Cricket World Cup – England Knocked out, Hindi: A Bhagavad-gita perspective
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सारांश (Summary)
- इंग्लैंड का क्रिकेट विश्व कप से बाहर होना और भगवद्गीता का दृष्टिकोण: इंग्लैंड टीम, जो गत विजेता (Defending Champions) और प्रबल दावेदार थी, का विश्व कप से बाहर होना यह दर्शाता है कि केवल वर्तमान के प्रयास या क्षमता (Performance) ही सफलता के लिए पर्याप्त नहीं होते।
- कर्म, फल और दैव (नियति): भगवद्गीता (2.47) के अनुसार फल केवल हमारे वर्तमान कर्मों पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि दैव (ईश्वरीय विधान/नियति) भी एक महत्वपूर्ण कारक है। कभी-कभी बहुत अच्छा खेलने के बाद भी दुर्भाग्यवश हार मिलती है, और कभी-कभी थोड़ी अनुकूलता से जीत मिल जाती है (जैसे पिछले विश्व कप के फाइनल में थ्रो का चौका लगना)।
- अर्जुन के जीवन से तुलना: कुरुक्षेत्र के महान योद्धा अर्जुन भी अपने जीवन के अंतिम दौर में उसी गांडीव धनुष के साथ पराजित हो गए थे, क्योंकि उनकी शक्ति और क्षमता भगवान द्वारा वापस ले ली गई थी। मनुष्य की क्षमता और योग्यता (Ability) भगवान की कृपा से आती है।
- समभाव (Equanimity): सफलता में अत्यधिक अहंकार या हर्षित न होना और विफलता में अत्यधिक दुखी न होना (सुखे दुखे समे कृत्वा) ही भगवद्गीता का मुख्य संदेश है। भगवान के आश्रय से ही ऐसी परिस्थितियों में शांति और आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन: इंग्लैंड का क्रिकेट विश्व कप से बाहर होना और भगवद्गीता का दृष्टिकोण
हरे कृष्णा! इंग्लैंड वर्ल्ड कप क्रिकेट की प्रतियोगिता से नॉकआउट हो गया है। इस पर भगवद्गीता का क्या पर्सपेक्टिव (Perspective/दृष्टिकोण) है, विचार है?
हम पहले सोच सकते हैं कि भगवद्गीता का यह क्रिकेट मैच के बारे में… उससे क्या संबंध है? वास्तव में भगवद्गीता हमें सारे विश्व को किस तरह से बुद्धि की दृष्टि से देखना है, यह समझाती है। और इस जगत में क्रिकेट यह एक घटना है, और क्रिकेट में जो होता है उसको भी समझने में भगवद्गीता हमें मदद कर सकती है।
यह वर्ल्ड कप शुरू होने के पहले इंग्लैंड न केवल डिफेंडिंग चैंपियंस थी, पर इंग्लैंड फेवरेट थी कि वह वापस शायद जीतेगी। पर अभी जैसे टूर्नामेंट खत्म होने को आ रहा है, तो दो चीज़ें ही सामने आ रही हैं—इंग्लैंड बिल्कुल अच्छी तरह से खेल नहीं पा रही है और इंग्लैंड बिल्कुल समझ नहीं पा रही है, न समझा पा रही है कि वह क्यों नहीं खेल पा रही है!
कमेंटेटर्स भी अलग-अलग थ्योरी दे रहे हैं, पर सब थ्योरी का खंडन हो रहा है—”इंग्लैंड के प्लेयर जो हैं, उनकी उम्र ज्यादा हो गई है”, पर ऑस्ट्रेलिया के प्लेयर भी वैसे ही हैं लगभग। “इंग्लैंड ने इस टूर्नामेंट के पहले वन-डे मैचेस का इतना प्रैक्टिस नहीं किया, दूसरे मैचेस खेल रहे थे वे टी-20…” तो अभी ऐसा क्यों हो रहा है?
