When things go wrong – Hindi Ramayan lecture
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Lecture Summary
1. तनाव और नीयत (Tension vs. Intention): सीता माता द्वारा घबराहट में लक्ष्मण जी पर लगाए गए अनुचित आरोपों से यह सीख मिलती है कि तनाव में आकर लोग कई बार कड़वी बातें कह देते हैं। ऐसे समय में “शब्दों में नीयत नहीं ढूंढनी चाहिए” (Don’t see intention in tension)। क्रोध या डर में कहे गए शब्द किसी व्यक्ति का असली चरित्र नहीं होते, इसलिए उन्हें गंभीरता से लेकर रिश्ते नहीं तोड़ने चाहिए।
2. धर्म और कर्तव्यों का द्वंद्व: श्री राम द्वारा सीता माता का वनवास भेजना कोई व्यक्तिगत द्वेष या लोगों की बातों में आना नहीं था, बल्कि यह एक ‘राजा’ और एक ‘पति’ के कर्तव्यों के बीच का टकराव था। यह एक महान त्याग था जिसमें राम और सीता दोनों ने ही पीड़ा सही, लेकिन अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया।
3. पूर्व-कर्म और ‘भौतिक न्याय’: कई बार जीवन में बिना हमारी गलती के हमारे साथ बुरा होता है (जैसे राम-सीता का वनवास या वर्तमान समय में निर्दोष लोगों पर विपत्ति)। इसके पीछे केवल तात्कालिक परिस्थितियां नहीं, बल्कि कई बार पूर्व जन्मों के कर्म या कोई वृहद कारण जुड़ा होता है। केवल एक घटना को देखकर अपनी किस्मत, समाज या भगवान को दोष देना ‘अज्ञानता’ (Ignorance) है।
4. अन्याय का सामना कैसे करें?
- क्षमा (Forgiveness): यदि कोई कैकयी की तरह परिस्थिति या मोह के वश में आकर एक बार गलती करे, तो उसे माफ़ कर देना चाहिए (Forgive and Forget)।
- प्रतिकार (Resistance): यदि कोई रावण की तरह हवस या अहंकार में बार-बार जानबूझकर नुकसान पहुंचाए, तो सहने के बजाय अपनी सुरक्षा के लिए सीमाएँ (Boundaries) तय करनी चाहिए और न्याय के लिए प्रतिकार करना चाहिए।
5. परिस्थिति की स्वीकृति (Acceptance): जो चीजें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं (जैसे दूसरों की नकारात्मक धारणाएं या अचानक आई कोई विपत्ति), उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि इस परिस्थिति में हम सबसे सकारात्मक और बेहतर कार्य क्या कर सकते हैं, क्योंकि समय के साथ परिस्थितियां भी बदलती हैं।
Full Transcriptions
जब कुछ बुरा होता है: रामायण से जीवन की सीख
हरे कृष्णा! हम यह चर्चा करेंगे कि जब कुछ बुरा होता है (When bad things happen), कि जब बुरी चीज़ें हो जाती हैं, तो फिर किसको दोषी न दें? कुछ दोषी न दें, और उससे महत्वपूर्ण है कि क्या करना चाहिए। और जो प्रसंग हम चर्चा करेंगे, वो है सीता माता का अपहरण।
अभी रामायण में दो प्रसंग हैं जिसके दौरान बहुत ही… जो कहानी है उसमें अचानक परिवर्तन होता है। पहला प्रसंग कौन सा है? ये राम जी का वनवास। वो राजकुमार से राजा बनने वाले थे और एकाएक क्या हो गया? उनको वनवास में भेज देते हैं। और वनवास में गए, कितने साल का वनवास था? चौदह साल। चौदह साल का था और फिर लगभग 12-13 साल लगभग खत्म हो गए थे, साढ़े 12 साल लगभग खत्म हो गए थे। और ये एक ही साल बचा था। अब तभी मारीच और रावण द्वारा सीता का अपहरण हुआ। अगर तभी सीता-राम भी वापस आ जाते… तो अभी जब ये हुआ तो हम देखेंगे क्या प्रसंग था, कैसे हुआ, और फिर उसके बाद में हम थोड़ी चर्चा करेंगे कि जब भी कोई बुरी चीज हो जाती है तो सब लोग एक दूसरे को दोष देने लगते हैं— “तुमने ऐसे किया, तुमने ऐसे किया, तुमने ऐसे किया।”
और जब कोई बुरी चीज होती है तो इतना आसान नहीं है स्पष्ट रूप से यह फैसला करना कि ये किसकी गलती है। तो हमें कैसे एक सकारात्मक रूप से कार्य करना चाहिए, उसके बारे में हम आज चर्चा करने का प्रयास करेंगे।
शूर्पणखा और खरदूषण का प्रसंग
