Srila Prabhupada expert presentation of the Bhagavatam – Hindi
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Lecture Summary
- 1. भगवान की इच्छा की प्रधानता और निष्काम कर्म: भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर महाराज को समझाया कि भौतिक सुख-दुख पर शोक करने के बजाय भगवान की इच्छा के अनुसार अपना कर्तव्य करना चाहिए। इसी से अंततः सबका कल्याण होता है।
- 2. वैष्णव संस्कृति बनाम वैदिक संस्कृति: युधिष्ठिर महाराज के शासन में जो अभूतपूर्व समृद्धि आई, वह शुद्ध भक्ति (वैष्णव संस्कृति) का परिणाम थी। यह केवल कर्मकांड आधारित (वैदिक संस्कृति) से भिन्न और श्रेष्ठ है।
- 3. प्रकृति द्वारा भगवान को ‘कर’ (Tax) देना: श्रील प्रभुपाद जी ने भागवतम् के श्लोकों की व्याख्या करते हुए बताया कि जैसे मनुष्य सचेत रूप से सरकार को कर चुकाते हैं, वैसे ही प्रकृति (पेड़, पौधे, नदियां, पर्वत) भी भगवान की इच्छा के अनुसार फल-फूल कर अपना कर्तव्य (कर) पूरा करती है। मनुष्य को भी इसी तरह भगवान की इच्छा के अधीन कार्य करना चाहिए।
- 4. शास्त्रों के सही अनुवाद का महत्व (Text vs Context): शास्त्रों का अनुवाद केवल शब्दकोश (Dictionary) या व्याकरण (Accuracy) के आधार पर नहीं किया जा सकता। आचार्यों का अनुवाद सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वे शब्दों के साथ-साथ आधुनिक समाज के लिए उसकी प्रासंगिकता (Relevance) को भी समझाते हैं। जो विज्ञान को जीता है, वही उसे सही से समझा सकता है।
- 5. आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की आलोचना: आधुनिक समाज भगवान से दूर होकर मशीनों और कृत्रिम जीवनशैली (Industrialization) पर निर्भर हो गया है। यह तथाकथित प्रगति (Technology) वास्तव में मुट्ठी भर लोगों को ऐशो-आराम देती है और बहुसंख्यक लोगों को प्रदूषण व परेशानियां। ईश्वर द्वारा दी गई मुफ्त प्राकृतिक चीज़ों (जैसे नदियों का पानी) को दूषित करके उसे व्यापार बनाना कोई प्रगति नहीं, बल्कि अधोगति है। सच्चा सुख भगवान के अनुशासन में रहने में है।
Full Transcriptions
युधिष्ठिर महाराज का दुख और भीष्म पितामह की सांत्वना
हरे कृष्णा! तो आज हम श्रीमद्-भागवतम् के प्रथम स्कन्ध पे चर्चा कर रहे हैं। यहाँ पे सूत गोस्वामी और नैमिषारण्य के ऋषियों में विमर्श चल रहा है, विवरण कर रहे हैं युधिष्ठिर महाराज के दुख के बारे में और उनको कैसे भीष्म पितामह ने सांत्वना दी है। और उसके सांत्वना देने के बाद, भीष्म पितामह की सांत्वना का सार क्या था? कि भगवान की इच्छा के अनुसार आप कार्य करो। कितने लोगों को दुख हुआ है, कितने लोगों को सुख हुआ है, यह आप इसका तर्क करते रहोगे तो फिर भौतिक स्तर पे यह आपको कभी सत्य तक नहीं ले जा सकता है। अगर आप भगवान की इच्छा में लगे रहोगे तो फिर सब का अंततोगत्वा कल्याण हो जाएगा।
युधिष्ठिर महाराज का समृद्ध राज्य और वैदिक संस्कृति
