Winning the Race Against Time – New Year Eve class (Hindi)
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Lecture Summary
यह व्याख्यान नव वर्ष के अवसर पर आध्यात्मिक दृष्टिकोण, भावनाओं के सही उपयोग और भगवान की अनन्य भक्ति की महिमा पर गहराई से विचार करता है। पूरे प्रसंग के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- नव वर्ष का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण: विज्ञान के अनुसार समय एक अंतहीन चक्र है, इसलिए नव वर्ष का कोई भौतिक महत्व नहीं है। हालाँकि, भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह एक बहुत महत्वपूर्ण अवसर है। यह हमें एक नया संकल्प लेने और अपनी चेतना को भगवान की ओर मोड़ने की प्रेरणा देता है।
- भावनाओं का दमन नहीं, शुद्धिकरण: शून्यवादी या भौतिकतावादी लोग भावनाओं को खत्म करने का प्रयास करते हैं। लेकिन रामायण में भगवान राम और लक्ष्मण के प्रसंग (भरत के आगमन पर) से यह स्पष्ट होता है कि भावनाएं जीवन का अलंकार हैं। इन्हें दबाने के बजाय, हमें अपनी भावनाओं को भगवान और धर्म की दिशा में लगाना चाहिए।
- हृदय का असली खजाना: शास्त्र हमें बताते हैं कि हमारा सबसे बड़ा और शाश्वत खजाना कोई भौतिक संपत्ति नहीं है, बल्कि हमारे हृदय में स्थित भगवान और उनके प्रति हमारा प्रेम है। भगवान अत्यंत आकर्षक और कृपालु हैं, और उनसे जुड़ना ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
- महाभारत का प्रसंग (भगवान का अद्भुत मार्गदर्शन): अर्जुन द्वारा जयद्रथ वध के संकल्प का विस्तार से वर्णन किया गया है। जब अर्जुन के मार्ग में द्रोणाचार्य, सुदक्षिण, कृतवर्मा और कौरवों की विशाल सेना जैसी असंभव बाधाएं आईं, तब भगवान कृष्ण ने सारथी के रूप में अपने भक्त की रक्षा की। यह प्रसंग सिखाता है कि जीवन में कई बार परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं, लेकिन भगवान पर पूर्ण विश्वास रखकर हमें अपना प्रयास जारी रखना चाहिए।
- भक्ति के तीन बड़े आश्वासन: श्रील बलदेव विद्याभूषण के अनुसार, एक भक्त के पास सफलता के तीन पक्के आश्वासन होते हैं:
- शास्त्र: शास्त्र गारंटी देते हैं कि जीवन भर स्मरण करने से अंत समय में भगवान की स्मृति अवश्य आती है।
- भक्ति की शक्ति: भक्ति मन की प्रवृत्ति को बदल देती है। जैसे रूस (Russia) के प्रसंग में बताया गया कि कैसे बिना भाषा या अर्थ जाने भी, केवल हरिनाम संकीर्तन ने लोगों को उच्च आध्यात्मिक आनंद प्रदान किया।
- स्वयं भगवान का संरक्षण: भगवान अपने भक्त को कभी नहीं छोड़ते। अमेरिका के उस भक्त का उदाहरण दिया गया, जिसकी जान एक शार्क (Shark) से केवल इसलिए बच गई क्योंकि संकट के समय उसके मुख से स्वतः नृसिंह आरती निकल पड़ी थी।
- निष्कर्ष और नव वर्ष का संकल्प: व्याख्यान का अंत भगवद्गीता (10.41) के श्लोक के साथ होता है, जो यह याद दिलाता है कि इस संसार में जो कुछ भी सुंदर, ऐश्वर्यवान या आकर्षक है, वह भगवान के तेज का ही एक अंश है। इसलिए, नव वर्ष का सबसे श्रेष्ठ संकल्प यही है कि हम दुनिया के प्रति अपने सारे आकर्षण को समेटकर उसे केवल भगवान के चरणों में एकाग्र करें।
Full Transcriptions
नौ वर्ष का प्रसंग है। भगवान की लीलाएं हैं और भगवान का स्मरण है, वह किस तरह से हमेशा नव वर्ष का आस्वादन कराता है। इसके बारे में हम चर्चा करेंगे। जब भी नव वर्ष आता है तो लोग कहते हैं, हैप्पी न्यू ईयर (Happy New Year)। तो उसका भाव होता है कि अभी एक नया वर्ष आने वाला है और उस नए वर्ष में हमें आनंद मिलेगा। ऐसी शुभ इच्छा हम व्यक्त करते हैं।
नया वर्ष: एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण
पर साधारणतया अगर जो साल गया है उसमें अगर हम इसको एक वैज्ञानिक दृष्टि से देखेंगे, तो फिर एक नया वर्ष मतलब वास्तव में क्या है? क्या है कि पृथ्वी और सूरज एक जगह होते हैं और एक चक्र पूरा हुआ है। और अगर हम जैसे नारद मुनि कंस को बताते हैं कि अगर आप एक चक्र लेते हैं तो चक्र की शुरुआत कहां है और अंत कहां है? चक्र जो है गोल है, उसकी ना कोई शुरुआत है ना कोई अंत है। तो उसी तरह से वास्तव में, अगर हम केवल वैज्ञानिक दृष्टि से देखते हैं तो अगर भौतिक शास्त्र के अनुसार जो पृथ्वी है, सूरज की ओर गोल घूम रही है तो जो एक गोल घूम रही है, उसकी शुरुआत कहां है और उसका अंत कहां है? तो इसलिए उस दृष्टि से देखेंगे, तो नव वर्ष का कोई महत्व नहीं है।
पर वह केवल एक दृष्टि है देखने की, और जो विज्ञान की दृष्टि है, वह अपूर्ण दृष्टि है। अपूर्ण क्यों है? क्योंकि अगर हम मेडिकल साइंस (Medical Science) देखते हैं जो इसमें दवाइयां देते हैं, ऑपरेशन (Operation) करते हैं, सर्जरी (Surgery) करते हैं तो पूरे मेडिकल साइंस का उद्देश्य क्या है? कि लोगों का दर्द दूर करें। पर अगर किसी को दर्द हो रहा है, तो कितना दर्द हो रहा है यह मापने के लिए कोई मीटर (Meter) नहीं है। किसी को फ्रैक्चर (Fracture) हो गया है, तो वह चिल्ला रहा है, कोई दर्द मीटर डालकर कितना दर्द हो रहा है, देख नहीं सकते हैं। हम थर्मामीटर (Thermometer) से कितना तापमान (Temperature) है देख सकते हैं, हम वजन कांटे पर कितना वजन है देख सकते हैं। जो भावनाओं का जगत है, वह विज्ञान के परे है। सारी जो अलग-अलग प्रकार की भावनाएं हैं, वह विज्ञान समझ नहीं सकता है।
भावनाओं का जगत और संकल्प
इसलिए, जब हम भावनात्मक दृष्टि से देखते हैं तो जो नव वर्ष का प्रसंग है वह महत्वपूर्ण है। महत्वपूर्ण इसलिए है कि हम इस नव वर्ष के प्रसंग में कुछ नया चालू कर सकते हैं और जब नया चालू करते हैं तो उससे कुछ नया हमें प्राप्त हो सकता है। इसलिए कई बार लोग होते हैं कि नव वर्ष के प्रसंग में कुछ रेजोल्यूशन (Resolutions) लेते हैं, कुछ संकल्प लेते हैं कि मैं यह करूंगा, वो करूंगा और उससे ऐसी अभिलाषा होती है कि ऐसा नया कुछ करने से कुछ नया मेरे जीवन में प्राप्त होगा।
