Voting in elections is the social responsibility of devotees (Hindi)
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Lecture Summary
भक्तों का संशय और दो विचार:
- पहला विचार (त्याग/ज्ञानमार्ग): यह भौतिक जगत क्षणिक और दुखों का कारण है, इसलिए इसमें बदलाव की कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। हमारा एकमात्र उद्देश्य भक्ति करके भगवदधाम लौटना है। प्रभुपाद जी के 1970 के दशक के कुछ वचनों का हवाला देकर लोग राजनीतिक बदलावों से उदासीन रहने की बात करते हैं।
- दूसरा विचार (युक्तवैराग्य): प्रभुपाद जी ने स्वयं विदेशों में भक्तों को राजनीतिक गतिविधियों और दलों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था। हालांकि धन की कमी के कारण वह दल सफल नहीं हुआ, लेकिन प्रभुपाद जी समाज की गिरती हुई स्थिति के प्रति कभी लापरवाह नहीं थे। लोकशाही (लोकतंत्र) या राजनीतिक माध्यमों का उपयोग यदि धर्म की स्थापना और प्रचार के अनुकूल किया जा सकता है, तो वह प्रतिकूल नहीं है। भौतिक चीजों या व्यवस्थाओं को भगवान की सेवा में जोड़ना ही ‘युक्तवैराग्य’ है।
भारत की स्थिति और सामाजिक जिम्मेदारी:
- भारत धर्मभूमि है और यहीं से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृष्ण भक्ति का प्रचार सबसे प्रभावी ढंग से हो सकता है। समाज में विभिन्न प्रकार के लोग हैं—कुछ भक्ति के अनुकूल हैं, कुछ उदासीन हैं, और कुछ धर्म के विपरीत हैं।
- यदि सरकार या राजनेता धर्म के प्रतिकूल हो जाएं, तो भक्ति और उसके अनुशीलन के लिए गंभीर कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए, समाज को धर्म के प्रतिकूल न होने देना और अनुकूल परिस्थितियाँ बनाए रखना भक्तों की सामाजिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी है।
धर्मनिरपेक्षता और सही राजनीतिक चुनाव:
- भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता का भाव प्राचीन वैदिक संस्कृति (जहाँ सभी को अपनी रुचि के अनुसार साधन करने की स्वतंत्रता थी) से मिलता-जुलता है। किंतु धर्मनिरपेक्षता के नाम पर नास्तिकता या धर्महीनता को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।
- भक्तों को चाहिए कि वे अपने मत (वोट) का प्रयोग ऐसी सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए करें जो धर्म के पालन और प्रचार के अनुकूल हों। जो राजनैतिक दल सत्त्वगुण या धार्मिक मूल्यों का समर्थन करते हैं, उनके पक्ष में मतदान कर भक्त अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
Full Transcriptions
इलेक्शन में वोटिंग करना: भक्तों की सामाजिक जिम्मेदारी
हरे कृष्णा! इलेक्शन में वोटिंग करना यह भक्तों की सामाजिक जिम्मेदारी है। इस विषय पर हम संक्षेप में आज चर्चा करेंगे। अभी इलेक्शन का माहौल चारों ओर है। इलेक्शन चालू भी हो गए, कई जगहों पर हो गए, कई जगहों पर बाकी हैं। तो कभी भक्तों में सवाल आता है क्या हमें इलेक्शन में वोट करना चाहिए? यदि वोट करना चाहिए, तो किसके लिए वोट करना चाहिए? हम शास्त्रों के आधार पर, कृष्णभावनामृत तत्वों के आधार पर, हम क्या फैसला कर सकते हैं, इसके बारे में।
भौतिक जगत और राजनीतिक परिवर्तन
तो इसके संदर्भ में एक विचार ऐसे हो सकता है कि यह सारा भौतिक जगत क्षणिक है और भौतिक जगत में जो भी बदलाव होते हैं, उन से वास्तव में कुछ बदलाव नहीं होता है। और एक ही सारी समस्याओं का हल है कि हमें भक्ति करके भगवदधाम लौट जाना है। इसलिए भौतिक समस्याओं के हल के लिए हमें कुछ भौतिक बदलाव में ज्यादा घुसने की जरूरत नहीं है और भौतिक बदलावों से ज्यादा कुछ अपेक्षा करने की भी जरूरत नहीं है।