और फिर उस सांत्वना को प्राप्त करके तो महाराज युधिष्ठिर राज्य करने लग गए। तो फिर वही राज्य जिसमें कोटि-कोटि लोगों की मात्रा में ऐसा विध्वंस हुआ था कि ‘न भूतो न भविष्यति’, न पहले कभी हुआ था, कुछ ही सालों में वही राज्य इतना समृद्ध हो गया कि विश्व के इतिहास में ऐसी समृद्धि अगली बार नहीं थी। ऐसा नहीं है कि प्राचीन काल में हमेशा ही भक्ति थी और भक्त ही भक्त राजा थे। प्राचीन काल में भी, जब चित्रकेतु का, महाराज चित्रकेतु का वर्णन आ रहा है, वृत्रासुर का, चित्रकेतु का, जा रहे थे:
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने
कि तभी भक्त बहुत कम थे। और पूर्व के काल में भी जिसे हम राम राज्य कहते हैं, या प्रभुपाद जी हम युधिष्ठिर महाराज का राज्य या परीक्षित महाराज का राज्य कहते हैं, यह प्राचीन काल में वैदिक संस्कृति थी। पर संपूर्ण वैदिक संस्कृति, ये वैष्णव संस्कृति नहीं थी। दोनों में फर्क है। वैदिक संस्कृति ये अधिकांश रूप से कर्मकांड के भाव में चलती है, पर वैष्णव संस्कृति ये शुद्ध भक्ति के भाव में चलती है। तो फिर यहां पे युधिष्ठिर महाराज राज्य कर रहे थे, तो प्रचुर मात्रा में समृद्धि आ गई और इस समृद्धि के कारण जो भी दुख था, वो सब चला गया।
महाभारत और श्रीमद्-भागवतम् का प्रसंग
महाभारत में वर्णन आता है कि जो दो पर्व हैं, स्त्री पर्व है जिसमें सारे जो योद्धा हैं, उनकी पत्नियां हैं, उनकी माताएं हैं, उनकी कन्याएं हैं, उनकी बहनें हैं, वहाँ सब विलाप करते हैं कि इतने सारे लोगों की मृत्यु हो गई, इसका विस्तारित वर्णन है। पर उसके बाद में शांति पर्व जो है, उसमें भीष्म पितामह उपदेश देते हैं, और उसके बाद में जो घटनाएं हो रही हैं, वो यहाँ पर वर्णन हो रही हैं।
तो फिर इसके बाद में जो भागवतम में, महाभारत का अधिकांश वर्णन नहीं है। महाभारत का अठारह पर्व, उसमें से कुछ-कुछ घटनाओं का वर्णन भागवतम में आता है। तो यहाँ पर जो सातवें अध्याय से चालू होता है, और यह इस स्कन्ध के अंत तक जो जाएगा उन्नीसवें अध्याय तक, वह महाभारत का एक वर्णन आता है। और फिर दशम स्कन्ध में दो बार आता है वर्णन — एक उन्नीसवें अध्याय में, 49वें अध्याय में और फिर 70-75 अध्याय में। उसके अलावा महाभारत में जो इतिहास बताया गया है, वो भागवतम को पता है, पर भागवतम और उसका ज्यादा बार ओवरलैपिंग, उसको वही बात दूसरी बार नहीं बतायी जा रही है। पर जो भागवतम में बताया जाता है, वो शुद्ध भक्ति की दृष्टि से बताया जाता है। और यहाँ पर जो समृद्धि आ गई है, उसका वर्णन हो रहा है।
ऐतिहासिक माहौल और प्रभुपाद जी के तात्पर्य
और यहाँ पर हम प्रभुपाद जी, जो हम पहला स्कन्ध प्रभुपाद जी ने भारत से अमेरिका जाने के पहले लिखा, और वह तीन विभागों में पहले छपा था। तो वास्तव में 1962 में पहला छपा उन्होंने, 1963 में दूसरा विभाग पहले स्कन्ध का, और 64 में। जो ऐतिहासिक माहौल क्या था? कि भारत जो पारंपरिक संस्कृति थी, वह अभी स्वेच्छा से छोड़ रहा था। इसके पहले जब मुसलमान लोगों का राज्य था और फिर ब्रिटिश लोगों का राज्य था, उससे काफी हद तक वैदिक संस्कृति को हानी हुई थी। पर जो भारत जो अधिकांश रूप से ग्रामीण भागों में रह कर, जो खेती के आधार पर जी रहा था, उसको अमेरिकन, उसको ब्रिटिश लोगों ने ज्यादा बदला नहीं।