कर्म, फल और दैव का सिद्धांत
यहाँ पर भगवद्गीता बताती है कि जब हमें कोई फल दिखता है, तो उसका कारण केवल उसके पहले होने वाला कार्य ही नहीं है। वह जरूर है, पर वह पर्याप्त नहीं है। कभी-कभी जो फल आता है, वह प्रेजेंट एक्शन (Present Action – अभी के कार्यों) से नहीं, पहले के कार्यों से भी आता है। इसे ही हम नियति या दैव कहते हैं।
अभी क्रिकेट में परफॉर्मेंस (Performance) बहुत जरूरी है। प्लेयर्स को अगर जीतना है, तो उन्हें परफॉर्म करना महत्वपूर्ण है, पर परफॉर्मेंस पर्याप्त नहीं है! कई बार कोई बल्लेबाज बहुत अच्छी बैटिंग कर रहा है, और दुर्भाग्य के वजह से जो नॉन-स्ट्राइकर पर है, तो स्ट्राइकर ने जो बॉल मार दिया, वह जाकर दूसरे स्टंप्स को लग जाता है और वह अगर क्रीज के बाहर है, तो आउट हो जाता है वह! तो कभी-कभी अच्छा खेलने के बावजूद भी जीत नहीं आती है या परफॉर्मेंस नहीं होता है, और कभी-कभी कोई नहीं खेलता है ठीक से, तो भी उनकी जीत होती है।
अभी इंग्लैंड का ही उदाहरण देखते हैं, तो पिछले वर्ल्ड कप के फाइनल में… वह फाइनल में एक तरह से जब फील्डर ने थ्रो किया था, वह जाकर किसी बल्लेबाज के बैट को लग गया और उधर से वह बाउंड्री चला गया! इसके कारण वे बच सके और बाद में वे जीत गए।
तो अभी इस तरह से जब परिस्थिति आती है कि जब हमारे कर्म से फल नहीं आ रहा है, तो भगवद्गीता कहती है, हमें समझना चाहिए:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
यह मत सोचो कि हम अकेले ही हमारे फल के कारण थे। कभी-कभी हमारा कर्म हो सकता है, पर फल नहीं आता है; कभी-कभी कर्म ज्यादा होता नहीं है, फिर भी फल आ जाता है।
अर्जुन के जीवन का उदाहरण
अभी जैसे कि इंग्लैंड की परिस्थिति है, वहाँ अगर कोई शास्त्र पढ़ता है, तो उसको उससे अर्जुन की जो परिस्थिति थी उनके जीवन के अंत की ओर, उसकी स्मृति हो सकती है।
अर्जुन महान योद्धा थे और कुरुक्षेत्र युद्ध में उन्होंने बहुत एक महान युद्ध किया। पर वही अर्जुन, उसी धनुष के साथ बाद में जब युद्ध कर रहे थे, तो उनके तीर बिल्कुल कम पड़ने लग गए! निशाने को भेदने की जगह, वे निशाने तक पहुँच भी नहीं पा रहे थे! और वह भी कुछ समय तक विचलित हो गए, हतप्रभ हो गए, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों हो रहा है ऐसा!
पर उसके बाद में उन्हें भगवान कृष्ण का संदेश याद आया, और उन्हें याद आया कि भगवान ही सब जीवों को शक्ति देते हैं। जो मानवों में एबिलिटी (Ability/क्षमता) होती है, योग्यता होती है, वह भगवान की कृपा से आती है। दैव की योजना के अनुसार वह भगवान की कृपा से हमें जो एबिलिटी आती है…
तो अभी जब एबिलिटी—जो क्षमता आती है, तो कोई मानव बहुत अप्रतिम कार्य कर सकता है। और जब वही क्षमता चली जाती है, तो बड़े-बड़े बल्लेबाज भी आउट ऑफ फॉर्म (Out of form) हो जाते हैं और कुछ कर नहीं पाते हैं!
समभाव से शांति और शक्ति की प्राप्ति
तो ऐसी परिस्थिति में क्या करना है? भगवद्गीता बताती है:
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
कि जब सुख है—जब बहुत ज्यादा यश आ जाए, तो बहुत ज्यादा सुखी मत हो; अपयश आ जाए, तो बहुत ज्यादा दुखी मत हो।
इस तरह से अर्जुन ने भगवद्गीता का स्मरण करके सांत्वना और शक्ति प्राप्त की उस परिस्थिति में। तो हम भी भगवान का आश्रय ग्रहण करके, भगवान की गीता के संदेश को स्मरण करके, वहाँ शांति और शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।