तो अभी ये जो प्रसंग की शुरुआत होती है, वो होती है कि अभी श्री राम वो अयोध्या से वनवास होता है उनका, तो चित्रकूट में आकर रहते हैं। चित्रकूट आने के बाद राम नाम… चित्रकूट के पर्वत में रहते हैं, और फिर उसके बाद में वनवास का समय आगे बढ़ता है। फिर वे दंडकारण्य में आते हैं और यहाँ पे पास में जनस्थान नाम की जगह होती है। जनस्थान में यह होता है, रावण का एक आउटपोस्ट (Outpost) होता है। वो राक्षसों की एक जगह होती है जो उन्होंने कंट्रोल की होती है।
अब इसके नीचे किष्किंधा होता है। किष्किंधा का राजा कौन होता है? वाली होता है, जो वानरों का राजा होता है। पर वानरों और राक्षसों की संधि हुई होती है। उसके कारण इस इलाके में रावण को एक जगह वहाँ पे दी होती है। तो जनस्थान में वहाँ पे खरदूषण थे और उसके साथ शूर्पणखा थी। तो अभी शूर्पणखा इधर-उधर घूम रही होती है और वहाँ देखती है कि उसको कुछ मानवों के पास आना है, उसका मन करता है, वह उनकी तरफ बहुत आकर्षित रहती है। तो फिर वह आती है इधर, और जैसे ही वह राम को देखती है तो क्या होता है? उसके लंच बॉक्स के लिए नहीं, उसके लव इंटरेस्ट (Love Interest) के लिए होती है! जो खाने वाले नहीं होते हैं, वह वासना से उनकी तरफ देखती है।
पर फिर वह पूरा प्रसंग होता है। फिर वह सीता पे आक्रमण करती है। वह सोचती है कि राम जी उसको नहीं बोल रहे हैं क्यों? क्योंकि सीता है। लक्ष्मण नहीं बोल रहे हैं, तो कारण सीता ही है। तो सीता पे आक्रमण करती है। तो तभी श्री राम जी उसको रोकते हैं। फिर इसके बाद में उसने अपने भाई खरदूषण को बताया कि “मुझ पर आक्रमण किया”, और श्री राम ने अकेले सब का संहार कर दिया।
रावण का क्रोध और अकम्पन का सुझाव
फिर इसके बाद में उनका… खरदूषण की पूरी सेना में से एक ही सैनिक बचा था, उसका नाम था अकम्पन। उसका नाम था अकम्पन, पर वो कम्पन करने लग गया! वो कांपने लग गया था डर से। और फिर वो जाके उसने रावण को बताया क्या हुआ। रावण बड़ा क्रोधित हो गया, “नहीं, मैं बदला लूँगा!”
फिर अकम्पन ने कहा कि “मैंने देखी राम की शक्ति, ऐसी शक्ति किसी में नहीं देखी! मैं लगता… पर मैं तो डरा हूँ। राम की शक्ति किसी से नहीं…” पर रावण को वरदान था, जो उसको वर मिला था, उसको मानवों से संरक्षण नहीं था। पर एक युक्ति है: “आप सीता का अपहरण करो।”
वो कर लोगे तो उसका क्या विचार था कि ये राम तो वनवास में आया है, पर जंगल में वो अपनी रानी को ले कर आया है, इसका मतलब है अपनी रानी से बहुत आसक्त है। “अगर उसका आप अपहरण कर लोगे तो उस आसक्ति के कारण वो बहुत कमजोर हो जाएगा, फिर उसको मारने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।”
मारीच और शूर्पणखा द्वारा रावण को उकसाना
तो रावण मारीच के पास गया। मारीच ने देखा… मारीच ने रावण को उकसाने पर उपदेश दिया है: “राम ऐसी शक्ति है, उसके सामने जाओगे, तुम्हारा पूरा विनाश हो जाएगा। उससे दूर रहो।” तो मारीच की ये बात सुनकर रावण शांत हो गया और लौट के आ गया।
उसके बाद में शूर्पणखा गई। और शूर्पणखा ने तभी रावण को उकसाया। और उकसाया कैसे? वही… “तुम्हारी बहन का अपमान हो गया, तुम यहाँ पर कुछ नहीं कर रहे हो, तुम कैसे राजा हो? तुम नारी को संरक्षण नहीं दे सकते?” तो पहले से अपमान किया, उसके बाद उकसाने का प्रयास किया: “मैं तुम्हारे लिए गई थी! मैं तुम्हारे लिए गई थी वहाँ पर! जो सीता है, उसका सौंदर्य ऐसा है कि वो सौंदर्य देख के मैं सोची कि ये तुम्हारी रानी हो जाए। उसको तुम्हारे लिए प्राप्त करने के लिए…”
तो अभी क्या होता है, इस दुनिया में झूठ होते हैं, पर सत्य होता है। पर सबसे खतरनाक झूठ जो होता है, वो सत्य का उल्टा नहीं होता है, वो सत्य से शुरू होता है, सत्य पे अंत होता है, पर बीच में पूरा झूठ होता है। तो क्या होता है, उसको झुठलाना मुश्किल होता है, वैसे उसको रिफ्यूट (Refute) करना मुश्किल होता है। तो जैसे ही वो सीता का सौंदर्य बताने लगी, तो रावण की वासना फिर जाग्रत हो गई और उसने फैसला किया “मुझे सीता को प्राप्त करना ही है!”
