Why Rama banished Sita – Hindi
Congregation program in the Middle East
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Lecture Summary
इस प्रवचन में रामायण से जुड़े कुछ भ्रामक विचारों को स्पष्ट किया गया है, विशेषकर सीता त्याग के कारण और रावण के चरित्र को लेकर। पूरे पाठ का मुख्य सार निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
- रावण एक आदर्श भाई नहीं था: रावण ने राम से युद्ध अपनी बहन शूर्पणखा के सम्मान की रक्षा के लिए नहीं किया था। सीता के रूप-सौंदर्य का वर्णन सुनकर उसने अपनी वासना की पूर्ति के लिए यह षड्यंत्र रचा था। वहीं, शूर्पणखा ने भी रावण का उपयोग केवल अपने स्वार्थ और राम-लक्ष्मण से प्रतिशोध लेने के लिए किया था।
- त्याग और उच्च कर्तव्य का भाव: वाल्मीकि रामायण का सबसे प्रमुख गुण ‘त्याग’ (Sacrifice) है। राम ने केवल अपनी ‘ख्याति’ या इमेज बचाने के लिए सीता का त्याग नहीं किया था (जैसा कि भगवान ने कृष्ण अवतार में 16,000 रानियों को अपनाकर समाज में उनकी रक्षा की थी)। राम ने यह कदम एक आदर्श राजा के रूप में समाज के समक्ष अनासक्ति और राजधर्म का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उठाया था।
- राम और सीता का समान त्याग: सीता को वन भेजना केवल सीता का त्याग नहीं था, बल्कि यह राम का भी बहुत बड़ा व्यक्तिगत त्याग था। राम ने सीता से असीम प्रेम किया, उनके जाने के बाद महल में रहते हुए भी एक संन्यासी का जीवन जिया और यज्ञ के दौरान सीता की सोने की मूर्ति रखकर अपना पत्नी-व्रत धर्म निभाया।
- अन्य पात्रों का निस्वार्थ भाव: रामायण में भरत का राजपाट ठुकराना, लक्ष्मण का भाई की सेवा के लिए वन जाना और उर्मिला का पति को निस्वार्थ भाव से विदा करना—यह सभी प्रसंग यह दर्शाते हैं कि व्यक्तिगत सुख से बड़ा उच्च कर्तव्य और निस्वार्थ प्रेम होता है।
- शास्त्रों को समझने का सही दृष्टिकोण: शास्त्रों में दिए गए प्रसंग (जैसे पिता के आदेश पर वन जाना या पत्नी का त्याग) अक्सर चरम (extreme) होते हैं। इनका उद्देश्य समाज को धर्म, अनासक्ति और निस्वार्थ त्याग के सिद्धांत सिखाना होता है, न कि वर्तमान जीवन में उनकी भौतिक रूप से अंधी नकल करना।
निष्कर्ष: ग्रंथों और उनकी कथाओं को उनके मूल भाव (Context) में ही समझना चाहिए। रामायण का मुख्य उद्देश्य न्याय-अन्याय की सतही बहस से ऊपर उठकर, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च त्याग के आदर्शों को स्थापित करना है।
Full Transcriptions
शूर्पणखा और रावण की वास्तविकता: क्या रावण एक आदर्श भाई था?
