What is the difference between Gita 2.60 and 2.67?
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### संक्षिप्त सारांश (Short Summary)
इस व्याख्यान में श्रीमद्भागवतम् प्रथम स्कंध के 11वें अध्याय के आधार पर वास्तविक गुणगान (प्रोत्साहन/आशीर्वाद) और चापलूसी (मक्खन लगाना) के बीच का अंतर स्पष्ट किया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे भक्तों का निश्छल गुणगान भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
हरे कृष्णा तो आज हम भागवतम के यारोरे अध्याल पहले स्कंद से बगवान श्री कृष्णा का द्वारका में आगमन इसमें चर्चा कर रहे हैं तो हम इस विशे पे इसमें चर्चा करेंगे की गुम्णान करना और मस्का लगना चापनुसी करना इसमें क्या फ़रक है तो पहले तोड़ी पाँच्छव भूमी जो है भागवतम के प्रत्थम स्कंद में भगवान की लिलाओं का कुछ हद तक वरनम होता है और इसका विस्तारित वरनम दश्यम स्कंद में होगा तो भागवतम के जो रुदे है दश्यम स्कंद उसकी जलग प्रत्थम स्कंद में दिजा रही है पर ये दोनों अलग पसंद है जो पांडवो की लिला है पांडवो के साथ भगवान की लिला है और द्वार्का वांसियों के साथ जो लिला है इसका पुल्वा वरन अंदश्यम स्कंद में नहीं आता है जो घटना यहाँ पर बताई गई है वहाँ पर नहीं बताई गई है पर वो यहाँ पर क्यों बता जा रहा है क्योंकि भागवतम का कथन किस प्रकार से हुआ कैसे शुगदेव वो स्वामी और परिषित महराज मिले और वो दोनों किस तरह से महान लिखती थे यह बताने के लिए पहले शुगदेव वो स्वामी का कि जन्म कैसे हुआ और फिर वे कैसे ब्रह्म ग्यानी थे और बाद में वे कैसे भखत बन गए इसका वरन साथवे अध्याय में आता है वो संख्षिप्त रूप में आता है पर आठवे अध्याय से भागवतम के अंत तक बागवतम के पहले सकंथ के अंत तक इस सारे घटनाओं का वरन इसलिए है कि कैसे परिषित महराज कितने महान लिखती थे कि उनके पूर्वज कैसे थे कितने भगवान उनको प्रिय थे और कितने वे भगवान के महान भक्त थे, पांडव जो थे वहाँ सब वरन परतं सकंथ में हो रहा है परतं सकंथ का अंतिम अध्याय जो है वहाँ है शुगदेव गोस्वामी का आगमन और फिर अगले सकंथ में, दुसरे सकंथ में शुरुबात होती है प्रश्णों की प्रश्णों के उत्तरों की भी तो फिर यहाँ पे जो वरन हो रहा है कैसे भगवान पांडवों को बहुत प्रिय थे, और जब कि द्वारका बासी, उनके पतनी, उनकी सदस्य थे, परिवार की सदस्य थे, उनको छोड़ कर भी भगवान द्वारका से हस्तनापूर जाया करते थे, और यहाँ सब वरन इसलिए हो रहा है, कि अभी देखिए यहाँ पे एक अध्याय भगवान का द्वारका में आगमन है, पर तुरंत उसके पाद में दुतराष्ट्र और विदुर का दुतराष्ट्र का संदेश, और फिर पांडवो का भगवान कृष्ण का जो दिरोभाव है, उसका भी वरनन प्रतंसकन में अधिक नहीं आता है, सिर्फ उसका प्रभाव पांडव पे क्या हुआ उसका वरनन आ रहा है, तो इससे क्या बता जा रहा है, कि द्वारका वासियों को भगवान इतने प्रियते फिर भी ये भगवान उनको छोड़कर पांडव के साथ बार बार रहा करती थे, तो पांडव कितने महान है, यहाँ इन सब प्रसंगों से बताय जा रहा है, पर यहाँ पे भगवान पांडवों के इजाज़त लेकर फिर अभी द्वारका में प्रभेश कर रहे है, और सभी द्वारका वासी बहुत आनन्दित हो गए हैं, और आनन्दित हो कर वे द्वार पे भगवान का स्वागत करने आ गए हैं, और जब वे स्वागत करने आए हैं, तो यहाँ पे तीन चिरोणियों के लोग के बारें बताय गया है, स्वयंज गुरुभी स्वयंज मतलब भगवान आ रहे है, गुरुभी मतलब, जो उनके वरिष्ट, उनके वरिष्ट रिष्टेदार वगे रहे हैं, वो सब आए हैं, और फिर विप्र रही हैं, फिर ब्राम्वन भी हैं, और किस प्रकार के ब्राम्वन है यह? सदारेर थविरेर, सदारेर थविरेर मतलब, कि जैसे, दो प्रकार के जियू बताये गए हैं शास्थ वैदिक शास्थर में, कि स्थावर और जंगम, स्थावर मतलब, जो हिल फिर सकते हैं, जो हिल फिर नहीं सकते हैं, जैसे कि पेड़ है, और जंगम मतलब, जो हिल फिर सकते हैं, जो जानवर है, पंची है, और मानव भी हैं, तो जो मानव है, वो जंगम होते हैं, पर ऐसे बताया है कि यह जो ब्रामभन थे, यह इतने वृद्ध हो गए थे, कि वृद्धता के कारण वो लगबक स्थवी रहीत हो गए थे, वो चल्व नहीं पा रहे थे जादा, पर फिर भी भगवान से इतना प्रेम था उनका, कि वे भगवान से मिलने आ गए, और जब भगवान से मिलने आ गए, तभी, उन्होंने क्या देखा, कि वो भगवान का, भगवान का सुन्दर दर्शन करके, वे भगवान का गुन्गान कर लग गए, पर यो जो गुन्गान क्या था, वहाँ भगवान से