उनकी ये इच्छा नहीं थी कि भारत इंडस्ट्री बनाये। उनकी इच्छा थी कि भारत हमको रॉ मटेरियल (Raw Material) दे, भारत हमको पदार्थ दे, और हम हमारी इंडस्ट्री में वो बनाएंगे, और फिर भारत वो खरीदे। ताकि हमारी जो इकॉनमी (Economy) है, हमारी जो अर्थयंत्रणा है, वह विकास हो और भारत का विकास न हो। पर वो जो पद्धति थी प्रगति की, वह पद्धति का अनुकरण भारतीय नेताओं ने करने का फैसला किया। और उसके कारण भारतीय नेताओं ने जो ग्रामीण संस्कृति थी, ग्रामीण जो किसान उसको त्याग रहे थे।
और प्रभुपाद जी, वो जो पाश्चात्य देशों का प्रभाव था, तो अभी जो हम शहरों में प्रभाव देखते हैं—वहां क्या अश्लील चित्र वगेरे वहां सब आ गये हैं, वहां सब इतना नहीं था—पर तभी जो प्रभुपाद जी विशेष चर्चा कर रहे हैं, वह क्या है? कि किस प्रकार से मानव इंडस्ट्रीज (Industries) की ओर जा रहा है और निसर्ग से दूर जा रहा है, और फिर इसके खिलाफ प्रभुपाद जी बोल रहे हैं।
शास्त्रों के शाश्वत सिद्धांत और ज्ञान मार्ग का खण्डन
तो जो आचार्य होते हैं, शास्त्रों के सिद्धांत जो होते हैं, वह शाश्वत होते हैं। पर उनका जो व्यावहारिक अमल करना होता है, वह अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग होता है। इसलिए हम देखते हैं कि हर एक शास्त्र का एक जोर होता है, वह उसके भाव के अनुसार।
अगर हम भगवद्गीता में देखेंगे तो जो ज्ञान-मार्ग है—ज्ञान-मार्ग मतलब कि आप संसार को त्याग करके जंगल में जाके तपस्या करो और परंब्रह्म चिंतन करो—यह ज्ञान-मार्ग कहीं भी उल्लेख नहीं है। लगभग हर जगह पर जहां पे आता है, उसका खंडन है। तो वैदिक शास्त्रों में ज्ञान-मार्ग है, और अगर हम उद्धव-गीता पढ़ते हैं जो ग्यारहवें स्कन्ध में आती है, छठे अध्याय से तीसवें अध्याय तक, उसमें ज्ञान-मार्ग का बहुत गुण-गान है। क्यों गुण-गान है वहाँ पे? वहाँ पे चक्रवर्ती पाद बताते हैं कई अध्याय ज्ञान-मार्ग पे, और वहाँ पे चक्रवर्ती पाद बताते हैं कि जो ज्ञान-मार्ग है, वहाँ जिनको भक्तों का संग मिलके भक्ती करने का मौका नहीं मिला है, उनके लिए बहुत उत्कृष्ट है। वहाँ मतलब किसी तरह से आप भौतिक जगत से तो निकल जाओ।
तो ऐसा भेद क्यों है? कृष्ण ही भगवद्गीता बोल रहे हैं, कृष्ण ही उद्धव गीता बोल रहे हैं, पर यह भेद क्यों है? क्योंकि संदर्भ अलग है। संदर्भ क्या है? जब कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं, तो उस समय जोर यह है कि अर्जुन को अपना कर्तव्य करना है। और उस समय का जो कर्तव्य है, उसके लिए ज्ञान मार्ग जो है, वहाँ बिल्कुल विपरीत है। इसलिए भगवान दो ही चीज़ बोलते हैं, या तो आप कर्मयोग करो या भक्ति करो। भगवान ज्ञान मार्ग का पूरी तरह से खंडन करते हैं। जहां भी आता है, उसको वो कहते हैं वो अति मिथ्याचारी बन जाएगा:
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्
बहुत कुछ बोलते हैं उसके बारे में। बहुत सब सत्य है, पर इसका मतलब अगर आप सिर्फ भगवद्गीता पढ़ेंगे, तो ऐसा लगेगा जो ज्ञान मार्ग पूरा निकम्मा मार्ग है। पर ऐसे नहीं है, उसमें बहुत शक्ति है, और वो उद्धव गीता में हम देखते हैं।
उद्धव गीता और श्रीमद्-भागवतम् का संदर्भ
उद्धव गीता का संदर्भ क्या है? वहाँ पे अभी यदु वंश का नाश हो गया है, वो बाह्य रूप से नाश हो गया है, अंतरंग से भगवान ने उनको भगवान धाम ले गए हैं। तो तभी भगवान की इच्छा है कि उद्धव विरक्त हो जायें, और जो विलाप हो गया है वो छोड़ के आध्यात्मिक तत्वों के चिंतन में लग जायें। और उस संदर्भ के लिए क्या है? अगर भक्ती उत्कृष्ट नहीं है, तो फिर ज्ञान मार्ग उत्कृष्ट है।
और वही भाव जो भागवतम का बड़ा संदर्भ है, वह क्या है? शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज को सारे भौतिक आसक्ति और भव बंधन से विरक्त कराना चाहते हैं। इसलिए अगर हम भागवतम देखेंगे, तो भागवतम में ज्यादा कर्मयोग का गुनगान नहीं किया गया। भागवतम हम देखेंगे तो फिर वहाँ पर जो हर प्रकार से गृह बंधन है, भौतिक बंधन है, उससे कैसे निकलना है, उसका वर्णन किया गया है। अभी दोनों भगवद्गीता और भागवतम में जो बताया गया है, वह शाश्वत सत्य है, पर शाश्वत सत्य का जो अमल करना है वो परिस्थिति के अनुसार होता है।
प्रभुपाद जी का अनुवाद और प्रकृति द्वारा कर (Tax)
तो उसी तरह से शाश्वत सत्य जो है, अभी जिस प्रकार का तात्पर्य प्रभुपाद जी ने इस श्लोक को दिया है, अगर हम चक्रवर्ती पाद या श्रीधर स्वामी या पूर्व आचार्यों के तात्पर्य को देखेंगे, तो उन्होंने किसी ने इस श्लोक में इंडस्ट्रियलाइजेशन (Industrialization) के बारे में उल्लेख नहीं किया है। क्योंकि उस समय वह समस्या नहीं थी, उस समय वह संदर्भ नहीं था। और प्रभुपाद जी की विशेषता ऐसी है कि वह अपना जो तात्पर्य देते हैं, कई बार वह केवल तात्पर्य में नहीं देते हैं, वह भाषांतर में भी तात्पर्य देते हैं।
तो यह भाषांतर में तात्पर्य क्या है? प्रभुपाद जी कहते हैं कि जो वनस्पति है:
नद्यः समुद्रा गिरयः सवनस्पतिवीरुधः।
यह सब क्या कर रहे हैं? वह राजा को कर दे रहे हैं। अभी ‘कर’ (Tax) के लिए संस्कृत में कोई शब्द नहीं है यहाँ पे। यहाँ पे क्या है शब्द? नद्यः समुद्रा गिरयः सवनस्पतिवीरुधः। यह सब वस्तुएं बता रहे हैं। वो सब क्या दे रहे हैं?
फलन्त्योषधयः सर्वाः
तो यह सब फलन्ति, फल रहे हैं अच्छी तरह से। और क्या कर रहे हैं?
काममन्वृतु तस्य वै
तस्य मतलब राजा के लिए, वै मतलब जरूर, काममन्वृतु—वह उनकी इच्छाएं, यहाँ पे काम का अर्थ वासनाओं के रूप में नहीं है, तो वह सब पूरी हो रही हैं। तो कोई सिर्फ अगर संस्कृत भाषा के आधार पर जाएगा तो कहेगा कि यहाँ पे कर का कोई संदर्भ ही नहीं है, यहाँ पे प्रभुपाद जी ने कर कैसे डाल दिया है?
