Why did Draupadi laugh at Duryodhana? – Hindi
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
1. प्रसंग की वास्तविकता और द्रौपदी की हँसी
- घटना: पांडवों के राजसूय यज्ञ के दौरान मयसभा में भ्रमवश दुर्योधन पानी समझकर फर्श पर फिसल जाता है और पूरी तरह गीला हो जाता है। यह देखकर द्रौपदी और अन्य रानियाँ स्वाभाविक रूप से हँस पड़ती हैं।
- अहंकार का पतन: यह हँसी किसी ईर्ष्या या दुर्भावना से नहीं, बल्कि एक गर्वित व्यक्ति के अहंकार के स्वाभाविक पतन को दर्शाती है (जैसे अंग्रेजी में कहा जाता है—Pride comes before a fall)।
- मिथक बनाम सत्य: टीवी सीरियल्स और मूवीज में यह दिखाया जाता है कि द्रौपदी ने दुर्योधन को “अंधे का बेटा अंधा” कहा था, जो कि पूरी तरह काल्पनिक और नाटकीय अतिशयोक्ति है। व्यास जी के मूल शास्त्रों या क्रिटिकल एडिशन में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। द्रौपदी की हँसी केवल एक मासूम और तत्कालीन परिस्थिति की प्रतिक्रिया थी।
2. दुर्योधन की मानसिकता और भगवान कृष्ण की भूमिका
- दुर्योधन की ईर्ष्या: दुर्योधन पांडवों के ऐश्वर्य और इंद्रप्रस्थ की समृद्धि को देखकर अत्यधिक ईर्ष्यालु और चिड़चिड़ा हो गया था।
- भगवान कृष्ण की परीक्षा: कृष्ण ने युधिष्ठिर को तो द्रौपदी पर हँसने से रोका, पर दुर्योधन का अपमान होने दिया। इसे एक डॉक्टर के उदाहरण से समझाया गया है—जैसे डॉक्टर यह जाँचने के लिए कि शरीर के किस हिस्से में अंदरूनी दर्द या चोट है, हाथ को घुमाता है या हल्का प्रहार करता है, वैसे ही भगवान कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ सामने लाते हैं जो हमारे अंदर छिपे अहंकार और विकारों (अनर्थों) को उजागर कर देती हैं ताकि हम उन्हें सुधार सकें।
- इंद्र और दुर्योधन की प्रतिक्रिया में अंतर: गोवर्धन लीला में इंद्र भी उत्तेजित हुए थे, किंतु भगवान की शक्ति देखकर वे समझ गए, क्षमा माँगी और अपने पद पर पुनः स्थापित हुए। इसके विपरीत, दुर्योधन ने अत्यधिक क्रोध और अहंकार के कारण प्रतिशोध में पांडवों का सर्वनाश और वस्त्रहरण जैसे अतिरेकपूर्ण (Disproportionate) कदम उठाए, जिससे अंततः उसका विनाश हुआ।
3. जीवन में उत्तेजनाओं (Provocations) से निपटने के चार स्तर
जब भी हमारे जीवन में अपमानजनक या उत्तेजित करने वाली परिस्थितियाँ आएँ, तो हमें केवल मन के स्तर पर प्रतिक्रिया (Reaction) नहीं देनी चाहिए, बल्कि बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। इसके लिए चार स्तरों पर तैयारी आवश्यक है:
- भावनात्मक स्तर (Emotionally): यह पहचानें कि किन बातों या व्यक्तियों से आपको सबसे अधिक गुस्सा या उत्तेजना आती है, और यथासंभव उन परिस्थितियों या समय से दूरी बनाए रखें।
- आध्यात्मिक स्तर (Spiritually): नियमित साधना (भक्ति) द्वारा चेतना को ऊँचा उठाना। जब चेतना उच्च होती है, तो छोटी-छोटी समस्याएँ और उत्तेजनाएँ बड़ी नहीं लगतीं।
- बौद्धिक स्तर (Intelligently): शास्त्रों का नियमित अध्ययन करना, जिससे हमारी बुद्धि सतर्क और विवेकशील बने। इससे हम बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने के बजाय सही निर्णय ले पाते हैं।
- सामाजिक स्तर (Socially): अच्छे और सही लोगों के साथ संबंध रखना, जो हमें गलत रास्ते पर जाने से रोक सकें और समय पर उचित मार्गदर्शन दें।
4. मुख्य सीख और निष्कर्ष
- स्वीकारोक्ति ही समाधान: झगड़ा करके खुद को सही साबित करने से बेहतर है अपनी गलती स्वीकार करना—“It is better to admit that we are wrong and be right than to argue that we are right and be wrong.”
- परिस्थितियाँ और हमारे विकल्प: जीवन में कई बार ऐसी कठिन परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ हमारे पास अच्छे और बुरे का विकल्प नहीं होता, बल्कि बुरे और बदतर का होता है। ऐसे में भी हम पूरी तरह असहाय नहीं होते; यदि हम स्थिति को बिगाड़ सकते हैं, तो अपनी विवेकपूर्ण समझ और संयम से उसे बेहतर भी बना सकते हैं।
- दैव और हमारे कर्म: हम अपनी नियति के पूर्ण स्वामी (Masters of destiny) तो नहीं हैं, परंतु अपने अच्छे कर्मों और निर्णयों के माध्यम से हम अपने भविष्य के शिल्पकार (Makers) स्वयं हैं।
Full Transcriptions
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादी गौर भक्तवृंद
हरे कृष्ण हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण!
बहुत प्रसन्न हूँ मैं आप सबके बीच में। आज हम महाभारत के आधार पर चर्चा करेंगे कि किस तरह से हम सबके जीवन में अलग-अलग प्रकार की चुनौतियाँ आती हैं, खास करके प्रोवोकेशन्स आते हैं—उत्तेजित करने वाली परिस्थितियाँ आती हैं—और उनका हमें कैसे सामना करना चाहिए। तो महाभारत में कुछ ऐसे प्रसंग आते हैं, जिसमें कभी-कभी हमें सवाल आ सकता है कि, अभी महाभारत में एक तरह से अच्छे लोग हैं जो पांडव हैं, बुरे लोग हैं जो कौरव हैं, पर कभी-कभी क्या होता है?
क्या हम म्यूट कर सकते हैं? सभी लोग अपने आपको प्लीज म्यूट कर दीजिए, ये रिक्वेस्ट है।
तो जब हम देखते हैं कि कुछ अच्छे लोग हैं, कुछ बुरे लोग हैं, तो अभी यहाँ पर ऐसे लोग समझना थोड़ा है कि कोई अच्छे कार्य होंगे, कार्य हैं। हम असली जीवन पर यह व्यवहार करते हैं, तो जो शास्त्र हैं, खासतौर कि अगर हम रामायण और महाभारत की तुलना करते हैं, तो महाभारत में जो कॉम्प्लेक्सिटी है, वो और बढ़ जाती है। क्योंकि महाभारत में कई ऐसे कौरवों के पक्ष में ऐसे कई पात्र हैं जो अच्छे हैं, और वो उनका त्याग भी नहीं करते हैं। जैसे विभीषण एक अच्छा पात्र है, पर विभीषण जो है रावण का त्याग कर देता है, पर भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण—ये त्याग भी नहीं करते हैं। और कभी-कभी जो अच्छे पक्ष में जो होते हैं, वे भी कभी-कभी कुछ ऐसा कार्य करते हैं जिससे लगता है कि शायद ये गलत है। जैसे युधिष्ठिर जूआ खेलते हैं या फिर न खेलते हैं, पर बहुत कुछ हार जाते हैं जूआ में।
या फिर आज का प्रसंग हम देख रहे हैं—जो दुर्योधन है, जब गिर जाते हैं, तो दुर्योधन पर हँसती हैं (द्रौपदी)। तो अभी इस प्रसंग में ऐसे क्यों करते हैं, उससे क्या सीखना है, हम यह समझने का प्रयास करेंगे। तो मैं तीन विषयों पर आज चर्चा करूँगा कि सबसे पहले उस प्रसंग में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, प्रसंग के बारे में सबसे पहले चर्चा करेंगे कि द्रौपदी हँसी तो क्यों हँसी? और फिर कई बार जो महाभारत की मूवीज होती हैं या महाभारत का टीवी सीरियल होता है, उसमें कुछ और वो जो प्रसंग हैं, बढ़ा-चढ़ा के बताया जाता है, तो द्रौपदी ने तभी दुर्योधन से क्या कहा? उसके बारे में हम चर्चा करेंगे। दृश्यों की इसमें क्या भूमिका थी? क्या जनता थे कि द्रौपदी को… दुर्योधन को… दुःखी करना है? क्या जनता थे कि वो प्रसंग के असुरक्षित लोग हैं? आज इसके बारे में लोग चर्चा करेंगे।
दुर्योधन का पतन और द्रौपदी की हँसी: प्रसंग की वास्तविकता