बहुत पूर्ण शब्दी समझे, आशिरी भी, तो जो ब्रामणों का गुन्गान था, वो एक प्रकार से आशिर्वार था, इसके वारे में हम अच्छा करेंगे, तो पहले श्रुनी की जो लोग थे, वो उनके ही रिष्टदार थे, गुरु भी, फिर स्थाविरई विप्रई, और दीसरे थे वन्दविश, वन्दविश मतलब वन्दविश अन्यहीर, बाकि सब लोग थे, वो उनकी वन्दना कर रहे थे, तो ब्रामण, जो बुजुर्ग ब्रामण थे, वो उनकी जो कर रहे थे, वो भी उनका गुणगान कर रहे थे, पर वास्तव जो गुणगान, वो क्या था, आशिरिभी, वो एक आशिर्वात के समान था, और इस तरह से, सब उनका गुणगान करते हो जाए, आविश्टपुरम, वे द्वारकापुरे में प्रवेश कर रहे थे, तो प्रभुपात जी, यहाँ पर जोर रहते हैं ब्रामणों पे, और वे ताथ पर रहे हैं, और वे बताते हैं, कैसे जो ब्रामण, जो गुणगान करते हैं राजाओं का, तो वह गुणगान, वास्तव में, बहाय रूप से ऐसे लग सकता है, कि वह, जैसे हम बहुत एक जगत में लोग, किसी से कुछ प्राप्त करना है, तो किसी, किसी से कुछ काम निकालना है, तो उसका गुणगान करते हैं, आप इतना हो, आप यह हो, आप वो हो, आप वो हो, और उसका गुणगान करते हैं, फिर अपना काम निकाल लेते हैं, तो वैसे ही यहाँ पर लग सकता है, पर प्रापा जी बोलते हैं, कि यहाँ पर फ़रक क्या है, फ़रक यहाँ है, दो चीज़े प्रापा जी बताते हैं, कि जो राजा थे, वे वास्तों में गुणशील थे, गुणवान थे भी, और उनके वास्तवे गुणों का, जब गर्णन किया जाता है, उनके स्तुति किया जाती है, तो वास्तों में, चापलू से यह मसका लगाना नहीं है, और दूसरी बात जो है, जो यहां पर बताये गया है, कि आशीरी भी, कि जब कोई, जो भुन्यवान, भक्ति पूर्ण देखती है, वह किसी और का गुणगान करता है, तो वह गुणगान, एक प्रकार से प्रोचसाहन होता है, और उस प्रोचसाहन में आशिरवाद होता है, अगर कोई वरिष्ट भक्त हमसे कहते हैं, कि आप बहुत अच्छे भक्त हों, तो इसका मतलब क्या है, उन्होंने जरूर, उन्होंने जरूर, हमें कुछ भक्ति के कुण देखे होगे, पर साथ साथ उसमें यह भी गुण है, उसमें यह एक परकार से आशिरवाद है, कि हम अच्छे भक्त बन सकते हैं, उनके प्रोचसाहन से, उनके आशिरवाद से, उसमें दोनों के जो गुणगान कर रहा है, और जो गुणगान स्विकार कर रहा है, दोनों की चीतना महत्वपूर्ण है, भौतिक जगत में जब गुणगान होता है, तो वास्तव में दोनों स्वार्थ की चीतना मिलते हैं, जो गुणगान कर रहा है, उसको वास्तव में उस विक्ति से कुछ लिया देना नहीं है, वास्तव में उससे अपना काम करवाना है, और वो विक्ति को एक आजार के रूप में इस्तमान कर रहा है, और वो उसके मुँफे उसका गुणगान करेगा, और उसके बीठ में उसको बहुत अनाप्शनात करेगा, क्योंकि वास्ता में बहुती जगत में किसी के लिए रुद्धे से आदर रखना मुश्किल होता है, क्योंकि हमेशा एक परधात्मक भाव होता है, क्योंकि बहुती जगत में जो भी चीज़े है, वो सब सीमित है, इसलिए अगर किसी और व्यक्ति को कुछ मिल गया, तो वो मुझे नहीं मिलेगा, अगर कोई विद्याले में, गक्षा में, कोई विद्यारती है, वो पहला आता है, तो बाकी विद्यारती भले जो उसका अभिननन करेगे, फिर भी वो उनकी रुदे में एरिशा हुई, कि मैं पहला आता था कि इतना अच्छा हुई था, तो वो जो अभिननन होता है, कई बार रुदे से नहीं होता है, क्योंकि उसमें स्वर्धात्मक भाव के कारणे एरिशा होती है, तो यह स्वर्धात्मक भाव होती है, जो गुनगान कर रहा है उसमें, तो वो गुनगान इसलिए करता है क्योंकि अच्छा लगना चाहिए, ऐसे नहीं लगना चाहिए कि मैं उसकी इरिशा कर रहा हूँ, या दिखावे के लिए करते हैं, या फिर उससे कुछ मदद चाहते है, तुम कौन से कितावे पढ़ते हो, मुझे नहीं पता ले, तो मैं आगली बार पहले आजाओंगा, तो जो भी हम करते हैं, जो भी लोग करते हैं भोतिक चेतना में, वो स्वार्थ से हमेशा दूशित होता है, कभी कभी ना केवल स्वार्थ से दूशित होता है, पर स्वार्थ से ही भरा होता है पुरा, दूशित मतलब और भी चीज़े है, और स्वार्थ भी है, पर केवल स्वार्थ से ही भरा होता है कभी कभी, तो जो विक्ति गुन्गान्च स्विकार कर रहा है, वह विक्ति भी वास्तव में मिठ्या अहंकार की भावना में होता है, और वह सोचता है कि मैं कितना महान हूँ, मैंने ये किया, मैंने वो किया, मैं इतना बड़ा हूँ, तो यहाँ जो भाव है, बगवाद जीताने बताते है, प्रकृति क्रियमानाने गुणें करमानी सर्वशा, अहंकार विमोरात्मा करता में तिमन्यते है, कि जो तिस्र अज्ञाय, जो 27 श्रौप भगवान बताते है, कि प्रकृति ही सब कुछ कर रही है, अगर मुझे अच्छा गाना