Gita 15.01-14 – Understanding material existence metaphorically and philosophically (Hindi)
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के मुख्य विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है:
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संसार वृक्ष की उपमा: भौतिक जगत को एक उल्टे पीपल के वृक्ष के रूप में वर्णित किया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर (परमात्मा) और शाखाएँ नीचे की ओर हैं। वेदों के मंत्र इस वृक्ष के पत्ते हैं। इस भौतिक जगत का असली स्वरूप समझने के लिए ‘शाखा चंद्र न्याय’ का उदाहरण दिया गया है।
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विकृत प्रतिबिम्ब: यह जगत आध्यात्मिक जगत का एक विकृत प्रतिबिम्ब है, जहाँ जीवात्मा अपनी भोग की इच्छा और विकृत कल्पनाओं के कारण फँस जाता है।
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बंधन और ज्ञान चक्षु: जीव मन और पाँचों इंद्रियों के साथ प्रकृति में संघर्ष करता हुआ कर्म-बंधन में बंध जाता है। ‘असङ्गशस्त्र’ (वैराग्य रूपी कुल्हाड़ी) और भगवान के स्मरण रूपी शस्त्र से ही इस मोह के बंधन को काटा जा सकता है। सांसारिक मोह से मुक्त होकर ही परम पुरुष की शरण में जाना संभव है।
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परम धाम: भगवान का वह परम धाम स्वयं ज्योतिर्मय है, जहाँ सूर्य, चंद्र या अग्नि की कृत्रिम रोशनी की आवश्यकता नहीं होती। वहाँ पहुँचने के बाद जीव इस संसार में वापस नहीं लौटता।
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विज्ञान और अध्यात्म: विज्ञान केवल घटनाओं का वर्णन (Description) करता है, जबकि उसकी मूल व्याख्या (Explanation) और संचालन भगवान द्वारा होता है। पाचन क्रिया और शरीर की आंतरिक ऊर्जा का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि पृष्ठभूमि में सब कुछ भगवान की शक्ति से चल रहा है।
Full Transcriptions
पंद्रहवें अध्याय का परिचय और वृक्ष की उपमा
आत्मा का भौतिक जगत में बंधन और ज्ञान चक्षु
पुरुषोत्तम योग और आचार्यों के दृष्टिकोण
भौतिक जगत: एक विकृत प्रतिबिम्ब
वृक्ष और शाखा चंद्र न्याय का उदाहरण
आध्यात्मिक जगत की वास्तविकता
सकाम कर्म और संसार वृक्ष की शाखाएँ
कर्म बंधन और मनुष्य लोक
भगवान का विराट रूप और अनंत की अवधारणा
आध्यात्मिक जगत बनाम भौतिक जगत (Infinite Set Theory)
आध्यात्मिक जगत के अस्तित्व पर बहस
और जो लोग यह बता रहे थे, वे कोई साधारण लोग नहीं थे। वे उस समय के सबसे बड़े पंडित थे, संस्कृत के महान विद्वान थे। तो उन्होंने भी इसके बारे में एक बड़ी किताब लिखी है।
तो फिर इस पर एक बहुत बड़ी बहस छिड़ गई। उनका कहना था कि प्रभुपाद जी ने, क्योंकि पाश्चात्य देशों में लोगों की चेतना इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए ऐसा कहा था। उन्होंने कहा कि “हाँ, आप आध्यात्मिक जगत में वापस जा सकते हैं। आप पहले वहीं थे।” उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने ऐसा कहा। लेकिन वास्तव में, ऐसे कोई शास्त्र नहीं हैं जो यह कहते हों कि हम आध्यात्मिक जगत में थे। तो उन्होंने यह सिद्ध करने के लिए एक बड़ी किताब लिखी।