तो अभी सबसे पहले हम देखते हैं कि साधारणतया अगर कोई व्यक्ति गिर जाता है, तो हम उन पर हँसते नहीं हैं। साधारणतया अगर कोई सुसंस्कृत होगा थोड़ा-बहुत, तो क्या है? अगर असंस्कृत है, तो शायद वो हँसेगा, पर सुसंस्कृत है तो फिर क्या करेगा? वो थोड़ी जाएगा वहाँ पे और उसको मदद करेगा उठने के लिए। अभी अगर कोई गिर जाता है और उससे कोई हँसता है, तो हमें क्या लगता है? क्या तुम जानते नहीं किस तरह से बर्ताव करना चाहिए? तो अभी क्या है कि उस दृष्टि से देखेंगे तो हमको लगेगा कि ये हँसना उचित नहीं है।
अभी द्रौपदी कब हँसती है? पांडवों का राजसूय यज्ञ होता है, उस समय कौरव भी वहाँ पर आते हैं और दुर्योधन वहाँ पर रह लेता है कुछ समय तक। और मयासुर ने एक दिव्य सभा बनाई होती है, इसको मयसभा कहते हैं। और मयसभा में कई ऐसी अद्भुत चीजें होती हैं जो आँख को मोह में डाल देती हैं। तो कुछ जगह पर ऐसे लगता है कि पानी है और वहाँ पर दुर्योधन चल रहा होता है, तो अपना कपड़ा उठा के चलता है, फिर देखता है यहाँ पर कुछ पानी है ही नहीं। और फिर बाद में जब यहाँ पर जमीन है और वहाँ पानी हो जाता है और गिर के फिसल जाता है। तो ऐसे जब एक बार फिसल जाता है, वो पूरा गीला हो जाता है, तुरंत वहाँ पर जो सेवक होते हैं, वहाँ आते हैं, उसको कपड़ा देते हैं सुखाने के लिए। पर वो इधर-उधर देखता है तो ऊपर जो होता है, वहाँ पर बालकनी जैसे होता है, वहाँ पर द्रौपदी और युधिष्ठिर और कृष्णा वो सब इधर-उधर देख रहे होते हैं। तो वो दुर्योधन को देखते हैं और वहाँ पर वो देख के द्रौपदी और बाकी रानियाँ जो हैं, वह हँसने लगती हैं। और तभी युधिष्ठिर जो हैं, वह द्रौपदी को बोलते हैं—मत हँसो। और जो द्रौपदी को बोल रहे होते हैं, तो कृष्णा युधिष्ठिर को बोलते हैं—मत रोको तुम।
अब ये सब दुर्योधन देख लेता है और दुर्योधन बहुत खुद को अपमानित महसूस करता है। तो अभी यहाँ पर हुआ क्या है कि जो लोग घमंडी होते हैं, उनको हम प्राउड कहते हैं। तो क्या होता है कि अगर कुछ लोग खुद को बहुत बड़ा दिखाने का… कोई कहे, ‘मैं गणित में बहुत बड़ा विद्वान हूँ’, कोई कहे, ‘मैं शास्त्र में बहुत बड़ा विद्वान हूँ’, और फिर एक प्राथमिक शास्त्र के बारे में कुछ बात है, अगर उस व्यक्ति को पता नहीं है वो, तो फिर क्या हो जाता है? एक तरह से जो ऐसे बाकी लोगों को जिनको पता होता है कि ये खुद को बहुत बड़ा चढ़ा के घमंड दिखाता है, तो उसमें थोड़ा एक आनंद मिलता है। क्या है कि ऐसे इंग्लिश में कहावत है—’प्राइड कम्स बिफोर अ फॉल’ कि जो गर्वित होता है, वो गिर जाता है। और साधारणतया कोई व्यक्ति गिरता है, तो उससे लोगों को आनंद नहीं होता है, पर कोई गर्वित व्यक्ति, बहुत गर्व करने वाला व्यक्ति अगर गिर जाता है, तो फिर क्या होता है?
अच्छा, तो इससे लगता है कि ‘सर्ज यू राइट’, ये तुम खुद को इतना मानते थे, अभी जीवन ने, दुनिया ने तुमको अपनी जगह दिखा दी है। और न केवल दुनिया ने, मान लीजिए कोई विद्यालय में कोई विद्यार्थी है जो वो दादागिरी करता है हमेशा, दूसरों को धमकाता है, डराता है, और तभी कोई और लड़का आता है, उससे चुनौती करता है और उसको हरा देता है, तो फिर क्या होता है? उसका जो अहंकार है कम होने पर दूसरों को एक आनंद मिलता है। और खास करके न केवल वो उस तरह से कम साबित होते हैं, पर वो खुद भी कुछ गलती करते हैं, खुद को भी अज्ञानी या अक्षम दिखाते हैं, तो उनका इनेप्टनेस जब होता है, तो उससे और एक तरह से वो आनंद होता है।
अभी यह आनंद अच्छा है या बुरा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, यह एक स्वाभाविक है। क्या है? स्वाभाविक कि कोई गर्वित व्यक्ति, उसका गर्व कम होता है या उसका गर्व कैसे वास्तव में सत्य पे आधारित नहीं है, पता चल जाता है। तो एक तरह से लोगों को एक आनंद मिलता है।
दुर्योधन की मानसिकता और ईर्ष्या
तो अभी दुर्योधन क्या था? दुर्योधन की मानसिकता क्या थी, देखते हैं। सबसे पहले उसको पांडव के प्रति ईर्ष्या थी। ईर्ष्या क्यों थी उसको? क्योंकि वो सोच रहा था कि ये राज तो सारा मुझे मिलना चाहिए, पर ये पांडव कहाँ से आ गए, उन्होंने राज ले लिया? तो पहले तो उसने थोड़ा राजनीति करके पांडव को केवल आधा राज दे दिया था, खांडवप्रस्थ जो जंगल सा था, पर पांडवों ने उसको क्या कर दिया? उसको एक बड़ा राज बना दिया, बड़ा ही समर्थशाली इंद्रप्रस्थ बना दिया उन्होंने। तो फिर वो देख के उसको बहुत ईर्ष्या हो गई।
खास करके जब पांडवों का राजसूय यज्ञ हुआ, तो इन दुर्योधन ने क्या किया? तभी उसने ये सेवा ली कि जो भी पांडवों को भेंट दी जा रही है, वो स्वीकार करना है। तो उस समय उसने देखा कि कितने सारे भेंट आए, कितना ऐश्वर्य है पांडवों के साथ का! यह देखकर तो उसकी ईर्ष्या और बढ़ गई, और बढ़ गई। और फिर जब ईर्ष्या बढ़ जाती है, तो क्या होता है? हम चिड़चिड़े हो जाते हैं। तो वहाँ पे भी दुर्योधन चिड़चिड़ा हो रहा था जब वह रह रहा था। बाकी सब तो चले गए, वो देखने के लिए कुछ समय यहाँ पे रहूँगा बोला और रह रहा था। तो फिर जो भी सेवक थे, उन पर चिड़चिड़ा, उन पर गुस्सा करता था वो। और इस तरह से वो अंदर ही ईर्ष्या है, बाहर चिड़चिड़ापन है, और उससे क्या होता है? सबको वो एक तरह से नाराज कर रहा था। सब उससे डरते थे, जो भी उससे अधीन थे, वो उससे डरते थे।
जो पांडव थे, वो भी देख रहे थे कि ‘ही इज नॉट बीइंग अ गुड गेस्ट’। अगर हमारे घर में कोई आता है मेहमान, और वो मेहमान क्या करता है हमेशा हमको परेशान करता है, हमेशा यह बात खोजता है, वो बात खोजता है, यह सही नहीं है, वो सही नहीं है, तो क्या है? वो एक जो उचित आदान-प्रदान होता है, वो नहीं रहता है। और उसके बाद में, तो वह क्या था? यह सब पृष्ठभूमि में थे कि दुर्योधन किस तरह से बर्ताव कर रहा था। वो एक अंडरस्टैंडेबल रिएक्शन है। अब यह ऐसे नहीं है कि वो ऐसे नहीं कि हम सबको हँसना चाहिए, यह नहीं, एक डिज़ायरेबल रिएक्शन है वो परिस्थिति में कभी-कभी हो जाता है, तो उस तरह से द्रौपदी हँस देती है।
तो फिर उस समय वहाँ, देखिए, दुर्योधन बड़ा क्रोधित हो जाता है—’तुमने मेरा इस तरह से अपमान किया, मैं तुम्हारा अपमान करूँगा’, ऐसा वो वहाँ पर निर्धार कर लेता है। तो अभी क्या होता है? मैं जैसे बता रहा था शुरुआत में, शास्त्र जब दर्शाते हैं सत्य, तो शास्त्र क्या करते हैं? वो जो कोई भी पात्र होता है, वो किसी भी विषय का पूर्ण ज्ञान नहीं है, कुछ अच्छे कम वो ज्ञान है। हम में से कोई भी ऐसा नहीं है कि हर कार्य हमेशा सही करता है, कभी-कभी हम गलत कार्य कर देते हैं। तो फिर वो संगमित ऐसे, हम समझते हैं। और ऐसे नहीं है कि हर पात्र का हर जो व्यवहार है, वह सही ही हो, भले ही वो अच्छा पात्र हो, अच्छे के पक्ष में हो, तो कभी-कभी उनका बर्ताव हो जाता है। उससे नहीं हँसा जा सकता है। तो ऐसे नहीं है कि द्रौपदी जो हँसती है, वो कुछ ईर्ष्या से था। वैसी परिस्थिति में, जो दुर्योधन का व्यवहार प्यार जैसे था और फिसल जाना था, उससे परिस्थिति के कारण वैसे हो जाता है।
