What exactly is the holy name – does its potency lie in the words or the meaning or somewhere else?
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संक्षिप्त सारांश
पभुईता का श्ट्रेथा अध्या जो है वह ध्यान योग कहलाता है और इसमें जो आखरी भाव है सत्स्वेशलोग से पैठार सेशलोग तक वहाँ पे अर्जुन जो योगी योग गरश्ट हो जाते हैं उनके प्रति के बारे में वर्णन करते हैं और वहाँ पे जब वर्णन करते हैं तो उसमें 44 और 45 स्लोग में बताते हैं तो किस तरह से योगी पहले अगर उसने आध्यात्म के अनुशीलन किया है तो उसके बाद में जब योगी पढ़नर्श्ट हो जाता है अगले जनन में पुना वक्ति पाप्त करता है या पुना आध्यात्म पाप्त करता है पुर्वाभ्यासेन तेनईवर्यते यवशोपिसः जिक्यासुरपियोगस्य चब्द।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
पभुईता का श्ट्रेथा अध्या जो है वह ध्यान योग कहलाता है और इसमें जो आखरी भाव है सत्स्वेशलोग से पैठार सेशलोग तक वहाँ पे अर्जुन जो योगी योग गरश्ट हो जाते हैं उनके प्रति के बारे में वर्णन करते हैं और वहाँ पे जब वर्णन करते हैं तो उसमें 44 और 45 स्लोग में बताते हैं तो किस तरह से योगी पहले अगर उसने आध्यात्म के अनुशीलन किया है तो उसके बाद में जब योगी पढ़नर्श्ट हो जाता है अगले जनन में पुना वक्ति पाप्त करता है या पुना आध्यात्म पाप्त करता है पुर्वाभ्यासेन तेनईवर्यते यवशोपिसः जिक्यासुरपियोगस्य चब्द ब्रह्माति वर्तते अत्ततं बुद्धिसं योगं लभते पुर्वदेहिकं यत तेजितो भूया संसिद्धा कुरुदन्दना प्रयत्ना यत मानस्तु योगी संशुद्ध किल्विश अनिक जन्म संसिद्धस तो यहावति भराम्गतिम् इति इश्वो को भगवान बता रहे हैं कि किस तरह से जोगी है पुर्वाभ्यासेन में यो उसने रियत्ति जो प्राप्त किया है अर्जुत किया है तो रियत्ति यवशोपिसः वह तुरंद एक अवश्षक जबर्दस्तियों से होता है उस तरह से वो आध्यात्मिक पूरा आकर्षिन लाता है तो मेरा क्लास का विशय ये होगा कि हम जो आध्यात्मिक संपत्ती या आध्यात्मिक उन्द्रिती कहते हैं वास्तव में ये क्या होती है प्रभुपा जी बताया करता है कि नेहां वेक्रमणा आश्वस के पत्य वायोना उद्देती तो दुसरे अध्याय के 40-60 लोके वाले मुलते हैं कि जो हम आध्यात्मिक फुंजी प्राप्त करते हैं वो हमें जो हमारे साथ रहती है वो कभी जाती नहीं है तो यह जाती नहीं है वो वास्तद में क्या है कभी हम देख सकते है कि जो वरिश्य भक्तों का लिए पतन हो सकता है कभी कभी हमारे चेतना भी उपर जाती है बहुत नीची आ जाती है तो वास्तद में जो आध्यात्मिक उन्नति हम करते हैं आध्यात्मिक पुंजी जो प्राप्त करते हैं वो क्या है और वो किस तरह से हमेशा स्थाही रहती है इसके बारे में हम यहाँ पर थोड़ा समझने का प्रयास करेंगे तो यहाँ पर भगवान बता रहे है कि पुर्व अभ्यास पुर्व पहले जो अभ्यास ने हमें अनुशीलन किया है उसके कारण क्या होता है रियते या अविशो पिसः रियते या अविशो पिसः अविशे मतलब असहिय भाव से यह अविशे शब्द भगवानीता में दूसरी जगपे पर इस्तिमाल किया गया है जब जीवात्मा भौतिक प्रकृति के प्रभाव में अविश रूप से इदा उदर किसे जाता है कि जो अविश मतलब एक तरह से helpless तो नौमली जब अविश कोई होता है मतलब अगर कोई व्यक्ति को बांधा गया है और वो बांध के उसको किचा जा रहा है तो अभी क्योंंकि हाथ पैर बांधे हुए है तो तो कुछ नहीं कर सकती जहां किचा जाएगा वहीं पे जहां किचा जा रहा है उसको वो उसी दिशा में जबर्दिस चला जाएगा तो जब हम अविश कहते हैं तो अगर उसके हाथ अगर छूटे हो गए तो शायद वो कहीं कहंबे को पकड लेगा और जो कीच रहा है उसको वो उसका प्रतिकार करने का प्रयास करेंगा तो अवश मतलब लगबग ऐसे है कि यह प्रतिकार नहीं कर सकते हैं ऐसी भाव बता गया है साधारन्ता यह परिस्थति होती है कि भोतिक जगत में जब हम अमारे वास्नाों के कभजे में आ जाते हैं तो आवश रूप से हम किच