Gita 14.06-27 – Understanding and transcending the modes (Hindi)
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Lecture Summary
यह पाठ भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभाग योग) पर आधारित एक विस्तृत प्रवचन है, जिसमें प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज और तम) और उनके प्रभाव का बहुत ही सुंदर और व्यावहारिक विश्लेषण किया गया है।
१. प्रकृति के तीन गुण और उनका स्वरूप
भौतिक प्रकृति (माया) तीन गुणों से बनी है। ये तीनों गुण आत्मा को आवरण (ढक) लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अलग-अलग रंगों या प्रकार के चश्मे हमारी देखने की दृष्टि को प्रभावित करते हैं:
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सत्वगुण (प्रकाशमय और निर्मल):
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यह ज्ञान और सुख से बाँधता है।
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इसमें व्यक्ति को सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है, पाप या दुखों का अभाव रहता है (“प्रकाशकमनामयम्”), और आत्मिक शांति का अनुभव होता है।
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बंधन का कारण: व्यक्ति को यह अहंकार हो जाता है कि “मैं ज्ञानी हूँ, दूसरों से श्रेष्ठ हूँ और सुखी हूँ,” इस प्रकार यह ज्ञान और सुख की आसक्ति से बाँधता है (“ज्ञानसंगेन च बध्नाति सुखसंगेन च”).
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रजोगुण (काम और तृष्णा का प्रतीक):
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इसकी उत्पत्ति असीम इच्छाओं (राग) और तृष्णा से होती है (“रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्”).
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यह कर्मों की अत्यधिक आसक्ति से जीव को बाँधता है (“कर्मसंगेन बध्नाति”). व्यक्ति दिन-रात संग्रह करने, अपने परिवार, नौकरी और प्रतिष्ठा को संभालने में व्यस्त रहता है।
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तमोगुण (अज्ञान और मोह का प्रतीक):
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यह अज्ञान से उत्पन्न होता है और सभी देहधारियों को मोहित करता है (“मोहर्म सर्वदेहिनाम्”).
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बंधन का कारण: प्रमाद (पागलपन/लापरवाह), आलस्य और निद्रा (तंद्रा) के द्वारा जीव को जकड़ लेता है (“प्रमादालस्यनिद्राभिरतन्निबध्नाति भारत”).
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२. संकट के समय तीनों गुणों की प्रतिक्रिया
एक ही परिस्थिति में अलग-अलग गुणों से प्रभावित लोग अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं:
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तमोगुण वाले: भय से जड़ हो जाते हैं, कुछ समझ नहीं पाते और केवल चीखते-चिल्लाते हैं।
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रजोगुण वाले: घबराकर भागने लगते हैं, भगदड़ (Stampede) मचा देते हैं।
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सत्वगुण वाले: शांत रहकर बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेते हैं कि ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए।
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गुणातीत (इन तीनों से परे): जो इन द्वंद्वों और प्रवृत्तियों से ऊपर उठ चुके हैं।
३. गुणों की प्रेरणा और हमारे संस्कारों का प्रभाव
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हमारे मन में विचार कहाँ से आते हैं? यह पूर्वजन्म के कर्मों, बचपन के संस्कारों (Upbringing), संगति और हमारी अपनी स्वतंत्र इच्छा (Free Will) पर निर्भर करते हैं।
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मन में पड़े हुए विचार पानी की तरह हैं, और प्रकृति के तीन गुण उस ढलान या खड्डे (या गुरुत्वाकर्षण) की तरह हैं जो विचारों को एक निश्चित दिशा में बहा ले जाते हैं।
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भौतिक संस्कृति में गुणों के प्रभाव को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। अर्जुन से भी भगवान कहते हैं कि मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करता है (“प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति”). इसलिए, अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति (जैसे वर्णाश्रम के अनुसार कार्य) का उपयोग करते हुए भगवान की सेवा और साधना करना ही सही मार्ग है।
४. मरणोपरांत गुणों की गति (लॉन्ग-टर्म प्रभाव)
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सत्वगुण में मृत्यु होने पर: व्यक्ति उच्च लोक (ज्ञानवानों और देवताओं के लोक) को प्राप्त होता है (“उत्तमविदां लोकानमलांग प्रतिपद्यते”).
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रजोगुण में मृत्यु होने पर: व्यक्ति बार-बार कर्म करने वाले संसार (कर्मसंगियों) में जन्म लेता है।
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तमोगुण में मृत्यु होने पर: व्यक्ति मूढ़ योनियों (पशु, कीट आदि) या अंधकारमय योनि को प्राप्त होता है।
५. गुणों से परे कैसे जाएँ और भक्ति का मार्ग
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सात्विक फल: पवित्रता और ज्ञान।
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राजसिक फल: दुःख, चिंता और अंतहीन असंतोष।
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तामसिक फल: अज्ञान और मूर्च्छा।
