Gita 18.29-39 Choose the intelligence, determination and happiness for attaining auspiciousness (Hindi)
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Lecture Summary
यह प्रवचन श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय के उस भाग पर आधारित है जहाँ भगवान बुद्धि, धृति (दृढ़ संकल्प) और सुख के त्रिविध स्वरूप (सत्व, रज और तम गुणों के आधार पर) का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
- कर्म के पाँच कारक और अहंकार: कर्म की सिद्धि के लिए अधिष्ठान (परिस्थिति), कर्ता, करण (इंद्रियाँ), चेष्टा (प्रयास) और दैव (भाग्य) – ये पाँचों आवश्यक हैं। जो व्यक्ति यह मानता है कि “सब कुछ मैं अकेला ही करने वाला हूँ,” वह अज्ञानी और मोहग्रस्त है।
- बुद्धि के तीन प्रकार:
- सात्विक बुद्धि: जो धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य और बंधन-मोक्ष को सही ढंग से समझती है।
- राजसिक बुद्धि: जो धर्म और अधर्म, तथा सत्य और असत्य में ठीक से भेद नहीं कर पाती।
- तामसिक बुद्धि: जो अधर्म को ही धर्म मान लेती है और हर बात को विपरीत समझती है।
- धृति (दृढ़ संकल्प) के तीन प्रकार: योग साधना के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों को नियंत्रित करने वाला संकल्प सात्विक है; फल की इच्छा से किया गया संकल्प राजसिक है; और आलस्य, भय, शोक व प्रमाद को बनाए रखने वाला हठ तामसिक है।
- सुख के तीन प्रकार: जो सुख आरंभ में विष जैसा और परिणाम में अमृत (आत्म-साक्षात्कार) जैसा होता है, वह सात्विक सुख है। जो सुख इंद्रियों के भोग से आरंभ में अमृत जैसा और अंत में विष जैसा लगता है, वह राजसिक सुख है। जो सुख केवल नींद, आलस्य और मोह से उत्पन्न होता है, वह तामसिक सुख है।
Full Transcription
अथार्वे अध्याय में भगवान संपूर्ण गीता का सार देते हैं। जो हमें दूसरे अध्याय में दिया है, एक तरह से, वही अथार्वे अध्याय में भगवान दे रहे हैं। पर अथार्वे अध्याय में वही चर्चा और गाढ़ हो रहे हैं। क्योंकि जो पहले परिचय के रूप में बताया था, उसका विस्तार से चर्चा किया, अगले तीसरे से सत्रहवें अध्याय तक। और अभी उसको एक तरह से पुनः विस्तार अंत कर रहे हैं, एक सार के रूप में।
यहाँ पर भगवान कई पद्धति से और गाढ़ जाते हैं। जैसे कि कर्म में जो पाँच कर्ता होते हैं, उनके बारे में चर्चा करते हैं। पर जब हम कर्म करते हैं, तो उसमें ज्ञान प्राप्ति में तीन अंश होते हैं—ज्ञानं, ज्ञेयः, परिज्ञाता। कर्म, कर्मे में करणं, कर्म करते ही। इसका वर्णन वो अट्ठारहवें श्लोक में करते हैं।
अभी जब हम कोई भी कर्म कर रहे हैं, अट्ठारहवें अध्याय का सार क्या है? कि हमें कर्म का त्याग नहीं करना है। अर्जुन को संशय है, भय है कि मैं यह युद्ध करूँगा, मेरे विशिष्टादारों से युद्ध करूँगा, तो मुझे पाप लग जाएगा, मैं कर्म के बंधन में फँसूँगा। तो इसलिए वो सोचते हैं कि मैं कर्म का त्याग कर दूँगा। पर भगवान बताते हैं, आपको कर्म का त्याग करने की ज़रूरत नहीं है, आप कर्म के फल से आसक्ति है, उसको त्याग दोगे। उसको अगर आप त्याग दोगे, तो आप बंधन में नहीं फँसोगे। तो अब यह आसक्ति कैसे त्यागे? यह केवल भावनाओं तक सीमित है कि मैं आसक्त हूँ या मैं आसक्त नहीं हूँ? नहीं, उसको और अच्छी तरह से समझाने के लिए, भगवान हमें समझाने के लिए और कितनी मैं आसक्ति से धीरे-धीरे छूट रहा हूँ, इसके लिए आगे समझाते हैं।
तो अभी बीसवें श्लोक से अट्ठारहवें श्लोक तक उन्होंने ज्ञान, कर्म और कर्ता, ये तीनों कैसे तीन गुणों में होते हैं, इसका वर्णन लिया। तो अभी इसके बाद में हम जब कर्म करते हैं, तो कर्म करने में और भी कुछ चीज़ें होती हैं, तो उसके बाद में चर्चा करते हैं। तो अभी बुद्धि, धृति और सुख—इन तीनों के बारे में चर्चा करेंगे। यहाँ भी कर्म में महत्वपूर्ण सहभाग करते हैं। तो इसके बारे में इसका क्या अर्थ है, और वो कैसे होता है, हम देखेंगे।
तो हम अट्ठारहवें अध्याय के, अभी उनतीसवें श्लोक से शुरुआत कर रहे हैं। अगर आपके पास गीता नहीं है, गीता की बात करेंगे, अगर नहीं है आपके पास तो? सबके पास है गीता पढ़ने के लिए? तो फिर अट्ठारहवां अध्याय का, अभी अट्ठारहवें श्लोक में भगवान ने, जो करता था तीन गुणों में, उसका चर्चा का पूर्ण दिखी है। तो अभी भगवान बोलेंगे कि मैं इन तीन चीज़ों के बारे में बात करूँगा:
बुद्धेर्भेदं धृतैश्चैव गुणतस्त्रविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥
बुद्धेर्भेदं धृतैश्चैव—बुद्धि और धृति, इन दोनों का जो भेद है, गुणतः त्रिविधं। बुद्धि कैसे सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण में भेद है:
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि सा पार्थ सात्त्विकी॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृताः।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि सा पार्थ राजसी॥
अयथावत् प्रज़ाजानाति—यथावत् मतलब जैसे है वैसे (भगवद्गीता यथा रूपम् कहते हैं)। यथावत् यानी जैसे है वैसे, अयथावत् मतलब जैसे है वैसे नहीं समझता व्यक्ति। प्रजानाति, कैसे समझता है व्यक्ति?—अधर्मं धर्ममिति या… तो क्या धर्म है, क्या अधर्म है, वह व्यक्ति समझ नहीं पाता है। कार्यं चाकार्यमेव च—क्या कार्य है, क्या अकार्य है, वह व्यक्ति समझ नहीं पाता है। तो यह बुद्धि जो है, यह रजोगुणी बुद्धि है। रजोगुणी बुद्धि में क्या मानता है व्यक्ति? कि प्रधान रूप से वो भौतिक और आध्यात्मिक इनका भेद समझ नहीं पाता है, भौतिक और आध्यात्मिक। तो यह भेद समझ नहीं पाता है, तो फिर अपाधर्म और पराधर्म इनका भेद समझ नहीं पाता है।