और प्रभुपाद जी के भी ऐसे वचन हैं जो कोई बोल सकता है इसके लिए, इसकी पुष्टि करने के लिए, तो प्रभुपाद जी ने जब 1970 की शताब्दी की उस दस सालों में, उस दशक में जब कांग्रेस पावर से जा रही थी, दूसरा पक्ष पावर में आ रहा था, इत्यादि, तो तभी काफी ही लोगों में उम्मीदें बढ़ गई थीं कि अभी परिवर्तन हो जाएगा, अभी सब कुछ ठीक हो जाएगा। तो प्रभुपाद जी ने तभी लोगों से कहा एक चर्चा में, कि हमें राजनीतिक बदलाव से हल नहीं होने वाला है, हमें आध्यात्मिक बदलाव करना चाहिए, और उन्होंने कृष्णभावनामृत पर जोर दिया।
प्रभुपाद जी का दृष्टिकोण और राजनीतिक सहभागिता
तो ऐसे जो प्रभुपाद जी के वचन हैं, इनको दोहरा के कोई बोल सकता है कि इलेक्शन में हमें… दूसरे प्रकार के वचन भी हैं, प्रभुपाद जी ने स्वयं भक्तों को राजनीति में प्रवेश करने के लिए बताया, अमेरिका में, ऑस्ट्रेलिया में, और “इन गॉड वी ट्रस्ट” (In God We Trust), हम भगवान में विश्वास करते हैं, इस नाम का एक पक्ष भी उन्होंने भक्तों को करने को बोला, और भक्तों को, उन्हें काफी प्रोत्साहन दिया।
पर जब प्रभुपाद जी ने देखा कि जो आर्थिक दरिद्रता है उसके लिए, इलेक्शन में खड़े रहने के लिए, कैंपेन करने के लिए, जो काफी धनराशी लग रही है, तो प्रभुपाद जी ने कहा कि जो कृष्ण भक्ति के प्रचार की धनराशी है, वो इसके लिए हम इस्तेमाल नहीं करेंगे। आप यह दल चालू कर सकते हैं और मैं उत्साही हूं उसके बारे में, पर आप मुझसे, अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ से कोई मार्ग नहीं थे, तो इसलिए वो दल ज्यादा प्रभाव नहीं कर पाया।
पर हम देखते हैं कि प्रभुपाद जी, जो सामाजिक परिस्थिति थी, उसके बारे में, उसके बारे में इंडिफरेंट, उसके बारे में लापरवाह नहीं करते थे प्रभुपाद जी। प्रभुपाद जी अपने तात्पर्यों में भी लिखते हैं कि किस तरह से समाज अभी गलत दिशा में जा रहा है, समाज को सही दिशा में लाने के लिए क्या-क्या करना चाहिए। और प्रभुपाद जी जो आदर्श राजा है, वो कैसे धर्म रखता था, उसके बारे में बताया करते थे।
लोकतंत्र और युक्तवैराग्य का सिद्धांत
तो प्रभुपाद जी, या आजकल जो लोकशाही है, डेमोक्रेसी है, उसकी ज्यादा पुष्टि नहीं करते थे प्रभुपाद जी, पर ऐसे नहीं है कि उसका खंडन करते थे। प्रभुपाद जी उसमें भी सहभागी होने के लिए भक्तों को कहा था और उन्होंने कहा था कि अगर हम कृष्णभावना का प्रचार कर सकते हैं, धर्म की स्थापना कर सकते हैं, उसके लिए वे सतर्क थे। तो अगर लोकशाही के माध्यम से धार्मिक तत्वों को और बढ़ाया जा सकता है, फैलाया जा सकता है, तो फिर प्रभुपाद जी उसके प्रतिकूल नहीं थे।
तो हमें समझ तो यह एक विचारधारा है, यह भोग की विचारधारा है, कर्ममार्ग की विचारधारा है क्या? कि हम थोड़ा परिवर्तन कर लेंगे, भौतिक स्तर पर ठीक हो जाएगा। और दूसरा विचारधारा है, त्याग की विचारधारा है, ज्ञानमार्ग की विचारधारा है, कि यह भौतिक जगत केवल बंधन का ही कारण है, दुखों का कारण है, यहां पर कुछ भी नहीं करना है, हमें यहां सिर्फ निकल जाना है।
तो यह जो भक्ति का मार्ग है, वो भोग का भी नहीं है, त्याग का भी नहीं है। वो क्या है? कि हमें घुसना नहीं है, छोड़ना भी नहीं है, हमें जोड़ना है उसको। हमें भौतिक जगत में घुसकर उसके बंधन में नहीं फंसना है, ना कि हमको छोड़कर जंगल में जाके भक्ति करनी है। तो जो भौतिक चीजों को भगवान की सेवा में जोड़ना है, इस तत्व को ‘युक्तवैराग्य’ कहते हैं।