पर प्रभुपाद जी जो आधुनिक समाज है, आधुनिक संस्कृति सभ्यता जो है, जो भगवान और भगवान की सरकार और भगवान की योजना से दूर चली गई है, उनको भगवत् चेतना का महत्व बता रहे हैं। और इसलिए प्रभुपाद जी बता रहे हैं कि जो दिव्य योजना है जिसमें सारी सृष्टि है, वह भगवान से संबंधित है। और वह संबंध केवल एक तात्विक रूप पे नहीं है, वह व्यावहारिक रूप पे है। तो जो सृष्टि है, वह जो भी उत्पन्न करती है, वह भगवान के लिए उत्पन्न करती है। और युधिष्ठिर महाराज, इसे प्रभुपाद जी तात्पर्य के पहले ही वाक्य में बताते हैं, युधिष्ठिर महाराज अजित (भगवान) के प्रतिनिधि के रूप में राज्य कर रहे हैं, तो इसलिए उनको, वह कर के रूप में प्रदान कर रहे हैं।
मानव और प्रकृति: भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य
तो साधारणतया, विचार करेंगे तो जो कर होता है, वह साधारणतया मानव को देना पड़ता है। जैसे शास्त्र है, वह मानवों के लिए है। शास्त्र में जो नियम बताये गए हैं, विधिविधान बताये गए हैं, वह सब मानवों के लिए हैं। तो अगर एकादशी है, और उस दिन एक बिल्ली, अगर एक चूहे को देखती है, तो भी नहीं सोचेगी, “आज मुझे उपवास करना चाहिए, आज एकादशी है।” क्यों? क्योंकि वो बुद्धि नहीं है। वो जो विवेक बुद्धि है, जो स्वयं की वासनाओं (Instincts), प्रवृत्तियों को नियंत्रण करना, वह जानवरों के लिए संभव नहीं है। जैसे जानवरों के लिए संभव नहीं है, वैसे वह फलों, फूलों, लताओं, उनके लिए भी संभव नहीं है।
तो मानव जो होते हैं, जो कर देते हैं, शास्त्रों के नियम का पालन करते हैं, वह सचेत भाव से करते हैं। तो जानवर जो हैं, वह अचेत भाव से, प्रायोगिक रूप से—मतलब उनके शरीर की यंत्रणा इस तरह से है कि वह अपने आप कार्य करते हैं। प्रभुपाद जी उदाहरण देते हैं कि शेर कितना भी भूखा होगा, वह कभी घास नहीं खाएगा। ऐसे नहीं है… जो शेर मानवों से दूषित हो जाते हैं… पर जो कुत्ते मानवों के संग से दूषित हो जाते हैं, वह कुत्ते भी सिगरेट फूंकने लगते हैं! ऐसे होता है।
वास्तव में, जो मानव होते हैं, वह सोचते हैं कि मुझे सिगरेट फूंकना है। परदेश में, अमेरिका में, यूरोप में, लोगों को कुत्ता बहुत प्रिय है। तो जो भी वह करना चाहते हैं, वह कुत्ते को भी कराना चाहते हैं। तो खुद सिगरेट फूंकते हैं, और कुत्ते को भी सिगरेट फूंकाना चाहते हैं। वैसे अभी परदेश में योगा बहुत लोकप्रिय हो गया है। अमेरिका में हर दस लोगों में से एक व्यक्ति ने योगा में रजिस्टर्ड कोर्स किया है, और अनेक लोग योग शिक्षा कर रहे हैं। तो उनका कुत्ता भी प्रिय है, तो उन्होंने कुत्ते के लिए योगा की एक प्रक्रिया निकाली है, उसको कहते हैं ‘डोगा’ (Doga – Yoga for dogs)। तो ये डोगा है, यहां बहुत विशाल मात्रा में चल रहा है। लोग योग करते हैं, और अपने कुत्ते को भी योगासन करने में लगा देते हैं।