अपाधर्म का मतलब है कि जो दिव्य धर्म नहीं है, जो भौतिक धर्म है। अपाधर्म मतलब जो दिव्य धर्म है, जैसे कि महाभाग रामायण में वर्णन आता है कि जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया, तो तभी उसको विभीषण ने उपदेश दिया कि ऐसे आपको नहीं करना चाहिए, यह परस्त्री है, राम बहुत शक्तिशाली है, राम, वास्तव में विष्णु का अवतार है, उसका क्रोध मत करवाओ। तो उसने बिल्कुल सुना नहीं है, तो बहुत बार प्रयास किया और फिर विभीषण का अपमान कर दिया और उसको ठुकरा दिया।
इसे बार से और तभी अभी विभीषण अपने, उसके चार मंत्री थे, उनके साथ वो विचार करने लगा कि अब क्या करना चाहिए मुझे? तो फिर तभी विभीषण क्या करते हैं कि अभी क्या है, कि मेरा कुल जो है, वह कुल का राज्य जो है, वह अधर्म के मार्ग में जा रहा है। तो अगर वह अधर्म के मार्ग में जा रहा है, तो मुझे क्या करना चाहिए? मेरे पास अभी तीन पर्याय हैं। एक पर्याय है कि मैं तो यह अधर्म में सहभागी नहीं होना चाहिए, तो इसलिए मैं यह राज्य त्याग करके वनवास चला जाऊँगा। तो क्या मैं इस पाप में सहभागी नहीं होना चाहूँ? बहुत एक पर्याय है मेरे पास।
पर यहाँ क्या होगा? क्योंकि अभी तब मेरा वानप्रस्थ का समय नहीं आना है और मैं राज परिवार में हूँ, तो मेरा इस राज परिवार का आदर बनाए रखने के लिए और हमारी प्रजा के प्रति उनका संरक्षण करने के लिए कर्तव्य अभी तक है। तो दूसरा पर्याय यह है कि मैं—सभी राक्षस होते हैं, सभी राक्षस आसुरी प्रवृत्ति के नहीं होते हैं, राक्षसों में कुछ अच्छे राक्षस होते हैं—मुझे आसुरी, अच्छे राक्षस होते हैं, पांडा होते हैं, घटोत्कच था, बहुत भीम का पुत्र था और बहुत काफ़िर सत्सगुणी था। तो वैसे तो मैं क्या कर सकता हूँ? ये राक्षसों में भेद कर सकता हूँ और फिर राक्षसों में भेद करके… पर यह पर्याय, यह उचित नहीं है, यह कर नहीं पाऊँगा, क्योंकि रावण का जो सत्ता है, उसने इस तरह से सब लोगों पे अपनी पकड़ बना ली है कि उसके प्रति विद्रोह करने से लोग भयभीत होंगे, विद्रोह करेगा नहीं।
तो तीसरा पर्याय मेरे पास क्या है कि मैं राम के पक्ष में जाऊँ और राम से कहूँ कि आपका शत्रुत्व रावण से है, आपका शत्रुत्व राक्षस कुल से नहीं है। सब राक्षस जो हैं, वो रावण की प्रवृत्ति के नहीं हैं, इसलिए अब युद्ध तो अनिवार्य है, पर युद्ध होगा। युद्ध में जो रावण के पक्ष से युद्ध करेंगे, उनका तो आप वध करोगे, पर उसके बाद में लंका की जो साधारण प्रजा है, उनके प्रति आप शत्रुत्व मत रखें, आप उनके प्रति कुछ हिंसा मत कीजे। और उसके बाद में इस तरह से जो रावण के पक्ष में हैं, मैं उनकी तो मदद नहीं कर सकता, रावण की मदद नहीं कर सकता, पर जो बाक़ी प्रजा हैं, मैं उनकी मदद कर सकता हूँ।
तो इस तरह से विचार करके फिर विभीषण ने क्या फैसला किया कि मैं तो श्री रामचरण के पक्ष में आऊँगा। जब उसने ऐसा फैसला किया, तो कई लोग ऐसा कहते हैं कि जो विभीषण था, वो भ्रातृद्रोही था, उसके भाई के सबसे बड़ा विरोध कर रहा था, तभी भाई को त्याग कर दिया, त्याग कर दिया, पर उसके विरुद्ध पक्ष में चला गया। तो कहा, यहाँ पर यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण क्या है? आध्यात्मिक दृष्टिकोण क्या बात है कि सब कुछ हम भगवान के लिए त्याग करना चाहते हैं, भगवान के लिए सब कुछ त्याग कर सकते हैं, सब संबंधों को त्याग कर सकते हैं। पर वो भले ही छोड़ते हैं, भौतिक दृष्टिकोण के लिए तो एक ऊँचा धर्म है—एक है एक राजा के प्रति धर्म, और दूसरा है एक प्रजा के प्रति धर्म। तो राजा एक प्रजा का सेवक है, तो प्रजा के कल्याण के लिए, प्रजा के प्रति धर्म है, उसके लिए राजा के प्रति धर्म वो त्याग करते हैं।
तो यहाँ पे क्या मतलब है कि जो लोग ऐसे कहते हैं कि विभीषण ने भ्रातृद्रोह किया, वो क्या है? समझ नहीं पा रहे हैं—अयथावत् प्रजानाति। क्या धर्म है, क्या अधर्म है, अच्छी तरह समझ नहीं पाते हैं वो। और यही वास्तव में गलती कुंभकर्ण करता है। जब कुंभकर्ण को पता चलता है कि रावण ने सीता का अपहरण किया है, तो कुंभकर्ण रावण को डाँटता है, यह राजसी बुद्धि है। तो उसके बाद में भी तामसी बुद्धि जो है:
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृताः।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि सा पार्थ तामसी॥
अधर्मं धर्ममिति या… जो अधर्म है, उसको यदि कोई व्यक्ति धर्म मान लेता है, बिल्कुल उल्टा कर देता है, मन्यते तमसावृता, जिसकी बुद्धि तमस से आवृत हो गई है, सर्वार्थान्विपरीतांश्च, वो बिल्कुल उल्टा कर देता है, जो सत्य है उसका उल्टा कर देता है।
तो कई बार क्या होता है जो कोई साधारण मानव है, उसको लोग भगवान मान लेते हैं और भगवान को साधारण मानव के समान आचरण करते हैं। भगवान ने ऐसे क्यों किया? ऐसे क्यों किया? ऐसे क्यों किया? अगर ऐसे किया तो वो भगवान नहीं हो सकते हैं! तो वास्तव में भगवान ने 16,108 रानियों से विवाह क्यों किया? तो एक बार क्रिश्चियन पादरी भगवान से पूछ रहे थे कि भगवान इतने कामो कैसे हो सकते हैं? इतना कामो कोई व्यक्ति है, तो वो भगवान कैसे हो सकता है?