इन तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त होने का एकमात्र उपाय शुद्ध भक्ति है। जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि सारे कार्य प्रकृति के गुण कर रहे हैं और वास्तविक द्रष्टा आत्मा शरीर से अलग है (अहंकार से मुक्त होकर), तब वह गुणातीत अवस्था को प्राप्त होता है।
Full Transcription
त्रिगुणातीत होने का मार्ग और भगवान की महिमा
हरे कृष्ण! हम चौदहवें अध्याय के लिए चर्चा कर रहे हैं। हमने पहले कैसे जीवात्मा प्रकृति में आता है, उसके बारे में चर्चा की और प्रकृति के गुणों के बारे में शुरुआत की थी। पिछले श्लोकों में हमने देखा था—तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्, सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्, प्रकाशकमनामयम्—प्रकाश उसमें क्या होता है? दिखता है हमें स्पष्टता से। हर जो गुण है, वह एक प्रकार से आत्मा को आवृत करता है। पर आवरण अलग-अलग प्रकार के होते हैं। जैसे अभी कुछ लोगों को आँख की बीमारी हो जाती है, तो कभी-कभी काले चश्मे पहनने को बोलते हैं, काले ग्लास होते हैं; तो उससे क्या होता है, रोशनी अंदर नहीं आती।
कभी-कभी कुछ लोगों को बोलते हैं, “अभी ऑपरेशन हुआ है, तो आपको कुछ देखना नहीं है, आप पट्टी खोल लेते हैं, पर काला आवरण होता है,” तो वो भी देख नहीं सकते और रोशनी भी अंदर नहीं आती, तो उससे आपकी आँखों का संरक्षण होता है। चश्मा होता है, उसका अलग-अलग प्रभाव होता है—पूरा काला चश्मा होगा, तो चश्मे के कारण अंधकार आ सकता है, भले ही आँखें हैं फिर भी।
और कुछ और चश्मा हो सकता है, जो थोड़ा सा अगर लाल रंग का चश्मा है, तो सब कुछ लाल-लाल दिखेगा उसमें। अगर साधारण, कुछ लोग क्या होते हैं, सिर्फ अच्छा दिखने के लिए चश्मा पहनते हैं, उसका नंबर-नंबर जीरो होता है, तो फिर उस चश्मे में कुछ ग्लास नहीं होता है, तो वैसे का वैसा दिखता है। और कुछ लोग चश्मा ऐसे पहनते हैं जिससे और अच्छा दिखे।
तो ये तीनों जो गुण हैं, ये इस प्रकार के कांच के समान हैं आत्मा की चेतना में और वह उसकी दृष्टि को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं। तो जो सत्त्वगुण में चेतना है, वह सत्त्वगुण में जो है, वह जो आवरण करता है, वह—क्योंकि ये भौतिक है, सत्त्वगुण में भौतिक ही है, इसलिए भौतिक चीजें हमको दिखाई देती हैं, पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, क्या? प्रकाशकम् और क्या? अनामयम्।
अनामयम् मतलब क्या है? पाप या दुःख। अनामयम्—पापों से दुःख आता है, तो वह अनामयम्, यानी दुःख क्या है? यह प्रकाश देता है और दुखों से मुक्त है—सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ।
तो इसको पहला जब होना है, तो अच्छा लगेगा, प्रकाश आता है इससे, निर्मल है, पर फिर भी यह बंधन ही है। तो अभी जो दूसरी पंक्ति में जो गुण बताए हैं, वह कैसे बंधन करते हैं, वह तीसरी और चौथी पंक्ति में बताए हैं। दूसरी पंक्ति में क्या था? प्रकाशकमनामयम्। तो जो प्रकाश है, उसके कारण क्या होता है? ज्ञानसंगेन चानघ।
क्योंकि जो प्रकाश होता है, सब कुछ स्पष्ट दिखता है, तो उससे व्यक्ति को लगता है कि मैं और बाकी सब लोगों से ज्ञानी हूँ, चलो, आ सकता है वह इंद्रियों के गुलाम है, मैं अनासक्त हूँ, मैं इनसे और ज्ञानी हूँ। और इस ज्ञान की भावना के कारण व्यक्ति एक स्तर से बँध जाता है, उसको लगता है कि ये तो छोटे बच्चे हैं, जो मूर्ख लोग हैं, वे दुखी हैं, पर मैं दुखी नहीं हूँ।
तो जो ज्ञान है, जो प्रकाश है, वह ज्ञान से बाँध देता है और जो अनामय है, मतलब ज्यादा पापों का फल नहीं है, उससे सुखसंगेन बद्धनाति। जो अनामय है, वह सुख से बाँध देता है। तो इस तरह से जीवात्मा सत्त्वगुण में भी बँध जाता है। कहने का भाव क्या है मुख्यपूर्ण कि यह जो गुण हैं, यह पहले भगवान का प्राथमिक परिचय कराते हैं और उसके बारे में उनके बारे में और वर्णन करेंगे।
रजोगुण और तमोगुण के लक्षण तथा बंधन
तो भी एक श्लोक में उन्होंने सत्त्वगुण का वर्णन किया, तो इसके बारे में भी रजोगुण का वर्णन करेंगे। तो यहाँ पे क्या बता रहे हैं? अभी रजोगुण के बारे में लक्षण आ रहा है। रजोगुण के बारे में यह लक्षण है—रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्।
अब यह ‘राग’ यह शब्द अर्थ है, कई ऐसा शब्द है संस्कृत में भी वह शब्द है, अंग्रेजी में, हिंदी में भी शब्द है, पर उनका अर्थ कई बदल जाता है। तो ‘राग’ का अर्थ हिंदी में क्या है? उत्साह। और संस्कृत में क्या है? आसक्ति। तो उस राग से यह राग आ जाता है, जब आसक्ति होती है, तो क्रोध भी आ जाता है—’कामात् क्रोधोऽभिजायते’।
राग आत्मकम् विद्धि, राग मतलब क्या? आसक्ति है। तृष्णासंगसमुद्भवम्। तो क्या है? राग किसके लिए है? जो चीजें मेरे पास हैं, उनसे मैं बहुत आसक्त हो रहा हूँ और जो चीजें मेरे पास नहीं हैं, उनके लिए तृष्णा है। तृष्णा मतलब क्या है? बहुत ही तीव्र इच्छा। तो इस तरह से दोनों के कारण क्या होता है—कर्मसंगेन बध्नाति।
कर्मसंगेन बंधन क्या है? जो मेरे पास है, उसको संरक्षित करने के लिए, आत्मा के लिए आठ घंटे बोलते हैं कि शरीर के लिए आठ घंटे, फिर आत्मा के लिए आठ घंटे, और फिर अपनी परिवार और नौकरी के लिए—सबको मिलाकर आठ घंटे। तो फिर वह जो है, वह इस तरह से आत्मा के लिए साधना, परिवार के लिए… आत्मा के लिए साधना, ध्यान…
अब, तमोगुण के बारे में क्या बताते हैं? प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।