और तो यह जो भावनाओं का जगत है वह अगर हमें समझना है, हम उसी जगत में जी रहे हैं। उस जगत से हमारे सारे जीवन की गति निर्धारित होती है। पर इन भावनाओं के जगत को समझना और उसकी गति को एक उचित दिशा में ले जाना, यह हमें भक्ति के मार्ग से पता चलता है। तो मैंने जो बताया था, वैज्ञानिक दृष्टि जो है वह ज्ञान का मार्ग है।
भावनाओं का दमन बनाम सही दिशा
जब कोई जन्मदिन होता है, उसका अगर कोई उत्सव मनाना है, तो जो निर्विशेषशून्यवादी जैसी विचारधारा के लोग होते हैं, जैसे बुद्धिस्ट लोग होते हैं, उनका अलग भाव होता है। कई बुद्धिस्ट लामा कहते हैं कि हम इस भौतिक जगत में इतने जन्मों से गुजर रहे हैं कि अगर हम देखेंगे तो हर एक दिन हमारा जन्मदिन हो सकता है, हर एक दिन हमारा मृत्यु दिन हो सकता है। तो फिर उसको मनाने का क्या फायदा है, क्या मतलब है? तो उनका भाव क्या है? भावनाओं को शून्य करना। तो भावनाओं को शून्य करने का भाव भौतिक जगत में भौतिक दृष्टि से हो सकता है, या आध्यात्मिक दृष्टि से हो सकता है।
पर जो वास्तविक आध्यात्मिक दृष्टि है, उसमें भावनाओं का दमन नहीं करना है, बल्कि भावनाओं को एक उचित दिशा में उजागर करना है।
रामायण का प्रसंग: भगवान राम और लक्ष्मण का संवाद
जब रामायण में वर्णन आता है, यह प्रसंग मैंने पहले भी बताया है, कि जब भरत आता है, भरत रामचंद्र भगवान को पुनः बुलाने के लिए। तो तभी लक्ष्मण और राम सुनते हैं कि कोई बड़ी आवाज आ रही है और वो देखते हैं कि सेना आ रही है। और फिर राम और लक्ष्मण देखते हैं कि भरत आ रहा है। तो लक्ष्मण सोचता है कि ये भरत जरूर राम को मारने के लिए आ रहा होगा ताकि अपनी जो राज-पकड़ है, पूरी कर ले। और फिर वह कहता है कि ये भरत यहां पहुंचने के पहले ही मैं इसको मौत के घाट उतार दूंगा।
और फिर रामचंद्र उसको समझाते हैं। रामचंद्र कहते हैं कि, “क्या तुम्हें याद नहीं है कि भरत का जो मुझ पर प्रेम है, तुम्हारा जितना प्रेम है उतना ही प्रेम है। तो अगर किसी कारण से तुम जो जंगल की तपस्या से पीड़ित हो गए हो और उसके कारण तुम अपना क्रोध भरत पे निकाल रहे हो, तो फिर जब भरत आएगा तो मैं भरत को बोलूंगा कि वो मेरे साथ रहे और तुम जाके राजा बन सकते हो।” तो उस तरह जब भगवान बोलते हैं तो लक्ष्मण शांत हो जाते हैं।
पर जब बाद में भरत निवेदन करते हैं, फूट-फूट के रो के पुकारते हैं कि “आप आ जाओ”, और बाद में प्रभु श्री रामचंद्र की पादुका लेकर चले जाते हैं, तो फिर लक्ष्मण को बहुत ग्लानि होती है। और तभी लक्ष्मण कहते हैं कि पहले जब उनको बहुत क्रोध आता है भरत के प्रति, उसके प्रति वो खेद व्यक्त करते हैं। वो कहते हैं कि “मैं इतना क्रोधित क्यों हो जाता हूँ?” तो फिर प्रभु श्री रामचंद्र बड़े भाई हैं, तो उनके कंधे पे हाथ रखते हैं और कहते हैं कि “लक्ष्मण तुम भावुक हो, तुम भावुक हो।”
तो फिर लक्ष्मण सोचने लगते हैं। लक्ष्मण कहते हैं, “क्या भावुक होना बुरी बात है? क्या भावनाएं बुरी हैं?” तो प्रभु श्री रामचंद्र कहते हैं कि, “नहीं, भावनाएं बुरी नहीं हैं, भावनाएं तो जीवन का अलंकार हैं। अगर भावनाएं नहीं होंगी तो जीवन पूरा नीरस हो जाएगा। पर हमें हमारी भावनाओं को इस तरह से जागृत करना है कि वो हमें भगवान की ओर ले जाएं, धर्म की ओर ले जाएं, ना कि धर्म से दूर ले जाएं।”
भक्ति और आध्यात्मिक भावनाएं
तो भक्ति की विशेषता क्या है? कि भावनाओं के द्वारा हम भगवान के करीब जा सकते हैं। और भौतिक जगत में जो भावनाएं आती हैं, भावनाओं को प्रकट करने के लिए, अनुभव करने के लिए लोग अलग-अलग प्रकार की योजना बनाते हैं, जैसे टीवी (TV) है, मूवीज (Movies) हैं। उससे क्या है, लोग कुछ भावनाएं महसूस करना चाहते हैं और उसके द्वारा कुछ अनुभव करना चाहते हैं, कुछ आनंद प्राप्त करना चाहते हैं।
पर यह जो आध्यात्मिक भावनाएं हैं, हमें भगवान के और करीब ले जाती हैं। और भक्ति की यही विशेषता है कि हमें भगवान के और करीब भावनाओं के द्वारा ले जाती है। भावनाओं के द्वारा ले जाने का मतलब यह नहीं है कि हम मनमाने पद्धति से भावनाओं को प्रकट करें। नहीं, भक्ति की विधि का पालन करने से स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक भावनाएं हृदय में जागृत हो जाती हैं।
तो जो नव वर्ष का प्रसंग जो होता है, भावनात्मक दृष्टि से देखेंगे तो हम इसको समझ सकते हैं कि यह एक और मौका है कि हम हमारे आध्यात्मिक जीवन में, जो आध्यात्मिक भावनाओं के अनुभव की प्रगति में, अग्रसर होने के लिए एक और प्रेरणा के रूप में ले सकते हैं।
एक महान वैष्णव संत हैं, उन्होंने एक प्रख्यात ग्रंथ लिखा है ‘चैतन्य चरितामृत’, जिसे श्रील प्रभुपाद जी ने भाषांतरित किया। उसके अलावा उन्होंने और अन्य ग्रंथ भी लिखे हैं। तो उनमें से भगवान कृष्ण की बहुत अंतरंग लीलाओं का वर्णन करने वाला एक ग्रंथ है ‘गोविंद लीलामृत’। और इस गोविंद लीलामृत में वर्णन करते हैं कि भगवान की क्या विशेषता है कि उनके संबंध में हर एक जो चीज है वह बहुत आकर्षक है। वह हमेशा नई लगती है। तो उनकी जो कांति है वह हमेशा नई है। किस प्रकार से नई है? जैसे नया बादल जब आता है आसमान में तो जिस तरह से वह आकर्षक लगता है, उसी प्रकार की उनकी कांति है, भगवान की कांति है।
शास्त्र और सर्वोच्च खजाना