भगवान जी बोले कि भगवान में सब गुण जो हैं, असीमित मात्रा में हैं। तो भगवान में अगर काम है, तो वो असीमित मात्रा में है और इसलिए वो भगवान है। तो जो जीवात्मा करना चाहता है पर कर नहीं सकता है, वो भगवान पूर्ण मात्रा में करते हैं। अगर भगवान में पूर्ण मात्रा में काम है, तो… यह दर्शाती है, भगवान कैसे अलौकिक हैं, जो कोई साधारण व्यक्ति कर नहीं सकता है, उससे उनका भगवत्त्व दर्शाया जाता है। पर लोग कहते हैं कि यह कर्तव्य नहीं किया, तो यह भगवान कैसे हो सकता है? तो यह उल्टा हो गया है।
और उसके विपरीत क्या होता है, कोई साधारण व्यक्ति है, उसको लोग भगवान नहीं मानते हैं। इसे थोड़ा जादू कर दिया, कोई चमत्कार कर दिया, कोई थोड़ा सा राख ला दिया, तो वो कहते हैं, वो भगवान मान लेते हैं। तो भगवद्गीता बोलती है कि चूल्हे से राख इतना सा निकलता है, चूल्हा भगवान है क्या? तो अगर कोई कहता है कि मेरे गुरु ने मुझे स्पर्श किया और मेरे पूरे शरीर से इलेक्ट्रिक करंट का शॉक लगता है, अगर इलेक्ट्रिक करंट का शॉक देना यह भगवान का लक्षण है, तो इलेक्ट्रिक के सॉकेट में हाथ डाल दो, वो शॉक लग जाएगा! तो क्या है, यह भगवान के भगवत्त्व का लक्षण नहीं है। पर इस तरह से जिन लोग करते हैं, तो क्या है, सर्वार्थान्विपरीतांश्च सत्य है, उसके विपरीत कार्य करना, उसके विपरीत विचार करना, यह भगवान का लक्षण है।
तो तभी लोग कहते हैं कि वास्तव में यह पुरुष और स्त्री, यह जो भेद है, यह शारीरिक है, हमें शरीर के परे जाना चाहिए, शरीर को देखना चाहिए। इसलिए क्या पुरुष और स्त्री का कैसे भी मिलन हो सकता है, और अगर आप याद रखते हो, अगर आप आध्यात्मिक चेतना में होगे, तो कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए कोई भी नियम विरोध नहीं है पुरुष और स्त्री के मिलन में। तो वास्तव में यह क्या है? यहाँ ज्ञान का लक्षण है, हम आत्मा हैं, यह सत्य है। कोई व्यक्ति पुरुष नहीं है, स्त्री नहीं है, ये सब आत्मा है, पर ऐसे सिर्फ यह बौद्धिक स्तर पर संकल्पना करना कि मैं आत्मा हूँ, पर्याप्त नहीं है। हमें शुद्धिकरण करना है, जिस तरीके से हम आत्मा के स्तर पर जा रहे हैं। तो जब तक हम आत्मा के स्तर पर नहीं गए हैं, शुद्धिकरण की विधि पालन करके, तब तक पुरुष और स्त्री का भेद करना महत्वपूर्ण है और पुरुष और स्त्री का जो मिक्सिंग होता है, उसको नियमित रखना चाहिए। तो यह जो है, ऐसे तत्वज्ञान को लेकर उसका उल्टा करना, यहाँ उचित नहीं है।
कोई लोग कहते हैं—कोई मुझे एक वेबसाइट पर एक सवाल पूछा था कि क्या यह आत्मा का ध्यान है, वो बता रही है? कोई बॉलीवुड में कोई मुझे आ गया था, उसने कोई हत्यारा था, वो व्यक्ति से आ गया, लोगों को हत्या करता था, और जब यह हत्या करता था किसी का, तो यह बोलता था—नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः… यह व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती है। तो वास्तव में यह है, अगर ऐसा कोई करता है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती है, उसको किसी का मार डालता हूँ, बहुत मूर्खता है! आत्मा की मृत्यु नहीं होती है, सत्य है, पर उसी भगवद्गीता में से बताया गया है—नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि… उसने ही बताया गया है कि सत्वगुण का एक लक्षण है अहिंसा, जो दैवी गुण है, अहिंसा एक गुण बताया गया है—मा हिंस्यात् सर्वभूतानि, प्रभुपाद जी बोलते हैं। तो आत्मा सनातन है, इसका मतलब यह नहीं है कि सबको लाइसेंस है किसी को भी मार डाले। आत्मा सनातन है, इसका मतलब क्या है कि हमें हमारा कर्तव्य करना चाहिए, भले ही ऐसे लग रहा है कि इस कर्तव्य से मुझे इस जन्म में फल नहीं मिलेगा, मुझे इस जो फल है, अगले जन्म में मिलेगा, ज़रूर मिलेगा फल। तो इसलिए मुझे कर्तव्य करते रहना चाहिए।
तो अर्जुन को अगर भगवान बोलते हैं, अगर उनकी आत्मा सनातन है, तो भय का कारण नहीं है, कौरवों का वध करने के लिए… कौरवों का वध नहीं है, बहुत से पाप किए हैं, उसके कारण उनको सज़ा देनी ज़रूरी है। तो सज़ा देने में हिचकिचा रहे हैं, तो तभी बता रहे हैं कि आत्मा सनातन है। तो आत्मा सनातन है, यह हिंसा के लिए कोई लाइसेंस नहीं है, छूट नहीं है। तो इस तरह से कोई करता है, तो वो क्या है? यह तमोगुण का लक्षण है।
अभी बुद्धि के बाद में भगवान धृति के बारे में चर्चा करेंगे। धृति मतलब दृढ़ संकल्प। अभी बुद्धि से हम समझते हैं कि मुझे यह कार्य करना है, यह कार्य नहीं करना है, पर जब हम कार्य शुरू करते हैं, तो शुरू करना पर्याप्त नहीं है, वो कार्य को करते रहना चाहिए। तो कार्य को करते रहने के लिए धृति लगती है, दृढ़ संकल्प लगता है:
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाविचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
तो यहाँ बता रहे हैं—धृत्या यया धारयते… जिस धृति के द्वारा धारण करता है, क्या धारण करता है? मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः—कि अपने मन, प्राण, इंद्रिय क्रिया, उसको नियंत्रित करता है और किस तरह से करता है? योगेन—योग साधना द्वारा, अविचारिण्या… उसमें हिचकिचाहट नहीं आता है, वह जो धृति है, वह सात्विकी धृति है।
तो हमें जब हम भक्ति करते हैं, या कोई आध्यात्मिक धर्म का कार्य करते हैं, तो हमें दृढ़ संकल्प बढ़ता है। अगर मान लीजिये एकादशी है, एकादशी के लिए उपवास करना है, तो हमें गौर पूर्णिमा आ रहा है, हम शाम तक उपवास करते हैं, तो यह उपवास करने के लिए क्या लगता है? नियंत्रण लगता है, जो नियंत्रण है, वह नियंत्रण सात्विक है। तो दृढ़ संकल्प से हम यदि हम हमारे इंद्रियों का कार्य है, हमारे मन का कार्य है, उसको नियंत्रित करते हैं, तो वो दृढ़ संकल्प जो है…
तो अगले से हम देखें जो होते हैं लोग, उनमें भी दृढ़ संकल्प होता है, पर वो दृढ़ संकल्प अधिक क्या होता है? वो बाहर के जगत को नियंत्रण करने का प्रयास होता है। तो अंदर का जगत है, उसका नियंत्रण करना बाहर के जगत के नियंत्रण से और बहुत मुश्किल है। इंद्रियों के स्वामी होते हैं, उनको वैदिक के संकल्प से, महाराज कहते हैं। बाहर जगत के राज हैं, उनको महाराज कहते हैं, पर जो इंद्रियों को नियंत्रण करते हैं, वास्तव में इस इलाके को नियंत्रण करना बहुत मुश्किल होता है, उनको महाराज कहते हैं।