तो उसी तरह से, अगर सर्कस में या जू (Zoo) में शेर को रखते हैं, तो शेर को कुछ खाने को नहीं मिल रहा है, तो जो भी खाने को मिल जाएगा, वो खा लेगा। तो तभी उसको घास भी खिलाया जाता है, पर वो स्वाभाविक रूप से शेर ऐसे नहीं करेगा, क्योंकि उनको वो बुद्धि नहीं, जिस तरह से शरीर की यंत्रणा चलती है। पर प्रभुपाद जी यहाँ पर क्या बता रहे हैं हमको? कि जिस तरह से ये पेड़, लताएं, ये सब कर दे रहे हैं, उसका अर्थ ये है कि वे सब भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य कर रहे हैं। तो जैसे वे सब भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य कर रहे हैं, उस तरह से हम सब को भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य करना चाहिए, वह भाव है यहाँ पर।
शास्त्र का टेक्स्ट (Text) और कॉन्टेक्स्ट (Context)
तो इसलिए, जब किसी का भाषांतर करना होता है, तो भाषांतर केवल दो भाषाओं की डिक्शनरी को जानने से नहीं किया जाता है। जो शास्त्र होता है, उसका टेक्स्ट (Text) होता है, और उसका कॉन्टेक्स्ट (Context) होता है। टेक्स्ट मतलब, उसका श्लोक है, जो बताया गया है, पर उसका संदर्भ जो है, बहुत महत्वपूर्ण है। और प्रभुपाद जी की ये दक्षता बार-बार हम देखते हैं। भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में जब छठा श्लोक आता है:
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः
तो वहाँ पर जो बताया गया है कि वो जो आध्यात्मिक जगत है, ‘न तद्भासयते सूर्यो’, वहाँ पर सूर्य से रोशनी नहीं आती है, ‘न शशाङ्को न पावकः’, वहाँ पर चंद्र नहीं है, वहाँ पर अग्नि नहीं है। तो वहाँ पर प्रभुपाद जी इलेक्ट्रिसिटी (Electricity) भी डाल देते हैं। तो अभी इलेक्ट्रिसिटी कहां से आ गई? कोई कहेगा वहाँ पर कोई विद्युत शब्द नहीं है। कुछ भक्त बोल सकते हैं कि तैत्तिरीय उपनिषद में ऐसा ही श्लोक है और उसमें विद्युत है, इसलिए प्रभुपाद जी वहाँ से यहां पर डाल रहे हैं, वो चल सकते हैं। पर यहां पर तो नहीं है, पर यहां पर प्रभुपाद जी क्यों डाल रहे हैं?
क्योंकि शास्त्र जो है, वह केवल एक निर्जीव ग्रंथ नहीं है, वह एक सजीव ग्रंथ है। कि गीता जो है, वो केवल एक डिक्शनरी से नहीं जानी जा सकती। जो सार्वकालिक रूप से यहाँ जीते हैं, उनके जीवन से सार्वकालिक जीते हैं। तो इसलिए शास्त्र को समझना है तो वह केवल एक डिक्शनरी के ज्ञान से समझा नहीं जाता है। तो प्रभुपाद जी शास्त्र का जो मर्म है वह आधुनिक समाज को समझा रहे हैं।
कृत्रिम संस्कृति और शास्त्रों की प्रासंगिकता (Relevance)
अभी आधुनिक समाज में जब लोग रहते हैं, तो कई बार लोग हमेशा कृत्रिम पद्धति से रोशनी प्राप्त करते हैं। कृत्रिम पद्धति से रोशनी प्राप्त करना मतलब इलेक्ट्रिसिटी है, बल्ब है। अमेरिका में एक सर्वे किया गया था शालेय विद्यार्थियों का, पूछा गया कि दूध कहां से आता है? तो उन्होंने बताया, “दूध हमारे फ्रिज से आता है।” तो उनको पता ही नहीं दूध कहां से आता है! दूध कहां से आता है? फ्रिज से आता है। फ्रिज में कहां से आता है? मार्केट से आता है, और कहां! पता ही नहीं। तो जो इतनी कृत्रिम संस्कृति में लोग जी रहे हैं, तो जो प्रकृति में गूढ़ एक-दूसरे से संबंध है, और उससे भगवान से संबंध है, वो लोगों को पता नहीं है।
तो इसलिए प्रभुपाद जी, जो आधुनिक संस्कृति में लोग इतना सूर्य या चंद्र या अग्नि की रोशनी पर निर्भर नहीं हैं, वहाँ विद्युत, वहाँ इलेक्ट्रिसिटी पर निर्भर हैं। तो प्रभुपाद जी के श्लोक बताने का भाव क्या है? कि आध्यात्मिक जगत में कोई भी कृत्रिम पद्धति की ज़रूरत नहीं है। रोशनी के लिए किसी भी चीज़ पर निर्भर नहीं हैं, क्योंकि हर एक चीज़ स्व-प्रकाशवान है, स्व-तेजस्व है।