तो वेदांत सूत्र जो बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है वैदिक ग्रंथों में, उसमें एक विश्लेषण आता है कि ये आध्यात्मिक ज्ञान का फायदा क्या है? बहुत बार लोग बोलते हैं कि आप जाके मंदिर में आते हो, भक्ति करते हो, जप करते हो तो उसका प्रैक्टिकल (Practical) फायदा क्या है? क्या मिलने वाला है उससे? तो लोग सोचते हैं कि जो भी ज्ञान हो, उसका प्रैक्टिकल फायदा होना चाहिए। तो मान लेंगे कि अगर भूख लगी है तो फिर आप खाना खाओ, ये व्यावहारिक ज्ञान है।
क्या आध्यात्मिक ज्ञान उस प्रकार से है? जैसे कोई व्यक्ति है, उसको बताते हैं कि आपके ही घर में, घर के आंगन में जमीन के अंदर एक बहुत मूल्यवान खजाना है। तो अगर ये ज्ञान दे रहा है तो ये ज्ञान इसमें कुछ व्यावहारिक क्या है? जाके मुझे वहां खजाना निकालना चाहिए और खजाना निकालूंगा तो मैं धनी बन जाऊंगा। तो ये जो ज्ञान है, आध्यात्मिक शास्त्रों में क्या ज्ञान बताया गया है? कि हम सबके हृदय में ही जो सर्वोच्च खजाना है, वह एक खजाना है भगवान और भगवान के प्रति प्रेम।
और जो बुद्धिमान व्यक्ति जब उसे समझता है कि भगवान कितने आकर्षक हैं, भगवान कितने प्रेमपूर्ण हैं, भगवान कितने करुणामयी हैं, तो वो समझ जाता है कि तुरंत मुझे भगवान के संबंध में जुड़ना चाहिए। और उस संबंध में जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंद है, वही जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। क्योंकि कोई भौतिक खजाना प्राप्त भी कर लेंगे तो वो केवल एक जीवन भर तक रहेगा, पर यह भक्ति का खजाना है, वह प्राप्त कर लेंगे तो अनंत काल तक रहेगा, यह सनातन काल तक रहेगा। तो इसलिए शास्त्र का ज्ञान है, वह हमें बताता है कैसे भगवान सर्वाकर्षक हैं, भगवान सबसे बड़ा खजाना हैं हमारे लिए। और यह हम देखते हैं सब शास्त्रों में।
महाभारत का युद्ध: भगवान ही असली मार्गदर्शन
महाभारत के युद्ध के शुरुआत में जब दुर्योधन और अर्जुन को चुनाव करना होता है तो दुर्योधन क्या चुनता है? वह सेना चुन लेता है। वह सोचता है कि सेना मूल्यवान है। पर जब ऐसे ही युद्ध होता है तो पता चलता है कि कैसे भगवान सबसे मूल्यवान हैं। क्यों भगवान मूल्यवान हैं? क्योंकि भगवान हृदय से, हृदय के अंदर से और बाहर सारथी के रूप में दोनों पद्धतियों से वे अर्जुन का मार्गदर्शन करते हैं।
तो हम महाभारत से एक प्रसंग के बारे में चर्चा करेंगे जिसमें भगवान कैसे हमेशा अपने भक्त का मार्गदर्शन करते हैं। पिछले बार मैंने उस प्रसंग का एक किस्सा बताया था कि जब १३वें दिन युद्ध के अर्जुन ने व्रत लिया कि मैं जयद्रथ का वध करूँगा। पिछले दिन अभिमन्यु का षड्यंत्र से वध किया गया था तो उसके बदले के रूप में व्रत लिया कि मैं कल या तो जयद्रथ का वध करूँगा या मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश कर लूँगा।
तो जब इस तरह से व्रत लिया तो उसके पहले सारे जो पांडव, उनके पक्ष के सारे योद्धा और सैनिक बड़े उद्विग्न थे, उदास थे, खिन्न थे। क्योंकि अभिमन्यु सोलह साल का बालक था पर सबका बहुत प्रिय था और बहुत वीर था और वो सब दुखी थे उसकी मृत्यु से। और, और भी दुखी थे कि हम उसको बचाने के लिए कुछ नहीं कर पाए। और जब अर्जुन लौट के आये थे युद्ध करके तो फिर कोई भी अर्जुन से अपनी दृष्टि मिला नहीं रहे थे, कि अर्जुन को कैसे बताया जाए, क्या अर्जुन की बाद में प्रतिक्रिया होगी। सब लोग शर्मिंदा थे।
तो युधिष्ठिर महाराज ने बड़े मुश्किल से फिर अर्जुन को बताया जब अर्जुन ने प्रवेश किया पंडाल में। वो पद्धति क्या थी कि रोज युद्ध होने के बाद शाम को सारे योद्धा युद्ध के पंडाल में मिलते थे और उस दिन के युद्ध की चर्चा करते थे और अगले दिन के युद्ध के लिए योजना बनाते थे। तो उस पंडाल में हर एक योद्धा के लिए एक आसन था। और जब अर्जुन लौट के आ रहे थे तो अर्जुन ने देखा कि कोई उनसे आँख नहीं मिला रहा है, तो उन्हें डर लगने लग गया।
तो अर्जुन ने सोचा, “मैंने सुना था युद्ध में, मैं इतना मग्न था कि मैंने उसके बारे में विचार नहीं किया। मैंने सुना था कि आज द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह लगाया था। तो अगर चक्रव्यूह लगाया था तो मेरे और कृष्ण के अलावा हमारे पक्ष में सिर्फ अभिमन्यु को पता है। तो क्या अभिमन्यु को भेजा गया था?” तो चिंता हो रही थी। और जब अर्जुन ने पंडाल में प्रवेश किया तो सब की ओर देखा, तुरंत उनकी आँखें अभिमन्यु के आसन की ओर गईं और वो आसन खाली था।
और मानो अर्जुन का हृदय थम गया, रुक गया। और उन्होंने युधिष्ठिर महाराज की ओर देखा, युधिष्ठिर महाराज का चेहरा गिरा हुआ था और उदास लग रहे थे। और फिर जब वो युधिष्ठिर महाराज के पास गए, “तो अभिमन्यु कहाँ है?” तो जब युधिष्ठिर महाराज ने पूरा प्रसंग बताया, तभी अर्जुन गिर गए और रोने लग गए। बाद में उनका शोक क्रोध में परिवर्तित हो गया। और फिर उन्होंने व्रत लिया।
जैसे ही उन्होंने व्रत लिया तो एक व्रत से पूरा जो पांडवों के पंडाल का वातावरण था, परिवर्तित हो गया। वो सब उत्तेजित हो गए, प्रेरित हो गए, उत्साहित हो गए और सब योद्धा अपने शंख बजाने लग गए, अपने वाद्य बजाने लग गए और बड़ा उत्साही सा वातावरण हो गया।
कौरव शिविर की हलचल और जयद्रथ का भय
दूसरे पक्ष में जब दुर्योधन और सारे उनके योद्धा साथ में थे, दुर्योधन उस समय द्रोणाचार्य को शाबाशी… वो उनका अभिनंदन कर रहे थे और कह रहे थे, “कैसे करो कल आप एक और चक्रव्यूह लगा लो और कल शायद हम अर्जुन को ही पकड़ लेंगे। चक्रव्यूह में अर्जुन को पकड़ लिया तो फिर युद्ध ही खत्म हो जाएगा।” तो इस तरह से योजना कर रहे थे और तभी अचानक ये पांडवों के पंडाल से ध्वनियां आने लग गईं, बड़ी उत्तेजित ध्वनियां। वो उससे आश्चर्यचकित हो गए। दुर्योधन, दुशासन और सब एक-दूसरे की ओर देखने लग गए कि, “पांडव तो दुखी होने चाहिए, वो इतने आनंदित क्यों लग रहे हैं?”