मारीच का स्वर्ण मृग बनना और सीता का आकर्षण
फिर वो मारीच के पास गया। और मारीच सहम गया वापस, कि रावण आ गया है। उसने कहा कि “तुम मुझे सीता को प्राप्त करने में मदद करो।” रावण ने कहा, “मैंने आपकी बात मान ली थी…” मारीच ने सोचा कि “अगर मौत आ ही गई है, तो बेहतर है रावण के हाथों मरने से, राम के हाथों मरुँ।”
तो ये एक तरह से क्या है? अच्छा विचार ही है कि राम के हाथों मरुँ तो थोड़ा कल्याण होगा। पर क्या है, वो ऐसी मृत्यु में भी वो स्वार्थ देख रहा है। वो राम के हाथों मरना चाहता है, पर वो रावण के निमित्त राम के खिलाफ बन गया है। तो इसमें हम किसके हाथों के औजार बन रहे हैं? तो स्वार्थी कल्याण है इसमें। औजार बन रहे हैं, वो विचार कर रहे हैं ‘मृत्यु के बाद क्या मिलने वाला है, अच्छी गति मिल जाएगी’। पर फिर भी क्या है? वो सेल्फिश (Selfish) है।
तो अभी मारीच जाता है हिरण के रूप में। स्वर्ण मृग के रूप में बड़ा ही आकर्षण होता है। सीता अपनी कुटिया में होती है, खिड़की से देखती है। तो वो खिड़की से देखती है, तो कहती है, “राम! लक्ष्मण! आओ यहाँ पर!” कितना सुंदर है यह। इतना देखने के लिए… बड़ा आकर्षण होता है। वो कहती है कि “राम, यह जो हिरण है तुम ले के आ जाओ। अगर यह आ जाएगा तो फिर हमारा यहाँ पर एक पेट (Pet) के रूप में रहेगा, मनोरंजन हो जाएगा। अगर वापस जाएंगे तो कौशल्या माँ को हम यह जो हिरण है वो एक जंगल से मेमेंटो (Memento), एक भेंट के रूप में देंगे।”
तो अभी क्या यह सीता माता की इच्छा को हम गलत कह सकते हैं? उसमें कुछ गलत तो था नहीं। स्वाभाविक इच्छा है। और वो भी जो गलत हुआ, जो भी हुआ उसके कारण… सीता की डिज़ायर (Desire) कोई बड़ी बात नहीं मांग रही थी। और वो भी क्या, सेल्फलेस (Selfless) भी थी, कि “कौशल्या माँ को भेंट देंगे।”
लक्ष्मण का संशय और राम का निर्णय
फिर अभी लक्ष्मण ने कहा, “नहीं, यह अच्छा नहीं है, यह सत्य नहीं हो सकता है। ऐसा हिरण इतना सुंदर मैंने कभी देखा नहीं है। यह मुझे लगता है, यह कोई माया है।” सीता ने कहा, “तुम्हारा मन बड़ा संशयी है! इतना सुंदर हिरण है।” राम जी से कहा: “तुम्हें लाने की इच्छा है?”
अभी श्री राम सोच रहे थे कि “सीता ने मेरे लिए इतना त्यागा है, जंगल चुना, राज का ऐश्वर्य छोड़ के आई है, तो मैं जरूर लाऊंगा।” इसलिए श्री राम सोच रहे थे। तो अभी राम जी जब वो हिरण के पीछे गए तो क्या वो गलत कह सकते हैं? नहीं, वो क्या है, एक रेसिप्रोकेशन (Reciprocation) है। सीता ने जो उनके लिए किया था उसके लिए रेसिप्रोकेशन है।
फिर इसके बाद में वो हिरण के पीछे जाने लग गए, जाने लग गए। और जैसे ही वो हिरण के पास में आते तो अचानक वो हिरण अगली बार दूर हो जाता। अब इतना दूर गए, तो साधारणतया जो हिरण है, उसका ऐसा स्वभाव नहीं है। और इससे राम जी भी थोड़ा समझे कि लक्ष्मण ने ठीक बोला था, शायद ये कुछ राक्षस की माया है।
कि “अब मान लो कि मैं इसे मार ही देता हूँ…” तो राम जी ने उसे मार दिया। तो मारीच मरते हुए क्या बोला? राम जी की ही आवाज में बोला: “हा सीते! हा लक्ष्मण!”