प्रमाद, आलस्य, निद्रा भी… प्रमाद मतलब पागलपन, शराब के पीने से पागलपन आ सकता है, आलस्य से पागलपन आ सकता है। और आलस्य का मतलब क्या है कि व्यक्ति को कार्य करना है, जानता है करना है, पर उसको आगे नहीं कर पाता है और फिर उससे क्या सोचते हैं कि बाद में कर लेंगे। तो कभी कार्य कर नहीं पाते हैं, तो यह सब तमोगुण का लक्षण है।
और अभी इस प्रकार से अगर हम व्यक्ति को कार्य करना है, अगर कोई थिएटर में मूवी चल रहा है और थिएटर में मूवी चल रहा है, तो तभी क्या होता है अचानक को थिएटर में आग लग जाती है, यह आग लग जाएगी, तो फिर क्या करें? तो कुछ लोग हैं, वो क्या हो जाएंगे? चीज नहीं लगेंगे और सीधा दौड़ नहीं लगाएंगे। और जब चीज नहीं लगेंगे, तो क्या हो जाएगा? वो स्टैम्पिड हो जाएगा और लोग उछल देंगे, कुछ लोग हो जाएंगे और…
तो इतना डर जाएगा, कुछ लोग हैं वो बुद्धिमान हो जाएंगे, यहाँ पर एक्सिटेशन कम है, देखे जाएंगे और उससे बंद कर देखेंगे। तो जो डर के दौड़ने लगते हैं और चीखने-चिल्लाने लगते हैं, वो कौन से गुण में हैं? रजोगुण में हैं। जो इतना डर जाते हैं, कुछ कर नहीं पाते हैं, वो कौन से गुण में हैं? तमोगुण में हैं। और जो बुद्धिमान हो जाएंगे, तो क्या करना चाहते हैं, वो कौन से गुण में हैं? सत्त्वगुण में हैं।
तो क्या है? वही कारण है, पर उससे प्रतिक्रिया अलग-अलग हो रखते हैं। और जो थिएटर में नहीं जाएंगे, वो गुणातीत! अगर थिएटर में भी लोग घर में आ गया है, तो गुणातीत होना बड़ा मुश्किल हो गया है।
तीनों गुणों का संक्षेप और उनका नियंत्रण
तो सबको बाँध देता है इस तरह से—तं निबध्नाति। किस से बाँधता है यह? तो अभी भगवान हर एक गुण का एक समान पद से बता रहे हैं—तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्। तो पहले उसका लक्षण बताते हैं और उसके बाद में वो किस कार्यों उसके द्वारा बाँध देता है, वो बताते हैं।
तो अब उनका लक्षण करता है—रागात्मकम् विद्धि तृष्णा संग और वो बाँधता किस से है? कर्मसंगेन। तो इसका लक्षण क्या है? मोहनं ज्ञानम् और वो बाँधता किस से है? प्रमाद-आलस्य-निद्रा। इसलिए तं निबध्नाति।
तो इस तरह से एक गुण और वो किसको गुण जो होता है, या उसका लक्षण नहीं, वो गुण का लक्षण क्या है? लक्षण बताते हैं और फिर वो किन कारणों से बाँध देता है, वो बताते हैं। और फिर अभी बताएंगे, संक्षिप्त में सार देंगे। जब पीछे तीन श्लोक में बताया, अभी एक ही श्लोक में तीनों गुणों का सार जो है, वो एक श्लोक में बताते हैं।
तो जो पहले बताया था, सत्त्वगुण के दो लक्षण थे—सुखसंगेन, ज्ञानसंगेन। यहाँ पर एक-एक प्रधान लक्षण है—सुखसंगेन, रजः कर्मणा, और जो तमा है, जो है प्रमाद-पागलपन, ज्ञानमेव च तमा।
इसके बाद बताया गया भगवान कि यह जो तीन गुण हैं, ऐसे नहीं है कि एक व्यक्ति सत्त्वगुण में है, दूसरा रजोगुण में है, तीसरा तमोगुण में है। हो सकता है, ऐसे… कभी सत्त्व रजः और तमों को हरा देता है, कभी रजस् तमश्चा अभिभूय, कभी तमों को हरा देना, सत्त्वं भवति। तो सत्त्व में सत्त्व प्रभावी होता है। तो कभी कोई सत्त्व, रज और तम को हरा देता है, कभी रजस् तमश्चा अभिभूय, कभी तमों को हरा देना…
तो यह जीवित है या निर्जीव है? जीवित है? उनका अधिष्ठाता लेता है मन। आपसे कहता है कोई बुरी चीज करो, तो मत करो, हम कहते हैं ना? मन कहता है, आप यह करो और हमें कहने से प्रोहिबिशन मिला है कि नहीं करना चाहिए। मन कहता है, यह करो, तो क्या मन जीवित है? नहीं है।
तो इंग्लिश में सो कहते हैं, लिटरेरी डिवाइस और फिगरेटिव स्पीच। तो यह कोई चीज बतानी है, तो कोई चीज को समझाने के लिए उसको अलग-अलग प्रकार से… लिटरेरी डिवाइस मतलब जो चर्चा करते समय लिखते समय वह कुछ पद्धतियाँ होती हैं बोलने की। तो उसमें अगर मैं कल उदाहरण दिया था आपको कि कोई किसी से नाराज हो गई है, तो क्या है, वहाँ बच्चे नहीं बोल रहे हैं, पर वह भाव है, दूसरा है।
तो कभी-कभी हम किसी को डाँटना है, तो किसी ने बड़ा मूर्खता से कार्य किया है, तो क्या है, उसको सरकाज्म क्या है? क्या है हिंदी में क्या बोलते हैं? तो उसको विरोध दवल से, आप कितने दिमागी हैं! तो क्या होता है, जो बोलने का भाव है, उससे उल्टा बोलते हैं, तो क्या होता है, उससे… क्या वह बोलने की पद्धति सरकाज्म कहते हैं उसको इंग्लिश में, हिंदी में व्यंग्य। आपका हिंदी काफी अच्छा है, तो इंग्लिश में, हिंदी में, व्यंग्य रूप से बोल सकते हैं।
तो ऐसे अलग-अलग पद्धतियाँ होती हैं बोलने के, तो उनमें से एक पद्धति होती है, उसको कहते हैं पर्सोनिफिकेशन। पर्सोनिफिकेशन मतलब कि जो व्यक्ति जीवित नहीं है, जो चीज जीवित नहीं है, उसको जीवित है इस तरह से बोलना ताकि जो कहने का उद्देश्य है, वो अच्छा है और आप एक स्थिति से समझना है।
तो अगर कोई बहुत बारिश हो रही हो, जोर से तूफान आ रहा है, तो बड़ा आवाज आ रहा है, तो कुछ पेड़ गिर रहे हैं और बड़ा बारिश की आवाज आ रही है, तो ऐसा लग रहा था कि निसर्ग क्रोध से चीख रहा था। तो भी निसर्ग तो क्या है, बहुत चीख नहीं रहा है, पर वहाँ पे वो बोलने की पद्धति है।
तो ये काव्यात्मक रूप से बोलते समय तो वैसे होता है। तो जैसे मन को बोलते हैं कि मन मेरा ऐसे कर रहा है, मन वैसे कर रहा है, तो मन महसूस निरजीव है, पर उसको वो समझाने के लिए काव्यात्मक पद्धति से वैसे बोला जाता है। तो फिर वही गुणों के बारे में वैसे ही है।
और जब गुणों के बारे में इस तरह से बोला जाता है, तभी कि यह गुण कभी जीत जाता है, वो गुण कभी जीत जाता है, वो कैसे होता है? वास्तव में ये गुण क्या है? यह हमारे चेतना के चेतना में पहले जो इम्प्रेशन हुए हैं, पहले जो छवियाँ पड़ी हुई हैं, हमने पूर्वकर्म किए हैं।