और वो ऐसे एक-दूसरे की ओर देख रहे थे और तभी दौड़ते-दौड़ते उस पंडाल में जयद्रथ आ गया। जयद्रथ का जो चेहरा था वो कैसे भूत का… तो उसने दुर्योधन से कहा, “या तो तुम मेरे संरक्षण का आश्वासन दो मुझे, नहीं तो मैं अभी हिमालय जा रहा हूँ।” तो जैसे ही दुर्योधन ने सुना, दुर्योधन ने कहा कि, “जयद्रथ तुम चिंता मत करो, हम सारी सेना तुम्हारे संरक्षण के लिए बना देंगे। और फिर अर्जुन तुम तक पहुँच भी नहीं पाएगा। और अर्जुन पहुँच नहीं पाएगा और उसके व्रत के कारण उसकी मृत्यु हो जाएगी।”
१४वें दिन का युद्ध: द्रोणाचार्य की चुनौती
तो फिर कौरवों की जब उन्होंने रण योजना देखी तो देखा कि जो कौरवों की सेना थी वो लगभग कई दर्जन मील इतनी पीछे थी और उसके पीछे जयद्रथ को छुपा के रखा था। तो अर्जुन ने कहा, “देखो, द्रोणाचार्य ने कैसी योजना… आगे पहुँच जाऊँगा।” और द्रोणाचार्य ने सोचा था कि अर्जुन जरूर जयद्रथ के पास जाने का प्रयास करेगा। तो द्रोणाचार्य ने खुद को सेना के बिल्कुल सामने रखा था।
और जब सामने रखा था तो फिर क्या हो गया? जैसे अर्जुन जाने लग गए युद्ध की ओर, तो तभी द्रोणाचार्य ने उनको चुनौती दे दी। और क्योंकि द्रोणाचार्य अर्जुन के गुरु हैं, तो अर्जुन अपनी पूरी भीषणता से युद्ध नहीं कर रहे थे। पूरी भीषणता से युद्ध नहीं कर रहे थे और द्रोणाचार्य से प्रतिकार कर रहे थे।
तभी भगवान कुछ चौकन्ने हो गए। भगवान कुछ समझ गए कि द्रोणाचार्य की योजना क्या है, कि अर्जुन को किसी तरह से रोक लें, कि अर्जुन को पहुँचने नहीं दें। तो अर्जुन से कहा उन्होंने कि, “हे अर्जुन, तुम अगर द्रोणाचार्य से युद्ध करोगे तो सारे दिन भर युद्ध चलते रहेगा। आज तुम्हें कुछ और करना है।” जैसे ही अर्जुन ने सुना तो अर्जुन ने एक बहुत भीषण प्रहार कर दिया द्रोणाचार्य पर। जैसे ही प्रहार भीषण हो गया तो द्रोणाचार्य थोड़े आश्चर्यचकित हो गए।
और उस समय में भगवान कृष्ण ने अर्जुन का रथ तेज़ी से आगे ले लिया। और जब तक द्रोणाचार्य पुनः चौकन्ने हो गए युद्ध करने के लिए, तो अर्जुन काफी आगे चले गए थे। तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन कहाँ जा रहे हो? डर गए हो तुम? मुझसे युद्ध करो! मुझसे!” पर भगवान कृष्ण ने इतने तेज़ी से रथ ले लिया कि जब द्रोणाचार्य ने पीछे से अर्जुन की ओर तीर छोड़े तो वो तीर… तीरों की तेज़ी से अधिक तेज़ी थी कृष्ण के रथ चलाने की, और वो तीर नीचे गिर गए।
भक्ति मार्ग की बाधाएं और समाधान
तो इस तरह से कई बार, तो हम जो अच्छी चर्चा कर रहे हैं कैसे है, जब हम भक्ति में प्रगति करने का प्रयास करते हैं तो कई बार अलग-अलग प्रकार की समस्याएं आती हैं। तो अर्जुन का जयद्रथ तक पहुँचना यह एक उपमा के रूप में हम देख सकते हैं कि हम सब को भगवद धाम तक पहुँचना है। तो अर्जुन के पास जिस तरह से समय सीमित था, उसी तरह से हम सब के पास भी समय सीमित है।
तो जो नया वर्ष आ रहा है, उसका मतलब क्या है कि जो सीमित समय है वह धीरे-धीरे और घटते जा रहा है। $ आयुर्हरति वै पुंसां उद्यन्नस्तं च यन्नसौ $ तो हर दिन जब सूरज डूबता है तो हमारी आयु खत्म हो रही है।
तो कई बार हमारे जीवन में अनेक ऐसी समस्याएं होती हैं कि जिनका हल करना नामुमकिन होता है। कुछ-कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं कि उनके साथ हमें जीना होता है। तो अगर ऐसी समस्याओं का हल करने के प्रयास में लग जाएंगे तो पूरा जीवन निकल जाएगा और हम आगे चल नहीं पाएंगे। तो क्या समस्या ऐसी हो सकती है? कभी-कभी लोगों को वातावरण अच्छा नहीं लगता है कि बहुत गर्मी है, बहुत ठंडी है, बहुत बारिश है। अब जैसे भी उसके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं।
तो ऐसी कई समस्याएं होती हैं जीवन में, उसके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं। तो उसको स्वीकार करके आगे चलते रहना ही प्रगति का मार्ग है। उन समस्याओं से हम अगर युद्ध करते रहेंगे तो हम वहीं पे अटके रहेंगे। तो भौतिक जगत में कई बार ऐसी चीज़ें होती हैं कि उनको परिवर्तन करना नामुमकिन होता है।
तो जैसे भगवान ने अर्जुन को बता दिया कि, “अगर इस समय में तुम द्रोणाचार्य से युद्ध में लग जाओगे, तुम फंस जाओगे और तुम आगे जा नहीं पाओगे।” और फिर तेज़ी से अर्जुन आगे जा रहे थे। और उस समय अर्जुन इस तरह से युद्ध कर रहे थे कि कोई भी उनका सामना नहीं कर पा रहा था। कोई भी उनका सामना नहीं कर पा रहा था।
अर्जुन और सुदक्षिण का युद्ध
तभी एक कंबोज राज्य का राजकुमार आता है सुदक्षिण नाम का। और सुदक्षिण, वो महा योद्धा था। और एकाएक जहाँ भी अर्जुन तीर चला रहे थे, जो सेना की जो दीवार थी, मान लीजिए वो दीवार टूट के गिर रही थी। जैसे अर्जुन के तीर जा रहे थे, तीरों से वो दीवार टूट रही थी और उस टूटी हुई दीवार से कृष्ण अर्जुन को आगे ले जा रहे थे।
तो ऐसी दीवार टूटते हुए जा रहे थे और तभी एकाएक सुदक्षिण बीच में आ गया। जो इस प्रकार की दीवार टूट न सके और केवल न टूट सके, सुदक्षिण ने कई तीरों का प्रहार किया। और ऐसा भीषण तीरों का प्रहार किया कि अर्जुन एक तीर से गिरके कुछ क्षणों के लिए लगभग बेहोश हो गए। और सुदक्षिण ने विजयघोष किया।
तभी अर्जुन तुरंत उठ गए और फिर क्रोधित होकर अर्जुन ने तीरों का प्रहार चालू कर दिया। तो सुदक्षिण और अर्जुन में बहुत ही भीषण युद्ध हुआ। सुदक्षिण ये सोच रहा था कि, “इस दिन को मैं… अर्जुन को रोक के मेरी ख्याति को प्रस्थापित करूँगा।” पर उस समय अर्जुन का जो दृढ़ संकल्प इतना था कि उन्होंने सुदक्षिण को पूरा हतप्रभ कर दिया और उसको फिर मार के आगे जाने लग गए।
