When problems go beyond our tolerance limit we explode as per our past conditionings – how to deal with this (Hindi)?
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Lecture Summary
सारांश: सहनशीलता और हमारी क्षमता
- सहनशीलता की एक सीमा है: जिस तरह हमारे शरीर के वजन उठाने की एक निश्चित क्षमता होती है, उसी तरह हमारे मन की भी सहन करने की एक सीमा (Tolerance Limit) होती है। हम असीमित मात्रा में समस्याओं को सहन नहीं कर सकते।
- विस्फोट (Explosion) से बचें: जब हम अपनी क्षमता से अधिक सहन करते जाते हैं, तो अंततः हमारा धैर्य टूट जाता है और हम गुस्से या अपनी पुरानी प्रवृत्तियों के अनुसार गलत प्रतिक्रिया कर बैठते हैं।
- पूर्व-योजना और मार्गदर्शन: समस्याओं का बोझ जब सहनशक्ति के पार जाने लगे, तो हमें चुपचाप सहते रहने के बजाय पहले से ही योजना बनानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर किसी वरिष्ठ या अनुभवी व्यक्ति से सलाह-मशविरा करना चाहिए।
- समस्याओं का सही आकलन: सहनशीलता से हम छोटी समस्याओं को बड़ा होने से रोक सकते हैं। लेकिन जो समस्याएं सच में बड़ी हैं, उन्हें केवल सहन करने से काम नहीं चलेगा; उनके लिए व्यावहारिक समाधान ढूँढने की आवश्यकता होती है।
- बुद्धिमानी से कार्य करें: आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ केवल सब कुछ आँख बंद करके सहना नहीं है। जब जीवन या परिस्थितियों का बोझ बहुत अधिक बढ़ जाए, तो अपनी बुद्धि का प्रयोग करके उस बोझ को कम करना, उसे बाँटना या परिस्थिति में बदलाव लाना भी उतना ही आवश्यक और उचित है।
Full Transcriptions
सहनशीलता और हमारी क्षमता
जब हम कुछ सहन करते हैं, जब भक्ति में आते हैं, तो हम काफी चीजें सहन करना सीख जाते हैं। पर कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं कि वो सहन करने की क्षमता के पार चली जाती हैं, तो हम में कुछ विस्फोट (explode) जैसा हो जाता है। पूर्व प्रवृत्ति का कार्य करने के लिए हम प्रवृत्त हो जाते हैं। तो क्या सहन करते रहना चाहिए या पूर्व प्रवृत्ति का कार्य करना चाहिए? ऐसा नहीं है कि सहन करना ही सर्वोच्च सद्गुण है।
मन की प्रवृत्तियां और संतुलन
हमारे रजोगुणी मन की एक प्रवृत्ति होती है कि किसी चीज को महत्व देना है, तो सबसे महत्वपूर्ण मान लेना है; और किसी चीज को महत्व नहीं देना है, तो उसको नगण्य मान लेना है। ऐसा नहीं है कि ये जो दोनों एक्स्ट्रीम्स (extremes) हैं, जो अलग-अलग दिशाओं में कार्य कर रहे हैं, उनके बीच में हम संतुलन नहीं ला सकते हैं।
इसका मतलब क्या है? कि अगर हम कोई चीज सहन कर रहे हैं, तो फिर हम देख सकते हैं कि ‘ठीक है, इस परिस्थिति में मैं सहन कर रहा हूँ, यह सहन कर रहा हूँ, यह सहन कर रहा हूँ।’ तो सहन करना मतलब क्या? मान लीजिए कि हमारे अंदर से कोई शक्ति आ रही है। तो क्या होता है कि हमारा जो टॉलरेंस (tolerance) का भी एक मसल (muscle) होता है। हमारे टॉलरेंस मसल की भी एक फाइनाइट कैपेसिटी (finite capacity) होती है। मतलब हो गया है कि मैं कुछ वजन लेकर जाऊं।
हमारी सहनशक्ति की सीमाएं
ठीक है, मैं 10 किलो वजन ला रहा हूँ, तो देखते हैं 10 किलो हो गया है। और 5 किलो बढ़ा दो, 15 किलो बढ़ा दो, फिर और 5 किलो बढ़ा दो, 20 किलो हो गया है। और फिर ऐसे ही लोग थोपते जाएंगे और फिर 40-50 किलो हो जाएगा। मैं 10 किलो सहन करता हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मैं 100 किलो सहन कर सकता हूँ। तो यह हमारे शारीरिक स्तर पर है, तो हम आसानी से समझते हैं कि हम कितना वजन उठा सकते हैं। क्या हम असीमित मात्रा में वजन उठा सकते हैं? उसी तरह से हमारी सहन करने की शक्ति जो होती है, उसके लिए भी सीमा होती है।
और जैसे-जैसे हम अध्यात्म में प्रगति करते हैं, वह सीमा भी बढ़ती है, पर फिर भी हमारी सहन करने की शक्ति असीमित नहीं है। तो जैसे अगर मैं वजन उठा कर लेकर जा रहा हूँ और वजन बहुत बढ़ता जा रहा है, तो मुझे समझ में आता है कि ‘यह वजन बहुत बढ़ रहा है, मैं सहन नहीं कर सकता, मैं वो नहीं ले जा सकता हूँ।’