यह मान लीजिए, चीजें यहाँ पर यह पानी गिर जाता है, तो यह पानी यहाँ पर गिर जाएगा, तो जिस दिशा में यह फर्शी टेढ़ी हुई है, उस दिशा में तो बराबर उस खड्डे में वो चला जाएगा पानी। दूसरी वो जहाँ पर खड्डा होगा, अब दूसरी वो चला जाएगा। तो क्या वो खड्डा जैसे हो गया है, वो पानी के लिए एक रास्ता बन गया है और उससे वो पानी चला जाता है।
वैसे ही क्या होता है? हमारे पानी विचारों को उस दिशा में जाने के लिए एक साधारण मार्ग बन जाता है। जैसे अगर एक खड्डा होगा, तो पानी को उस दिशा में जाने के लिए मार्ग बन जाता है, तो उस तरह से, जिस प्रकार से हमने पहले कार्य किए हैं, उसके अनुसार हमारे चेतना में… तो क्या होगा? वो विचार मन में आ जाएंगे। क्यों? क्योंकि क्या है, चेतना में उस प्रकार की छवियाँ हैं।
पर किसी ने कोई शराब पी है, नहीं, कोई सुंदरी में तो वो शराब की दुकान आ जाएगी, तो वो देखेगा भी तो क्या, ध्यान नहीं है, वो क्या है, वो प्रकार की छवियाँ हो गई हैं और उन छवियों के कारण विचारों को मार्गदर्शन मिल जाता है।
तो कुछ लोगों की चेतना में छवियाँ समझ रहे हैं ना? इंप्रेशन इसे कहते हैं, छाओ, तो वो उसके अनुसार आचार धारा होती है। तो यह जो छवियाँ हैं, ये अलग-अलग प्रकार की और यह तो अनंत कारण हो सकती है क्योंकि हम सबका अनुभव अलग-अलग है, पर उनकी प्रधान विभाग है वो ये तीन हैं—सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
हम देखते हैं कि कंप्यूटर के स्क्रीन पे या टीवी के स्क्रीन पे इतने सारे अनंत चित्र आ सकते हैं, पर अगर आप इलेक्ट्रॉनिक्स पढ़ोगे, तो प्रधानतः या ये होते हैं—कंप्यूटर के स्क्रीन पे सिर्फ तीन रंग आते हैं, वो RGB होते हैं, और RYB अलग जगह होते हैं—लाल, हरा, नीला या लाल, पीला और नीला। तो अगर हम कहते हैं, तो तीन रंग होते हैं, पर यह तीनों रंगों का संगम अलग-अलग मात्रा में हम करते हैं, तो फिर यह अनंत रंग प्रकट हो जाते हैं।
वास्तविकता में, अगर हम इसी कमरे में देखेंगे, तो सभी चीजों का रंग, अगर आप पेंटर्स को पूछेंगे, वो लेकर सफेद रंग में ही लगभग सौ अलग रंग होते हैं, किस दर्जे का आपको सफेद चाहिए। अगर मैं बोला मुझे पीला रंग चाहिए, तो पीले में भी सौ दर्जे हो सकते हैं। कंप्यूटर में आप देखते हैं, अगर फोटोशॉप अगर कुछ इस्तेमाल करते हैं आप, तो उसमें बहुत से रंगों की छवियाँ होती हैं।
तो क्या तीन रंगों से अनंत रंग आ सकते हैं? उस तरह से तीन गुण प्रधान हैं, पर उन तीन गुणों के मिलन से एक अलग-अलग प्रकार की मानसिकता आ सकती है। और हम सबकी मानसिकता एक अलग है, क्यों? क्योंकि हम सब पे तीन गुणों का प्रभाव अलग-अलग पद्धति से हुआ है।
तो कभी यह गुण जीता है, कभी वह गुण जीता है, या हमारा चेतना प्रभावित होता है। तो अभी हम कैसे समझ सकते हैं, कौन सा गुण जीत रहा है मेरे चेतना में? उसके लिए भगवान लक्षण बताएंगे। तो पहले तीन गुणों के साधारण लक्षण बताएंगे, पर अभी-अभी तीन श्लोक में भगवान बताएंगे कि तीन गुणों में द्वंद हो रहा है, जो संग्राम हो रहा है, तो उसमें कौन सा गुण जीत रहा है?
कर्म, संस्कार और भगवान की सेवा
यह पहले हम कार्य क्यों करते हैं? वास्तव में हमारी कार्य करने की प्रवृत्ति होती है, वह पाँच चीजों से प्रभावित होती है। सबसे पहला है कि हमारे पूर्वजन्म के कर्म, उसके कारण से कुछ बाध्यता होती है। दूसरा है कि हमारी, जो इस प्रकार से हमारा, क्या बोलते हैं इसको, आप प्रवृत्ति, जैसे हमारे माता-पिता ने हमको बचपन में किस प्रकार संस्कार दिए हैं। तीसरा है हमारा संग। इस प्रकार कई बार माता-पिता ने अच्छे संस्कार दिए होंगे, पर फिर व्यक्ति पाठशाला भी जाता है, कॉलेज भी जाता है, हॉस्टल में रहता है, तो हॉस्टल में पूरे अलग प्रकृति के लोग रहते हैं, तो उनका स्वभाव, उससे प्रकृति का प्रभाव…
पहले क्या है? पूर्वजन्म के कर्म, उससे जो स्वभाव हमें प्राप्त हुआ है। फिर हमारा… what to say the word for upbringing? बचपन के संस्कार। फिर उसके बाद में हमारा संग। उसके बाद और भी हमेशा हमारी स्वेच्छा रहती है। स्वेच्छा होगी, भले हमारा संग खराब है, कई बार हम देखते हैं हॉस्टल में, कुछ लोग होते हैं, बाकी साथ अशील चीजें कर रहे हैं, तो कुछ व्यक्ति होते हैं, पाँच चीजें जीतते हैं, स्वेच्छा है। और उसके बाद में पाँच है भगवान के कर्म।
तो क्या है? ये पहले तीन जो हो सकते हैं—पूर्वजन्म का स्वभाव, पूर्वजन्म की स्वेच्छा स्वभाव, जो हमारा बचपन का संस्कार और हमारा संग, ये पहले प्रतिकूल हो, हमारी स्वेच्छा भी तक हमारे पास है, और अब हम भक्ति प्रारंभ करते हैं, तो भगवान की शक्ति भी साथ में आती है, और कुछ संग के प्रभाव से हो जाता है।
कौन सा कार्य हमने पहली बार क्यों किया, वो प्रसंग में जाके हमें विचार करने पड़ते हैं, तब ही समझ पड़ते हैं, हम स्पर्शयोग से ऐसे समझ नहीं सकते हैं, पर महत्वपूर्ण क्या है, कि क्या हमने किया है, वो हमसे प्रभावित हुए, पर हमारे पूर्वजों के बंदी नहीं है। अभी हमारे पास, हम स्वेच्छा का उपयोग करेंगे, तब हम हमारे संस्कारों को परिवर्तित कर सकते हैं।
ठीक है, ये सिर्फ हाँ बोली, कुछ-कुछ सेवा हम कर रहे हैं, तो क्या हम गुण के अंदर प्रभाव के लिए से कर रहे हैं, या गुण के अनुसार कर रहे हैं, वो कैसे समझते हैं? हमारे चेतना होते हैं, अधिकांश रूप से बोलो होते हैं, क्या थोड़ा गुण का प्रभाव होता है, और थोड़ा सेवा का भावना नहीं होता है।
तो भौतिक संस्कृति क्या है? कि गुणों के प्रभाव को हम पूर्णतया परिहार नहीं सकते हैं। इसलिए भगवान तीसरे अध्याय में भी कहते हैं—’निग्रहः किं करिष्यति’। आप निग्रह करने से क्या फायदा कर सकते हैं? यह किसके लिए बता रहे हैं भगवान? यह हमारे वर्णाश्रम ज्ञानवान भी, ‘प्रकृतिं यान्ति भूतनि निग्रहः किं करिष्यति’ है, कि निग्रह करने से क्या होगा?
