Mahabharata Characters 1 – Bheeshma (Hindi)
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Lecture Summary
महाभारत और श्रीमद्भागवतम् में भीष्म पितामह के चरित्र का सारांश
इस पूरे प्रवचन का मुख्य उद्देश्य महाभारत (कर्मकाण्ड और राजधर्म) और श्रीमद्भागवतम् (शुद्ध भक्ति) के दृष्टिकोण से भीष्म पितामह के चरित्र की तुलना करना है। यह स्पष्ट करता है कि महान भक्तों के कार्यों को केवल सांसारिक नियमों से नहीं, बल्कि भगवान की इच्छा के दृष्टिकोण से समझना चाहिए।
प्रवचन के मुख्य बिंदु:
- शास्त्रों के उद्देश्य में अंतर: महाभारत का मुख्य स्वर राजधर्म, क्षत्रिय नियम और सांसारिक कर्तव्यों पर आधारित है, जबकि श्रीमद्भागवतम् का एकमात्र उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और शरणागति को दर्शाना है।
- द्रौपदी चीरहरण में भीष्म का मौन:
- महाभारत की दृष्टि: भीष्म पितामह नियमों की जटिलता (‘नियमाग्रह’) में फँस गए थे। वे इस दुविधा में थे कि पत्नी पति की संपत्ति है, लेकिन जो पति खुद को हार चुका है, क्या वह पत्नी को दाँव पर लगा सकता है? इस चक्कर में वे एक क्षत्रिय के मूल धर्म (स्त्री की रक्षा) को भूल गए।
- भागवतम् की दृष्टि: भीष्म का मौन रहना भगवान की एक दिव्य योजना थी। वे संसार को यह सिद्ध करने दे रहे थे कि पाँच पति, भीष्म, द्रोण जैसे महारथी भी किसी की रक्षा नहीं कर सकते। विपत्ति में एकमात्र रक्षक केवल और केवल भगवान श्रीकृष्ण हैं।
- श्रील प्रभुपाद का उदाहरण (‘नियमाग्रह’ से बचना): नियमों के पालन से ज़्यादा महत्वपूर्ण भगवान की सेवा का मूल भाव है। जैसे प्रभुपाद जी ने अमेरिका में मंदिर बनाते समय बाहरी दिखावे और कड़े नियमों (जैसे शिखर और विग्रह की दिशा) की परवाह किए बिना, लोगों को भगवान का स्मरण कराने वाली व्यावहारिक जगह बनाने पर ज़ोर दिया।
- युद्ध में भीष्म की प्रतिज्ञा और भगवान का चक्र उठाना:
- दुर्योधन के ताने सुनने के बाद भीष्म ने प्रतिज्ञा ली कि वे या तो अर्जुन को मार देंगे या कृष्ण को शस्त्र उठाने पर विवश कर देंगे।
- भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त (अर्जुन) की रक्षा के लिए अपनी ही प्रतिज्ञा तोड़ दी और रथ का पहिया (चक्र) उठाकर क्रोध में भीष्म की ओर दौड़े।
- भीष्म पितामह यही चाहते थे। वे भगवान के इस ‘भक्त-वत्सल’ (भक्तों से प्रेम करने वाले) और क्रोधित रूप के दर्शन करना चाहते थे।
- शरशैया और कर्ण का पश्चाताप: अर्जुन द्वारा बाणों की शैया पर लिटाए जाने के बाद भीष्म ने साधारण जल पीने से मना कर दिया, तब अर्जुन ने तीर मारकर गंगा जल प्रकट किया। अंत में कर्ण ने आकर भीष्म से क्षमा माँगी, तब भीष्म ने बताया कि वे उसे इसलिए नीचा दिखाते थे ताकि उसका और दुर्योधन का अहंकार टूट सके।
- भगवान द्वारा भीष्म का स्मरण और अंतिम उपदेश: युद्ध के बाद अपने सगे-संबंधियों की मृत्यु से युधिष्ठिर गहरे शोक में थे। तब साक्षात् भगवान कृष्ण उन्हें भीष्म पितामह के पास ले गए। भगवान ने भीष्म की सारी पीड़ा हरकर उन्हें आशीर्वाद दिया, जिसके बाद भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म और मोक्षधर्म का वह महान उपदेश दिया जिसे आज हम ‘शान्ति पर्व’ और ‘अनुशासन पर्व’ के रूप में जानते हैं।
Full Transcription
महाभारत के प्रमुख पात्र और भीष्म पितामह
हरे कृष्ण! तो आज हम, कल हम महाभारत के जो प्रधान कैरेक्टर्स हैं, जो उसमें हैं, उनके बारे में हम थोड़ा चर्चा करेंगे। तो उसके बारे में भीष्म, द्रोण, पाँचों पाण्डव, इन सब के बारे में थोड़ी-थोड़ी चर्चा करेंगे। तो आज मैं, खास करके हम महाभारत में जो व्यक्ति हैं, जो भागवतम् में भी उनका उल्लेख आता है, न केवल उल्लेख पर काफी विस्तारित रूप से उनका वर्णन आता है, उनके ऊपर हम थोड़ा ज़ोर देंगे। तो उनमें से सबसे प्रधान जो हैं, जो आते हैं, तो वे जगन्निवास कृष्ण ही हैं। तो भागवतम् में भी हैं, महाभारत में भी हैं।
तो उनके अलावा हम अगर बुजुर्गों में देखते हैं, तो भीष्म पितामह पहले हैं। भीष्म पितामह पे एक पूरा अध्याय है, वो नवम अध्याय है। और भीष्म पितामह का उपदेश जो है, वह पूरा एक पर्व है महाभारत में। तो महाभारत में अठारह पर्व हैं। जैसे अठारह दिन युद्ध हुआ था, अठारह पर्व हैं। तो उसमें से एक पर्व जो है, भीष्म पर्व, वह जब भीष्म सेनापति थे, कुरुक्षेत्र युद्ध था, उसके बारे में है। और उसके बाद दो पर्व आते हैं, पूरा युद्ध खत्म होने के बारे में—अनुशासन पर्व और शान्ति पर्व। इन दो पर्वों, जैसे भागवतम् में स्कन्ध हैं, वैसे महाभारत में जो विभाग हैं उस किताब के, उसको पर्व कहा गया है।
तो इन तीनों में भीष्म पितामह प्रमुख हैं। बाकी सब पर्वों में भी भीष्म पितामह हैं, पर इन तीनों में प्रमुख हैं—शान्ति, अनुशासन और भीष्म पर्व। और जो भगवद्गीता है, वो भी भीष्म पर्व में ही आती है, भागवत के, महाभारत के। और जो भीष्म पितामह का जीवन काफी विस्तारित है, तो उसके बारे में हम पूरी चर्चा नहीं करेंगे।
श्रीमद्भागवतम् और महाभारत के उद्देश्य में अंतर
आज हम एक दृष्टि से देखेंगे कैसे जो महाभारत में भीष्म पितामह का वर्णन है और जो श्रीमद्भागवतम् में भीष्म पितामह का वर्णन है, उनमें क्या समानता है और क्या विभिन्नता है, यह हम देखेंगे। उससे हम समझेंगे कैसे जो महाभारत है… हर एक शास्त्र जो होता है, उसका एक उद्देश्य होता है बताने का। तो श्रीमद्भागवतम् को बताने का उद्देश्य क्या है? कि परीक्षित महाराज को जो अपना शरीर त्याग करना है, वहाँ पूरी एकाग्रता से वह त्याग कर सकें, वह केंद्र है श्रीमद्भागवतम्।
महाभारत जो है, उसका केंद्र क्या है? कि जो कुरुवंश है, उनकी प्रतिमा का वर्णन और उसके द्वारा उनमें जो घटना है। कुरुवंश जो जी रहा है, कुरुवंश मतलब कौरव और पाण्डव, जो मतलब है, पाण्डवों पर ज़ोर देता है यहाँ पे वो। महाभारत यह नहीं दिखा रहा है… महाभारत में भी योद्धाओं की मृत्यु होती है, महाभारत का ज़ोर कैसे मृत्यु होती है उसके बारे में नहीं है। महाभारत का ज़ोर है कि राजा कैसे राज्य में जीवन जीता है। और महाभारत यह शास्त्र कर्मकाण्ड के स्तर पे है और भागवतम् शुद्ध भक्ति के स्तर पे है।
तो यहाँ जो आज का उद्देश्य है, यह नहीं चर्चा की… विचार किया जा रहा है, जो परसों कल प्रवचन हुआ था, तभी देवकीनन्दन प्रभु ने सवाल कुछ पूछा था, “कैसे भीष्म पितामह शांत क्यों रहे, कि जब द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा था?” तो वास्तव में वो जो प्रसंग है उसका हम महाभारत से चर्चा करेंगे और उसकी हम भागवतम् की दृष्टि से चर्चा करेंगे। और इससे क्या होगा, हमें दोनों शास्त्र जो हैं, उनका जो भाव है, वह भी हमें समझने में आएगा। मैं भीष्म पितामह के पूरे जीवन पर नहीं जाऊँगा, उनके जीवन में कुछ-कुछ प्रसंगों को लूँगा।
द्रौपदी वस्त्रहरण: द्युत-सभा का प्रसंग
तो हम इस प्रसंग से चालू करते हैं, यह उस शास्त्र का भाव हमें दिखाता है। तो महाभारत में वर्णन आता है कि जब द्रौपदी को बुलाया जा रहा है, सबसे पहले दुर्योधन ने उसके राजदरबार का जो सेवक था… सेवक, प्रातिकामी होता है… कि दुर्योधन ने भेजा कि, “अभी द्रौपदी हमारी दासी बन गई है, उसको यहाँ पर लेकर आओ।” तो द्रौपदी अपने कमरे में थी और उस समय एक वस्त्र पहना था उसने, जो स्त्रियों का समय होता है, मेंस्ट्रुएशन का समय था उसका। तो इसलिए उस समय में जो स्त्रियाँ जो होती हैं वो अलग रहती हैं।
