Appreciating India after traveling in America – Hindi
[Brahmachari class at ISKCON, Nasik]
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Lecture Summary
इस व्याख्यान के पहले भाग में वक्ता ने भारत और पाश्चात्य देशों में संस्कृति, पारिवारिक ढाँचे, सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रचार की अनुकूलता का एक गहन और निष्पक्ष तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है:
- उचित तुलना (Fair Comparison): तुलना हमेशा समान स्तर पर होनी चाहिए। मीडिया अक्सर भारत के सबसे बुरे उदाहरणों की तुलना पश्चिम की सबसे अच्छी चीज़ों से करता है, जो अनुचित है। इसी प्रकार हमें भी पश्चिम की केवल बुराइयों और भारत की केवल अच्छाइयों से तुलना करने से बचना चाहिए।
- ऐतिहासिक संदर्भ और पारिवारिक विघटन: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पाश्चात्य संस्कृति में आए बदलावों और सेक्स रिवोल्यूशन (Sex Revolution) के कारण पारंपरिक पारिवारिक ढाँचा कमजोर हुआ। इसके परिणामस्वरूप वहाँ ‘सिंगल पैरेंट’ (Single Parent) परिवारों की संख्या बढ़ी है, जिससे युवाओं में मानसिक अस्थिरता और प्राधिकार (Authority Figures) के प्रति अविश्वास उत्पन्न हुआ है।
- स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व (Liberty & Responsibility): स्वतंत्रता का दूसरा पहलू उत्तरदायित्व होता है। पश्चिम में अत्यधिक स्वतंत्रता के कारण जब लोग सही फैसले नहीं ले पाते, तो जीवन जटिल हो जाता है। वहाँ प्राधिकार पर विश्वास न होने के कारण या तो अत्यधिक अविश्वास है या फिर अनसोचे-समझे कट्टरता (Radicalization) को स्वीकार कर लिया जाता है।
- पारिवारिक संस्कार और भारतीय समाज: भारत में पारिवारिक संस्कार (Family Unit) व्यक्ति के चरित्र निर्माण की नींव हैं। पाश्चात्य देशों में भारतीय अपने परिवार और काम के प्रति उत्तरदायी होने के कारण सम्मानित माने जाते हैं।
- पाश्चात्य देशों में प्रचार की चुनौतियाँ: पश्चिम में ‘हिंदू’ पहचान के सेक्टेरियन (संकीर्ण) लगने के कारण विशुद्ध ‘भक्ति’ और ‘योग’ के सार्वभौमिक सिद्धांतों को प्रस्तुत करना पड़ता है। वहाँ संस्कृति के अभाव (Absence of culture) के कारण भक्ति की शुरुआत कराना कठिन होता है।
- भारत में प्रचार के अवसर: भारत में यद्यपि आर्थिक कठिनाइयाँ और पश्चिमी आकर्षण हैं, फिर भी यहाँ सांस्कृतिक नीव (Presence of culture) और धार्मिकता के प्रति आदर पहले से मौजूद है। इसलिए भारत में भक्ति का एक आदर्श कार्य मॉडल (Working Model) प्रस्तुत करना और प्रचार करना अपेक्षाकृत बहुत आसान है।
- शास्त्रों का वर्णन बनाम निर्देश (Descriptive vs Prescriptive): शास्त्रों में दी गई बातें दो प्रकार की होती हैं—Descriptive (उस काल विशेष का वर्णन) और Prescriptive (आज के समय में आचरण योग्य निर्देश)। सिद्धांतों (जैसे नम्रता, सहनशीलता, पारिवारिक मूल्य) को समझना आवश्यक है, परंतु किसी विशिष्ट सांस्कृतिक अभ्यास को बिना परिस्थिति देखे कठोरता से लागू करने से समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- भारतीय संस्कृति की विकृतियाँ एवं आंतरिक सुधार: जाति-प्रथा का भेदभाव, दहेज प्रथा जैसी कुरीतियाँ और मंदिरों में होने वाला शोषण वैदिक धर्म नहीं, बल्कि संस्कृति की विकृतियाँ (Corruptions) हैं। भक्ति आंदोलन ने हमेशा जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समाज में आंतरिक सुधार (Internal Reform) का कार्य किया है।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व (Individual Liberty vs Social Responsibility): पश्चिम में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अत्यधिक बल दिया जाता है, जबकि पारंपरिक समाजों में सामाजिक उत्तरदायित्व अधिक था। समाज में पूर्ण अनियंत्रित स्वतंत्रता संभव नहीं है।
- निम्न प्रवृत्तियों का नियमन (Regulation): यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता या आचरण से समाज के अन्य लोगों की निम्न प्रवृत्तियाँ (जैसे काम, क्रोध, लोभ) भड़कती हैं, तो उस पर सामाजिक नियमन लगाना आवश्यक है। स्वतंत्रता का उपयोग ऐसा नहीं होना चाहिए जो समाज में अपराध या उच्छृंखलता को बढ़ावा दे।
Full Transcription
हरे कृष्णा। आज मैं ऐसे विषय को बोलूँगा, जो विषय पर मैं इसके पहले कभी नहीं बोला हूँ। मैं अभी तीन महीने अमेरिका में था क्योंकि आप सब लोग यहाँ पे इंडिया में आगे ट्रैवल किए हैं, तो “Appreciating India, Appreciating Abroad” — ऐसे विषय पर मैं बोलूँगा कि भारत यह भक्ति के लिए और संस्कृति के लिए अभी किस तरह से अनुकूल है।
ऐसा नहीं है कि हमें दूसरे देशों की या पाश्चात्य देशों की निंदा करनी है, पर उसके बारे में थोड़ा मैं चर्चा करने का प्रयास करूँगा आज।
सबसे पहले जब हम तुलना करते हैं, तो तुलना—Comparisons should always be fair. तुलना जो होती है, वह अगर हम… कोई क्रिश्चियन आता है, वह कहता है कि “तुम खुद को भक्त कहते हो, पर अगर वह हमारी तुलना जीसस क्राइस्ट से करे तो वह एक unfair comparison है”, कि हम साधक हैं, जीसस क्राइस्ट ये भगवान के महान भक्त हैं, भगवान ने भेजा है। तो इसलिए जब तुलना करनी है, तो हमको उचित स्तर पर उसकी तुलना करनी है।
तो आज के बाहर की मीडिया में जो तुलना होती है भारत और पाश्चात्य देशों में, तो क्या करते हैं वे? The worst of India is compared to the best of the best. कि भारत का सबसे जो बुरी चीज़ें हैं, इसकी तुलना पाश्चात्य देशों के सबसे अच्छी चीज़ों से करते हैं। तो अधिकांश रूप से कहते हैं कि भारत में स्त्रियों के प्रति इतना अत्याचार होता है, इतनी हिंसा होती है, और उसकी तुलना पाश्चात्य देशों से करते हैं कि वहाँ कितनी सुरक्षा है, भारत कितना खतरनाक है, इसकी संस्कृति के कारण या जो भी कारण है, इतना यह खराब है। यह तुलना होती है भारत की—The worst of India (जो भारत का सबसे बुरा चीज़ है), उसकी पाश्चात्य देशों के सबसे अच्छे से तुलना की जाती है।
तो अभी आज एक बात ने मुझे एक लिंक दिखाया कि ‘द गार्जियन’ न्यूज़पेपर में आया है कि एक कोई उसने अपने चेहरे पे एक गाय का मास्क डाल लिया है। तो वे बोलते हैं कि शायद अगर हम गाय बन जाएँगे तो हमारी अधिक सुरक्षा होगी, हमारे लिए कोई झगड़ा नहीं करेगा। क्योंकि आपको पता होगा कि जो मांस खाते हैं, उनको कुछ लोग… कुछ संशय भी होगा कि उनके पास मांस है, तो उनके पास हमला हो रहा है, उनको मारा जा रहा है। तो अभी यह अंतर्राष्ट्रीय पेपर में सब हेडलाइन में डाल दिया है।
तो यह क्या है? तुलना ऐसी है कि यह unfair comparison है। अनफेयर अनुचित तुलना… और हम भी कई बार उचित तुलना नहीं करते हैं। हम क्या करते हैं? जो भारतीय संस्कृति है, वैदिक संस्कृति, उसकी सबसे अच्छी चीज़ लेते हैं और पाश्चात्य देशों के सबसे बुरी चीज़ लेते हैं, उससे तुलना करते हैं। और यह भी गलत है।
पाश्चात्य देश में भी वास्तव में संस्कृति थी। और मैं कुछ वृत्तांत पढ़ रहा था जब मेरे परिचित थे, वे पीएचडी कर रहे हैं, उनका पीएचडी भक्तिविनोद ठाकुर पर हुआ। तो भक्तिविनोद ठाकुर का जब समय था, जब ब्रिटेन से लोग भारत में आए थे, तो तभी वहाँ पर अंग्रेज़ों ने भारत को ऊपर से देखा। इसके बारे में वर्णन आता है। तो एक अंग्रेज़ स्त्री बताती है कि “ये भारतीय स्त्रियाँ कितनी अश्लील हैं!” कि उस समय विक्टोरियन एरा (Victorian Era) था इंग्लैंड में। तो वह बताती है कि “ये स्त्रियाँ… ब्रिटेन में तो एक संस्कृति थी कि कल्चर्ड लेडी (संस्कृत स्त्री) कभी अपने पैर नंगे रख के बाहर नहीं जाएगी, हमेशा स्टॉकिंग्स, कुछ सॉक्स या कुछ पहनेगी। भारतीय स्त्रियाँ नंगे पैर बाहर जाती हैं, कुछ संस्कृति नहीं है इनको!”