चिंता (Anxiety) और अपराधबोध (Guilt)
अब दो चीजें हैं, कि जिनसे हम प्रेम करते हैं वो खतरे में हैं। और वो एक कैसे होता है कि जो एंग्जायटी (Anxiety) होता है, चिंता होता है। यहाँ पे सीता की जो भावना थी वो क्रिटिकल एंग्जायटी (Critical Anxiety) थी, और वो एक गिल्ट (Guilt) भी था थोड़ा सा। एक है कि ‘Ram is in danger’ कि राम खतरे में हैं, वो उससे स्वाभाविक चिंता होती है। पर कैसे है कि ‘I sent him into danger’ कि मेरे निवेदन के कारण वो उस खतरे में गए। तो उससे क्या होता है, चिंता और बढ़ जाती है।
और फिर वो सीता लक्ष्मण से कहने लगी “तुम जा क्यों नहीं रहे हो? राम बुला रहे हैं, तो राम खतरे में ही हो सकते हैं!” लक्ष्मण ने कहा: “यह कोई षड्यंत्र है! यह राम की आवाज नहीं है, मायावी आवाज है। मैं मेरे भाई को जानता हूँ, मैं उनकी आवाज पहचानता हूँ। यह कोई मायावी षड्यंत्र है और राम जी ने कहा है कि मुझे तुम्हारा संरक्षण यहाँ पर करना है।”
अब यह सुन के तो सीता और चिंता में आ गई, “मेरे कारण राम खतरे में चले गए हैं, और मेरे संरक्षण के कारण उनका बचाव नहीं हो पा रहा!” बोलीं, “लक्ष्मण तुम जाओ! मुझे यहाँ पर कुछ नहीं होने वाला है। राम को कुछ होने वाला है! तुम यहाँ पर रहो, मुझे तुम्हारे संरक्षण का आदेश है…”
जब हम डिस्टर्ब (अशांत) होते हैं
कभी क्या होता है कि जब एक व्यक्ति बहुत विचलित है, तो हमारा भाव होता है कि उस व्यक्ति को शांत करना है। तो हम शांत रहते हैं, उनको शांत करने का प्रयास करते हैं। तो कभी-कभी क्या होता है कि जब हम डिस्टर्ब (Disturb) होते हैं और हम जब डिस्टर्ब हुए हैं, दूसरे को कुछ बोलते हैं। और वो डिस्टर्ब नहीं होते हैं, तो उससे हम और ज्यादा डिस्टर्ब हो जाते हैं।
कि “तुम इस मेरी बात सीरियसली क्यों नहीं ले रहे हो? कि ये सीरियस बात थी, सीरियस बात है, तुम क्यों सीरियस नहीं ले रहे हो?” तो क्योंकि दूसरा व्यक्ति शायद हमको शांत करने का प्रयास कर रहा है, और हम ज्यादा अशांत हो जाते हैं। तो उसकी शांति से हमारी अशांति और बढ़ जाती है। तो अभी इसमें कैसे हो गया, “आप लक्ष्मण, राम के लिए क्यों नहीं जा रहे हैं? आप लक्ष्मण के लिए क्यों नहीं जा रहे हैं?”
तो फिर जब हमारा मन विचलित हो जाता है, तो हम क्योंकि हम प्रयास कर रहे हैं कि यह व्यक्ति ऐसा क्यों कर रहा है? जब समझ में नहीं आता है, तो हम किसी न किसी कारण को समझने का प्रयास करते हैं।
सीता का आरोप और लक्ष्मण का जाना
तो तभी जो होता है, सीता माता कहती हैं कि “मुझे पता है तुम क्यों नहीं जा रहे हो! पहले से तुम्हारी मेरे ऊपर बुरी नज़र है। तुम्हारी इच्छा है कि तुम मुझे प्राप्त करो। और अगर राम जी की मृत्यु हो जाएगी तो फिर तुम्हारी हवस पूरी होगी।”
नहीं! लक्ष्मण के मन में ऐसा विचार कभी था भी नहीं। और शायद सीता के मन में भी ऐसा कोई विचार नहीं आया था। तो तभी क्या हो गया? परिस्थिति ऐसी थी कि उसमें सीता ने ऐसा अनुचित आरोप कर लिया। लक्ष्मण सहन नहीं कर पाए: “क्या बोल रही हो? इसमें रत्ती भर सत्य नहीं है, तुम ऐसे कैसे बोल सकती हो?”
