How can we differentiate between our cheating propensity and our tendency to be illusioned by duality – Hindi?
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में मन के द्वंद्व, हमारी बद्धावस्था और सत्य को पहचानने के व्यावहारिक दृष्टिकोण पर चर्चा की गई है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- शब्दों से अधिक संकल्पना (Concepts) पर ज़ोर: वक्ता ने सूटकेस और उसके हैंडल का उदाहरण देकर समझाया है कि हमें शब्दों या तकनीकी नामों (Terms) में उलझने के बजाय मूल विचार या संकल्पना पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- सत्य को न देख पाने का कारण: हमारे भीतर मौजूद कमियों—चाहे उसे मन का विकार, बुद्धि की कमी, अहंकार या ‘चीटिंग प्रोपेंसिटी’ (बेईमानी की प्रवृत्ति) कहें—के कारण हम दुनिया की वास्तविकता को वैसी नहीं देख पाते जैसी वह है।
- विश्लेषण के निष्कर्ष का महत्त्व: शास्त्रों (जैसे सांख्य दर्शन) में भौतिक जगत को अलग-अलग तत्त्वों (24, 16, 8 आदि) में विभाजित किया गया है। हमें इन तकनीकी बातों (Technicalities) में नहीं फँसना चाहिए। किसी भी विश्लेषण का अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि हमें भगवान की शरण लेनी है और भौतिक जगत के पार जाना है।
- कार्यात्मक दृष्टिकोण (Functional Perspective): दर्शन (Philosophy) को कंप्यूटर के उपयोग की तरह समझना चाहिए। जिस तरह हम यह जाने बिना कंप्यूटर पर काम करते हैं कि हार्ड डिस्क में डेटा भौतिक रूप से कहाँ सेव है, उसी तरह हमें आध्यात्मिक ज्ञान को भी व्यावहारिक (Functional) रूप से अपने जीवन में लागू करना चाहिए।
- मोह से बचने का उपाय: जब हमें यह पता है कि हमारा मन हमें मोह में डाल सकता है और सत्य देखने से रोक सकता है, तो हमें अपने मन के हर विचार पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए। भ्रम की स्थिति में सही मार्गदर्शन लेना चाहिए और उन चीज़ों से बचना चाहिए जो हमें मोह में डालती हैं।
Full Transcription
मन का द्वंद्व और बद्धावस्था
तो मैं आपका सवाल दोहराता हूँ। आप मुझे बताइएगा, मैं समझा कि नहीं आपका सवाल। तो आप पूछ रहे हैं कि हम सब में एक तरह से बेईमानी करने की प्रवृत्ति होती है, और साथ-साथ हमारे मन में द्वंद्व भी होता है।
तो कभी-कभी क्या होता है कि ये बेईमानी करने की प्रवृत्ति और द्वंद्व, इन दोनों के कारण हमारी जो बद्धावस्था है, उसमें हम फँस सकते हैं। तो इसमें से वास्तव में हम कैसे बाहर निकल सकते हैं, इसका कैसे हम विश्लेषण कर सकते हैं?
शब्द (Terms) और संकल्पना (Concepts)
तो क्या है कि इसमें एक चीज़ समझना है कि there are terms and there are concepts. Terms मतलब शब्द और concepts मतलब विचार, तत्त्व या आईडिया। हिंदी में concepts क्या है? संकल्पना है। तो क्या है कि कभी-कभी हम शब्दों में बहुत फँस जाते हैं। शब्द महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, संकल्पना जो है, वह महत्त्वपूर्ण है।
मान लीजिये कोई बड़ा सूटकेस की चीज़ उठाना है। तो जो सूटकेस है, वो संकल्पना है। सूटकेस उठाने के लिए हैंडल लगता है, तो हैंडल जो है, वह टर्म (term) है। तो अभी हैंडल महत्त्वपूर्ण नहीं है, सूटकेस को उठाने के लिए महत्त्वपूर्ण है, पर हैंडल असली चीज़ नहीं है।
कभी-कभी पाँच सूटकेस हो जाते हैं, उन सबका हैंडल एक ही जैसे हो सकता है। मैं एक बार अमेरिका में था, मेरा सूटकेस टूट गया था, तो भक्त ने दूसरा सूटकेस दे दिया। और फिर जब मैं कैरोसेल (carousel) पर आ गया, दूसरी जगह पे, नए सूटकेस लेने के लिए; क्योंकि नया सूटकेस था, उसका कलर मैं भूल गया कि कौन सा सूटकेस है। तो मुझे सिर्फ हैंडल याद था, क्योंकि उसका हैंडल अलग था। तो अभी कैरोसेल पर पाँच-छह सूटकेस, सब निकाल के देख रहा था— ‘ये मेरा सूटकेस है? ये मेरा सूटकेस है?’ क्योंकि सिर्फ हैंडल याद था, असली सूटकेस याद नहीं था।
तो वही हैंडल अलग-अलग सूटकेस में भी हो सकता है। तो ऐसे क्या होता है, एक शब्द होता है, पर वो शब्द हम बोल रहे हैं, संकल्पना अलग-अलग हो सकती है। तो शब्द पर जोर नहीं देना, संकल्पना पर जोर देना है।
विश्लेषण और सत्य की पहचान