क्या है, सब लोग हम अपनी दृष्टि से दूसरों को देखते हैं। मेरा पॉइंट यहाँ यह है कि पाश्चात्य देश में भी संस्कृति थी, कंजर्वेटिव कल्चर था एक तरह से। पर द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) के बाद बहुत कुछ परिवर्तन हो गया। जब दूसरा महायुद्ध हुआ, तो तभी ब्रिटेन और अमेरिका में क्या हुआ कि जो पुरुष थे, वे सब युद्ध करने चले गए। इन देशों में जनसंख्या ज़्यादा नहीं है। जब बड़ा युद्ध हो रहा था, बहुत से पुरुष चले गए। तो फिर जो साधारणतया काम चलाना था, जो साधारण व्यवसाय पुरुष कर रहे थे, तो वह करने के लिए कोई नहीं था। तो वह स्त्रियाँ करने लग गईं।
और जब स्त्रियाँ इस तरह से व्यवसाय करने लग गईं, जो पारंपरिक रूप से सोचा जा रहा था कि स्त्रियाँ नहीं कर पाएँगी, स्त्रियों को नहीं करना चाहिए… नहीं, वे कर पाईं! पर ऐसे अनेक जो व्यवसाय थे, वे स्त्रियाँ करने लग गईं। और फिर दूसरा महायुद्ध समाप्त हो गया, पुरुष आ गए युद्ध करके वापस। उससे उन्होंने देखा कि “हम अभी यह करना चाहते हैं, हम यह कर सकते हैं। और हम न केवल कर सकते हैं, हम आपसे भी बेहतर पद्धति से कर सकते हैं।”
और फिर उसके बाद में जो सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति में काफी परिवर्तन हो गया। और फिर उसके बाद में जो फ्री सेक्स रेवोल्यूशन (Free Sex Revolution) हो गया पाश्चात्य संस्कृति में, सेक्स रेवोल्यूशन में क्या हो गया? जो विचारधारा थी लोगों की, वह परिवर्तित हो गई कि “जो सेक्स है, वह वास्तव में यह परंपरा रूढ़ियों द्वारा, परंपरा द्वारा, धर्म द्वारा इसको नियंत्रित किया गया था, और इसको नियंत्रण की कोई ज़रूरत नहीं थी।” वास्तव में इसको नियंत्रण नहीं करेंगे तो फिर हम सब सुखी हो जाएँगे।
उनकी संकल्पना क्या थी कि नियंत्रण के कारण लोग आनंद नहीं भोग पा रहे हैं। पर उसका परिणाम क्या है कि समाज में अभी कई जगहों पे… न्यूज़ीलैंड में (अभी मैं ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड गया था, वहाँ पर न्यूज़ीलैंड से कई भक्त आए थे), तो न्यूज़ीलैंड में लगभग औसतन 50-100 लोगों में से एक व्यक्ति शादी करता है! बाकी सब जो लोग हैं, ब्रह्मचारी नहीं हैं वहाँ पर, पर विवाह होता ही नहीं।
अमेरिका में विवाह होता है, क्योंकि जो पाश्चात्य देश हैं, उनमें से अमेरिका बहुत रिलिजियस देश है। वेस्टर्न वर्ल्ड हम अमेरिका को कहते हैं, पर अगर यूरोप से तुलना करते हैं तो अमेरिका में धर्म काफी है, क्रिश्चियन धर्म है अधिकांशों से, पर धर्म है काफी। उसके कारण अभी तक थोड़ा बहुत जो परिवार का महत्त्व है, वह समझ में आता है।
जो अभी पाश्चात्य देशों में अगर कोई व्यक्ति भक्त भी बनता है, तो अधिकांश लोग जो भक्त बनते हैं अभी (युवा पीढ़ी में जो बन रहे हैं), वे अपने परिवार के लिए सिंगल पैरेंट फैमिलीज़ (Single Parent Families) से आते हैं। वे सब ऐसे परिवार से आते हैं जिसमें एक ही पैरेंट (पालक) है। अधिकांश रूप से वह माँ होती है, पुरुष नहीं होता वह।
तो उसके कारण क्या होता है, उनके लिए प्रॉपर साइकोलॉजिकल डेवलपमेंट नहीं होता है, मन की समस्याएँ बहुत होती हैं। और ख़ास करके क्या होता है कि जो मेल अथॉरिटी (पिता) उनके जीवन में नहीं है, उसके कारण जो भी मेल अथॉरिटी फिगर उनको मिलता है (जो उनके पिता नहीं हैं), उनके प्रति आदर नहीं होता। वह सारे कोई भी मेल अथॉरिटी फिगर आ जाता है, उसके प्रति हो जाता है। तो इसलिए ऐसे लोगों के साथ काम करना है तो मेल अथॉरिटी फिगर से काम होता ही नहीं है! तो उनको अगर कोई अथॉरिटी फिगर चाहिए तो फीमेल होना चाहिए, क्योंकि माँ उनके साथ रही है, माँ ने उनकी देखभाल की है। कोई भी मेल अथॉरिटी उनको नहीं चाहिए, पर अथॉरिटी अगर हो गई तो फीमेल अथॉरिटी।
तो अभी ऐसी परिस्थिति में हम सब जो भक्ति करते हैं, तो हम ब्रह्मचारी बनते हैं, हम माता-पिता छोड़ देते हैं और यहाँ आते हैं। तो कई बार क्या होता है, हम हमारे माता-पिता को एक रूप से ‘माया’ के रूप में देखते हैं कि “यह आसक्ति है, वह छोड़ दिया और मैं यहाँ पर आया हूँ।” पर वास्तव में अभी हम अगर भक्ति कर पा रहे हैं, तो हमारे माता-पिता ने हमको थोड़ी बहुत संस्कृति जो दी थी (भले भक्ति न दी हो, पर संस्कृति तो दी है), और उस संस्कृति के कारण जो हमारा चरित्र बना है, उसके कारण हम भक्ति कर पा रहे हैं।
अगर परिवार का एक प्रॉपर यूनिट नहीं है… Family is the foundation of society. परिवार यह समाज की नीव है। और यदि परिवार ही नहीं हो, तो फिर वह समाज की नीव ही निकल जाती है, और फिर वह समाज बड़ा अस्थिर हो जाता है।
और यहाँ एक पूरा… यहाँ पर हमें किसी को demonize नहीं करना है, किसी को असुरी नहीं बताना है। हमको उनकी जो मनोधारणा है, वह हम समझते हैं तो हम उनके बारे में सही सोच पाते हैं और उनको प्रचार करना कितना मुश्किल है, समझ पाते हैं।
अभी जैसे एक तरह से मैं एक प्रोग्राम में गया था डेनवर में। और वहाँ पे मैं था और वहाँ पे दो ब्रह्मचारी प्रचार करने जाते हैं कॉलेज में, यूनिवर्सिटी में। तो वहाँ पे वे मुझे लेके गए थे। और कार्यक्रम में लड़के-लड़कियाँ साथ में होती हैं। तो एक लड़की पहली बार आई थी, और मेरा क्लास दार्शनिक था कि कैसे मन हमें प्रभावित करता है—मन क्या है, बुद्धि क्या है, आत्मा क्या है।
और पहला सवाल उसने पूछा: “All of you are monks, where are the nuns?” (आप सब ब्रह्मचारी हो, ब्रह्मचारिणी कहाँ हैं? आप सब ब्रह्मचारी हो, ब्रह्मचारिणी कहाँ हैं?)