सत्वगुण का लक्षण है, सत्वगुण का दृढ़ संकल्प है कि व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रण करता है और नियंत्रण कैसे कर सकता है? योगेन अविचारिण्या—योग की साधना के द्वारा, योग के प्रयास, योग की विधि के द्वारा। ऐसे नहीं है कि व्यक्ति को कोई कहता है कि मेरे पास क्या है? मेरे पास दृढ़ संकल्प है। नहीं, तो ऐसे नहीं है, सबके पास दृढ़ संकल्प है कि सब आत्मा ही है और सबके पास शक्ति तो है। वास्तव में दृढ़ संकल्प मतलब क्या है? Determination is nothing but persistent desire. जो इच्छा की शक्ति सब के पास है, पर क्या है? हमारी इच्छा जो है, पहले यह इच्छा होती, फिर वो इच्छा होती, तो वो इच्छा होती।
पहले जो उपवास करने का, अगर हम कल शिव उपवास कर रहे हैं, तो उपवास का शुरुआत जब कर रहे हैं, तो इच्छा होती है कि अभी मैं उपवास करना चाहता हूँ। पर इच्छा करने की शक्ति तो सब में है, तो अगर हम एक ही इच्छा को बरकरार रखते हैं, वही दृढ़ संकल्प है। तो दृढ़ संकल्प यह कोई मिस्टीरियस, रहस्यमय चीज़ नहीं है, यह क्या है? Determination is simply focused and persistent desire. फोकस्ड मतलब एक चीज़ हमारी इच्छा शक्ति है—बहुशाखा अनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायीनाम् (दूसरे अध्याय के श्लोक में भगवान बोलते हैं कि बहुशाखा, अनेक चीज़ों में हमारी इच्छा जाती है)।
पर अगर हम एक चीज़ में इच्छा को लगाते हैं, केंद्रित करते हैं और उसी में केंद्रित रखते हैं, तो वो क्या है? बहुत दृढ़ संकल्प है। तो यह कैसे आता है? योगियों में भी जाते हैं, यह योग साधना से आता है। अगर कोई बोलता है कि मैं इंद्रियतृप्ति को त्यागने वाला हूँ, यह छोड़ना है, यह बुरी आदत है, यह आसक्ति है, इसको छोड़ना है, तो क्या है? सिर्फ उसका विचार करके मुझे छोड़ना है, मुझे छोड़ना है, छोड़ना है, छोड़ना है… यह एक मानसिक तत्व है, जो हमारे ध्यान को पकड़ लेता है, वो हमें पकड़ लेता है। जिस चीज़ के बारे में विचार करते हैं, वैसा हम कार्य करने लगते हैं।
तो अगर मैं नकारात्मक विचार करूँगा कि ये नहीं करूँगा, ये नहीं करूँगा, ये नहीं करूँगा, ये नहीं करूँगा… तो क्या होगा? वो ना, ना, ना विचार करते हैं, उसको मन कैसे जादू कर देगा? ना, ना, ना—हाँ, हाँ, हाँ, हो गया! ऐसे हो जाता है, वो परिवर्तित हो जाता है। तो जब हमें दृढ़ संकल्प करना है, तो नकारात्मक रूप से दृढ़ संकल्प नहीं करना है, सकारात्मक रूप से करना है। ठीक है, मुझे छोड़ना है, पर छोड़ने पर ज़ोर नहीं देना है, मुझे क्या पकड़ना है, इस पर ज़ोर देना है।
तो अगर मैं नियम करता हूँ कि मैं यह हरे कृष्ण महामंत्र का जप करूँगा, या मैं शास्त्र का और अध्ययन करूँगा, मैं यह भक्ति की विधि और करूँगा, या यह कार्य और करूँगा, तो वो सकारात्मकता मैं बढ़ा दूँगा, तो क्या होता है? नकारात्मक अपने आप छूट जाता है, प्रायः वो प्रायः भगवान की। तो इसलिए, जो हमें मन-प्राण-इंद्रिय क्रिया धार रहे थे, उनका नियंत्रण करना है, वो कैसे करना है? वह योगेनाविचारिण्या, योगेना—योगी साधना के द्वारा।
तो ‘बैक टू गॉडहेड’ में एक आर्टिकल आया था कि मैं कृष्ण भावनामृत में कैसे आया? तो वो एक माताजी का आर्टिकल था। ये माताजी जो थी, एक यूरोप में थी कहीं, फ्रांस में, तो वो एक एक्ट्रेस थी, एक्ट्रेस बन रही थी फ्रांस में। तो तभी क्या होता है, उसको सिगरेट पीने की बहुत आदत थी, तो फिर वो एक फ्लाइट से जा रही थी, तो एक भक्त मिल गया उनको फ्लाइट में और उन्होंने उनको बताया कि ये हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने से आपको मन की शांति मिलेगी।
तो क्या हो रहा था कि अभी वो सिगरेट पीने के कारण उसका जो पब्लिक इमेज था, वो प्रॉब्लम आ रहा था उसको, उसको छोड़ना था, उसके लिए, उसको छोड़ने नहीं पा रहा था। तो ये भक्त ने बताया कि आप ये हरे कृष्ण महामंत्र का जप करो और आपको… जब माला जप कर लिया, फिर सिगरेट पीना हो गया, तो क्या हुआ? एक दिन, दो दिन, तीन दिन, तो इसके बाद में क्या हुआ? माला जप कर लिया और सिगरेट पीने की आदत चली गई और फिर जो कई साल से छूटा नहीं गया था, एक हफ़्ते में छूट गया।
तो उससे हो रहा है, अगर इसमें हरे कृष्ण आपने इतनी शक्ति है कि इतने आसानी से छूट गया? क्या है, पाश्चात्य देश में, लोग कृष्ण कौन है, भगवान क्या है, भगवान क्या है, कुछ पता नहीं था, सिर्फ़ यह मंत्र सुन लिया और वो कर… तो पहले यह शक्ति आजमाने नहीं होने और फिर उसके बारे में भक्त बन गए। तो क्या है? योगेना विचारिण्या, तो जो नहीं करना है, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं… उस पीछे के लिए नहीं करना है, क्या करना है? उस पर ज़ोर देना है। अगर उस पर हम ज़ोर दें, जो नहीं करना है, वो मन से चला आता है।
भक्ति की विधि क्या है? मन को खाली करना नहीं है, कि मन को माया से खाली करना नहीं है—यतपादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या कर्माशयं ग्रथितमुद्वहतीन्द्रियैः। तद्वन्त्यपेतदयो यतयोऽङ्ग सङ्गान् स्रोतोगणस्य तमरणं भज वासुदेवम्॥ वो बता रहे हैं यहाँ पे, श्रीमद्भागवत में प्रार्थना आती है कि कुछ लोग होते हैं रिक्तमतयो, वो सोचते हैं हमारी मती को खाली करना है, कि आसक्तियों से मुक्त करना है, पर क्या आता है? स्रोतोगणस्य, जैसे सागर की तट पे लहरें आ जाती हैं और लहर से पानी जो सूख गया है, तट, वो पुनः गीला हो जाता है, वैसे भौतिक इच्छाओं की लहरें आती हैं और हमारी चेतना पुनः भौतिकवादी बन जाती है। तो मन को खाली करना मुश्किल है, पर क्या करना है? यतपादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या… अगर मैं भक्ति में लगाता हूँ…
योगेनाविचारिण्या, पर फॉल अवे—मतलब हम भक्ति को छोड़ते हैं, तो क्या होता है? हम कभी-कभी क्या, आप जानते हैं, कभी-कभी क्या होता है, आप इलेक्ट्रिसिटी को कोई डिवाइस, कोई यंत्र चला रहे हो, तो कभी इलेक्ट्रिसिटी में स्पैक आ जाता है, तो ये करंट का स्तर है। तो अचानक स्पैक इतना ज़्यादा आ गया है, कोई कहेगा कि अभी इलेक्ट्रिसिटी का मैं इस्तेमाल नहीं करूँगा, छोड़ो इसको। नहीं, ऐसे नहीं है, उसके लिए स्पैक गार्ड होता है।
तो क्या होता है? हमारी भौतिक वासनाएँ भी होती हैं, क्या होती है? हमारा साधारण चेतना एक स्तर पर रहता है, थोड़ी भौतिक आसक्तियां रहती हैं, पर वो नियंत्रण में रहती हैं। पर कभी-कभी क्या होता है, अचानक एक स्पैक के समान वो आसक्तियां और बढ़ जाती हैं। स्पैक मतलब जो शक्ति है, वो किस चीज़ की इच्छा बहुत बढ़ जाती है, ऊपर हो जाती है। तो वो उस समय के लिए आ गया, कि उस समय कुछ गलती हो गया, ठीक है। पर क्या है? वो ऐसे ही वासना हमेशा के लिए रहने लगी है? वो चली जाएगी बाद में।