अगर कोई पारंपरिक घरों में आप जाते हैं, वो जो स्त्रियों का समय होता है, कभी वो घर का खाना नहीं पकाती हैं, घर में कुछ और कार्य नहीं करती हैं, दूर एक कमरे में रहती हैं। तो उस समय शरीर से ऐसी चीज़ें निकलती हैं तो उससे वो व्यक्ति अशुद्ध होगा, ऐसे माना जाता है। तो इसलिए द्रौपदी ऐसी परिस्थिति में थी और वो अपने कमरे में थी। तभी प्रातिकामी गया। द्रौपदी ने पूछा, “आप क्यों आये हो?” तो प्रातिकामी, वो एक नेक व्यक्ति था, तो उसकी आँखों में आँसू आये थे। वो बोला कि, “मुझे लगता है कि कुरु के राज्य में बड़ा विनाश होने वाला है, ऐसी विपत्ति मैंने कभी देखी नहीं है मेरे जीवन में, पूरा विनाश होने वाला है।”
द्रौपदी ने पूछा, “क्या हुआ बताओ?” तो उसने कहा कि… ठीक है, अगर ये सब हुआ है, तो आप जाके उस पूर्ण सभा को पूछो कि, “पहले युधिष्ठिर ने अगर मुझे जुए में गँवाया है, हराया है, तो पहले युधिष्ठिर ने किसको दाँव पर लगाया था? मुझे लगाया था या खुद को लगाया था?” तो प्रातिकामी ने कहा कि उन्होंने खुद को लगाया था। “अगर खुद को लगाया था, तो फिर वो खुद को हार चुके हैं, तो फिर वो मुझे दाँव पर कैसे लगा सकते हैं? तो इसलिए ये उचित नहीं है।”
तो प्रातिकामी गया है और उसने दुर्योधन से पूछा… दुर्योधन ने पूछा, “क्यों, द्रौपदी क्यों नहीं आई है?” तो उसने बताया। तो दुर्योधन हँसने लग गया और बोला, “जाओ उसको कहो कि वो ही यहाँ पे आके सवाल पूछे।” तो प्रातिकामी वापस गया वो और उसने कहा कि, “मैं अपने सवाल पूछ रही हूँ, और आप जवाब दो। मैं मेरे रजस्वला समय में हूँ, मैं बाहर नहीं आ सकती हूँ।”
दुःशासन का द्रौपदी को सभा में घसीटना
तो फिर वो वापस आते हुए गया और दुर्योधन ने कहा, “क्या हुआ?” उसने कहा, “पहले उसने जवाब माँगा था।” तो दुर्योधन ने कहा, “ये डरपोक है। दुःशासन, तुम जाओ लेके आओ।” तो दुःशासन गया वहाँ पर। अगर दुःशासन को आते हुए देखा, तो द्रौपदी समझ गई कि ये बहुत खतरनाक है। तो वह दौड़ते हुए गांधारी के कमरे के लिए जाने लगी। क्यों? जानती थी कि गांधारी कितनी भी… उसकी भी इच्छा थी कि मेरा पुत्र राजा बने, पर फिर भी उसकी नेक प्रवृत्ति थी। तो वह गांधारी के महल के लिए दौड़ रही थी कि गांधारी अगर कुछ आदेश देगी तो मैं रोक नहीं पाऊँगा उसका।
तो इसलिए उसने दौड़ के उसको पकड़ लिया, उसके अंदर जाने के पहले। और बालों से खींचते हुए उसको वो लेके आए। जब वो लेके आ रहे थे, तो द्रौपदी चिल्ला रही थी, “मैं केवल एक वस्त्र पहने हूँ, मैं रजस्वला हूँ इसलिए राजसभा में नहीं आ सकती।” दुःशासन बोला, “अभी तुम हमारी दासी हो गए हो, तुम एक वस्त्र पहने हो और कुछ भी वस्त्र नहीं पहने हो तो क्या।” तो वो लेके आ गए। द्रौपदी चिल्ला रही थी तभी, और वो खींचते हुए लेके आए और उसको पटक दिया सभा के बीच में।
और सभा के बीच में जब पटक दिया, तब द्रौपदी चिल्ला रही थी। और भीष्म पितामह जो देखे, जो वातावरण था वहाँ पर बहुत त्रस्त हो गया था, बहुत टेंशन हो गया था तभी। तभी द्रौपदी खड़ी हो गई, सबको प्रणाम किया भीष्म को और उसने कहा कि, “मैं उचित वस्त्र में नहीं आयी हूँ इसलिए मैं आपसे माफ़ी चाहती हूँ। पर ज़बरदस्ती लाई गई हूँ यहाँ पे, और मैं आपसे सवाल पूछती हूँ कि अगर युधिष्ठिर ने पहले ही मुझे हराया है…”
अक्सर उसके पहले दुर्योधन क्या बोलता है कि द्रौपदी को आके ये सवाल युधिष्ठिर से पूछने कहो, युधिष्ठिर ने गलती की है वो पत्नी नहीं कहेगी, तो वो भी उसका भाव ऐसे था। तो द्रौपदी ने कहा कि, “मैं आपसे सवाल पूछती हूँ कि अगर उसने खुद को पहले गँवा दिया है, तो फिर वो मुझे कैसे दाँव पर लगा सकता है?” तो किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। और द्रौपदी सब की ओर देख रही थी। धृतराष्ट्र शांत था, और विदुर और बाकी कुछ कोई नहीं बोल रहे थे।
भीष्म पितामह का धर्म-संकट और मौन
और तभी बाद में अंत में उसने भीष्म पितामह की ओर देखा। और तभी भीष्म पितामह को लगा मुझे कुछ बोलना चाहिए था। उन्होंने कहा कि, “हे द्रौपदी, आप जो पूछ रही हो, यह सवाल बड़ा कठिन है। क्योंकि साधारणतः अगर व्यक्ति ने खुद को गँवा दिया है, तो उसकी कुछ संपत्ति नहीं रहती है। इसलिए खुद को, किसी को दाँव पर नहीं लगा सकता है। यह एक सत्य है, एक धार्मिक सत्य है। और दूसरा सत्य है, जो पत्नी होती है वो हमेशा अपने पति के साथ होती है, तो पत्नी जो है वो पति की एक तरह से संपत्ति होती है। तो फिर इसलिए दोनों बातें हैं यहाँ पर। सत्य क्या है, इसमें मेरी बुद्धि भ्रमित हो गई है, मैं कुछ बोल नहीं पा रहा हूँ।”
और फिर जब यह सब हो रहा होता है, तो विकर्ण खड़ा हो जाता है। विकर्ण जो होता है, 99 भाइयों में से एक होता है, पर यह जो भाई होता है, थोड़ा नेक प्रवृत्ति का होता है। तो यह नेक प्रवृत्ति का होता है, वो कहता है कि, “द्रौपदी सवाल पूछ रही है, आप सबको ही जवाब देना चाहिए।” और कोई जवाब नहीं देता है कभी। तो फिर विकर्ण सब की ओर देखता है। विकर्ण कहता है, “मैं जवाब देता हूँ अगर आप कोई जवाब नहीं दे रहे हैं।”
विकर्ण कहता है कि, “जो क्षत्रिय होते हैं, वह जुआ आदि चार कार्यों के प्रभाव में जब आ जाते हैं, तो उन्मत्त हो जाते हैं। उन कार्यों के प्रभाव में आकर अगर वो कुछ करते हैं, तो क्योंकि वो उन्मत्त अवस्था में किया है, तो फिर उसको गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।” तो एक तरह से जुए का आवेश था, उसमें युधिष्ठिर आ गए हैं, और उसमें उन्होंने सब कुछ गँवा दिया है। और ऊपर से लगे वो जुए का आवेश आ गया था उनको, जुआ खेलने के लिए लगभग ज़बरदस्ती किया गया था। कई बार लोग पूछते हैं कि युधिष्ठिर ने जुआ क्यों खेला? तो वास्तव में युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए लगभग बाध्य किया गया था। आग में, अग्नि में जैसे लकड़ी डालते हैं, वैसे वो (कर्ण) कहता है कि, “वैसे भी द्रौपदी को किसी भी अवस्था में अगर दरबार में लाया जाये, तो उसमें क्या बड़ी बात है? पहले से एक स्त्री पाँच पुरुषों के साथ रह सकती है, तो एक छठे पुरुष के साथ रहेगी तो क्या फ़र्क पड़ता है? तो यह वास्तव में इसमें कुछ पतिव्रता है ही नहीं!”
पाण्डवों का भयंकर क्रोध और प्रतिज्ञा
यह जब सुनता है, तो भीम क्रोधित हो जाता है। और जो अर्जुन होता है, अर्जुन और कर्ण में स्वाभाविक वैर होता है, उन्हें बहुत क्रोध आता है। पर तभी क्योंकि युधिष्ठिर महाराज शांत रहते हैं, तो वो भी शांत रहते हैं। तो इसके बाद में… बाद में पूरा प्रसंग मैं नहीं जा रहा हूँ, हम यहाँ पर ज़ोर दे रहे हैं। तो बाद में भीष्म पितामह का भाव क्या होता है? तो जब पहले भगवान कृष्ण वो द्रौपदी को साड़ी भेजते हैं और वो बच जाते हैं। तो उसके बाद में जो सब पाण्डव होते हैं—भीम, युधिष्ठिर, अर्जुन, सहदेव, नकुल—जब वो द्रौपदी इस तरह से आती है, वो सब खड़े हो जाते हैं।
और जब वो दुर्योधन कहता है, “मेरी जाँघ पर आके तुम बैठ जाओ”, दुर्योधन कहता है उसको द्रौपदी को, तो भीम खड़ा हो जाता है। भीम की आँखों से ऐसे चिंगारियाँ निकल रही हैं, ऐसे लग रहा है कि अगर वो उठ के कूद जाएगा और भीम उसको तोड़ेगा वहीं पे! भीम दुर्योधन को तोड़ेगा। तो भीम कहता है कि, “तुमने जाँघ जो दिखाई है द्रौपदी को, यही तोड़के मैं तुम्हें तड़पा-तड़पा के मार डालूँगा! और दुःशासन, तुमने जिस हाथ से खींचा है, मैं तुम्हारा हाथ काट डालूँगा और तुम्हारा खून पीऊँगा!”