तो फर्स्ट वर्ल्ड और थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज़ में जो फ़र्क है… तो एक डिफाइनिंग डिफ़्रेंस (जो बहुत ही मूलभूत फ़र्क) जो है, वह है पोजीशन ऑफ विमेन (स्त्रियों की समाज में क्या भूमिका होगी)।
तो पाश्चात्य देशों में भले ही प्रैक्टिस में पुरुष और स्त्री इक्वल नहीं हैं, उसमें भी फ़र्क है, पर कम से कम एक बौद्धिक स्तर पे प्रिंसिपल ऐसा माना जाता है कि पुरुष और स्त्रियाँ हर तरह से इक्वल होने चाहिए। भले ही न हों, पर उनकी इक्वलिटी को एक बौद्धिक स्तर पे कोई चुनौती नहीं दे सकता।
और थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज़ में ऐसा समझा जाता है कि जो स्त्रियाँ हैं… पुरुष जो हैं, वे स्त्रियों से बौद्धिक रूप से ऊपर हैं, तो स्त्रियाँ जो हैं वे पुरुषों के अधीन रहें, उनके संरक्षण में रहकर कार्य करें।
तो अभी भारत जो है, वह थर्ड वर्ल्ड से फर्स्ट वर्ल्ड की ओर जा रहा है। और इसमें अभी मैं अच्छा और बुरा नहीं देख रहा हूँ, जो मनोधारणा है उसे हम समझने का प्रयास करेंगे। और इसके कारण कैसे समस्या आती है भक्ति करने में, प्रचार करने में, हम बाद में चर्चा करेंगे।
तो अभी जब वहाँ पे एक युवा प्रचार कर रहे हैं, वहाँ पे अगर पाश्चात्य देशों में युवाओं को प्रचार करना है तो वे बोले, “आप लड़कियों के लिए प्रचार करेंगे। जो लड़कियाँ आ रही हैं प्रचार के लिए, उनको आप अच्छी तरह से प्रचार करेंगे। अगर वे आती रहेंगी प्रचार के लिए, तो लड़कियों के कारण लड़के आ जाएँगे!” हम बोले, “यह कैसा प्रचार है?” पर अगर वे नहीं आएँगी तो कोई आएगा ही नहीं प्रचार में!
तो वहाँ पे कैसे… मैं एक कॉलेज में एक लेक्चर दिया और मैं मन के बारे में प्रचार कर रहा था। उसके बाद 25 सवाल हुए। और कुछ सवाल क्लास से संबंधित थे और कुछ नहीं थे। और सब सवाल थे रिलेशनशिप्स (Relationships) के बारे में! और उनके मतलब रिलेशनशिप्स मतलब क्या है… और ये अधिकांश लोग भारतीय थे! मैं उसके बाद चर्चा करूँगा भारतीयों के बारे में। भारतीय लड़के, भारतीय लड़कियाँ वहाँ पर आए थे। पर वे सब भी उनका सवाल क्या था कि रिलेशनशिप्स मतलब क्या है? वहाँ पर वे सब डेटिंग कर रहे हैं। और अभी डेटिंग में कोई रिलेशनशिप आगे बढ़ाना है, कोई रोकना है, कोई रिलेशनशिप चालू करना है, कैसे डेटिंग करना है… मैं सोचा था कि ये मुझे क्यों सवाल पूछ रहे हैं इसके बारे में?
पर क्या है कि जो सोशल स्ट्रक्चर वहाँ पर नहीं है… तो अभी भारत में एक प्रकार का सोशल स्ट्रक्चर है, वहाँ पर नहीं है। तो इसलिए वह अभी किसी से संबंध जोड़ना है, नहीं जोड़ना है, वह सारी ज़िम्मेदारी उस पर है। क्या है वह? The flip side of liberty is responsibility. कि जब व्यक्ति सोचता है कि “मुझे आज़ादी चाहिए, मैं मेरे जीवन के फैसले खुद करूँगा”, पर ठीक है, अगर आप फैसला करना चाहते हैं, पर वह सही फैसले करने की ज़िम्मेदारी भी आज़ादी के साथ आती है। और जब ज़िम्मेदारी आती है तो जब व्यक्ति समझता है तो समझता है कि आसान काम नहीं है। अगर मैं किसी से संबंध जोड़ना चाहता हूँ और व्यक्ति कैसा है मुझे पता नहीं है, और फिर इसके आधार पर समस्या खड़ी हो जाए, व्यक्ति एब्यूज़ करे, कुछ कर ले, तो सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर है।
इसका तो एक्सट्रीम है अमेरिका में क्या होता है कि लोग छोटी-छोटी बात पर कोर्ट में चले जाते हैं, केस कर लेते हैं। तो अभी यहाँ, इसके कारण बड़ा परिणाम क्या हो गया? अभी मेडिकल ट्रीटमेंट में भी डॉक्टर्स रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं लेते हैं! तो क्या होता है, मतलब क्या करते हैं? डॉक्टर बोलते हैं—”अभी देखो, तुमको यह सिम्पटम है, यह सिम्पटम है। मतलब यह सिम्पटम हो तो आपको यह बीमारी हो सकती है, यह बीमारी हो सकती है, यह बीमारी हो सकती है, यह बीमारी हो सकती है। चार विकल्प हैं। और अगर यह बीमारी है, तो इसका यह इलाज हो सकता है, यह इलाज हो सकता है, यह इलाज हो सकता है, यह इलाज हो सकता है। यह इलाज लेंगे तो इसका यह साइड इफेक्ट हो सकता है, पर इसका इस तरह से आपका हल हो सकता है…” तो ऐसा डॉक्टर पेशेंट को ऐसे 15 विकल्प दे देगा!
अगर अथॉरिटी में श्रद्धा नहीं है, फेथ नहीं है, तो फिर क्या होता है? “मैं आज़ाद हो जाऊँगा”, पर वह आज़ादी से ज़िम्मेदारी निभाना आसान नहीं है। अभी पेशेंट क्या करेगा? कोई व्यक्ति बोलेगा, “मुझे विश्वास नहीं था।” क्यों विश्वास नहीं था? “इतने सारे मेरे बुरे अनुभव आ गए।” बात सही है, आ गए होंगे ज़रूर। पर फिर भी अगर श्रद्धा नहीं है किसी अथॉरिटी में, तो Life becomes endlessly complicated. ज़िंदगी बहुत ही जटिल हो जाती है। अभी इसका कोई आसान हल भी नहीं है, क्योंकि किसी अथॉरिटी में श्रद्धा रखना आसान काम नहीं है।
पर उसकी भी समस्या है। क्या है कि पाश्चात्य देशों में, यूरोप में बहुत से जो मुस्लिम लोग हैं, वे युवा ख़ासकर, वे बहुत आसानी से रेडिकलाइज़ (Radicalize) हो जाते हैं। रेडिकलाइज़ मतलब वे एक्सट्रीमिस्ट बन जाते हैं, वे आतंकवादी जैसे बन जाते हैं। और इसका भी कारण क्या है? क्योंकि उनका जो जीवन है, उसमें इतनी अनिश्चितता (Uncertainty) है, इतना सब कुछ अस्थिर है उनके जीवन में! “कुरान यह भगवान का शब्द है, और कुरान में ऐसा बताया है, हमको ऐसा करना है, बस!” तो उनका कहना है कि “Allah said it, so it’s settled.” यह अल्लाह ने कुरान में बोल दिया है, वह सेटल्ड है। उसमें कोई बातचीत नहीं।
हम कहते हैं कि हम बाह्य रूप से बहुत रिलिजियस लगते हैं, क्योंकि हमारा ड्रेस है, हमारा तिलक वगैरह सब कुछ है। तो हम बहुत रिलिजियस लगते हैं दूसरे धर्मों के लोगों को। तो फिर वे पूछते हैं कि धार्मिक स्तर पे जो हिंसा होती है धर्म के नाम में, उसके बारे में। तो कई बार लोग कहते हैं कि यह ISIS जो है, वह इस्लामिक है कि नहीं है? अगर इनके नाम में इस्लाम है, तो दे आर लिटरली इस्लामिक (Literally Islamic)। लिटरली मतलब जैसे मोहम्मद ने किया था 1500 साल पहले, बिल्कुल वे दुनिया को वहाँ पे लेके आना चाहते हैं। इसलिए वे लोगों को… उन्होंने किसी लोग को मार डाला भी कैसे, तो उसको जला दिया या उसको गोली मार डाला। तो जैसे वहाँ पे एग्जीक्यूशन हुआ करते थे 1500 साल पहले, जैसे लोगों को मार डाला करते थे, वैसे मार डाला करते हैं। तो बिल्कुल वे कहते हैं—”Turn back the clock.” वे घड़ी को पीछे लेके 1500 साल, जैसा इस्लाम तभी था, वैसी संस्कृति वापस लाने का प्रयास करते हैं।
तो इस्लामिक स्टेट इस्लामिक है। पर, तो ओबामा जो था पहले, वह इस्लामिक स्टेट को इस्लाम नाम नहीं देता था। उसकी निंदा करते थे कुछ लोग कि “यह तो इस्लाम है!” पर क्या है कि प्रॉब्लम यह है कि… यह सोचना कि हर जो मुस्लिम है, वह आतंकवादी बनेगा, यह भी गलत है।
तो क्या है इसमें, समस्या यह है कि जो मुस्लिम लोग हैं, वे अभी वहाँ पर जो कुरान में बताया है, वह अभी आज के समाज में कैसे अमल करना है, इसके लिए सोचना नहीं चाहते। They give up intellectual responsibility. जो यह अथॉरिटी ऐसा बोलता है, उसको वैसा ही करूँगा।
तो एक है—Unthinking rejection of all authority. And the other is unthinking acceptance of authority.