टीवी सीरियल्स और काल्पनिक वर्णन
तो अभी इस तरह से नहीं समझ सकते क्या दुर्योधन को द्रौपदी ने फिर उसके ऊपर कोसा हो? तो क्या हो ये? रामायण, महाभारत ये जो है, कुछ लीला, कृष्णलीला भी, खास करके रसस्कंद, ये हमारे शास्त्रों में बताए गए हैं और उसके बाद में अलग-अलग तरह से, भारत में इसको दर्शाया गया है। दर्शाया गया है, मतलब इसके पर ड्रामा लिखे गए हैं, नाटक बने हैं, काव्य बने हैं, और आजकल फिर टीवी सीरियल बने हैं, मूवीज बने हैं। तो कई बार ड्रामा जो होता है, इसके आधार पर किसी भी तरह से उसको और ड्रामेटिक बनाते हैं, तो कभी-कभी क्या होता है, उससे सत्य से ज्यादा उसको थोड़ा सेंसेशनाइज करते हैं, सनसनीखेज बना देते हैं। जैसे अखबार में भी अगर कुछ न्यूज आता है, तो न्यूज अगर थोड़ा और सनसनीखेज बना देंगे, तो क्या होता है? लोग और पढ़ेंगे उसको। तो वही भाव यहाँ पे होता है, कि थोड़ा सनसनीखेज बनता है यहाँ पे।
तो क्या कर देते हैं अभी ये टीवी में बताते हैं कि द्रौपदी ने दुर्योधन से कहा कि ‘अंधे का बेटा अंधा’। तो अभी यहाँ दुर्योधन के लिए बहुत बड़ा अपमान हो गया। पर वास्तव में ऐसा दुर्योधन ने कभी नहीं कहा था। यह न केवल एक ड्रेमटाइज्ड है, यह एक नाट्यात्मक वर्णन नहीं है, यह एक काल्पनिक वर्णन है। क्या है कि महाभारत एक बहुत बड़ा ग्रंथ है, एक लाख से ज्यादा श्लोक है, तो उसके अलग-अलग रिसेन्शंस हैं। रिसेन्शंस मतलब उसके अलग-अलग थोड़े अलग रिसेन्शंस से बताया गया है। पर कोई भी उसका वर्णन है, क्रिटिकल एडिशन मतलब क्या होता है, ऐसा उसका, वो महाभारत का जो ग्रंथ है, जो अच्छी तरह से तुलना करके सही क्या है, वो जाँच करने का प्रयास किया गया है। किसी में भी ऐसे नहीं बताया कि द्रौपदी ने ऐसे कहा था। यह क्या है? यह केवल एक काल्पनिक है।
और अभी ऐसा द्रौपदी ने नहीं कहा था, यह कहना क्यों जरूरी है? अभी अगर उस तरह से ऐसे उसको कोसा है, तो क्या होता है? कि द्रौपदी अभी हँसी, वो जैसे मैंने पहले बताया है, कि वो तो एक परिस्थिति के कारण एक मासूम हँसी थी, ऐसे नहीं थी कि वो जान-बूझ के और ईर्ष्या के साथ, हुलस के साथ ऐसे हँसी हुई थी वो। तो जो अभी यह उस पे, जब उसको यह कर रहे थे, जो उसने वर्तावनो, एक सेमिनार… अगर मरती हमारे माता-पिता, अज्ञान मैंता… तो क्या उसने धृतराष्ट्र का भी अपमान किया था? कदापि नहीं।
तो वो जो इस तरह से काल्पनिक वर्णन होता है, उससे क्या होता है? यह अभी नाट्यात्मक बुद्धि से शास्त्रों को बताना उचित है, पर वो इस तरह से बताना चाहिए कि जो शास्त्र है, जो शास्त्र की कथा है, वहाँ और अच्छी तरह से समझे, उसका जो मूड है, उसका जो रस है, उसका जो भाव है, वहाँ और अच्छी तरह स्पष्ट हो, ऐसे नहीं बताना चाहिए, जिससे कि वह भाव चला जाए, और कोई अपना ही एजेंडा है, अपना ही उनका उद्देश्य है, वो उद्देश्य अपना आगे बढ़ाने के लिए, वो कुछ अपना ही, अपने ही पद्धति से कुछ बता देगा, तो ऐसे करना उचित नहीं है।
अभी कभी-कभी क्या होता है? यह रामायण के साथ भी होता है, महाभारत के साथ भी होता है, तो भारत एक बड़ा देश है, भारत में भी अलग-अलग विभागों में कभी-कभी थोड़ा तनाव होता है, तो दक्षिण भारत और उत्तर भारत में कभी थोड़ा तनाव होता है, अमेरिका में भी आजकल जो अभी इलेक्शंस होने वाले हैं, तो उसमें क्या है? उसको कहते हैं कोस्टल अमेरिका और मिडलैंड अमेरिका। तो जो दोनों कोस्ट में है—न्यू यॉर्क है, लॉस एंजिल्स है, सैन फ्रांसिस्को है, बॉस्टन है—यह सब कोस्ट में हैं, तो वहाँ के लोगों की विचारधारा होती है, और जो बीच में अमेरिका में रहते हैं—टेनेसी, विस्कॉन्सिन, मिनेसोटा—वहाँ पर जो लोग रहते हैं, उनकी विचारधारा अलग है। तो कभी-कभी उनमें भी ऐसे भेद होता है। तो अभी ऐसे भेद होता है, तो कुछ लोग क्या करते हैं? शास्त्रों को लेते हैं और शास्त्रों को अपने ही अपने दृष्टि से देख के अपने भेदों में वो डाल देते हैं। तो कुछ लोग कहते हैं, रामायण जो क्या कहानी है, यह दक्षिण भारत और उत्तर भारत के लोगों के युद्ध के बारे में कहानी है, तो वो नाटक नहीं हो रहा है, वो कल्पना हो रहे हैं उसके। तो ऐसे क्या है? पॉलिटिकलाइज्ड रीटेलिंग होते हैं, यह लोग अपने-अपने राजनैतिक उद्देश्य होते हैं, उसके लिए वो कहानी उत्तर से बता देते हैं।
तो इसके लिए लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए वो क्या करते हैं? अच्छे लोगों को बुरा दिखा देते हैं और बुरे लोगों को क्या करते हैं? बुरे लोग, वो इतने बुरे नहीं थे, वास्तव में वो अच्छे थे। तो इस तरह से कोई लोग अपनी कहानी बनाएँगे, तो कुछ पढ़ेंगे, नहीं पढ़ेंगे, पर वो क्या करेंगे? शास्त्रों को लेंगे और शास्त्रों को एक विकृत प्रदेश से बताएंगे। तो क्या हो? ‘अरे मैं ऐसे सोचा ही नहीं था, यह ऐसा है क्या?’ उनकी जो कहानियों की लोकप्रियता बढ़ेगी, तो ऐसा करना उचित नहीं है।
इसलिए शास्त्रों को अगर हमें समझना है कि जो परंपरा है, भक्ति की परंपरा है, धर्म की परंपरा है, यह एक जीवंत परंपरा है, और शास्त्रों को समझना है, तो हमें जो शास्त्रों के अनुसार अपना जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं, उनके माध्यम से हमें समझना है, उनके माध्यम से हम समझ सकते हैं। इसलिए हम देखते हैं कि प्राचीन काल से आधुनिक काल के पहले तक, भारत में जो धर्म के आधार की संस्कृति थी, वो चल रही थी, क्यों? क्योंकि हर गाँव में, हर शहर में, हर ग्राम, हर तालुक में, वहाँ के अपने-अपने ब्राह्मण हुआ करते थे, वहाँ पुरोहित हुआ करते थे, संत हुआ करते थे और वो भगवान की कथा करते थे, धर्म की कथा करते थे और इस तरह से ये चलते आ रहा था।
पर आजकल जो क्या हो गया है? शहर आ गया है और जो प्राचीन संस्कृति है, उससे हमारा संबंध थोड़ा कम हो गया है। इसलिए जो लोग अभी टीवी सीरियल अगर बनाते हैं, तो शायद उनका धर्म में कोई मूल नहीं है, धर्म में कोई रुचि नहीं है, उनको सिर्फ अपना-अपना पैसा कमाना है। अगर ऐसा होगा, तो फिर क्या होता है? उससे वह शास्त्रों का उचित भाव…
भगवान कृष्ण और दुर्योधन का अपमान: एक आंतरिक परीक्षा
तो अभी हम जो आखिरी पॉइंट है, उस पर जाएँगे और यह हमारे सबसे महत्वपूर्ण है कि जैसे मैं बताया कि ठीक है, द्रौपदी ने तो वो परिस्थिति के कारण हँस दिया और द्रौपदी ने वैसे कुछ अपमानस्मत बोला नहीं। पर कृष्णा भागवत में स्पष्ट वर्णन आता है कि जब युधिष्ठिर महाराज द्रौपदी को बोलते हैं—’रुको, हँसो मत’—तो कृष्णा युधिष्ठिर महाराज को रोकते हैं, द्रौपदी को नहीं रोकते हैं।
अभी ऐसे क्यों करते हैं कृष्णा, कि अभी किसी का अपमान हो रहा है, तो कृष्णा वो अपमान को क्यों नहीं रोकते हैं? यह जो समझना है, यह हमारे आज का प्रवचन है। इससे सबसे महत्वपूर्ण है, यह हमारे जीवन के लिए बहुत एप्लीकेबल है, इसका हमारे जीवन से बहुत संबंध है। अभी तक तो हम कहानी देख रहे थे, तो क्या है? क्या जानबूझ कि कृष्णा चाहते थे कि दुर्योधन का अपमान हो जाए? क्या कृष्णा चाहते थे कि दुर्योधन को उकसाएँ?