तो उसके बाद में मैं क्या करता हूँ, महत्वपूर्ण है। तभी जो हो गया सो हो गया, तभी वो फॉल डाउन हो गया, पर फॉल डाउन मतलब क्या? कि वो एक कार हो गया है, इसलिए मैं इतना अदर हो गया कि मैं तो इतना अदर… तो मैं भक्ति नहीं कर पाऊँगा, छोड़ो इसको। नहीं, वो करने की ज़रूरत नहीं है। तो वो स्पैक आते रहेंगे, तो स्पैक के बीच में जो होता है, उस समय मैं क्या कर रहा हूँ, वो महत्वपूर्ण है। उस समय मैं, मैं अगर गंभीर रूप से भक्ति करते रहूँगा, तो धीरे-धीरे क्या होगा? वो शुद्धि के कारण के कारण, वो स्पैक जो होंगे, वो उतने नहीं आएँगे और वो धीरे-धीरे उनकी फ्रीक्वेंसी और उनकी इंटेंसिटी कम हो जाएगी, मतलब इतने बार-बार नहीं आएँगे और इतनी शक्ति से नहीं आएँगे, धीरे-धीरे उनका प्रतिकार कर देंगे।
इसलिए भक्ति में सकारात्मक कुछ कारण, योगेनाविचारिण्या, यह जो धृति है, वो सात्विक है। अब इसके बाद में हम राजसी धृति के बारे में चर्चा करते हैं:
यतु धर्मकामार्थार्थं धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
यतु धर्मकामार्थार्थं… वह धृति, जो किसके लिए करते हैं? धर्म और काम के लिए। धर्म-काम, वेले पालन करते हैं, पर वो काम के लिए।
कई बार हम देखते हैं कि श्रावण मास आता है तो लोग तभी बहुत व्रतों का पालन करते हैं—मैं यह करूँगा, वो करूँगा, ये नहीं खाऊँगा, वो नहीं खाऊँगा। और उनकी अपेक्षा होती है क्या? इससे मैं, इससे बहुत एक तरह से पुण्य प्राप्त होगा उन्हें। तो यह अच्छा है, वो क्या है? आत्मनियंत्रण का इच्छा नहीं है हमेशा के लिए, पर उस समय के लिए वो कर रहे हैं, वो भी अच्छा है, एक तरह से, बिल्कुल, धर्म से तो अच्छा है। पर यह धर्म है, यह कामार्थार्थं है, तो बाह्य रूप से कुछ प्राप्त करने के लिए जो दृढ़ संकल्प होता है, धृति है, वो क्या है? वह राजसिक है।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी—वह क्यों कर रहा है व्यक्ति? दृढ़ संकल्प तो है, पर फलाकाङ्क्षी, ये फल चाहिए, इसलिए मैं कर रहा हूँ। तो वास्तव में ध्रुव महाराज का जो दृढ़ संकल्प था, वो पहले राजसिक था। पहले ता क्या था? उनको राजसिक चाहिए था, ऐसा राजसिक चाहिए मुझे, जो मेरे पिता से भी बड़ा हो, ना कि पिता से, मेरे दादा से भी बड़ा राजसिक हो। तो ऐसे राज्य के लिए क्या करना चाहिए? उनकी माता ने बोला कि तुम जंगल में जाओ, भगवान को ढूँढो।
और फिर नारद मुनि ने उनको, उनको बोला कहा, तुम अपने बालक हो के लिए नहीं करते हो… नहीं, मुझे करना है, आप बताओ मुझे कैसे करना है। तो पहले उनका दृढ़ संकल्प था राजसिक, क्योंकि क्षत्रिय होते हैं, वो थोड़ा रजोगुण में होते हैं। पर क्या हुआ? क्योंकि वो जो दृढ़ संकल्प था, वो भगवान के ओर के लिए था, क्योंकि वो भगवान पर चिंतन कर रहे थे, भगवान की भक्ति कर रहे थे। तो जब भगवान का दर्शन हो गया, तब उनको एक उच्चाधिकार कर गया और भगवान का दर्शन जब उनको देखा, तो भगवान इतनी सुंदरता से, इतना संतुष्ट रहे थे, वो हो रहे थे—यह क्या है? काचं विचिन्वन्नपि दिव्य रत्नम् कि यह बहुत एक चीज़ माँग रहा था, मैं वो काँच है, और आप भगवान तो आप एक रत्न के समान हैं। तो मैं एक अच्छा क्यों पिया जवा, मैं आपका ही स्वीकार करता हूँ, मुझे स्वामिन कृतार्थोऽस्मि वरं याचे, मुझे और कुछ नहीं चाहिए भगवान!
तो यह जो है, अगर कोई राजसिक चेतना से भी भक्ति में लग जाता है, तो फिर धीरे-धीरे वह सिद्ध हो जाएगा। तो कोई दृढ़ संकल्प से करता है, कि मैं पांडुत्व प्राप्त करना चाहता हूँ और मैं सबसे नंबर बनाऊंगा, पांडुत्व प्राप्त करता हूँ, कोई बात नहीं, इसी तरह से यह ना करता है, मना कृष्णा दिवेशिवित, उसी तरह से करने लगता है सेवा, तो धीरे-धीरे से शुद्धिकरण हो जाएगा और भक्ति में प्रगति करेगा।
तो राजसिक जो है, उसमें व्यक्ति बाहर की चीज़ें प्राप्त करने के लिए, बाहर के जगत को निरंतर करने के लिए काफ़ी दृढ़ संकल्प प्राप्त है। अभी भौतिक चीज़ें भी प्राप्त करने के लिए वो आसान नहीं है, उसके लिए दृढ़ संकल्प प्राप्त है। कोई व्यक्ति धन प्राप्त करता है, कोई व्यक्ति क्रिकेट का चैंपियन बनता है, कोई व्यक्ति बड़ा लखपति, करोड़पति बनता है। अभी कोई बड़ा राइटर बनता है, तो उस सबके लिए मेहनत करनी पड़ती है और वो मेहनत भी, उसमें दृढ़ संकल्प ज़रूरी है। तो वो दृढ़ संकल्प है, वो राजसिक है। यह राजसिक दृढ़ संकल्प व्यक्ति को कार्यशील करता है, और उसको यश भी दिला सकता है, पर वह आध्यात्मिक यश नहीं दिलाएगा।
तो एक तो राज के सपने देखते हैं, दूसरा है कि दिन में सपने देखते हैं, डे-ड्रीमिङ्ग कहते हैं, तो दिन में सपने देखते हैं और वास्तव में कुछ सकारात्मक रूप से करना ही नहीं। यहाँ क्या है? यह तमोगुण का लक्षण है।
तो प्रभुपाद साथ को कहानी बताते थे कि एक दूसरा बेचने वाला था, वो क्या कर रहा था? वो बताता था कि मैं अभी दूसरा बेच रहा हूँ, और यह एक मटका दूसरा बेचूँगा, तो फिर क्या होगा? यह पैसा मिलेगा, तो क्या, इससे मैं और दूसरा कर दूँगा, फिर मेरी पत्नी आएगी, और फिर मैं भोग करूँगा। और फिर अगर मेरी पत्नी मेरी बात नहीं सुनेगी, भोग में मदद नहीं करेगी, तो मैं उसको मारूँगा! और क्या, यह मटका सामने था, उसको मारा, और मटका फूट गया, जो था वो भी चला गया।
तो यह क्या है? जो सपने देखते रहना और व्यावहारिक रूप से कुछ कार्य करना ही नहीं, सिर्फ़ सपने देखते रहना, यह क्या है? यह तमोगुण का लक्षण है।
कभी-कभी अभी क्रिकेट का वर्ल्ड कप चल रहा है, तो क्या होता है? लोग क्रिकेट का नशा होता है, तो कभी-कभी क्रिकेट का नशा होता है, तो क्या होता है? यहाँ भी तमोगुण का लक्षण है। और यहाँ क्या होता है, यहाँ तामसिक लोग होते हैं, उनको हॉरर मूवीज़ देखने भी बड़ा अच्छा लगता है। क्या है? वास्तव में भय जो है, यहाँ वास्तव में यहाँ कोई आनंद देने वाली भावना नहीं है, पर क्या है? जब व्यक्ति इतने बोर हो जाते हैं, इतना तंग आ जाते हैं (तंग is actually frustrated), उप जाते हैं, तो कुछ तो उत्तेजना चाहिए। तो भय का भी उत्तेजना क्यों ते? बड़ा अच्छा है, वो लोग कोई बड़ा खतरनाक चीज़ देखते हैं, भयभीत हो जाते हैं, और लोग कहते हैं, बहुत मज़ा आ गया है, बहुत तङ्गम लग गया है। तो उससे मज़ा क्या है?