हरे कृष्ण! विद्यार्थी ने सवाल पूछा, उसको एक व्हाट्सऐप पर मैसेज मिला था। कि एक लड़की थी, बोल रही थी, “अगर भाई चाहिए, तो मुझे रावण जैसे भाई चाहिए।” क्यों? क्योंकि रावण हमेशा शूर्पणखा के साथ रहा। और शूर्पणखा का आदर, सम्मान बचाने के लिए उसने राम से भी युद्ध कर लिया। और इसके विपरीत “ये पति कभी राम जैसे नहीं चाहिए, क्योंकि जब समय आया तब राम ने सीता का त्याग कर दिया।” तो भी ये शास्त्र हैं, क्योंकि रामायण, महाभारत, ये हमारी संस्कृति में बहुत प्रचलित हैं। तो अनेक लोग क्या करते हैं, इन शास्त्रों का आधार लेकर, खुद की बातों के ऊपर आक्षेप नहीं आने देना चाहते हैं। तो शास्त्रों का कुछ भी उल्टा-पुल्टा विवरण करके, वो लोगों के मन को उत्तेजित और विचलित करते हैं।
तो ये जो रामायण में संदर्भ है, कि सीता को राम जब दूर भेज देते हैं, तो वैसे क्यों किया उन्होंने? वो हम समझने का प्रयास करेंगे आज। तो उसके पहले, सबसे पहले, क्या रावण सच में एक आदर्श भाई था? यहाँ, अगर हमें चर्चा करनी है, तो हमें पृष्ठभूमि देखनी है।
वास्तव में, जब पहले शूर्पणखा, अपने दूसरे भाई जो होते हैं, खर-दूषण, उनको उकसाती है, और कहती है कि आप आके बदला लो मेरे अपमान का। तो तभी, वो खर-दूषण आते हैं अपने सारे 14,000 राक्षसों को साथ में लेके, और राम अकेले उन सब का वध कर देते हैं। त्रिशिरा नाम का एक बहुत ही शक्तिशाली असुर भी होता है, उनका भी वध कर देते हैं। और तभी अकम्पन नाम का असुर, वो बच जाता है, और वो भागते-भागते जनस्थान से लंका चला जाता है। वो रावण को सारा वर्णन करता है कि आपकी बटालियन थी, आपकी सारी सेना का विभाग जो जनस्थान में था, उसका विनाश हो गया है।
किसकी इतनी जुर्रत हुई, ऐसे करने के लिए? रावण क्रुद्ध हो जाता है, “मैं अभी जाके उससे बदला लूँगा!” और अकम्पन कहता है कि पंगा मत लो आप, इसके हाथ में मत पड़ो आप। तो जब रावण सुनता है तो गंभीर हो जाता है। वो जानता है कि अकम्पन भी एक योद्धा है, और वो जानता है कि अगर अकम्पन कह रहा है कि युद्ध नहीं करना चाहिए, और वैसे अकेले मानव ने इतने सारे राक्षसों को हरा दिया है, तो वो कोई साधारण नहीं होगा। और रावण को भी याद होता है कि उसको मानवों से सुरक्षा का वरदान नहीं है, तो इसलिए सोचता है कि छोड़ो, कुछ करना नहीं।
शूर्पणखा का उकसाना और रावण का असली स्वार्थ
उसके बाद शूर्पणखा आती है। और जब वो आके रावण को कोसने लगती है, कहती है वो कि “तुम कैसे राजा हो? तुम कैसे भाई हो? तुम्हारी एक अपनी बहन का अपमान हुआ है, तुम्हारे एक नागरिक का अपमान हुआ है, और तुम यहाँ ऐशो-आराम में रह रहे हो!” तो वो भर्त्सना करती है। तो जब रावण सुनता है, क्या हुआ, उससे पूछता है। तो बोलती है कि ऐसे-ऐसे हुआ। वो भी तभी बता देती है, कि रावण पहले तो कोई प्रतिक्रिया, राम के प्रति कुछ करने के लक्षण नहीं दिखा रहा है।
तभी वो एक दूसरा उपाय करती है। अगर दूसरा क्या उपाय करती है वो? वह रावण का अगर क्रोध नहीं उकसा सकती है, तो रावण का काम उकसाती है। तो रावण उससे कहता है कि “देखो! परेशान किया फिर तुमने, तब उन्होंने आक्रमण किया है, गलती तुम्हारी है, ऐसा नहीं है।” क्योंकि रावण सारे समाज के सामने इंडिपेंडेंस दिखा रहा है तो वो उसका जो दोष है शूर्पणखा पे डालने का प्रयास करता है कि “तुम नहीं मानती।”