तो अभी यह हमें समझना चाहिए कि कभी-कभी यह क्या होता है? उकसाया जाता है, वो एक परीक्षा लेने के लिए। मान लीजिए कोई गाड़ी चला रहा था और वो बाइक पर चल रहा है और वो बाइक से गिर जाते हैं और वो कंधे पर गिर जाते हैं, तो अभी वो थोड़ा हाथ हिला लेते हैं, कुछ दर्द नहीं होता है, उनको लगता है कि कुछ नहीं हुआ है, पर फिर वो एक डॉक्टर के पास जाते हैं, तो वो बोलते हैं कि कुछ नहीं हुआ है, तो डॉक्टर क्या करेंगे? उनका हाथ लेंगे और गोल घुमाएंगे। तो अभी क्या होगा, जब इस तरह से हाथ गोल घुमाएंगे, तो अगर अंदर से कोई समस्या नहीं है, तो थोड़ा सा गोल घुमाएंगे, तो कुछ अर्थ दर्द नहीं होगा।
या मान लीजिए कोई छोटा सा हथौड़ा जैसे कुछ लेंगे और ठक-ठक ऐसे करेंगे, ठक-ठक ऐसे करेंगे, तो अभी अंदर से कुछ दर्द नहीं है, अंदर से कुछ समस्या नहीं है, तो वैसे थोड़ा सा हथौड़ा मारने से… यहाँ पे जब वो जो डॉक्टर इस तरह से हाथ हिलाते हैं, वो डॉक्टर इज नॉट कॉजिंग पेन, वो डॉक्टर इज एक्सपोजिंग पेन कॉजिंग। कि जो डॉक्टर है, ऐसे लगता है कि उन्होंने ऐसे हाथ हिलाया, उसके बाद दर्द हो रहा है, पर नहीं, वो दर्द का कारण पहले से अंदर है, डॉक्टर क्या कर रहे हैं? वो दर्द का कारण अंदर है, यह दिखा रहे हैं, डॉक्टर इस एक्सपोजिंग।
तो इसी तरह से भी कृष्णा क्या करते हैं? जब किसी को इस तरह से उत्तेजित करने की परिस्थिति में डालते हैं, तो अगर अंदर अहंकार नहीं है, तो अगर अंदर अहंकार होगा, तो क्या होगा? उसको बड़ा क्रोध आ जाएगा। क्रोध आके फिर हिंसा हो जाएगी। तो इसलिए अभी हाँ, कृष्ण ने दुर्योधन का अपमान होने दिया, पर कृष्ण ने अपमान होने दिया, तो क्या थे वो एक डॉक्टर के समान? डॉक्टर कभी-कभी ऐसे उसको मारते हैं, वो चेक करने के लिए—अभी कुछ आपको दर्द हो रहा है अंदर?
तो कृष्णा किसी को उत्तेजित करते हैं, तो हम यह तुलना करेंगे अभी। हम सब जानते हैं ये गोवर्धन लीला, जहाँ पे कृष्णा इंद्र को उत्तेजित करते हैं और यहाँ पे महाभारत में कृष्णा दुर्योधन को उत्तेजित करते हैं। तो अभी क्या होता है, क्या प्रसंग क्या है? कि हम देखते हैं कि इंद्र जो था, उसको इंद्र पूजा होती थी, पर कृष्णा ने कहा—’इन्द्र पूजा छोड़ दो और तुम क्या करो? गोवर्धन पूजा करो।’ और ज्योतिषियों को बताया, तो जब अभी ऐसे हुआ, तो इंद्र को बड़ा अपमान हुआ।
अब ये अपमान कैसे है? आप देख सकते हैं कि एक तो उसको पूजा नहीं मिली और वो पूजा किसी और को दे दी और किसको दे दी वो पूजा? एक पर्वत को दे दी। अब इंद्र सोचते हैं—कहाँ एक पर्वत है और कहाँ मैं स्वर्ग का राजा हूँ? तो वो एक… मैं आप से मिल नहीं मिल सकता हूँ कि मेरा कोई और किसी और से मीटिंग आ गया है और फिर हम पता चाहते हैं कि किसे मिल रहे हैं और वो तो एक बहुत साधारण व्यक्ति है, तुम मुझसे मीटिंग छोड़ के उससे क्यों मिल रहे हो? तुमको थोड़ा बुरा लगेगा। तो इंद्र को इस तरह से अपमान हो गया और अपमान क्या हो गया? तो उसने क्या किया? बहुत ही बुरी प्रतिक्रिया है उसकी, उसने ब्रजवासियों का विनाश करने का प्रयास किया।
उसने ऐसे… अभी क्या होता है? सबके पास कभी-कभी क्रोध आ जाता है, सबको क्रोध आ जाता है, पर क्या है? हमारे पास कितनी क्षमता है, उसके अनुसार हम क्रोध को प्रकटीकरण करते हैं। अभी कोई छोटा बच्चा है, उसको क्रोध आ जाता है, तो क्या? वो थोड़ा रोएगा या फिर अपने कोई तकिया है, इधर-उधर फेंकेगा, कुछ खिलौना इधर-उधर फेंकेगा, पर कोई बड़ा व्यक्ति है, उसको क्रोध आ जाएगा और क्रोध को नियंत्रण नहीं करेगा, तो शायद वो क्या करेगा? कोई बर्तन फेंकेगा इधर-उधर, कोई होगा तो वो चाकू निकाल लेगा। अब अमेरिका में तो क्या है? सब लोगों के पास, जिसको भी चाहिए वो गन खरीद सकता है और लोगों के पास गन्स होते हैं, तो लोग गुस्सा आके वो गन इस्तेमाल कर सकते हैं कभी-कभी। तो जितनी हमारे पास क्षमता है, उस क्षमता के अनुसार अगर हमारा क्रोध नियंत्रण…
जो अब तक हो रहा है, पहली जो बात हो रही है, वहाँ हम देखते हैं दुर्योधन वैसे ही करता है, पर उसके बाद में क्या होता है? कृष्णा गोवर्धन उठा देते हैं और इंद्र पूरी शक्ति से गोवर्धन पे प्रहार करता है, पर वो ब्रजवासियों को कुछ नहीं कर सकता है और गोवर्धन को भी कुछ नहीं कर सकता है। उसके लिए पूरा उसका गर्व चला जाता है और समझ जाता है कि मैं तो मूर्खता हूँ, और फिर वो क्या होता है? कृष्णा से माफी माँग लेते हैं वो। आ कर कृष्णा क्या करते हैं? वो चेतावनी देते हैं, उपदेश देते हैं और तो कहते हैं—तो पुनः जाके अपने इंद्र के पद पे स्थापित हो जाओ।
तो कृष्णा ने इंद्र को उकसाया क्या किया? द्रौपदी को हँसने दिया। द्रौपदी को हँसने दिया, पर अभी इसके कारण दुर्योधन ने क्या किया? कि दुर्योधन ने, दुर्योधन का भाव हो गया—’द्रौपदी, तुमने मेरा अपमान किया है, मैं तुम्हारा अपमान करूँगा।’ और कैसे अपमान करूँगा? उसने द्रौपदी को बहिष्कृत करने का प्रयास किया, उसने उसका वस्त्रहरण करने का प्रयास किया।
अभी क्या है? यह किसी को क्रोध भी आता है, तो क्या है? कि क्रोध अगर किसी ने हमारे प्रति कुछ बुरा किया है, तो अच्छा है कि हम उनको माफ कर दें। माफ भी नहीं कर सकते हैं, तो कभी-कभी हमको उनको सही मार्ग पर लाना है, तो फिर अच्छा है। तो जिस मात्रा में उन्होंने गलती की है, उस मात्रा में उनको उसका प्रतिक्रिया देना चाहिए।
अब मान लीजिए हम किसी घर में जाते हैं और उनके घर में हमें एक मच्छर काट लेता है और इसलिए हमें इतना गुस्सा आता है कि हम उनके घर पर बॉम्ब डाल के उनका पूरा घर उड़ा देते हैं, यह क्या बेवकूफी है? यह तो एक मच्छर काटा था आपको, उनके घर में अभी उन्होंने भी कुछ नहीं किया। तो अभी ठीक है, दुर्योधन का अपमान हुआ, पर द्रौपदी का वस्त्रहरण करना, पांडवों का सारा राज्य संपत्ति छीन लेना, यहाँ क्या था? बहुत ही एक्सेसिव था, तो उसमें कुछ प्रमाणात्मक रूप से उचित नहीं था वो। तो अपने अंदर… अपने अंदर अपना पर्सपेक्टिव का सारा राज्य नहीं किया था, क्या उचित नहीं है, वो हमारी विचारधारा नहीं रहती है।
