When a problem goes on for a long time and our attempts to solve it only aggravate it what should we do – Hindi?
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Transcript
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Thank you. The problem has been there for many years and we try to solve it. Our aim has been fulfilled but there is something more to be done.
So how can we save ourselves from God’s wrath? The reason for some problems is not only our situation. Sometimes some problems can’t be solved by us. So when we see the problems that I did this and this is the result.
Basically our actions are not the sole cause of results. Our work is not the sole cause of results. So our work is not the sole cause of results.
There are many other things in it. The most important thing is our previous karma. What is the meaning of previous karma? Suppose there is a doctor who performs an operation.
Doctors perform the operation properly. But while performing the operation the patient faces complications. And the patient’s condition gets worse.
The doctor has not performed the surgery wrongly. But he himself faces complications. So what happens? In a way, the doctor’s name gets ruined.
You have performed the surgery and it got ruined. It is possible that it is the doctor’s fault. But if it is not the doctor’s fault and the doctor has performed the surgery but there are complications.
Then what happens? Sometimes there are situations when our previous karma is not the sole cause of results. And when it is the sole cause of results then our intentions are not good. We don’t study according to that.
Problems arise. So when this is happening we should have at least this kind of courage. So what happens? I am trying.
It is happening slowly. What happens when the problem increases? Nothing. Nothing is going to happen.
It is not like that. The last thing God says कर्मन्देवादिकारस्ते मात्वलेखुददाच्छना मात्वलेखुददाच्छना योगा अगर आप इस तुष्चित आप देखते हैं पहला जा करें कर्मा में आपका अधिकार है पर फल से आसक्त मत करो क्यों? क्योंकि फल जो है केवल आपकी कर्मा से नहीं आ रहा है आपकी नियती भी उसका आपकी योगी नियती, आपकी what is destiny? दैवा दैवा भी उसमें सा योगी है इसलिए आप फल से आसक्त मत करो और क्यों फल है? मैंने कर्म किया है मैंने इतने अच्छी इरादे से इसके लिए आरखे क्यों फल का आसक्त मत करो? मत करो मैं क्योंकि मां कर्म फल हेतु है तुम मत समझो कि तुम भी इस फल के हितु हैं क्योंकि हम जरूर हम हितु है इस फल के पर हम एक हितु है इसके अलग भी हमारे परें भी कुछ और कार्य है कुछ और चीज़े है क्यों उस कर्म का फल करते है और तुम बोले है अगर मैं कर्म करने वाला हूँ फल मिलने वाला है तुम कर्म करने क्यों करते हैं तुम कर्म न करने से आसक न कर जाओ कर्म जो है यह तुमारा धर्म है यह तुमारा कर्म करने है वह अलग करते है तुम इसके मतन क्या है कि भले ही समस्या हो यह भले ही हमारे समस्या का हल करने का प्रयास हो समस्या बढ़ने हमें क्या देखना है कि यह समस्या हो यह समस्या ना हो मेरी पहचान हूँ मैं भगवान कर सकता हूँ और भगवान की सेवा के भाव में मैं जो भी काय करना है तो करना हूँ और फिर हमें पहसला करना है अगर हम यह सपच्च रखते हैं कि कुछ भी हो जाये समस्या बढ़ी हो चोटी हो समस्या चली जाये समस्या हमेशा के लिए रखे उससे काफी समय के लिए रखे उससे यह फर्त नहीं बढ़ने वाला कि मैं भगवान का सेवा करता हूँ तो अगर मैं समझ जाता हूँ कि भगवान का मैं सेवा करता हूँ तो अभी भी यह एक नाएन है कि भगवान की सेवा मैं इस तरह से कर सकता हूँ तो कभी कड़ी उस समस्या के साथ की जीवन कभी कभी वो समस्या से लूट चले जाना वो एक तरह से मैं सेवा कर सकता हूँ कभी कभी गुद को बदल लेना ताकि वो समस्या सहाल करे वो भी हो सकता है, मैं इसकी बारे में बता था जब भी समस्या चले जाना ती परिया होती है हमारे में एक है कि हम गुद को बदल लें और सहन कर ले दूसरा है कि हम परिशिपि को बदल ले और तीसरा है कि हम उस परिशिपि को चले ले तो इन थीनों परियाय एक तरह से हम सेवा भाव से कर सकते हैं और थीनों परियाय हम गुणा भाव से कर सकते है मतलब मैं खुद तो सहन कर रहा हूँ और सारा जो जो गुशा है क्रोध है उसको दबा कर रहा हूँ वो गुणा भाव से कर रहे थे तो पारे में वो सारा इस सोट होने बाद है मैं दूसरों को प्रियवत करने को प्रयास कर सकता हूँ और वो भी अगर क्रोध से करूँगा और गुणा से करूँगा तो क्या होगा उसका प्रतिक्रिया वो भी कर जाएगा या फिर मैं उससे दूर भी जाएगा हूँगा पर जब दूर जाएगा हूँगा तो क्या हो रहा है एक है इस प्रियस्तिस दूर जाना और दूसरा है एक है एक प्रियस्तिस दूर जाना और दूसरा है एक है एक प्रियस्तिस दूर जाना तो जब हम समस्य से दूर चले जाते हैं तो तभी हमारा क्या है कि मेरे जुन्य में बहुत कुछ करना है जिद्दगी वक्ते समस्या चेहे इसलिए मैं इसे दूर जाना हूँ पर जब हम दूर भागते हैं समस्या चेहें तो भी क्या हो रहा है हम तो जा रहे हैं समस्य से दूर पर हमारा मन उसमें फसा हुआ है और उस समय क्या है कि ये बचाना है कि इससे बड़ी भी और चीजे कुछ करनी है इसलिए मैं इसे दूर जाना हूँ इससे मैं भाग रहा हूँ, इससे दूर जाना हूँ तो हमारा मन अभी तो उसमें फसा हुआ है तो अगर हम सेवा भाव रखते हैं तो फिर हम उसके बारा पिचार कर सकते हैं कि मैं भगवान की सेवा किस तरह से कर सकता हूँ और फिर उस भाव से हम भगवान से प्राचन करते हैं मुख्टों से, मारोड प्राचन करते हैं पेसला कर सकते हैं हमें अभी क्या करना है तो समस्या से हमारी सेवा की जो पद्धती है वो बदल सकती है कभी-कभी कोई समस्या आ गई है मैं इस सेवा का बदल सकती हूँ सेवा का प्रूप बदल सकता है पर जो सेवा का उद्देश है वो नहीं बदलना सकता है अगर हम सेवा का उद्देश बनाए लगेगे तो भक्वान तदाओ नहीं होगा भक्वान मार्वणचने किस तरह से हम आधे बद सकते हैं