और फिर सहदेव कहता है, “शकुनि, तुमने जिस हाथ से जुआ खेला है, तुमने जो जुआ हमारे साथ खेला है, मेरे धनुष से तीर तुम्हारे सीने में जाएँगे और तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी!” अर्जुन कहता है, “मैं कर्ण का वध करूँगा!” तो इस तरह से जब ये घोर व्रत लेते हैं, तो आसमान में बिजली कड़कने लगती है। तो इस सारे प्रसंग में विदुर जो होता है, धृतराष्ट्र को बोल रहा होता है कि, “अभी रोको इसको, बहुत हो गया है।” तो वो रोकने को तैयार नहीं होता है, धृतराष्ट्र तैयार नहीं होता है। पर फिर भी अंत में वो रोक देता है कि बहुत हो गया है।
और फिर उसके बाद में बड़ा प्रसंग होता है। इसमें जो राजसभा में धृतराष्ट्र का विरोध केवल दो व्यक्ति करते हैं, विदुर है और विकर्ण है। भीष्म, द्रोण विरोध नहीं करते हैं तभी। धृतराष्ट्र पाण्डवों को बुलाते हैं, तो भाई-भाई में झगड़ा हो जाता है। “तो तुम्हें जो चाहिए वो वापस ले लो।” द्रौपदी कहती है कि, “मेरे पति युधिष्ठिर को आप गुलामी से आज़ाद करो।” “और क्या माँगोगी?” “मेरे बाकी पतियों को आप आज़ाद करो।” धृतराष्ट्र कहते हैं, “और क्या चाहिए तुमको? उनके जो अस्त्र हैं, उनको वापस दो।” “और क्या चाहिए?” बोली, “नहीं, नहीं, तीन वरों से ज़्यादा मैं नहीं माँग सकती।”
बारह वर्ष का वनवास और अज्ञातवास की शर्त
तो धृतराष्ट्र कहता है कि, “ठीक है, मैं तुमको तुम्हारा पूरा राज्य वापस देता हूँ, पूरा राज्य वापस देता हूँ।” ये सुनता है तो दुर्योधन और शकुनि… तो शकुनि इतना क्रोधित हो जाते हैं, पर धृतराष्ट्र राजा है, कुछ बोल नहीं पाते हैं। अपने साथ पाँचों पाण्डव बाहर निकलते हैं, जाने लगते हैं। और तभी दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि सीधा धृतराष्ट्र पर टूट पड़ते हैं। लगभग सारी क्रोध वहीं है। “तुमने क्या कर दिया? हमने सारा राज्य प्राप्त कर लिया था, तुमने पूरा राज्य गँवा दिया!” “नहीं नहीं, वो इतने क्रुद्ध हो गए थे, वो तुम्हारा विनाश कर देंगे, तुम्हें क्या लगता है? अभी विनाश नहीं करेंगे वो हमारा? सब कुछ तो हो गया है, अभी शत्रु बन गये हैं, और तुमने क्या किया? शत्रु को वापस राज्य दे दिया! तुमने हमारी सारी जो मेहनत की थी, उसको पानी में डाल दिया!”
तो धृतराष्ट्र कहता है, “मुझे लगता है तो पाण्डव अगर बारह साल वनवास में चले जाएँगे, तो उससे क्या होगा? उस समय में हम हमारी सेना और हमारे सहयोगियों को सुदृढ़ बना देंगे, और फिर उसके बाद में जब युद्ध होगा तो हम उनको हरा देंगे।” तो जो धृतराष्ट्र सुन रहा होता है। शकुनि कहता है, “पिता, मुझे एक और आईडिया है। बारह साल के साथ हम एक साल अज्ञातवास में डाल देंगे। और बारह साल में हमारा राज्य का प्रभाव इतना फैल जाएगा कि सब जगह हमारा राज्य का प्रभाव होगा, वो एक साल कभी अज्ञातवास में रह ही नहीं पाएँगे। और अगर हम ऐसी शर्त डालेंगे कि एक साल अज्ञातवास में नहीं रहेंगे तो फिर बारह साल वापस जाना पड़ेगा, और उसके बाद एक साल अज्ञातवास नहीं रहेगा… तो ऐसे जीवन भर उनको वनवास में रख देंगे।”
तो ऐसा बोलते हैं, उनको मना लेते हैं फिर। और मना लेके फिर बुलाते हैं। और फिर पुनः एक जुए के बारे में होता है। और तभी उनको वनवास में भेजते हैं।
भीष्म पितामह की विवशता और ‘नियमाग्रह’
जब जाते हैं ये वनवास में, तो तभी भीष्म पितामह उनसे मिलने आते हैं, विदा करने आते हैं। भीष्म पितामह की आँखों में आँसू होते हैं। वो कहते हैं कि, “मैं विवश हूँ, मैं कुछ नहीं कर पाया तुम्हारी मदद के लिए। और तभी मैं कहता हूँ कि मैं कौरवों के धन से बँध गया हूँ। क्योंकि मैं कौरवों के धन से बँध गया हूँ, इसलिए मैं कुछ नहीं कर पाया आपके लिए।” और भीष्म पितामह का जो चरित्र है, वह बहुत ही शक्तिशाली क्षत्रिय के रूप में है, पर उनका जो भक्ति का भाव है, बीच-बीच में दिखाई देता है।
तो अगर हम महाभारत के प्रसंगों को देखेंगे, यह हमारे भीष्म पितामह के समझने के लिए पृष्ठभूमि है। तो यहाँ पर जो भीष्म पितामह की विचारधारा है, तो यह एक ‘नियमाग्रह’ का उदाहरण है। नियमाग्रह आपको सब पता है, उपदेशामृत में जो छह दोष बताये गए हैं भक्ति में, उनमें से “अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः, जनसङ्गश्च लौल्यं च षड्भिर्भक्तिर्विनश्यति।” तो नियमाग्रह के दो अर्थ हैं: नियम-अग्रह और नियम-आग्रह। नियम-अग्रह मतलब नियम का पालन न करना, और नियम-आग्रह मतलब उसका जो उद्देश्य है वो भूल जाना।
तो वास्तव में यहाँ पे क्या हुआ? ये दोनों विचार एक स्तर पे ठीक हैं कि हाँ, पत्नी, जो स्त्री है, हमेशा पति के अधीन रहती है। पर पति ने सब कुछ गँवा दिया था, फिर स्त्री को कैसे दाँव पर लगा सकता है? ये दोनों नियम कह सकते हैं। पर उससे ऊँचा नियम क्या है? कि एक क्षत्रिय को हमेशा पाँच प्रकार के लोगों का संरक्षण करना चाहिए। कौन से पाँच लोग हैं ये? स्त्री, बालक, ब्राह्मण, गाय, वृद्ध लोग। तो पाँच लोगों का हमेशा संरक्षण करना चाहिए। तो यह क्षत्रिय का एक मूलभूत धर्म है।
और क्षत्रिय का धर्म इतना महत्वपूर्ण है कि उसके लिए इतना… इससे हम जानते हैं श्रीमद्भागवतम् में वर्णन आता है जब एक ब्राह्मण आता है और वो कहता है, “मेरे पुत्र की मृत्यु हो रही है, आप द्वारकावासी कुछ क्यों नहीं करते हैं?” कुछ तो अर्जुन कहते हैं, “मैं उसका संरक्षण करूँगा।” तो अर्जुन संरक्षण नहीं कर पाते हैं तो क्या करते हैं? तो वो अपना प्राण त्याग करने जाते हैं। तो यह संरक्षण करना, यह एक बहुत मूल धर्म है। और इसमें संरक्षण में, एक साधारण स्त्री का संरक्षण करना भी महत्वपूर्ण है। और अगर वो राजकुल की एक रानी है, उसका संरक्षण करना है तो न केवल क्षत्रिय का धर्म है, पर वो कुल का भी धर्म है, कुल का भी धर्म है। और अगर ऐसा भरी सभा में हो रहा है, तो वो और भी घृणित है।
तो इसलिए क्या हो रहा है यहाँ पे? जो नियमों की टेक्निकेलिटी है, जो नियमों की जटिलता है, उसमें फँस जाना, और जो नियमों का उद्देश्य है उसको ध्यान न देना। यह जो है, यह महाभारत की दृष्टि से देखा गया है। पर महाभारत से जो हमें चित्र मिलता है, वह एक तरह से उचित चित्र है, पर वह पूर्ण चित्र नहीं है।
श्रीमद्भागवतम् की दृष्टि से भगवान ही एकमात्र रक्षक
अगर हम श्रीमद्भागवतम् की दृष्टि से देखते हैं, तो हम जानते हैं कि इस प्रकार के धर्म की जटिलता में भीष्म पितामह भी फँस नहीं सकते हैं। अगर हम केवल उनके वचनों के आधार पर देखें… तो अगर हम श्रीमद्भागवतम् की दृष्टि से देखें, तो शुद्ध भक्त वही कार्य करते हैं जो भगवान की इच्छा के अनुसार हो जाते हैं। इससे भगवान हैं। तो यह जो द्रौपदी के वस्त्रहरण का प्रसंग है, उसका एक उद्देश्य है। उसका उद्देश्य क्या है? यह दर्शाना कि इस जगत में हमारा भगवान के अलावा और कोई संरक्षणकर्ता नहीं है।
तो भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि “हे प्रभो! तुमि बिना आर रक्षाकर्ता नाहि” कि आपके बिना और कोई रक्षाकर्ता नहीं है। तो द्रौपदी के पाँच पति थे, भीष्म पितामह थे, द्रोणाचार्य थे, इतने सब बड़े-बड़े लोग थे, पर वह सब भी संरक्षण नहीं कर पाए। और तभी भगवान संरक्षण करने को आ गए। तो वहाँ पे अगर हम श्रीमद्भागवतम् की दृष्टि से देखें, तो भीष्म पितामह की शांति का कारण क्या है? क्योंकि वो इस एक प्रकार के नाट्यात्मक प्रसंग से यह तत्त्व को दर्शाना चाहते थे कि इस जगत में भगवान के अलावा हमारा कोई भी सच्चा रक्षक नहीं है। तो इसलिए यह दोनों दृष्टिकोणों से हम देख सकते हैं।