आता है, वास्तव में जो एक आउजार है, जो प्रकृति ने और भगवान ने मुझे दिया है, और वो अपने योजना के अनुसार कारे कर रहे है, तो हमने जरूर इसमें कुछ प्रयास किया होगा, पर वास्तव में जो गुण है, वो हमारे नहीं है, प्रकृति कारे कर रही है, एक बार एक गाउं में बड़ा आलसी विक्ति था, और जब वो आलसी विक्ति, वो उसको कुछ भी काम हो, घर से निकलने को भी तयार नहीं होता था, हमेंशे नधर में बैठा रहा था, और एक दिन गाउं वालों ने देखा, कि वो एक गोरे पे बैठ के बहुत तेज़े से चल रहा है, तो सब लोग आश्चे चेकित हो गए, हर लोग पुछे, रे भाई, आज क्या बात है, इतना तेज़े से क्यों चल रहे हैं, तो वोला, मुझे क्यों पूछ रहे हैं, गोरे को पूछो, तो वास्तव में, जो भौतिक्वादी विक्ति है, वहाँ कभी-कभी लगता है, कि वो बहुत कार्य कर रहा है, पर अगर असलियत देखेंगे, तो वो जो कार्य है, उसके प्रवनुत्य के इंसार ही हो रहा है, कभी-कभी, जब वो प्रवनुत्या, उसके इच्छा के खिलाब जाती है, तो उसके प्रवनुत्या कहा, क्या हो रहा है ये, पर कभी-कभी, बहुत बार, वो समझ में भी नहीं आता है, तो इसलिए, वो विक्ति भी मत्या अंकार पर होता है, भावना कर जो गुल्गान स्विकार कर रहा है, और ऐसे गुल्गान से, केवल उसका मोह जो है, और बढ़ जाता है, और बढ़ जाता है, पर इसके अलावार, दूसरी भाव में भी गुल्गान हो सकता है, क्योंकि जो स्वार्थ भाव है, जो स्वार्थ है, हम एक दरह से देखें कि, बौतिक चेतना में स्वार्थ होता है, पर जो है, मानविय भावनाएं भी होती है, अगर कोई बालक है, वहाँ पहले बार चलने लगता है, तो उसके माता पिता बहुत प्रसंद हो जाते हैं, और उसको शाबास की लेते हैं, तालिया बजाते हैं, तो वास्तव में हम कहे सकते हैं, कि इसमें भी स्वार्थ है, पर यहाँ एक तरह से, जो विश्लेशन है, बड़ा निष्ठूर है, हमें यहाँ पर समझना चाहिए, कि यहाँ पर माता पिता का भाव, एक तरह से, जो होता है, अपने बालक को पोत्साहन करना है, तो इसलिए, जो हम भावतिक और आध्यात्मिक चेतना में विभाजन करते हैं, उससे में हमें यहीं पर समझना चाहिए, कि कुछ मानविय भावनाएं हैं, जो वह भले ही आध्यात्मिक नहो, पर वह हमेशा पूर्ण दया मत्याहं करके भावना पर भी नहीं होती है, क्योंकि वह दूसरे वेक्ती की भी चिंता होती है, दूसरे वेक्ती के कल्यान की इच्छा भी होती है, तो ऐसा प्रोट्साहन जो है, हम सब को एक दूसरे से करना जरूरी है, जिससे कि हमें, हमारे जीवन में जो समस्याएं आती है, जो हमें कभी-कभी हार सामना करना पड़ता है, किसी परस्तिति में, उसमें हम होसला हारे भी नहीं चल सकते है आगे, तो यह जो, एक क्या है, मित्याहं कार के स्थरपे है, दूसरा जो है, हम थोड़ा भावत, भावतिक स्थरपे क्यों नहों, पर मानुविय स्थरपे वो प्रेम है, दूसरे के लिए चिंता है, और उसके के लिए हम उनको पोत्साहन करने के लिए कारे करते हैं, और फिर इससे उपर है, स्वार्थ भावास्तमें क्या है, कि हम खुद समझते हैं, कि मैं, मैं शरी नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, मैं भगवान का अंश हूँ, और यह वेक्ति भी जो है, भगवान का अंश हूँ, और उस वेक्ति को भगवान की सेवा का हमें, पोत्साहित करने के लिए, हम अगर कोई, उनका गुंदान करते हैं, तो वह बहुत महत्वपूर्णा है, क्योंकि इस भावतिक जगत में, हम जब भक्ति करते हैं, तो अनेक प्रकार से विरोध आते हैं, प्रहुपाज्ञु यारं दिया करते थे, कि जैसे, अगर लदी का प्रवाह एक दिशा में हो, और हम तैर रहे हैं दूसरे दिशा में, तो फिर वह तैरने के लिए हमेशा संगर्श होता है, तो उसी तरह से भावतिक जगत में, जो प्रवाह होता है, वह हमेशा भावतिक चीजों के ओर होता है, भावतिक आकरशनों के ओर हम खीज़े जाते हैं, तो इसलिए हमेशा हमेशा संगर्श करना परता है, कि हम भगवान का संरन करें, भगवान की सेवा में बने रहें, और इस संगर्श में हम सबको प्रोचसाहन की ज़रूत होती है, और इसलिए, जो वैश्णो संस्रती है, उसमें एक दूसरे का गुणगान करना यह बहुत महत्बपूर्ण बताए गया है, और हम यहाँ देखते हैं, श्रिमत भागवतम में न केबल भक्त भगवान का गुणगान करते हैं, पर उसी तरह से, चेतननी चरता में जब भक्ते एक दूसरे से मिलते हैं, तो भक्ते एक दूसरे का गुणगान करते हैं, तो प्रवापाजी तात्पर यह में दो चीज़े गुणगाते हैं, एक तो वो एक साधारन जो संस्कृति है, जिसमें ब्रामखन चत्रियोगा गुणगान कर रहे हैं, और दूसरे इस परस्थिति में क्या है कि जिव चत्रिय जो है वास्तव में चत्रिय नहीं है, वे