संकल्पना क्या है? तो अभी क्या चीटिंग प्रोपेंसिटी (cheating propensity) है, क्या ड्यूअलिटी (duality) है, क्या कंडीशनिंग (conditioning) है, ऐसा हम एक विश्लेषण कर सकते हैं। पर ऐसे विश्लेषण की टेक्निकैलिटी (technicality) में जाएँगे तो हम कभी-कभी बहुत फँस सकते हैं।
तत्त्व क्या है? हममें कुछ तो भी ऐसा है जिसके कारण हमें चीजें जैसी हैं वैसी नहीं दिखती हैं। कुछ तो भी है, उसको हम मन का विकार कह सकते हैं, उसको हम बुद्धि की कमी कह सकते हैं, उसको हम अहंकार का दूषण कह सकते हैं। कुछ नाम, कुछ भी दोष दें, महत्त्वपूर्ण क्या है कि आत्मा यहाँ पर है, दुनिया यहाँ पर है, बीच में कुछ तो भी हममें है, जिसके कारण जो बाहर की चीज़ जैसी है वैसी मुझे नहीं दिखती है।
शास्त्रों के दृष्टिकोण और निष्कर्ष
तो अभी वो exactly क्या है? उसको अलग-अलग विश्लेषण में अलग-अलग नाम भी दिया जाता है। जैसे 11वें स्कंध में, उद्धव गीता में बताया है कि जो सांख्य के तत्त्वज्ञानी हैं, वो कभी-कभी इस भौतिक सृष्टि को 24 तत्त्व में विभाजन करते हैं, कभी 16 में विभाजन करते हैं, कभी 8 में विभाजन करते हैं, कभी 11 में विभाजन करते हैं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं वहाँ पे कि इस तरह से अलग-अलग प्रकार से विश्लेषण करके जो ऋषिगण हैं, अपनी क्रिएटिविटी (creativity) दिखाते हैं, अपनी रचनात्मक बुद्धि दिखाते हैं, और उससे मैं बहुत प्रसन्न होता हूँ, भगवान कहते हैं। तो क्या है मतलब? इस भौतिक जगत का विश्लेषण अलग-अलग प्रकार से कर सकते हैं।
भौतिक जगत के विश्लेषण से निष्कर्ष क्या निकल रहा है? विश्लेषण कैसे भी हो, निष्कर्ष अगर है कि मुझे भगवान की शरण लेना है, भौतिक जगत के परे जाना है, तो वह महत्त्वपूर्ण है। तो इसलिए टेक्निकैलिटी में ज़्यादा फँसना नहीं है। हमको तत्त्व समझना है। तो भले वो बेईमानी की प्रवृत्ति हो, हमारी कंडीशनिंग हो, या हमारे मन का ही दौड़ने का स्वभाव हो, महत्त्वपूर्ण क्या है कि जो सत्य है, हमको दिख नहीं रहा है।
संरचनात्मक (Structural) और कार्यात्मक (Functional) दृष्टिकोण
तो फिर हमें क्या करना है? किस तरह से मुझे गलत दृष्टि होती है, और किस तरह से मुझे उसको सही करना है, वो देखना है। कि कैसे है, in general, you can approach this… I speak in English as I tried last week… we can approach philosophy from a structural perspective or from a functional perspective.
Structural perspective मतलब क्या? कि वास्तव में यह असली में क्या है? और functional मतलब, यह काम कैसे करता है?
जैसे कंप्यूटर है, अभी कंप्यूटर में यह डायरेक्टरी (directory) होती है, इसमें इस फोल्डर (folder) में, इस फोल्डर में यह फाइल (file) है। अभी अगर आप कंप्यूटर की हार्ड डिस्क (hard disk) में जाओगे, तो वहाँ पे कोई ऐसा कपबोर्ड (cupboard) नहीं है कि ‘यहाँ पे यह फोल्डर है, यह है, वो है।’ कंप्यूटर की जो मेमोरी (memory) में डेटा (data) स्टोर्ड (stored) होता है, वह बहुत अलग पद्धति से होता है, और वह किसी स्पेशलाइज्ड हार्डवेयर इंजीनियर (specialised hardware engineer) को पता होता है।
हमें कैसे पता होता है? आपको पता नहीं है, यह फोल्डर में यह फाइल है, यहाँ है। तो हम जब कंप्यूटर पर काम करते हैं, तो हम क्या करते हैं? कभी भी वो कंप्यूटर का एक्चुअल, फिजिकल लोकेशन (actual, physical location) क्या है फाइल का, वो पता नहीं होता है। हम सिर्फ फंक्शनल (functional) दृष्टि से देखते हैं। तो वैसे ही हमें तत्त्वज्ञान को फंक्शनल दृष्टि से देखना है।
मोह से बचाव का व्यावहारिक समाधान
फंक्शनल दृष्टि से क्या है? कि कुछ तो ऐसी चीज़ है मुझ में, जिसके कारण सत्य दिखाई नहीं दे रहा है। सत्य दिखाई नहीं दे रहा है, तो मैं सत्य कैसे देख सकता हूँ, यही समझना चाहिए।
पर इस चीज़ के बारे में सोचता हूँ, तो कई बार मैं मोह में पड़ जाता हूँ। तो इस चीज़ के बारे में जब भी मेरे मन में कुछ विचार आएगा, तो मैं उस पर भरोसा नहीं करूँगा, किसी और से पूछ कर करूँगा। पर इसके मोह में पड़ जाता हूँ, तो हमें क्या करना है? जो भी हमें मोह में डालने की संभावना है, उसको हम टाल सकते हैं। प्रश्न के लिए धन्यवाद।