पर अभी कृष्ण ने भी क्या किया? उसने जब द्रौपदी का वस्त्रहरण करने का प्रयास किया, तो कृष्ण ने द्रौपदी का वस्त्र असीमित बना दिया और यह एक तरह से यह चमत्कार था। तो जैसे अभी देखा, द्रौपदी का वस्त्र असीमित बना दिया, पर उससे दुर्योधन सुधरा नहीं है, तो क्या? यह तो कुछ जादू हो गया और वो अपना ही जो हिंसात्मक ईर्ष्यापूर्वक कार्य जो कर रहा था, वो करता रहा, वो यह नहीं हुआ।
पर मैं दूसरा कार्य करूँगा, तो पांडव वनवास में… जब कृष्णा… जब पांडव वनवास में जाके आए, उसके बाद में पांडव जो आए वहाँ पे, पांडव के पास वो एक शांतिदूत के रूप में गए वो और वो भी दुर्योधन ने ठुकरा दिया। और इस तरह से ठुकरा दिया कि तभी युद्ध अनिवार्य हो गया। और जब युद्ध अनिवार्य हो गया, तो फिर दुर्योधन का विनाश हो गया।
अहंकार त्याग कर नम्रता अपनाना
तो अभी क्या कृष्णा ने युद्ध करवाया? नहीं। कृष्णा ने दुर्योधन का जो अहंकार ही बिल्स को लगा था, तो उस रेकॉर्ड अपर मुझे सीख क्या हुई? क्या मैं अहंकार के अनुसार कार्य करूँगा और मैं अहंकार को त्याग करके नम्रता को स्वीकार करूँगा?
वो क्या होते हैं? कभी-कभी हम देख सकते हैं, जानबूझ के वे देख सकते हैं या कभी-कभी हमें भी पता नहीं होता है कि ऐसा है हम में, पर कभी-कभी परिस्थिति वो सामने लाती है और जब परिस्थिति को सामने लाती है, तब भी हमें चुनना होता है। तो अभी यह पता चल जाता है, जैसे मेरा हाथ जोर से घूमता है, दर्द हो रहा है, तब भी मुझे समझा जाता है—’अच्छा-अच्छा, जब हमें कुछ समस्या है, तो मुझे कुछ करना चाहिए।’ यापने तो क्या करना चाहिए? मुझे शायद योग करना चाहिए, एक्सरसाइज करना चाहिए, इससे मैं ठीक हो जाऊँगा। अगर मैं इसको मानूँगा नहीं, ध्यान नहीं दूंगा, तो क्या होगा? वो और खराब होते रहेगा।
इसलिए जब हमारे अंदर के अनर्थ हमें दिखते हैं, तो हमें इसका विरूपकरण करना चाहिए, जस्टिस मतलब नहीं, यह सही है, क्या गलत है? तुमने ऐसे किया, मैंने इसलिए मैंने ऐसे किया, पर क्या है? हम कब तक करने वाले हैं ऐसे? ऐसे कुछ लोग कहते हैं कि एक आँख के लिए एक आँख… तुम मेरी एक आँख तोड़ोगे, तो मैं तुम्हारी एक आँख तोड़ूँगा। अगर वैसे करेगा, तो कुछ समय में सारी दुनिया अंधी हो जाएगी। तो क्या है? हमें एक-दूसरे को माफ करना भी और छोटी-छोटी गलतियाँ होती हैं, उसको माफ करना भी सीखना चाहिए।
उत्तेजना से निपटने की चार तैयारियाँ
तो अभी ये जो है, हमारे, हम प्रसंग से में क्या सीख रहे हैं? हम सबको हमारे जीवन में आएगा कि हम कभी उत्तेजित हो जाएँगे, कभी-कभी हमारे जीवन में ऐसे आएगा कि हमको कोई अपमान करेगा, कोई किसे उत्तेजित करेगा, तो हमें प्रार्थना करनी है कि हे भगवान! तभी हमें शक्ति दे सके ताकि मैं उत्तेजित न हो जाऊँ, ताकि मैं तभी उचित कार्य कर पाऊँ। और न केवल एक प्रार्थना करनी है, उसके लिए हमें तैयारी भी करनी है—’टू प्रिपेयर हाउ डू वी प्रिपेयर फॉर प्रोवोकेशन’—सेल्फ प्रिपेयर, हाउ टू प्रिपेयर फॉर प्रोवोकेशन, हाउ टू बिल्ड स्ट्रेंथ।
वहाँ चार चीज़ें हैं—इमोशनली, स्पिरिचुअली, इंटेलेक्चुअली और सोशलली।
सामाजिक स्तर पर (सोशली): सामाजिक स्तर पर क्या है? हमें अच्छे लोगों से अच्छे संबंध जोड़ने हैं। अच्छे लोगों से अच्छे संबंध जोड़ने हैं। अभी दुर्योधन जो था, उसके साथ बहुत से हितचिंतक थे—भीष्म थे, विदुर थे, द्रोणाचार्य थे—पर वह उसके संबंध उनके साथ अच्छे नहीं थे। अभी अच्छे संबंध का मतलब क्या है? यह नहीं कि ये जब हमसे मिलते हैं, तो हमसे हँसते हैं, अच्छे से बात करते हैं, वो एक स्तर पर अच्छा संबंध है, पर अच्छा संबंध का मतलब यह भी है कि अगर हम कुछ गलती करते हैं, तो हमको गलत क्या है, बताते हैं और हम वो स्वीकार कर सकते हैं। अच्छा संबंध अगर नहीं होगा, तो कोई हमें डाँटता है, तो तुरंत कोई हमको बोलता है—’ऐसे नहीं करना चाहिए, तुम कौन होते हो हमें बताने वाले?’ तो हम प्रतिक्रिया बहुत आक्रामक पद्धति से कर देते हैं। इसलिए जितने हमारे अच्छे संबंध हैं…
इमोशनल स्तर पर (भावनात्मक स्तर पर): हमें खुद को पहले से पता करना चाहिए कि किन चीज़ों से मैं उत्तेजित होता हूँ और जहाँ तक हो सके उन चीज़ों से दूर रहो। अभी हमेशा हम दूर नहीं रह सकते हैं, पर अगर हमको पता है, तो हमें उससे दूर रहना चाहिए जहाँ तक हो सके उतना। अगर कोई व्यक्ति शराब पीता है बहुत ज़्यादा, उसको शराब छोड़नी है, तो अगर वो अपने घर में ही बहुत से शराब के बॉटल्स रखेगा, तो फिर उसको छोड़ना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। तो वो तो हम सब कुछ-कुछ चीज़ों में उत्तेजित हो जाते हैं, तो किन चीज़ों से उत्तेजित होते हैं? अगर हम समझेंगे, तो उससे दूर रह सकते हैं। तो कभी-कभी हम जानते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति है, हम सबके जीवन में ऐसे हो सकते हैं व्यक्ति, जिन से हम बात करते हैं, तो बात करते-करते छोटी बात बड़ी हो जाती है और फिर वो हम पर चिल्लाते हैं, हम उन पर चिल्लाते हैं और फिर बहुत झगड़ा हो जाता है। तो अगर ऐसे में पता है, तो फिर क्या है? उस व्यक्ति से ऐसे समय पे मिलो जब हम शांत हो। मान लीजिए अगर हमारा लंबा दिन हुआ है, 10-15 समस्याओं का हमने सामना किया है, हम फिर थक गए हैं, हम थोड़े से चिड़चिड़े हो गए हैं और उस समय ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं, तो क्या होगा? तो फिर तभी विस्फोट ही हो जाएगा। तो हमें खुद को समझना है कि क्या मेरे, क्या चीज़ें मुझे उत्तेजित करती हैं? या तो उन चीज़ों को टालो या उन चीज़ों का सामना बहुत सावधानी से करो। जैसे अगर हम रोज़ रस्ते पर जाते हैं और अगर हम जानते हैं कि यहाँ पर कोई खड़ा है, यहाँ पर कोई स्पीड ब्रेकर है, तो फिर तभी धीरे से जाओ, वहाँ पर तेजी से मत जाओ। तो वैसे हमें खुद की जो उत्तेजित करने वाली चीज़ें हैं, वो समझनी चाहिए, वो भावनात्मक स्तर पर हम खुद को सुरक्षित कर सकते हैं, खुद की शक्ति बढ़ा सकते हैं।