सही समय पर योजना और मार्गदर्शन
तो उस समय हम एक योजना करते हैं कि किसी और को बुला लेंगे, या किसी कुली को हायर (hire) कर लेंगे, या बोलेंगे कि ‘यह मैं बाद में लेकर जाऊंगा।’ तो हम एक योजना कर लेते हैं। उसी तरह से, जब हम देखने लगते हैं कि बात अभी मेरी सहनशीलता की शक्ति के परे जा रही है, तो तभी हमें पहले ही विचार करके कुछ योजना करनी चाहिए।
या किसी से सलाह-मशविरा करना चाहिए—किसी वरिष्ठ भक्त से, या किसी वरिष्ठ व्यक्ति से कि इस परिस्थिति में क्या करना चाहिए। अगर जिनसे हमें बहुत परेशानी है, तो हम चर्चा कर सकते हैं। प्रिवेंशन (prevention) करना मतलब क्या करना? अरे इसने ऐसे बोला, इसने ऐसे किया, यह ऐसे होगा… उसके कारण हम हमेशा चिड़चिड़े बन जाते हैं, हमेशा उद्विग्न रहते हैं और जो हम कर सकते हैं, वह भी नहीं कर पाते।
समस्याओं का सही आकलन
तो छोटी-छोटी चीजों को छोटा रखना है, वह सहनशीलता की देन है। तो हम छोटी चीजों को छोटा रख सकते हैं। पर ऐसा नहीं है कि सब चीजें छोटी हैं, कुछ चीजें बड़ी भी हो सकती हैं। और ऐसा नहीं है कि हम सहनशीलता से बड़ी चीजों को छोटी बना सकते हैं। कोई वजन छोटा है और कोई वजन बड़ा है। तो बड़े वजन को हम छोटा नहीं कर सकते हैं, वो बड़ा वजन बड़ा ही है।
मानसिक स्तर पर, हमारे मन के विचारों से हम छोटी समस्या को बहुत बड़ी बना सकते हैं, और सहनशीलता से हम छोटी समस्या को छोटी रख सकते हैं। पर कुछ समस्याएं बड़ी भी होती हैं और उसको उचित रूप से हमें सुलझाना पड़ेगा।
समय रहते उचित निर्णय लेना
तब यह उचित मार्ग क्या है, उसका हमें पहले ही विचार करके उसकी योजना करनी चाहिए। तो अगर हम देख रहे हैं कि यह समस्या आ गई, यह समस्या आ गई, अभी मैं थोड़ा इसके लिए उदास होने लग गया हूँ, चिड़चिड़ा होने लग गया हूँ या मुझ पर प्रभाव पड़ने लग गया है, तो हम पहले से उसको सुलझाने का प्रयास कर सकते हैं।
और कई बार समस्याओं का जो बोझ होता है, वह बोलने से भी सुलझता नहीं है, पर वो बोझ कम हो जाता है। कोई कहता है, ‘अच्छा कोई सुलझा रहा है, समझ रहा है मेरी बात।’ तो इसके बाद हमें कुछ मार्गदर्शन मिल सकता है कि इसे कैसे कम कर सकता हूँ।
आध्यात्मिकता और बुद्धिमानी से कार्य
तो ऐसा नहीं है कि हमें हमेशा सहनशीलता ही दिखानी है। या ऐसा नहीं है कि मैं सहनशील नहीं बन पाया, सहन नहीं कर पाया, तो पूर्व प्रवृत्ति का कार्य करने लग जाऊं। हम उसके बीच में भी आ सकते हैं। और जब सहनशीलता की सीमा के परे जा रहे हैं, तभी हम विचार करके एक उचित मार्ग निकाल सकते हैं।
तो ऐसा नहीं है कि सहनशीलता रखने के लिए या आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिए, हमेशा सहनशील ही रहना है। हमें कभी-कभी आगे बढ़कर कुछ परिवर्तन भी करना होता है, तो वो भी आध्यात्मिक मार्ग ही है। वो हम हमारे इम्पल्स (impulses) या हमारे वेगों के कारण नहीं करते हैं। हम हमारे विचारों के अनुसार, बुद्धि के अनुसार वो कार्य करते हैं।
पहले तो विचार करते हैं, समझते हैं कि यह जो वजन हो रहा है, बहुत ज्यादा हो रहा है, इसको मुझे कुछ कम करना पड़ेगा। एक व्यक्ति काफी वजन लेकर जा रहा है, जब वजन नहीं ले जा पा रहा है, तो सब वहीं फेंक देता है। पर पहले जब ज्यादा वजन हो रहा है कि ‘मैं उठाऊंगा नहीं’, तो उसको निकाल देता है, हम कुछ योजना कर सकते हैं।
ऐसा नहीं है कि हमें सहनशीलता के लिए सारी दुनिया का बोझ खुद ही उठाना है। जब बोझ ज्यादा हो रहा है तो आपको बस फेंक नहीं देना है। हम एक योजना करके, जब बोझ ज्यादा हो रहा है, तो कुछ अन्य लोगों को बोझ दे सकते हैं, कुछ कर सकते हैं, उसको सुलझा सकते हैं। तो ऐसे बुद्धिमानी से कार्य करके हम हमारी सहनशीलता की सीमा के परे जाने से पहले ही समस्या का हल कर सकते हैं।