भगवान स्वय में और भगवान तो उत्तम शलोक है वे सब गुणो सब पूर्ण दया सब प्रकार के गुणगान के लिए पात्र है वह उरुगाय तो इसे पता गया है कि उरुगाय उनके लिए इतना भी गुणगान करे उतना कम ही है भगवान के लिए तो भगवान के गुणगान के बारे में जो यहां पर बता जा रहा है वह प्रवापाद जी एक विशेश परसंग है एक विशेश परस्थिति है पर प्रवापाद जी उस परस्थिति पे जोर नहीं दे रहे है जो संस्कृति है जिसने वो रहा है उस पे जोर दे रहे है और उस संस्कृति में बता रहे है कि क्षत्रिय ब्रामनों का गुन गान करते हैं और हम यही देखते है कि भागवतन में कही जगपे आता है जब स्वयं भूमन हूँ और कर्दं बुनी एक दुसर से मिलते हैं तो वह दोनों एक दुसरे का गुन गान करते हैं तो यहां पे तो गुन गान करते समय किस प्रतार से हमें गुन गान करना चाहिए कि जो शिक्षाश्टकम में तिसरे शलोक में बता या है तुनादपी सुनीचेन तरोरबी सहेशन अमानिना मान देना कीर्तनिय सदा हरी तो यहां पे कीर्तनिय सदा हरी जो बताया गया है कि सदा भगवान हरी का कीर्तन करना चाहिए तो कभी कभी हम प्रयास कर सकते हैं कि मैं हमेशा जब जितना समय जितना हो सकता है जब करो अच्छी बात है प्रयास करना चाहिए पर यहां हमेशा भगवान का कीर्तन करना यहां केबल एक यांत्रिक प्रयास से हम एशस्वी नहीं हो सकते हैं तो उसके लिए एक चेतना का परिवर्तन ज़रूरी है और वो चेतना का परिवर्तन जो ज़रूरी है वह इशलोक के पहले तीम पंग्तियों बताय गया है कि जब हम नम्र, सहनिशी, तो भकतन उठा कर अपने गीत में बताते है कि कि सबको सम्मान देने के लिए मैं मैं सबको सम्मान दे सकूं इसके लिए आप मुझे शक्ति दीजे क्या है वश्लूक सकल समान सकल समान को रिते शक्ती दिया देखो नाथ यथा यथा सकल समान क्या कह रहे हैं अपने? कि सबको सम्मान करने के लिए किस परकार सम्मान? यथा यथा उस विक्ति के पद के अनुसार इसके लिए आप मुझे शक्ति दीजे साधा रहन दया हम हम जब भगवान से प्रातना भी करते हैं तो हमारी प्रातना होती है कि भगवान मुझे ऐसी शक्ति दीजे जिसे कि मैं ऐसे कारे कर सकुँ जाकि सब लोग मेरा सम्मान करें तो हमारा भाव जो होता है अगर भगवान की सेवा के लिए हम बहुत से बड़ी कारे करना चाहते हैं तो अच्छा है वो पर गेबल वो अगर हम हमारे कुछ की गुन्गान के लिए चाहे रहे हैं तो वो अनुचीत है और यह जो है बहुत बड़ी-बड़ी कारे करना यह अच्छा है भगवान की सेवा में हमें चाहिए कि भगवान का जो मिशन है वो हम बहुत बहुत अच्छी तरह से रिस्तार कर सके उसका पर यह जो शक्ती है यह इसके लिए शक्ती लगती है पर इससे अधिक शक्ती जो लगती है वहाँ है क्योंकि क्या है जब हम कुछ ऐसा कारे करते हैं जो संभान अलिए हो जिससे के हमें आदर मिलता है वह भले ही हम भगवान की प्रसनता के लिए कर रहे हैं भले ही भगवान की सेवा के अनुसार ही कारे कर रहे हैं पर उस समय क्या होता है उसमें हमारा मिठ्या अंकार भी उसमें संयूगतक होता है तो क्या होता है जब हम कोई बड़ा कारे कर रहे है तो भगवान की सेवा करने की इच्छा उसमें सिर्फ नहीं है भगवान की सेवा करने की इच्छा के साथ साथ हमारा भी हमारा भी महिमा दुनिया को दिखाने की इच्छा है उसमें तो ऐसे नहीं है कि इसके कारण ऐसे विचार से हम वो पुछ भगवान की सेवा में अच्छा नहीं करे क्या है हमारे स्तरपे ये न केना प्रकारे न मना क्रिष्टु निविशेद किसी न किस दरसे भगवान की सेवा करनी है हमें पर तो क्या होता है जब हम को बहुत बड़ा कारे करते हैं तो उसमें हमारे हमारा मित्याहंकार हमें सहयोग करता है हमें सहयोग करता है और इसलिए उसको उतनी शक्ति नहीं लगती है जितना कि हम दूसरों को आदर देने के लगती है कि दूसरों को आदर देने के समय क्या होता है हमारा मित्याहंकार उसका विरोध करता है और उस मित्याहंकार का विरोध करके किसी का गुन्गान कर्मा जब होता है तो वो आसान नहीं होता है तो इसलिए बक्तिन और ठाकुर कह रहे है और वो यहां पर यह भी नहीं कर रहे है कि दूसरों का गुन्गान करने के लिए वो शक्ति नहीं है वो कहते है दूसरों का सम्मान करने के लिए शक्ति नहीं है अब गुन्गान और सम्मान इसमें फ़रक क्या है गुन्गान या शब्दों से कहना है सम्मान मतलब अंदर से वो भाव होना दूसरों के परिदी आदर का भाव होना कभी कभी हम बक्तों में मिलते हैं तो हम एक रीती रिवाज के रूप में दूसरों का गुन्गान करते हैं हम इतने अच्छी बक्तों तो आप यह हो आप वो हो और उसमें भले ही कभी कभी हमारा स्वार्था भी होता है कभी कोई बक्ता हमारा गुन्गान करें लगता