वास्तव में शूर्पणखा भी क्या है? सब जो लोग होते हैं, इतिहास को जो भी गढ़ता है, वो अपने हिसाब से गढ़ता है… ऐसा इंग्लिश में कहावत है। तो इतिहास पूरा वहाँ पे राम की बहुत ही सुंदर पत्नी है, और मैं सोच रही थी कि… वो वर्णन करने लगती है। और रावण बड़ा कामुक होता है। जैसे ही सीता के सौंदर्य का वर्णन सुनने लगता है, वो बोलता है और फिर वह षड्यंत्र बना लेता है।
तो यहाँ यह नहीं है कि रावण शूर्पणखा के अपमान का बदला लेना चाहता था। इसका उद्देश्य क्या था? उद्देश्य था कि अपने काम (वासना) की पूर्ति करने के लिए उसने ये सब कुछ किया। और शूर्पणखा भी वहाँ पे जब गई थी, वो रावण के बारे में सोच ही नहीं रही थी। पहले तो वो जंगल में भटक रही थी, वहाँ पे उसने क्या देखा उसको कुछ भोजन मिल जाएगा। तो फिर जब वो गई वहाँ पे उसने राम को देखा, तो जो उसका लंच बॉक्स था, वो उसका मैरिज पार्टनर बन गया। और सोचने लग रही थी, “अरे, आपसे ही विवाह हो गया है तो सीता का क्या होगा?” तो अब राम जब ध्यान नहीं दिखा रहे हैं, तो जो हवस रास्तों में उसका हथियार था, उस मोह से छुड़ाने के लिए वो सीता पर झपटी।
तो इसमें वो सीता के लिए या रावण के लिए कुछ भी नहीं कर रही थी और रावण भी अपनी हवस से ही कार्य कर रहा था। इसमें कोई भाई-बहन के लिए स्वार्थ था? “उसको भाई चाहिए है तो फिर उसकी बड़ी दुर्गति हो जाएगी।” वास्तव में बाद में पता चलता है रावण ने क्या किया। इसलिए एक चीज़ बाहर से तो अच्छी लगी कि उसने अपनी जान कुर्बान कर दी, पर अंदर से क्या था? उसको बली का बकरा बना लिया था। और जब शूर्पणखा को ये पता चला तो बड़ी क्रुद्ध हो गई वो और तभी सोच रही थी कि ये मेरे भाई ने मुझे विधवा बनाया है, तो उसको भी मेरा नाम काटना है, उसके लिए राम से बदला लेना है। ऐसे नहीं था उसको कि ये राम इतना शक्तिशाली है तो रावण राम के प्रति कुछ अपराध करेगा।
राम ने सीता का त्याग क्यों किया? प्रतिष्ठा या कर्तव्य?
सबसे पहले हमें देखना है कि हर शास्त्र का एक भाव होता है। कई लोग कहते हैं कि राम की अपनी ख्याति थी, अपना रेपुटेशन था, इसके प्रति उन्होंने अपनी पत्नी का भी त्याग कर दिया। केवल ख्याति की बात नहीं है। ख्याति का एक सवाल है उसमें, पर उससे और महत्वपूर्ण चीज़ें हैं। अगर सिर्फ ख्याति या नाम या इमेज बचाने की ही बात होती, तो वही प्रभु रामचंद्र दूसरे अवतार में कृष्ण के रूप में आते हैं। और कृष्ण के रूप में वह क्या करते हैं?
एक असुर होता है भौमासुर नाम का। और इस भौमासुर ने, जो बड़ा शक्तिशाली असुर था, उसने अनेक राजाओं को बंदी बना लिया होता है। और वह राजाओं की कन्याएं होती हैं, उनको भी बंदी बना लिया होता है। तो सोलह हजार कन्याओं को बंदी बना लिया होता है। उसकी योजना होती है कि वो सोलह हजार कन्याओं को भैरव की बलि में अर्पण करेगा, और उनकी जो राजकुमारियां हैं, उनसे वो संग करेगा। तो अभी ऐसे समय में, तभी वो जो राजाओं से संदेश भेजते हैं कि कृष्णा को हमें बचाना होगा। बहुत प्रार्थना करते हैं, लोग संदेश भेजते हैं, और कृष्णा आते हैं वहाँ पे। और कृष्णा भौमासुर का वध करते हैं।
