Narasimha Katha Hindi 3 – SB 07.08.14-30 – Love underlies the various dangerous forms of the Lord
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Lecture Summary
- स्तम्भ से भयंकर प्राकट्य: जब हिरण्यकशिपु अहंकार में चूर होकर खंभे पर प्रहार करता है, तो भगवान नरसिंह देव एक भयानक गर्जना के साथ प्रकट होते हैं। यह गर्जना इतनी भीषण होती है कि तीनों लोक कांप उठते हैं और ब्रह्मा जी भी भयभीत हो जाते हैं।
- वचनों की मर्यादा: भगवान ने आधा नर और आधा सिंह (Half-man, Half-lion) का अद्भुत रूप इसलिए धारण किया ताकि वे ब्रह्मा जी द्वारा हिरण्यकशिपु को दिए गए वरदानों (ना नर से मरेगा, ना जानवर से) को भी सत्य रख सकें और अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा का वचन भी पूरा कर सकें। कथा में इसकी तुलना भगवान कृष्ण द्वारा महाभारत में भीष्म पितामह के वचन को सत्य करने के प्रसंग से भी की गई है।
- भगवान कृष्ण और नरसिंह देव के रूप की तुलना:
- भगवान कृष्ण: सर्व-आकर्षक हैं, जिनकी कमल जैसी आँखें, कोमल होंठ, मधुर वाणी और मनमोहक मुस्कान है, जो दुखी व्यक्ति को भी प्रसन्न कर देती है।
- भगवान नरसिंह देव: अत्यंत भयानक किन्तु दिव्य रूप (Ferociously Beautiful) वाले हैं। उनकी आँखें सूर्य और अग्नि के समान क्रोधित हैं, दांत भयानक हैं, और वाणी इतनी उग्र है कि जागृत व्यक्ति भी भय से बेहोश हो जाए। रूप बिल्कुल विपरीत होने पर भी, दोनों एक ही परम भगवान हैं।
- विश्वरूप दर्शन के विभिन्न प्रसंग: कथा में भगवान द्वारा दिखाए गए विश्वरूप के पांच प्रसंगों का उल्लेख है।
- यशोदा माता को उन्होंने अपने मुख में ब्रह्मांड दिखाकर बाल-लीला की।
- अर्जुन को भगवान ने अपना ‘काल रूप’ (विनाशकारी रूप) दिखाया, जिसमें सभी योद्धा उनके मुख में समा रहे थे। इसे देखकर शूरवीर अर्जुन भी भयभीत हो गए और उन्होंने भगवान से उनके सौम्य रूप में आने की प्रार्थना की।
- अहंकार इंसान को अंधा कर देता है: जिस प्रकार भगवान का विराट रूप देखकर भी अहंकारी दुर्योधन नहीं बदला और उसे केवल एक जादू-टोना समझकर अपनी शक्ति पर घमंड करता रहा, ठीक उसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान नरसिंह देव के भयानक रूप को देखकर डरा नहीं, बल्कि अपने अहंकार में उनसे युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। ज्ञान और बुद्धि के बिना भगवान के दर्शन होने पर भी मनुष्य सत्य को नहीं समझ पाता।
- भगवान का व्यक्तिगत वात्सल्य: भगवान जब भी आते हैं तो शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ आते हैं। लेकिन नरसिंह देव इतने क्रोध में थे कि उन्होंने प्रह्लाद की रक्षा का कार्य अपने अस्त्रों पर नहीं छोड़ा, बल्कि स्वयं अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध करने का निश्चय किया। यह उनके असीम भक्त-प्रेम को दर्शाता है।
Full Transcription
भगवान नरसिंह देव का प्राकट्य
आज नरसिंह चतुर्दशी के परम पावन तिथि में, आज नरसिंह चतुर्दशी के इस उत्सव में, राधा मदन गोपाल मंदिर में नरसिंह देव के विग्रह उपस्थित हो जाएंगे। थोड़े समय उनके सान्निध्य में हम सब का भाग्य है कि हम नरसिंह देव की महिमा के बारे में कुछ चर्चा कर पा रहे हैं, उनका स्मरण कर पा रहे हैं।
तो हम दिन की कथा कर रहे थे, तो कल और परसों हमने जो नरसिंह देव के आगमन के पहले की घटना है, उनके बारे में चर्चा की। खासकर कि श्रीमद्भागवतम् के सातवें स्कंध के आठवें अध्याय से, कैसे प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु के बीच चर्चा हुई।
हिरण्यकशिपु का स्तम्भ पर प्रहार और भीषण गर्जन