है तो हम सोच लगते हैं उनको कुछ सेवा चाहिए होगी हमसे लगता है तो इसलिए हम यह बोल रहे हैं तो वास्तव में अगर वैसे है भी तो वो बुरा नहीं है क्योंकि वो हमें भगवान के सेवा में ही लगा रहे हैं पर जो है कि हमारी जो अंतरन चेतना होती है वो कुछ समय तक हम चिपा सकते हैं पर भीरे भीरे वो दुश्यों को समझ जाती है तो अगर कोई वेक्ति हम देखते है कोई आम है दुश्यों के परती सही में उनके कल्याण की चिंता है उनसे स्मेह है और उनके परती आदर है तो वह जो है धिरे धिरे समझ में आजाता है और अगर वो नहीं है तो वह भी समझ में आजाता है केवल हमारे वचन है और बोलने की पत्रती है उससे ही हम दुश्यों से संपर्क नहीं करते हैं हमारे अंतरन चेतना है उससे भी हम दुश्यों से आदर परतान करते हैं और जो शुद्ध वक्त होते हैं जो महान वक्त होते हैं उनकी रुदे की शुद्धता इतनी होती है उससे लोग प्रभावित हो जाते हैं तो विवाइज्ञान की सोचोदन कर रहे है उन्हों पता चल रहा है कि हमारे जो इंद्रिया हैं उनसे ही हम ज्ञान नहीं प्राप्त करते हैं उसके अलावा अनेक पद्धतिया है जिससे भी ज्ञान प्राप्त करते हैं और यह कैसे होता है वह उनको समझ में नहीं आता है पर यह है मैं इसके दो उधारन डूंगा और पिर हमारा जो भाव है उस पे हम केंदर देगे तो अभी कई जगह में दुनिया में ऐसे जगह है जहाँ पर भुकम्प बहुत होते हैं तो अभी जब भुकम्प कभ होगा कैसे होगा इसका भुविश्यवानी करना लगबग नामुमकिन है हमारे पार जो यंतर है कितना बड़ा भुकम्प वो बता सकता है पर भुकम्प होगा कि नहीं वो बताना बड़ा मुश्किल है तो वाइग्यानिक देखते है कि कई बार जब कहाँ भुकम्प होता है तो वहाँ जो जानुवर होते है उनका जो बरताव है बदल जाता है और यूरोप में ऐसा समझोतन हुआ है कि जो चीटिया होती है जब भुकम्प होता है उसके एक दिन पहले और उसके एक दिन बाहत तक वो चीटिया अपने जो घर होते है उसके अंदर जाते ही नहीं है उसके बाहर गूंते रहते है और अभी यहाँ कई भुकम्पों है और उनने क्या देखा है कि जितना बड़ा भुकम्प होता है उतना वो चीटिया अपने घरों से दूर रहते है तो अभी उनको समझे चीटियों कैसे समझे आता है भुकम्प होने वाला है और यह एक बार होगा दूसरे बार होगा तिसरे बार होगा पर यह सैक्रों बार हो रहा है और एक चीटि नहीं है ऐसे नहीं है कि जो एक ही अगर हम इस बालगाँ में चीटियों की लोक संक्या बनाएगे तो कितना होगा कितने सारे हैं और ऐसे नहीं है कि एगर एक चीटि के पास कुछ विशीश बुद्धी है वो चीटि समझ जाती है और बागी सब को इमेल कर देती है नहीं यह SMS कर देती है उनमें इस प्रकार से कोई संदेश भीडने के सुभिधावे नहीं है मतलब वो चीटिया स्वयम समझ जाती है तो कैसे समझती है वो उनको पता नहीं है वो कुछ मनोगरी धारना करते है कि वो चीटियों के दिमाँख में कोई चुम्बक जैसे शक्ती होगी और जब भुकम होता है तो उसमें से कोई चुम्बक जैसे शक्ती निकलती होगी और इन दोनों जब समझ में आते तो चीटियों को समझ जाता है कि कुछ यहाँ पर खत्रा होगा तो अभी यहाँ सब मनोगरी बात है पर यहाँ पर कहने का वहाँ क्या है कि इस सुष्टी में ऐसी चीज़े है जो हम हमारे केवल इद्रियों से समझ नहीं सकते हैं दूसरा वैक्यानिकों ने माननों के साथ प्रयोग किया है कि एक वेक्ति यहाँ पर बैठा जिसे मानने मैं बैठा हूँ यहाँ पर और मेरे पीछे कोई वेक्ति बैठा है और वहाँ कभी मेरे और भूर के देखता है और कहीं का कोई और देखता है और मैं उसको देख नहीं सकता हूँ पर मुझे पुछे जाता है कि आप अन्दाजा लगाओ क्या वो वेक्ति आपके ओर देख रहा है नहीं तो अगर यह केवल अन्दाजे की बात होगी तो फिर क्या होगा 50% समय में सही होगा 50% समय में गलुप होगा कुछ लोगों के लिए 90% होता है कि वो लोग तो इसका ऐसे काई वीडियो क्लिपिंग भी है तो वो वेक्ति आपे गएता है कि देख रहे हो हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं तो वहाँ पर जो बता रहे हैं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं हाँ नहीं अंतरंग रूप से संवान नहीं करना है तो वो संवान किस तरह से हम कर सकते हैं यहाँ समझ के कि वास्तों में भक्त कितने दुर्भव हैं इस दुनिया में भक्तों में कुछ गुण कम हो सकते हैं हम देखते हैं कि यह भक्त आलसी है यह भक्त कोल्ज हो जाता है यह भक्त ऐसा है यह भक्त और ऐसा है अभी यह कुछ कमिया हम भक्तों में हो सकती है पर वास्तों में जो भक्तों का परधान लक्षन जो है कृष्णी कृषरनम कि इस दुनिया में लाकों करोरों लोग हैं और