वह कहने का भाव क्या है? कि अगर व्यक्ति की ब्राह्मणी की प्रवृत्ति है, तो वह ब्राह्मणी की प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करेगा। और इस भौतिक जगत में समस्या सबकी जीवन में आने वाली है, पर वर्णाश्रम की दक्षता क्या है? कि लोगों को उस प्रकार की समस्याएँ दे, जिनको हल करना उनको अच्छा लगे।
क्या? इस प्रकार की समस्याएँ दे, जिसको हल करना उनको अच्छा लगे। क्या मतलब है? एक करोड़ रुपया रेज करना है, चंदे उसका जमा करना है, हमको ये स्कीम कर सकते हैं, वो स्कीम कर सकते हैं, हम वो कर सकते हैं, वो कर सकते हैं। तो उसको अच्छा लगे, “हाँ, मैं कुछ कार्य करना हूँ, कुछ करना है मुझे, करने को मिल गया सेवा।”
अगर… क्या नहीं, महाभारत में, कहीं श्लोक आता है, कि जो व्यक्ति अंधा है, उसको आँखें मिल सकती है, पर जो आसक्त है, उसको कभी आँखें नहीं मिल सकती है। क्या श्लोक आप ढूँढ सकते हैं? कहाँ से लो? कहाँ हो सकता है? शायद विदुर ने धृतराष्ट्र को बोला होगा।
तो क्या है? जो व्यक्ति की प्रवृत्ति है, उसके अनुसार उसको कार्य देना, जहाँ वर्णाश्रम की एक्सपर्टीज, दक्षता है। तो इसलिए हमारे गुणों को हम पूर्णतया त्याग नहीं सकते हैं, हमारे गुणों का एक सर्टेन, एक वर्तुम है, और जो भगवान की सेवा का दूसरा एक वर्तुम है, तो यह दोनों में कहाँ ओवरलैपिंग हो रहा है, वो एक ओवरलैपिंग है, दोनों में संबंध…
दोनों कहाँ मिल रहे हैं? तो जो मेरे गुणों के अनुसार भी है, और जो भगवान की सेवा के लिए भी हो सकते हैं, तो दोनों जहाँ मिलते हैं, वहाँ पर हम कार्य करेंगे, तो हम प्रसन्नता से भक्ति कर सकते हैं।
तो अगर हमारे में संबंध में क्या होगा? वो तुरंत पता नहीं चलता है, कुछ-कुछ भक्ति कर भी रहे हैं, तो हमें देखना है कि, जो सेवा करने की अपार्चुनिटी को मुझे करनी चाहिए, पर साथ-साथ मुझे भी देखना चाहिए, कि मेरी प्रवृत्ति कहाँ है, क्या करने के लिए मुझे रुचि मिलती है, और धीरे-धीरे से साल जाएंगे, तो उसके अनुसार पता चलेगा, कि हाँ, ये सेवा मुझे करने की प्रेरणा मिलती है, ये सेवा मैं अधिक करूँगा, और उस प्रकार से हमें, हमारे गुणों को त्यागना नहीं है।
सेवा में संतुलन और गुणों के प्रभाव से परे जाना
पर अभी क्या होता है? जो वैश्य प्रवृत्ति का व्यक्ति है, उसको ऐसा भी प्रभाव हो सकता है, कि वो उसको कहा है, शास्त्रों के अध्ययन में भी रुचि आ जाएगा, पर साथ-साथ सिर्फ अध्ययन नहीं करना है, आपको साधना नहीं करना है, आपको भक्ति भी करनी है, तो उसके साथ हमारे गुणों के अनुसार सेवा करते हैं और साथ-साथ साधना करते हैं।
तो इसलिए गुणों का प्रभाव इतना नहीं होना चाहिए, कि हमारी भक्ति की विधि है, भक्ति की साधना है, उससे दूर चले जाए। और जहाँ तक हम जो सेवा कर रहे हैं, उसमें गुणों का प्रभाव हो रहा है, तो वो क्या होता है? वो धीरे-धीरे कम होता है। हमारा सबसे नहीं होना क्या है? सेवा में लगे रहे हैं, नाजी से क्या होता है कि प्रभुपाद इतनी बड़ी इंटरनेशनल संस्था चला रहे थे, पर प्रभुपाद जब भी कोई इनसे मिलता था, तो कभी किसी को लगता नहीं था कि प्रभुपाद धारी मिले कि प्रभुपाद यहाँ तक था ना कि प्रभुपाद का अगर किसी को साइन करना है किसी लेटर पे या चेक पे तो प्रभुपाद जी का एक पेन का केस होना था और अगर पेन इस केस के अंदर होता था, तो केस को खोलते थे, फिर पेन के टोपा को खोलते थे, फिर पेन को उड़ाते…
तो प्रभुपाद जी कभी ऐसे है, बहुत हरी में हैं, जल्दी में ऐसे कभी रहता था, तो प्रभुपाद जी बिजी हैं… जो प्रभुपाद का अगर किसी को साइन करना था तो… पंखा क्या है, बहुत घूमता है, पर कहीं आता ही नहीं। तो उसी तरह से हमारा जो प्रभुपाद होता है, ये करना है, वो करना है, वो करना है, वो करना है, पर दिन के बाद क्या किया दिन है? कुछी नहीं है।
तो क्या होता है, उसके थोड़ा योजना करते हैं, प्लानिंग करते हैं, क्या होती है? ये सेवा करनी, ये सेवा करनी, ये सेवा करनी। तो प्लानिंग के लिए थोड़ा बहुत सत्त्वगुण लगता है, तो उसके क्या होता है, सत्त्वगुण आता है। और कई बार प्लानिंग के लिए करते हैं, कि प्लानिंग में, प्लांस में नहीं करते हैं, पर प्लानिंग करते हैं। प्लांस और प्लानिंग में फर्क है।
प्लांस मतलब क्या? मैं सुबह यह करूँगा, फिर उसके बाद में यह करूँगा, फिर उसके बाद में यह करूँगा। वो कभी होगा ही नहीं क्योंकि हम भगवान नहीं हैं, क्योंकि सब कुछ हमारे यज्ञ कुछ है। पर जब हम प्लानिंग करते हैं, तो थोड़ा अंतर होता है कि ये सारी सेवाएँ मुझे इस हफ्ते में करनी है, तो आज नहीं कर पाऊँगा, तो कल करूँगा, कल नहीं कर पाऊँगा, तो परसों कर पाऊँगा।
इसलिए ‘युक्ताहारविहारस्य’ जो बोलते हैं, वह क्या है? योजनाबद्धता है, नियमबद्धता है। तो हम कुछ सत्त्वगुण ला सकते हैं हमारे सेवा में, ताकि हम जो सेवा करने की प्रेरणा है, उसके कारण जो गुण में नहीं सुलझाएँ, और न कि सेवा न…
