?
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥
भगवान कहते हैं, भगवद्गीता के पांचवें अध्याय के 11वें श्लोक में, जो योगी होते हैं, वह अपने शरीर के साथ, कायेन मनसा बुद्ध्या, शरीर के साथ, मन के साथ, बुद्धि के साथ, केवलैरिन्द्रियैरपि, अपनी इन्द्रियों के साथ भी, योगिनः कर्मकुर्वन्ति कर्म करते हैं, पर किसलिए? सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये – आत्मशुद्धि के लिए।
तो अब शुद्धि का, क्या है? कि एक है, हम खुद के आनंद के लिए हम कुछ कार्य करते हैं, दूसरा है, कि भगवान के आनंद के लिए कार्य करते हैं। तो अभी ये दोनों जो उद्देश्य हैं, ये कभी-कभी हमारे लिए इम्प्रेक्टिकल (impractical) हो जाएं। अगर हम खुद के आनंद के लिए कार्य करेंगे, तो भी कुछ आनंद नहीं मिल रहा है, तो फिर हम बोलें, “क्या क्यों करूँ मैं ये?” पर अगर केवल भगवान के आनंद के लिए कार्य करना है, कोई लगे, “अभी भगवान को किसमें आनंद मिल رہا है? क्योंकि मुझे पता कैसे चलेगा?” और कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि, हमें ये लगेगा कि, “इसमें मुझे प्रेरणा नहीं मिल रही है।”
तो अभी जो शुद्ध भक्त होते हैं, वह केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए सब सेवा करते हैं। हमें भी उस स्तर पे आना है, पर हम उस स्तर पे ऐसे एक कृत्रिम पद्धति से, खुद की कल्पना नहीं कर सकते हैं, मैं वहाँ पे हूँ। जो हमारे लिए स्थिरता का स्तर है, वह क्या है? शुद्धिकरण के लिए है।
मतलब क्या है, एक बार प्रभुपाद जी को एक शिष्य ने बोला, “प्रभुपाद जी, मैं आपकी सेवा जन्म-जन्म तक करना चाहता हूँ।” तो प्रभुपाद जी ने कहा, “तुम्हारी सेवा सुधारने के लिए, मुझे बार-बार जन्म लेने को मत लगाओ, तुम शुद्ध हो जाओ और भगवद्धाम आ जाओ!”
अब इसमें भाव क्या है, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि जन्म-जन्म में, “अगर मुझे मुक्ति नहीं मिले, तो मैं जन्म-जन्म आपकी भक्ति करना चाहता हूँ।” तो वो भाव अच्छा है, पर क्या है, कि क्या हम उस स्तर पे हैं? अभी हमें, अभी हम भौतिक चीज़ों से आसक्त हैं, भौतिक जगत में रहें, तो शायद इस जन्म में थोड़ी भक्ति करते रहें, पर अगले जन्म में भक्ति से दूर भी जा सकते हैं। तो इसलिए, अभी हमें क्या करना है? स्थिरता से भक्ति में लगना है, और यह शुद्धिकरण है। वहाँ हमारा एक स्टेडी प्लेटफॉर्म (steady platform) हो सकता है, कि जो इन्द्रियाँ हैं, मैं इसको इस्तेमाल कर रहा हूँ, वहाँ शुद्धिकरण के लिए इस्तेमाल कर रहा हूँ।
तो अभी शुद्धिकरण का मतलब कैसे होता है, कुछ-कुछ शब्दों का, कुछ-कुछ शब्दों का अर्थ होता है, वह एक संदर्भ से उसको हम निकालते हैं। तो कभी-कभी आजकल के हम जो प्यूरिफिकेशन बोलते हैं, तो उसको थोड़ा नकारात्मक अर्थ आ जाता है। अगर कोई हमको प्रसाद के लिए बुलाते होंगे घर में, तो “आपकी यात्रा कैसी थी?” “यात्रा एक्सटैटिक (ecstatic) थी, यात्रा प्यूरिफाइंग (purifying) थी।” मतलब क्या बहुत तपस्या करनी पड़ी आपको? आपके… कभी-कभी हम सोचते हैं, प्यूरिफिकेशन मतलब क्या हम सोचते हैं, कि उसमें मुझे कुछ नहीं मिला, सिर्फ शुद्धिकरण हुआ। मतलब मेरे लिए तपस्या की बात रही, पर उससे शुद्धिकरण हो गया।