उसी तरह से सातवें स्कन्ध में प्रह्लाद महाराज की शिक्षाएं जब आती हैं, तो वहां बताते हैं प्रह्लाद महाराज कि मेरी इंद्रियां जो हैं, मुझे हर जगह खींच रही हैं। मेरी आंखें एक जगह खींच रही हैं, मेरी जीभ दूसरी जगह खींच रही है, कर्ण अन्य जगह खींच रही हैं। तो वहां पे प्रभुपाद जी भाषांतर में लिखते हैं कि जो कान हैं, वह फिल्मी सॉन्ग (Filmy song) की ओर आकर्षित हो जाते हैं। तो अभी प्रह्लाद महाराज के समय तो कोई फिल्मी सॉन्ग नहीं थे। तो एक्यूरेसी (Accuracy) मतलब जो है कि बिल्कुल ठीक तरह से भाषा या व्याकरण के भाव से सही-सही बताना। और रेलेवेंस (Relevance) मतलब जो इसके लिए बताया जा रहा है, वह किस तरह से उनके जीवन से संबंधित है, उसे किस तरह से अमल करना है। वास्तव में ये दोनों का समन्वय रखना बड़ा मुश्किल है।
भाषांतर की कला और आचार्यों का महत्व
तो जो केवल संस्कृत जानते हैं और अंग्रेजी जानते हैं, वह भाषांतर कर सकते हैं। पर उनका जो भाषांतर होगा, वह एक्यूरेसी में आ जाएगा, संस्कृत की दृष्टि से उचित होगा, पर लोगों को व्यावहारिक रूप से उसका क्या फायदा है, वह पता नहीं चलेगा। तो इसलिए शास्त्र जो सीखना है, वह वास्तव में जो उसको जी रहे हैं, उनके अनुसार सीखना है, नहीं तो फिर हम ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते हैं।
जैसे मान लीजिये कि चाइना में एक प्राचीन दवाई की पद्धति है, और उस दवाई की पद्धति से कई लोगों की आजकल जो बीमारियां हैं वो ठीक हो सकती हैं। एक डॉक्टर है जो 40-50 साल से उस ग्रंथ के अनुसार दवाई देकर लोगों को ठीक कर रहा है। वह डॉक्टर अंग्रेजी सीखता है, और उस ग्रंथ को अंग्रेजी में भाषांतरित करता है। और दूसरा व्यक्ति है, अंग्रेजी उसकी मातृभाषा है, वह चाइनीज सीखता है, दक्ष हो जाता है, और वह चाइनीज से अंग्रेजी में भाषांतरित करता है। भाषा की दृष्टि से, यह व्यक्ति स्कॉलर है, उसका भाषांतर अधिक उचित होगा। पर व्यावहारिक रूप से अगर मैं बीमार हूँ और मुझे दवाई लेनी है, तो मैं किस पे विश्वास करूँगा? डॉक्टर ने जो किया है, क्योंकि डॉक्टर ने उस विज्ञान के अनुसार वो जिया है, लोगों को ठीक किया है और वह जानता है।
तो ये जो संस्कृत लोग जो जानते हैं, उनका ये मिथ्या भाव होता है कि सिर्फ एक भाषा जान ली, तो उस भाषा में जो भी लिखा है, उस पे हमने प्रभुत्व पा लिया। ऐसे नहीं है। अगर मैं इंग्लिश जानता हूँ, तो सिर्फ इंग्लिश जानने से मैं विज्ञान (Physics) का ग्रंथ नहीं जानता हूँ। तो जैसे भौतिक विज्ञान का ग्रंथ हम नहीं जानते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक विज्ञान का ग्रंथ, सिर्फ भाषा के प्रभुत्व से जाना नहीं जाता है। वह जानने के लिए उस विषय में निपुणता चाहिए होती है। इसलिए आचार्यों के भाषांतर, आचार्यों के तात्पर्य बहुत महत्वपूर्ण हैं।
आधुनिक समाज की विडंबना और तथाकथित प्रगति