जो भी अथॉरिटी है, उसको पूरी तरह से ठुकरा देते हैं। जैसे मैं बोला, एग्जांपल दिया, डॉक्टर पर विश्वास नहीं है, तो उससे बहुत समस्या आ जाती है। पर दूसरा है कि हर तरह से बिल्कुल अथॉरिटी को वैसा ही स्वीकार कर लो, जो भी अथॉरिटी बोले वैसा ही करो।
भगवद्गीता में ऐसा नहीं है। भगवद्गीता में अर्जुन क्या करते हैं? कृष्ण अर्जुन से कहते हैं भगवद्गीता में कि “तुम चिंतन करो, और फिर विचार करके फैसला करो कि तुम्हें क्या करना है।”
और उनका कारण है उसके लिए, बहुत साल उनका शोषण हुआ है। और पुरुष भी हैं, अगर वे स्त्रियों का संरक्षण नहीं करते हैं, नहीं कर पाते हैं, तो तभी उन स्त्रियों को बोलें कि “आप पुरुषों में श्रद्धा रखो”, वह नहीं रख पाएँगी और उनसे अपेक्षा करना, वह भी अनरीज़नेबल है।
स्त्रियाँ भी अपना करियर चाहती हैं, और देखती हैं कि करियर के बीच में अगर शादी कर लेती हैं, बच्चे कर लेते हैं, तो यह बड़ी ज़िम्मेदारियाँ हो जाती हैं। तो वे बच्चे को एक बंधन के रूप में देखती हैं। पर इसका प्रभाव क्या हो रहा है? कि जो स्त्रियाँ हैं, वे बच्चे नहीं रखती हैं, वे कुत्ते रख लेती हैं!
तो अभी जितने वे पेट्स (Pets) की देखभाल करते हैं… जैसे हम योगा करते हैं, एक प्रकार का योगा है उसका नाम है ‘डोगा’ (Doga)। डोगा मतलब क्या? योगा जो आप कुत्ते के लिए करते हैं! आप योगा करो अपने कुत्ते के साथ। और डोगा के टीचर्स भी हैं! तो डोगा के टीचर्स आपको योगा सिखाते हैं, आपके कुत्ते को योगा सिखाते हैं और फिर आप और आपका कुत्ता साथ में योगा करते हैं!
अगर आप पार्क्स में देखोगे अमेरिका या यूरोप में, पार्क्स में बच्चों से कम आपको कुत्ते दिखेंगे! लोग हैं वहाँ पर कुत्तों को घुमाने के लिए लेके आते हैं। तो क्या हो गया है उसमें?
और इसका उल्टा प्रभाव क्या हो रहा है? एक और चीज़ हो रही है कि मिडिल ईस्ट से काफी मुस्लिम लोग यूरोप में आ रहे हैं। तो जो यूरोपियंस हैं, क्रिश्चियनिटी कम हो रही है, जो मैटेरियलिस्टिक वेस्टर्न लोग हैं, वे बच्चे पैदा नहीं करते हैं; और जो मुस्लिम हैं, वे बहुत बच्चे पैदा करते हैं। तो उससे क्या हो रहा है? पूरा इस्लामीकरण हो रहा है यूरोप का!
तो यहाँ पे यह सब सोशल एनालिसिस मैं इसलिए कर रहा हूँ कि क्या है, बेसिकली हम कहते हैं कि लोग इतने असुरी हैं, लोगों में संस्कृति नहीं है, लोग यह नहीं हैं, वह नहीं हैं… पर उस सब का कारण है। कारण यह है कि जो अथॉरिटी का अनुभव उन्होंने किया, वह अनट्रस्टवर्दी (Untrustworthy) थी।
तो कई बार अभी मैं गया था एक जगह, वहाँ पर जो ज़िम्मेदारी लेते हैं घर में हो या नौकरी में हो, वे स्त्रियाँ लेती हैं। क्यों? क्योंकि जो पुरुष हैं, उनमें ज़्यादा रिस्पॉन्सिबिलिटी का कल्चर नहीं होता। वे नौकरी भी ज़्यादा करते नहीं हैं। और फिर क्योंकि फैमिली नहीं है उसमें… क्या होता है कि एक तरह से जब पुरुष विवाह करता है तो उसमें एक रिस्पॉन्सिबिलिटी का कल्चर आता है कि “मुझे इसकी देखभाल करनी है, बच्चे हो गए, बच्चों की देखभाल करनी है।” पर जब वह मैरिज चला जाता है और लिव-इन रिलेशनशिप आ जाता है, तो फिर जो युवक होता है, वह कभी परिपक्व आदमी बनता ही नहीं है! It is actually either detachment… अगर कोई युवक है और कोई ब्रह्मचारी बन सकता है (जो कि रेयर है), और अगर बन जाता है तो उससे भी मैच्योरिटी आ जाती है कि one is trying to control, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीख रहा है, मन पर नियंत्रण करना सीख रहा है। पर अधिकांश लोग जो हैं, वह जो युवावस्था की अपरिपक्वता (immaturity) है, जो इम्पल्सिवनेस (impulsiveness) है—जो भी मन में आया वह करना—उससे बाहर कैसे निकलते हैं? वे विवाह के कारण निकलते हैं! जब विवाह हो जाता है, ज़िम्मेदारी आती है।
जिन भी देशों में भारतीय गए होंगे, Indians are very highly respected. कोई भी देश में जाओगे, भारतीय इमिग्रेंट्स जो होते हैं, बहुत रिस्पेक्ट करते हैं लोग उनकी। क्यों? क्योंकि वे बोलते हैं कि इंडियंस जो हैं, वे कभी क्राइम में नहीं पड़ते ज़्यादा, वे बहुत रिस्पॉन्सिबल होते हैं अपनी जॉब्स में और फैमिली ओरिएंटेड होते हैं। हमको कभी लगता है कि फैमिली रिस्पॉन्सिबिलिटी बहुत आसक्ति है, but actually वह समाज के चलने के लिए बहुत ज़रूरी है! So Indians are in that sense respected, because they take care of their families, they take care of their jobs.