तो एक बार दो भक्त मिले थे, और दोनों भक्तों में बहुत झगड़ा हुआ था। तो बहुत बहस हुई, और फिर साथ में रहते हैं, तो जब कोई जा रहे थे, तो फिर कोई विज़िटिंग प्रीचर (visiting preacher) अगर आते हैं हमारे यहाँ पे, हम कैसे भक्त मिलते हैं, वो जा रहे थे, तो वो कहते हैं कि “आपका साथ बहुत इंस्पायरिंग (inspiring) था।” तो कभी कोई उसका नकारात्मक अर्थ हो सकता है, हम अब जिस तरह से उसको इस्तेमाल करते हैं।
पर यहाँ पे शुद्धिकरण का मतलब क्या है? शुद्धिकरण मतलब दो चीज़ें होती हैं, कि एक है कि हमारी भौतिक चीजों से आसक्ति कम होती है, और भगवान से आसक्ति बढ़ती है। शुद्धिकरण का यही अर्थ है। कि शुद्धिकरण मतलब क्या है, अगर हम शुद्धिकरण के भाव से कार्य करते हैं, अगर सेवा में लगे रहते हैं, तो धीरे-धीरे जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्सर्य हैं, वो सब कम हो जाएगा, और हमारी भक्ति में जो भगवान के प्रति आकर्षण है वो धीरे-धीरे बढ़ जाएगा।
तो जो भक्ति है वो क्या है? इन्द्रियों को इस्तेमाल करने वाला आध्यात्म है। Bhakti is sensory spirituality. कि इसीलिए इन्द्रियों को हम इस्तेमाल करते हैं, शुद्धिकरण के लिए इन्द्रियों को इस्तेमाल करते हैं, भगवान की सेवा के लिए। और उसके द्वारा वही इन्द्रियाँ जो मोह और बंधन का कारण बनती हैं साधारणतया, वही इन्द्रियाँ हमें शुद्धिकरण और फिर मुक्ति का साधन बन जाती हैं।
शरीर की सकारात्मक भूमिका और मोहमुक्ति
इसलिए एक है कि शरीर मोह का कारण है पर शरीर धर्म साधन में जाता है। शरीर हमें भगवान के पास ले जाने में भी एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इस तरह से जब हम शरीर को सकारात्मक रूप से देखते हैं कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण उपजाऊ है मेरे लिए जिससे कि मैं भगवान की सेवा कर सकता हूँ, तो हम इसका ख्याल रख सकते हैं। उससे आसक्त हुए बिना हम उस शरीर को संभाल सकते हैं। पर उससे आसक्त हुए बिना… आसक्त हुए बिना हम कार्य करते हैं तो हम शरीर की देखभाल कर सकते हैं, उसके साथ-साथ आत्मा के भी साक्षात्कार की ओर बढ़ सकते हैं।
तो सारांश में नेक्स्ट पॉइंट (Next point) हम देखें। पहला पॉइंट यह था कि किस तरह से शरीर में हम न केवल उसको इस्तेमाल करते हैं पर उससे खुद को पहचान लेते हैं और वो मोह है। अभी ऐसे मोह में क्यों पड़ते हैं? क्योंकि शरीर में जो उपयोग का कार्य है और जो भोग का कार्य है दोनों में एक साथ कर दिया। कार में पेट्रोल डालने में कुछ आनंद नहीं मिलता है पर शरीर में अन्न डालने में आनंद मिलता है। तो कुछ लोग फिर वो जो अन्न का शरीर की पुष्टि करने का उद्देश्य छोड़कर सिर्फ भोग के उद्देश्य से कार्य करने लगते हैं। और जितना हम किसी चीज़ से सुख प्राप्त करते हैं या सुख प्राप्त करने की अपेक्षा रखते हैं, उससे हमको उतनी आसक्ति हो जाती है।
जैसे कुत्ते के प्रति इतनी आसक्ति हो जाती है कि कोई मल्टी-मिलियन डॉलर (multi-million dollar) केस कर लेगा, “कुत्ता मुझे प्राप्त करना है।” तो वैसे ही कि हाथी के लिए इतनी आसक्त हो जाएं कि हाथी का कोई केस कर सकता है। तो वैसे ही क्या है कि जितना हम इस शरीर से भोग करते हैं और उससे भोग करने की इच्छा करते हैं, उतना हमारी भावना उसमें अटक जाती है, उतना आसक्त हो जाती है कि न केवल उसको बहुत आसक्त हो जाती है पर उससे खुद को पहचानने लगते हैं। तो एक मोह है कि भौतिक जगत में थोड़ा सुख है पर उसको बहुत सुख मानना। पर दूसरा मोह है कि इस भौतिक शरीर से ही खुद को पहचान लेना।