जाते हैं अथकेन प्रयुक्तोयं पापं चेरति पूरुशहां अनिच्छन पे वार्षनेय बलाद इवनियोजितः यहां पे अवश इस्तमाल नहीं कर रहा है भगवान आर्जुन सब्द तो एक तरह से देखा जाये तो कुछ भी हमारे इच्छा के बिना नहीं होता है जब आर्जुन बता रहा है कि अनिच्छन यह नहीं आवश रूप से होता है यह आर्जुना से सब्दिक्टिव परसेप्शन है तभी मतलब कैसे होता है कि जब हम कुछ कारे कर लेते हैं मालि जब हम गुस्सा आजाता है और हम किसे को बुला बुला बोल लेते हैं और फिर उसके पहले हमने बड़ा निश्चे किया था कि मैं गुस्से के वश्च में नहीं जाओंगा मैं लोगों को कुछ बोलूगा नहीं और उसके बाद में भी हमने जाओंगा ऐसे नहीं करना चाहिए तो वास्तो में स्थाई दुश्चने देखेंगे तो हमारी इच्छा वैसे कुछ करने की नहीं थी पर उस समय हमने वो कर दिया तो उस समय जब हम कर लेते हैं तभी तो हमारी इच्छा होती है पर स्थाई रूप से वो इच्छा नहीं होती है अलिए चन्न पिवार्षनेय बलार तो यह बल रूप जो हम किच जाते हैं बहुत साधार अंत है हम मोवभौतिक क्रकृति के वारे में इस्थमाल करते हैं प्रकृते क्रियमाणानी बुणई कर्माणी सर्वश्ट अहंकार मूरात्मा करता हम यड़े यहाँ पर जबर्दस्थी से मान लिए प्रकृति हमको कीच रही है तो वही शब्द जो है और वही भाव है कि कोई अवश्व रूप से बावतिक प्रकृति के बावतिक प्रकृति के जिज्ञासुर पियोगस शब्द ब्रह्म अतिवर्तते शब्द ब्रह्म अतिवर्तते जिज्ञासुर पियोगस शब्द ब्रह्म अतिवर्तते एवं प्रसंद मनसो भगवाइत भक्ति योगता प्रसंद मनसो भगवाइत भगवाइत भगवाइत भगवाइत भगवाइत भगवाइ तो वो कहते हैं इसलिए जो कवी है जो बुद्धिमान लोग हैं वो शाश्वत काल से आनन्से अत्वाई कवाइतिम भक्तिम परमया मुदा बुदा मतलब वो आनन्से भक्ति कर रहे हैं वो आनन्से भक्ति करते हैं किसकी पति वासुदेव भगवति और बताते हैं ऐसे करने से क्रुवन्ते आत्म प्रसाध है जो सुखी बना देती है तो यहां पे वो कहते हैं वो आनन्से भक्ति करते हैं जो आनन्स प्रदान करती हैं तो इसमें मतलब क्या चल रहा है?
तो हमें आनन्से भक्ति करने हैं या भक्ति करने के बाद आनंद प्राप्थ होने वाला हैं? तो रभवाजी कहा था तो चांट हरे कृष्णा और बी हैपी तो चांट हरे कृष्णा और बी हैपी यह एक आनन्स प्रदान है और हमें आनन्स प्रदान करते हैं? कि आप जब करो और जब करने से सुखी हो जाओगे या जब करो और सुखी रहो?
यह एक है या दो है? वास्तव में यह दोनों है दोनों है मतलब क्या? कि ऐसे नहीं है कि हम जब कर रहे थो सारे समस्या चल जाएगे अपने आप सुखी हो जाएगे वैसे नहीं है हम जब भक्ति करेंगे तो इस बहुत समस्या रहती है पर क्या है भक्ति यह भावरोक के लिए दवाई है और कोई रुगन बड़ा बिमार है और तभी जब वो बिमार होता है तो अभी बहुत समय तक ऐसी बिमारी है कि वो कौन सी बिमारी पता ही नहीं चला है बिमारी पता नहीं चलती है तो फिर उसके दवाई भी कैसा जाने का पता नहीं चलता है तो तभी तो बहुत ही दुइडा के मस्या होती है क्योंंकि मैं दुखी हूँ क्योंं दुखवा है वो भी पता नहीं मुझे मुझे 8-10 साल पहले टीपी हुआ था तो एक साल के लिए ट्रिट्मेट ना पड़ता था अगर वो पता नहीं चलता था क्या हुआ था तो एक डॉक्टर के बाद जाये दूसरे डॉक्टर के बाद जाये तुसरे डॉक्टर के बाद जाये लगबर 6 में एक ट्रिट्मेट लिया फिर बाद में एक बड़े डॉक्टर के बाद गया था तो डॉक्टर ने बहुत से टेस्ट किये और बाद में वो जो रिपोर्ट लिखा तो मैं ये रिपोर्ट पढ़ रहा था तो उसमें लिखा था ड्यागनोसिस पी यू एइ पी यू ओ अच्छा ये कौन साथ बिमारी है वो पता ही नहीं चला अगर तो पी यू ओ मैं पी यू ओ मतलब पाइरोक्षिया of unknown origin पाइरोक्षिया मतलब वो टेंपरिचर बढ़ रहा है और टेंपरिचर क्योंं बढ़ रहा है हमको पता नहीं लगा तो कई बार आजकल के जमाने में ignorance is concealed under terms that seem knowledgeable तो जो अग्जान को जो छुपा देते हैं लोग ऐसे शैसी जब्दों का इस्तवाल