और फिर ‘खड्गं प्रगृह्य…’ तो प्रह्लाद, “तो भगवान यहाँ सब जगह हैं, स्तम्भ में भी हैं?” तो फिर वो ‘अतिबलात् सुमुष्टिना’, तो अपनी सुमुष्टि से वो इस खंभे पर प्रहार करते हैं। और जब प्रहार करते हैं तो अचानक, उनको लगता है खंभा टूट के गिर जाएगा। पर वो खंभा टूटता है पर उससे ऐसा भीषण आवाज आता है, कि वो केवल खंभा टूटने का आवाज नहीं है।
वो आवाज क्या था? वास्तव में, भगवान नरसिंह देव उस खंभे के अंदर से जब प्रकट होने वाले थे, वो अपने क्रोध को व्यक्त कर रहे थे। और वो क्रोध से जब सिंह गुर्राता है तो सारे जानवर कांपते हैं। तो ये तो साधारण सिंह नहीं हैं, दिव्य सिंह हैं। तो वो जब गुर्राते हैं, ऐसा भयानक आवाज आता है कि ऐसे लगता है कि वो सारी इमारत की दीवारें कांप रही हैं। ना केवल इमारत की दीवारें कांप रही हैं, पर वो आवाज उस लोक से चौदह लोकों में पहुँच जाता है, तीनों लोकों में पहुँच जाता है।
ब्रह्मा जी का वरदान और भगवान का वचन
और ऊपर के लोगों को ऐसे लगता है कि हमारे जो ना केवल ग्रह हैं, पर हमारा जो धाम है, वो टूट जाएगा। ब्रह्मा जी अपने लोक से भाग जाते हैं, क्या हो गया देखने के लिए। और ऐसा भीषण आवाज आता है, हिरण्यकशिपु भयभीत हो जाता है। वो ऐसा असुर है, ब्रह्मा जी ने वचन दिया था कि ये जो हिरण्यकशिपु है, उसका कोई मानव वध नहीं करेगा, कोई जानवर वध नहीं करेगा। तो इसलिए भगवान एक ऐसे रूप में आ रहे हैं जिससे कि वो ब्रह्मा जी के वरदान को भी सत्य रखें और फिर भी विश्व का कल्याण कर सकें। ‘सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितम्’।
तो इस तरह से कितने… चार हो गए; अर्जुन, ब्रह्मा जी, नारद मुनि और प्रह्लाद। और पांचवां कौन है? पांचवां है हिरण्यकशिपु स्वयं। अभी हिरण्यकशिपु का वचन कैसे सत्य कर रहे हैं? वास्तव में हिरण्यकशिपु कौन है? किसी को पता है कौन है ये? जय-विजय। वास्तव में आप कई बार मंदिर में जाते हैं। “सिर्फ तीन बार तुम जन्म लोगे और तभी तुम बहुत भगवान के खिलाफ जाओगे, पर भगवान स्वयं आएंगे तुम्हारा उद्धार करेंगे। और उसके बाद सिर्फ तीन बार जन्म होगा, उसके बाद तुम मेरे पास आ जाओगे।”
अर्जुन की कथा और भगवान की भक्त-वत्सलता
दूसरी ओर से सोच रहे हैं कि भीष्म का वचन है, उसको भी पूरा करना है। और अर्जुन क्या सोच रहे हैं? किसे पकड़ना है! तो उनके पैर पर जाकर गिरने का… तो वैसे गिर जाते हैं, पर भगवान इतने तेजी से दौड़ रहे हैं कि अर्जुन का विशाल शरीर है, वो भगवान के पैर पर गिरते हैं, कुछ भी होते हैं, भगवान दौड़ते रहते हैं। अर्जुन अपने हाथों से भगवान की जांघ को पकड़ लेते हैं। तो भगवान इतनी शक्ति से दौड़ रहे हैं कि अर्जुन उनकी जांघ पर हैं और भगवान दौड़ते ही रहे हैं।
फिर अर्जुन क्या करते हैं? अपने जो पैर होते हैं ऊपर उठाते हैं और पैर जोर से जमीन में पटकते हैं, शक्तिशाली पैर होते हैं उनके, तो जमीन में गड्ढा हो जाता है उससे। और गड्ढे में उनका पैर अटक जाता है। और जब गड्ढे में पैर अटक जाता है, तो फिर भगवान का आगे जाने का प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है। और फिर तब उनको पकड़ के वो कहते हैं, “हे भगवान! हे कृष्ण! आप रुक जाओ, मैं कल जरूर भीष्म का वध करूंगा, आपको अपने वचन तोड़ने की जरूरत नहीं है।” और तभी भगवान शांत हो जाते हैं।
तो ‘सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितम्’। तो वो यहाँ पे भीष्म का वचन भी सत्य करते हैं, और वे अपना वचन भी सत्य करते हैं कि मैं मेरे भक्त का संरक्षण जरूर करता हूँ। और फिर इसके द्वारा अगले दिन अर्जुन… अर्जुन ने व्रत लिया होता है युद्ध शुरू होने के पहले कि मैं भीष्म का वध करूंगा, आप ऐसे मत सोचो कि मैं स्नेह के कारण कमजोर हो जाऊंगा। तो भगवान अपने भक्त का वचन हमेशा पूरा करते हैं।
भगवान नरसिंह देव का अद्भुत रूप