अगर बहुत से लोग… भारतीय लोग भी परदेस में जाते हैं, कई बार लोग इतना सारा कर्जा लेते हैं और कर्जा कभी पूरा नहीं करते हैं, और फिर वह कर्जा देने वाला है उसको समस्या आ जाती है। पर भारतीय लोग अगर जाते हैं कहीं, तो क्या होता है? अगर वे कर्जा लेते हैं तो हमेशा लगभग हमेशा वह कर्जा चुकाते हैं, पूरा कर्जा चुकाते हैं—”मैंने किसी से कर्जा लिया है तो मुझे वह देना है।”
तो एक कहावत होती है कि “Indians are good everywhere except India!” (भारतीय लोग भारत के बाहर हमेशा अच्छे होते हैं)। तो मैं उसके बारे में विचार कर रहा था। बेसिकली ऐसा नहीं है। भारतीय लोग जो हैं, वे क्रांतिकारी नहीं हैं। तो अगर भारतीय लोगों को अच्छा सिस्टम मिल गया, तो उसमें वे भी अच्छे बन जाएँगे। अगर सिस्टम खराब है, तो उस सिस्टम में चलने के लिए वे भी खराब बनने में हिचकिचाते नहीं हैं।
तो बेसिकली पाश्चात्य देशों में क्या है, इंडियंस में सहनशीलता बहुत है। पाश्चात्य देशों में सहनशीलता नहीं है, अगर कोई सिस्टम खराब लगे तो सिस्टम के खिलाफ चले जाएँगे। भारतीय लोग कैसा भी सिस्टम होगा, उसमें अपना काम चला लेंगे! तो अगर सिस्टम अच्छा होगा तो वे भी अच्छे हो जाएँगे। अगर सिस्टम में भ्रष्टाचार करने की ज़रूरत नहीं है तो वे भ्रष्टाचार नहीं करेंगे; पर अगर सिस्टम में भ्रष्टाचार हो रहा होगा, तो फिर वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आंदोलन ज़्यादा नहीं करेंगे, वे भी काम चला लेंगे।
पाश्चात्य देशों में जो लोग रहते हैं, वे बहुत कम भक्त बनते हैं। उसका कारण क्या है? कई कारण हैं उसके लिए, पर प्रधान रूप से हमारे प्रचार में हमारी संस्कृति जो है, वह बहुत बाह्य रूप से भारतीय लगती है। और इसके कारण लोगों को लगता है कि “मैं हिंदू नहीं बनना चाहता हूँ, मैं आध्यात्मिक बनना चाहता हूँ।” तो इसलिए कई बार जो प्रचारक यशस्वी हुए पाश्चात्य देशों में… हमारी संस्कृति जो है, सांस्कृतिक दृष्टि से हम बहुत सेक्टेरियन (संकीर्ण) लगने लगते हैं कि “आप भी एक हिंदू पंथ हो।” तो उन लोगों को हिंदू नहीं बनना है, तो फिर कीर्तन लोगों को अच्छा लगता है, योगा भी अच्छा लगता है।
तो बहुत से मंदिरों में, पाश्चात्य देशों में हमारे जो मंदिर चल रहे हैं, वे भारतीयों के लिए मंदिर चल रहे हैं। और ऐसा नहीं कि भारतीय कम हैं, पाश्चात्य देशों में भारतीय आते हैं, वे बड़े बुद्धिमान भारतीय हैं—जो वहाँ पे हार्ड वर्किंग थे, टैलेंटेड थे, वे बहुत सेवा भी करते हैं, बहुत समर्पित हैं। पर पाश्चात्य देशों के मूल लोग नहीं आ रहे हैं, तो उसके लिए कुछ स्पेशल अरेंजमेंट्स करने हैं कि कैसे उनको भक्ति का ज्ञान प्रेजेंट करना है। उनको ऐसा न लगे कि हमको एक हिंदू बनना है, उनको लगे कि हमको भक्त बनना है। तो सार्वभौमिकता (Universality) जो भक्ति की है, वह दिखानी बहुत आवश्यक है।
जो अभी यूरोप और रशिया में जो प्रचार हो रहा है, वहाँ पे काफी लोग, नेटिव लोग भक्त बन रहे हैं। पर वह इसलिए कि वे भी थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज़ थे, और वहाँ पे भी अथॉरिटी स्ट्रक्चर पहले से था। तो वहाँ पे वे अपने अथॉरिटी स्ट्रक्चर को छोड़कर भक्ति का अथॉरिटी स्ट्रक्चर स्वीकार कर रहे हैं। फिर भी लोग रुचि लेते हैं, और अगर हम उनको भक्ति का ज्ञान प्रदान करते हैं अच्छे ढंग से, तो वे वास्तव में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।
मैं यूटा (Utah) में था। यूटा अमेरिका का एक ऐसा प्रांत है जहाँ पे पूरे क्रिश्चियन हैं। क्रिश्चियनिटी की एक विंग है उसको ‘मॉर्मोन’ (Mormons) कहते हैं, मॉर्मोन क्रिश्चियंस। अधिकांश क्रिश्चियन लोग उनको क्रिश्चियन मानते नहीं हैं, वे बोलते हैं “तुम डिविएंट (Deviant) हो।” क्योंकि उनका जो जोसेफ स्मिथ नाम का फाउंडर था, उसको वे प्रॉफिट मानते हैं, और उसने जो दिया उसको भी वे बाइबल का कंटिन्यूएशन मानते हैं। पर वे काफी इन्फ्लुएंशियल हैं वहाँ, काफी बड़े हैं वहाँ, और पूरा प्रांत मॉर्मोन से ही भरा हुआ है, यूटा स्टेट जो है।
तो वहाँ पे प्रभुपाद जी के एक शिष्य हैं चारु प्रभु। उन्होंने जाके वहाँ पे एक मंदिर बनाया। और वह मंदिर ऐसे बनाया है कि क्रिश्चियंस ने उनको पैसा दिया मंदिर बनाने के लिए! क्यों? क्योंकि अमेरिका में ऐसा है कि मल्टी-कल्चरलिज्म (Multiculturalism) बहुत इम्पोर्टेंट माना जाता है—ऐसा दिखाना कि हम संकीर्णवादी नहीं हैं। तो इसलिए उस मंदिर के लिए मॉर्मोन्स ने पैसा दिया कि “हमने हमारे इलाके में भी एक हिंदू मंदिर बना दिया है।”
और वहाँ पर जो रिलिजियस स्टडीज़ होती हैं उनकी यूनिवर्सिटीज़ में, तो उनके प्रोफेसर्स स्टूडेंट्स को बोलते हैं कि अगर आप हरे कृष्णा मंदिर में जाओगे संडे प्रोग्राम में, और वहाँ से अटेंडेंस की चिट लाओगे, तो आपको क्रेडिट्स मिलेंगे आपकी क्लास में! पर कैसे है कि वहाँ पर भक्त बनाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि मॉर्मोन्स काफी क्लोज़्ड ग्रुप होता है।
पर वहाँ पर प्रचार के दौरान जब मैं प्रवचन दे रहा था, तो एक क्रिश्चियन प्रीचर वहाँ पर आया था। वह क्रिश्चियन प्रीचर मुझे… जब मैं प्रचार कर रहा था, तो उसने बताया कि “मुझे रास्ते पर हरे कृष्णा वाले लोग मिल गए जो मुझे भगवद्गीता दे रहे थे। तो मैं देखा कि यह क्या है भगवद्गीता, मुझे पढ़ना है। तो मैं भगवद्गीता पढ़ने लगा इसलिए कि मुझे भगवद्गीता का खंडन करना है!”
फिर वह भगवद्गीता पढ़ने लगा, फिर उसने गूगल में ढूँढा, तो उसको मेरी ‘गीता डेली’ (Gita Daily) वेबसाइट मिली। फिर वह पढ़ने लगा गीता डेली। और बाद में जब मैं वहाँ पर गया था, तो वह मुझे मिलने आया था। वह बोला कि “तुम जो बोल रहे हो, उसका 90% से मैं एग्री करता हूँ। 10% जो अलग है, वह देह-पूजा (Deity worship) के बारे में है।”
तो वह जो क्रिश्चियन प्रीचर था, वह बोला कि “20 साल से मैं प्रचार कर रहा था। फिर मुझे भगवद्गीता पढ़ने को मिली, मैं हरे कृष्ण का जप करने लग गया।” वह बोला कि “क्रिश्चियनिटी में कैसा है कि उनका कल्चर अलग है। उनमें एक क्रिश्चियन किताब में लिखा है कि ‘शराब का जो स्वाद है, यह सबूत है कि भगवान आपसे प्रेम करते हैं!’ तो मतलब शराब पीना उनकी संस्कृति का एक अविभाज्य अंग जैसा है। तो उनका कहना है कि Drink, but don’t get drunk (शराब पियो पर शराबी मत बनो)।”
तो उसको कुछ लंग्स का प्रॉब्लम आ गया, कुछ किडनी का प्रॉब्लम आ गया। तो डॉक्टर बोला—”आपको शराब छोड़नी चाहिए, सिगरेट छोड़नी चाहिए।” वह बोला—”मैं 6 साल से प्रयास कर रहा था, मैं छोड़ नहीं पा रहा था। पर जब मैंने यह भगवद्गीता पढ़ी, फिर हरे कृष्ण जप के बारे में सुना, पिछले एक महीने से मैं जप कर रहा था और शराब-सिगरेट छूट गई मुझसे!”
तो वह बोल रहा था कि “अभी मैं चौराहे (crossroads) पर आ गया हूँ। मैं बाइबल पर लेक्चर्स देता हूँ पूरे अमेरिका में, और मैं खुद भगवद्गीता पढ़ रहा हूँ और हरे कृष्ण जप कर रहा हूँ!”