तो इसके बाद में, वो उन राजकुमारियों को छुड़ाते हैं। तो वो राजकुमारियां कहती हैं कि “अभी क्योंकि हम किसी के यहाँ, जिसने अपहरण किया है, हम किसी और के घर में रहे हैं, तो अभी हमें कोई स्वीकार नहीं करेगा।” तो तभी कृष्णा कहते हैं, “तो तुम क्या चाहते हो? मैंने तुम्हें अभी आज़ाद कर दिया, और क्या चाहते हो?” तो वो कहती हैं, “तो तुम हमें स्वीकार करो।” तभी कृष्णा क्या करते हैं? उन सबको अपनी रानी की इज़्ज़त देते हैं, सबको अपनी रानी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। और अगर कृष्णा वैसे नहीं करते थे, तभी तो उनको कोई स्वीकार नहीं करता था। तो उनकी बड़ी ही गुरुतर परिस्थिति हो जाती थी।
तो क्या किया यहां? अगर ख्याति की ही बात होती, तो कृष्णा वो सब रानियों को क्यों स्वीकार करते हैं? राजकुमारियों को अपनी रानियां क्यों बनाते हैं? जबकि यहाँ पर उनका कोई संबंध था ही नहीं! भगवान ने उनका संबंध बनाया है। क्योंकि जो समाज में इज़्ज़त है वो बनी रहे। अगर इज़्ज़त की ही बात होती है तो कृष्णा ऐसे क्यों करते हैं? तो यह कहने की बात है कि जो भी कार्य होता है, उसके बारे में तुरंत कुछ निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। अगर ख्याति की बात होती है कि उसमें इतना भाव नहीं है। तो व्यक्ति जो है, अलग-अलग जीवन, व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग प्रसंगों पर प्रभाव करना होता है। तो वही व्यक्ति, वही भगवान यहाँ आप कृष्णा अवतार में देखते हैं तो बिल्कुल विपरीत कार्य कर रहे हैं। वो क्या कर रहे हैं? किसी और का नाम बचाने के लिए उसको स्वीकार कर रहे हैं। तो फिर वो भाव को क्यों त्याग करते हैं? सीता को क्यों छोड़ते हैं?
रामायण का मूल भाव: त्याग और अनासक्ति
पहली बात है कि हर एक शास्त्र का एक भाव होता है, और सब कुछ वो शास्त्र का भाव है। तो रामायण की शुरुआत में वाल्मीकि ऋषि पूछते हैं नारद मुनि को कि “ऐसा कोई व्यक्ति है जिसका आदर्श चरित्र है? कोई सर्वगुण संपन्न ऐसा कोई व्यक्ति है?” तो संपूर्ण रामायण में अलग-अलग गुण दिखाये गये हैं, पर सबसे कंसिस्टेंट, सारे रामायण में अगर एक गुण सबसे अधिक दिखता है हर जगह, वह है त्याग का गुण। तो जो भी आदर्श व्यक्ति है रामायण में, वह क्या कर रहे हैं? त्याग कर रहे हैं। अभी क्या सही है और क्या गलत है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि त्याग करना है।
यहां पर मतलब क्या है कि जब राम को वनवास भेजा जाता है, पहले तो तभी राम कह सकते थे, “क्या है? मेरी क्या गलती है? मैंने तो अभी तक बिल्कुल नेक जीवन जिया है।” नहीं, मेरा कर्तव्य क्या है, यह महत्वपूर्ण है। मेरा कर्तव्य क्या है कि मुझे मेरे पिता का आदेश पालन करना होगा। लक्ष्मण बड़ा क्रुद्ध हो जाता है। लक्ष्मण कहता है कि “तुम क्यों जाओ जंगल में? तुम्हें नहीं जाना चाहिए, तुम युद्ध करो!”
तभी राम कहते हैं कि “वास्तव में जब मैंने कैकेयी के मुख से सुना वचन कि मैंने 14 साल वनवास जाना है, तभी मैं समझ गया कि यह मेरे पिता की इच्छा नहीं है। पर ये पिता के वचन हैं, तो मैं उनका आदर करूँगा। तो तुम जानते हो कि वास्तव में कैकेयी भी मुझे कितना प्यार करती है, कि हम सबको प्यार करती है अपने पुत्रों के समान।” तो लक्ष्मण कहता है तो राम कहते हैं कि “कैकेयी का प्यार हमारे प्रति स्नेह था, वो गंगा नदी के समान था।” लक्ष्मण अभी तो क्रुद्ध हो जाता है! “हर बात से माता प्यार करती है, मुझे भी वही समझ में नहीं आ रहा है, एक रात में गंगा सूख कैसे गई!”