करते हैं जिससे कि बहुत बड़ा ज्यान है ऐसे लगता है पर मैं कहरा हूँ यहाँ पर कि अगर किसी को बहुत दिमारी है और कौन सी दिमारी है पता नहीं चल रहा है और बहुत से डॉक्टरों के बाद जाने के बाद तो बाद में डॉक्टरों के बाद गया और जब वहाँ ने बता है कि आपको TV हो रहा है और बहुत advanced TV है तो वास्तव में तो खुश हो गया तो भी और डॉक्टरों के बाद खुश क्योंं हो गया तो भी बहुत serious दिमारी है पर हाँ serious दिमारी भी पता है पर अभी पता चल गया है कौन सी दिमारी है अगर दिमारी पता चल गया तो तो दवाई चाल हो जाती है तो यह क्या है दवाई का असर होने के बाद स्वास्ते अच्छा हो जाएगा तो भी वास्तव में व्यक्ति सुखी हो जाएगा पर कम से कम कौन सी दवाई लेने वो पता चल गया वो भी एक सुक का कारण है अगर पहले पता ही नहीं था तो दवाई पता चल गया वो भी सुक का कारण है तो उसी तरह से जब हम इस भोती जिगत में हम अलग-अलग पकास से पीडाओं का अनुभव करते हैं और ये पीडाओं से बाहर कैसे निकरने का वो ही पता नहीं है पर जब हम भगवान के चर्ण कमल में आ जाते हैं भकती कर लगते हैं तो हमको बिमारी क्या है दवाई क्या है यह सही रूप से पता चल गया है तो यह भी एक आनंद का सुकारण है अगर इसमें ही अतवई का भकतिं परमयाम हो जा तो आनंद से भकति करो भले यह भी आनं अगर हम यह संतुष्ट नहीं हैं सुखी नहीं है तो हम क्या थोड़ी घुना से या नकारात्म भाव से भकति करते हैं तो हमारे चेतना का संपर्क भगवान से नहीं होता है और चेतना का संपर्क जो भगवान से नहीं होता है तो फिर हमारा शुद्धी करण नहीं होता है जो अवचेत स्थर परिवर्तन होता है और परिवर्तन नहीं होता है तो प्रगती नहीं होती है इसलिए अभी जब हम समझ जाते हैं कि भकती जीवन में और खास करें भकती जीवन में जो प्रगती है वो अनितरंद है और वो प्रगती के लिए बहुत ही अनुकूल मार्क हमें मिल गया है इसलिए यह अनुकूल मार्क को सुखार करके उत्सहासे मैं भकती करूँगा यह भाव जब हम रखते हैं तो फिर उससे हम अभी भी सुखी रहेगे तो कभी कभी मन परिशान करेगा कभी कभी समस्या आयेगी तो कभी हम अतास हो जाते हैं पर नहीं मैं सत मार्क में हूँ अच्छे मार्क में हूँ सही मार्क में हूँ यह विचार करके हम सुखी हो सकते और तभी हम देख सकते है चान्ट हरे कृष्णा हैं बी हैपी यहां दो इंस्ट्रक्शन्स हैं यह दोलूरों को पाला करना हैं मैं जब करूँगा मैं भक्ति करूँगा और साथ साथ मैं सुखी रहूंगा जितना सुखी रहता हूँ और इस तरह से जब भक्ति करते रहेग तो इससे हम देखा कि जो भगवान कहता है यह अवश्यर रूप से जो योगी ब्रह्ष्ट हो गया है वो अगले जन्म में अवश्य पद्धती से भगवान के ओर आध्यात्म के ओर आकरशे जाता है तो अवश्य मतलब क्या है कि हम अवश्य कह सकते है कोई वक्ति रसी से जबरदसि किचा जा रहा है एसे हमारे वासना है कभी हमको जबरदसी किच लेती है तो अवश्य का मतलब यहां पे क्या है कि जो अवचेतन स्थर पे जो आकरशन होता है उसको भगवान अवश्य कहते है तो हम संदर में हमने देखा है कि मानों और जानों में प्राणियों में फ़रक क्या है तो क्रिश्ण अधारा में है कि आन मानों में अलग आत्मा है और जानों में अलग आत्मा है और जो भोतिकवादी विज्ञान कहता है कि वास्तों में आत्मा है ही भी तो आमानों जानों कुछ फ़रक है ही नहीं सब एक ही है पर जो फ़रक क्या है फ़रक वास्तों में यहाँ है कि आत्मा एक ही प्रकार का है पर आत्मा की चेतना जो है वह अधिक विक्सित है मानों में और यह आत्मा की चेतना का विकास मतलब क्या कि जो आत्मा ग्यान स्वरूप जो है जो सच्चितान आत्मा है वह तो स्वाभाविक ही है पर जो ग्यान रूप है चेतना कितनी विस्तारित हुई है चेतना कितने विशेयों के बारे में कितने गूर स्थर पर चिंतन कर सकती है से टौर्च है उसकी रोष्टी कितने दूर जा रही है उस तरह से तो वो जितनी उद्धी हुई है उतना वो आत्मा की चेतना बड़ी है तो हम देखा है मानव और जानवरों में फरक