तो सीता को इतनी राम जी की चिंता थी उनके मन में, वो कह रही हैं कि “तुम तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं कर पाओगे, मैं सती जल जाऊंगी, तुम मुझे कभी प्राप्त नहीं कर पाओगे, तुम्हारी हवस कभी पूरी नहीं हो पाएगी।”
तो अभी लक्ष्मण जी सोचने लगे कि लक्ष्मण के लिए बहुत सीरियस बात हो गई। “राम जी बोले कि सीता की रक्षा करते रहो… जाऊं यहाँ से?” फिर दोनों छोड़ के आते हैं, दौड़ के आते हैं। तो राम ने अब एक्सपेक्ट (Expect) कर लिया है।
तो अभी जब लक्ष्मण और राम लौट के आते हैं और जब वो देखते हैं कि सीता नहीं है, तो क्या लक्ष्मण सोचते हैं कि “तुमने मुझ पर ऐसा आरोप किया, जो हुआ अच्छा ही हुआ”? नहीं, ऐसा बिल्कुल विचार नहीं होता है।
शब्दों में नीयत मत ढूंढो (Don’t see intention in tension)
क्यों? भले ही शब्द बहुत कटु होते हैं, दर्द देने वाले होते हैं, पर एक हमें समझना चाहिए कि टेंशन में कभी-कभी लोग कुछ बोलते हैं। परिस्थिति ऐसी हो जाती है कि टेंशन होता है और वर्ड्स स्पोकन इन टेंशन (Words spoken in tension)—जब टेंशन में कोई बोल रहा होता है, तो ऐसे शब्दों में डोंट सी इंटेंशन (Don’t see intention)। जब कोई टेंशन में कुछ बोल रहा होता है, तो वो उस व्यक्ति का चरित्र नहीं है। कभी-कभी परिस्थिति ऐसी होती है, कोई कुछ बोल देता है, उसको ज्यादा बुरा मानने की जरूरत नहीं है।
अमेरिका का एक संस्मरण: पिता और पुत्र
तो मैं अमेरिका में एक भक्त के घर रह रहा था। वो जो बेटा था, उनके माता-पिता भी वहाँ पे थे। तो वो बेटा मुझे बता रहा था: “मैं अमेरिका आ गया तो मेरे पिताजी और माता को भी यहाँ लेकर आ गया।” अभी माता-पिता को अमेरिका में इमिग्रेट (Immigrate) कराना बहुत मुश्किल है। जो नौकरी कर रहा है उसको भी परमानेंट वीज़ा (Permanent Visa) मिलना मुश्किल है। उसने बड़ी मेहनत कर के लाया था।
“मेरे पिताजी मुझ पर बहुत क्रोधित रहते हैं, वो कुछ चेहरा दिखाते हैं। और मेरी माँ बचपन में ही गुज़र गयी थी। जब मैं 10-15 साल का था, तो गुज़र गयी थी।” तो मैं पिताजी से बात करने लग गया। तो पिताजी ने मुझे बताया कि “जब इसकी मां गुज़र गयी थी, तो इसके बाद में इसका दसवीं का एग्जाम (Exam) था। और इसने मुझे कहा था कि मुझे पढ़ाई करनी है। और फिर वो रात को लेट तक पढ़ाई कर रहा था। तो मैंने उसको उठाया, सुबह एक बार उठाया, पर वो रात को उठा नहीं। मैंने उसको सोने दिया। मुझे लगा कि थोड़ा सोएगा तो फिर एग्जाम में जाएगा, नींद पूरी रहेगी तो अच्छा परफॉरमेंस कर पाएगा। तो वो लगभग दो-ढाई घंटे बाद उठा और मुझ पर इतना गुस्सा हो गया! वो कहने लग गया कि ‘माँ की तरह तू भी मर गया होता तो अच्छा होता’!”