आध्यात्मिक स्तर पर: क्या है कि हम हमारी साधना करते हैं। हमारी साधना होती है, वो हमें अंतरंग रूप से भगवान से जोड़ती है और जब भगवान से हमें जोड़ती है, तो उसके द्वारा हम हमको अंदर से शक्ति मिलती है, हम जो परिस्थितियों से उत्तेजित नहीं हो जाते हैं। अगर हम एक बड़ी बिल्डिंग के नीचे हैं और एक बड़ी बिल्डिंग है उसके नीचे हैं, तो हमको लगेगा यह बिल्डिंग इतनी बड़ी है, पर वो बिल्डिंग के ऊपर हम हवाई जहाज़ से जा रहे हैं, तो क्या होगा? यह बिल्डिंग तो इतनी छोटी है! तो उस तरह से क्या है? जब हम भगवान की भक्ति करते हैं, तो हमारी चेतना ऊपर उठती है। जब हमारी चेतना नीचे होती है, तो छोटी-छोटी समस्याएँ भी बहुत बड़ी लगती हैं, छोटा-छोटा उत्तेजन भी बहुत बड़ा लगता है, पर जब हम साधना करते हैं अच्छी तरह से, तो हमारी चेतना ऊपर उठती है। तो मान लीजिए हम हवाई जहाज़ में गए हैं, ठीक है, इसने ऐसे बोला, क्या इतनी बड़ी बात नहीं है, इस दुनिया है, मैं इसमें होते रहता है, इसको इसको ज़्यादा इतना सीरियस लेने की ज़रूरत नहीं है। हम देखें, ज़्यादा हम साधना अच्छी तरह से कर रहे हैं, तो हम वही जो चीज़ें हैं जो हमें उत्तेजित करते हैं, उससे हम उतना उत्तेजित नहीं होंगे।
बौद्धिक स्तर पर: हमें हमारे शास्त्रों का अध्ययन करना है। शास्त्रों के अध्ययन से क्या होता है? जो हमारी बुद्धि है, वो सतर्क होती है। तो जब हम उत्तेजित हो रहे होते हैं, तो हमें समझ में आता है। कभी-कभी क्या होता है कि कुछ लोग… अभी कोई हमारे घर में कोई चोरी करने आता है, हमको पता चल रहा है, तो हम पुलिस को बुलाएँगे, दरवाज़ा बंद कर लेंगे, कुछ चिल्लाएँगे, फिर उतना आसान चोरी नहीं कर पाएगा। पर चोर आता है, हमको पता ही नहीं चलता है, चोरी कर रहे हैं, चोरी करके चला आता है, तो फिर हम कुछ नहीं कर पाएँगे। तो इसलिए हमें क्या करना है? तो उसी तरह से हमारे अंदर जब अनर्थ आते हैं, अगर हम शास्त्र नहीं पढ़ रहे हैं, तो कब अनर्थ आ गए, कब हमें उत्तेजित कर दिया, यह कुछ समझ भी नहीं आता है हमको। पर शास्त्र नहीं पढ़ रहे हैं, तो हम अंदर से हम सतर्क हो जाते हैं।
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादी गौर भक्तवृंद
हरे कृष्ण हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण!
तो उससे क्या होगा? हमारा मन अगर हमें प्रतिवेश करने का प्रयास करेगा, तो हमारे अच्छे संबंध हैं, हमें बचा पाएँगे। इस तरह से हम आगे बढ़ सकते हैं।
मन, बुद्धि और उत्तेजना: एक आंतरिक संघर्ष
और फिर यह एक डायग्राम के रूप में मैं दिखा रहा हूँ। यह आखिरी पॉइंट है—हमारे अंदर जो है, आत्मा है और आत्मा के आजू-बाजू में मन और बुद्धि है। तो क्या होता है? जब हमारा मन अनियंत्रित होता है, जब हम रजोगुण या तमोगुण में होते हैं, जब हमारे अनर्थ बहुत शक्तिशाली होते हैं अंदर, तो क्या होता है कि बाहर से कोई उत्तेजित करने वाली हमको चीज़ दिख जाती है, तो उससे हम उत्तेजित हो जाते हैं और हमारा मन कुछ प्रतिक्रिया कर देता है और हम मन के अनुसार कार्य कर देते हैं और जो हमारी बुद्धि है, वो दूर रह जाती है।
बुद्धि क्या—यहाँ पे देख रहे हैं—बुद्धि कहाँ पीछे चली गई है? हम बुद्धि के बारे में कुछ विचार ही नहीं कर रहे हैं, हमारा मन ही पूरा कार्य कर रहा है। तो मन बोलता है—’अच्छा, इसने ऐसे बोला, मैं ऐसे करूँगा।’
एक बार दो भक्तों में मीडिएशन कर रहा था। मीडिएशन मतलब क्या होता है? दो भक्तों में झगड़ा हो गया है, तो फिर उनको एक झगड़ा सुलझाने के लिए मदद करना। तो एक भक्त नम्रता से बोल रहा था कि, “I know you are very angry with me,”—मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे बहुत क्रोधित हो। तो ये दूसरे भक्त बोले, “No, I am not angry with you,”—नहीं, मैं तुम पे क्रोधित नहीं हूँ। अब वो इस तरह से बोल रहा था कि क्रोधित तो है, पर उसके बाद में वो क्या बोला कि, “Anger is a very expensive emotion and you are not worth it,”—कि क्रोध जो है, यह बहुत महँगी भावना है और तुम उसकी इतनी महँगी भावना के लायक नहीं हो।
अगर कोई ऐसे बोलेगा, तो क्या है? तो कैसे उस तरह से वो भेदभाव को हम उसको सुलझा सकते हैं? तो मतलब कोई एक नम्रता से माफी माँग रहा है, समझाने का प्रयास कर रहा है, पर दूसरा क्या करता है? दूसरा और उसमें अपमान करता है। तो कई बार ऐसे हो जाता है कि हम मन के स्तर पर प्रतिक्रिया करते हैं, तो हम विचार नहीं करते हैं।
तो दूसरी बार ऐसे हुआ कि एक बार बोल रहे थे कि आप नहीं-नहीं करते हैं कि मैंने कुछ गलत किया, तुमने कुछ गलत किया, हम उसको पीछे रख देते हैं। तो वो दूसरे बार समझाते हैं कि आप नहीं करते हैं, कि आप नहीं करते हैं कि तुम बीच में आके मुझसे मिलो, हम बात मान लेंगे। तो वो दूसरे बार बोले—”हाँ, मैं बीच में आने को तैयार हूँ। तुमने दो चीज़ें बोले कि तुमने कुछ गलत किया और मैंने कुछ गलत किया, मैं इसमें से आधी बात मानने को तैयार हूँ। क्या आधी बात? कि तुमने कुछ गलत किया, मैंने कुछ गलत किया, जब मानने को तैयार नहीं हूँ।”
तो अभी कोई इस तरह से भाव रखता है, तो फिर क्या है? उसको सुलझाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। तो कई बार जब हमें उत्तेजित करते हैं, तो हमारा मन हमें नियंत्रण कर लेता है और मन के स्तर पर हम प्रतिक्रिया कर देते हैं, तो फिर उससे सुलझाना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
तो यह एक अनियंत्रित मन है जो ऐसे उत्तेजित के लिए तैयार नहीं है, ऐसे व्यक्ति की परिस्थिति है। यहाँ पर जो व्यक्ति जो अच्छी तरह से साधना की है, जो अच्छी तरह से तैयार हुआ है जीवन के उत्तेजनों के लिए, उसमें क्या होता है? उसका मन दूर आ जाता है, उसकी बुद्धि सामने आ जाती है और जब भी कोई प्रलोभन करने वाली चीज़ आ जाती है, तो फिर वो बुद्धि से उसका सामना करता है। तो फिर जब बुरी चीज़ें होते भी, हमारे जीवन में कोई हमारे साथ बुरा बर्ताव भी करता है, तो हम इस तरह से कार्य करते हैं कि उस बुरी चीज़ों को… “Or we don’t make a bad thing worse”—जो रहा है, नहीं बढ़ाना है, बुरी चीज़ को।