तो तभी लक्ष्मण कहता है कि “कायर ही अन्याय को दैव बोलके स्वीकार कर लेते हैं। जो वीर होते हैं, वह अन्याय का प्रतिकार करते हैं। तुम्हें इस अन्याय का प्रतिकार करना चाहिए, तुम्हें युद्ध करना चाहिए।” और लक्ष्मण इतना क्रुद्ध हो जाता है कि “अगर जो भी तुम्हारे राज्याभिषेक के बीच में आएगा, अगर तुम्हारे तीर मेरे पिता के पार जाएंगे, तो वो मेरे सीने से पार होके जाना पड़ेगा यहाँ से!”
तो राम कहते हैं कि “मुझे मेरे पिता के वचनों का पालन करना है।” तो यहां पे भाव क्या है? त्याग का भाव है। कि सही क्या है, गलत क्या है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। जो उच्च कर्तव्य क्या है, वह देखते हैं। और वही भाव है।
सीता, लक्ष्मण और उर्मिला का निस्वार्थ त्याग
जब सीता राम के साथ जाती है, राम तो सीता से कहते हैं कि “आपको आने की कोई ज़रूरत नहीं है। आप यहीं पर रहो” और किस तरह से तुम्हें रहना चाहिए, उपदेश भी देते हैं। सीता कहती है कि “मैं तुम्हारे साथ आऊँगी क्योंकि मेरा कर्तव्य है।” तो वो भी कह सकती है कि “मैं तो राजकुमारी हूँ और मेरे पिता ने मेरा हाथ एक राजकुमार को दिया था। तुम जा रहे हो, मैं क्यों तुम्हारे साथ आऊँ?” वो कह सकती है। पर यहां पर सीता जाती है, वो भी त्याग का भाव है।
लक्ष्मण भी जब जाता है तो क्या है? लक्ष्मण को जाने की ज़रूरत नहीं है। सीता-राम पति-पत्नी हैं तो पत्नी को पति के साथ वन में जाना है, पर भाई को अपने भाई के साथ जाने की ज़रूरत नहीं थी। तो जब लक्ष्मण जाता है, वो क्या है? उनका त्याग है। जब लक्ष्मण तैयार होते हैं जाने को, तो लक्ष्मण की पत्नी होती हैं उर्मिला, वो कहती हैं “मैं भी तुम्हारे साथ आऊँगी।”
तो लक्ष्मण कहते हैं “नहीं, अगर तुम मेरे साथ आओगी तो मुझे तुम्हारी देखभाल करनी पड़ेगी। मुझे राम की निरंतर सेवा करनी है।” उर्मिला कहती है, “नहीं नहीं तुम्हें मेरी कोई देखभाल नहीं करनी पड़ेगी, मैं खुद को संभाल लूँगी। मैं तुम्हें तुम्हारी सेवा में मदद करूँगी।” तो लक्ष्मण कहते हैं “नहीं, अगर तुम सेवा में मदद करने जाती हो, तो आप एक दूसरी सेवा करो। अगर मैं अपने बड़े भाई की सेवा मैं कर रहा हूँ, तो मैं माता-पिता की सेवा नहीं कर सकता हूँ। क्योंकि अब यह दो जगहों पर हैं, तो फिर मैं सेवा नहीं कर सकता हूँ। इसलिए मैं मेरे बड़े भाई के साथ जब जा रहा हूँ, तुम जो मेरे माता-पिता हैं, तुम उनकी सांत्वना बनकर सेवा करो।” तो यह भाव से उर्मिला स्वीकार कर लेती है।
भरत का आदर्श और राम का अंतिम निर्णय
और फिर जब भरत आ रहे हैं, तो भरत क्या करते हैं? भरत पूरा राज्य जो है, जब राम स्वीकार नहीं करते हैं, तो क्या करते हैं? राम अपनी पादुका प्रदान करते हैं। और वो कहता है, अगर आज इधर कई जगह ऐसे होता है कि कोई बड़ा रईस व्यक्ति है और फिर उसके बाद में उत्तराधिकार में, तो क्या होता है? बड़ा संघर्ष होता है, “मुझे मिले, मुझे मिले!” तो यहाँ पर भी संघर्ष था। तो संघर्ष क्या था? “मुझे नहीं चाहिए तुम लो, मुझे नहीं चाहिए तुम लो।”
तो सक्सेशन कॉम्प्लेक्स हैं। अगर दो भाईयों में झगड़ा हो रहा है ऐसे, और एक भाई अपनी चप्पल निकाल कर देता है। तो भरत भी उसी तरह से रहते हैं, और आज भी अयोध्या के बाहर जो एक नंदीग्राम नाम की जगह है, वहाँ पर एक झोपड़ी में रहते हैं। तो जैसे वनवास में राम रह रहे हैं, उसी तरह से भरत रहा है। इतना क्या महत्वपूर्ण है कि कर्तव्य क्या है?