तो वास्तव में ऐसी परिस्थिति में भक्ति के जो प्रिंसिपल्स हैं, वे काम करते हैं। अगर कोई व्यक्ति भक्ति करने लगता है, तो उनका भी जीवन परिवर्तित हो जाता है। पर उनके लिए भक्ति चालू करने के लिए ही बहुत सी समस्याएँ हैं। तो विचारधाराओं में इतनी सारी समस्याएँ हैं कि उनको भक्ति चालू करना बड़ा मुश्किल है।
भारत में ऐसी परिस्थिति है कि राष्ट्रीयता और संस्कृति पर काफी जोर है। एक समय मूवमेंट था वेस्ट का कि हमको सब कुछ वेस्टर्नाइज करना है। अब वेस्टर्नाइजेशन है भारत में, और वह तो होने ही वाला है। अब कहीं वेस्टर्नाइज सोच लेते हैं, तो भारतीय लोगों के बारे में देखने के लिए… हाँ, कुछ बार आपको भी वेस्टर्नाइज होना है या संस्कृति को भी बचाना है। कुछ वेस्टर्नाइज हो गए, और ये लोग मीडिया में काफी हैं—मीडिया मतलब न्यूज़पेपर में लेख लिखते हैं वगैरह हैं। पर जन-साधारण जो लोग हैं, उन सबको यह सोचना है कि “हमको मॉडर्नाइज भी होना है, पर हमको हमारी संस्कृति भी बरकरार रखनी है।” और काफी हद तक यह प्रभुपाद जी और इस्कॉन ने किया है कि हम सब मॉडर्न टेक्नोलॉजी यूज़ करते हैं, पर हमने मॉडर्न अधर्म स्वीकार नहीं किया है।
अमेरिका जाने के प्रति जो आकर्षण है भारत में, वह अभी तक है। पर जो 80s, 90s में भारतीय लोग अमेरिका में गए, अभी क्या हो गया, उन्होंने अपना परिवार बना लिया, उनके बच्चे हैं। और अमेरिका में अपने बच्चों को अच्छी तरह से बड़ा करना बहुत मुश्किल है, बहुत मुश्किल है! वहाँ पर अगर कोई 20 साल का व्यक्ति है जिसने कभी ड्रग्स नहीं लिए हैं, तो ऐसा आपको हज़ारों में एक मिलेगा, स्वाभाविक है! तो वहाँ पर अपने बच्चों की कैसी देखभाल करना, यह बहुत बड़ी चुनौती है।
तो वहाँ जाके जब लोग रहते हैं, भले ही वे भक्त नहीं बनते हैं, फिर भी पाश्चात्य देश में भी वे खुद की भारतीय संस्कृति के मूल्यों को समझते हैं।
भारत में अभी भी प्रचार करने की सुविधा बहुत है। अगर कोई ब्रह्मचारी आता है पाश्चात्य देश से, ब्रह्मचारी को प्रचार करने के पर्सनल चैलेंजेस जो हैं, खुद का ब्रह्मचर्य कायम रखना वह भी एक चैलेंज है। पर उसके अलावा भी हम जिनको प्रचार करते हैं, वे भले ही ब्रह्मचारी न बनें, उनको साधारण मानव जीवन भी जीना है, धार्मिक जीवन जीना है।
और कुछ बौद्धिक स्तर पे समझाया जाए, तो लोग स्वीकार कर लेते हैं।
वास्तव में जो लोग हमारे मंदिर में आ रहे हैं, वे वैसे भी एक तरह से पुण्यवान लोग हैं। पर उनकी जो पुण्यवान भावनाएँ हैं, वे कुछ गलतफहमियों के कारण कार्य नहीं कर रही थीं। उनकी भ्रांत धारणाएँ थीं—”यह बहुत पुराना है, इसका कुछ प्रैक्टिकल यूज़ नहीं है।” अगर वह गलत धारणा हम निकालते हैं, तो उनकी जो पुण्य प्रवृत्तियाँ हैं, अपने आप कार्य करने लगती हैं।
तो जब हम प्रचार कर रहे हैं, अगर लोगों को ब्रह्मचारी बनना है तो अच्छा है। I definitely encourage them. पर हम ब्रह्मचर्य का प्रचार करते हैं, तो कम से कम ऐसा है कि जो फैमिली है, उसको क्रिटिसाइज नहीं करना है, उसको नीचा नहीं दिखाना है। अगर हमारे माता-पिता एक फैमिली के रूप में न हुआ करते, तो हममें वह संस्कृति, वह चरित्र कहाँ होता कि हम भक्ति में आ पाते? इसलिए जो प्रचार है, वह एक बैलेंस्ड रूप से करना है।
बैलेंस्ड रूप से मतलब, जो ब्रह्मचारी बनते हैं वे रेयर लोग हैं। अगर बन गए, बहुत अच्छा है। पर अगर नहीं बन रहे हैं, तो जो लोग गृहस्थ बन रहे हैं, वे भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं—न केवल हमारी संस्था के लिए, बल्कि समाज के लिए।
और इस तरह से, जब अभी भारत में मैं यह दृष्टि से देखता हूँ, तीन प्रधान समस्याएँ हैं:
- आर्थिक समस्या: पाश्चात्य देशों में इतनी आर्थिक समस्या नहीं है, यहाँ बहुत समय तक लोगों को पैसे कमाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। उसके बाद भक्ति करने के लिए समय और एनर्जी निकालना मुश्किल होता है। पर जैसा प्रभुपाद जी बोलते थे कि Material progress is a result of spiritual progress. अगर कोई भक्ति में स्थिर हो जाता है, तो वह बुरी आदतों में पैसे गँवाना बंद कर देता है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति भी सुधर जाती है।
- भौतिकवाद का प्रभाव: भारत में जो अश्लील विज्ञापनों और भौतिकवाद का प्रलोभन है, उसके लिए we have to philosophically present करना पड़ता है।
- संस्कृति का आकर्षण: सबसे बड़ा एडवांटेज भारत में क्या है? It is that if people want to practice bhakti, there is a lot of fascination about it. The culture is there, the overall character is there. जो संस्कृति है, जो चरित्र है, वह सब कुछ पृष्ठभूमि में अभी तक है।
इसलिए प्रभुपाद जी भी एक लेक्चर में कहते हैं कि “मेरे गुरु महाराज ने कहा था कि तुम पाश्चात्य देशों में प्रचार करो, और मैं वहाँ आया भी। पर अभी मेरी इच्छा है कि मैं भारत में प्रचार करूँ।” प्रभुपाद जी ने क्या देखा कि पाश्चात्य देशों में प्रचार होगा और हो रहा है, पर अल्टीमेटली लोगों को एक working model चाहिए। और पाश्चात्य देशों में Actually we are a minority in a minority religion (अमेरिका में हिंदू धर्म एक माइनॉरिटी धर्म है, और उसमें भी हम एक छोटी माइनॉरिटी हैं)। पर अगर एक working model हमको दिखाना है, तो भारत में हम दिखा सकते हैं। इसीलिए प्रभुपाद जी ने इतना समय भारत में डाला प्रचार करने के लिए।
हम भारत में हैं, तो हमको बहुत मौका है, बहुत ज़िम्मेदारी है। और भले ही हमको बहुत सारी समस्याएँ लगती थीं प्रचार करने के लिए, पर वास्तव में यह समस्याएँ ऐसी हैं कि यहाँ भक्त बनते रहते हैं, भक्तों की संख्या बढ़ती जाती है। और फिर पाश्चात्य देश के लोग भारत में जब आते हैं, तो देखते हैं कि इतने सारे लोग भक्त हैं, तो उनको बहुत प्रेरणा मिलती है।
भारत में भक्ति करना, भक्ति का खुद पालन करना, दूसरों को प्रचार करना—यह दोनों वास्तव में एक आशीर्वाद हैं। हर जगह पर दुनिया में समस्या है, पर जो भारत में समस्या है—These are difficulties which have come because of the culture. In the West, there are difficulties which have come because of the absence of culture.