महान भक्तों के कार्यों का विश्लेषण
तो हम जब शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो वहाँ पर प्रभुपाद जी कहते हैं, दूसरे अध्याय के पहले तात्पर्य में प्रभुपाद जी कहते हैं कि यह अर्जुन की आँखों में अश्रुपूर्ण आकुलता… जो आँसू जो हैं, यह शारीरिक संकल्पना के लक्षण हैं, ऐसे शारीरिक संकल्पना के लक्षण। तो यह प्रभुपाद जी अध्याय के लक्षण हैं… ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अयोग्य हैं। तो यहाँ तो वास्तव में जो बलदेव विद्याभूषण हैं, जो एक मधुसूदन सरस्वती नाम के एक आचार्य थे, तो उन्होंने भगवद्गीता पे तात्पर्य लिखा है। और उनको बलदेव विद्याभूषण कोट करते हैं।
और वह कहते हैं जो पूरा पहला अध्याय है, भगवद्गीता का पहला अध्याय, का उद्देश्य यह है कि यह दर्शाना कैसे अर्जुन आध्यात्मिक ज्ञान के लिए पात्र हैं। तो अर्जुन की जो विचारधारा है—यह करूँगा तो यह होगा, यह करूँगा तो यह होगा—तो इस सब से अर्जुन कुछ हद तक धर्मज्ञ हैं, दूरदर्शी हैं, सद्गुणी हैं, यहाँ सब दर्शाया जाता है। और इससे वह ज्ञान के पात्र हैं। तो फिर अभी इसमें सत्य क्या है? क्या अर्जुन सद्गुणी हैं या अर्जुन अज्ञानी हैं? तो यहाँ पर प्रभुपाद जी हमें क्या… प्रभुपाद जी का भाव क्या होता है? शास्त्र सिखाते हैं हमको, तभी हम जो भी शिक्षा है वहाँ पर सीख सकते हैं। कौन सही है, कौन गलत है, यह निर्णय करना हमारे लिए नहीं है।
पहले स्कन्ध के आठवें अध्याय में हम देखेंगे, जब द्रौपदी कहती है कि अश्वत्थामा को छोड़ दो, और भीम कहता है कि अश्वत्थामा को मार डालो। तो कभी प्रभुपाद जी कहेंगे कि द्रौपदी जो है वो स्त्री का कोमल भाव होता है, करुणा में होता है, ब्राह्मण को आदर देते हैं। पर यह अच्छा है। बाद में कहेंगे प्रभुपाद जी कि वास्तव में ऐसी भावुकता नहीं होनी चाहिए, ब्राह्मण ब्राह्मण का कार्य नहीं कर रहा है तो उसको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिए। तो बोले कि इसमें सही क्या है?
तो वैसे ही छठे स्कन्ध में आप देखेंगे, चित्रकेतु का प्रसंग आता है। चित्रकेतु जब थोड़ा हँस देते हैं शिवजी पे, तो फिर चित्रकेतु… तो प्रभुपाद जी कहते हैं हमें गर्वित होके महान भक्तों का अपराध नहीं करना चाहिए। वो पढ़ेंगे तो ऐसे लगता है कि चित्रकेतु ने अपराध किया है, चित्रकेतु ने शिवजी के प्रति अपराध किया है। पर बाद में जो बड़े शांति से पार्वती का शाप स्वीकार कर लेते हैं चित्रकेतु, और फिर शिवजी चित्रकेतु का गुणगान करने लगते हैं पार्वती के सामने।
प्रभुपाद जी तात्पर्य में लिखते हैं कि वास्तव में शिवजी कह रहे हैं कि, “हे पार्वती, यह रमा है, तुम बहुत सुन्दर हो, पर वास्तव में यह नारायण के भक्त हैं। उनके हृदय के सौंदर्य के सामने तुम्हारे शरीर के सौंदर्य में कुछ नहीं है। वह इतने महान हैं कि कितनी भी विकट परिस्थिति में आ जाएँ, वो कभी विचलित नहीं होते हैं।” अभी कहते हैं अपराध किया, अभी कहते हैं यह महान भक्त हैं। क्या चल रहा है यहाँ पर? ऐसे लगेगा। यह महत्वपूर्ण समझना है कि जो महान हस्तियाँ होती हैं, उनके कार्यों में उन्होंने सही कार्य किया या गलत कार्य किया, यह देखना, यह जाँच करना, यह निर्णय करना हमारे बस की बात नहीं है। तो हम प्रभुपाद जी हमें क्या दिखाते हैं कि इससे हम क्या सीख सकते हैं। तो इसलिए यह तीन उदाहरण दिए हैं—अर्जुन का भगवद्गीता से, द्रौपदी का आठवें अध्याय पहले स्कन्ध से, और छठे स्कन्ध से चित्रकेतु पार्वती का। तो इन तीनों उदाहरणों से यह भाव है।
भीष्म पितामह का उपदेश और श्रील प्रभुपाद जी का उदाहरण
तो अभी यहाँ भीष्म पितामह के लिए है। क्या भीष्म पितामह नियमाग्रह कर रहे हैं? अगर हम महाभारत बाद में पढ़ेंगे, तो जो अनुशासन पर्व और शान्ति पर्व में भीष्म पितामह ने जो उपदेश दिया है, वह इतना विशाल है, इतना विशाल है कि लगभग वह महाभारत के लिए… एक लाख श्लोक हैं, तो उनमें से लगभग एक-तिहाई यही है। बहुत विशाल है भीष्म पितामह ने जो उपदेश दिया है। और हम देखते हैं भीष्म पितामह किस चेतना में थे जब वो शरीर त्याग करते हैं। नियमाग्रह क्या है? क्या भीष्म पितामह नियमाग्रह कर सकते हैं? वो समझते हैं नियम का उद्देश्य क्या है। नहीं, वो नियमाग्रह नहीं कर सकते हैं। पर जब हमें सीखना है तो अगर हम यह ऐसे करना चाहिए, तो दोनों बात सही हैं, पर उससे महत्वपूर्ण कार्य क्या है? महत्वपूर्ण यह है कि भगवान को प्रसन्न करना है। तो भीष्म पितामह ने जो किया वो क्यूँ किया? वो इसलिए कि जो भगवान का संदेश, जो भगवान दर्शाना चाहते थे कि वही अकेले संरक्षणकर्ता हैं, वह दर्शाया है।
तो प्रभुपाद जी के जीवन में हम कई बार ऐसे देखते हैं कि प्रभुपाद जी जब अमेरिका में गए, तो पहले उनको मंदिर बनाना था। तो एक पदमपत सिंहानिया नाम के व्यक्ति थे, और व्यक्ति वो रईस व्यक्ति थे। और वो मंदिर बनाना चाहते थे, और वो थोड़ा पैसा देने के लिए तैयार थे। पर उन्होंने कहा कि… प्रभुपाद जी कह रहे थे कि मेरे पास अभी एक छोटी जगह है, तो आप मुझे वो स्टोरफ्रंट जो था दुकान का… प्रभुपाद जी कह रहे थे कि अगर वैसे करना है तो जो भारतीय सरकार है, उतना पैसा कभी भारत से बाहर जाने नहीं देगी। और वैसा करने के लिए बहुत साल लग जाएँगे।
तो प्रभुपाद जी ने क्या कहा? तो वो बोले ऐसे करने की ज़रूरत नहीं है, वास्तव में आप द्वारकावासी हैं… प्रभुपाद जी उनको मनाने का प्रयास कर रहे थे। तो बोले, “आप द्वारकावासी हैं, मैं ब्रजवासी हूँ।” तो वृन्दावन में भगवान के लिए बड़ा मंदिर नहीं होता है, छोटा गाँव का जैसे रमण रेती भाव होता है। द्वारका में बड़े-बड़े मंदिर होते हैं। “तो इसलिए आपका भाव भी उचित है, मेरा भाव भी उचित है। पर महत्वपूर्ण है, हम दोनों भगवान कृष्ण का गुणगान करना चाहते हैं। और अभी अगर आप बड़ा आलीशान मंदिर बनाना होगा, तो उसके लिए बहुत समय लग जाएगा। तो आप पहले कुछ पैसा दे दीजिए, मैं थोड़ा सा मंदिर कर देता हूँ यहाँ पर। यहाँ पर जब सफलता मिल जाएगी, तो फिर बड़ा मंदिर बना देंगे।”
तो प्रभुपाद जी… तो जो पदमपत सिंहानिया जी, उनको क्या भाव था? उनको ऐसा सारा धार्मिक गर्व करना था कि “मैंने अमेरिका में मंदिर बनाया!” एक। तो इसलिए बोले, “नहीं, ऐसा नहीं करना है मुझे।” तो यहाँ पर क्या हो गया? प्रभुपाद जी बोले ठीक है। मंदिर का… तो कभी-कभी विग्रह जो होते हैं, उनका एक दिशा में उनकी दृष्टि होनी चाहिए, तो मंदिर पर शिखर होना चाहिए, तो अनेक नियम होते हैं। तो पहले-पहले प्रभुपाद जी पर यह सब नियम थोपे गए। वास्तव में यह क्या है? मंदिर मतलब लोगों को भगवान का स्मरण करने की सुविधा होगी। तो इसलिए प्रभुपाद जी ने प्रैक्टिकल इसके ऊपर ज़ोर दिया। और जो द्वितीय चीज़ें हैं कि शिखर है कि नहीं, विग्रह कौन सी दिशा में हैं, वह एक तरह से नियमाग्रह का लक्षण है। और ऐसा नियमाग्रह हमें नहीं करना चाहिए। पर जो भागवतम् की दृष्टि से अगर देखेंगे, तो उन्होंने जो किया है, वह भगवान को प्रसन्न, भगवान जो शिक्षा सिखाना चाहते थे, उसके लिए किया है।
शास्त्रों का मूल भाव और भगवान की शरणागति
