When our opinions come from our nature, how can we understand that the opinions of those with different natures can also be correct – Hindi?
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संक्षिप्त सारांश
हमारा जम्मत है, वो छोड़ना बड़ा मश्किल होता है। हम एक ही, जैसे हमारे सुभाव उसके नसरे में दुचार करते हैं। तो दुसरों का मत भी सही हो सकता है। यह हम कैसे हमल सकते हैं। रहनद सरोपरो प्रभाजी के वरिष शिष्य है, उन्होंने एक लेक लिखा है इस कौन के इतिहास के बारे में। वो बोलते है उसमें कि मियोफाइव दिबोटीज और कनिष्ट अधिकारी वो दूसरे भक्तों के बारे में बात करते हैं।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
हमारा जम्मत है, वो छोड़ना बड़ा मश्किल होता है। हम एक ही, जैसे हमारे सुभाव उसके नसरे में दुचार करते हैं। तो दुसरों का मत भी सही हो सकता है।
यह हम कैसे हमल सकते हैं। रहनद सरोपरो प्रभाजी के वरिष शिष्य है, उन्होंने एक लेक लिखा है इस कौन के इतिहास के बारे में। वो बोलते है उसमें कि मियोफाइव दिबोटीज और कनिष्ट अधिकारी वो दूसरे भक्तों के बारे में बात करते हैं।
मध्यम अधिकारी दूसरे भक्तों से बात करते हैं। मतलब मुझे लगता है कि इसने कुछ गलत किया है। तो जो कनिष्ट होते हैं वो क्या करते हैं?
उसने वो गलत किया बता है, उसने वो गलत किया, उसने वो गलत किया। और हम भी क्या करते हैं? एक दूसरे में बात करके नकारत भक्ता लिकालते रहते हैं।
नकारत मुझे बात करते हैं। करते हैं, तो कि हम कम से कम कुछ बात करते हैं जो नहीं करते हैं लेकिन अच्छा बात करते हैं। मैं इसको सही नहीं मानता, पर यह ऐसे दुच्चार क्योंं करते हैं, यह तो कम समझ में आ गया हूँ।
यह कभी कोई होता है कैसे सोच भी कोई सकता है, यह समझ नहीं होता है। तो ऐसे नहीं है कि सारे मकसमाल में हर चीज हमको स्विकारी करनी है, कि यह सही है, पर ठीक है, इस कारण तुम ऐसे सोचते हो, क्योंंकि मैं इसे कारण करता हूँ। तो बेहतर है कि अगर हमको समस्या होने किसी कोई किस्ता से कारण कर रहा है, किसी कामा किस्ता से, तो उनकी पास्चो भुमियां समझ सकते हैं, उनसे इस फश्टिकर्ण करके, उच्छित पढ़धि से फश्टिकर्ण करना है, तो उससे हम समझ सकते हैं कि विश्चार क्योंं कर रहा है।
और ज़रूरी नहीं है कि हर चीज को हमें, हर चीज में एग्रिमेंट की बात हमको सही लगने जाएगा। हम कमसे नहीं समझ सकते हैं कि ये कहां से आ रहे हैं। ऐसा विश्चार क्योंं आ रहे हैं कि मैंने, ऐसे मत कैसे हो सकता है।
उतना भी समझ जाया है ये, तो हम जी सकते हैं। तो इसलिए ये directly उससे फश्टिकर्ण करना अच्छी बात है। इससे पूछो, उससे पूछो, उससे पूछो, या इससे पूछो, इससे बात करो, उससे बात करो, उससे नकार पूछता भर जाता है।
अगर उनसे हम पूछ नहीं सकते हैं, तो उस व्यक्ति के वरिष्ट ऐसा कोई व्यक्ति, जो उनको भी जानते हैं, जो हमें भी जानते हैं, उनको जाकर पूछ सकते हैं। और उनसे थोड़े समझ प्राक्त कर सकते हैं। और इस तरह से हम अगर उनके दुरिश्टी को उनको समझने का प्रयास करते हैं, तो फिर उनका मद भी हम समझ सकते हैं।
और कहीं बार ऐसे होता है कि जो the spiritual is the goal of the cultural, is the goal of the social, is the goal of the intellectual, but the spiritual is not the same as the cultural, the social, the intellectual. मतलब क्या, जो आध्यात्मिक है, हमारी जो समाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक प्रहुत्ति है, उनके दौन हमको आध्यात्मिक प्राप्त करना है। पर हमारी जो, अभी मेरा बौद्धिक स्थर और किसी और का बौद्धिक स्थर अलग हो सकता है, मेरे सांस्कृतिक पार्श्यो भुमी और किसी और का सांस्कृतिक पार्श्यो भुमी अलग हो सकता है। तो इसलिए, वो किस पार्श्यो भुमी से आ रहे है, उससे उनका जुष्टी कोन काफ़ी बढ़ल सकता है।
तो इसलिए, वो पार्श्यो भुमी आ रहे हैं, समझें चाहिए, कि वो उनकी पार्श्यो भुमी बले ही अलग हो सकती है। उससे कारण, वह वही सत्य को दुसरी दुष्टी से देख रहे हैं। भक्तिन औटाको, चेथन शिक्षाम भुम बताते हैं, कि अगर हम परम सत्य को एक पहार के शिकर के रूप में देखते हैं, तो कहते हैं कि पातान्ज़े ने उसको शिकर को एक दुष्टी से देखा है, प्लेटोने उससे सत्य को दुसरी दुष्टी से देखा हो रहे हैं।
और उनकी दुष्टी से देखकर, उन्होंने अपनी संत्यकुति के अनुसार, अपनी भाषा के अनुसार, अपने समय के अनुसार, उसी एक परम सत्य का वर्ण किया है। तो यह परम सत्य के वर्ण के लिए तो ज्ञान का है और वही व्यावारिक ज्ञान में भी हम ला सकते हैं। कभी कभी ऐसे हो सकता है कि मैं एक पहाड है, मैं इस पहाड को इधर से देख रहा हूँ और वो उधर से देख रहे हैं।
और मुझे उधर से क्या देख रहा है पता ही नहीं, उधर से क्या देख रहा है मैं देख रहा ही नहीं उधर से। तो अभी शायब मेरे लिए ज़रूरी है, मैं उस व्यक्ति के साथ रहना है, काम करना है, तो मुझे महतर के पहाड के उस पास जाना पड़ेगा। और अगर वो ज़रूरी नहीं है मुझे इतना, तो फिर बैठेंगे, वो उस तरह से देख रहा है, चल।
वो उस तरह से देख रहा है, मैं इस तरह से देख रहा हूँ, हम आगे से करते रहते हूँ। तो जब किसी का मत हमें समझ में नहीं आ रहा है, तो ऐसे नहीं है कि हमें हमारा मत बदलना ज़रूरी है। इंग्लिस्स में कहते हैं कि हम आगे से देख सकते हैं।
कि हम इस मत में सहमत हैं, कि हमारा मत बेद हैं। यह तुमारा मत है, मेरा मत है। हम इसके नसारे दे रहे हैं।
तो कभी-कभी हम उनका मत समझने का प्रयास कर सकते हैं, कभी-कभी वो हमारा मत समझने का प्रयास करेंगे। और कभी-कभी अगर वो बहुत मतपूर नहीं है, तो फिर हमारा जीवन से अगर चला सकते हैं। और उसमें उनकी दुश्ट्यां में समझ सकते हैं, क्योंंकि वो कुछ एक और दुश्ट्यां को से देख रहे हैं।