तो अभी ये मोह से छूटना है तो भक्ति का मार्ग है। भक्ति के मार्ग में दो चीज़ें हैं क्या है कि हम शरीर को इस्तेमाल करते हैं तो Misidentification (मिस-आइडेंटिफिकेशन), Utilization (यूटिलाइजेशन) कि हमें भक्ति में कार्य करने हैं, भौतिक जगत में भक्ति करनी है, शरीर तो ज़रूरी है कार्य करने के लिए। तो हमारी इन्द्रियों से हम भगवान का दर्शन करते हैं, भगवान का गुणगान करते हैं और इसके द्वारा हम धीरे-धीरे शुद्ध होने लगते हैं। जब हम अगर हम भौतिक चेतना से कोई कार्य करते हैं तो फिर उसी कार्य से हम आसक्त हो जाते हैं।
तो कोई भौतिक संगीत गाता है तो गाने के कार्य से और गाने से जो मिलता है धन-संपत्ति उससे बड़ा आसक्त हो जाता है। पर अगर भगवान के लिए गाते हैं तो हम ज़रूर हमारी वाणी को, हमारे गले को संभालेंगे पर क्या होगा, उससे भी परे जो भगवान हैं उनकी ओर आसक्ति बढ़ जाएगी। तो सेवा से आसक्ति अच्छी है पर उससे महत्वपूर्ण है कि सेवा के उद्देश्य से जो आसक्ति है, आसक्ति बढ़नी है। और ज़रूर हम… ज़रूर से साक्षात्कार होता है जब हम हमारी इन्द्रियों को और सेवा को भगवान की सेवा में इस्तेमाल करते हैं। उसके द्वारा हमारी दृष्टि, वो भौतिक चीज से जो उद्देश्य हैं भगवान उनकी ओर के लिए लगती है।
और फिर तीसरा है जब हम इन्द्रियों को भगवान की सेवा में इस्तेमाल करते हैं तो उससे शुद्धिकरण होता है। शुद्धिकरण का मतलब ये नहीं कि ये सिर्फ तपस्या की बात है। शुद्धिकरण क्या मतलब क्या है कि वो स्थिर स्तर पे हम कार्य कर सकते हैं। कि भले ही हमको खुद सुख मिलता है, वो कार्य करने में सुख नहीं मिलता है कभी। हम भगवान को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं पर भगवान प्रसन्न हो रहे हैं या नहीं हमको पता नहीं है। पर हम अगर स्थिरता से भक्ति कर रहे हैं तो शुद्धिकरण का अर्थ क्या है कि हमें जो अनर्थ हैं काम, क्रोध वो कम होने लगते हैं। जो परम अर्थ है भगवान के प्रति, भक्ति उसमें हम प्रगति कर सकते हैं।
और इस तरह से जब हम utilization (उपयोग) और purification (शुद्धिकरण), उपयोग करना और शुद्धिकरण करना इस भाव से, शरीर से हमारा सम्बन्ध जोड़ते हैं, सम्बन्ध को पुनः एक बार देखते हैं, तो फिर क्या है हम शरीर की देखभाल करते हैं पर शरीर से आसक्त नहीं होते हैं। शरीर की देखभाल करते हैं, आत्मा का कल्याण है, उसके लिए इस्तेमाल करते हैं। बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा।
प्रश्नोत्तर (Q&A)
प्रश्न: किसी को कोई सवाल है? हरे कृष्णा प्रभुजी। अपनी सेवा से आसक्त होगा या सेवा के उद्देश्य से आसक्त होगा? यदि सेवा से आसक्त होगा, कैसे हम बैलेंस (balance) कर सकते हैं? हम सेवा से आसक्त होंगे या सेवा के उद्देश्य से आसक्त होंगे?
उत्तर: हाँ, अगर हम सेवा के बाद… सेवा करने के बाद हमारे मन में क्या स्मरण होता है? क्या हम अगर हम प्रवचन देते हैं, प्रवचन देने के बाद हमने भगवान का गुणगान किया है, तो क्या भगवान का स्मरण हो रहा है या फिर “देखो मैंने कितना बड़ा प्रवचन दिया, कितना अच्छा प्रवचन दिया, कितने लोग मेरा गुणगान कर रहे हैं, कोई गुणगान मेरा क्यों नहीं कर रहा है?” अगर उसको सेवा करने के बाद हमारे स्मरण में यही आ रहा है, खुद के बारे में बहुत स्मरण आ रहा है, “देखो मैंने ऐसे किया, मैंने ऐसे किया, मैंने ऐसे किया”, तो फिर क्या है वो थोड़ा हम भौतिक चेतना में कर रहे हैं। अब एक तरह से वो स्वाभाविक है, पर इस प्रकार का विचार आ सकता है, पर क्या हम उसी विचार पर चिंतन करते रहते हैं?