भागवतम् की दृष्टि से अगर देखेंगे, तो उसके लिए किया है क्योंकि भगवान चाहते थे कि वह उनके विरुद्ध युद्ध करें, तो इसलिए विरुद्ध युद्ध करने जाते हैं। भले लोग उनको गलत कहें, क्या होगा? मान लीजिए अगर मैं कुछ कार्य करता हूँ और दूसरे लोग मेरे बारे में कुछ गलत कहते हैं, तो मुझे बुरा लगेगा। तो फिर मैं साधारण व्यक्ति होने से क्या करूँगा? मैं सबको बताऊँगा मैंने क्या किया था, इसलिए मैंने ऐसा नहीं किया। दूसरे लोग मेरे बारे में कुछ गलत कहेंगे तो मैं उसका स्पष्टीकरण करने का प्रयास करूँगा।
पर भीष्म पितामह की इतनी शरणागति है कि वो खुद ही वो गलत छवि में बने रहे। वो क्या कह रहे हैं पाण्डवों को? “पाण्डवों, मैं उनके धन से बँध गया हूँ, और मैं उनके धन से बँध गया हूँ इसलिए मैं आपकी मदद नहीं कर रहा हूँ।” पाण्डवों में सत्य नहीं है। दर्शा रहे हैं दुनिया को, दर्शा रहे हैं कि इस तरह से व्यक्ति हैं जो धन के बंधन में फँसे हुए थे। तो इसलिए जब हम शास्त्र पढ़ते हैं, हर एक शास्त्र का एक भाव, यह समझना बड़ा महत्वपूर्ण है। वह समझेंगे नहीं हम यह शास्त्र का भाव, तो फिर क्या होगा? हम विरोधाभास में आके फँस जाएँगे।
इसलिए वाल्मीकि रामायण है, वाल्मीकि रामायण में लगभग कहीं भी श्रीरामचंद्र को स्पष्ट रूप से भगवान नहीं बताया गया है। क्यों नहीं बताया गया है? क्योंकि कार्य तो सब बताये गए हैं, और जब कार्य देखेंगे तो समझ जाएँगे कि यह भगवान ही हैं। पर स्पष्ट रूप से, यहाँ तक कि जब ब्रह्मा जी और शिव जी आते हैं रावण के वध के बाद, और कहते हैं कि आपने इतना कार्य, महान कार्य किया है तो आप विष्णु हो गए। राम कहते हैं, “मुझे पता नहीं मैं कौन हूँ, आप बताओ मुझे मैं कौन हूँ।” तो क्यों है ऐसा? क्योंकि वो शास्त्र की शुरुआत होती है, वहाँ वाल्मीकि जो हैं, वहाँ नारद मुनि से पूछ रहे हैं।
वाल्मीकि पूछते हैं नारद मुनि से कि, “ऐसा कोई व्यक्ति है जो सारी दुनिया के लिए एक आदर्श बन जाए? ऐसा कोई व्यक्ति है जो सब सद्गुणों से संपन्न है? ऐसा कोई व्यक्ति है जो हर एक आदर्श गुण हमें दिखाना चाहेगा, किसी में वो सब हैं?” तो वाल्मीकि जो सवाल पूछते हैं, वह यह नहीं है कि भगवान कौन है, भगवान के लीला हमें बताओ। इसलिए हर एक शास्त्र का जो मूल होता है, वह हमें देखना है।
तो महाभारत का मूल यह नहीं है दिखाना कि मृत्यु के समय कैसे हमें शरीर त्यागना है। महाभारत का मूल भाव क्या है? कि राजा लोग राज्य कैसे करते हैं धर्म के अनुसार। और धर्म के अनुसार कार्य करने के लिए कैसे उनके लिए प्रत्यवाय आता है, कैसे समस्या आती है, और कैसे धर्मनिष्ठ रहकर पार करते हैं उसको। तो इसलिए हर एक शास्त्र का एक भाव होता है। इसलिए सवाल के लिए दो दृष्टि से उत्तर दिया। इसके भी कोई प्रश्न हैं?
कुरुक्षेत्र युद्ध और भीष्म पितामह का सेनापतित्व
तो दो प्रसंग हम भीष्म पितामह के जीवन से लेकर गए, जिससे हमें दर्शाते हैं कैसे भीष्म पितामह बहुत ही अद्भुत व्यक्ति थे। तो जो महाभारत का युद्ध कितने दिन तक चला? तो उसमें पहले दस दिन तक भीष्म पितामह सेनापति, अगले पाँच दिन तक द्रोणाचार्य सेनापति, अगले दो दिन तक कर्ण सेनापति, अगले आखिरी दिन के लिए शल्य सेनापति थे। और आखिरी रात के लिए अश्वत्थामा सेनापति थे। तो कौरवों के पक्ष में भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य और अश्वत्थामा, पाँच सेनापति।
तो उसमें से प्रधान समय तक भीष्म सेनापति थे। और जब भीष्म सेनापति थे, तो अधिकांश रूप से कुछ भी अनैतिक नहीं हुआ। जो अभिमन्यु का वध हुआ, वह बारहवें (तेरहवें) दिन हुआ। और भीष्म पितामह होने के ईशा… volunteers… ऐसे फँसे हम नहीं हैं अभी मैं कहूँगा… 12 दिन में हुआ तो भीष्म पितामह तो ऐसे… बार-बार भीष्म पितामह तक शिफ्ट कर रहे थे।
युद्ध का आरंभ और युधिष्ठिर की निराशा
ऐसे फँसे हम नहीं हैं। अभी मैं कहूँगा… १२ दिन में हुआ तो भीष्म पितामह तो ऐसे… बार-बार भीष्म पितामह तक शिफ्ट कर रहे थे। तो सातवें दिन में… तो पहले दिन में जब युद्ध हुआ, तो भीष्म पितामह ने ऐसा भीषण युद्ध किया, कि पाण्डवों के पक्ष में बड़ा विनाश हो गया। और भीष्म पितामह की शक्ति इतनी विशाल थी, कि युधिष्ठिर जब शाम को उनके तंबू में, उनकी मीटिंग हो रही थी, युधिष्ठिर ने कहा कि, “भीष्म पितामह से कोई भी प्रतिकार नहीं कर सकता है। मुझे लगता है कि भीष्म पितामह से युद्ध करना मतलब, मौत के घाट में उतरना ही है। और सब सैनिकों को, सब राजाओं को मौत के घाट में उतरने से बेहतर है, कि मैं जंगल में चला जाऊँगा। तो इसलिए हे कृष्ण, मुझे लगता है कि हम ये जो युद्ध है, इसको बंद कर देते हैं, और हम सब वापस वनवास में चले जाते हैं।”
युधिष्ठिर तैयार हो जाते हैं वास्तव में, तभी कृष्ण आते हैं, युधिष्ठिर को आलिंगन करते हैं, कंधे पर हाथ रखते हैं, चलते रहता है ऊपर नीचे।
भीम का भयंकर पराक्रम
तो सातवें दिन जब होता है, तो भीम अपना पराक्रम दिखाते हैं। भीम क्या, भीम भी धनुष और बाण से युद्ध कर सकते हैं, पर कभी-कभी धनुष बाण से युद्ध कर रहे हैं तो बोर हो जाते हैं। तो क्या करते हैं, धनुष बाण बाजू को रख देते हैं, और अपने रथ से गदा ले के उतर जाते हैं, और सीधा शत्रु के पक्ष में चले जाते हैं। और अपनी ऐसे गदा घुमाने लगते हैं, गदा घुमाने लगते हैं। तो ऐसे बता रहे हैं, भागवत में वर्णन आता है, कि उनका सारा शरीर जो है… जो गदा घुमाये लोग मृत हो रहे हैं, तो खून उड़ रहा है, सारा शरीर जो होता है, वो शत्रु के खून से लाल-लाल हो जाता है। और सिर्फ उनके सारे लाल चेहरे पे सिर्फ दो सफेद चीज़ें हैं, एक है उनकी आँखें, और वो हँस रहे हैं तो दाँत। हाँ! तो उस समय भीम ऐसा युद्ध करते हैं, कि सब कौरवों के पक्ष में हाहाकार मच जाता है।
और तभी दुर्योधन कहता है, उसके पास बड़ा एक हाथियों का समूह (चमू) होता है, वो भेजता है। तो भीम क्या करते हैं, एक हाथी उनके पास आता है, हाथी को पकड़ लेते हैं, हाथी को उठाते हैं, गोल-गोल घुमाकर फेंक देते हैं, और जो भी हाथी आते हैं उसको ऐसे फेंक देते हैं। और यह जब दुर्योधन देखता है, वो सहन नहीं करता है कि क्या हो रहा है, सबसे शक्तिशाली हाथियों के समूह को, उसको ऐसे ही मार डाला है! तो तभी दुर्योधन आक्रमण करने आता है, और उस दिन भीम बहुत क्रुद्ध होते हैं।
तो फिर क्या होता है, भीम ऐसा आक्रमण करते हैं दुर्योधन पर, अपने पूरे ज़ोर से प्रहार करते हैं। दुर्योधन का जो कवच होता है, टूट जाता है, और बस कुछ ही समय में भीम दुर्योधन को मार डालेंगे, ऐसा लगता है। तो तभी भीष्म और द्रोण दोनों दुर्योधन के पास आ जाते हैं, और वो दुर्योधन तभी बेहोश हो जाता है वास्तव में। और फिर वो सब भीम को रोक लेते हैं।
दुर्योधन की निराशा और भीष्म पितामह का उत्तर
और फिर बाद में, वो शाम को जब दुर्योधन होश में आता है, तो तभी उसको एक तो क्रोध होता है, अपमान होता है, भय होता है, ऐसी भावना होती है, जल रहा होता है वो। एक तो मैं हार गया भीम से, ऊपर से मेरी इतनी सारी सेना मर गई! तो उस समय वो भीष्म पितामह के पास जाता है। भीष्म पितामह सेनापति होते हैं। कहता है कि, “पितामह, जब आप हमारे साथ में हैं, आप तो ऐसे योद्धा हो, कि कोई भी, तीनों लोकों में आपका सामना नहीं कर सकता है। तो आप हमारे सेनापति होते हुए, कैसे हमारी सेना का ऐसे विनाश हो रहा है?”