उनमें कृष्णी कृषरनम कृष्णी कृष्णी कृष्णी कृष्णी कृष्णी कृष्णी कृष्णी कृष्णी अची बन जाते हैं भले ही बातचीत में हम ज़ादा कुछ गुणगान नहवा करे फिर बھی अगर संभान हो अंदर तो उस से भी धीरि धीरी संभाने इते यो अच्छे विजाते हैं और एसे नहीं कि सिप्स अनदर करना है और गुनगान बाहर से कमी नहीं करना है अंदर भाव है ना तुम्हें समझ नहीं आता है तो तुम्हारी कमी है ऐसे नहीं सचना चाहिए हमें हमें वास्तों में दुसरी का गुनगान भी करना चाहिए है और वो गुनगान क्यों करना है? ऐसे नहीं है किरितिरिवास के रूप में वास्तों में हमें देखना है कि ये भक्त में कुछ गुन है और अगर वो गुन है तो ये गुन भी कुछ आध्यात्मी गुन हो सकते हैं कुछ बौतिक गुन हो सकते हैं वास्तों में ये कोई भक्ती कर रहा है तो सब गुन जो है वो एक परकार से आध्यात्मी हो जाते हैं क्योंकि वे बगवान की सेवा में ही वो गुन लगाए जा रहे हैं इस्तिमाल हो रहे हैं पर किसी में कुछ बौतिक गुन भी होते है तो उनका भी विकास करना ज़रूरी है कोई विक्ती अच्छा गाता भी है तो भी कोई अच्छा लिखता है कोई अच्छा अनुशीलन करता है किसी भी गुन का तो उसमें प्रयास लगता है उसमें अभ्यास लगता है और उससे ही विक्ती और अच्छी तरह से वो कारे कर सकता है और वो प्रयास वो अभ्यास करने के लिए उस विक्ती को प्रोथसान चाहिए तो प्रोथसान देना बहुत ज़रूरी है यहाँ प्रहुपाज्जी की विशेष्टा थी राधा गोकुलानन भगवान की जाय यहाँ प्रहुपाज्जी की विशेष्टा थी कि प्रहुपाज्जी हम एक दर से प्रहुपाज्जी का एक ही पहलू देखते है कि प्रहुपाज्जी लोगो कभी यह फूल, सिद, रास्कल, समूर्ख का कहा करते थे पर प्रहुपाज्जी का जो स्निया पूर्ण, प्रेम पूर्ण भाव था उससे भी सब को प्रोचसाहित करते थे भक्ति में और अगर प्रहुपाज्जी लोगो प्रोचसाहित नहीं कर सकते थे और नहीं कर रहे होते तो जो लोगो को बगवान के बारे में कुछ जानकार ही नहीं थी वह लोग बगवान को क्यों अपना जीवन समर्पित करते हैं तो प्रहुपाज्जी में यह भाव था कि वह हर एक विक्ति को वह उनके जो बाहया आवरण है कि विक्ति इस तरह से एमलेच है, या शुद्र है, या यासा है, या वैसा है उसके परे विक्ति को देवी विक्ति आत्मा है और आत्मा किस तरह पे यह बगवान का वक्त है भले ही वक्ति अभी आवरुत हो वो वक्ति जागरुत होने की एक शम्ता सब में है तो यह सिद्ध सिद्ध कृष्ण प्रेंच साध्य करुना है शर्वन अधि शुद्ध चित्ते कर ये हुदा है प्रहुपा जी कही बार ये श्लोग बताय करते थे और खास करके जब वो अपने परदेशी वक्तों को भारत में लेकर आते थे तब की वे अपने भारती लोगों को वो बताते थे कैसे ये लोगों को कुछ भी पता नहीं था पर फिर भी ये वक्तों कैसे बन गए प्रहुपा जी खुद स्ट्रें नहीं लेकर थे कि मैंने कोई जादो किया है वो कहा करते थे कि वास्तव में कृष्ण बक्ती सब में अगर उनको शरुवन करने का मौका दिया जाए तो उससे वे साब भक्त बन जाएगे तो इसलिए ये प्रहुपा जी वचीषता थी चानकी पंडित का जो श्लोक है वो प्रहुपा जी कई बार बोला करते थे कि कि अगर सोना है वो अगर कचरे में पढ़ा है तो सोने को कचरा निकाल के मिला जाएगे तो हर एक व्यक्ति जो है वो भगवान का अंश है पंद्रवे अध्याय के सातु श्लोक में भगवान किताते है कि हर एक जीव जो है वो मेरा अंश है तो भगवान जो है वो पूर्ण सुवर्ण के समान है और हर एक जीव है वह एक सुवर्ण का आम्श की समान है तो हमारा जो सेवा की अनतर से क्या है हमें गंतों का वितन करना है, विग्रहों की सेवा करने हैं, पुछार करना है पर यह सबका भाव क्या है? यह सबका उद्दिश क्या है? कि जो हरे एक विक्ती अंतर से सुनहरा है और बाहर से जो कुछ गंदरी का आवरन लग गया है तो वो गंदरी का आवरन निकाल के वो जो असली सोना है उसको बाहर लाना है और वहां लाने के लिए हमें दूसरों को मारदधर्शन देना है मारदधर्शन देते हैं कि आप महरे कुछ महांतर जब करो शास्त्रों का अध्यान करो उससे आप समझूगे कि वास्तों में आप क्या हो असली में और अभी आपकी जो भी कस्तशा हो गई है कुछ दुर्गुण हो सकते है, कुछ वेसन हो सकते है, कुछ अनर्थ हो सकते है पर यहां सब बाय है अंदर से वास्तों में आप शुद्ध हो सोने के समान हो और जो आध्यात्मिक ज्ञान है, तत्वज्ञान है, उसका उद्दिश वास्तों में यह है हर एक विक्ति दिल्बिय है हर एक विक्ति भगवान का अंशय है बताना श्मिद्धा कुटल के दीसरे स्कंध में बता जाता है कि सबसे बड़ा सबसे बड़ा दुसरों का सेवा करने वान विक्ति कौन है बता जाते है, बहुत