कृतवर्मा से भावनात्मक युद्ध
जब आगे जाने लग गए तेज़ी से, तो उस समय इस तरह से जा रहे थे वो, अर्जुन बहुत आगे जा रहे थे, पर फिर भी बहुत दूर जाना था। कई मील का अंतर था और मील भर दीवारें थीं। तभी जो दो राजकुमार थे, साविंद (विंद) और अनुविंद नाम के दोनों राजा थे। वो दोनों एक साथ अर्जुन पर आक्रमण कर दिए। तो जो अर्जुन के साथ योद्धा जा रहे थे, वो योद्धा पीछे रह गए थे। और अर्जुन इतने तेज़ जा रहे थे क्योंकि अर्जुन के जो सारथी थे कृष्ण, वो अद्वितीय थे, उनके समान कोई और सारथी था ही नहीं। तो इसलिए कोई उनके साथ नहीं रह रहा था।
और जो युद्ध हुआ था, उस समय जो यदुवंशी थे, यदुवंश से एक योद्धा था, यदुवंश की जो सेना थी, द्वारका की सेना थी, वो कौरवों के पक्ष से आई थी। और वो जो सेना का सेनापति था, जो कृतवर्मा था, वह भी कौरवों के पक्ष से आ गया था। तो विंद और अनुविंद से युद्ध करने के पहले कृतवर्मा से युद्ध हो गया।
अभी कृतवर्मा, यह अर्जुन का मित्र था। कृतवर्मा जो था, ये भगवान कृष्ण का रिश्तेदार था, यदुवंश का ही था। तो यह उस समय एक बहुत ही भावनात्मक युद्ध हो गया था। न केवल क्षत्रिय थे, वह क्षत्रिय युद्ध कर रहे हैं, पर साथ-साथ जिस तरह से भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य ये दुर्योधन के पक्ष से युद्ध करना नहीं चाहते थे, पर परिस्थिति से विवश होकर वो युद्ध कर रहे थे, कृतवर्मा भी उसी तरह से परिस्थिति से विवश होकर युद्ध कर रहा था।
भीम का रौद्र रूप और धृतराष्ट्र की मूर्छा
जैसे ही दुर्योधन के भाई कौरव भीम के सामने आ गए, तो भीम अब तक धनुष बाण से युद्ध कर रहे थे। तुरंत धनुष बाण रख दिया, अपनी गदा उठा ली और रथ से कूद गए। और रथ से कूद के कौरवों के पक्ष में चले गए और कौरवों की सेना में जाकर अपनी गदा घुमाने लग गए। और कर्ण की आँखों के सामने ही जो अनेक-अनेक कौरव थे, उन सबका एक-एक करके वध करने लग गए। और कर्ण देख रहा था, कर्ण की आँखों के सामने कुछ ही समय में तीस कौरवों का वध भीम ने कर दिया।
और उधर हस्तिनापुर में जब संजय ये सारा वार्तालाप सुना रहे थे धृतराष्ट्र को, तो ये सुनके धृतराष्ट्र बेहोश हो गए। और बेहोश हो गए, गिर गए। और जब धृतराष्ट्र होश में आ गए तो उन्हें लग रहा था, “क्या, क्या ये तो शायद बुरा सपना हुआ कि तीस पुत्रों की मृत्यु हो गई?” पर वो बुरा सपना नहीं है, वो सत्य है।
दुर्योधन की निराशा और पश्चाताप
और एक और सत्य संजय बता रहे थे कि न केवल भीम ने इतने सारे पुत्रों का वध कर दिया है, बल्कि अर्जुन अभी जयद्रथ के बहुत पास में पहुँच गए हैं। इतने पास में पहुँच गए हैं कि अभी कुछ ही समय में ये युद्ध निर्णायक दौर में आ जाएगा। तो उससे वो और चिंतित हो गए।
और इधर न केवल भीम ने इतने सारे पुत्रों का वध कर दिया, पर साथ-साथ जब कर्ण युद्ध कर रहा था, कर्ण को घायल कर दिया और कर्ण घायल होके अपने रथ पे निकल गए। पुनः साधारणतः योद्धाओं को लग रहा था कर्ण अर्जुन को भी हरा सकते हैं, पर यहाँ पे अर्जुन को तो छोड़ो, भीम ने हरा दिया कर्ण को। और साथ-साथ अपने तीस भाइयों का वध हो गया और साथ-साथ अर्जुन को कोई भी रोक नहीं पा रहे हैं।
यहाँ जब सोच रहे हैं, तो दुर्योधन ने अपना सिर पकड़ लिया और विवशता, क्रोध, घृणा, पश्चाताप सब भावनाएं एक लहरों के रूप में उनके हृदय में आ रही थीं। पश्चाताप इसलिए कि युद्ध शायद मुझे करना ही नहीं चाहिए था। घृणा कि ये पांडवों की इतनी शक्ति क्यों है? शोक, कि इतना सारा मेरी सेना का विध्वंस हो रहा है। और विवशता कि मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ।
और जो भीष्म पितामह ने वचन बताए थे कि कृष्ण परम पुरुषोत्तम भगवान हैं और जो अर्जुन हैं, कृष्ण नारायण हैं और अर्जुन नर हैं। और इन दोनों के सामने कोई भी युद्ध नहीं कर सकता है। वो वचन बार-बार दुर्योधन के मन में घूम रहे थे। और जब इस तरह से वचन घूम रहे थे तो दुर्योधन सोच रहा था कि, “काश मैंने वचन पहले सुन लिए होते तो इस तरह से ये विध्वंस नहीं होता।”
पर फिर भी जो दुर्योधन की ईर्ष्या थी, दुर्योधन का लोभ था, दुर्योधन की घृणा थी, वो इतनी थी कि भले ही उसकी हार बिल्कुल सामने उसको दिखाई दे रही थी, पर फिर भी…
अर्जुन का संघर्ष और कौरवों का प्रहार
उसको स्वीकार नहीं कर पा रहा था, सत्य सामने है। भगवान कहते हैं, भागवत में बताया गया है, “पश्यन्नपि न पश्यति।” पश्यन् मतलब देखना, न पश्यति मतलब न देखना। कि देखना पर न देखना, पश्यन्नपि न पश्यति। जो ऐसा भाव था, स्वीकार करने की इच्छा नहीं थी। और इस तरह से विवश होकर वो देख रहा था, क्या करे। और ऊपर आसमान की ओर देखा, तब उसने देखा कि सूरज जो है अभी सूर्यास्त के बिल्कुल पास में आ गया है।
फिर तब अचानक दुर्योधन के हृदय में आशा जागृत हो गई। उसने कहा, “शायद अभी तो सब कुछ अंत ही हो गया है, अभी एक आखिरी हम भीषण प्रयास करेंगे और भीषण प्रयास करके हम अर्जुन को रोक लेंगे।” और उसने सोचा कि कल अभिमन्यु को रोकने के लिए हमने छह योद्धा लिए थे, पर आज अर्जुन उससे बहुत बड़ा है, पिता है, अर्जुन उम्र में बड़ा है, तो हम आठ महारथियों को लेंगे। और आठ महारथियों को लेके हम अर्जुन को रोक देंगे।