क्या है कि सेल्फ अवेरनेस की हमारे विचारों के बारे में विचार करने की शम्ता जो है यह मानवों में एक विशेयों मुझसे हैं और विचारों के बारे में विचार करके हम हमारे विचारों की धारा को परिवर्तित कर सकते हैं तो जब हम भक्ति करते हैं तो साधारनता है हम चेतन स्थर पे हम चुनाओं करते हैं कि मैं माया के पास नहीं जाओंगा मैं कृष्णी के पास जाओंगा और यह मतलब पूर्ण है ऐसे हमें करना चाहिए ऐसे जब हम करते रहते हैं तो एक अवचेतन स्थर पे भी हम धीरे धीरे कृष्ण को चुनने लगें हम अवचेतन स्थर पे जो चुनते हैं हम कई बार चुनते हैं पर हमकों समझ भी आता हैं हम चुन रहे हैं जैसे लोग बहुत एक ग्यानी परी बताया है कि लगबाग 200 से अधिक अन्य के वाले खाने के वाले लोग चुनाव करते हैं उनको लगता हैं 10-15 आई चुनाव कर रहा हैं और जब हम जो हमारी सुख की परिभाषा है वो अवचेतन स्थर पे जो परिभाषा है उसके अनुसार हम चुनाव कर लेते हैं तो खाने की चीज़ होगी जो मैं सोचता हूँ कि मैं सेहत के लिए अच्छा है खाओंगा ऐसे दोस्ता हूँ पर जब मैं सक्रिय नहीं हूँ स पर जब मैं सक्रिय नहीं हूँ पर जब मैं सक् यहाँ यहाँ अवचीतन स्थर्पे फ़र्ग शाश्वत रूप से यहाँ कहा होता है तो सुख्षन शरीब में होता है मैं गजेद्रा का देखा गजेद्रा ऐसे नहीं था पूरा शरीब बदल गया था और परिस्थिति बदल गयी थी क्योंंकि इंद्रतुक्ति में लग गय थे तो बहार से रूप से इंद्रतुक्ति का संसकार था पर जब विशम परिस्थिति आ गई तभी वो जो भगवान के परी आकरशन था और भगवान के परी आकरशन के नियों में जो घ्यान था वहाँ सब पुना जागज हो गया और जिवा इसके आधारत उन्हें प्रातनाया करते हैं तो हम जब भक्ति कर रहे हैं तो यह अवचेतन स्थर पे भगवान को चुनना और भगवान को आकरशन होना इसके लिए हमें बहुत अपरतीर मौका है प्रमचारी आश्रम में हम सब हमेशा प्रगती करना जाते हैं तो अगर हम भोतिक परिभाषा प्रगती के लेकर आते हैं तो हम भोतिक प्रमचारी आश्रम में क्या प्रगती कर रहा हैं कुछ करी नहीं रहा हैं मैं वही चीज़े करते रहा हूं करते रहा हूं तो हमें क्या देखना है कि असली प्रगती जो है कि मैं जितना भगवान का चुनाव ध्यान पूरो करता हूं उतना चुनाव किये भिना भी भगवान का चुनाव हो जाएगा और वही असली प्रगती है और ऐसी प्रगती हम करेंगे तो धीरे धीरे सत्वगुण में आकर हम प्रसन हो जाएगे और जब तक हम सत्वगुण में आकर शुद्ध सत्वगुण में आकर प्रसन नहीं हो रहे तब तक यह समझ कर की वही मेरी बिमारी थी अभी बिमारी की कम से दवाई तो पढ़ा चल गयी हूँ जो इसलिए मैं सन्तुष्ट हूँ और ये मैं दवाई अन प्रसन हो जाएगे तो बहुत बहुत धन्यवाद इसके सवाल है कुछ तो जब हम आध्यात्मिक जगत में जाते हैं तो क्या हम हमारा सुक्ष्म शरीर वो अध्यात्मिक जगत में जाते हैं और उसको हम त्याग करते हैं जहां तक बता गया है कि जो आत्मा मुक्त हो के जाता है तो जो ब्रह्मान्ड के आवरण है अलग-अलग जो भौतिक तत्त्व है उन सब का आवरण है और जो आत्मा का शरीर है उसके आवरण है तभी तभी वो त्याग करते रहता है वो त्याग करते रहता है मतलब क्या कि उससे जो खुद की पहचान थी वो पहचान त्याग हो जाती है अभी क्योंंकि जो सुक्ष्म शरीर है वो भौतिक ही है तो सुक्ष्म शरीर भौतिक होने के कारण उसको भी हम त्याग करते हैं और आध्यात्मी जगत में हमको जो हमारा स्वरूप के अनुसार जो है वो प्राप्त होता है जो स्वरूप के अनुसार जो बोलते है भावतिक की तीसर स्वरूप में उसका वरना आता है तो वो हम जीवन मुक्ति के वारे में वरना नहीं है वो विदेह मुक्ति के वारे में वरना नहीं है विदेह मुक्ति मतलब जब हम देह त्याग करके आध्यात्मी जगत जा रहे जो सुक्ष्म शरील को आध्यात्मी बनाना है वो जीवन मुक्ति का लक्षी है तो विदेह मुक्ति में हम जो सुक्ष्म शरील और सुक्ष्म शरील दोनों को त्याग के भगवत धान जाते हैं विदेह मुक्ति मतलब जब हम देह त्याग करके आध्यात्मी जगत जा रहे जो