अच्छी तरह से बता जाया है कि ऐसे नहीं बता है कि जो हमेशा भगवान का गुन्गान करता है, वो सत्य है पर वो बताते है कि जो विक्ति बाकी सब लोगों को अभय का आश्वासन देता है वह विक्ति सबसे बड़ा हिच्छी उतक है पर भगवान का अच्छी तरह से बताते है यह अभय का आश्वासन का मतलब क्या है अभय का आश्वासन मतलब कि जब हम समझते है कि क्या जो विक्ति है हम सब आत्मा है और आम आत्मा जो अविनाश ही है कोई भी शस्त्र उसको विनाश नहीं कर सकता है तो इसका भाव यह है जब हम समझते है कि हम वास्तव में दिव्य है, अभिनाशी है, आध्यात्मिक है तो इससे अभय प्राप्त होता है तो और यहां तत्वक्यान प्रदान करना यहां सबसे बड़ा हिच्ची, सबसे कल्यान का कार्य है कभी-कभी लोग गीता सार, कई-कई दुकानों में होता है और उसमें वो लिखते है जो हुआ, वो अच्छा हुआ जो हो रहा है, वो अच्छा हो रहा है जो होने वाला है, वो भी अच्छा ही होगा कावी है, मैंने तो डर्जनों बार भगवनीता पढ़ा है कहीं भी ऐसा शलोक नहीं मिला है कहां से आया है यह शलोक पता नहीं है और पूरे भगवनीता का उद्देश हमें, एक तरह से हमको कह सकते है कि निषकर्ष हम निकाल सकते हैं पर यह घीता का सार नहीं है घीता का सार, क्या हो रहा है उसके पारे में नहीं है हमें क्या करना है उसके पारे में तो, जो हो रहा है वो ज़रूर अच्छा हो रहा है पर क्या हम कर रहे है वो अच्छा कर रहे है कि नहीं वो महत्वपूर नहीं है तो इसलिए भगविता के अंथ में अर्जुन क्या कहते है करिशे वचनंतव वो कहते है कि आप जो बता रहे हैं मैं वह करने के लिए तयार हूँ अच्छा भगविता के 73 विशलोक में बता रहे है वो और वह अर्जुन का अंतिन वचन है भगविता में तो इसलिए यहाँ भवतिक स्थर पर आश्वासन देना लोगों के जो सब कुछ अच्छा हो जाएगा वह अगर परिस्थिति जरूरी है तो हम बोल सकते हैं पर उसके साथ साथ हमें उस विक्ति को ज्यान भी दिना चुईए तो अगर कोई लगती बिमार है और वह बहुत दुखी हो गया है मैं इतना बिमार हूँ तो उसको हम आश्वासन दे सकते है कि ठीक हो जाएगा पर साथ साथ उसको डॉक्टर के बास देखे जाएगा कि ठीक होने के लिए कुछ मदद हो सके सिर्फ बोलने से ठीक नहीं होने वाला है तो उससे दरहर से लोगों का आश्वासन देना है पर आश्वासन के साथ साथ ठीक होने के लिए पत्तिती भी देनी है तो इसलिए हम क्या बताये थे प्रहुपात जी ने लोगों का मारगधर्शन दिया मारगधर्शन किस तरह से है वो ऐसे डॉक्टर का एक ट्रीट्मेंट देनी के समान है तो डॉक्टर बताते है कि आप ये दवाई लो इससे आप ठीक हो जाएगे तो वैसे ही मारगधर्शन दे रहे हैं कि हम अंदर से शुद्ध है पर वह शुद्ध भाव है वह बार कैसे ला सकते हैं वह भकती की पंधती से ला सकते है पर साथ साथ जैसे कोई मरीद होता है उसको दवाई देनी चाहिए पर दवाई के साथ प्रोथसाहन भी देना चाहिए कभी कभी बिमार हो जाते है वागती तो अगर किसी भकत में कुछ गुण है तो ज़रूर का गुण गान करना चाहिए अभी गुण है नहीं भी पर जलग भी है उसका गुण का तो उस गुणों का भी गुण गान करने से क्या होता है विक्ति को प्रोथसाहन मिलता है जिस से कि वो अभी वो गुणों का और विक्सित कर सके है और दुसरी ओर से जब हम स्वयम अगर हमारा को एक गुण गान होता है तो हमें ऐसे नहीं सोचना चाहिए हाँ अभी मेरा ऐश्वर्ज में पता चल गया ऐसे भाव नहीं मिला चाहिए हम क्या देखना चाहिए कि गुण गान हमें एक प्रोथसाहन के रूप में देखना चाहिए हम देख रहे हैं कि इस वकार से मैं बगवान की सेवा में कुछ योगदान कर सकता हूं इसलिए मैं इस तरह से सेवा करने का प्रयास करूँगा तो इस तरह से हम देखेंगे तो वो गुण गान से हम अगर कोई हमारा गुण गान करता है तो हम उससे हमारा अहंकार नहीं बड़ेगा और जब हम दुसर गुण गान करते हैं तो उससे हम जाप पुरूसी नहीं कर रहे हैं तो जितनी हमारी बक्तों से आसक्ति बड़ती है बक्तों के समुधाएं में हम और अच्छी तरह से स्थित हो जाते हैं उतना हमारी भक्ती में भी हम प्रगती करते हैं क्योंकि जो हमारा भगवान से संवन्द है वो केवल भगवान से ही संवन्द नहीं होता है भक्तों से संवन्द जोड़ता है उससे भगवान से संवन्द जोड़ता है और यही परक है कनिष्ट अधिकारी में और मद्दिम अधिकारी में कनिष्ट अधिकारी होता है सिर्फ मंदिर में आता है दर्शन करता है और चले जाता है पर मद्दिम अधिकारी होता है वो भक्तों के महतू को समझता है और भक्तों से मैत्री करता है और मैत्री का एक प्रधान लक्षन है कि एक दुसरों के सराहना करना एक दुसरों को प्रोथसान देना और गुणगान की पढ़ती