और उसी तरह उसी भाव से जब सीता के प्रति कुछ अफ़वाह फैलने लगती है। तो पहले ही जहां तक अफ़वाहों को दूर करने का प्रयास है, राम ने पहले ही किया है कि सीता अग्नि परीक्षा से पास हो चुकी है। पर फिर भी यह बातें हैं। तो अभी राम और सीता यह देखते नहीं हैं कि सही क्या है, गलत क्या है। यहाँ पे भाव त्याग का भाव है। तो अगर त्याग का भाव है, तो सबसे पहले राम देखने के लिए “उनका देखभाल मुझे करनी है। यह दोनों भूमिकाएं हैं, यह दोनों भूमिकाओं से मैं नहीं भाग रहा हूँ।”
होता क्या है आध्यात्मिक संस्कृति में? कि जो सारी संस्कृति जो है, उसका उद्देश्य होता है कि हम आध्यात्मिक प्रगति करें। और आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए अनासक्ति जो है, वह महत्वपूर्ण है। अनासक्ति ही नहीं, वास्तव में जो नैतिक मूल्य हैं, आध्यात्मिक मूल्य हैं, उसके ऊपर आध्यात्मिक प्रगति जो है, उसके ऊपर अनासक्ति है, यह ज़रूरी है। तो इसलिए अभी साधारणतया जो लोग होते हैं, भौतिकवादी होते हैं, भौतिक भोग करना चाहते हैं। भौतिक भोग करने के लिए सबसे अधिक सुविधा जो होती है, वो राजा के पास होती है। और इतना सारा भोग करने की सुविधा होते हुए भी अगर राजा अनासक्त है, तो फिर उससे सारी प्रजा पे एक बहुत प्रभाव होता है।
तो इसलिए जो राजा होता है, वो बड़े सिंहासन पर बैठता है। तो जो भौतिक दृष्टि से देखेंगे तो उसको कोई आदर नहीं देगा, पर जो लोग देखते हैं, इसमें बहुत बड़े लोग होने चाहिए। तो राजा की धर्मनिष्ठता से समाज को एक उदाहरण मिलता है। सारा समाज भी धर्मनिष्ठता अपनाता है—यथा राजा तथा प्रजा। तो अभी रामचंद्र जो थे, उनको धर्मनिष्ठता दिखाने की वह आसक्ति नहीं, उनका एक कर्तव्य दूसरा कर्तव्य है कि अपनी प्रजा को ये दिखाना है कैसे वो धर्मनिष्ठ हैं, कैसे व्यक्ति को अनासक्त रहना है। तो अभी यह दोनों कर्तव्य साथ में नहीं कर पाते हैं। तो इसलिए वो क्या करते हैं? वो त्याग करके जो उच्च कर्तव्य है—प्रजा के प्रति कर्तव्य, समाज के प्रति कर्तव्य, यह निभाते हैं।
राम और सीता का विरह: एक महान त्याग
और इसमें ऐसे नहीं है कि पूरे राज्य के बाहर जंगल में कुछ भी नहीं है, ऐसे जगह आके रहना पड़ता है। जब राम सीता को भेजते हैं, तो वो लक्ष्मण को बोलते हैं कि वाल्मीकि आश्रम के पास में ले जाओ। और वाल्मीकि के आश्रम में अनेक वो वहाँ पे ऋषि-मुनि होते हैं, और अनेक वरिष्ठ स्त्रियां भी होती हैं। तो वो सीता को भेजते हैं, एक पुत्री के रूप में स्वीकार करके उसका देखभाल करते हैं। तो जो राम वनवास में जाते हैं, वो ऋषि के परिवार में, उनके महल में नहीं हैं। और यहां पे जो त्याग का भाव है, इससे पता चलता है।