तो भीष्म पितामह का चेहरा थोड़ा थका हुआ है, दिन भर युद्ध करे हैं। वो कहते हैं, “हे बालक!” (इसको बालक कहते हैं, तो उनके लिए बालक ही है) “हे दुर्योधन! कि मैं चीख-चीख के तुमको बोलके, मेरा गला सूख गया है, मैं तुमको कितनी बार बताया है, कि जब तक पाण्डवों के पक्ष में वासुदेव हैं, महाभारत में, पाण्डवों के पक्ष में वासुदेव हैं, तब तक न कोई राजा, कोई सेनापति, कोई सेना ऐसी हुई है, ऐसी हुई थी, ऐसी होगी, जो पाण्डवों को हरा सके!”
क्योंकि, ये बहुत बार इसके पहले बताया है दुर्योधन को। दुर्योधन को अपनी शक्ति, और अपने सेनापति की शक्ति में, इतना अहंकार है, कि वो सुनता नहीं है। पर इस बार में, उसने थोड़ा देखा है, आजमाया है, तो थोड़ा गंभीर होकर सुनने लगता है, “अच्छा! और इस कृष्ण में इतनी शक्ति, कहाँ से आ गई है?”
भीष्म द्वारा कृष्ण की भगवत्ता का वर्णन
तो वास्तव में, दुर्योधन का ऐसा भाव होता है, कि भले ही, उसने देखा है कि कृष्ण ने विश्वरूप दर्शाया है, और विश्वरूप दर्शाने के बाद भी, कि “ये कुछ जादू दिखा रहा है, कुछ योगिक सिद्धि दिखा रहा है”, और उनकी भगवत्ता का सबूत नहीं मानता है। वो कहता है, “विश्वरूप क्या बड़ी बात है, मैं भी ऐसा विश्वरूप दिखा सकता हूँ!” वो क्यों बोलता है? वो ऐसा दिखा नहीं सकता है, पर उसके सारे सैनिक होते हैं, जब डर गए होते हैं, उनका डर दूर करने के लिए बोलता है, “कुछ बड़ी बात नहीं है, सब जादू है!” पर अभी वास्तविकता से हार हो गई है। “कि कृष्ण कौन हैं? कि कृष्ण की इतनी शक्ति कैसे आ गई है?”
तभी भीष्म पितामह प्रसन्न हो गए हैं, तो उनको भगवान कृष्ण के गुणगान करने का मौका मिल गया है। तो अगर हम पूरे महाभारत को देखेंगे, तो हम देखेंगे कि भीष्म पितामह महाभारत में भक्त दिखाई देते हैं। तभी वो कहते हैं कि, “मैं जब स्वर्ग में था…”
तभी, आप कब स्वर्ग में थे भीष्म पितामह? आप जानते हैं, भीष्म पितामह किसके पुत्र हैं? गंगा देवी के पुत्र हैं। तो गंगा देवी के आठवें पुत्र हैं, अष्ट वसु। देव, आठ वसुओं को पानी में डालते हैं। तभी वो जब, उनके पिता (शांतनु) कहते हैं कि, “आप उसको लेके जाओ स्वर्ग में, आप उसको शिक्षित होने दो, बाद में जवान होने दो, आप लेके आओगे।” तो फिर वो तभी जब जाते हैं, तो भीष्म पितामह परशुराम से शस्त्र विद्या सीखते हैं।
“और तभी जब मैं स्वर्ग में था गंगा के साथ, मेरी माँ के साथ, तभी वहाँ पर जो ब्राह्मण आये, वो चर्चा कर रहे थे, वो मुझे एक प्रसंग बता रहे थे, और वो प्रसंग मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तो बताया कि प्राचीन कुछ समय पहले, पृथ्वी आयी थी, और पृथ्वी ने कहा कि (जैसे भागवतम् के दशम स्कन्ध में आता है वहाँ), कि मैं पूरे पापी क्षत्रियों से भर गई हूँ, बोझ बढ़ गया है, आप कुछ करो! और पूरा प्रसंग बताया था। और तभी मुझे ब्राह्मण और ऋषियों ने बताया, कि वहाँ जो विष्णु को प्रार्थना की गई थी, वहाँ विष्णु ही कृष्ण के रूप में आये हैं। और यह जो पाण्डव हैं, वो विष्णु के पार्षद हैं। और जो सब असुर हैं, जो विष्णु के विरोधी थे, वो तुम्हारी सेना में आये हैं!”
कि यह सब उनके सामने ही बता रहे हैं, कि यह सब असुर हैं! उसका अहंकार होता है दुर्योधन का। जब कोई अहंकारी होता है… कृष्ण भावना का प्रभाव जो होता है, दुर्योधन पर भी हो जाता है। उसको लगता है, “अगर सही में कृष्ण भगवान हो सकते हैं, क्या? पर अगर कृष्ण भगवान हो के… पर भगवान का तो रूप नहीं होता है, कृष्ण का रूप है। अगर भगवान का रूप होगा भी, तो भगवान मेरे विरुद्ध क्यों जाएँगे? मैं तो नेक आदमी हूँ!” हाँ, लोग यही सोचते हैं मैं नेक हूँ, पर वो मूर्ख हैं। भगवान को तो मूर्ख नहीं होना चाहिए, लोग मुझे नहीं समझेंगे, पर भगवान को तो समझना चाहिए मुझे। पर अगर भगवान नहीं हैं, तो पाण्डवों में ऐसी शक्ति कैसे आ सकती है? और भीष्म पितामह गलत नहीं हो सकते हैं। तो ऐसी स्थिति में वापस कुछ भ्रम में पड़ जाता है दुर्योधन।
भीष्म पितामह की भयंकर प्रतिज्ञा
तो भीष्म कहते हैं, “पर तुम्हारी संतुष्टि के लिए मैं आज ऐसा युद्ध करूँगा, कि या तो आज पाण्डवों का, अर्जुन का वध होगा, या आज कृष्ण को उन्हें बचाना होगा (शस्त्र उठाना होगा)!”
कि जब वो ऐसा व्रत ले रहे होते हैं, तो भीष्म पितामह का भाव क्या होता है? बाह्य रूप से अगर हम महाभारत पढ़ेंगे, तो ऐसे लगता है, कि भीष्म पितामह दुर्योधन के वचनों से क्रोधित हो गए हैं, और क्रोध के वश में आकर वो ऐसे बोल रहे हैं। “और आज मैं अर्जुन का वध करता हूँ!” अर्जुन का वध कैसे कर सकते हैं? वो तो उनके पोते हैं। वो ऐसा क्यों बोल रहे हैं? तभी वो भीष्म पितामह सोच रहे हैं मन में, कि “मैं आज देखूँगा कि भगवान कृष्ण अपना भक्त-वात्सल्य कैसे दिखा के अर्जुन को छुड़ाते हैं!”
तो वो अपना व्रत क्यों लेते हैं ऐसा? ताकि आज भगवान अपने भक्त-वात्सल्य को दिखा सकें। तो उनके व्रत का वही भाव होता है। पहले वो बोलते हैं कि पाँच तीर से मैं पाँचों पाण्डवों को मारूँगा। “तो भगवान कैसे बचाएँगे मैं देखना चाहता हूँ! तो आज भगवान को दिखा सकते हैं।”
भगवान का रथ का पहिया (चक्र) उठाना
तो अगले दिन जब युद्ध होता है, तो अर्जुन जो होते हैं, पूरे उत्साह से युद्ध नहीं कर रहे होते हैं। वो भावना है, उनकी थोड़ी कम होती है, युद्ध करते हैं तो। भावना के कारण तीव्रता से युद्ध नहीं करते हैं। भीष्म पूरे उत्साह से युद्ध कर रहे हैं! क्योंकि वो देखना चाहते हैं कि कृष्ण क्या करेंगे। जब अर्जुन उत्साह से युद्ध नहीं करते हैं, तो कृष्ण गंभीर हो जाते हैं। कि “आज के एक दिन में भीष्म लगता है कि सारा युद्ध खत्म कर देंगे! पाण्डवों की सारी सेना का वध कर देंगे, अर्जुन का वध कर देंगे! और मैं कभी ऐसे नहीं होने दूँगा।”
और तभी क्या करते हैं भगवान कृष्ण? अर्जुन के रथ से कूद जाते हैं! और कूद के इधर-उधर देखते हैं और वहाँ पर उनको रथ का पहिया (चक्र) दिखता है। और चक्र उठा लेते हैं। तो अब यहाँ पर सवाल आता है कि भगवान अपने सुदर्शन चक्र को क्यों नहीं बुलाते हैं? एक साधारण चक्र उठाने की क्या ज़रूरत होती है? वास्तव में क्या होता है, भगवान कृष्ण अपने भक्त अर्जुन के संरक्षण के भाव से इतने उद्विग्न, इतने चिंतित, इतने आतुर हो जाते हैं कि वह अपने सुदर्शन को बुलाना भूल जाते हैं! इतने आतुर होते हैं कि सुदर्शन को भूल जाते हैं कि “मेरा चक्र, मेरा सुदर्शन चक्र है।” तो इसलिए जो साधारण चक्र दिखता है, उसी चक्र को उठा लेते हैं!