अगर आपको किसी को कुछ भाषा सिखानी है… अगर व्यक्ति को… नहीं, अगर व्यक्ति को किसी को… आपको एक शब्द का अर्थ समझाना है, तो वास्तव में अगर व्यक्ति को भाषा पता है, तो उसको एक शब्द का अर्थ समझाना इतना मुश्किल नहीं है। पर अगर व्यक्ति को भाषा ही पता नहीं है, तो उसको उस शब्द का अर्थ समझाना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
तो फिर अगर बेसिक फाउंडेशन (Basic Foundation) ही नहीं है, तो फिर लोगों को भक्ति का प्रचार करना या कुछ भी समझाना बड़ा मुश्किल है। पर यह बेसिक फाउंडेशन अगर है, तो प्रचार करना रिलेटिवली (Relatively) बहुत आसान है—मुश्किल है, और फिर भी रिलेटिवली आसान है।
तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: “भारत-भूमिते हैल मनुष्य-जन्म यार। जन्म सार्थक करि’ कर पर-उपकार॥”
तो वास्तव में यह भारत जन्म महत्त्वपूर्ण क्यों है? भारत की संस्कृति महत्त्वपूर्ण क्यों है? भारत में भक्ति महत्त्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि यहाँ पे संस्कृति है, यह बहुत है।
और अगर इस्कॉन का इतिहास देखें ऐसा कि पहले जब शुरुआत हुई थी इस्कॉन की, अमेरिका में थी। पर अभी इस्कॉन सबसे स्ट्रॉन्ग जो है, भारत में ही है—Strongest in the world is in India, second in Russia. (रूस में भी जो पुराना पूरा साइड था उसमें)। तो वास्तव में हम बहुत स्ट्रॉन्ग हो रहे हैं, हम बहुत स्ट्रॉन्ग हो रहे हैं। और इस्कॉन में इंडिया वर्ल्ड लीडर है। और अगर हम बहुत स्ट्रॉन्ग हो रहे हैं, तो इंडिया प्रचार कर सकता है। भारत एक उदाहरण जैसा है कि किस तरह से भक्ति का प्रचार किया जा सकता है।
फैमिली कल्चर मतलब क्या? फैमिली कल्चर मतलब कि हम जो सांस्कृतिक परिवार, संस्कृति के बारे में कितना जोर देते हैं। मैं भी दो-तीन साल से जा रहा हूँ, पर जहाँ तक मैंने देखा है, हम प्रिंसिपल्स देखें और लोगों पर प्रैक्टिकल्स लागू हों। जो प्रिंसिपल्स हैं, वे लोगों को हम समझाते हैं। जब हर एक रूप से वह कैसे अपने जीवन में अमल करना है, तो हर एक व्यक्ति को निर्णय करना पड़ता है। कई बार लोगों की परिस्थिति इतनी अलग होती है कि हम बोलें कि “आपको ऐसा ही करना है”, तो उनके लिए प्रैक्टिकल नहीं होता है।
तो प्रिंसिपल्स में… जैसे कि शास्त्रों में (Scriptures)—there is descriptive and there is prescriptive. मतलब शास्त्र में कैसे बताया कि यह ऐसा था उस समय में। चैतन्य चरितामृत में बताया कि कैसे सब लोग भक्ति करते थे, सब लोग बंगाल से जगन्नाथ पुरी यात्रा के लिए आया करते थे। तो अभी यह description है, यह वर्णन है। अभी prescription मतलब—आप ऐसा करो! तो शास्त्रों में क्या description है और क्या prescription है—क्या एक उस समय का वर्णन है और क्या हमको इस समय उसको अपने जीवन में उतारना है—इसमें भेद है, सब कुछ एक जैसा नहीं है।
तो व्यावहारिक दृष्टि से देखेंगे हम। तो हम जब प्रैक्टिकल चीज़ों के बारे में बात करते हैं—प्रैक्टिकल मतलब हम प्रैक्टिकल जप करना, कीर्तन करना, संवेदनशील बनना, हम ह्यूमिलिटी (humility), टॉलरेंस (tolerance), यह वैल्यूज़ (values) के बारे में बात करना ठीक है। पर जो स्पेसिफिक कल्चरल प्रैक्टिसेस (specific cultural practices) जो हैं, उसके बारे में बात करना… हम उनके बारे में इतना जानेंगे नहीं तो बात करेंगे तो समस्या आ सकती है।
तो कई बार (ऑफ़कोर्स ऐसा हो नहीं रहा है, पर just to give an example), जब अफगानिस्तान में तालिबान था, तो तालिबान ने रूल बनाया था कि कोई स्त्रियाँ काम नहीं करेंगी, स्त्रियों का काम है घर में रहना, पुरुष काम करेंगे। पर क्या हुआ था? तभी युद्ध इतना हुआ था कि कई बार जो वहाँ पुरुष थे, वे घायल हो गए थे, कुछ काम नहीं कर पा रहे थे। कई परिवार में ऐसा था कि जो स्त्रियाँ थीं, वही घर चला रही थीं, वही नौकरी कर रही थीं। जब तालिबान ने अफगानिस्तान के एरिया में कॉनकर (conquer) कर लिया, तो फिर वे बोले कि “कोई स्त्रियाँ काम नहीं करेंगी! और जो स्त्रियाँ नौकरी करने जाएँगी, उनको मारा जाएगा।” तो फिर क्या हो गया उसके कारण? अभी वे स्त्रियाँ हैं, घर में बच्चे हैं, कोई उनको खाने के लिए है नहीं, और फिर स्त्रियों को नौकरी के लिए जाने नहीं देना! तो फिर जब उनको बताया गया कि “नहीं, अल्लाह उनको खाने के लिए देगा”, तो ऐसे तो नहीं हो गया कि अल्लाह खाने के लिए दे देगा उन स्त्रियों के लिए! तो फिर उसके बहुत… मीडिया में भी इसके बहुत खिलाफ आ गया।
तो पॉइंट क्या है कि जो भी प्रिंसिपल्स हैं, उसको जो जगह है, उसको देखे बिना हम अप्लाई नहीं कर सकते हैं। तो इसलिए कई चीज़ें ऐसी हैं कि जो लोग… हर एक व्यक्ति को अपना-अपना फैसला करना पड़ेगा कि मैं किस तरह से इसको अपने जीवन में अमल कर सकता हूँ।
तो सांस्कृतिक… इसलिए वैल्यूज़ हैं—फैमिली वैल्यूज़, कल्चरल वैल्यूज़, स्पिरिचुअल वैल्यूज़—यह सब पर जोर हम देते हैं। बट जो लोग प्रैक्टिकली कैसे अमल कर रहे हैं, उस पे हम अगर जाएँगे, तो वह ऐसी दखलंदाज़ी हो जाएगी जो हमें एक्सपीरियंस नहीं होगा उस स्थिति का।
तो कई बार अगर कोई ऐसे परिवार में है जो फैमिली एब्यूसिव है, कोई स्त्री पे कुछ फिजिकल रूप से आक्रमण कर रहे हैं, तो फिर उनको बोलें कि “आप डिवोर्स मत करो…” ऐसा एक बार हुआ, एक क्रिश्चियन प्रीचर था, वह बोला कि “Divorce is a sin against God, तुम डिवोर्स मत करो।” तो फिर क्या हो गया? वह जो पति था, वह अपनी पत्नी को physically abuse करता था, उसको मारता था (यह यूरोप में हुआ था)। और उसके बाद में एक बार उसने अपनी पत्नी को इतना मारा कि Wife died! और वह पति जो था, वह शराबी था। और शराब जब नहीं पीता था, तो बहुत ही नॉर्मल, डिसेंट, अच्छा व्यक्ति रहता था बिना शराब के। और जब यह घटना हो गई तो वह प्रीचर इतना डिप्रेस्ड हो गया!
तो जब प्रैक्टिकल हम बोलते हैं, तो हम रेकमेंड कर सकते हैं, हमें इंस्ट्रक्ट नहीं करना चाहिए कि “आप ऐसा ही करो।” पर जब बहुत जोर से कुछ बोलते हैं, तो समस्या आ सकती है।
तीसरी जो प्रॉब्लम है कि भारतीय संस्कृति की विकृतियाँ काफी आ गई हैं। विकृतियाँ मतलब, फॉर एग्जांपल—कास्ट सिस्टम जो है, तो उसके कारण बहुत डिस्क्रिमिनेशन (भेदभाव) आ गया है। दहेज (Dowry)—पारंपरिक पद्धति से एक उद्देश्य था उसका, पर अभी यह न केवल भारतीय संस्कृति की विकृति है, पर इस विकृतियों के कारण जो भारतीय संस्कृति के बारे में गलत विचारधारा समाज में आ गई है, वहाँ एक समस्या आ जाती है।
तो उसके कारण कई बार लोग सोचते हैं कि “नहीं, मैं इसके कारण भक्ति में नहीं जाना चाहता हूँ।” तो अगर हम समझाते हैं… कई बार लोग जाति-पद्धति जो है, इसके बारे में बहुत भेदभाव हुआ है वास्तव में। लोग क्या सोचते हैं कि हम भारतीय संस्कृति से हैं, मतलब हम भी जाति-पद्धति का सपोर्ट करते हैं। पर अगर हम देखते हैं, कई भक्त जो हैं, वे निचली जातियों से थे, और कई बार उनके प्रति अत्याचार हुए हैं। तुकाराम महाराज—वहाँ के ब्राह्मणों ने उनके प्रति अत्याचार किए। हरिदास ठाकुर जो थे—उनके प्रति ब्राह्मणों ने अत्याचार किए।
तो कैसे है कि भक्ति जो पार्ट है… भक्ति जो जाति-पद्धति आ गई थी, जाति-पद्धति का भेदभाव सही नहीं है। पर ऐसा नहीं है कि हमको जाति-पद्धति का समर्थन करना है। भक्ति संस्कृति में ही रिफॉर्म था! भक्ति संस्कृति जो थी, वह एक इंटरनल रिफॉर्म (आंतरिक सुधार) था।
तो जो भारतीय संस्कृति के बारे में गलत धारणाएँ हैं, ये केवल धारणाएँ नहीं हैं, वास्तव में विकृतियाँ भी हैं। विकृतियाँ भी हैं और विकृतियों के कारण धारणाएँ हैं। उसके कारण कई लोग थोड़ा हिचकिचाते हैं।
अभी कई बार जगन्नाथ पुरी मंदिर में जाते हैं, तो लाखों लोग जाते हैं। पर वहाँ पर क्या होता है? कई बार वहाँ पंडे पैसे के पीछे होते हैं। जगन्नाथ पुरी मंदिर में पैसे के पीछे होते हैं।
“मैं एक चर्च में गया और वहाँ पर जो प्रीस्ट था, उसने अच्छे से मुझसे बात की, हर सवाल का जवाब दिया, वह इतना जेंटलमैन था। अगर मुझे भगवान के पास जाना है, तो यहाँ पर भगवान के लोग इतने ग्रीडी (लालची) हैं! और मैं क्रिश्चियन जगह गया तो वहाँ भगवान के लोग इतने अच्छे हैं!”