सीता को बड़ा दुख होता है। सीता का जो दुख होता है वो बड़ा दुख होता है। तो उसके बाद सीता स्वीकार करती है, वो समझती है कि भले मुझे दुख हुआ है, मैं जानती हूँ राम ने ऐसे क्यों किया। राम मुझे नहीं ठुकरा रहे हैं। और यह केवल सीता का त्याग नहीं है, यह राम का भी त्याग है। क्योंकि ऐसे नहीं है कि राम सीता को ठुकरा रहे थे और उनके पास यह शक्ति थी, पर उन्होंने सीता को बता रखा था कि मैं एक पत्नी-व्रत रहूँगा। तो वो वैसे ही हैं। और न कि वो उनकी शक्ति थी, कुछ लोग कहते हैं कि राजा का कर्तव्य भी था। क्योंकि जब-जब यज्ञ करने होते हैं, तो यज्ञ करने वाले जो यजमान होते हैं, तो पति-पत्नी दोनों साथ में बैठ के यज्ञ में यजमान के रूप में वो आहुति देते हैं। तो तभी राम को बताया था कि आप तो राजा हो, आपको यज्ञ करना है, तो आपको पत्नी ज़रूरी है। तो पत्नी नहीं होगी तो आप यज्ञ कैसे कर सकते हैं?
तो राम यह जो जस्टिफिकेशन है, यह कारण देखते हैं। वो बोल सकते हैं कि हम पत्नी करते हैं पर वो भी धार्मिक कर्तव्य है इसलिए मैं विवाह करता हूँ। पर वैसे भी राम नहीं करते हैं। क्या वो क्या करते हैं? सीता की सोने की मूर्ति बना रहे थे वो अपने पास।
तो यह जो त्याग का है, यह अगर हम यह देखते हैं कि राम ने सीता के प्रति अन्याय कर दिया, उसको त्याग कर दिया, इसको ठुकरा दिया, तो वहाँ हम पूरी कहानी नहीं देख रहे हैं। यह केवल सीता का त्याग नहीं है। राम सीता से असीम प्रेम करते थे। और वह जो सीता से विरह है, उससे सीता को दुख होता है, राम को भी दुख होता है। भले राम महल में रह रहे हैं, सीता जंगल में रह रही हैं, पर राम सीता की जगह किसी और को नहीं लाते हैं। तो इस लीला को अगर हमें समझना है, तो हमें देखना है कि यहाँ पे न्याय और अन्याय का सवाल नहीं है।
शास्त्रों के उदाहरणों का सही अर्थ
और ऐसे नहीं है कि जो शास्त्र में बताया गया है वैसे का वैसा हर प्रसंग में है। तो इसका मतलब क्या है कि शास्त्र में जब हमें उदाहरण देते हैं, तो उदाहरण काफी एक्सट्रीम, काफी जो विलक्षण उदाहरण देते हैं, जिससे हमको वो सिखाया जाए।
जैसे कि हम जानते हैं कि भागवत में वर्णन आता है अजामिल का कि अजामिल बड़ा ही पतित हो जाता है। पर वो एक नारायण का नाम लेता है, और उससे क्या होता है? यमदूत… नारायण का नाम लेता है। तो अभी यहाँ जब परीक्षित महाराज भागवत सुन रहे हैं, तो परीक्षित महाराज सुनके यह नहीं कहते हैं कि “एक नाम लेने से बच जाते हैं, मौत जब आएगा तब मैं नारायण बोलूँगा।” ऐसे नहीं कहते हैं परीक्षित महाराज, कि “मैं क्यों नहीं हरिनाम ले लेता हूँ?” तो उसका उत्तर है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम सब भी पूरे जीवन में पाप करें और प्रतीक्षा करें। अजामिल ने एक बार भगवान को संबोधित करके नाम नहीं लिया था, वो अपने पुत्र को संबोधित करके नाम ले रहे थे। उन्होंने एक बार अनजाने में नाम लिया था। जब आप साधना के रूप में भगवान को संबोधित करके जप करते हैं, तो हमें क्यों नहीं फल मिलेगा?