पिताजी बोले, “मुझे तब से… तब से मैं उसको चेहरा नहीं दिखाता हूँ।” पर जो मुझे समझें कैसे नहीं? फिर जब मैंने उस बेटे से बात किया, फिर उसने मुझे बताया: “मेरी ऐसी कोई भावना नहीं थी! मैं तो सोचता था कि मेरे पिताजी दुखी हैं कि मेरी माँ गुज़र गई है। मैं सोचता था कि अगर मैं एग्जाम में अच्छे मार्क्स लाऊंगा तो उससे मेरे पिताजी को प्रसन्नता मिलेगी। इसलिए मैं बहुत मेहनत करने का प्रयास कर रहा था।”
तो क्या हुआ था कि हम कह सकते हैं ऐसे वचन बोलने नहीं चाहिए, यह बात सही है। पर क्या हुआ था कि वो तो मैंने उससे पूछा, वेरीफाई किया कि “उसके बाद में क्या उसने ऐसा कार्य किया कभी जिससे लगे कि वो आपका आदर नहीं करता है? आपसे स्नेह नहीं करता है?” तो कभी-कभी परिस्थिति में ऐसे वचन बोल दिए जाते हैं, तो उनको ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। यह मुश्किल है। तो अभी ये कैसे है कि इसलिए अभी कर्तव्य करने के लिए क्या मुझे करना चाहिए, उसका हम विचार कर सकते हैं।
धर्म और कर्तव्य का द्वंद्व
कोई कहे प्रकृति बड़ी क्रूर है, निष्ठुर है, और राम उसके एक हेल्पलेस विक्टिम (Helpless victim) हैं। ऐसे नहीं है। दोनों एक तरह से बड़ा क्या होता है… तो उसी तरह से जो दशरथ-राम के बीच में हुआ है, वही राम-सीता के बीच में हुआ है। तो अभी ये क्यों हुआ, उसका हम कुछ अगर समझ सकते हैं कि ‘वचन दिया है तो वचन पूरा करने जाना है’। तो वो जो सांस्कृतिक परिस्थिति थी उसमें जब राम ने सीता को भेज दिया, महल से बाहर, तो वो क्या सांस्कृतिक परिस्थिति थी, वो अलग थी।
उस समय राम के दो कर्तव्य थे: एक था एक पति के रूप में, दूसरा था राजा के रूप में। तो अभी ऐसे नहीं है कि राम ने सीता को निकाल दिया है, या किसी और रानी को ले आए हैं। अगर राम जी ने सिर्फ इसलिए सीता का त्याग किया कि लोगों ने आरोप किया… पर अगर वैसे ही होता, तो फिर राम जी ने सीता को सब्स्टिट्यूट (Substitute) क्यों नहीं किया? वो तो बड़े राजा थे, सीता तो कभी मिलती नहीं।
तो क्या है कि जो कभी ऐसा हो जाता है एक ही व्यक्ति के बहुत कर्तव्य होते हैं। मान लीजिये हम कोई नौकरी कर रहे हैं, हमारा ऑफिस में बड़ा इम्पोर्टेन्ट मीटिंग है, और हमारे बच्चे का स्कूल में परफॉरमेंस है (ड्रामा में)। तो ऑफिस की मीटिंग में जाएँ, या हम स्कूल में जाएँ? दो धर्म हैं, और वो दो अलग-अलग दिशा में खींच रहे हैं। तो कभी-कभी ऐसा हो जाता है।
तो राम जी के लिए क्या था, एक धर्म था पति का, और उनका धर्म था राजा का। तो ये जो धर्म थे, वो उस संस्कृति में… अभी रामायण में, जो रामायण का आदर्श है, जो सदियों से सीखा गया था। अगर हम पुराणों में देखते हैं, तो इंडिया में काफी जॉइंट फॅमिली स्ट्रक्चर स्ट्रांग (Joint family structure strong) है। अगर सदियों में लोगों ने रामायण से इंस्पिरेशन लिया है— “किसी पर कुछ भी आरोप आ रहा है, उसको छोड़ दो निकाल दो”— तो ये इंस्पिरेशन नहीं है शास्त्रों में। अब यह उदाहरण बताता है कैसे, किस तरह से राम जी ने धर्म का आदर्श पालन किया, कैसे लक्ष्मण ने राम का साथ दिया। वो आदर्श है। राम जी का त्याग महान है।
त्याग और पूर्व जन्म के कर्म