‘व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः’। हाँ, प्रह्लाद ने कहा है कि सब जगह भगवान हैं, तो वचन सत्य करते हैं और रूप प्रकट होता है, ‘अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन्’। एक अभी नाम आया था, तो बड़ा अद्भुत रूप था। और अद्भुत कैसा था? अदृश्य था। अदृश्यता मतलब इसके पहले कभी देखा नहीं ये रूप। और यही भाव आता है बाद में जब भगवान हिरण्यकशिपु का वध कर देते हैं, उसके बाद में वो इतने क्रोधित होते हैं, कोई उनको सांत्वना नहीं कर सकता है। ब्रह्मा जी, शिव जी, इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु, मरुत, ऋषिगण सब प्रार्थना करते हैं, कोई सांत्वना नहीं कर पाता है।
बाद में ब्रह्मा जी बोलते हैं लक्ष्मी देवी को कि, “ये तो आपके पति हैं, आप शांत करो उनको।” लक्ष्मी देवी बोलती हैं, “मेरे पति को मैंने भी ऐसे रूप में नहीं देखा है कभी। मैं भी जा नहीं सकती हूँ उनके सामने।” तो अभी विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि वास्तव में लक्ष्मी देवी तो हमेशा नरसिंह देव के साथ आध्यात्मिक जगत में रहती हैं।
‘एकेन चक्रम् अपरेण शङ्खम्, अन्येन सिन्धुतनयाम् अवलम्ब्य तिष्ठन्। वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं, लक्ष्मी नृसिंह मम देहि करावलम्बम्।’
नाम में आता है लक्ष्मी-नरसिंह। लक्ष्मी-नरसिंह साथ में होते हैं। ‘एकेन चक्रम् अपरेण करेण शङ्खम्’ तो उनका वर्णन आ रहा है, एक हाथ में चक्र है दूसरे हाथ में शंख है। ‘अन्येन’ और तीसरे हाथ से क्या किया? ‘सिन्धुतनयाम् अवलम्ब्य तिष्ठन्’, सिन्धुतनया लक्ष्मी देवी को उन्होंने आलिंगन किया है। और फिर चौथे हाथ से, ‘वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं’।
‘रूपमुद्वहन् अदृश्यतात्यद्भुतम्’ रूप! क्या रूप है? ‘स्तम्भे सभायां’, स्तम्भ से वो सभा में! क्या है? ‘न मृगं न मानुषम्’, वो तो ना जानवर हैं ना मानव। जब ऐसे रूप को देखते हैं तो यह रूप कैसा है? बहुत विशाल रूप है।
भगवान कृष्ण और नरसिंह देव के रूप की तुलना
और ये जो विशाल रूप है, इसकी तुलना हम कृष्ण के रूप से कर सकते हैं। तो हम देखते हैं, आप देख रहे हैं वो एक ही व्यक्ति हैं, पर बहुत ही अलग रूप है। तो क्या है? नरसिंह देव जो हैं वो Half Man, Half Lion और Full God। क्या है? वो आधे मानव, आधे सिंह और पूरे भगवान हैं! पूरे भगवान हैं, पूरी भगवान की शक्ति है उनमें। पर ये कैसे हैं? वो एक Ferociously Beautiful Lord। वो आकर्षक हैं पर वो एक भयानक आकर्षण है।
वो भगवान कृष्ण जो हैं, सर्व-आकर्षक हैं। नरसिंह देव जो हैं, वो सर्व-आकर्षक नहीं हैं, कभी-कभी असुरों को भय लगता है, क्या है ये! तो इसकी तुलना करनी है, वो एक ही व्यक्ति हैं। ऐसे बताते हैं कि भगवान कृष्ण की आँखें हैं, वो एक कमल पुष्प के समान हैं। बहुत ही मुलायम, आकर्षक, कोमल हैं। पर जो नरसिंह देव की जो आँखें हैं, ‘चंडलोचन’, इसे बताया कि बहुत क्रोध की आँखें, जो कोई अग्नि जल रही है या सूर्य है, उसके समान उनकी आँखें हैं।
तो भगवान कृष्ण के जो होंठ हैं, वो बहुत मुलायम हैं, नरसिंह देव के जो होंठ हैं वो क्या हैं? सिंह के होंठ हैं। और भगवान कृष्ण के जो दांत हैं, वो वास्तव में एक फूल की सफेद पंखुड़ियां होती हैं, उनके समान हैं। पर भगवान नरसिंह देव के दांत हैं, उनके दांत हैं, वो बाहर आ रहे हैं और बड़े ही भयानक दांत हैं।
भगवान की मधुर वाणी और भयानक गर्जन
भगवान कृष्ण के जो होंठ हैं, उनकी जो ध्वनि है, ‘अधरसीधुनाप्याययस्व नः’। तो गोपी गीत में गोपियां बता रही हैं, “प्रभो! मधुरया गिरा”, आपकी जो गिरा है, आपकी वाणी है, बहुत ही मधुर है। और उस वाणी से आप जो बोलते हैं, ‘वल्गुवाक्यया’, और जो बोलते हैं वचन, वह भी बहुत ही प्रिय हैं। तो कभी-कभी कुछ व्यक्तियों की वाणी बड़ी मधुर होती है, पर जो वचन आते हैं वाणी से वो बड़े कटु होते हैं। कोई बोलता है गुस्से में, “आई लव यू!” बाप रे! क्या है ये? वचन जो बोल रहे हैं मधुर हैं, पर वो इतना क्रोध से हैं, कुछ मधुरता रहती नहीं है उसमें।