तो कभी-कभी क्या होता है, कोई ऐसे एग्ज़िबिशन होते हैं, गार्डन होते हैं, उसके कोई गुफा के अंदर से आप जा रहे हो, और वहाँ से ऐसे भूत जैसे कोई कार आता है, तो लोग उसको देखते हैं, उसके लिए पैसा भी देते हैं। तो क्या है? यह जो है, यह सब तामसिक है।
स्वप्नं भयं शोकं… शोक करना—यह वास्तव में तामसिक है। कि एक है, इंग्लिश में, हिंदी में बताने है—there is grief and there is lamentation. तो कभी-कभी ये शब्दों को संभाल लेते हैं, पर क्या है? अगर कोई व्यक्ति हमारे करीबी का है, वो गुज़र गया है, तो स्वाभाविक रूप से उसके कारण तो हमें दुख तो होगा। तो अर्जुन भी हम देखते हैं, जब अभिमन्यु का वध होता है, तो वो विलाप करते हैं, और उसके प्रति जीवन में रो तो नहीं… वो तामसिक है। तो महाभारत में बताया गया है, जब अभिमन्यु का वध होता है, तो उसकी युधिष्ठिर महाराज बहुत दुःखी करते हैं, तो वहाँ उनको व्यास्ते हैं, वहाँ पे सांत्वना देने का आते हैं, व्यास्ते हैं, बोलते हैं कि शोक क्या होता है?
शोक से कुछ भी प्राप्ति नहीं होती, शोक से… क्या होते हैं? जो शोक करते हैं, उनकी शक्ति चली जाती है। तो शोक क्या करता है? प्राप्ति करता है। तो हमारे भूत और हमारे वर्तमान और भविष्य, वास्तव में एक दीवार बना देता है। तो क्या है? जीवन को आगे चलते रहना है, निज़ा। पर अगर एक दीवार आ गई, तो मैं आगे जा नहीं पाऊँगा। तो क्या होता है? यह जो शोक है, वो एक दीवार बना जाता है, जिससे कि मेरा जीवन सिर्फ मैं भूत में अटक जाता हूँ—ये ऐसे क्यों हुआ, वो उसको कहा ऐसे क्यों हुआ, ये क्या हुआ, ऐसे क्यों हुआ, मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ… और हम भूत में अटकी रहते हैं। तो इस तरह से भावनात्मक में अटका रहना है, यह तामसिक है।
विषादं मदमेव च… विषाद मतलब क्या? हमेशा से, अरे यह गलत हो गया, वो गलत हो गया, यह गलत हो गया, वो गलत हो गया… कुछ लोग होते हैं, वो कहा जो भी हुआ, उसके बारे में शिकायत करते रहते हैं हमेशा, शिकायत करते हैं—ये हो गया, ये हो गया, वो हो गया, वो हो गया। दुनिया में क्या है? यह अपेक्षा करना कि सारा जगत मेरे प्रसन्नता के लिए कार्य करे, यह मूर्खता है, यह कभी होने वाला नहीं है। और अगर सारा जगत मेरे प्रसन्नता के लिए कार्य नहीं कर रहा है, उसके लिए मैं शिकायत करते रहूँगा, तो ज़िंदगी में मैं शिकायत करते रहूँगा। तो क्या नहीं है? हाँ, ठीक है, दुनिया में कोई चीज़ें हमारे इच्छा के अनुसार होते हैं, कोई चीज़ें हमारे इच्छा के विपरीत होती हैं, तो लाइफ गोज़ ऑन और हम चलते रहना चाहिए।
तो विषादं मतलब हमेशा दुखी रहना, यह गलत है, यह गलत है, यह गलत है। मदमेव च, मदम मतलब नशा कर लेना। और नशा कर लेना क्या है? अभी भगवान यह सब तंत्रों से क्या नहीं बोलते हैं, क्या है? यह सब भावना है, सब में आएगी। अगर मुझे घर जाना है और गाड़ी पंचर होगी, तो उसमें तो नाराज़गी थोड़ी सबको ही होगी। पर भगवान यहाँ बोले, न विमुञ्चति दुर्मेधा… अगर ऐसी भावना है, स्वाभाविक रूप से आएगी हमें, पर वो भावना को छोड़ना चाहिए, न विमुञ्चति, ऐसी भावना को जो पकड़ के रखता है और वो छोड़ने की बुद्धि नहीं रखता है, दुर्मेधा, जो ऐसी भावना को छोड़ता नहीं है, वो क्या है? उसकी धृति साक्षात तामसी है, उसकी बुद्धि तामसी है।
तो वास्तव में ऐसी भावनाएँ आएगी ही, पर उन भावनाओं को भी पकड़ के रखना यह तामसिक है। और वास्तव में यह तामसिक धृति है। क्यों? क्या है? यह भावनाओं को पकड़ के रखने के लिए भी एक प्रकार का दृढ़ संकल्प लगता है, वो विकृत दृढ़ संकल्प है। कोई व्यक्ति बहुत आलसी है, तो हम कहते हैं कोई आलसी है, तो उसमें दृढ़ संकल्प नहीं है। पर वास्तव में आलस बनाए रखने के लिए भी दृढ़ संकल्प लगता है। लोग बोले, इतना आलसी क्यों हो तुम, छोड़ो? वो क्या है? वो एक तरह से आलसी व्यक्ति होता है, जो जिद्दी व्यक्ति होता है, वो मानात-मानत तुल्य होता है। तो आलसी व्यक्ति में मानात-मानत तुल्य होता है—तुम कितना भी मेरा अपमान करो, मैं आलसी बना रहूँगा। तो ये क्या है? यह एक प्रकार दृढ़ संकल्प है, विकृत दृढ़ संकल्प है।
तो क्या है, चिंतामणि क्यों होती है? हम जानते हैं बिल्वमंगल ठाकुर की कहानी। तो चिंतामणि की आसक्ति से बहुत समस्याओं को पार करके बिल्वमंगल ठाकुर चिंतामणि के पार जाते हैं, इतना सब कुछ करता हूँ, तो मतलब मुझमें दृढ़ संकल्प है, पर क्या है? वो दृढ़ संकल्प सिर्फ़ गलत दिशा के बात है। तो दृढ़ संकल्प की शक्ति मुझमें है, तो सिर्फ़ मुझे क्या करना है? वो दृढ़ संकल्प को सकारात्मक दृष्टि में लाना है। तो ऐसे नहीं है कि आपने दृढ़ संकल्प नहीं है, सबके पास दृढ़ संकल्प है, एक शराबी के पास भी दृढ़ संकल्प है, सिर्फ़ वो दृढ़ संकल्प शराब की ओर चला गया है, शराब से भगवान की ओर रहा है। तो उसके लिए क्या है? भक्तों के सत्संग से, शास्त्रों के अध्ययन से विधि बना सकते हैं और हम सत्वगुणों की ओर आ सकते हैं। तो यह तामसिक धृति है।
अभी हम जो भी कार्य करते हैं, तो हर कार्य का उद्देश्य क्या होता है? सुख प्राप्त करना। इसलिए भगवान अभी बुद्धि, धृति के बाद में, बाद में सुख के बारे में चर्चा करते हैं। वह कहते हैं कि अलग-अलग प्रकार के सुख होते हैं और हम किस प्रकार के सुख की अपेक्षा कर रहे हैं, कि आकांक्षा कर रहे हैं, उससे हम समझ सकते हैं कि हमारा कार्य कैसा है, हमारी मानसिकता कैसी है। तो भगवान बताएंगे कि सुख के बारे में चर्चा करते हैं:
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
सुखं त्रिविधं—सुख तीन प्रकार के हैं, हे भरतर्षभ, अर्जुन, आप सुनिए इन सुख के बारे में और क्या है? इस सुख का अभ्यास, उसका प्रैक्टिस करना पड़ता है। तो उसके द्वारा रमते यत्र… कोई भी सुख है, कोई पहली बार शराब पीता है, तो शराब से कोई आनंद नहीं होता है, कोई उल्टी आनंद नहीं होता है। कोई पहली बार सुख, अगर सिगरेट फूँकता है, तो क्या होता है? उसके खाँसी आती है, पर क्या होता है? वो जो चीज़ अगर बार-बार करने लगता है व्यक्ति, पहले अगर भारत से कोई अमेरिका में जाता है, तो अमेरिका में क्रिकेट कोई आओ, वो पता ही नहीं है। सिर्फ़ भारतीय काफ़िर अमेरिका में तो क्रिकेट खेलते हैं वहाँ पे, पर वहाँ पे बेसबॉल है। तो बेसबॉल, भारतीय कोई जाएगा तो उसको बेसबॉल क्या, पता ही नहीं होता है।