सुक्ष्म शरील को आध्यात्मी दोनों को त्याग करके आध्यात्मी दोनों को त्याग कर क्योंंकि अध्यात्मी दोनों को त्याग करके आध्यात्मी दोनों को त्याग करके आध क्योंंकि अध्यात्मी दोनों को त्याग करके आध्यात्मी दोनों को त्याग करके आध अध्यात्मी दोनों को त्याग करके आध्यात्मी थिर मतलब मेरे तम बहुत पतले हो और स्लूरी मतलब आकरशक है तो वैसे जो अतिष्वव व्यक्ति है वास्तों में वह सकारात्मक है, वह एक श्रंगार है एक्जाजिरेशन मतलब जो इंग्लीष में आता है वो नकारात्मक हो जाता है तो इसलिए यहांपे कई बार जो कवी होते हैं, सबसे पहले शास्त्र जो है, उसमें कई चीज़े काव्यात्मक है और बगविता में हम देखते है अविनाशित तद्विद्धी भगवान करते है, आत्मा का नाश नहीं होता है, 2.72, इस व्यक्ति के 17 विश्वों में बताया है और उसकी बाद में 16 व्यक्ति के 21 विश्वों में बताया है काम त्रिविद्धं नरकस्येगं द्वारं नाशने मा आत्मन हाँ, आत्मा का नाश करते हैं काम क्रोद लोग ये आत्मा का नाश कर रहे हैं, तब ये आत्मा का नाश तो कोई नहीं कर सकता है, तो यह जो है यह दिवहारिक नहीं है, यह काव्यात्मक है, कि आत्मा का नाश करता है आत्मा के आध्याति चितना का नाश है तो मतलब हमें देखना यह है कि शास्त्र का एक सिधानत है और शास्त्र में जो भी चीज बताए गई है वो चीजे उस सिधानत के सिधान के अनुकूल हमें उसका अर्था लिना है तो उसके अभिपरित अगर होगा, तो यहाँ तक हमारे आचारे बताते हैं कि अगर कृष्ण भी सिधान के अभिपरित बोलेगे तो हम कृष्ण के वच्ण भी सुखार नहीं करेंगे और इसका उधारन क्या है, गोवर्धन लीला में कृष्ण कर्ममवाम से कवरण करते हैं कृष्ण कहते हैं कि अरे तुमको देवता के पूजा करने के जूरत क्या है, तुम कर्म करो, इंद्र को पाने लेना ही पड़ेगा तो यहाँ पे आचारे गन बता रहे हैं, संदर्प से भी हमें स्पश्चर होता है कि यहाँ पे कृष्ण कोई आध्यात्मिक गुरू के रूप में आध्यात्मिक ग्यान नहीं दे रहे है वो एक लीला है, लीला में वो इंद्र को उकसाने के लिए कुछ कारी कर रहे है हमें जो भी शास्त्र बता रहे हैं, वो शास्त्र की सिद्धान के लाइट में, के दुश्टिकों से देखना हैं हम तो अभी कुछ चीज़े हैं, जो शास्त्र की सिद्धान, कुछ लोग ऐसे कावयात्मक विश्लेशन करेगे, इंटरप्रेटेशन है विश्लेशन, नहीं, इंटरप्रेटेशन है कुछ एसा मतलब निकालेगे, जो कावयात बोलेगे कि वह शास्त्र की सिद्धान के विप्पिर्फ हो जाता है एसे की अभी कोई कहता है कि आज तो मैं कोई कुरुशीत्र का जुद्ध हुआ है नहीं, तो अभी ये तो महाभारत में उसका पूरा महाभारत का क्लाइमाक्स ही है वो, कितना तो अगर वो कालपणिक अगर हम बोलते हैं, या कालपणिक या कावयात्मक कुछ मेटाफारिक कले बोल दिया, तो तो कितना महाभारत, अब पूरा महाभारत मेटाफारिकल बोलना पड़ेगा, तो ऐसा तो कुई आच्छा नहीं पता, तो ये क्या हो रहा है, सारे सिद्धान के विपरित हो गया है, तो अगर कोई सिद्धान के विपरित है, तो उसको उस परकार के काव कावयात्मक अर्था नहीं निकालेगे, तो वो सिद्धान के विपरित हो जाएगा, जैसे कैमें बता है कि आत्मा का विनाश होता है, तो हमें कावयात्मक लेना पड़ेगा उसको, तो अभी कुछ-कुछ चीज़े ऐसे हो सकती है, जो जिसके हम कावयात्मक अर्था ले सकत है या व्यावाहरी करत ले सकते हैं, और उसका सिद्धान पे कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है, तो बानलेव चित्रकेतु के इतनी सारी पत्नी आते हैं, तो अभी यह कोई वक्तर जाएगे, नहीं, यह everything is possible for Krishna, don’t आप भोतिक तरक-वितरक मां लगाओ, भगवान कृष् और यहाँ पे चित्रकेतु कोई महान भक्त भी नहीं है, चित्रकेतु कोई महान योगी भी नहीं है, और उस समय उनके पास कोई दिव्यशक्तिया भी नहीं है, अच्छे बताया गया है कि, अगर हम कहानी के एक तरह से देखेंगे तो, मतलब चित्रकेतु में उस समय इतनी शक्ति भी नहीं है कि एक संतान उत्पन्न कर सके तो, ऐसी