तो भगवान की वाणी भी बड़ी मधुर है और वचन भी बड़े मधुर होते हैं। और ये ऐसे वचन हैं कि ये वचन सुनकर बुद्धिमान लोग भी मोहित हो जाते हैं। और गोपियां कह रही हैं, “प्रभो! अभी आप हमसे दूर चले गए हैं, कृपया आ जाओ, और अगर हम आपके वचन की वाणी भी सुन सकें, आपके मुख से जो वाणी आ रही है उसके द्वारा… क्या ये ‘अस्वना’? हम अभी मूर्च्छित हो रहे हैं, बेहोश पड़ रहे हैं, आप कृपया हमें पुनः होश में लाओ, पुनर्जीवित कर दो।”
तो भगवान की वाणी ऐसी है, कृष्ण की वाणी ऐसी है, इतनी मधुर है कि कोई बड़े ही चिंता में, विरह में, दुख में है, वो सिर्फ वाणी सुनके पुनः जागृत हो जाएगा, पुनः प्रसन्न हो जाएगा। पर नरसिंह देव की वाणी ऐसी है कि जो जागृत है वो बेहोश हो जाएगा। ऐसी भयानक वाणी है! आँखें खुली हैं तो… तो यहाँ नरसिंह देव का जो रूप है, क्या है? नख जो हैं एक अस्त्र के समान हैं।
और फिर कृष्ण जो हैं, वह जब हँसते हैं, तो वो इतना उनका सुन्दर स्मित है, और जब हँसते हैं तो सब लोग उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। पर जब नरसिंह देव हँस रहे हैं – अभी वो प्रकट हो गए, हँस रहे हैं – तो एक बार इतना हँस रहे हैं कि सारे असुरों का हृदय कांप रहा है डर के कारण। क्योंकि, “मुझे भी देखे हैं, तुम सब मेरे शिकार ही हो, अभी तुम सब मृत्यु में आने वाले हो।”
भगवान के अनन्त रूप
तो ये जो है, दोनों का जो रूप है, ये बिल्कुल विपरीत हैं। उसमें अगर हम देखने जाएँगे, तो कोई समानता दिखती ही नहीं है। पर फिर भी, वह एक ही भगवान हैं। भगवान एक ही हैं, ‘अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपम्’। एक भगवान हैं, पर उनके अनेक रूप हैं। और अलग-अलग रूप में प्रकट होके, वे अलग-अलग लीला करते हैं।
तो जैसा रूप, यहाँ पर नरसिंह देव ने दर्शाया है, उस मात्रा का तीक्ष्ण रूप, और कोई अवतारों में भगवान ने दिखाया नहीं है। बाकी सब अवतार भी बहुत ही शूरवीर कार्य करते हैं, पर इतना भयानक रूप, किसी और ने नहीं दिखाया है। सिर्फ भगवान कृष्ण ने दिखाया है।
कब दिखाया है? उनका स्वाभाविक रूप जो है, साधारण रूप जो है, वो बहुत ही मधुर रूप है। पर वो जो रूप दिखाते हैं, वो एक विश्वरूप दिखाते हैं। तो भगवान कृष्ण ने विश्वरूप कितनी बार दिखाया? पांच बार दिखाया। दो बार उन्होंने यशोदा माई को दिखाया। एक बार अर्जुन को दिखाया। और अब यशोदा माई को… तभी जो विश्वरूप दिखाते हैं, उसमें क्या दिखा रहे हैं?
ये सब विश्वरूप एक नहीं हैं। और उसमें से जो विश्वरूप है, भयानक सब विश्वरूप नहीं हैं। तो यशोदा माई को जो रूप दिखाते हैं, वो सिर्फ… क्या भगवान खेल रहे हैं! यशोदा माई को खेल-कूद दिखा रहे हैं, कि मेरे अंदर सारा विश्व है। तो उसमें कुछ विध्वंस नहीं दिखाते हैं, वो सिर्फ सारा ब्रह्मांड मेरे मुख में दिखा रहे हैं। तो वो एक बार है।
दूसरी बार क्या होता है? पहली बार जब भी कृष्णा के दांत आ रहे हैं… जब छोटा बालक होता है, बड़ा हो रहा होता है, तो माता-पिता को बहुत अच्छा लगता है। “इसके दांत आ रहे हैं ना!” तो देख रहे होते हैं। तो फिर कृष्णा के दांत आ रहे हैं, क्या दिखा रहे हैं? तो वो बार-बार दिखा रहे हैं, कि उनको सिर्फ दांत दिख रहे हैं, या उनको कुछ और दिखा रहे हैं! तो छोटे से बालक होते हैं…
यशोदा माई को विश्वरूप दर्शन