और उसने सेनादेश दिया कि अभी जो अर्जुन जा रहा है, तो उसके सामने से कर्ण और अश्वत्थामा उसको रोकें। उसके बाएं बाजू से कृपाचार्य और द्रोण आक्रमण करेंगे। उसके दूसरे बाजू से, दाएं बाजू से शल्य और शकुनि आक्रमण करेंगे। और उसने कहा पीछे से मैं और दुशासन आक्रमण करेंगे। तो मैं पीछे से आऊंगा, अगर कोई घायल नहीं होने वाला था तो मैं पीछे से आऊंगा।
तो इस तरह से अर्जुन तेज़ी से जा रहे थे आगे। पर अचानक अभी तक तो एक सेना की दीवार थी, पर अभी मान लीजिए तीरों का एक बादल जैसे आ गया। और इतने तीर थे कि उससे आसमान ढक गया। और आगे जाने की बात तो दूर ही रही, आगे देख भी नहीं पा रहे थे। चारों ओर से तीर आने लग गए थे क्योंकि ये सब महायोद्धा थे, सब महारथी थे और सब साथ में आक्रमण कर रहे थे।
और अर्जुन अपनी पूरी शक्ति से प्रतिकार करने का प्रयास कर रहे थे। पूरी शक्ति से तीर चला रहे थे और इतना भीषण प्रहार हो रहा था। अर्जुन फिर भी उससे घायल नहीं हुए, अर्जुन उससे हतप्रभ नहीं हुए, पर इतने भीषण प्रहार में अभी आगे जाना नामुमकिन हो गया था। और अर्जुन जानते थे कि अभी सूर्यास्त का समय बहुत करीब आ गया है। और अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति से युद्ध किया था, और उनकी पूरी श्रद्धा थी कि मैं जरूर जीत पाऊंगा। पर जब इस तरह से तीरों का बादल चारों ओर से आने लग गया, तो अर्जुन थोड़े हताश होने लग गए थे। पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे थे पर नहीं तो देख पा रहे थे। तो उनका भाव क्या होता है कि चमत्कार जो भगवान अपनी शक्ति से कर रहे थे।
भक्ति के तीन आश्वासन: शास्त्र, भक्ति और भगवान
यह जो आखिरी प्रसंग जो है, वह बहुत महत्वपूर्ण है कि अर्जुन पूरा प्रयास कर रहे थे पर फिर भी वो पहुँच नहीं पा रहे थे जयद्रथ तक। तो उसी तरह से जब हम भक्ति करते हैं तो हम जानते हैं कि जो अंतिम समय जब आने वाला है, पर उसके बावजूद उस समय हम भगवान तक पहुँच पाएंगे कि नहीं? भगवान का स्मरण कर पाएंगे कि नहीं? इसकी क्या गारंटी है? इसका क्या आश्वासन है?
तो बलदेव विद्याभूषण इस प्रश्न का, इसी विषय पर वो विश्लेषण करते हैं, ‘गोविंद भाष्य’ के अंत में कहते हैं। वो कहते हैं कि इसके तीन आश्वासन हैं। पहला आश्वासन है शास्त्र, दूसरा आश्वासन है भक्ति, और तीसरा आश्वासन है भगवान। क्या मतलब है इसका?
शास्त्र में बताया गया है कि अगर हम जीवन भर भगवान का स्मरण करने का प्रयास करेंगे तो तभी हम अंत में ‘अंते नारायण स्मृतिः’, हम ज़रूर स्मरण कर पाएंगे।
पर दूसरा आश्वासन है वो भक्ति। भक्ति का आश्वासन मतलब क्या है? वो कहते हैं कि जब भक्त जीवन भर भक्ति में लगता है तो उससे जो मन की प्रवृत्ति होती है वो बदल जाती है। जो मन होता है धीरे-धीरे भगवान की ओर आसक्त हो जाता है। “मय्यासक्तमनाः पार्थ”, भगवान कहते हैं भगवद्गीता में कि मेरी ओर मन आसक्त हो जाता है। तो यह भक्ति की शक्ति है कि मन को भगवान की ओर ले जाती है। तो पहली बात क्या है कि शास्त्रों ने बताया इसलिए ज़रूर सत्य है। पर दूसरी बात उसमें क्या है कि भक्ति का ऐसा सामर्थ्य है कि व्यक्ति की मानसिकता को पूरी तरह से वो परिवर्तित कर देती है। जो परिवर्तित कर देने की शक्ति जो है, यह भक्ति की शक्ति अद्वितीय है। तो यह शक्ति के बारे में एक प्रसंग मैं बताऊंगा, फिर मैं भगवान के बारे में बताता हूँ।
पर तीसरा भगवान के बारे में मतलब क्या है? भगवान भक्त की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। और भक्ति की शक्ति से ही मन भगवान की ओर चला जाएगा, पर वैसे नहीं भी होगा तो भगवान स्वयं वो मन को खींचने के लिए आएंगे। तो भक्ति की शक्ति भी इतनी अद्भुत है, इसकी हम जो झलक है वह भगवान के संकीर्तन में प्राप्त कर सकते हैं। जैसे अभी हम कीर्तन करने वाले हैं कुछ समय में।
हरिनाम संकीर्तन की अद्भुत शक्ति: रूस का प्रसंग
तो वैसे विश्व भर में अभी हरिनाम संकीर्तन फैल गया है। हरिनाम संकीर्तन का एक गुण है कि बहुत ही आसानी से, बहुत ही ऊंचे स्तर के आनंद के अनुभव की उपलब्धि, अनुभव की सुविधा मिलती है। तो विश्व भर में भक्त कीर्तन करते हैं। रूस (Russia) में बहुत संख्या में भक्त हैं अभी, तो रूस में भक्त कीर्तन करते हैं।
तो इसी तरह से जब उत्सव हो रहा था, तो एक बार वोल्गा (Volga) नदी के पास में—रूस में एक बड़ी नदी है वोल्गा नाम की—उसके पास में कीर्तन चल रहा था और उस कीर्तन में बड़ा उत्साह था। तो भी उस उत्सव में अलग-अलग प्रकार के लोग अलग-अलग प्रकार के गीत गा रहे थे। जैसे अभी बाहर भौतिक संगीत चल रहा है, तो वैसे अलग-अलग प्रकार के लोग अलग गीत गा रहे थे। और भक्त जो थे, हरे कृष्ण का संगीत कर रहे थे। हरे कृष्ण का संगीत जब चल रहा था तो उस समय बहुत से लोग आकर्षित हो गए। क्योंकि बाकी सब संगीत में क्या करना था? सिर्फ सुनना था, पर हरे कृष्ण संगीत में कुछ सहभागी भी हो पा रहे थे।
तो फिर जो भक्त कीर्तन कर रहे थे, उनकी प्लान (Plan), योजना थी कि वे शाम को साढ़े छह बजे कीर्तन चालू करने वाले थे और फिर आधा-एक घंटा कीर्तन करने वाले थे। फिर साढ़े सात से साढ़े आठ बजे प्रवचन होगा, और फिर साढ़े आठ से नौ कीर्तन करेंगे और फिर बाद में प्रसादम करने वाले थे। फिर जब कीर्तन चालू हो गया तो उस समय उन्होंने पंडाल के ऊपर रशियन (Russian) भाषा में हरे कृष्ण महामंत्र का प्रिंट आउट (Print out) लगाया था ऊपर। और लोग आके गा रहे थे।