देते हैं तो यहाँ पर ब्राम्मन चित्रियों का गुणगान करते है और इससे कि वो चित्रियें जो हैं भौतिक जगत में रह रहे हैं और भौतिक प्रलोभनों से हर तरह के आगरुत हैं वो तो जब कोई धार्मिक व्यक्ति है, धार्मिक पत्तियों का गुणगान करता है तो बहुत चित्रियें लोग भौतिक धर्म में और प्रगतिशीर होने के लिए प्रोथसाहित हो जाते हैं और इस तरह से समाहाँच का कल्यान होता है तो साराँच में हमने आज देखा इस तरह से जो भागवतन की पहले स्कंट की पाशो भूई त्यार की जा रहे है परक्षित महराशी गुणगान बताने के लिए उनका पूर्वजोगा गुणगान बता जा रहा है, पांडबो का और फिर हमने दिखा की गुणगान और करना और चापलसी करना स्वार्थ कवा होता है तो हम दुसरों की परवाण नहीं करते दुसरों को एक आउजार के रूप में लेके खुद की जो चाहे पूर्वजोगा प्रयास करते हैं तो यहां मिठ्यांकार के स्थरपे, मानविय स्थरपे जो है कि हम दुसरों को सराहना करना जाते हैं तो उसके लिए दुसरों के प्रतिस्नेह हैं और उनका कुछ गुणगान करते हैं, प्रोथसान देते हैं और उससे उंचा है कि हम आत्याद्मिक स्थरपे देखते हैं कि जो हर एक विक्ति है तो भगवान का अंश है और भगवान के बक्ति में प्रदती करने के लिए संगर्श करना पड़ रहा है हर एक बक्ति को, तो हम सबको इससे को प्रोथसान देना चाहिए तो जो कमियों का आवर हैं, उसके परेज आकर हम जो अंदर से, जो सोना है, बगवान का आंश है हर एक बक्ति उसके किंद देकर, उसको पाहर लाने के लिए जैसे डॉक्टर मरीज को दवाई देता है और उसको प्रोथसान देता है वैसे हम बक्ति के बारे में लोगों को बताते हैं और बक्ति में प्रोथसाहित करते हैं तो इससे हम सब प्रगती कर सकते हैं बगवान के धाम के कुछ कोई सवाल है? हम बता रहे थे कि बक्त कितने दुरलब हैं और इससे हम जानते हुए भी कभी-कभी हम संवान नहीं दे पाते हैं तो क्या खारण है? और कैसे हमें प्रयास करना हैं? हम जानते हैं कि बक्त दुरलब हैं फिर भी हम बक्त को संवान नहीं दे पाते हैं इससे क्यों होता है? इसके वारिए हम क्या कर सकते हैं? वास्तमें जो कोई भी प्रकात प्रवृत्ति है उसका अनुशीलन करना होता है जो आदत है किसी आध्यात्मी तक्व को मन में रखने की उसका बार बार हम शर्मन करते हैं उसका मनन करने का प्रयास करते हैं तो उससे उसका अनुशीलन होता है तो कोई अगर भूल भी गए है तो कोई बात नहीं है जब संवान आ जाता है तो पुना हम उसको कारे कर सकते हैं तो पुना हम अपना जीवन में अमल करा सकते हैं ऐसे बता जाता है कि अगर कोई हवाई जहाज मेंगाव से बॉंबे जा रहा है तो 90% समय वो हवाई जहाज जा होता है वो रास्ते से गलत रास्ते में जा रहा होता है क्यों क्या होता है जब वो आस्मा से जा रहा है तो हवा का प्रवाह होता है कोई बादल होते है, कोई वातावरन प्रसुचे होती है तो वो हवाई जहाज कभी भी सीधे रास्ते पर जा नहीं पाता है तो फिर भी वो कैसे पहुँच जाता है बंबई क्योंकि वो जब समझ जाता है कि अभी थोड़ा गंत रास्ते पर जा रहा है तो पुनत सही रास्ते पर जा जाता है गंत रास्ते पर जा रहा है तो पुनत सही रास्ते पर जा जा जाता है इसलिए हम गाड़ी चला रहे होते हैं तो गाड़ी को स्टियरिंग वील पर पकड़ के रखते हैं क्यों कि वो जो होता है पकड़ेगे नहीं तो अपने अब गल्लग दिशा में चले जाएगे तो थोड़ा था वापस लाना पड़ता है वापस लाना पड़ता है तो उस तरह से क्या होता है हमारे मनी के पूरो प्रवक्ति के कारण हम गल्लग दिशा में चले जाएगे तो इससे हताश नहीं होना है इस अपेक्षित ही है पर इस अपेक्षित है पर इसका मतलग नहीं है कि ये अनिवार्य है वो होगा पर उसको हम ठीक कर सकते हैं जब हम समझ जाते हैं कि मैं भी गुम्रा हो गया हूँ तो फिर हम उसको पुना पलट सकते हैं उसको सही दिशा में आ सकते हैं तो ऐसे नहीं है कि अगर हम देखे के मैं गलत रास्ते में से ला गया है तो मैं छोड़ दो सब कुछ नहीं हम भले ही इतना गुम्रा हो कि उल्टा जाने लग गये फिर भी हम पुना मुढ के वापस आगे जा सकते हैं तो इसलिए ये मन की प्रवर्ती है उसके उसको कोई जादू से अपने आप परिवर्ति नहीं होने वाली है उसको हम अपेक्षित होना चाहिए कि वो गुम्रा करेंगे मुझे पर जैसे ही मुझे स्मर्ण में हो जाएगा तो पुना मैं सही रास्ते में आ जाओंगा और जितना हम ऐसे करेंगे तो दिरे दिरे वो सही रास्ते में हम रहे गे और तुर वो गुम्रा करने के परिवर्ति भी कम हो जाएगी पहुँत बहुत धन्यवाद ग्रंथ राज सिम्पा गुतम की स्रिल प्रभुपात की गाउर बख्त विल्ल की निताई गाउर प्रेमा नंदी