परिस्तिती में, ऐसा लगाना कि चित्रकेतु के पास कोई अच्छे नित्य शक्ति से, जिससे कि वो दस लाग पत्मियों के साथ रह सकता था वहां, उसके संदर्म में नहीं ज़रूरी है, और नहीं consistent है, नहीं उसके साथ जुड़ता है तो और उपर से, अगर उस कहानी का मरम क्या है, कि आपको भोतिक सुख्य, कितनी भी योजनाय, कितनी भी आपके पास सुभिधाय हो, फिर भी आप सुखी नहीं होगे, इतनी सारी पत्मिया अधि, फिर भी एक पुत्र प्राप्त नहीं होगे, फिर भी बाद, बाद में प कहाणी के सार पे कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है, कहाणी के सिद्धान पे कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है, कोई बखते है कि यह भागवतम सार अचिंत है, उसमें यह हो सकता है, और उनके वो शद्धा है, उनके शद्धा रख सकते है, पर इसको हमें एक faith issue नहीं बना च इसमें तुम्हें शद्धा नहीं है, तुम्हें शद्धा नहीं है, ऐसे नहीं है, क्योंंकि एक और चीज़ वहाँ पे बताया गया है कि जब उचित्रकेतु को पुत्र हुआ हर्चशोक, उसके बाद में वो उसके बाकी पत्मियों के बाद को लक्षे करने लगा हो और उसक साल में भी एक बार मिल नहीं सकते थे, तो किट्टा लक्षे ले सकते थे, तो यहाँ पर जो है, यह कोई कहता है काव्यात्मक है, तो वास्तव में उसने कोई नहीं हानी नहीं है, इसको हमें विल्कुल ज़रूरी नहीं है कि इसको कुछ लिटरली लेना ज़रूरी है, तो प्रहुपा जी को एक बार पुछा गया था किसी ने कि कोई शिष्य ने पुछा कि हम जब जो बड़े-बड़े, हम जब स्कॉलर्स, पंडितों से बात करते हैं, उनको अगर हम बताते हैं भागवतम में कि भागवतम में बताया है कि जो महाराजु की सेंद थे, उनके करोडो-करोडो बॉड़ी गार थे तो कहते हैं कैसे संभव है ये, कहां रह रहे थे वो, कहां उनका टॉयलेट था, कहां उनका घर था, वहां पे आसनी लगते हैं तो प्रभुपाजी दे तभी क्या बोला, आपको भागवतम के हजारो शलोक है, उसमें से पंडितों से बात करने के लिए वो ही शलोक मुला क्या तो हमें हमेशा शास्त्र का सिंधान्त क्या है, उस पर जोर देना है और सुद्धान्त की दुरिश्टी से हमें सब कुछ देखना है, तो भागवतम के पहले सकल में भी आता है कि जब वो आयती कौन सब, डस्वा अध्या है, डस्वा या ग्यारावय अध्या जो है, उसमें भगवान कृष्ण द्वारका क्योंं जा रहे है, नापूर से, और त शहर से गए, शहर से गए, शहर से गए, और तभी तात्वारी भगवान लिखते है कि कुछ वाइज्ञानिक है, वहाँ भगवान ने कौन सा मार्ग लिया है, वहां बिल्कुल उसका जाज करके उसका विश्विशन करने का प्रयास कर सकते, कर रहे है, तो प्रोज यहते है क हम सेतन्तुष्ट हैं कि कृष्णा दुआरका पर जाएँ और ने पास्टायन के लिए ज़ोगी कर रहे है हम सेतन्तुष्ट हैं कि अभि भगवान कृष्णे दुारका आ गये और वहाँ भगतु बुला करने वाले हैं तो इसलिए शास्त्रों का जो संदेश है, उसका एक महतुपूर्ण साहर है और उसका सिध्धानत है, उसका साहर है, उसपे ही हमें जोर देना चाहिए और बाकी सारे चीजों को किस तरह से समझना है दो चीज़ है उसमें, सिध्धान के विपरित से नहीं समझन निकालनी है दूसरा है कि ऐसे चीजों पर जोर नहीं देना चाहिए जिससे कि लोगों का सिध्धान से वन निकल के कहीं और चले जाए तो सिध्धान पे जहां तक मन रहेगा, उतना वो प्रगती करेगे, उतना वो आकलित होगे भगवाण की और उतना वो अगरसर होगे बक्ति में और दूसरा सवाल था कि जो अलग-अलग संपुर्दायों में कुछ फरक होते हैं और खास कर कहते है कि कुछ पुरानों में भी कुछ ग्रंथ, कुछ शलोग चाहिए आदर आले गया है, कुछ शलोग चले गया है उतने से हाँ ये तो जीवगस्वामी कहते हैं तत्वसंदर्व में कि जो वेद है खास करके उनमें वो बड़े विशाल मात्र में वेद थे पर अभी सारे वेद हमारे पास है नहीं और जो अधिकांच पुरान है वो पुरानों में भी वो बोलते है कि वो शुद्ध रूप में अभ तो इसलिए वो कहते हैं कि हमें श्रीमध भागुतम पर जोड़ना चाहिए कहते हैं भागुतम ये है सर्वप्रमान चक्रवर्ति