तो अभी ‘सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते’। ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत। विवृद्धी मतलब क्या? बढ़ना। जब सत्त्व बढ़ जाता है, तो उसके लक्षण क्या है? सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश… प्रकाश मतलब रोशनी। जब रोशनी होगी, तो हम मार्ग देख सकते हैं, अगर रोशनी नहीं होगी, तो मार्ग देख नहीं सकते हैं।
तो हमारे द्वार मतलब क्या है? इंद्रियाँ। तो जब इंद्रियाँ रोशनी से झाँकने मतलब क्या करना है, क्या नहीं करना है, वो समझने आता है। इंद्रियों से क्या देखना है, क्या खाना है, क्या चीज करनी है, वो हम समझ पाते हैं। नहीं तो फिर क्या आता है? जब प्रकाश नहीं है, तो मोह में फँस के लोग कार्य करते हैं, वो बाद में पछताते हैं। जब इंद्रियों में ज्ञान की रोशनी आ गई है, मतलब हम कार्य करने के पहले सोच सकते हैं, कि ये करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए, उसके बाद में हम फैसला करते हैं करना है या नहीं।
अत्यंत ज्ञान है वो विवृद्धं सत्त्वं इति उता, तो वो सत्त्वगुण है। फिर इसके बाद में—लोभः प्रवृत्तिरारंभः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥
पर जो चालू किया है, उसको पूरा नहीं कर पाते हैं। उनका कामम् आश्रित्य दुष्पूरम्। वो जो काम का आश्रित्य कभी पूरा नहीं होगा, धर्म के विधि के अनुसार नहीं रहते हैं। विवृद्धे भरतर्षभ—जो गुण बढ़ जाता है, तो विवृद्धी में इच्छा बढ़ जाती है, कोई कार्य में लग जाता है, नया कार्य, नया कार्य, नया कार्य, ऐसे करते रहते हैं।
फिर तमोगुण का लक्षण क्या है? अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनंदन॥
तो अभी ग्यारहवें, बारहवें श्लोक में भगवान ने सत्त्वगुण का लक्षण बताया था, तो क्या बताया था? सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाशः। तो यहाँ में बताया—अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
अगर उसके लक्षण बताएं, अभी सत्त्व, रज और तमोगुण के प्रभाव बताएंगे। सबसे पहले वो लॉन्ग टर्म इफ़ेक्ट। लॉन्ग टर्म मतलब क्या? बाद में दूरज, what is long term? जो लंबाई में आने वाला फल है।
पहले क्या बताएंगे कि तीन गुणों में वो गुणों के प्रभाव मूर्ति होगी, तो क्या होगा, उसका वर्णन करेंगे—श्रेयस और प्रेयस।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलां प्रतिपद्यते॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, जब सत्त्व प्रवृद्ध है, तभी क्या होगा? प्रलयं याति देहभृत्। अगर आप, व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी, तदोत्तमविदां लोकान। विदाम मतलब जो ज्ञान है, विद, विदु जो ज्ञानवान था, तत्त्ववित् जो तत्त्व जानते हैं। तो विदाम जो जानते हैं, उत्तम विदाम मतलब ये धर्म अच्छा है, उत्तम विदाम लोकान, मतलब ये स्वर्गलोक के लोग, ऊपर के लोग हैं। स्वर्गलोक और ऊपर जो तत्त्वलोक, जनलोक के लोग हैं, वहाँ पर उस सत्त्वगुण से उच्च लोग प्राप्त होगी।
इसके बाद रजोगुण और तमोगुण का क्या प्रभाव होगा, बताएंगे—रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥
कर्मों का फल और गुणों से परे जाना
सात्त्विकं निर्मलं फलं रजसस्तु फलं दुःखम्। अज्ञानं तमसो फलम्॥
सत्त्वगुण में होता है, व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, व्यक्ति सात्त्विकं निर्मलं फलं। तो उससे क्या होता है? शुद्धि कर्म होता है, व्यक्ति की शुद्धि है तो वैसे भी शुद्ध है, पर सत्त्वगुण में कार्य करता है तो और शुद्ध हो जाता है।
रजोगुण का प्रभाव क्या होता है? दुःखम् प्रधान लक्षण होता है। रजोगुण का लक्षण का प्रभाव होता है मानसिक सर्वे दुःखम्। भले ही लोग मोज कर रहे हो, पर रजोगुण में जो होता है, चिंता बहुत रहती है। तो क्या होता है? रजोगुण में इंद्रितृप्ति चाहिए और इंद्रितृप्ति क्या है? वहाँ हमारे नियंत्रण में नहीं है, नियंत्रण में नहीं है क्योंकि इंद्रितृप्ति के साधन वहाँ मुझे मिलने के नहीं, पता नहीं है, आज है, कल चले जाएंगे।
तो मैंने इंग्लिश में एक छोटी सी कविता लिखी थी कि लोग जब पार्टी करते हैं, तो चीयर्स कहते हैं, जब देखा वो कोई मुझे नहीं है शराब की तरह चीयर्स कहते हैं, तो क्या होता है? Their hearts are filled with fears. उनके हृदय, उनके जिंदगियों से जिदें हैं, Their minds are pierced by desires. उनके हृदय… तो यह जो है, दिखावा है, पर जो मुझे बोलता है तो बहुत दुःख आता है, क्लेश आता है।
और फिर—अज्ञानं तमसो फलम्। तमोगुण है तो अज्ञान में है और अज्ञान में बढ़ जाएगा उसका प्रभाव। तो प्रभुपाद ही खास करके लोग सोचते हैं, प्रभुपाद साधारणतया लोग सोचते हैं कि अभी मैं सुखी नहीं हूँ क्योंकि मैंने पैसा नहीं है, पैसा और आ जाएगा तो मैं सुखी हो जाऊँगा।