उस समय तो वो अपनी माँ की गोद में ही होते हैं और गोद में बैठे होते हैं, लेटे होते हैं, अभी स्तनपान किया होता है। तो स्तनपान होता है, तो यशोदा माई को लगता है कि, “अभी मुझे लगता है, छोटे दांत आ गए हैं यहाँ पर, तो मैं देखना चाहती हूँ।” तो मुख खोल देते हैं, वो पूरा विश्वरूप है। वो देखते ही रह जाती हैं, देखती हैं, समझ भी नहीं पाती हैं कि क्या हो रहा है यह। और तभी कृष्ण वो दृश्य गायब करा देते हैं।
उत्तंक ऋषि और भगवान कृष्ण का संवाद
और फिर हम जो सबसे भयानक रूप है, उसको बाद में देखेंगे। वो उत्तंक ऋषि नाम के एक ऋषि होते हैं। जब महाभारत का सारा युद्ध खत्म हो जाता है, उसके बाद में उत्तंक ऋषि जो होते हैं, वो आते हैं। और वो कहते हैं कि, “मैं जा रहा हूँ, ये महाभारत का युद्ध क्यों नहीं रुका?” तो भगवान बोलते हैं, “मैंने तो पूरा प्रयास किया, मैं शांति दूत के रूप में स्वयं गया था, फिर भी नहीं रोक पाया।”
तो वो बोलते हैं, “तो तुम कैसे भगवान हो? अगर तुम भगवान हो तो तुम्हें शक्तिशाली होना चाहिए, सर्वशक्तिशाली होना चाहिए। तो तुम्हें रोकना चाहिए था, तुम कैसे रोक नहीं पाए?” तो वो बोलते हैं कि, “मैं स्वीकार नहीं करता कि तुम भगवान हो।”
वास्तव में, ये वह महान ऋषि हैं, पर इस समय वो इतने क्रोधित हो गए हैं, सब उससे मुकर जाते हैं। तो भगवान बताते हैं कि, “वास्तव में, मैं सर्वशक्तिशाली हूँ, पर जो जीवात्मा है, उसकी जो स्वेच्छा है, उसमें मैं हस्तक्षेप नहीं करता। तो दुर्योधन अपनी स्वेच्छा से विनाश का मार्ग स्वीकार करता है, तो मैंने उसको निवेदन किया, पर मैं उसमें जबरदस्ती जाके हस्तक्षेप नहीं कर सकता हूँ।” तो ऋषि कहते हैं, “यह मेरी योजना है, अगर तुम युद्ध नहीं रोक पाए, तुम कैसे भगवान हो?” तभी उनको अपना विश्वरूप दर्शन कराते हैं।
दुर्योधन को दिखाया गया उग्र रूप
तो जब अर्जुन को और दुर्योधन को जो रूप दिखाते हैं, उसमें सबसे भयानक जो रूप है, वो अर्जुन को दिखाते हैं। दुर्योधन का क्या होता है? वो शांति दूत के रूप में आये होते हैं, और जब आये होते हैं तभी वे पूरे… अग्नि हर एक रोम से आने लगती है, और आसमान में बिजली होने लगती है, बादल गड़गड़ाने लगते हैं। जमीन में भूकम्प होने लगता है, जो सागर होता है, उस पर बड़ी-बड़ी सुनामी की लहरें उठने लगती हैं।
तभी वो रूप देखते हैं, धृतराष्ट्र रूप देखते हैं, और सभी जो ऋषिगण होते हैं जो वहाँ पर आये होते हैं, वो सब कृष्ण की प्रार्थना करने लगते हैं। सारे जो सैनिक होते हैं, वो सोचते हैं, “अरे! ये इतना विशाल रूप है!” और उनके साथ सारे… एक सात्यकि का हाथ पकड़ लेते हैं, दूसरे कृतवर्मा का हाथ पकड़ लेते हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं, बातें करते हुए निकल जाते हैं वहाँ से। और बाकी कुरु जो होते हैं बीच में, द्रोण, कृपाचार्य हाथ जोड़ते हैं, उनके पीछे चले आते हैं। और दुर्योधन हाथ पर… वो कहते हैं “क्या हो गया ये?” और ऐसा भयानक रूप दिखाते हैं भगवान।
अर्जुन को विश्वरूप का दर्शन और ज्ञान चक्षु
और इन सब रूपों में से जो रूप भगवान अर्जुन को दिखाते हैं, वो सबसे भयानक रूप है। क्यों सबसे भयानक है? कैसे होता है? दसवें अध्याय में, नौवें अध्याय में भगवान बोलते हैं कि, “मैं सारे विश्व में व्याप्त हूँ, रूप ईश्वर हूँ।” तो दसवें अध्याय में अर्जुन कहते हैं, “कृपया आप मुझे आपका विश्वरूप दिखाओ।” तो इसमें जो विश्वरूप है, इतना अद्भुत है कि वो देखेंगे तो भी समझ में नहीं आएगा कि क्या है।
क्योंकि क्या है, कभी-कभी लोग कहते हैं, “क्या हमको आप भगवान दिखा सकते हैं?” तो क्या है, देखना है तो देखके भी समझना है। और समझने के लिए सिर्फ देखने की शक्ति नहीं चाहिए, वो समझने के लिए बुद्धि की शक्ति भी चाहिए। कि अगर कोई व्यक्ति अंधा होता है— दो प्रकार के अंधे व्यक्ति होते हैं, एक होते हैं जन्म से अंधे और दूसरे हैं किसी अपघात के कारण, किसी बीमारी के कारण अंधे हो गए। तो अगर ये दोनों में से अगर किसी की सर्जरी कर ली, कोई ऑपरेशन कर लिया और उनकी आँखें वापस आ गईं, तो अगर जन्म से अंधा है तो अगर उनकी आँखें आ जाती हैं तो क्या होता है? कुछ समझता ही नहीं है।