तो युक्तवैराग्य मतलब, जो भगवान की सेवा में इस्तेमाल किया जा सकता है, उसको त्यागना यह अनुचित है। उसको हमें भगवान की सेवा में लगाना चाहिए, तो इसको युक्तवैराग्य कहते हैं। तो युक्तवैराग्य के अनुसार ही हम तंत्रज्ञान का इस्तेमाल करते हैं, कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं। लोग जो संन्यासी हैं, वे भी कभी एरोप्लेन में प्रवास करते हैं, हवाई जहाज में जाते हैं, क्योंकि प्रचार करने के लिए वह अनुकूल है, तो उसका स्वीकार कर सकते हैं। प्रभुपाद जी ने प्रचार में ऐसे किया था।
भारत की स्थिति और भक्तों का कर्तव्य
तो क्या यह लोकशाही जो है, और उसमें इलेक्शन, चुनावों की प्रक्रिया है, इसको हम युक्तवैराग्य के पासे से कैसे देख सकते हैं? हम एक समाज में रह रहे हैं, और भारतीय समाज जो है, वह धर्म की आज की दुनिया में प्रधान भूमि है। प्राचीन काल से भारत को आर्यावर्त तक कहा जा रहा था, धर्मभूमि कहा जा रहा था। तो प्रभुपाद जी ने विश्वभर प्रचार किया, पर अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने प्रचार के द्वारा… मतलब इस्कॉन की स्थापना के बाद उन्होंने भारत में ही गुजारा। क्योंकि अगर हम प्रचार अच्छे से कर सकते हैं, तो फिर बाकी विषयों में दूसरे भक्त प्रचार कर सकते हैं, पर भारत में वे प्रचार करेंगे, तो भारत में अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ, कृष्ण भक्ति को और दृढ़ बना सकते हैं और यहां से धर्म का प्रचार सारे विश्वभर हो सकता है।
तो यहीं पर पहले से वैदिक संस्कृति है। यहां पर आज भी वैदिक संस्कृति कुछ मात्रा में जरूर है। पूजा करते हैं और भक्ति के मार्ग से हम भगवान के घर जाते हैं। तो कुछ लोग इस चक्र में आएंगे, इस गोल में आएंगे। इसके अलावा कुछ लोग हैं जो इतनी तीव्रता से भक्ति नहीं करते हैं, पर भक्ति के अनुकूल हैं वो और वो मंदिर में उत्सवों के लिए आते हैं, कुछ विशेष-विशेष ऑक्यूपेशन होते हैं, उनके लिए आते हैं और वो मंदिर और भक्ति की सराहना करते हैं, उसके अनुकूल हैं, पर वो खुद साधक के रूप में ही है वो। तो ऐसे लोग अगर समाज में होते हैं, तो उससे भक्ति का प्रचार करना आसान हो जाता है।
इसके परे है एक और बड़ा सर्कल है, गोल है, जिसमें लोग हैं जो धर्म के बारे में कुछ परवाह नहीं करते हैं, तुम्हें करना है तुम करो, हमें कुछ नहीं करना है, ऐसे हमें इसमें मत घुसो तुम। और इससे और है कि जो धर्म के विपरीत है और ऐसे लोग जो है अगर वो समाज में प्रभावशाली बन जाते हैं, वो अगर नेता बन जाते हैं, तो धर्म का प्रचार करना बड़ा मुश्किल हो जाएगा, कि भक्ति छोड़ दो आप। तो अगर सरकार जो है, भक्ति के प्रतिकूल है, तो फिर वो उससे काफी खराब परिणाम हो सकता है, भक्ति के, न केवल भक्ति के प्रचार के लिए, पर भक्ति के अनुशीलन के लिए भी, स्वयं को भक्ति करनी है, उसमें भी आप प्रतिकूल हो सकता है वो परिस्थिति।
तो इसीलिए वैसी परिस्थिति न आने देना, यहां भी भक्तों की जिम्मेदारी है, भक्तों की एक जिम्मेदारी है, आध्यात्मिक जिम्मेदारी है कि खुद भक्ति करना और भक्ति का प्रचार करना। पर हम एक समाज में रह रहे हैं और समाज को भक्ति के प्रतिकूल न होने देना, जहाँ तक हम कर सकते हैं, उसके लिए प्रयास करना, यहाँ एक सामाजिक जिम्मेदारी है। अगर हम इसमें कुछ कर सकते हैं, तो हमें जरूर करना चाहिए।
धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक विकल्प
तो अगर हम भारत की आज की राजनैतिक परिस्थिति देखते हैं, तो फिर भारत में संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्षता है। तो धर्मनिरपेक्षता का भाव जो है, वैदिक संस्कृति में भी था। क्योंकि वैदिक संस्कृति में क्या था कि अलग-अलग मार्ग थे, कर्ममार्ग था, ज्ञानमार्ग था, भक्तिमार्ग था और सब प्रकार के साधकों को अपनी-अपनी समझ के अनुसार, अपनी जो करना है, साधन करनी है, उसको करने का मौका दिया जाता था, उसके लिए कोई जोर-जबल नहीं की जाती थी।