भूँता है सर्वप्रमान में प्रमुख है एक चक्रवर्ति की समय भागुतम में भागुतम पर जोड़ना चाहिए कि हमें शुद्ध रूप में भागुतम पर जोड़ना चाहिए कि हमें शुद्ध रूप में भागुतम पर जोड़ना चाहिए कि हमें शुद्ध रूप में भागुतम पर जोड़ना चाहिए कि हमें शुद्ध रूप में कुछ फरक नहीं है इसलिए हम देख सकते हैं कि अजार साल तक खास करके जो ग्रंथ बहुत प्रच्चित है जिसके पर भाष्य रिखा गया है उस ग्रंथ में परिवर्तन करना काफी मुश्किल है तो कुछ पुरान है उसमें परिवर्तन ज़रूर हुआ है इसलिए उन पुराणों में हम ज़रूर देते नहीं है माराचारिक माराचारिक बहुषे पुराण से भी कोट करते हैं पर बहुषे पुराण के ऐसे विवावों से कोट करते हैं जो सिद्धान पर ज़रूर दे रहा है तो विवाद आसपर जो चीज़े हैं उसके बारे में कोट नहीं करते हैं तो इसलिए शास्त्रों में भले ही कुछ शास्त्रों में थोड़ा बहुत परिवर्तन हो गया है तो उसका जो मूलभूत संदेश है उसमें परिवर्तन नहीं हुआ है और जो खास करके महतुपूर्ण शास्त्र है क्योंंकि वो भाष्य के साथ है इसे उसके बारे में हम काफी हद तक विश्वास रख सकते हैं और वह महतुपूर्ण यह है कि शास्त्र का जो निष्करश्य है वो हम आज भी जलन देख सकते हैं यासे कि अगर मान लिजे मैंने किसी को दवाई दी और आपको खासी दी उससे आपको खासी खराब होगी ठीक होगी तो अपने वो दवाई इनको दी और आपके पास वो दवाई आगे अब इस बीच में किसी ना दवाई बदल दी होगी आपको अगर पता चल गगा दवाई बदल लेंगे पर आप क्या देख सकते हैं कि इसकी जो खासी है चली लेंगे दवाई लेंगे और मैंने दवाई लेंगे मैंने भी खासी चली लेंगे तो मतलब आप समझ सकते हैं कि तो दवाई में कुछ परिवातर नहीं हुआ है अगर मैं हरे एक व्यक्ति को आए जाओंगा हरे एक का मैं पोकेट ढूंडूंगा हरे एक का लौकल ढूंडूंगा तुमने काई दवाई को नहीं रख दिया है मैं कहाँ तो जाओंगा वैसे तो हम वैसे थी फल देखते हैं फलेन परिच्छेयती हम कहते हैं तो उस इसरे से हम देख सकते हैं कि भगवदीता जब आर्जुन सुनते हैं तो आर्जुन में क्या परिवर्जन होता है आर्जुन में क्या समझ आती है क्या समझ होती है उनकी तो भगवान को परंपुर्छ उत्तम भगवान के रूप में सुखार कर लेते हैं कि क्रिष्ण को परंब सर्थ्य के रूप में सुखार कर लेते हैं भगवदीता में दो चीज़ हैं जैसे मैं उस दिन बता रहा था कि साधन और साध्य तो वो साध्य के रूप में क्रिष्ण को सुखार कर लेते हैं और साधन के रूप में भकती को सुखार कर लेते हैं और आज भी हजारों सालों के बाद हम परंपराण में अगर हम प्राप्त करते हैं भगवदीता के ज्यान को तो आज भी हम देखते हैं लोग वो वही परि प्राप्त करते हैं जो अलग अलग परंपराण में अलग अलग संपरदायों में थोड़ा बहुत फ़रक है और समझ में तो वो कहते हैं कि जो समझ है वहाँ वो बैसिकली सिंप्ली कहते हैं वहाँ पर कि हम नहीं अपरने करते हैं मादशारी कहते हैं कि उनका कहाने कि कुछ आत्माये हैं जो नरक में जाने वादी हैं नरक योगियों आत्मा कहते हैं तो उनके उद्धार कोई संभाव ही नहीं होते हैं तो यहाँ सुखार नहीं करते हैं तो वास्तम में आत्मा के जो आवरण हैं तीर परकार के होते हैं सत्वगुण, रजवगुण, तमगुणी तो कुछ मादशारी परताय में कुछ लोग ऐसे तात्पर ले देते हैं उसको कि आत्मा ही तीर परकार के होते हैं तुझी को समझेते हैं हम इसको सुखार नही करते हैं तो इसको हमें समझना है कि ऐसे नहीं है कि सब आचार्य बिल्कुल एक दुसरे की जिरोक्स कॉपी होनी चाहिए हरेक आचार्य एक विक्ति होता है और हरेक आचार्य देश काल पात्र के अनुसार बताते हैं जो बताते हैं ऐसे नहीं है कि उसमें से हरेक वैसे के वैसे के में स्विकार करते हैं जैसे कि हम देखते हैं कि हमारे ही संप्रदाई में रूप गोस्वामे को कुछ बहुती गुईय ग्रंथ लिखे और जीव गोस्वामे बड़े आदर पुरुवा उन ग्रंथों को जमीन में उनको ग्रंथ समाधी देते जो विंदावा में क्या जगह है उसका नाम जो वहाँ पह एक जगह है जो उसको ग्रंथ समाधी है वहाँ पह जो रूप गोस्वामे के ग्रंथ थे वहाँ पह देते क्योंं?