तो पारंपरिक कीर्तन की पद्धति होती है कि पहले जो कीर्तन लीड (Lead) कर रहा है वो गाता है और बाद में बाकी सब लोग गाते हैं। पर यहाँ पे यह लोग सब नए थे, उनको कुछ पता नहीं था। तो वो कीर्तन करने वाला गा रहा है या नहीं गा रहा है, वो हमेशा गाते ही जा रहे थे।
तो इसलिए ६:३० बजे कीर्तन चालू हो गया। ७ बज गया, ७:३० बज गया, जो कीर्तन करने वाले थे वो कीर्तन रोकने वाले थे। उन्होंने कीर्तन रोक दिया ताकि प्रवचन चालू कर सकें। पर उन्होंने कीर्तन रोक दिया, लेकिन लोगों ने कीर्तन चालू रखा। और वो सब इतने उत्साह से कीर्तन कर रहे थे कि वो कीर्तन का कुछ अंत ही नहीं हो रहा था। इसलिए तो फिर भक्तों ने सोचा कि सारे तत्वज्ञान का जो सार है वह तो कीर्तन ही है, इसलिए कीर्तन चालू रखते हैं।
तो अब साढ़े सात, ८, ९ बज गए। प्रवचन का समय खत्म हो गया, फिर भी लोग कीर्तन करते जा रहे थे। फिर १० बज गए, जो कीर्तन कर रहे थे भक्तों का गला सूख गया था, जो मृदंग बजा रहे थे उनकी उंगलियां दर्द कर रही थीं। पर सब लोग इतने आनंदित थे उस कीर्तन में कि वह कीर्तन चालू ही जा रहा था। फिर ११ बज गए, १२ बज गए, १ बज गए। फिर १:३० बजे जो एम्प्लीफायर (Amplifier) था, एम्प्लीफायर से धुआं आने लग गया। जब एम्प्लीफायर से धुआं आने लग गया, तब जाकर भक्त बेचैन हो गए कि अभी कीर्तन बंद करना चाहिए।
और फिर अगले दिन सुबह जब जप कर रहे थे—तो यह जो कीर्तन था उस समय जयपताका महाराज लीड कर रहे थे—तो फिर अगले दिन सुबह जब वो जप कर रहे थे, तो कुछ भक्त वहाँ… एक रशियन भक्त वहाँ पे आ गया कि कुछ लोग कल के प्रवचन के लिए आए थे, कल के कीर्तन कार्यक्रम के लिए आए थे। वो अभी आए हैं आज सुबह कुछ सवाल पूछना चाहते हैं।
तो फिर उनको बुलाया, तो एक दंपति थे, युवा दंपति थे, पुरुष और स्त्री। तो उन्होंने कहा कि, “हम यहाँ पे, हमारा अभी-अभी विवाह हुआ है और अभी हम विवाह के बाद जो हनीमून (Honeymoon) कहते हैं, उसका मज़ा करने के लिए हम यहाँ पे वोल्गा नदी के पास में आए थे। तो जो कल की रात थी वो हमारे हनीमून की सबसे अच्छी रात थी। रात भर हम कीर्तन कर रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे।”
तो फिर उन्होंने कहा कि, “पर हमारे कुछ सवाल हैं।” क्या सवाल हैं? वो बोले कि, “वास्तव में हम यह रात भर गा रहे थे, पर यह क्या गा रहे थे हमको पता नहीं है। तो क्या आप बता सकते हैं क्या गीत था वो?”
तो ये हरे कृष्ण महामंत्र की शक्ति जो है, यह ऐसी शक्ति है कि उसको भाषा, संस्कृति की कोई ज़रूरत नहीं है। भाषा और संस्कृति ये मानसिक और बौद्धिक स्तर पे होती है, पर आत्मा है आध्यात्मिक स्तर पे। आत्मा का संबंध भगवान से जो है, आध्यात्मिक स्तर पे है। तो इसलिए हरे कृष्ण महामंत्र की ध्वनि सीधे आध्यात्मिक स्तर पे कार्य करती है। तो यह भक्ति की शक्ति है, हरे कृष्ण महामंत्र जो भक्ति का प्रधान रूप है इस कलियुग में। तो भक्ति की शक्ति से क्या होता है? जो मन भौतिक इंद्रियतृप्ति में लगा हो, खींच के वह भगवान की ओर ले जाता है।
तो इसलिए यह दूसरा आश्वासन है। भक्ति की शक्ति इतनी अद्वितीय है कि अगर व्यक्ति जीवन भर भक्ति करते रहेगा तो मन अपने आप भगवान की ओर चला जाएगा।
भगवान की अलौकिक रक्षा: शार्क और भक्त का प्रसंग
और तीसरा आश्वासन जो देते हैं बलदेव विद्याभूषण, वो कहते हैं कि भगवान जो हैं वह अपने भक्त को कभी त्याग नहीं सकते हैं। तो अगर भक्त भक्ति करता है पर तीव्रता से भक्ति नहीं करता है, अपने मन को आसक्ति में बनाए रखता है, तो भक्ति की शक्ति जो है बड़ी शक्तिशाली है, पर भक्ति की शक्ति भी हमारी स्वेच्छा के खिलाफ कार्य नहीं करती है। अगर हम इच्छा नहीं कर रहे हैं भगवान की ओर आसक्ति बढ़ाने की, तो फिर भक्ति कार्य करेगी पर धीरे-धीरे कार्य करेगी।
तो अगर भक्त ज़ोरों से भक्ति नहीं कर रहा है, पर फिर भी भक्ति में लगा है, तो फिर क्या है? वो कहते हैं कि भगवान उस भक्त को त्यागेंगे नहीं। भगवान उस भक्त को अपने पास खींच लेंगे। कैसे खींचते हैं भगवान? वो अपनी अलौकिक योजना से खींच लेते हैं। कैसी योजना करेंगे उसकी कोई गारंटी नहीं है।
जब एक भक्त थे, वहाँ अमेरिका का प्रसंग है। वो मंदिर में पुजारी थे और वो अलौकिक प्रकार से आरती करते थे। पर बाद में सोचने लग गए कि ये भक्ति बड़ी कठिन है। रोज़ सुबह उठना पड़ता है, रोज़ जप करना पड़ता है और कोई इंद्रियतृप्ति नहीं है, तो ये बहुत हो गया है। तो वो सोचे कि मैं छोड़ के चला जाऊँगा।
तो वास्तव में वो जो भक्त थे, वो पहले… अमेरिका में कई लोगों को स्कीइंग (Skiing) करने का एक शौक होता है। स्कीइंग मतलब क्या? वो सागर पर एक बोट (Boat) के पीछे जो जाते हैं। तो वो भक्त सोचे कि बारह साल से वो स्कीइंग नहीं किए हैं। जबसे वो भक्ति में आ गए तो स्कीइंग नहीं किया है। तो फिर उसके पहले वो २०-२२ साल तक रोज़ स्कीइंग करते थे… रोज़ नहीं, पर जब वो नौजवान थे।
तो एक दिन वो स्कीइंग कर रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि जिस दिशा में जा रहे हैं, उसी दिशा से बराबर तेज़ी से उनके ओर ही एक शार्क (Shark) आ रहा है। शार्क क्या होगा इन हिंदी? शार्क ही होता है, जो बड़ा मानवों को खाने वाली जो मछली होती है, विशाल मछली। “तो मैं दस-बारह साल तक जो मैं स्कीइंग कर रहा था कभी शार्क नहीं आया, तो आज ही बराबर स्कीइंग कर रहा था कि शार्क कहाँ से आ गया?”