तो यहां पर एक उदाहरण क्यों दिया है? कि शास्त्र में यह उदाहरण देते हैं, तो वही उदाहरण हमारे जीवन में उतारते हैं। जैसे हम ऐसे नहीं करेंगे, जब जप कर रहे हैं साधना के रूप में तभी हम प्रेरणा देखते हैं कि एक नाम में इतनी शक्ति है, तो मैं इतने नाम में जरूर भगवान का स्मरण करूँगा। तो जो साधना के रूप को, उसका उदाहरण देने के लिए शक्ति देते हैं हमें। जो सिद्धांत जो हैं, वहाँ देते हैं।
उस तरह से नहीं है कि कोई भी पिता अपने पुत्र को बोले कि “आप जंगल में चले जाओ, मैं मेरी जो जायदाद है किसी और को देना चाहता हूँ।” तो जो दशरथ महाराज ने किया, वैसे हर पिता को नहीं करना चाहिए। वो उस तरह से हर भाई को ऐसे नहीं करना ज़रूरी है कि उसके भाई को कुछ परेशानी आ गई है तो वह भी उसके साथ जंगल में चले जाएगा। तो जो हर एक चीज़ रामायण में की गई है, वैसे हम हर एक को करने की अपेक्षा नहीं रखते हैं। तो वैसे ही ऐसे नहीं है कि प्रभु रामचंद्र ने जो सीता के साथ किया वही लोगों ने अपनी पत्नी के साथ करना है। ऐसे कभी नहीं है।
रामायण का वह उद्देश्य नहीं है। कि त्याग का भाव, निस्वार्थ भाव जो है, उससे जो भी संबंध है वास्तव में और बढ़ता है, सार्थक ही होता है। जितना त्याग बढ़ता है, संबंध सार्थक होता है। तो जो है, वह रामायण में दिखना चाहिए।
विभिन्न रामायण ग्रंथों का भाव
और इसके अगर अनेक चीज़ें हैं जो हम देखते हैं पूर्व जन्म की कहानी बता कर। उस पे अगर हम देखते हैं, तो लोग बोलते हैं कि उनको समझ में नहीं आता है उसकी कहानी। वो नहीं करते हैं, तो क्या है? त्याग करते हैं और निस्वार्थ भाव करते हैं। तो हम सब त्याग करते हैं।
अगर उसके अनुसार शास्त्रों का ग्रंथ होता है, उसका एक रस होता है, उसका एक भाव होता है, उसकी एक कहानी होती है। तो जो दूसरे ग्रंथों में जो भी बताया गया, अगर वो जो पहले वाल्मीकि रामायण में बताया है, उसका ही और विस्तार है। एक है विपरीत जाना। पर अगर कुछ वाल्मीकि रामायण में, तुलसी रामायण में कुछ विपरीत है, ऐसे में यह बात नहीं है, मेरी बात यही है कि जो दूसरी रामायण की कहानियां हैं, हम तुरंत उसको स्वीकार नहीं कर सकते हैं। अगर वो रामायण की कथा के भाव के, रामायण के तत्व के विरुद्ध में कुछ बताया जा रहा है, तो वो हम स्वीकार नहीं कर सकते हैं।
कुछ रामायण ऐसे पढ़ी जाती हैं, उसमें ऐसे बताया गया है कि वास्तव में सीता जो थीं, वो रावण की पुत्री थीं। वाल्मीकि रामायण में नहीं है, ऐसे कुछ नहीं है। तो ऐसी जो चीज़ें हैं, वो हम स्वीकार नहीं कर सकते हैं। पर जहां तक जो भी दूसरे रामायण में बताया, एक आदर्श व्यक्ति, तो वाल्मीकि रामायण में राम के आदर्श चरित्र पे ज़ोर है। क्या है, हर एक ग्रंथ का उद्देश्य होता है। तो अगर वाल्मीकि रामायण में राम के आदर्श चरित्र पे ज़ोर है, तो इसलिए रामायण में राम एक आदर्श व्यक्ति बहुत हैं। तो अगर अलग ग्रंथ होते हैं, उनका अलग-अलग संदर्भ होता है, अलग-अलग उद्देश्य होता है, तो जहां तक वो पूरा देखो।
श्री रामचंद्र भगवान की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल! प्रवचन प्रवचन प्रवचन प्रवचन।