ऐसे नहीं कि उसको गलत बोल रहे है पर वो बोलते है यह कल यूट के लोगों को समझने के लिए संभाव ही है तो इसलिए यहाँ पह क्या है कि हमारे ही संप्रदार्य में ऐसे हो सकता है कुछ आचारे कुछ शिक्षा है ऐसी है जो हमें जो उचित नहीं है तो इसमें जब बहुत महान आचारे गं कुछ बता रहे है तो उसमें हम सही और गलत के परिवाशा से आना नहीं चाहिए अनुकूल और परिवाशा से आना नहीं चाहिए मतलब यह नहीं हम सोचना की हमने गलत कहा है पर यह क्या है यह हम समझ नहीं सकते है हमने कुछ कारण से वो उस समय बताया होगा पर ऐसे नहीं है कि वो ही मुझे अभी इस समय स्विकार करके बिल्कुल सब कुछ मेरे जीवन में ऐसे ही उतारना है जो मेरे भक्ति के लिए अनुकूल है और जो मेरे अभी आचारे गं है मेरे परिश्ट भक्त है जो गुरुवर्ग है उनकी मार्ग दर्शन में जैसे हमारे आचारे को भी हमारे गुरुवर्ग के दुश्टी से ही समझते है वैसे ही दूसरे संप्राय के आचारे उनके शिक्षाओं को भी हम हमारे गुरुवर्ग के मार्ग से ही समझना चाहिए तो इसलिए इनको जो थोड़ा फ़रक है उसको ज़्यादा जोर देना नहीं है हमें समझना है कि ये देशकाल पातर के अनुसार किसी और कारण से भी इसमें भेड हो चलता है हमें हमारे आचार्यों के उपदेश के लिए जीवन जीना है हमारे गंदों को प्रस्टुज करते हैं जैसे कुछ रामायन के पर कुछ लिखना है जैसे ये आत्मा का गंदेश हो गया है तो वो पुरांट नेंस्ट्रीम एजुगेशन का नेंस्ट्रीम एजुगेशन में चला जाता है आज भी अमेरिका में कुछ लोगों को जो रामायन पीकना है तो उनको इस प्रकर्श में पीका जाता है क्योंंकि ये अच्छी थी ये जीवन के लिए क्योंंकि ये अच्छी थी ये जीवन के लिए क्योंंकि वो भारत में भी आता है और यहाँ पर प्रचार करना हम लोगों को थोड़ा मुझ्किल हो जाता है क्योंंकि वो बेंस्ट्री में जाता है जैसे दार्विन का सिंदान्द्र में बेंस्ट्री में जाता है मुझ्लाइडिंग के बेंस्ट्री में जाता है प्रचार करना उस अस्पेट को मुझ्लाइडिंग के बेंस्ट्री में जाता है आत्मा के बेंस्ट्री में जाता है क्योंंकि वो बेंस्ट्री में जाता है मुझ्लाइडिंग के बेंस्ट्री में जाता है हमारा युद्ध क्या है यह हमें जोर देना है अगर मैं युद्ध कर सकता हूँ पर उसके लिए कुछ प्रसिक्षन लेना है सिर्फ ये सब लोग आसूर है ऐसे कहरें से ज्यादा प्रभाव नहीं होता है हम उनको आसूर कहेंगे वो हमको भावुप कहेंगे और फिर उससे कुछ फ़रक नहीं पड़ता है वो किसी को जदा परिवर्तल नहीं होने वाला है तो इसलिए हमें unnecessarily जो चीज़ों का हमारे लिए महतपूर्ण नहीं है क्या है समाज में बहुत सी भ्रांत धार्णाएं है पर कई बार ऐसे होता है मैंने देखा है कि जो महाभारत और रामायन के बारे में गलत फेह्मिया है वह इस कौन में आने के बारे में गलत फेह्मिया पता चली है अरे देखो इस पंडित ने ऐसे बताया कि कितना मूर्ख है वो अगर मैं कृष्ण भक्ति के आंदल में आ रहा है पर क्या है कि जो हमारे आडियन्स के लिए ज़रूरी है वहाँ बताना और उसका खंडन करना ज़रूरी है जो अभी पीके मूवी आया था वो लाकों लाकों लोगों ने देखा है तो उसमें जो बताया था उसका खंडन करना हाँ तो बोलना है पर किसी पंडित में कहीं कुछ लिखा हुआ है वहाँ लोगों में पता ही नहीं है तो उसका खंडन करना मतलब क्या ऐसा है कि जो व्यक्ति बॉक्सी के मैज देखने का आया है उसको यह अंदर बुला की टीटा उसका जो हवारे आउडियेंस के लिए रेलिवन्ट हैं वही ग्यान पर हम जोर देना चाहिए और जो उनके लिए रेलिवन्ट नहीं है जो दूसरों के लिए रेलिवन्ट हैं उसके लिए हमें सक्षन होना चाहिए जो जिनको ऐसे परतार के गलत फहमिया है उनके गलत फहमिया को खंडन करने के लिए हमें ट्रेन होना चाहिए या हमें ऐसे भकत परतार चाहिए जो ट्रेन हो सकते हैं और जो उनको उनसे कनेक कर सकते हैं पर हमारे लिए जो हमें युद्ध हमारे सामने है करते हैं