और चक्र को उठा लेते हैं तो उसके बाद में जैसे बताते हैं कि, वह दौड़ने लगते हैं भीष्म पितामह की ओर! दौड़ने लगते हैं। अगर हम शिशुपाल के प्रसंग में देखेंगे, तो वहाँ पर भगवान दौड़ते नहीं हैं शिशुपाल के पास, वहाँ पर खड़े रहते हैं और चक्र छोड़ देते हैं, और चक्र जाकर काट देता है। तो यहाँ पर भगवान वहीं से चक्र को नहीं फेंकते हैं। भगवान इतने आतुर हैं अर्जुन के संरक्षण के लिए, वह सोचते हैं कि “अगर मैं चक्र फेंकूंगा और निशाना चूक जाएगा तो क्या होगा?” तो इसलिए पास में जाएँगे तो निशाना चूकेगा नहीं। भगवान दौड़ते-दौड़ते जाते हैं!
जब इस तरह कृष्ण जा रहे होते हैं, तो अर्जुन एकदम विचलित हो रहे होते हैं। तो सोचते हैं कि कृष्ण ने व्रत लिया था कि वो युद्ध नहीं करेंगे! “मैं भगवान की निंदा सहन नहीं कर सकता हूँ!” तो इसलिए अर्जुन चिल्लाने लगते हैं, “कृष्ण आप रुक जाओ!” और भगवान कृष्ण इतने क्रोधित हो गए हैं कि कुछ भी सुनते नहीं हैं। अर्जुन चिल्लाने लगते हैं। जब वो अपने रथ से उतरते हैं तो उनका पीताम्बर उड़ जाता है। भीष्म पितामह कहते हैं कि “जैसे शेर होता है, किसी हाथी की ओर दौड़ता है, वैसे वो दौड़ते हुए मेरे पास आ गए!”
तो फिर अर्जुन रथ से कूद जाते हैं! और कूद के वो भगवान के पैर को पकड़ लेते हैं, जंघा को पकड़ लेते हैं! पर भगवान का इतना क्रोध होता है, इतना वेग होता है, अर्जुन के पैर पकड़ने पर भी, वो अर्जुन को घसीटते हुए दौड़ते हैं। और जब ऐसे दौड़ते रहते हैं, तो अर्जुन क्या करेंगे? पूरी शक्ति से पकड़े हुए, अपने जो विशाल शक्तिशाली पैर होते हैं, वो ऊपर उठाते हैं, ज़ोर से ज़मीन में मारते हैं! ज़ोर से ज़मीन में मारते हैं, तो क्या होता है? उनका शक्तिशाली शरीर होता है, शक्तिशाली पैर होते हैं, तो ज़मीन में दो गड्ढे हो जाते हैं! और उनके पैर गड्ढे के अंदर चले जाते हैं। और जब उनके पैर गड्ढे के अंदर चले जाते हैं, और फिर वो भगवान के पैरों को पकड़े हुए हैं, तो उनका पैर ज़मीन के अंदर है, इसके कारण क्या होता है, भगवान रुक जाते हैं! और तभी अर्जुन चिल्लाते हैं कि, “कृष्ण आप रुक जाओ! मैं ऐसा युद्ध करूँगा कि मैं भीष्म का वध कर दूँगा, आपको शस्त्र उठाने की ज़रूरत नहीं है!” तो इसी बीच तभी भगवान रुक जाते हैं।
भगवान का क्रोध और भीष्म का अलौकिक प्रेम
पर इसके बीच पहले क्या होता है, जब भगवान चक्र उठा लेते हैं। तो जैसे ही भगवान चक्र उठा लेते हैं, भीष्म पितामह बोलते हैं, “आओ! आपके हाथों से मृत्यु मेरे परम कल्याण का कारण बन जाएगी।” भीष्म पितामह प्रसन्न हो जाते हैं। भीष्म पितामह देखते हैं कि ये भगवान हैं! पर यहाँ पर भगवान भावुक नहीं हैं, भगवान क्रोधित हैं। वास्तव में कृष्ण कहते हैं कि, “ये सारे जो युद्ध है, उसकी जड़ तुम ही हो!”
अब ये भीष्म कैसे जड़ हो गए? तो भगवान ये (This is the logic of anger) ये क्रोध का तर्क है। वो क्या कहते हैं? भगवान कहते हैं कि, “जब कोई राजा गलत कार्य पर जाता है, तो उसके मंत्री की जिम्मेदारी है कि राजा को सन्मार्ग में लाए! तो तुम धृतराष्ट्र के मंत्री थे, तो तुमने कभी धृतराष्ट्र को सन्मार्ग में नहीं लाया। इसलिए सारा युद्ध तुम्हारा दोष है, तुम इसकी जड़ हो, और आज तुम्हें मैं उखाड़ डालूँगा!” तो भीष्म पितामह जो कहते हैं कि, “मैंने पूरा प्रयास किया धृतराष्ट्र को समझाने का, तो धृतराष्ट्र ने मेरी एक भी बात नहीं मानी।”
और यह सब काम हो रहा है जब कृष्ण दौड़ते हुए आ रहे हैं और अर्जुन उनका पैर पकड़ रहे हैं, तब यह सब चल रहा है। और यहाँ से प्रसंग जब देखते हैं (विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे), भीष्म पितामह कहते हैं कि, “ऐसे जो विजय सखा हैं, ऐसे जो भगवान कृष्ण अर्जुन के सखा हैं, उनकी इस दृष्टि को मैं हमेशा ध्यान में रखना चाहता हूँ!” तो यहाँ पे फिर क्या होता है, भगवान दौड़ के आ जाते हैं। तो भीष्म की लीला में कई चीज़ें छिपी होती हैं—भगवान का अर्जुन के प्रति प्रेम, अर्जुन का भगवान के प्रति प्रेम, और भीष्म का भगवान के प्रति एक अलौकिक प्रेम!
संजय की दृष्टि और भगवद्गीता का आरंभ
जो महाभारत का वर्णन कैसे है? महाभारत का वर्णन पूरा लीनियर नहीं है, सीधी लकीर में नहीं है। जो विदुर होते हैं, विदुर नहीं संजय, वो कुरुक्षेत्र में होते हैं दस दिन के लिए। दस दिन के लिए कुरुक्षेत्र में होते हैं। और जब भीष्म का पतन होता है, तब दौड़ते-दौड़ते संजय आ जाते हैं हस्तिनापुर! और हस्तिनापुर में आके धृतराष्ट्र को बोलते हैं कि, “वास्तव में भीष्म पितामह गिर गए!”
जब “भीष्म पितामह गिर गए” सुनते हैं, क्या होता है? धृतराष्ट्र गिर जाते हैं, बेहोश हो जाते हैं! “कैसे पितामह भीष्म का पतन कैसे होगा? कैसे होगा मुझे पूरा प्रसंग बताओ!” और तभी ही पूरे युद्ध की शुरुआत कैसे हुई, तभी भगवद्गीता का वर्णन होता है! भीष्म पर्व में भगवद्गीता का वर्णन होता है। यहाँ पर जो होता है, महाभारत में, संजय जो दूरदृष्टि से देखते हैं, वो 11-18 दिन देखते हैं। जो पहले 10 दिन जो हैं, वो भूत काल का वर्णन कर रहे हैं। 11-18 दिन जो हैं, वो वर्तमान काल का दूरदृष्टि से मुझे देखते हैं कि वर्णन कर रहे हैं। पर यहाँ पर हमारे लिए वो महत्वपूर्ण बात नहीं है।
भीष्म का शरशैया पर विश्राम
कि जब “शिखण्डी को आप सामने रखो, मैं अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दूँगा”, जब यह सुनते हैं, तो अपने लिए बोलते हैं, यह कैसे बोल सकते हैं वो? उनको ऐसे बोलने की ज़रूरत क्या थी? एक क्षत्रिय का धर्म होता है कि शत्रु का वध करे, ना कि अपना वध कैसे करें यह बताये! यह उन्होंने उचित नहीं किया, यह बराबर नहीं किया। वो बड़े बेचैन हैं। जब लौट के आ रहे होते हैं कृष्ण और अर्जुन एक रथ में, पाण्डव भी आ रहे होते हैं। तो अर्जुन बड़े गंभीर हो गए, सोच रहे होते हैं कि “कल मैं मेरे भीष्म पितामह हैं, कि उनका वध कैसे करूँगा?” तो उनका वध कैसे करते हैं।
जो युद्ध के अंत में वहाँ पे बहुत से वैद्य आ जाते हैं। कि उनके जो घाव हुए हैं, उसकी मरहम पट्टी करेंगे। भीष्म पितामह कहते हैं कि, “नहीं! अभी मुझे इन वैद्यों की कोई ज़रूरत नहीं है। अभी मैं यहीं पे रहूँगा।” उनका सिर लटक रहा है। उसके लिए एक आसन (तकिया) ले के आते हैं। उसके लिए रेशमी गद्दियों का आसन ले के आते हैं। “कि जो योद्धा तीरों की गद्दी (शरशैया) पे सो रहा है, उसको ऐसे तकिया सिर के लिए नहीं चाहिए!” अर्जुन को पता है कैसा तकिया होगा सिर के लिए। अर्जुन क्या करते हैं, नीचे से तीन तीर मारते हैं और ऊपर आते हैं। और उनके सिर के लिए तीरों का आसन देते हैं।
अर्जुन द्वारा जल-दान और कर्ण का अहंकार
फिर वो कहते हैं अर्जुन से कि, “अर्जुन मुझे पानी चाहिए, मुझे बहुत प्यास लगी है।” तुरंत दुर्योधन कुछ तो सेवा करने के लिए, पानी लेके आता है। वो बोलते हैं, भीष्म पितामह कहते हैं कि, “जो क्षत्रिय इस तरह से तीरों के बिस्तर पे सो रहा है, वो साधारण जल से पानी नहीं पीता और उसके लिए शोभा नहीं देता। अर्जुन, तुम पानी दो मुझे।” तो अर्जुन अपने मंत्रों को जानते हैं, तो क्या करते हैं? ज़मीन में तीर छोड़ते हैं, तुरंत ज़मीन से गंगा देवी आती हैं! तो गंगा देवी जल देती हैं, तो भीष्म पितामह प्रणाम करते हैं गंगा देवी को।