प्रभुपाद बोलते हैं, यह नहीं होगा। क्यों? क्योंकि भले यह पैसे हो सकता है, कुछ लोगों को पैसे की कमी है, पर जो है, जो मानसिकता है, यह कि पैसे के अभाव के कारण मैं दुखी हूँ, यहाँ मानसिकता है, यह एक बीमारी है। और जो पैसा प्राप्त करने से वो मानसिकता की बीमारी है, वो ठीक नहीं होने वाली है और इसलिए क्या पूरी रहेगी? और उसके आपके लिए तो देखेगा कि अब और कितना पैसा है, और कितना पैसा कैसे आएगा, और पैसा कैसे आएगा, और पैसा कैसे आएगा।
तो कभी कोई लोग पूछते हैं कि आप यार कुछ ना, यार कुछ ना करते रहते हैं, समाज में इतने सारे गरीब भूखे लोग हैं, उनके लिए आप क्या कर रहे हैं? इस तरह से। तो हम बिन्टे-बीड़ वगैरह करते हैं, फूड फॉर लाइफ है, इसको उनका।
पर उसके साथ-साथ महत्वपूर्ण यह है, ठीक है, अगर जो भूखे लोग हैं, वो पीड़ित हैं, स्वीकार कर लिया। पर क्या अन्न की प्राप्ति क्या सुधार का कारण है? नहीं। लोगों को और इतने सारे ज्ञान फायदे होते हैं, कोई-कोई बहुत से लोग बेरोजगार हैं, वो समस्या है, बेरोजगार है, ठीक है, उनको समस्या है।
पर जिनको पाया, जिनके पास आज नौकरी है, क्या लोग? जब तक भौतिक चेतना है, तब तक असंतुष्टि रहेगी। इसलिए प्रभुपाद कहते हैं कि अगर हमने सुख चाहिए, तो और पैसा कमाने से कुछ फायदा नहीं होने वाला है, हमें भक्ति करके चेतना को रजोगुण, सत्त्वगुण से ऊपर ले जाना होगा, फिर ही हम दुखों से मुक्त हो सकते हैं, नहीं तो मुक्त में ही हो पाएंगे।
फिर और लक्षण बताएंगे से, अब इसका प्रभाव एक और पत्र से बताएंगे—ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
हमारा जो गुण है अभी के, वो हमारे अगले जन्मों की पत्ति निर्धारित करते हैं। अभी गुणों के परे कैसे जाना है, उसका संक्षिप्त में उल्लेख करेंगे भगवान। आगे उसके बारे में आना सवाल मुझेगे, तो बाद में भगवान स्पष्ट करेंगे उसे।
प्रकृति के तीन गुण और गुणातीत अवस्था
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यती। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भావं सोऽधिगच्छति॥
जब व्यक्ति इस तरह देख सकता है और जब व्यक्ति इस तरह देखता है, व्यक्ति उसके बारे में क्या होता है? इस साधारण टर्म क्या लोग सकते हैं कि जो मेरे शरीर से बाहर है, वो बाहर यह है और जो अंदर है, वो अंतरंग है। साधारण से पूछते हैं, पर क्या है? यह विचारधारा भी जो है, यह शरीर, शारीरिक चेतना के आधार से साधारण है।
जब तक मैं सोचता हूँ कि मैं शरीर हूँ, तो मैं सोचता हूँ कि शरीर के अंदर जो है, वो मेरा है और वो मैं हूँ और जो शरीर के बाहर है, वो बाहर यह है। पर जब हम समझेंगे कि मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, तो फिर हम समझेंगे कि यहाँ पर द सोल इज इंटरनल टू व्हाट वी कंसीडर नॉर्मली एज इंटरनल। क्या है? आत्मा यह अंतरंग से भी अंतरंग है।
क्या है अंदर? क्या है हमारे मन है। तो शरीर की दृष्टि से मन अंदर लगता है, पर आत्मा की दृष्टि से मन बाहर है। तो इसलिए मन की कोई इच्छाएँ आ रही हैं, तो वो मेरी इच्छाएँ नहीं हैं, वो मन की इच्छाएँ हैं, वो आएगी और हो जाएगी। जब मैं इससे समझूँगा, तो मन की इच्छाएँ को मैं ‘ना’ बोल सकता हूँ। तो सिरनानिम गुणे नहीं करता रहा है, तो मैंने भाव को प्राप्त हो जाएगा। और मैंने भाव को प्राप्त क्या होगा? उसका वर्णन आगे के श्लोक में करते हैं।
तो इन तीन गुणों के बारे में क्या होता है? नहीं करते हैं… जो तीन गुण हैं, ये हमारे मन की छवियों के अलावा भी उनका स्वतंत्र प्रभाव है। जिसे मैं उदाहरण करते हैं। छवियों के साथ मैं उदाहरण क्या दिया मैंने? कि वहाँ पे जमीन में कोई खड्डा गिर गया है, तो अभी उस खड्डे के माध्यम से पानी चला जाएगा। पर पानी और खड्डा, ये तो अलग चीजें हैं। तो वह खड्डा एक मार्ग देता है जिससे कि पानी चला जाएगा।
तो उसी तरह से क्या है कि हमारे मन की छवियाँ हैं, वहाँ पहले से छवियाँ पूर्वकर्म से आ गई हैं, हमारे जो अलग-अलग प्रकार की विचारधाराएं हैं, विचार जो आते हैं मन में, वो पानी के समान हैं। पर उसके अलावा भी जब पानी किसी खड्डे में जाता है, वो क्यों जाता है? वो गुरुत्वाकर्षण के कारण जाता है। सिर्फ खड्डे और पानी से पानी के लिए चलना नहीं होता है, वो गुरुत्वाकर्षण से होता है।
तो गुरुत्वाकर्षण जैसे एक पार्श्वभूमि सत्य है, जो दिखता नहीं है, पर वह है। इस तरह से यह प्रकृति के तीन गुण हैं, वो गुरुत्वाकर्षण के समान वो एक सत्य है और वो जो है यहाँ तीन प्रकार के होते हैं। मतलब क्या कि तीनों जो है… मान लिया यहाँ पर पानी है, तीन प्रकार के खड्डे हैं, पर एक खड्डा है, तेजी से नीचे आता है, उससे धीरे-धीरे से नीचे आता है, तीसरे से बहुत ही धीरे-धीरे से नीचे आता है, लगभग उससे स्थिर हो।