उन्होंने एक शास्त्र का उद्धरण (quote) दिया कि वैकुंठ से एक पत्ता भी नहीं गिरता है। उन्होंने कहा कि वैकुंठ से एक पत्ता भी नीचे नहीं गिरता, तो आत्मा कैसे गिर सकती है। उन्होंने ऐसी एक किताब लिखी। तो उसके बाद, जी.बी.सी. (G.B.C.) के जो बड़े विद्वान थे, उन सभी ने मिलकर इस दावे का खंडन करने के लिए एक किताब लिखी। उसका नाम था ‘अवर ओरिजिनल पोज़िशन’ (Our Original Position)।
तो, किसी समय उन्होंने यह किताब लिखी। जी.बी.सी. प्रेस ने भी यह किताब छापी है—’अवर ओरिजिनल पोज़िशन’। तो ये दो किताबें हैं। फिर जयराज महाराज ने इसके बारे में एक लेख लिखा। यह बहुत सरल है। उन्होंने लिखा, “इसे सुलझाने की कोशिश मत करो, बाहर निकलो” (Don’t figure it out, get out)। तो, इसे सुलझाने के चक्कर में मत पड़ो। अगर आप यह सब समझने जाएंगे, तो आप समझ नहीं पाएंगे। मुझे बस यही कहना है कि यहाँ से बाहर निकलो।
असङ्ग रूपी शस्त्र
तो यह क्या है? “अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।”
उन्होंने कहा कि अगर आप यह नहीं समझेंगे, तो आप कुछ नहीं समझ पाएंगे: “न रूपमस्येह तथोपलभ्यते।”
मुझे बस यही कहना है कि इस बंधन से बाहर निकलो। इससे, अब कोई कहेगा कि इतना बड़ा पेड़ है, मैं इसे कैसे काट सकता हूँ? तो आपको पूरा पेड़ नहीं काटना है। हमें केवल उस पेड़ को काटना है जो हमसे बंधा हुआ है। हमें सिर्फ अपने से बंधे हुए हिस्से को काटना है। हम सारे पेड़ों को नहीं काट सकते। लेकिन हमें उस पेड़ (बंधन) को काटना है जो हमारे साथ जुड़ा है।
और उसके लिए शस्त्र (हथियार) क्या है? ‘असङ्गशस्त्रेण’ (वैराग्य रूपी शस्त्र)। अब, शस्त्र की यह उपमा शास्त्रों में कई बार आती है। भगवद गीता में यह दो बार आती है और भागवतम् में यह एक बार आती है। भगवद गीता में शस्त्र की उपमा कहाँ आती है?
नहीं, वह उपमा नहीं है, वहाँ तो बताया जा रहा है कि कोई भी शस्त्र आत्मा को काट नहीं सकता है (नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि)। लेकिन भगवद गीता के चौथे अध्याय के 42वें श्लोक में भगवान बोलते हैं: “तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।”
यहाँ भगवान बताते हैं कि ज्ञान जो है वो एक शस्त्र (ज्ञानासि – ज्ञान रूपी तलवार) है, और उस ज्ञान के शस्त्र के द्वारा आप हृदय के अज्ञान को काटो, और फिर उठकर कार्यशील हो जाओ (उत्तिष्ठ भारत)।
ज्ञान, वैराग्य और भगवान का स्मरण
तो ज्ञान को शस्त्र के रूप में हमें बताया गया है। और यहाँ पंद्रहवें अध्याय में क्या बोला है? ‘असङ्ग’। असङ्ग मतलब वैराग्य, इसको भी एक शस्त्र के रूप में बताया गया है। भागवतम् में अगर हम जाएंगे, तो पहले स्कंध के दूसरे अध्याय के 15वें श्लोक में बताया गया है:
“यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम्। छिन्दन्ति कोविदासस्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम्॥”
वहाँ पे भगवान के स्मरण (अनुध्यासिना) को शस्त्र बताया गया है। तो अभी वास्तव में क्या शस्त्र है? क्या ज्ञान शस्त्र है, या वैराग्य शस्त्र है, या भगवान का स्मरण शस्त्र है? तो सभी सत्य हैं। क्योंकि उसी भागवतम् में अगर हम जाते हैं (पहले स्कंध के दूसरे अध्याय के 7वें श्लोक में), तो बताया गया है कि अगर भक्ति होगी:
“वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः। जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्॥”
इसका मतलब क्या है? जहाँ पर भक्ति होगी, जहाँ भगवान का स्मरण होगा, वहाँ पर ज्ञान और वैराग्य दोनों अपने आप आ जाएंगे। तो ज्ञान और वैराग्य ये दोनों भी शस्त्र हैं। पर वो दोनों शस्त्रों को पकड़ने के लिए अलग-अलग युद्ध करने जाओगे, तो उससे अच्छा है कि एक ही शस्त्र पकड़ लो, उससे दोनों अपने आप आ जाएंगे। वो एक शस्त्र क्या है? भगवान का स्मरण! भगवान का स्मरण कर लेंगे तो उससे ज्ञान भी आ जाएगा और वैराग्य भी आ जाएगा। तो इस तरह से हमारा आध्यात्मिक जीवन एक युद्ध के समान है।
‘असङ्गशस्त्रेण’, अभी यहाँ पर शस्त्र बताया गया है। पर श्रील प्रभुपाद जी जब इसका अनुवाद करते हैं, तो कई बार यहाँ पर इसके लिए वो ‘Axe’ (कुल्हाड़ी) शब्द का प्रयोग करते हैं। अब शस्त्र को कोई तलवार भी बोल सकता है। पर क्या है, अनुवाद भी हमेशा संदर्भ के अनुसार करना होता है। अगर किसी को पेड़ काटना है, तो तलवार लेकर जाने से कोई फायदा नहीं है, इसके लिए कुल्हाड़ी चाहिए। इसलिए उचित अस्त्र क्या है? कुल्हाड़ी (Axe) है। तो ‘असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’।
परम पुरुष की शरणागति
कभी-कभी मायावादी लोग कहते हैं कि “हाँ, भव-बंधन से मुक्त हो गए हैं, अब सब खत्म हो गया है।” पर हम बोलते हैं, नहीं! मुक्ति के बाद भी कुछ करना है:
“ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेवाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥”
और अभी यहाँ पे भगवान क्या कर रहे हैं? वो खुद को ‘थर्ड पर्सन’ (Third Person – अन्य पुरुष) में उल्लेख कर रहे हैं। ‘थर्ड पर्सन’ मतलब ‘मैं’, ‘तुम’ और ‘वो’। ‘मैं’ प्रथम पुरुष हो गया, ‘तुम’ द्वितीय पुरुष हो गया, और ‘वो’ तृतीय पुरुष है।
तो यहाँ पे भगवान क्या कर रहे हैं? जब भगवान ज्ञान की दृष्टि से विश्लेषण कर रहे होते हैं, तब कई बार वो परम सत्य को उल्लेखित करते समय इस ‘तृतीय पुरुष’ का इस्तेमाल करते हैं कि ‘उस पुरुष की जाकर आप शरण लो’। पर वहाँ भगवान ध्यान रखते हैं कि कोई ज्ञानी व्यक्ति सुन रहा होगा। तो क्या होता है? भगवान पहले ही बता चुके हैं: “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।”
तो उससे स्पष्ट कर रहे हैं, और आगे भी भगवान स्पष्ट करेंगे। लेकिन जब ज्ञानियों की चेतना के अनुसार बात बता रहे हैं, जिन्हें पहले से पता नहीं है कि कृष्ण ही परम सत्य हैं, तो भगवान उनके दृष्टिकोण से परम सत्य को उल्लेखित करते समय तृतीय पुरुष (Third Person) का उपयोग करते हैं।
तो जो परम सत्य है, उसकी शरण में जाओ। पर अभी भगवान बताएंगे कि शरण में कैसे जाना है? शरण में जाने के लिए क्या करना चाहिए? स्वाभाविक रूप से उसका वर्णन अगले श्लोक में आता है:
“निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।”
मान (सम्मान) का जो मोह है कि ‘मैं ये हूँ, मैं वो हूँ’, उससे मुक्त होना ही ‘निर्मान मोहा’ है। श्रील प्रभुपाद जी बोलते हैं कि शरणागति को इस तात्पर्य में बहुत सुंदर रूप से बताया गया है। संग से क्या होता है? संग से ‘मुझे यह अच्छा लगता है, वह अच्छा नहीं लगता है’ वाली भावना आती है। इससे हमें मुक्त होना है— ‘जितसङ्गदोषाः’, संग के दोष में नहीं पड़ना है।