पूरे रामायण में सैक्रिफाइस (Sacrifice) का वर्णन है। उसका जो क्लाइमेक्स का सैक्रिफाइस है, उनका सैक्रिफाइस है। और देखें तो सीता को जब वनवास जाने को बोला गया। पर मैं दो चीज़ समझता हूँ कि उसको सीता का वनवास कह सकते हैं, पर एक्चुअली वो वनवास नहीं है। मतलब क्या साधारण वनवास होता है कि महल से बाहर बिना किसी सहारे के रहें। पर यहाँ पर क्या था, वो वाल्मीकि आश्रम जाना था और वाल्मीकि आश्रम राम जी के राज्य में ही था एक तरह से। तो इन्डायरेक्टली वो राम के संरक्षण में ही था। पर यह पति के रूप में नहीं था, पर यह एक राजा के रूप में संरक्षण था।
और तो यह एक त्याग की बात है। और यह त्याग जो था, जैसे दशरथ महाराज और राम दोनों उससे दुखी थे, पर परिस्थिति के कारण उनको करना पड़ा। वैसे ही राम और सीता दोनों दुखी थे। राम ने सीता को रिप्लेस (Replace) नहीं किया। सीता भी दुखी थी पर सीता ने कभी राम जी की भक्ति कम नहीं की। ऐसे नहीं कि कोई डाइवोर्स (Divorce) हो जाता है। दुख तो था पर क्या है कि वो परिस्थिति के कारण है। हम अपने कल्चरल स्टैण्डर्ड (Cultural Standard) से उस कल्चर को एग्जामिन (Examine) नहीं कर सकते।
परिस्थिति अलग होती है और इसके परे भी कई और कारण हैं। ये जो है मेन कारण ये नहीं है, वो सैक्रिफाइस का होता है। और उसके परे से बताता है कई बार ऐसा होता है कि जब हमारी इमीडियेट (Immediate) परिस्थिति से कुछ समझ में नहीं आता है, तो हमें क्या देखना है? कुछ पूर्वजन्मों के कर्मों का प्रभाव।
रामायण में एक कहानी आती है कि बहुत पहले एक देवता और असुर में युद्ध हो रहा था। तभी एक असुर ने एक ऋषि का आश्रम देखा। ऋषि वहाँ नहीं थे। तो उसकी पत्नी ने उस असुर को आश्रम में आश्रय दिया। तो उस असुर ने तपस्या की थी, बहुत क्रूर था। जब विष्णु उसके पीछे गए, तो उसकी पत्नी ने उस असुर को आश्रय दिया।
विष्णु ने कहा कि “ये असुर बड़ा खतरनाक है तो बाजू हट जाओ, मुझे इस असुर को मारना है।” तो उसने कहा, “ये मेरे आश्रम में आया है तो मैं इसको नहीं दूँगी।” विष्णु ने देखा कि “ये असुर को इस समय नहीं मारा तो ये सारे विश्व का संहार कर देगा।” बड़ा युद्ध हुआ। तो विष्णु को, उस असुर को मारने के लिए, उस ऋषि पत्नी को मारना पड़ा।
ऋषि आ गए, तो उन्होंने शाप दिया। विष्णु को शाप स्वीकार करने की जरूरत नहीं है, वे भगवान सर्वशक्तिमान हैं। पर एक धर्म का उदाहरण दिखाने के लिए उन्होंने उस शाप को स्वीकार किया। तो इस जन्म में जो अन्याय लगता है, उसके पूर्व जन्म में कुछ कहानी भी होती है। राम जी ने जो सीता के साथ किया, वो कहना बहुत डिस्टॉर्टेड (Distorted) सत्य है। परिस्थिति ने दशरथ और राम दोनों के साथ अन्याय किया है। परिस्थिति ने राम और सीता दोनों के साथ अन्याय किया है।
अन्याय का सामना और क्षमा करना (Forgive and Forget)
परिस्थिति अगर कोई किसी के साथ अन्याय करती है, तो जिसके साथ अन्याय होता है उसने फिर वो चीज़ में कैसे रिस्पॉन्ड (Respond) करना चाहिए? जो अन्याय होता है तो अभी कैसे साथ देखें कि राम के साथ कैकयी ने किया, वो अन्याय था। पर राम जी ने देखा कि कैकयी अंदर से बुरी नहीं थी, परिस्थिति हावी हो गई, माया में आ गई, मोह में पड़ गई। अगर कोई एक बार बड़ी गलती करता है, तो फिर उसको जिंदगी भर सजा नहीं देनी चाहिए।
और जो रावण ने किया, वो एक बार की गलती नहीं थी, वो बहुत पहले से हवस का शिकार था। पर राम जी ने बहुत बार क्षमा किया था। जो अन्याय होता है, तो वो व्यक्ति का एक्शन (Action) देखना है जिसने अन्याय किया है, और उसका इंटेंशन (Intention)/कैरेक्टर देखना है। क्या वो एक बार की गलती है, या बार-बार है?