तो ऐसे प्रत्येक तीन प्रकार के खड्डे हैं, यह सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण हैं। पर उन सब में क्या है? पार्श्वगुण है, वो गुरुत्वाकर्षण है। वो गुरुत्वाकर्षण क्या है? कि माया का प्रभाव है, माया का प्रभाव है। तो जो प्रकृति के तीन गुण हैं, यह तीन प्रकार के प्रधान संस्कार हैं और मतलब प्रधान छवियाँ हैं। और हमारे जो मन में विशेष छवियाँ हैं, वो तीन प्रकार की छवियों से सम्मिलित होती हैं।
पर क्या है? ये केवल हमारे मन की छवियाँ नहीं हैं, पर यह छवियाँ हमारे मन में है, पर उसी प्रकार से यह तीन इन गुणों से सब कुछ भी प्रभावित हुआ है। मतलब क्या कि मेरा मन रजोगुण से प्रभावित हुआ है, तो बाहर के कोई लोग हैं, उन्होंने रजोगुण में जो लोग हैं, उनको आकर्षित करने के लिए प्रलोभन करने के लिए वो चीजें रख दी हैं, तो फिर मेरे मन में जो लोग दिखाया, तो वो उसका करने के लिए हो जाता है।
तो मतलब ये केवल छवियाँ नहीं हैं। अगर हम और उदाहरण आया, तो ये मैग्नेटिक फोर्स जैसा है कि एक मैग्नेटिक, एक चुंबक यहाँ पर डालता है, एक चुंबक यहाँ पर डालता है, तो दोनों में आकर्षित हो जाता है। तो क्या रजो-रजोगुण की चीजों में आकर्षित हो जाता है? तो इसलिए, अब क्या है, दो चुंबक एक उसके लिए आकर्षित हो जाता है वेदी, तो वो क्यों हो रहे हैं? उससे दो चुंबक के कारण ही हो रहे हैं।
उसके अलावा एक मैग्नेटिक फोर्स, चुंबक की शक्ति है, वो पूरे सृष्टि में है, उससे से तीन गुण जो है, ये सब जगह है, देया-लिया-दी, बैकग्राउंड फोर्स में मेटल रेजिस्टेंस, वो सब जगह पर है, पर वह हमारे चेतना में जिस प्रकार के संस्कार हैं, जिस प्रकार की छवियाँ हैं, उसके अनुसार हम प्रभावित करते हैं। और जब हम प्रभावित होते हैं, उससे उस प्रकार के संस्कार भी करते हैं।
करचली सवाल है, थोड़ा टेक्निकल सवाल है, मैं आपको बाद में देते हैं, तो मैं इसका लंबा जवाब दिया मेरे वेबसाइट पे तो मैं आपको बोलता हूँ कि क्या है, किसी सवाल में होगी कि जब प्रभावित करते हैं, अगर प्रभावित करते हैं… तो अगर आप देखें तो ये दोनों हैं, कि यह आत्मा भी कामोद्दीप्त इच्छा कर सकता है और जो मन में छवियाँ हैं, वो भी कामोद्दीप्त छवियाँ हो सकती हैं, तो ये विस्तारित विषय है, पर संक्षिप्त में यहाँ पर ये दोनों हैं, छवियाँ भी है और उसके परे भी एक शक्ति भी और वो दोनों साथ कार्य करते हैं आत्मा को अलग-अलग प्रकार से बंधन लगाने के लिए ये तीनों गुणों के पड़ जाएगा व्यक्ति जो देह से संबंध है, राने गुणा गए हैं, तो तभी क्या होगा?
व्यक्ति भौतिक जेल के दुखों से पड़ जाएगा—जन्म-मृत्यु-जरा-दुःख विरहै मुच्येत अमृतमश्रुत। यह प्रगतिशील है।
भक्ति और भगवान का परम आश्रय
तो अभी हम जब भक्ति करते हैं, तो ऐसे नहीं है कि हम पूर्णतया इच्छाकर से भक्ति कर रहे हैं, पर ऐसे भी नहीं है कि हम अभक्त हैं। क्या होता है अगर हम हमारे मन की वासनाओं को देखेंगे, तो अगला वासनाओं नहीं होते हैं, पर भले कि हम कुछ सालों के लिए भक्ति कर लेते हैं, तो उसके बाद में ऐसा तो विचार आ जाएंगे, तो ऐसे विचार नहीं आ जाएंगे कि मुझे सारे विचार आ जाएंगे का स्वभाव होता है, वो कितना लीजिए आएगा, उसकी प्रभाव कम होती जाता है, और फिर धीरे-धीरे व्यक्ति शुद्ध भक्ति के उड़ाने लगता है।
इसलिए अभी हम विचार भक्ति नहीं कर सकते हैं, मतलब क्या कि हम सोलह माला जब ध्यान पूरा कर सकते हैं, तो एक गवर्नर जनरल बता रहे थे, वो एक भाई प्रभावे करते हैं, तो आप जब करते हो, आ बोले सोलह, सोलह क्या? सोलह बोलते हैं, करता है, तो क्या है, शुरुआत में सोलह माला उठ-डाऊन हिल लग सकता है, तो अभी सोलह माला इतना विश्व में ते हैं, कर लूँगा मैं, तो क्या है, सोलह माला जब भी रोज सोलह माला जब करना, ये भी एक स्तर में विचार भक्ति कि उसमें तो कोई ब्रेक नहीं आ रहा है।
फिर उसके बाद में नहीं-नहीं क्या होगा, ये सोलह माला मैं और और में कुछ चार माला ध्यान पर उठेंगे, फिर साथ अच्छा माला ध्यान पर उठेंगे, फिर और माला ध्यान पर उठेंगे, तो ये विचार भक्ति है, उसका भी धीरे-धीरे स्तर बढ़ेगा।
और—ब्र्मणो हि प्रतिष्ठाहम अमृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकांतिकस्य च॥
भगवान कहते हैं कि मैं ही ब्रह्मन का आधार हूँ, ब्रह््मणो हि प्रतिष्ठाहम्। मैं ब्रह्मन के प्रतिष्ठाहम्, मैं भगवान के प्रतिष्ठाहम्…
बन गया है, पर जब वो भक्त बनता है, तो करोपति अपना पैसा खर्च करना है, यह तो क्या है? मैं आत्मा हूँ समझ गया है, पर आत्मा के स्तर पर कार्य नहीं होता है, उसको तो करोपति तो बन गया, पर करूँगा क्या उसके साथ है, कोई पता नहीं है। मैं आत्मा हूँ, पर आत्मा तो जब उनकी भक्ति करेगा, आत्मा के स्तर पर कार्य नहीं करेगा, और इसका आपको सीकर भगवान आगे अध्याय में करेंगे।
इस तरह से भगवान ने तीन गुणों का वर्णन किया, तीन गुणों के पराजाने की विधि बताई।