तो एक तरह से देखा जाए तो प्राचीन वैदिक संस्कृति थी, वो और धर्मनिरपेक्षता जो आज है, उसमें एक प्रकार की समानता है। क्या है? धर्मनिरपेक्षता का अगर हम कहते हैं, उसका अर्थ कि सबको अपने-अपने, जिसको भी जो धर्म का पालन करना, जिसको भी साधना करनी, उसको करने का उसको मौका देना चाहिए। तो वो भाव वैदिक संस्कृति में भी था, एक तरह से, क्योंकि अलग-अलग लोग…
पर धर्महीनता की तरफ चली जाती है, धर्महीनता मतलब नास्तिकवाद। या तो जो नास्तिकवाद, जैसे मैं पढ़ रहा था, सोवियत रशिया में था, वहाँ पे सेक्युलरिज्म और एथीज्म, कि धर्मनिरपेक्षता से, अगर नास्तिकता जाना है, तो ज्यादा अंतर नहीं है वो। और कई समाजों में इस तरह से हो जाता है। तो वैसे, अगर भारत में हो जाता है, कि जो धर्म का पालन करना चाहते हैं, उनका खंडन किया जाता है, उनको परेशानी की जाती है, तो फिर धर्म का पालन करना, धर्म का प्रचार करना… ऐसी परिस्थिति आएगी और आने की संभावना काफी है, आजकल के समाज के प्रभाव को देखकर।
तो फिर धर्मभूमि है, वहाँ पर ही धर्म की ग्लानी बहुत हो जाएगी, वह बहुत ही दुर्भाग्य की बात हो जाएगी, और इसको टालना हम सबका कर्तव्य है। तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्महीनता या नास्तिकता नहीं होने दी जाएगी। तो अगर कोई राजनैतिक दल ऐसे हैं, जो नास्तिकता की ओर जाते हैं, या धर्म के विरुद्ध जाते हैं, तो उनका विरोध करना, यह भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है।
निष्कर्ष और सही निर्णय
तो अभी दूसरी प्रकार, एक संकीर्णता है कि धर्म को पालन न करने देना, या धर्मनिरपेक्षता… तो क्या है? हम एक ही धर्म करेंगे, दूसरा कोई धर्म नहीं करेंगे। तो ऐसा संकीर्णवाद है, उसका आजकल के समाचार पत्रों में, टीवी पे, उसका बहुत खंडन होता है। और यह भी है कि हम… हमारा ही धर्म सही है, दूसरा साथ धर्म गलत है, कोई और दूसरे धर्म को पालन नहीं करना चाहिए, हम उनको पालन नहीं करने देंगे, हम उनको भारत में रहने नहीं देंगे, ऐसा कोई बोलता है, तो यह भी वैदिक संस्कृति का भाव नहीं है। तो गलत तरह से बतलाया जाता है कि जो लोग केवल धर्म का संरक्षित करना चाहते हैं, उनको ऐसे बताया जाता है कि ये दूसरे धर्मों का नाश करना चाहते हैं, तो ऐसा सत्य नहीं है।
तो हमें भक्तों के रूप में देखना चाहिए कि क्या मैं धर्म के पालन और धर्म के प्रचार के लिए अनुकूल कोई परिस्थिति लाने में मदद कर सकता हूँ? तो मैं जो वोट करूँगा उससे क्या कर रहा हूँ मैं? कि समाज में किस प्रकार का वातावरण होता है, उसमें उसको फैसला करने में, मैं अपनी जिम्मेदारी अच्छे से… हमारे धर्म के पालन प्रचार के अनुकूल परिस्थिति रखने के लिए, हम एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में हम वोटिंग कर सकते हैं।
और ऐसे करते समय हम यह विचार कर सकते हैं कि कौन सा धार्मिक पक्ष है, कौन सा पक्ष… और उनको हम… हमारी भक्ति करना चाहते हैं तो भक्ति के अनुकूल जो है हम चाहते हैं, भक्ति शुद्ध सत्त्व में होती है, सत्त्वगुण जो होता है, सत्त्वगुण में भी अगर कोई राजनैतिक दल है, वो ऐसे मूल्यों का अनुशीलन करते हैं, उनका प्रस्थापन करना चाहते हैं, जो सत्त्वगुण में हैं, तो वो भी भक्ति के लिए अनुकूल है। तो उसके अनुसार हम हमारा मत दे सकते हैं और इस तरह से हमारी सामाजिक जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
धन्यवाद, हरे कृष्ण।