अगर वन टाइम (One Time) हो गया है, तो फॉरगिव एंड फॉरगेट (Forgive and forget)। सब तो गलती करते हैं, तो उसको ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए। और अगर बार-बार ऐसे ही कर रहा है, तो फिर हमें कुछ तो करना चाहिए प्रोटेक्शन के लिए। बदला लेना जरूरी नहीं है, पर न्याय/प्रतिकार करना चाहिए। एक सीमा (Boundary) रखनी चाहिए: “ठीक है, मैं तुम्हारे साथ यह नहीं करूँगा, ऐसे नहीं करूँगा, हम यह बिजनेस साथ में नहीं करेंगे, हम साथ में नहीं रहेंगे।” जो एक बार की गलती है, या बार-बार गलती है। जानबूझकर गलती की थी, वो देखकर परिस्थिति को समझ कर हमें कार्य करना चाहिए।
भौतिक न्याय और सामाजिक धारणाएँ
वो हमारे कर्म के वजह से हमें वो रिजल्ट (Result) मिल रहे हैं। कैसे है कि हर पल, हर जगह में, इस जगत में अलग-अलग सोशल कंडीशनिंग (Social Conditioning) होती हैं, परिस्थितियां होती हैं। कैसे है कि ‘एवरीथिंग ट्रेडिशनल’ (Everything Traditional)— जो भी ट्रेडिशनल है, रीति-रिवाजों से चला आ रहा है, ‘एवरीथिंग ट्रेडिशनल इज नॉट स्क्रिप्चर’ (Everything traditional is not scripture)। यह अधिकांश लोग जन्म से ही मान लेते हैं, पर शास्त्र बताते हैं कि यह पूर्व कर्म से है। कई बार जो ऐसी परिस्थितियां हमें सामना करनी पड़ती हैं, समाज में कुछ रीति-रिवाज़ होते हैं, कुछ पद्धतियां होती हैं, वो सब शास्त्र के आधार पर हैं यह जरूरी नहीं है।
दूसरा है कि अभी जब किसी के जीवन में कुछ बुरा होता है तो क्या… अलग-अलग लोगों की उसके लिए अलग-अलग धारणाएं होती हैं। और वो अपने-अपने धारणा में किसी को दोष देते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि “मेरी किस्मत ही बुरी है”, “हम इस शहर में आ गए इसलिए बुरा हुआ”, “ये परिवार ऐसा है”, “ये व्यक्ति ऐसा है”। इसको कहते हैं कि एक ‘भौतिक न्याय’। एक चीज़ को लेके उस पर पूरा तर्क कर देना। इसको कहते हैं knowledge in the mode of ignorance (अज्ञान में ज्ञान)।
अगर अमेरिका में जाते हैं, तो अमेरिका में बहुत इमिग्रेंट (Immigrant) लोग आ गए हैं। वहाँ लोग कहते हैं “ये लोग हमारी नौकरी चोरी करने आए हैं।” समाज में ऐसे होता है कि ‘we will all be unfairly blamed’ (हमें अनुचित रूप से दोषी ठहराया जाएगा)। बिना हमारी गलती के हमें दोष दिया जाता है।
परिस्थिति को स्वीकारना और सुधारना
मेरे क्लोज (Close) मित्र हैं, वो इस्राइल में रहते हैं। जब वो हमास ने अटैक किया था, तो तभी उनका घर तहस-नहस हो गया। उनका सारा करियर वहाँ पर था। ये क्यों है? उनका उस परिस्थिति में जन्म पूर्वकर्म से ही है। जो चीजें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, जो हम पर प्रहार करती हैं—जैसे हमास ने आक्रमण किया—इसका मतलब यह नहीं कि प्रतिकार न करें। प्रतिकार करना जरूरी है।
दो चीजें हैं, जब हमारे साथ कुछ गलत होता है (बिना हमारे दोष के)। यहाँ पर एक्सेप्टेंस (Acceptance) और सिचुएशन को सरवाइव (Survive) करना जरूरी है। जो परिस्थिति है, उसके हिसाब से अच्छा क्या कर सकते हैं? एक चीज़ है कि अभी लोगों की ऐसी धारणा है, उसको बदल नहीं सकते। पर कम से कम मैं अपने बच्चों को, नेक्स्ट जनरेशन (Next generation) को वैसी धारणाएं न दूँ।
इस तरह से क्या करते हैं, जो परिस्थिति है, कभी हम परिस्थिति बदल सकते हैं, कभी नहीं बदल सकते हैं। तो जब नहीं बदल सकते हैं, तो ये हमेशा नहीं रहने वाली। हम भी बदलते हैं, परिस्थितियां भी बदलती हैं। बहुत अच्छे से हमें सीखना चाहिए।
श्री रामचंद्र भगवान की… जय! प्रभुपद की… जय! गौर भक्त वृंद की… जय! गौर प्रेमानंदे… हरि हरि बोल!