इसलिए क्या है, कई बार वैदिक धर्म की विकृतियाँ ही एक बहुत बड़ी समस्या हैं। कई बार ऐसा होता है कि मंदिरों में, गाँवों में वगैरह जो होते हैं, जो निचली जातियों के लोग हैं, उनको मंदिर में आने नहीं देते हैं। उनको भगवान के पास जाना है, उनको मंदिर में आने नहीं देंगे, तो फिर वे अगर क्रिश्चियन बन जाएँगे, तो उनको कौन दोष देगा? How can we blame them?
तो कैसे है कि इस्कॉन में भी अपनी-अपनी समस्याएँ हैं, पर कम से कम प्रभुपाद जी की कृपा से, प्रभुपाद जी की शिक्षाओं के कारण जाति के आधार पर भेदभाव नहीं है। अगर कोई सीरियस भक्त है, तो फिर वह सीरियस भक्ति कर सकता है। तो भारतीय संस्कृति की जो विकृतियाँ हैं, वह भी एक समस्या है जब लोगों को भक्ति स्वीकार करनी है। और उन विकृतियों से अगर हम बचते हैं, तो फिर भक्ति का बचाव हो सकता है अच्छे ढंग से।
जब संस्कृति जो है… “मुझे मेरे मन में जो भी आएगा, वह मैं बोलूँगा। जो भी करने की इच्छा होगी, मैं करूँगा।” तो ऐसी आज़ादी कोई भी कहीं नहीं जीता है, हर देश में नियम हैं। अगर पाश्चात्य देशों में हैं, अगर कोई जो अफ़्रीकन-अमेरिकन लोग हैं, उनको कोई बुरा कहेगा, तो उसका बहुत रिएक्शन आ जाता है कि “तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?”
तो विनियमन (Regulation) हर जगह है। हम इंडिविजुअल्स (व्यक्ति) हैं, पर हम समाज में हैं। So there is individual liberty and there is social responsibility. तो व्यक्ति की आज़ादी और समाज की ज़िम्मेदारी, समाज की जो नियमबद्धता है, इन दोनों में सामंजस्य रखना है।
जो पारंपरिक समाज थे (Traditional societies)—उसमें ख़ासकर भारतीय, चीनी ऐसी संस्कृतियों में—individual liberty was much less. व्यक्ति की आज़ादी बहुत कम थी, सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ बहुत ज़्यादा थीं। पाश्चात्य देशों में व्यक्ति की आज़ादी बहुत ज़्यादा है, सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ कम हैं। पर फिर भी वहाँ पर भी सोशल ऑब्लिगेशंस (Social obligations) होते हैं।
तो अब हमें देखना है कि यह जो काम-वासना (Sensuality) है, “यह मेरी खुद की इच्छा है, मैं जैसे कपड़े पहनना चाहता हूँ, मैं जैसा दिखना चाहता हूँ, मैं जैसा घूमना चाहता हूँ, कौन मुझे रोकने वाला है?” ठीक है, यह बात सही है, अगर हम मान भी लेते हैं कि यह आपकी आज़ादी है, पर इस आज़ादी का प्रभाव क्या होता है?
क्या प्रभाव होता है कि जिन लोगों को ऐसे चित्र देखने में ख़ुशी मिलती है… और वास्तव में होता क्या है उससे? लोगों की जो निचली प्रवृत्तियाँ हैं, वे जाग्रत हो जाती हैं!
अभी कैसे है कि इसका एक वेस्टर्न सोशियोलॉजिस्ट ने किताब लिखा है, इसका नाम है Porning of America (पॉर्नोग्राफ़ी से अमेरिका पर प्रभाव)।
जैसे मान लीजिए अगर कोई व्यक्ति एक रास्ते पे जा रहा है और रास्ते पे जब जा रहा है, तो उसकी जेब में से कई नोटों का ढेर आधा बाहर निकला हुआ है। इधर से आधा निकला है और वह चल रहा है ऐसे। और कुछ चोर आते हैं, उसको पकड़ लेते हैं और उसके पैसे चुरा लेते हैं। और उसके बाद जब वे चले जाते हैं, तो वह पुलिस को बुलाता है। पुलिस आती है तो वह बोलता है—”मेरी चोरी हो गई, पकड़ो उनको!” पुलिस पूछती है—”पैसे कहाँ थे?” वह बताता है नोटों का ढेर—”मैं जेब में रखता हूँ।” “अगर आप ऐसे पैसे खुले रख के क्यों जा रहे थे?” “मेरे पैसे, मेरी आज़ादी! मैं कैसे भी पैसे रखूँ!” यह आज़ादी का सवाल नहीं है! अगर आप ऐसे पैसे दिखाकर निकल रहे हो सब के सामने, तो फिर क्या है कि आप चोरों को आकर्षित कर रहे हो!
तो इसी तरह से कैसे है कि अगर अश्लील चित्र बहुत प्रदर्शित किए जाते हैं समाज में, तो उसका प्रभाव क्या होने वाला है? उसका प्रभाव अभी स्त्रियों पर आक्रमण होने वाला है! भले ही उस पर्टिकुलर स्त्री पे न हो, किसी और पे हो जाएगा। पर लोग कहेंगे—”नहीं, पुरुष तो जानवर होते हैं, वे ऐसे ही करते हैं।” ठीक है, वे वैसे ही करते हैं, पर कैसे होता है? हम जैसे कार्य करते हैं, उसके कुछ मैसेज भेज रहे हैं।
तो वास्तव में बेसिकली, अगर कोई व्यक्ति क्रोधी है, अगर मैं जानता हूँ कि यह व्यक्ति क्रोधी है, तो मुझे इस तरह से बातचीत करनी चाहिए कि वह व्यक्ति क्रोध से और चिढ़े नहीं, शांति से बात करे। अगर मैं जानता हूँ कि यह क्रोधी है और मैं जानबूझकर ऐसा बर्ताव करता हूँ जिससे वह और क्रुद्ध हो जाए, तो फिर क्या हो रहा है? मैं उचित तरह से कार्य नहीं कर रहा हूँ।
तो लोगों में काम-वासना है, यह सत्य है। पर अगर मैं इस तरह से खुद का बर्ताव करता हूँ जिससे औरों के अंदर काम-वासना बढ़ जाएगी, तो फिर क्या हो गया उससे?
अभी इसमें कहते हैं कि कई बार ऐसे लोग बता देंगे—”नहीं, पर जो स्त्री अच्छी तरह से पूरे कपड़ों से ढकी हुई है, उन पर भी तो लोग आक्रमण करते हैं, उनका भी शोषण करते हैं!” सत्य है वह, पर जब हम इस तरह से कारण बनते हैं… जब हमारी आज़ादी के कारण अगर दूसरों की निचली प्रवृत्तियाँ निकल रही हैं, तो उस पे रेगुलेशन (Regulation) करना यह ज़रूरी है, यह ज़रूरी है!
अभी लोग शराब पीते हैं, और कई दुकानें शराब बेचती हैं। अभी कोई कहे—”शराब बेचना हमारा अधिकार है।” ठीक है, मान लिया आपका बिज़नेस है, आप करेंगे। पर सरकार परमिट रूम देती है। कोई भी व्यक्ति रास्ते पे शराब की दुकान नहीं खोल सकता। क्यों? क्योंकि लोगों को पीना है तो पियो, पर उस पर रेगुलेशन होना चाहिए। रेगुलेशन नहीं होगा तो पूरे लोग बर्बाद हो जाएँगे!
तो ड्रग्स जो हैं, अभी कई कॉलेजों में ड्रग्स बहुत आसानी से मिलते हैं और लोगों की ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है उससे।
तो क्या है कि… I will speak this in English:
There are bad people who will do bad things. But it is the responsibility of society that the bad tendencies in people are not provoked. If bad tendencies are provoked, then bad people will do worse things, and good people will also start doing bad things! So therefore, individual freedom—the right to individual freedom—has to be counterbalanced with what is the effect of that freedom on others.
So bad people are always going to do bad things, and they can’t stop it. So the government can’t do anything about it. Drunk people are going to drink. But there should be such a system in the society so that good people don’t do bad things.
So if in the name of freedom… in colleges, India is a free country, so no one can stop anyone from drinking, no one can stop anyone from selling drugs. But still, in colleges, why is the sale of drugs not allowed? Because people who don’t want to drink, people who don’t want to sell drugs—good people shouldn’t do bad things. People who want drugs are going to buy it. But you can think… so if someone is going to sell drugs, you can say that “This is my freedom, I will sell drugs.” But if your freedom is ruining others, then you have to stop it.
So sensuality is such a power that if it is not controlled, then people’s lust will increase uncontrollably, and from that, even if that person is safe, but other women, other people will be affected. That’s why individual liberty has to always be balanced with social responsibility.
That’s what I’ll broadly say. So we’ll stop here. Thank you very much!
- श्रील प्रभुपाद की जय!
- गौर भक्तवृंद की जय!
- निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
- श्री रंजनाम प्रभु की जय!