वास्तविक महानता और सहनशीलता
हमारी आध्यात्मिक से कैसे बढ़ा है? वो एक बहुत बड़ा वजन उठा लेता है। ऐसे नहीं है कि भक्ति में भी ऐसे नहीं कि माला जप कर लिया, हँसना-पाल कर लिया, इससे व्यक्ति महान बन जाता है। बहुत सारे ग्रंथों का डिस्ट्रीब्यूशन किया, बहुत सारे पैसे, बहुत सारे मंदिर के लिए डोनेशन कलेक्ट किया—ये सब अच्छा है, कर सकते हैं, पर वास्तव में आध्यात्मिक दृश्य से व्यक्ति कौन महान होता है? जो उत्तेजनों को सहन कर सकता है वास्तव में। अगर महाराज की भक्ति करता है, तो “to tolerate provoked situations”, तो एक तरह से दुर्योधन और इंद्र—दोनों जो उत्तेजन को सहन नहीं कर पाए, नियंत्रण नहीं कर पाए। पर जो इंद्र था, उस समय के बाद नियंत्रण में आ गया, दुर्योधन कभी भी नियंत्रण नहीं आया। फलस्वरूप दुर्योधन का विनाश हो गया।
पर अगर हम भक्ति करते हैं, तो हम भी कभी उत्तेजित हो जाएँगे, पर हम जल्दी से उत्तेजित के परे जा सकते हैं। बहुत चिड़चिड़ा था, तभी वो फिसल गया, तो एक परिस्थिति के कारण तभी हँस दिया—ऐसे नहीं कि वो अच्छा है, पर वहाँ पर हो गया उससे। पर जो उसमें काल्पनिक दृष्टि से बताया जाता है कि तभी द्रौपदी उसका अपमान करती है—’अंधे का बेटा अंधा’, यह क्या है? यह उचित नहीं है, क्योंकि यह द्रौपदी के चरित्र के विपरीत है, यह महाभारत की जो कहानी है, उसके विपरीत है। और इससे क्या होता है? वह जो हँसना, वो एक तरह से मासूम था, वो मासूम न लग के वह पूरा घृणा या ईर्ष्या से या नफरत से भरा हुआ ऐसे लगता है।
और फिर हमने देखा हमारे तरह से क्या था कि कृष्णा ने ऐसे क्यों होने दिया? तो कृष्णा कभी-कभी हमको उत्तेजित करने वाले परिस्थिति में डालते हैं, जिससे कि हमारे अंदर क्या है, वो हमें पता चले। ऐसे डॉक्टर कभी-कभी हाथ को घुमाते हैं, तो अंदर कुछ समस्या है कि नहीं, हमको पता चलता है। तो कृष्णा ने इंद्र को भी उत्तेजित किया और दुर्योधन को भी उत्तेजित किया और दोनों उत्तेजित हो गए। उससे क्या है? जो इंद्र था, वह कुछ समय के लिए उत्तेजित हो गया, जब कृष्णा की शक्ति देखी, तो वह अपनी सही बुद्धि से सही मार्ग में आ गया।
पर जब दुर्योधन… दुर्योधन की प्रतिक्रिया जो थी, वह क्या थी? क्रोध के कारण बहुत ज़्यादा हो गई। ठीक है, द्रौपदी तुम पे हँस भी नहीं, उसने कुछ गलती कर दी, पर उसके कारण उसका वस्त्रहरण करना, उसका अपमान करना, पांडवों का सारा… यह तो बिल्कुल अनुचित है, वह disproportioned है, उचित मात्रा में नहीं है वह। तो फिर उसके बाद में कृष्ण ने अपनी क्षमता दिखाई—चमत्कारिक रूप से द्रौपदी का वस्त्र असीमित कर दिया। कृष्ण शांतिदूत के रूप में आए, पर वो सब को उसने ठुकरा दिया और उसके कारण दुर्योधन का विनाश हो गया।
जीवन के उत्तेजनों का सामना कैसे करें?
तो हमने देखा अंत में कि हम सबको भी… हम सब भी कभी-कभी जीवन में उत्तेजित हो जाएँगे या उत्तेजित करने वाली हमारे जीवन परिस्थिति आ जाएगी, तो उसका हम सामना कैसे करना है? तो हमें प्रेय और प्रेपर… भगवान से प्रार्थना करनी है, जब भी ऐसे समस्या आएँगे, हमें सामना कर सको और हमें तैयार होना है। तैयार कैसे होना है? चार स्तर पर हमने देखा कि भावनात्मक स्तर पर क्या हमको उत्तेजित करता है, उससे दूर रहे; आध्यात्मिक स्तर से हम साधना करके हमारे चेतना को ऊपर उठाए ताकि इस छोटी चीज़ों को हम ज़्यादा बड़ा न बनाएँ; बौद्धिक स्तर पर शास्त्रों के अध्ययन से हम बुद्धि को अशक्त बनाएँ ताकि हम बुद्धि के द्वारा समस्या का सामना करें, न केवल हमारे मन के द्वारा हम प्रतिक्रिया करें; आखिरी—हम हमारे संबंधों को अच्छा बनाएँ, अच्छे लोगों से अच्छा संबंध बनाएँ ताकि अगर हम कुछ गलत चीज़ करने लगते हैं, तो वो हमें सही मार्ग पर ला सकें।
प्रभुपद हमें कहते हैं कि व्यक्ति की महानता किससे दिखती है? कि उत्तेजित करने वाली परिस्थितियों में वो कैसे कार्य करता है, उससे उसकी महानता हमें समझ में आती है।
बहुत धन्यवाद! हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे कृष्ण!
किसी का कोई सवाल है, प्लीज मैसेज बॉक्स में टाइप कर दीजिए।
“It is better to admit that we are wrong and be right than to argue that we are right and be wrong.”
— यह बेहतर है कि मैं स्वीकार करूँ मैं गलत हूँ और उससे हम सही हो जाएँगे, न कि मैं झगड़ा करूँ कि मैं सही हूँ और उससे मैं गलत हो जाऊँगा।
प्रश्नोत्तर सत्र
अभी एक सवाल पूछा है एक माताजी ने—प्रभु जी, आपके उसमें खुलता है क्या? I got it.
तो फिर अभी कृष्ण सब कुछ जानते हैं, तो कृष्ण को हमें उत्तेजित करने की ज़रूरत क्या है? कृष्ण भगवान को हमें उत्तेजित करने की ज़रूरत नहीं है। वास्तव में हमें हमारे अंदर जो अशुद्धियाँ हैं, जिनके कारण हम उत्तेजित होते हैं, वह समझना ज़रूरी है ताकि हम उनको ठीक कर सकें। कि जैसे मान लीजिए मेरे हाथ में कुछ बीमारी है, कुछ ज़ख्म हुआ है, मुझे भी पता नहीं है, पर पता नहीं अंदर से बढ़ते जाएगा वो। तो इसलिए जब कोई हाथ को घुमाता है, तो पता चलता है—’अच्छा, यहाँ पर कुछ ज़ख्म है, उसको ठीक करना पड़ेगा मुझे।’ तो वैसे ही यहाँ पर भी है, कृष्ण का जानना महत्वपूर्ण नहीं है, हमारा जानना और हमारा उसका हल करना महत्वपूर्ण है। तो हमें हल कराने के लिए कृष्ण बताते हैं।
प्रभु जी ने पूछा—”क्या यहाँ पड़ेगा मुझे कृष्ण का जानना महत्वपूर्ण नहीं है?”
मुझे पता है कि मुझे सुबह मुझे इतने बजे उठना था, पर मैं इसके आधे घंटे देर से उठ गया, मुझे यह काम करना था इस समय पर, यह मैं आलसी हो गया। तो हम जानते हैं हमने क्या किया इस भूतकाल में, पर उसको हम परिवर्तित नहीं कर सकते हैं। तो जैसे हम जो जानते हैं, पर उसमें कंट्रोल नहीं है—Knowledge without intervention.
God’s knowledge of the future is like our knowledge of the past.