तो एक बढ़ई (Carpenter) का वर्णन है, उसका… वह अंधा था पर वह बराबर अस्त्र इस्तेमाल करता था, लकड़ी को काटता था और बड़े अच्छे मेज बनाया करता था। तो जब उसका ऑपरेशन किया और उसकी आँखें खोलीं, तो उसको क्या दिखा था? “क्या मुझे कुछ रोशनी और अंधकार के कुछ डिज़ाइन दिख रहे हैं, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है क्या है।” और अचानक एक तरफ से आवाज आई, और उसने उधर देखा, “उधर भी कुछ काला और सफेद कुछ दिख रहा था।”
तो अगर मुझे पहले पता नहीं होता कि जो आवाज किसी चेहरे से आती है, तो मुझे पता ही नहीं था। तो ये काला-सफेद रंग का एक विचित्र कुछ दिख रहा है, वह एक चेहरा है। पर उसके सामने उसका ही चाकू रखा है जो वो इस्तेमाल करता है, उसको समझ में नहीं आता यह क्या है। उसको देख के समझने को बोला, कुछ भी समझ में नहीं आया उसको। फिर बाद में उसको स्पर्श कर रहा है, तुरंत उसने कहा, “हाँ, ये मेरा चाकू है।” तो इसका तो ऐसे अनेक बार निर्णय होते हैं।
तो क्या होता है, देखने की शक्ति भी आ जाए, पर अगर हमारी बुद्धि में वो समझने की शक्ति नहीं है, तो फिर जो देखते हैं वो हम समझ नहीं पाते हैं। तो इसलिए अगर कोई अंधे व्यक्ति को आँखें आ जाती हैं, तो कुछ समय लग जाता है कि जो आँखों से दिख रहा है वो क्या है, वो समझने के लिए।
अर्जुन का विश्वरूप दर्शन का अनुभव
तो इसलिए जब भगवान विश्वरूप का दर्शन दिलाते हैं, तो पहले क्या होता है? हमें समझने के लिए और अर्जुन को समझने के लिए, पहले पाँच श्लोकों में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अभी क्या दिखने वाला है। फिर उसके बाद में… नहीं, पहले पाँच श्लोकों में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि अभी तुम्हें क्या दिखने वाला है। और फिर पाँच श्लोकों में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि क्या दिख रहा है। और फिर उसके बाद में लगभग 20 श्लोकों में, 15-16 श्लोकों में, अर्जुन बताते हैं कि मुझे क्या दिख रहा है।
क्योंकि जब कृष्ण दिखाने वाले हैं तो अर्जुन को समझ भी नहीं है कि क्या है ये। तो उन्हें थोड़ा समझाने के लिए पहले बताते हैं कि क्या दिखने वाला है। और जब दिखाते हैं वो, तो ‘पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्’, अर्जुन समझ जाते हैं कि वास्तव में ये विश्वरूप जो मैंने पूछा था, वो ही दिखा रहे हैं। पर जब विश्वरूप को देख रहे होते हैं— ‘नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्’— कहाँ अंत है, कहाँ शुरुआत है, कहाँ बीच में है। दिशा, भूभाग, आसमान से जमीन तक पूरा व्याप्त रूप है। वो देख रहे होते हैं, कुछ समझने का प्रयास कर रहे होते हैं।
विश्वरूप में काल रूप का दर्शन
और वहाँ पर वो क्या देखते हैं? वहाँ पर वो काल रूप देखते हैं। और काल रूप क्या है? काल रूप मतलब विध्वंस का रूप है। जो काल रूप है, उसमें देखते हैं कि वो सारे कौरव योद्धा हैं— ‘भीष्मद्रोणौ सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः’। कि सारे योद्धा हैं, वो सब आपके मुख में जा रहे हैं और मुख में जा के उन सब का विनाश हो रहा है।
तो जब देखते हैं, अर्जुन सोचते हैं यह क्या है? अभी हम साधारणतया जब विश्वरूप का चित्र देखते हैं तो हम क्या देखते हैं? यहाँ पर अर्जुन हैं, यहाँ पर कृष्ण हैं, यहाँ पर विश्वरूप है। पर ऐसा नहीं है, जब अर्जुन विश्वरूप देखते हैं, तो कृष्ण अंतर्धान हो जाते हैं उनके लिए। इसलिए वो क्या पूछते हैं? अर्जुन पूछते हैं, “आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो,” ‘आप कौन हो?’