तो वास्तव में कर्ण और भीष्म पितामह… भीष्म पितामह जानते हैं कि जो दुर्योधन है, वह कपटी भाव का है, अहंकारी है, अधर्मी है, कपटी है! पर वो जो दुर्योधन है, वो इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह पाण्डवों से युद्ध कर सके। तो दुर्योधन का जो दुस्साहस है कि पाण्डवों से युद्ध करे, वह दुस्साहस कहाँ से आया है? वह कर्ण के अहंकार से है! और वह जानते हैं कर्ण अच्छा योद्धा है, पर कर्ण का अहंकार कम करने के लिए, और दुर्योधन का जो कर्ण में अति विश्वास है उसे कम करने के लिए, हमेशा भीष्म पितामह क्या करते हैं, कर्ण को… कर्ण बोलता है कि “मैं अकेला ये कर सकता हूँ,” तो भीष्म पितामह कहते हैं “तुम क्या कर सकते हो!” तो उसको हमेशा कम आँकते हैं।
कर्ण को भीष्म की क्षमा और युद्ध की समाप्ति
कर्ण कहता है कि, “जब तक भीष्म युद्ध में रहे… तो मुझे आप माफ़ करो।” तो ये वास्तव में एक संस्कृति का लक्षण है, जब कोई मृत्यु के समय में आ गया है, कोई व्यक्ति, तो उसके पहले कितना भी अपराध हो, क्षमा हो जाता है। तो तभी भीष्म पितामह कहते हैं, “हे कर्ण, तुम राधेय नहीं हो, तुम कौन्तेय हो, तुम कुन्ती के पुत्र हो! और वास्तव में, मैंने तुम्हें जो भी कहा, बहुत तुम्हारे कल्याण के लिए कहा है। वास्तव में तुम्हारा जो जन्म हुआ था, तुम्हारी जो बुद्धि है जन्म से… तुममें क्षत्रिय की शक्ति है, पर तुममें क्षत्रिय की नेक बुद्धि नहीं है।”
इसलिए वो कहते हैं, “तुम पाण्डव हो!” तो फिर वो चले जाते हैं। भीष्म पितामह वहीं पे लेटे रहते हैं। फिर वो अठारह दिन तक युद्ध चलता है। और फिर इसके बाद में हम जानते हैं क्या होता है (ये अंतिम प्रसंग है इसके बाद), कि सब युद्ध हो जाता है। युद्ध होने के बाद, उनके सारे सेनापतियों का वध हो जाता है।
युधिष्ठिर का शोक और वैराग्य
उससे वो बहुत उदास हो जाते हैं। जो युद्ध है, तो युद्ध में जीत भी है। हार के समान हो जाते हैं। सारे उनके सैनिक मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। तो जब अंतिम संस्कार हो रहा होता है, तो कुन्ती सोचती है, कि “अभी कर्ण का अंतिम संस्कार कौन करेगा?” कर्ण के कई पुत्र होते हैं, तो वो सब पुत्रों का वध हो जाता है। कर्ण के भाई होते हैं, सब भाइयों का वध हो जाता है। तो कर्ण का अंतिम संस्कार कौन करेगा? तो इसलिए युधिष्ठिर को बुलाती हैं। युधिष्ठिर से कहती हैं, “कर्ण था तुम्हारा बड़ा भाई, तो अंतिम संस्कार तुम करो।”
और जब युधिष्ठिर सुनते हैं, “न केवल मैंने मेरे रिश्तेदारों का वध किया, मैंने मेरे बड़े भाई का भी वध किया!” तो वो उनके लिए एक असहनीय वज्र हो जाता है। तो अंतिम संस्कार हो जाता है, और जब युधिष्ठिर बाहर आते हैं, वो बाहर आते हैं, कहते हैं भीम से कि, “हे भीम! मेरे से पापी इस दुनिया में कोई नहीं है। मैं सालों-सालों साल तक प्रायश्चित करूँगा मेरे पाप का, कि मैं राज्य कभी नहीं स्वीकार कर सकता हूँ। तो ऐसा करो, तुम राजा बन जाओ, मैं जंगल में जाके तपस्या करूँगा।” तो भीम अपना सिर पकड़ लेते हैं, “अगर यही तुम्हें करना था, तो यह युद्ध क्यों किया?”
और फिर बाद में बड़ा, यह जो वास्तव में लंबा प्रसंग है, सब लोग युधिष्ठिर को मनाने का प्रयास करते हैं, कोई मानते नहीं हैं। तो बाद में कृष्ण कहते हैं कि “हम भीष्म के पास जाएँगे।” और कहते हैं, “भीष्म के पास जाएँगे, भीष्म को प्रसन्न करने के लिए, आप राजधर्म के लिए भीष्म के पास जाओ।” तब जब वो भीष्म के पास जाते हैं, तो जाने के लिए तैयार होते हैं।
भगवान का भीष्म का स्मरण करना
तो उस दिन हस्तिनापुर में, दुर्योधन का एक बड़ा महल होता है। और दुर्योधन का बड़ा प्रिय भाई होता है, दुःशासन। दुर्योधन ने अपने प्रेम के कारण, दुःशासन के लिए, अपने से भी अच्छा महल बनाया होता है। तो क्या करते हैं, जो दुर्योधन का महल होता है, युधिष्ठिर को दिया जाता है, और जो दुःशासन का महल होता है, उसमें कृष्ण रह रहे होते हैं। अर्जुन वहीं पर रह रहे हैं, अलग-अलग महल में रह रहे हैं। तो युधिष्ठिर महाराज, जिस महल में कृष्ण रह रहे होते हैं, वहाँ पर जाते हैं।
जब वहाँ पर जाते हैं, तो फिर तभी क्या होता है? और देखते हैं, भगवान कृष्ण ध्यान में लगे हुए हैं, आँखें बंद करके ध्यान में बैठे हैं। चेहरे पर बड़ा प्राकृतिक सौन्दर्य दिखाई दे रहा है। तो यह दृश्य बड़ा आश्चर्यजनक है! “यह कितने अचरज की बात है, कि जिस व्यक्ति पर तीनों लोक ध्यान कर रहे हैं, वो किस पर ध्यान कर रहे हैं?” भगवान कृष्ण फिर भी ध्यान करते रहते हैं। वो कहते हैं, “वो महान गंगा-पुत्र है! जिसने अकेले ही, जो परशुराम हैं, जिन्होंने सब योद्धाओं को मार दिया था, उनको हराया था। वो गांगेय है! जिनमें बृहस्पति की बुद्धि थी, वो गांगेय है! जो अकेले ही जब गांधार (काशी) में गए, तो स्वयंवर में अकेले ही सब योद्धाओं को हरा दिया! वो भीष्म, जिनका जो ज्ञान था, तीनों लोकों में समानता नहीं है। वो भीष्म, जब तक रणभूमि में थे, तब तक तुम्हारी जीत की कोई गुंजाइश भी नहीं थी। वो भीष्म आज हज़ारों तीरों के बिस्तर पर लेटकर मेरा स्मरण कर रहे हैं, अब मैं भी उनका स्मरण कर रहा हूँ!”
भगवान का भीष्म को आशीर्वाद और उपदेश की तैयारी
तो इस प्रकार से भगवान जब गुणगान करते हैं, तो युधिष्ठिर की आँखों में आँसू आने लगते हैं। कहते हैं कि “समय आ गया है कि हम भीष्म के पास जाएँ, आप भी हमारे साथ चलो।” तो वे वहाँ जाते हैं, भीष्म के पास जाते हैं। भीष्म कहते हैं उनको कि, “आप कैसे यहाँ पर?” कृष्ण आँखें खोलते हैं, युधिष्ठिर की सवाल का जवाब देते हैं। भीष्म कहते हैं, “आप तो जगद्गुरु हो, और आपके सामने तो मैं एक छोटा सा शिष्य हूँ।”
यहाँ पर महाभारत में (भागवतम् में नहीं), यहाँ पर महाभारत में पूरा भीष्म की भक्ति की चर्चा होती है। और वो कहते हैं कि, “गुरु के सामने शिष्य क्या बोल सके? तो आप ही उपदेश दो, तो मैं भी सुनूँगा, मेरा कल्याण हो जाएगा। और वैसे भी, मैं बहुत कमज़ोर हो गया हूँ, मेरी वाणी भी जा रही है, और मेरे लिए बोलना संभव नहीं है, आप ही बोलते हैं।” तो वास्तव में, महाभारत में यहाँ पर क्या दिखाते हैं? तो भगवान कृष्ण कहते हैं, “मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ, कि तुम्हारी पीड़ा चली जाएगी। तुम्हारी शारीरिक शक्ति जो है, जो नवजवानी में थी, वैसी शक्ति, बुद्धि, स्पष्टता, स्फूर्ति, सब कुछ वापस आ जाएगा! और तुम ऐसा उपदेश करोगे, जो इस विश्व के इतिहास में, कभी किसी ने नहीं किया होगा!”
और भगवान यह आशीर्वाद देते हैं। जैसे ही आशीर्वाद देते हैं, तो आसमान से सब फूल गिरते हैं। भीष्म को आशीर्वाद देते हैं। और फिर भीष्म पितामह, जो नवजवान हो गए हैं अंदर से, बहुत उपदेश करने के लिए, आगे उपदेश करते हैं।