तो अभी क्या हो रहा था? क्योंकि वो बहुत समय के बाद स्कीइंग कर रहे थे। अगर किसी व्यक्ति को गाड़ी चलाने का, मोटर साइकिल या कार चलाने का बहुत शौक है, पर बहुत समय तक कार नहीं चलाया, तो गाड़ी चलाने में जो आनंद आता है कि बहुत तेज़ से गाड़ी चलाते हैं तो थोड़ा आनंद मिलता है। तो उस तरह से यह भक्त स्कीइंग कर रहे थे। तो वो स्कीइंग बहुत तेज़ से कर रहे थे उस समय, क्योंकि बहुत सालों के बाद कर रहे थे। तो वो तेज़ी से एक दिशा में जा रहे थे और बराबर उनकी ओर ही शार्क आ रहा था। वो इतने तेज़ जा रहे थे कि वो दिशा भी बदल नहीं सकते थे। अब वो क्या करेंगे?
तो जो भक्ति के संस्कार थे, वो पहले से थे। और जब भक्त होता है, तो बराबर बिना विचार किये ही उनके मुँह से नृसिंह आरती निकलने लग गई। नृसिंह आरती, “नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाद-दायिने”, अपने आप आने लग गई। और उन्होंने स्मरण भी नहीं किया, अपने आप आ गई। और बराबर वो तेज़ जा रहे थे, और क्या हुआ पता नहीं, वो शार्क अपने आप उसने अपनी दिशा बदल ली और दूसरी ओर चला गया। वो शार्क चला गया।
और क्या हुआ? भक्त समझ गया कि अभी भगवान ने मुझे बचा लिया है। और भगवान ने मुझे नृसिंह आरती याद दिला दी। तो उन्होंने अपनी स्कीइंग की दिशा बदल ली और स्कीइंग ही रोक दी और मंदिर वापस चले गए।
तो वास्तव में जब भक्तों के जीवन में ऐसे प्रसंग आ जाते हैं तो भगवान स्वयं मदद करने के लिए आ जाते हैं। और वो मदद किस तरह से करेंगे हम उसकी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। पर एक भविष्यवाणी ज़रूर कर सकते हैं कि अगर भक्त भगवान की भक्ति में लगा रहता है, तो हमें भगवान ज़रूर मदद करते हैं।
तो इसलिए यहाँ जो बलदेव विद्याभूषण कहते हैं कि जो अर्जुन के लिए भगवान ने इस तरह से किया कि सूरज को ढक लिया, तो हम अर्जुन जैसे भक्त नहीं हैं, तो हम इस तरह के चमत्कार की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। पर फिर भी जो हम भक्ति करते रहेंगे, तो भगवान का जो आश्वासन, भगवान ने शास्त्रों के द्वारा जो आश्वासन दिया है, भगवान ने भक्ति के द्वारा जो शक्ति दी है, और भगवान स्वयं हमारे हृदय में स्वयं परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं, तो इसके द्वारा जो यश है ज़रूर प्राप्त होगा हमें, उसके बारे में कोई संदेह नहीं है।
तो इसलिए जो भक्त भगवान की भक्ति में लगते हैं, तो तभी वो निसंकोच भाव से, कि अगर मैं भक्ति करते रहूँगा तो भगवान ज़रूर मेरी मदद करेंगे, यह भाव से जब भक्ति करते हैं, तो जो भी समस्याएं आएंगी, उनके परे हम जा सकते हैं।
नव वर्ष का संकल्प और भगवद्गीता की प्रार्थना
और जो नव वर्ष का प्रसंग है, हम भक्ति में कई प्रयास करते हैं, कभी असफल होते हैं। तो इस प्रसंग पे नया दृढ़ संकल्प ज़रूर से करते हैं कि मैं भक्ति में दृढ़ता से प्रयास करते रहूँगा। तो इस तरह से संकल्प लेके हम ज़रूर करेंगे नव वर्ष का। तो हम देखेंगे कि भगवान हमारे जीवन में नई प्रेरणा देंगे और इससे हम भक्ति में भगवान के और करीब आने के लिए तेज़ी से अग्रसर होते रहेंगे।
तो हम भगवान की कृपा की याचना के लिए एक प्रार्थना के साथ अंत करेंगे। ये प्रार्थना है, ‘जितान्ते स्तोत्र’ नाम का एक सुन्दर स्तोत्र है जो रामानुजाचार्य ने लिखा हुआ है। उसमें कहते हैं कैसे भगवान ही हमारे सर्वस्व हैं। कि भगवान ही हमारे पिता हैं, भगवान ही हमारे गुरु हैं, भगवान ही हमारे सर्वस्व हैं, इस भाव से हम प्रार्थना करते हैं।
तो हमारी जो भावनाएं हैं, हम देख रहे थे आज कैसे जो भावनाएं हैं, हमें भौतिक जगत की ओर ले जा सकती हैं, या भगवान की ओर ले जा सकती हैं। तो हमारा इस दुनिया में बहुत से लोगों के प्रति स्नेह होता है, हमारे रिश्तेदारों के प्रति स्नेह हो सकता है, अंत में ये आकर्षण भगवान से ही आ रहा है।
तो जो भी हमारा स्नेह इस दुनिया में अलग-अलग लोगों के लिए आ रहा है, वो सारा हम अगर भगवान की ओर एकाग्रित कर सकते हैं, तो उससे भक्ति में हम बहुत प्रगति कर सकते हैं। तो उसके लिए हम ये प्रार्थना करेंगे। तो ये जो प्रार्थना है, इस प्रार्थना का भाव क्या है? भाव ये है कि हे भगवान, आप मुझे आपकी ओर… जिस तरह से मैं अलग-अलग चीज़ों की ओर आकर्षित हो रहा हूँ, वह सब चीज़ों में जो मेरा आकर्षण है वह केवल आपकी ओर ही हो जाए, और किसी और चीज़ की ओर न रहे।
तो इस दुनिया में हम कभी लोगों की ओर आकर्षित होते हैं, धन की ओर आकर्षित होते हैं, शक्ति की ओर आकर्षित होते हैं। पर यह सब जो चीज़ें हैं, उनमें जो आकर्षण करने की शक्ति है, वह भगवान से ही आ रही है। तो यह जो श्लोक है, कृपया आप मेरे पीछे दोहराइए, उसके साथ हम अंत करते हैं। तो जितान्ते स्तोत्र का जो श्लोक है, वह अभी ब्लैकबोर्ड (Blackboard) पर नहीं है, तो थोड़ा मुश्किल है उसको रिसाइट (Recite) करना। तो उसी भाव का भगवद्गीता में एक सुन्दर श्लोक है, उसको हम रिसाइट करते हैं। कि जो भी चीज़ों का आकर्षण है वह सब भगवान से ही आ रहा है:
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं (यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं) श्रीमदूर्जितमेव वा (श्रीमदूर्जितमेव वा) तत्तदेवावगच्छ त्वं (तत्तदेवावगच्छ त्वं) मम तेजोंशसम्भवम् (मम तेजोंशसम्भवम्)
श्री कृष्ण भगवान की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्तवृंद की जय!