अगर हम भगवान को सजा रहे हैं विग्रहों को, तो अभी अगर हम पूरा सजाते हैं भगवान को और फिर दर्शन होता है। तो अभी हम देख रहे हैं कि भगवान कितने सुन्दर हैं या मैंने कितना अच्छा सजाया है? “ये लोग जानते हैं कि मैंने कितना सुन्दर सजाया है?” तो हमको पता है ना। तो अभी एक तरह से वो एक मानवीय अपेक्षा है कि अगर हम कुछ अच्छी सेवा करें तो लोग उसकी थोड़ी सराहना करें, गुणगान में थोड़ी सराहना करें, उसको पहचानें, वो ठीक है। पर वही अगर हमारी चेतना में बना रहता है, तो Is our service making self-conscious or Krishna-conscious? (क्या हमारी सेवा हमें आत्म-सचेत बना रही है या कृष्ण-सचेत?) वो हम देख सकते हैं, सेवा करने के बाद क्या स्मरण में आता है हमें। ये पहली जाँच होगी।
दूसरी चीज यह है कि क्या हम दूसरी सेवा करने के लिए भी तैयार हैं? क्योंकि क्या होता है कि जो सेवा हम अच्छी तरह से कर सकते हैं उसको करने में हमको आनंद मिलता है और उसको अच्छी तरह से कर भी सकते हैं। तो स्वाभाविकता से हम वही सेवा अधिक करेंगे और अच्छा ही है, क्योंकि हम अच्छा योगदान कर सकते हैं। पर क्या है, जब हम कोई चीज अच्छी तरह से कर सकते हैं और अगर वही करते रहते हैं तो उससे कर्ता का भाव बहुत बढ़ जाता है। कि “मैं कर्ता हूँ, देखो मैं कितनी अच्छी तरह से कर रहा हूँ।”
पर जब हम इस तरह से अहंकार बढ़ जाता है, कर्ता का भाव बढ़ जाता है, और इसीलिए तब हम दूसरी कोई चीज करना चाहते हैं और वह अच्छी तरह से कर नहीं पाते, उसमें स्ट्रगल (struggle) करते हैं, तो हम समझते हैं कि वास्तव में एक छोटा सा आत्मा होना है। “कुछ चीज़ें मैं अच्छे से कर सकता हूँ पर बहुत सी चीज़ें अच्छे से नहीं कर सकता हूँ।” तो ऐसे नहीं कि जानबूझ के हमको दूसरी चीज़ें ऐसे करनी हैं जिसमें हम सब कुछ खराब कर देंगे, ऐसे नहीं है। पर वो तैयारी रखनी चाहिए। इसे कहते हैं कि जो चीज़ें हमें अच्छे से नहीं आती हैं वह कभी हम करते हैं, जानबूझ के नहीं पर उससे टालते नहीं हैं, करना पड़े तो टालते नहीं हैं। उससे क्या होता है हमें थोड़ी नम्रता आती है, कर्ता का भाव कम हो सकता है। कम से कम करने के लिए तैयार रहना चाहिए, ऐसे नहीं कि “मैं यही करूँगा और कुछ भी नहीं करूँगा।”
और तीसरी चीज यह है कि जब हम यह सेवा करते हैं तो उसके द्वारा हमारा दूसरों के प्रति क्या भाव हो रहा है? क्या है कि मतलब कि जो दूसरे भक्त हैं क्या हम उनसे खुद को ज्यादा सुपीरियर (superior) मानने लगते हैं? उनका तिरस्कार करने लगते हैं? उनकी निंदा करने लगते हैं? या हम देखते हैं कि ठीक है, अगर हम प्रवचन देते हैं और हम प्रवचन देने से ही आसक्त हो रहे हैं, तो फिर दूसरे भक्त जब प्रवचन देते हैं, “कुछ आता ही नहीं है इसको, कुछ शास्त्र पढ़ता नहीं है, कुछ याद नहीं है इसको।” तो फिर उनको हम तुच्छ मानने लगें।
शायद अलग लोगों में अलग क्षमता होती है। कुछ प्रवचन नहीं दे पाएंगे पर उनका जो डेडिकेशन (dedication) होगा, उनकी जो सेवा प्रदान सेवा है उसमें शायद उनका समर्पण भी ज्यादा हो सकता है। तो वो अगर हम देखते नहीं हैं, सेवा के द्वारा हमारी चेतना संकुचित हो रही है क्या? भक्ति के द्वारा हमारी चेतना विस्तारित होनी चाहिए कि कैसे कृष्ण सब जगह उपस्थित हैं, सब चीजों से कृष्ण का संबंध है। हम कृष्णभावनामृत सब चीजों में देख सकते हैं। तो अगर हम सेवा के उद्देश्य से आसक्त हो रहे हैं, तो फिर क्या हम देखेंगे सब भक्त हैं और सब अपनी अपनी क्षमता के साथ सेवा कर रहे हैं। पर हम सेवा से ही आसक्त हो रहे हैं तो हम देखेंगे “यह सेवा अच्छी आती नहीं, क्या फायदा है इसका?” तो फिर हम दूसरों के लिए उसको कम मानने लगे हैं।
तो यह तीन चीज़ें हैं:
- हमारे स्मरण में क्या हम खुद को लाते हैं या भगवान आते हैं?