और फिर ‘अध्यात्मनित्याः’, अगर मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, तो फिर ‘यह अच्छा है, यह बुरा है’ इस भौतिक द्वंद्व में मुझे नहीं पड़ना है। और फिर ‘विनिवृत्तकामाः’। यह बहुत महत्वपूर्ण है। काम का केवल त्याग करने को नहीं बोल रहे हैं, ‘विनिवृत्तकामाः’ कह रहे हैं।
निवृत्ति और कामवासना का त्याग
विनिवृत्त मतलब क्या? पूर्ण रूप से रिटायर (Retire) हो जाना। यह बहुत महत्वपूर्ण है, यह कैसे होता है? कामवासना तुरंत नहीं चली जाएगी। मान लीजिए किसी ने बहुत समय से कोई पालतू कुत्ता पाला है। वह कुत्ता हमेशा उसके साथ ही रहता है, वो उसका आलिंगन करता है, उसको अपने बिस्तर में सुलाता है, उससे बहुत प्रेम करता है। फिर बाद में उसे पता चलता है कि कुत्ते को रेबीज़ (Rabies) जैसी खतरनाक बीमारी हो गई है। तो अभी यह कुत्ता अगर स्पर्श करेगा तो आपको भी बीमारी हो जाएगी, इसलिए कुत्ते को दूर करो।
अब जब कुत्ते को दूर किया जाता है, तो क्या होता है? वो कुत्ता हमेशा की तरह वापस आ जाता है, कुत्ते को लगता है कि मेरा मालिक मेरे साथ खेल रहा है। वो वापस आता है, और मालिक उसे भगाता है। फिर एकदम से कुत्ता सामने आ जाता है, तो मालिक का हृदय पिघल जाता है और वो एक बार उसको प्रेम से स्पर्श कर लेता है। इससे कुत्ते को लगता है कि सब ठीक है। लेकिन जब भी कुत्ता आए, और बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना किसी संदेह के मालिक उसे दृढ़ता से दुत्कार कर भगा दे, तभी कुत्ते को समझ में आ जाएगा कि ‘मैं जब भी आऊँगा, मुझे यहाँ से ठुकराया ही जाएगा’, और फिर वो हमेशा के लिए चला जाएगा।
उसी तरह से ‘विनिवृत्तकामाः’ है। कामवासना आती है क्योंकि हमने पहले ही कामवासना को पाल रखा था। बहुत से लोग सोचते हैं कि कामवासना को बढ़ाना ही जीवन का उद्देश्य है और उसी में बड़ा आनंद है। पर जब हम समझते हैं कि कामवासना ही बंधन का कारण है, तो हम उससे दूर रहना चाहते हैं। पर जब दूर रहने का प्रयास करते हैं, तो क्या होता है? कभी-कभी हम दूर रहते हैं, पर जब कोई मौका मिल जाता है यह सोचकर कि ‘किसी को पता नहीं चलने वाला है’, तो वासना लौट आती है। इसलिए भगवान कहते हैं ‘विनिवृत्तकामाः’। निवृत्ति मतलब रिटायरमेंट (Retirement), विनिवृत्त मतलब पूर्ण और अपरिवर्तनीय निवृत्ति (Complete irreversible retirement)। अब यह नहीं चलने वाला है!
भगवान का परम धाम
अब यह परम पद क्या है, उसका वर्णन भगवान करते हैं: “न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥”
तो ‘न तद्भासयते सूर्यो’, भगवान बता रहे हैं कि उस जगत में… भगवान बहुत सुंदर और सटीक (Precise) शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। वे ऐसे नहीं बता रहे हैं कि उस जगत में सूर्य नहीं है, चंद्र नहीं है। वे बता रहे हैं कि उस जगत में रोशनी देने के लिए सूर्य की ज़रूरत नहीं है, चंद्र की ज़रूरत नहीं है, अग्नि की ज़रूरत नहीं है। मतलब वहाँ पर सब कुछ स्वयं ज्योतिर्मय (तेजवान) है।
अगर इसे प्रतीकात्मक रूप से देखते हैं, तो क्या है? दो श्लोक पहले ही बताया था कि ‘न रूपमस्येह तथोपलभ्यते’। अगर हम इस भौतिक जगत के वृक्ष का ही रूप समझ नहीं सकते, तो आध्यात्मिक जगत का रूप कैसे समझेंगे?