अर्जुन का भय और भगवान की शरण
अभी साधारणतया तो अर्जुन और कृष्ण मित्र हैं। इसलिए वो शरणागत भी हो जाते हैं। तो तभी क्या करते हैं? वो ‘त्वाम्’ इस्तेमाल करते हैं, वो बोलते हैं कि ‘शरणं त्वां प्रपन्नम्’, “मैं आपकी शरण में आ रहा हूँ।” तो संस्कृत में क्या होता है? दो प्रकार का सम्बोधन होता है। एक मित्र में सम्बोधन होता है तो ‘त्वं’ (तू) बोलते हैं, और कोई आदरणीय व्यक्ति है तो उसको जैसे ‘आप’ बोलते हैं, तो ‘त्वाम्’ और ‘भवान्’। तो किसी का फोन आता है, कौन है? अपने बॉस। “हाँ, यस सर! यस सर!” तो क्या होता है? पूरा भाव बदल जाता है उसका।
तो वैसे ही ये अर्जुन को ‘त्वं’ बोल रहे हैं पहले। पर जब विश्वरूप देखते हैं, “ये क्या है? कौन है?” तो ‘त्वं’ का ‘भवान्’ हो जाता है। “आप कौन हो मुझे बताओ?” तो यहाँ पर उनको कृष्ण दिख नहीं रहे हैं, तो कृष्ण को पूछते हैं, “कृष्ण ये क्या है?” पर कृष्ण भी पूरे गायब हो गए और वो बोल रहे हैं, “आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो, आप कौन हो बताओ मुझे? आपकी प्रवृत्ति क्या है मुझे पता नहीं है।”
और जो बता रहे हैं, कैसे बता रहे हैं वो? कि “जब सारे… जो सारे योद्धा हैं, वो इस विश्वरूप के मुख में जा रहे हैं और वो निगल रहे हैं। कुछ योद्धा हैं, वो दांत के बीच जा रहे हैं, उनका सिर दांत पर टकरा रहा है। और जब दांत पर टकरा रहा है तो सिर टूट जाता है। और सिर टूट जाता है तो खून दर-दर बह रहा है।” तो ये विश्वरूप क्या कर रहे हैं? वो चाट रहे हैं। तो ये क्या भयानक है!
तो अर्जुन साधारणतः योद्धा है, भयभीत नहीं होता है, पर अर्जुन भयभीत हो जाता है। भयभीत होकर बोलता है कि “ये क्या है?” तो भगवान तब बोलते हैं, “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो।” “मैं काल हूँ और मैं सारे लोकों का विनाश करने आया हूँ, सिर्फ तुम पांच पांडवों को छोड़कर। ‘ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे’, तुम्हारे अलावा कोई नहीं रहेगा यहाँ पे।” और इसलिए अर्जुन, आप युद्ध में उठके जीतो, यश प्राप्त करो, राज्य स्वीकार करो।
अर्जुन का घबराना और सौम्य रूप की प्रार्थना
तो तभी अर्जुन प्रार्थना अर्पण करने लगते हैं और प्रार्थना अर्पण करके बोलते हैं, “भगवान! मैंने गलती की, मुझे विश्वरूप देखना नहीं है। अभी आप साधारण रूप में आ जाओ।” तो तभी भगवान क्या करते हैं, अर्जुन से खेलते हैं और अर्जुन से कहते हैं, “अरे अर्जुन! ये जो रूप है, ये बड़ा अद्भुत है। ये देवताओं ने भी अभी देखा नहीं है, तुमको अकेले को देखने का मौका दिया है। और तुम ये क्यों देखना नहीं चाहते हो? ये रूप बहुत अद्वितीय है।” अर्जुन बोलते हैं, “नहीं, नहीं! बापू मुझे देखना नहीं है! मैं कभी नहीं मांगूंगा ये रूप!”
तो क्या हो गया ये? अर्जुन का भाव कैसे है, वो समझने के लिए… जैसे कोई टीवी पर सर्फिंग कर रहा है, देखते हैं क्या प्रोग्राम है। और अचानक क्या होता है, कोई हॉरर मूवी दिखती है वहाँ, और थोड़ा उत्साह आता है कि चलो हॉरर मूवी देख लेते हैं। पर वह हॉरर मूवी में कोई बड़ा विनाश हो रहा है, और ऐसे ही अर्जुन देख रहा है कि ये सारा विश्वरूप है, सब जगह विध्वंस हो रहा है। पर वह हॉरर मूवी देख रहा है और अचानक क्या दिखता है कि ये दूसरी कोई बिल्डिंग का विनाश नहीं हो रहा है, मैं जिस घर में बैठा हूँ उसका ही विनाश हो रहा है।
तो वैसे ही अर्जुन देखता है कि “ये जो मेरे युद्ध में योद्धा हैं, वो ही सब का विध्वंस हो रहा है यहाँ पर। तो चैनल बदल दो!” पर चैनल बदलेंगे कैसे, रिमोट खराब हो गया! तो वो सब विनाश हो रहा है। तो वैसे ही अर्जुन बोल रहे हैं कि, “कृष्ण! मुझे रूप नहीं देखना है! कृष्ण देखो ना, अभी देखो और बदलो रूप।” तो अर्जुन बोलते हैं, “नहीं, नहीं! मुझे देखना नहीं है रूप।”