- क्या हम दूसरी सेवा, जिसमें हम इतने अच्छे नहीं हैं, उसे करने के लिए हम तैयार हैं क्या?
- और हमारे अच्छी सेवा करने से दूसरे भक्तों के लिए हमारी क्या दृष्टि हो जाती है?
अगर हम उनको भक्तों के रूप में देख रहे हैं या उनको हमसे तुच्छ के रूप में देख रहे हैं, उससे हम समझ सकते हैं कि हम कृष्णभावनावित हो रहे हैं या नहीं। थैंक यू।
आसक्ति और उत्साह (Q&A)
प्रश्न: कोई और सवाल है किसी का? Yes sir, last question. तो क्या आसक्ति होना बुरा है? अगर आसक्ति नहीं होगी तो फिर हम कुछ कार्य नहीं करेंगे, कुछ कार्य करने की इच्छा भी नहीं होगी। हम अच्छा कार्य नहीं कर पाएंगे।
उत्तर: तो क्या है कई बार शब्द ऐसे होते हैं कि कुछ शब्दों का नकारात्मक भाव होता है। कुछ करने की इच्छा, कुछ करने की क्षमता, कुछ करने की चेतना, जोश… कुछ कार्य नहीं होगी। अभी हम उसे देखेंगे, प्रभुपाद जी में तो ज़रूर वो जोश था, तो फिर वो वृद्धावस्था में अमेरिका क्यों गए थे अकेले उस अवस्था में? ज़रूर उनमें वो उत्साह, जोश था।
आसक्ति शब्द का साधारणतः अर्थ क्या होता है कि एक चीज में इतना मर्ज (merge), इतना फंस जाना कि उसके बिना हम कुछ सोच ही नहीं पाते हैं, उसके बिना हमारा कोई जीवन ही नहीं। जैसे धृतराष्ट्र के, दुर्योधन के प्रयास होते थे। अभी प्रभुपाद जी ऐसा था कि उनकी भी बहुत इच्छा थी कि भगवान की सेवा करें, भगवान का गुणगान सारे विश्व भर में हो। और प्रभुपाद जी की इच्छा थी कि एक तरह से उनके बाकी सारे गुरुभाइयों से उनकी ज़्यादा इच्छा थी। प्रभुपाद जी के साथ कई गुरुभाइयों में से कुछ उनसे बड़े विद्वान थे, पर प्रभुपाद जी की ड्राइव (drive) जो थी ज़्यादा थी कि “हमें सारे विश्व भर में प्रचार करना है।”
पर फर्क यह था, प्रभुपाद जी ऐसे नहीं थे कि जब तक सारे विश्व भर में प्रचार नहीं हुआ तब तक प्रभुपाद जी उदास थे, हताश थे। जब प्रभुपाद जी पहले-पहल अमेरिका में गए थे और जब कोई भी उनको जानता नहीं था, रस्ते पर चलते थे, तब भी उनको जो भक्त उनसे मिले, पहले, बाद में वो भक्त मिले, जो हिप्पी (hippies) मिले… प्रभुपाद जी ऐसे संतुष्ट थे वो, शांत और संतुष्ट थे।
तो क्यों शांत और संतुष्ट थे? क्योंकि उनका सम्बन्ध परम सत्य भगवान से था। वो भगवान का गुणगान ज़रूर करना चाहते थे, चाहते थे कि सारे विश्व भर में मंदिर हो जाएं, और वो इच्छा ज़रूर थी, पर ऐसे नहीं था कि आसक्ति मतलब “उसके बिना मैं जी ही नहीं सकता।”