पर क्या होता है? अगर वो कॉलेज में रहता है, कॉलेज में सब विद्यार्थी हैं, वो बेसबॉल खेल-खेल रहे हैं, तो और बेसबॉल के बारे में चर्चा कर रहे थे, तो छह महीने रहेगा, एक साल रहेगा, तो वो बेसबॉल के बारे में पागल हो जाएगा। तो क्या, अच्छा नशा बोलते हैं, अच्छा नशा बोलते हैं। शराबी कैसे बनते हैं? तो बोलते हैं क्या? शराबी के संग में रहो और शराबी हो। तो उस तरह से क्या है? जब करते हैं, जप के आसक्तियों के संग में रहो और जप करो। तो जो भौतिक चीज़ों में है, जो मानसिकता तो है, मन का जो स्वभाव है, वो तो सभी समान ही है। तो, यहाँ पर क्या बताया जा रहा है? अभ्यासाद्रमते यत्र, यह सब सुखों का लक्षण है। पर उनमें से एक सुख ऐसा है कि वो सुख में अगर आप लगेंगे, दुःखान्तं च निगच्छति, तो क्या है? शराब में लगेंगे, शराबी पीते रहे तो शराब के आसक्त हो जाएँगे, पर उससे दुखों का अंत नहीं होगा। पर कुछ एक सुख है, जिससे दुख का अंत हो जाएगा, वो क्या है? वो सात्विक सुख है। सात्विक, सत्व के द्वारा हम शुद्ध होते हैं, फिर मोक्षिक हो जाते हैं।
इसलिए, वह एक प्रकार का सुख है, पर अभ्यासाद्रमते यत्र, यह सब सुखों का लक्षण है। पर इसके बाद में भी सत्व गुण के सुख ही घर है, भगवान वर्णन करते हैं:
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
सत्व गुण के सुख का लक्षण है कि वो पहले विष के समान लगता है—अग्रे विषमिव। पर बाद में परिणामेऽमृतोपमम्, परिणाम में अमृत के समान लगता है। वो छोटा बालक है, उसको अग्रे विषमिव के समान लगता है कि आपको स्कूल में जाओ। नहीं, मुझे खेलना है, मैं स्कूल में नहीं जाना है। नहीं, स्कूल में जाओ और पढ़ाओ। नहीं, उसको स्कूल में जाना विष के समान लगता है, पाठशाला में जाना।
पर जब पाठशाला में जाता है और टीचर बोलता है—तुम्हारा नाम क्या है? बोलता है—मेरा नाम है कोई नाम, अभिजीत। तुमको पता है तुम्हारा नाम कैसे दिखते हैं? नहीं पता है। बता है, मुझे तुम्हारा नाम कैसे दिखते हैं? तुम्हारा नाम कैसे दिखते हैं… तो जब आप स्कूल में जाते हो, तो पढ़ना पड़ता है, सीखना पड़ता है, वो थोड़ा कठिन लगता है, पर बाद में उससे हमें ज्ञान मिलता है, उससे हमारा जीवन अच्छा बनता है।
वैसे ही भक्ति का है। भक्ति में भी पहले-पहले जब हम जप करते हैं, तो मन नहीं लगता है। पर जैसे-जैसे हम जप करते रहते हैं, अभ्यास करते रहते हैं, तो फिर क्या होता है? हमें उसमें आनंद आने लगता है। तो हमारे स्तर पर जो है, भक्ति में कभी आनंद होगा, कभी आनंद नहीं होगा। जप में, कीर्तन में कभी आनंद होगा, कभी आनंद नहीं होगा।
तो अभी क्या है? हमारा स्तर जो रूप गोस्वामी बताते हैं—उपादेशामृत में:
स्यात् कृष्णनामचरितोच्छित्तिकापि चेष्टा
प्रत्यग्दिहः स्वरुचिदा भवति प्रपन्नः।
जीडाविदूररसलस्य रुजाचिकार्तु
किन्त्वाद्रदन्नतनुषः खलु सैव जुष्टा
स्वाद्विक्रमाद् भगवतस्तदगदमूलहन्त्री॥
वो कहते हैं कि किसी को अगर जौंडिस—जौंडिस क्या होता है? पीलिया। पीलिया हो गया है, तो फिर उसको कोई मीठी चीज़ है, गन्ने का रस है, उसका स्वाद नहीं लगता है। पर अगर वो गन्ने का रस पीते रहेगा, तो वही दवाई है। तो पहले उसको स्वाद नहीं लगेगा, तो तभी विष के समान है, पर पीते रहेगा, तो फिर स्वाद आ जाएगा।
तो यह क्या है? हम हमारे जप में भी देख सकते हैं, कि कहते हैं, पहले-पहले जप शुरू करते तो मन नहीं लगता है। जप करते रहे, करते रहे, करते रहे, तो क्या होता है? धीरे-धीरे मन लग जाता है, उसको तो स्वाद लग जाता है। और यह हमारे रोज़ के जप में भी हम देख सकते हैं, कभी-कभी और हम जप करते रहेंगे सालों-साल, तो उसमें भी देख सकते हैं—परिणामेऽमृतोपमम्।
और यह केवल अमृत नहीं है, उसके साथ-साथ क्या है? आत्मबुद्धिप्रसादजम्। यह जो सात्विक सुख है, उससे हमारी आत्मबुद्धि विकसित होती है, हम आत्मसाक्षात्कार हो जाते हैं। सात्विक सुख जब लेते हैं, तो उससे हमारा स्वभाव क्या है? हम वास्तव में कौन हैं? हमें कैसे कार्य करना चाहिए? बुद्धि का विकास होता है। जो भौतिक सुख है, उससे कोई बुद्धि का विकास नहीं होता है। कोई जुआ खेलता है, कोई क्रिकेट खेलता है, क्रिकेट में आनंद देता है, तो उससे वास्तव में कौन है? बुद्धि का विकास नहीं होने लगा। नशा है, नशे से क्या बुद्धि का विकास होता है? बुद्धि का ह्रास होता है, बुद्धि का नाश होता है, विनाश होता है।
पर आध्यात्मिक सुख क्या है? पहले वो विष से लगेगा, पर वो न केवल बाद में अमृत बन जाएगा, पर वो हमारी बुद्धि का भी विकास करेगा और हमें मोक्ष की ओर ले जाएगा।
इसके विपरीत जो भी भगवान रजोगुण का सुख बोलते हैं:
विषयेन्द्रियसंयोगानयत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
तो यह सुख क्या है? विषयेन्द्रियसंयोगात्, विषय और इंद्रियों के संयोग से आता है। इसका तो मान लेंगे कि मुझे गुलाब जामुन खाना है, गुलाब जामुन खाता हूँ, तो पहले एक गुलाब जामुन खाता हूँ, बड़ा स्वादिष्ठ है—यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। पर एक खाता हूँ, दूसरा खाता हूँ, तीसरा खाता हूँ… अगर वही गुलाब जामुन मैं पाँच खाऊँगा, छह खाऊँगा, आठ खाऊँगा, दस खाऊँगा, फिर बाद में मुझे कहोगे—खाओ? नहीं, मैं नहीं खाऊँगा, खाओ! और बाद में वही गुलाब जामुन, जो पहले उसको रोक नहीं सकता था, वो सहन नहीं कर पाऊँगा बाद में, बहुत हो गया, अब और कोई दबाएगा मेरे मुझ में, तो उल्टी आ जाएगा पूछे।
तो क्या होता है? भौतिक सुख जो है, उसकी जो सुख देने की, भौतिक सुख देने की शक्ति जो होती है, वह सीमित होती है और वह सुख ख़त्म हो जाता है, तो बाद में उससे तंग आ जाता है, उप जाता है, उत्तेजित हो, तंग आ जाता है। तो क्या होता है? भौतिक जगत में इंद्रियतृप्ति को बहुत दर्शाया जाता है, दिखाया जाता है, फिर भी क्या है? उसमें जो भी सुख है, वो क्षणिक सुख है, और उसके बाद में उससे व्यक्ति तंग आ जाता है। क्या, पहले जो—That which seems irresistible initially, becomes insufferable afterwards—जो पहले लगता है, उसके बिना रह नहीं सकता, उसके बाद नहीं सकता, इसके कारण मैं रह नहीं सकता अभी, चल जा यहाँ से! तो क्या होता है? वह ऐसा सुख जो है, परिणामेऽमृतो, परिणामे विषणि, वह क्यों इसमें मैं फँस गया? क्यों मैंने यह किया?