और फिर जब कृष्ण देखते हैं कि अर्जुन बहुत चिंतित हो गया है, ‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावो’। “हे अर्जुन! तुम व्यथित मत हो, तुम चिंतित मत हो। मैं तुम्हें प्रसन्न करता हूँ।” और फिर वो अपना सौम्य रूप दिखाते हैं। तो यह जो रूप है, जब अर्जुन को दिखाते हैं वो रूप, तो उसमें काल रूप दिखाते हैं। बाकी सब लोगों को जो रूप दिखाते हैं, वो सिर्फ विश्व को व्याप्त करने वाला रूप दिखाते हैं। पर अर्जुन को दिखाते हैं काल रूप, मतलब सब का विनाश भी होने वाला है।
हिरण्यकशिपु का अहंकार और नरसिंह देव का प्राकट्य
तो यह जब रूप दिखाते हैं, तो अर्जुन को उससे उत्साह बढ़ता है। हिरण्यकशिपु भयभीत हो गया और दौड़ने लग गया वहाँ से। हिरण्यकशिपु ने पहले अपनी आँखें बंद कर लीं, “युद्ध नहीं कर सकता, मैं कैसे युद्ध करूँगा?” पर बाद में देखने लगा कि कौन होगा यह? “शायद लगता है मुझे यह विष्णु ही है जो मेरा शत्रु है, वह इस रूप में आ गया है।” और वो देख रहा था कि वो विष्णु को जानता था, विष्णु उसका विश्व शत्रु था। “तो यह विष्णु अनेक रूपों में आया है, पर ऐसा रूप तो अभी तक नहीं देखा है। कोई बात नहीं, विष्णु बड़ा जादू-टोना कर लेता है, नए रूप में आ जाएगा, कुछ फर्क नहीं पड़ेगा।”
दुर्योधन भी क्या करता है? जब कृष्ण ने अपना इतना बड़ा विश्वरूप दिखा दिया होता है, तो क्या दुर्योधन की वृत्ति बदल जाएगी? तो दुर्योधन की वृत्ति बदलती नहीं है। उल्टा वो पांडवों को, शकुनि का पुत्र जो होता है उलूक, उससे संदेश भेजता है हर एक पांडव को उकसाने के लिए। “भीम! तुम तो खुद को बड़े शक्तिशाली मानते हो, पर देखो मेरा सामर्थ्य क्या है, कि तुम जो सारे विश्व के सबसे बड़े मल्ल युद्ध के योद्धा मानते हो खुद को, तुमको मैंने एक किचन का नौकर बना दिया!” क्या होता है, भीम विराट के राज्य में, विराट के राज्य में किचन में सेवा कर रहे होते हैं। तो इस तरह सारे पांडवों का अपमान करता है।
और फिर उलूक से कहता है, “कृष्ण को बताओ, तुम कृष्ण, तुमने ये रूप दिखा के सभी लोगों को डरा दिया। पर ये रूप दिखाना कोई बड़ी बात नहीं, मैं भी बहुत से रूप दिखा सकता हूँ। तुम्हारे रूप दिखाने से युद्ध में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। युद्ध शक्ति का खेल है, और वहाँ पे हम तुम्हारा विनाश कर देंगे।”
तो ये क्या होता है? हिरण्यकशिपु ऐसे सोचता है, “ये विष्णु ने कोई रूप दिखा दिया, कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं इस पर प्रहार करके विनाश कर दूँगा।” आक्रमण करने आता है, तो वो पहले अपनी तलवार और गदा उठाता है।
तो नरसिंह देव क्या हैं? अभी जब नरसिंह देव प्रकट होते हैं, भगवान जहाँ भी आते हैं, शंख, चक्र, गदा, पद्म होते हैं। शंख, चक्र, गदा, पद्म न केवल अस्त्र हैं, पर वह व्यक्ति भी हैं। वह व्यक्ति हैं जिन्होंने वह शंख, चक्र, गदा, पद्म का रूप लिया है, और उसके अनुसार उस भूमिका को लेके वह सेवा कर रहे हैं। तो वो भी वहाँ पर प्रकट होते हैं।
पर भगवान नरसिंह देव इतने क्रोधित हैं, वो सोचते हैं… जैसे भगवान बताते हैं, “मुझे मेरे भक्तों की रक्षा करनी है, तो वो रक्षा करने के लिए मैं किसी और को नहीं भेजता, मैं स्वयं जाता हूँ।” तो इसलिए यहाँ पर जब नरसिंह देव प्रकट होते हैं, वो अपना शंख, चक्र, गदा, पद्म लिए हैं, पर वो बोलते हैं, “तुम युद्ध मत करो, मैं युद्ध करूँगा। अहम्! मैं मेरे प्रह्लाद की रक्षा करूँगा।” और इसलिए वो स्वयं आते हैं। इतने सारे उनके हाथ हैं, उनके नाखून हैं, अभी किससे प्रतिकार करें? आप सोचते हैं कि “अभी मैं वध करूँगा।” अभी पुनः वो आक्रमण करने आता है। और इस समय क्या हो रहा है? प्रह्लाद हाथ जोड़ के देख रहे हैं। वो जानते हैं कि भगवान प्रकट होने वाले हैं।