तो अभी ऐसे नहीं है कि हम सब एक तरह से कटपुतली हैं और हम सब नाचे जा रहे हैं। तो जो भविष्य है, वो किस तरह से निर्धारित है, यह हमें समझना ज़रूरी है कि मैं भूत, वर्तमान, भविष्य सब कुछ जानता हूँ, उसका मतलब क्या है? हम कोई भी शास्त्र का एक विधान… उसको एक विधान को absolute नहीं मान सकते हैं। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु—तुम चिंतन करो और चिंतन करके फिर फैसला करो, तुम्हें क्या उचित कार्य करना है।
तो कैसे है कि कृष्ण knows the consequences of our choices. पर भगवान नहीं choices करते हैं। अपने choices से, जब मैं गाड़ी चलाए जा रहा हूँ, तो अगर किसी के पास पूरे रास्ते का मैप है और वह आगे जानता है कि अगर मैं इस रास्ते पर इधर जाऊँगा, तो अगर इस रास्ते से मैं इधर पहुँच जाऊंगा, तो… नहीं, यहाँ पहुँचूँगा, तो इस रास्ते से पूरी समस्या आ जाएगी।
एक तरफ बलदेवा विद्याभूषण जी कहते हैं अपने गोविंद भाष्य में, जो वेदांत सूत्र के भाषण में, वो कहते हैं कि अगर हम पूर्णतया एक कटपुतली के समान हैं, भगवान ही हमारे सारे कार्यों को जानते हैं, इसका मतलब है वो नियंत्रित कर रहे हैं, तो फिर क्या होगा? तो फिर शास्त्रों का ही कुछ अर्थ नहीं रहेगा। शास्त्रों में बताया जाता है कि आप ऐसा कार्य करो, ऐसा कार्य मत करो। तो अभी अगर हमें कुछ नियंत्रण है ही नहीं कुछ पे, अगर हमारे चुनाव पहले से ही नियंत्रित हो गए हैं, तो फिर शास्त्र देने का फायदा ही क्या है?
और दूसरी, उससे और भी एक गंभीर उसका परिणाम होता है कि कुछ लोगों की बुरी प्रवृत्तियाँ होती हैं और कुछ लोग बुरा कार्य करते हैं। तो अगर जो बुरा कार्य करते हैं लोग, अगर उनकी अपनी स्वेच्छा है ही नहीं, उनकी स्वतंत्रता है ही नहीं, तो मतलब क्या है? भगवान उनसे बुरा कार्य करवा रहे हैं और उनके बुरा कार्य करते हैं, बाकी सबको दुख दे रहे हैं और फिर उनके बुरे कार्य का उनको भविष्य में कर्मफल दे रहे हैं—मतलब क्या है? भगवान ही सब दुख निर्माण कर रहे हैं उनके बुरे कार्य का, बाजू-बाजू के लोगों को और फिर बाद में उनको भविष्य में करते हैं।
तो अगर हम निर्माण करते हैं, तो हम भगवान करते हैं, जो हम सबको दुख दे रहे हैं। तो ऐसे नहीं है कि कृष्ण… कृष्ण दुर्योधन की स्वेच्छा का आदर करते हैं, कृष्ण दुर्योधन को भी सही मार्ग चुनने का मौका देते हैं। और भगवान अलग-अलग तरह से कार्य करते हैं। अभी उस समय भगवान ने दुर्योधन को उत्तेजित किया, पर बाद में जब कृष्ण शांतिदूत के रूप में गए, तभी उसको शांत करने का प्रयास किया, उसको साम, दाम, भेद, दंड—सब से उसको समझाने का प्रयास किया।
तो क्या है? भगवान अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग पद्धतियों से कार्य करते हैं और हर चीज़ का उद्देश्य क्या है कि जो व्यक्ति सही मार्ग पर आ जाए। तो कभी-कभी डॉक्टर क्या करते हैं? हमको कितनी समस्या है, वो दिखाते हैं और कभी-कभी दवाई देते हैं। तो सिर्फ दवाई देंगे, तो अगर रोगी को लगेगा नहीं कि समस्या बहुत खतरनाक है, तो दवाई लेगा भी नहीं। पर अगर उसको सिर्फ दिखाएँगे इतनी समस्या खतरनाक है, तो बाद में तो हताश हो जाएगा वो—कुछ दवाई है या नहीं? इसके लिए तो दोनों करते हैं।
तो जब भगवान कभी ऐसी परिस्थिति देते हैं हमारे जीवन में, हम उत्तेजित हो जाते हैं, दुर्योधन को उत्तेजित करते हैं, तो उसका उद्देश्य क्या है? उसको समझें कि ठीक है, मुझमें कुछ अनर्थ है, इसका मुझे सामना करना चाहिए, इसका मुझे प्रतिकार करना चाहिए, इसका नियंत्रण करना चाहिए, शुद्धि करना चाहिए। अगर वो नहीं करता है, तो यह भगवान का करुणापूर्ण स्वभाव है।
निष्कर्ष और मुख्य सीख
नश्च चेसा… अगर विस्तार से देखें, तो हमें लोगों की क्लियर हो जाएगी कि कई लोग दोष भी देते हैं कि मेरी किस्मत ऐसी क्यों चल रही है या मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? ये भी समझ में आ जाएगा कि जो भी चीज़ हम कर रहे हैं, उसके कारण हम खुद हैं, क्योंकि हमने वो choice लिया है, जो आपने अभी बताया कि हम जो choice करेंगे, उसके अनुसार हम उसका reaction मिलेंगे।
यह कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि हमारे जीवन में चुनाव करना बड़ा मुश्किल होता है। कभी-कभी हमारे जीवन में एक अच्छा मार्ग है और दूसरा बुरा मार्ग है और तभी हमें कुछ स्वेच्छा लगता है, दृढ़ संकल्प रहता है, हमको अच्छी विवेक बुद्धि लगती है चुनाव करने के लिए। पर कभी-कभी ऐसे होता है कि हमको लगता है दोनों जो option हैं, दोनों बुरे ही हैं, अभी मैं क्या करूँ इसमें? तो ऐसे भी हो सकता है, कभी-कभी हमारे जीवन में परिस्थिति आती है कि we don’t have the choice between good and bad, we only have a choice between bad and worse—अच्छा और बुरा में चुनाव नहीं है, पर बुरा में चुनाव है।
तो कभी-कभी, हमारे जीवन में… आज से आप कहते हैं किस्मत फूटी है, तो हाँ, कभी-कभार कुछ destiny होता है हमारे किस्मत के कारण, हमारे दैवा के कारण हमारे जीवन में ऐसी परिस्थिति आती है, जिसमें कोई भी अच्छा चुनाव नहीं है। पर फिर भी हम असहाय नहीं हैं, उसमें भी हमें चुनाव करना है। अगर ऐसे तो लगता है कि मैं ऐसी परिस्थिति में हूँ कि मैं अच्छा कुछ भी नहीं कर सकता हूँ, तो एक सवाल पूछ सकते हैं—थाँ, परिस्थिति है, तो मैं क्या करूँ? मैं कुछ नहीं कर सकता। या सही में कुछ नहीं कर सकते? अगर हम चाहे, तो क्या वो रिश्ते को और खराब नहीं कर सकते हैं? 15 मिनट के लिए जिह्वा को खुला छोड़ दो, जो भी मन में आए बोल दो, तो कितना भी अच्छा रिश्ता हो जाएगा, वो बर्बाद हो सकता है 15 मिनट की बातों से। तो क्या है? कोई भी परिस्थिति है, अगर हम उस परिस्थिति को और हम और खराब कर सकते हैं, तो उसका मतलब है, हम इतने असहाय हैं नहीं, जितना हमको लगता है। अगर हम परिस्थिति को खराब कर सकते हैं, तो परिस्थिति को अच्छा भी कर सकते हैं और कभी-कभी काफी अच्छा कर सकते हैं, कभी-कभी थोड़ा अच्छा कर सकते हैं।
तो ऐसे नहीं कह सकते हैं कि सब कुछ हमारे हाथ में है, कभी-कभी ऐसे होता है कि बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं रहता है। पर फिर भी कुछ तो हमारे हाथ में रहता है।
तो इंग्लिश में से कहते हैं, कुछ लोग कहते हैं कि “We are the masters of our destiny”—कि हम हमारे नियति के, दैव के स्वामी हैं। तो यह उचित नहीं है। हम हमारे नियति को, हमारे दैव के स्वामी नहीं हैं। पर हम हमारे दैव के, हम हमारा दैव बनाते हैं।
दैव के स्वामी नहीं हैं मतलब क्या है? कि ऐसे नहीं है कि मेरी इच्छा के अनुसार और मेरे प्रयासों के अनुसार जो भी चाहिए, मुझे मिल जाएगा वो। तो उस तरह से मतलब हम स्वामी नहीं हैं, पर फिर भी हम हमारे दैव के, हम शिल्पकार हैं, हम कह सकते हैं, हम maker हैं। क्योंकि क्या है? अगर हम उचित कार्य करेंगे अभी, अच्छा कार्य करेंगे, तो ज़रूर उससे भविष्य अच्छा होगा। तुरंत होगा, कुछ समय के बाद होगा, वो अलग-अलग है, पर ज़रूर अच्छा होगा। क्योंकि क्या है? क्योंकि क्या है, प्रभु जी… प्रभु जी अच्छा करते हैं।
प्रभु जी, क्लास था, जो इतना प्रैक्टिकल है हम सबके जीवन में और ये स्थितियाँ तो हम सबके जीवन में आती ही रहती हैं। आज की क्लास से क्या होगा? प्रभु जी की जय!
हरे कृष्ण! हरे कृष्ण! हरे कृष्ण!