तो जो सत्व गुण में क्या है? व्यक्ति, जो दूर की चीज़ें हैं, उसको भी देख सकता है, दूरंदेशी होती है व्यक्ति में। रजोगुण क्या होता है? सिर्फ़ पास की चीज़ देखता है व्यक्ति में। तो इसके कारण बाद में जो परिणाम होने वाला, देख नहीं पाता है। और जब रजोगुण में रहते हैं, तो क्या है? अभी हम सबको चुनाव करना है, हम सब सुख, कोई भी सुख के बिना नहीं रह सकता है, पर हमें चुनना है, किस प्रकार के सुख के लिए मैं प्रयास करने वाला हूँ?
अगर मैं राजसिक सुख के लिए प्रयास करता हूँ, तो थोड़ा पहले अमृत मिलेगा और बाद में विष पीना पड़ेगा। तो ऐसे क्या है? वो ऐसे नहीं कर सकता कोई, कि पहले अमृत पीयेगा, बाद में विष आ जाएगा, तो मैं नहीं पिऊँगा। तो विष आएगा, आएगा। अभी यह विष क्या है? अलग-अलग प्रकार से विष है। अगर आप विश्व का इतिहास देखोगे, तो बहुत से युद्ध जो हुए हैं, वो क्या है? इंद्रिय सुख के प्रलोभन के कारण ही हुए हैं। तो यह सब है—परिणामे विषणि भार, परिणामे विषणि भार।
तो एक पल का, एक कुछ समय के लिए लोग सुख चाहते हैं, पर उसके बाद में इतनी सारी समस्या आ जाती है कि जीवन पूरी तरह से सुचिंतित हो जाता है। तो ऐसा जो सुख है, विषयेन्द्रिय सुख कारण है। तो ऐसा सुख से आसक्त न रहे कर, तो क्या करना है? आध्यात्मिक सुख के लिए प्रयास करना है।
तो इसके विपरीत क्या है? आख़िरी सुख है, तामसिक सुख है:
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
तामसिक क्या है? वास्तविक शुरू से अंत तक कोई सुख है ही नहीं उसमें। अग्रे चानुबन्धे च, सुख क्या है? वास्तविक शुरू के केवल एक मोहनमात्मनः, वो मोह ही है। कभी कोई क्या होता है? व्यक्ति आलसी होता है, और कभी जो आलसी होता है व्यक्ति, वो अगर कोई काम टाल दिया, काम से बच गया, सोता है क्या—देख देखो, मैं कितना बुद्धिमान हूँ! यह काम टाल दिया, यह काम टाल दिया, यह काम टाल दिया, यह कारण बता दिया, यह एकस्क्यूज़ कर दिया, यह कर दिया… देखो, मैं यह काम से बच गया!
तो वास्तव में क्या है? भले यह काम से बच गया है, पर क्या है? उसने सकारात्मक पर उसने क्या किया है? कुछ भी नहीं किया है। तो आलस में, वास्तव में सुख क्या है? सिर्फ़ एक मोह है कि मैं इससे बच गया।
निद्रा, आलस्य, प्रमादोत्थम्… निद्रा जो है, वो आवश्यक है, सोना आवश्यक है—युक्ताहारविहारस्य, युक्तचेष्टस्य कर्मसु, युक्तस्वप्नावबोधस्य… भगवान बताते हैं छठे अध्याय में, सत्रहवें श्लोक में, कि आपको सोना है, मात्रा में सोना है, पर बहुत ज़्यादा सोना यह क्या है? सोते रहना, यह तामसिक है।
कई बार लोग होते हैं कि वो अभी, अभी आजकल की संस्कृति में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, चार-पाँच दिन मेहनत करते हैं, पर बाद में अपने घर में आके टीवी देखते हैं, सो जाते हैं। और एक हॉस्टल में, मुझे बता रहे थे, हॉस्टल में कुछ विद्यार्थी रहते हैं, वो वीकेंड में क्या करते हैं? सो जाते हैं, और एक डेढ़ दिन का जो खाना है, अपने में बिस्तर पर… तो उसमें आनंद कुछ नहीं है, उसमें क्या है? यह दुनिया भर की सारी समस्याएँ हैं, ये समस्याओं का मुझे… मैं फँस रहा हूँ, समस्याओं से बचना है, तो क्या है? Sleep should be for resting the body, sleep should not be for escaping from the world, कि हाँ, ये दुनिया की सारी समस्याएँ हैं, तो ये प्रॉब्लम है, ये प्रॉब्लम है, क्या करें, एक बिस्तर पे कंबल ले लो, मुँह पर रख लो, सो जाओ! क्या है? उससे सकारात्मक से कुछ भी नहीं कर रहा है। तो यह तामसिक सुख है, सारे समस्या पर से लगता है कि मैं समस्याओं से छूट गया हूँ, और उससे तरह से निद्रा, आलस्य, प्रमाद… तो प्रमाद मतलब नशा हूँ। नशा करने से क्या होता है? कुछ समय तक लगता है कि मैं, मैं क्या, दुनिया का राजा बन गया हूँ! नशा कर रहता है, तो वो… उससे कुछ सुख ही नहीं है। अग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। तो इस प्रकार का सुख यह तामस के।
तो इस तरह से भगवान ने क्या बताया है? बुद्धि, धृति और फिर सुख बताया है। तो इस तरह से हम ये विश्लेषण को समझ करके, ख़ासतौर कि किस प्रकार के सुखों को मैं पीछे जा रहा हूँ, किस प्रकार के सुख को मैं मेरे जीवन का उद्देश्य बना रहा हूँ, वो देख करके हम हमारे जीवन को सात्विक बना सकते हैं और फिर भक्ति में लगा सकते हैं।
तो अभी यहाँ पर भगवान ने बताया है, किस तरह से हम सात्विक स्तर पर आ सकते हैं। अभी भगवान बताएंगे, अगले श्लोक से बताएंगे कि वास्तव में सिर्फ़ मैंने नहीं किया है, एक व्यक्ति के लिए बोल रहा हूँ, हर एक व्यक्ति को अगर बोले आप यह सब करो, तो मुश्किल है। पर उसके साथ-साथ एक सामाजिक योजना भी बनाई है, जिससे कि व्यक्ति धीरे-धीरे सत्विकों के स्तर पर आके की मोक्ष प्राप्त कर सकता है। तो वो सामाजिक योजना क्या है? वो वर्णाश्रम और वर्णाश्रम में कर्मयोग से, ज्ञानयोग से, भक्ति तक कैसे आते हैं, वो अगला विभाग है, 41वें श्लोक से 55वें श्लोक तक। तो वास्तव में यह थोड़ा टेक्निकल है, तो शायद हम यह दोपहर को नहीं लेंगे, हम 56 से 78 श्लोक हैं, वहाँ जो आख़िरी विभाग है भगवद्गीता का, वहाँ हम दोपहर के प्रवचन में नहीं लेंगे, और वो बाक़ी का विभाग जो है, वो कल हम लेंगे।