तो इसलिए प्रभुपाद जी जो ‘कर’ उन्होंने भाषांतर किया है, उसका भाव है, वो दर्शा रहे हैं कैसे आज मानव समाज भगवान के अनुशासन से दूर जा रहा है। और वह बता रहे हैं कि आधुनिक सभ्यता सोचती है कि हम जितने औजारों में, टेक्नोलॉजी में, यंत्रों में प्रगति कर लेंगे, उसके द्वारा हम अधिक समृद्ध हो जाएंगे। भगवान की ज़रूरत नहीं है, आध्यात्मिक चेतना की ज़रूरत नहीं है, केवल हमें तंत्रज्ञान में प्रगति करनी है और बड़े-बड़े इंडस्ट्री बनाने हैं।
तो इसका फल क्या हुआ है? प्रभुपाद जी ने जब ये तात्पर्य लिखे थे, अभी उसको 50 साल हो गए, तो उनके तात्पर्य हम एक भविष्यवाणी के रूप में देख सकते हैं। तो क्या दिख रहा है? सारे विश्व भर में ये समस्या है कि जो अमीर और गरीब लोग हैं, उनमें जो भेद है वो बढ़ते जा रहा है। और ये न केवल भारत में है, सारे विश्व भर में है। पिछले एक-दो साल से जो अरब देश हैं, उनमें हर एक देश में क्रांति हो रही है, हत्या होती है, हिंसा होती है। क्योंकि इन देशों में जो धन संपत्ति है, वह सिर्फ कुछ लोगों के पास है।
उसी तरह से अमेरिका में भी एक बड़ा आंदोलन चल रहा है, उसको ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ (Occupy Wall Street) कहते हैं। अमेरिका में अमीर लोगों में बहुत संपत्ति है, और बहुत से लोग ऐसे हैं कि कार लग्ज़री नहीं मानी जाती, कार जरूरत है। तो कई लोग ऐसे हैं जिनके पास घर नहीं है पर कार है, तो लोग अपनी कार में ही रहते हैं। शहर के बाहर बड़ा कोई ग्राउंड है, वहाँ रात को सैकड़ो कार आ जाते हैं, और कार में ही लोग रहते हैं।
तो प्रभुपाद जी यहाँ पे तात्पर्य में क्या बता रहे हैं? कि जहाँ पे फैक्ट्रियां तथा औजारों पर आश्रित रह कर जीने की कृत्रिम शैली से कुछ ही व्यक्तियों को, लाखों की लागत पर तथाकथित सुख प्राप्त हो सकेगा। ‘टेक्नोलॉजी गिव्स लग्जरीज फॉर फ्यू एंड मिजरीज फॉर मेनी’ (Technology gives luxuries for few and miseries for many)। तंत्रज्ञान क्या करता है? जो ऐशोआराम है, कुछ लोगों को देता है। कितने प्रतिशत लोग कार ले सकते हैं? एक प्रतिशत, पांच प्रतिशत। उससे अधिक लोगों के पास कार आ जाएंगे, तो भारत जैसे देशों में सड़क ही बंद हो जाएगी, हो रहा है कई शहरों में ऐसे। पर कार से जो धुआं निकलता है, प्रदूषण कितने लोगों को होता है? अधिकांश लोगों को उससे प्रदूषण होता है।
उसी तरह से अभी कई जगह पे सरकार क्या कर रही है? नदियां भगवान ने दी हैं, पर जब सरकार के पास पैसा नहीं है, तो वो नदियां प्राइवेट कंपनी को बेच देती है। प्राइवेट कंपनी नियम बनाती है कि “यह नदी हमारी संपत्ति है, कोई भी पानी नहीं ले सकता है।” तो लोग मानते नहीं हैं। तो कंपनी क्या करती है? पानी में जहरीले रसायन डाल देती है। और फिर उसके बाद में वो प्लांट (Plant) बनाते हैं, जहरीले रसायन निकालते हैं, और फिर वो पानी बेचते हैं।
तो यह क्या है?
या निशा सर्वभूतानां
पूरी कुबुद्धि है यह! तो भगवान ने जो मुफ्त (Free) दिया है, वहाँ दूषित करके, फिर उसको शुद्ध करने की यंत्रणा बनाना, और उसको हम क्या कहते हैं? प्रगति कहते हैं! तो कई बार घरों में जो फिल्टर आ जाता है, जो आरओ (RO) फिल्टर होता है। तो ऐसा चुनाव किया है जिससे अधोगति हुई है, और फिर जो अधोगति का हम निवारण करते हैं उसको हम प्रगति कहते हैं!
कुर्वन् दुःखप्रतीकारं सुखं मन्यते गृही
कपिल देव अपनी शिक्षाओं में बताते हैं।