‘न तद्भासयते सूर्यो’ – सूर्य हमें रोशनी देता है जिससे हम आँखों से देख सकते हैं। तो इसका मतलब वह धाम हम भौतिक आँखों से नहीं देख सकते। ‘न शशाङ्को’ – आयुर्वेद में बताया गया है कि चंद्र हमारे मन का अधिष्ठाता देव है, अतः हम भौतिक मन से उसका चिंतन नहीं कर सकते। ‘न पावकः’ – अग्नि का संबंध वाणी से है (जैसे हम कहते हैं कि वह ‘तेजस्वी’ या fiery वक्ता है), अतः हम भौतिक वाणी से उसका वर्णन भी नहीं कर सकते। पर फिर भी वो सर्वाकर्षक है, सर्वोत्कृष्ट है, सर्वोच्च है, और हमें उसको प्राप्त करना है। ऐसा ही वर्णन भगवान ने पहले आत्मा के लिए भी किया था (अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्)।
अनुवाद की सटीकता और प्रासंगिकता
यहाँ पर हम श्रील प्रभुपाद जी के अनुवाद की महत्ता और सुंदरता देख सकते हैं। प्रभुपाद जी तात्पर्य में बोलते हैं कि उस आध्यात्मिक जगत में इलेक्ट्रिसिटी (Electricity – विद्युत) भी नहीं है। श्लोक में कहीं विद्युत शब्द नहीं है, तो प्रभुपाद जी इसे क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं? क्योंकि जब शास्त्र का अनुवाद किया जा रहा हो, तो दो चीज़ों को ध्यान में रखना पड़ता है: सटीकता (Precision) और प्रासंगिकता (Relevance)।
सटीकता का मतलब है सत्य को बिना किसी बदलाव के समझाना। और प्रासंगिकता का मतलब है उसे इस तरह से समझाना कि व्यक्ति उसे अपने वर्तमान जीवन से जोड़कर समझ पाए। दोनों में संतुलन होना चाहिए।
मान लीजिए मैं कहूँ कि भगवान की लीला में चैतन्य महाप्रभु सात जगहों पे एक साथ प्रकट हुए। इसे वैज्ञानिक भाषा में क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) के ‘नॉन-लोकैलिटी’ (Nonlocality) सिद्धांत से समझाया जा सकता है जहाँ मेसॉन्स (Mesons) एक साथ कई जगहों पर मौजूद होते हैं। अब अगर कोई इसका शब्दशः हिंदी अनुवाद करने बैठे, तो वह किसी को समझ नहीं आएगा। वास्तव में हमें पहले मूल बात समझनी है, और फिर उसे प्रासंगिक बनाकर समझाना है।
यहाँ मूल बात यह है कि आध्यात्मिक जगत में सब कुछ स्वयं तेजवान है, बाहरी रोशनी की ज़रूरत नहीं है। आज के समय में गगनचुंबी इमारतों (skyscrapers) में रहने वाले कई लोग सूर्य को देखते ही नहीं हैं। उनके लिए रोशनी बटन के स्विच से (इलेक्ट्रिसिटी से) आती है। इसलिए उस भाव को समझाने के लिए प्रभुपाद जी कह रहे हैं कि वहाँ इलेक्ट्रिसिटी की भी ज़रूरत नहीं है, कोई कृत्रिम रोशनी नहीं चाहिए, वहाँ सब कुछ स्वयं ज्योतिर्मान है।
जीवात्मा का भौतिक संघर्ष
और फिर आगे बता रहे हैं: ‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते’, जिसे प्राप्त कर लिया, तो वह वापस इस भौतिक जगत में नहीं आएगा। ‘तद्धाम परमं मम’, वह मेरा परम धाम है।
अब प्रश्न उठता है कि अगर वह हमारा शाश्वत धाम है, तो हम यहाँ कैसे फँस गए? पहले इसे वृक्ष के प्रतीक से बताया, अब तत्त्वज्ञान से बता रहे हैं:
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥”
ये जो जीव हैं, वो मेरे ही सनातन अंश हैं और इस जगत में फँसे हैं। क्यों? क्योंकि वे मन और पाँचों इंद्रियों के साथ प्रकृति में संघर्ष (कर्षति) कर रहे हैं। ‘ये करो इससे आनंद मिलेगा, वो करो उससे आनंद मिलेगा’— इसी चक्कर में जीवात्मा इस भव-बंधन में फँस जाता है। हम भगवान के अंश हैं, अंश रूप में रहें तो सुखी रहेंगे, पर हम अलग (apart) होकर प्रकृति का भोग करना चाहते हैं, इसलिए बँध जाते हैं।
श्रील प्रभुपाद तात्पर्य में लिखते हैं कि वैराग्य केवल भगवा वस्त्र (Saffron dress) पहनने की बात नहीं है, यह भगवान के प्रति आकर्षित होने की बात है। जीवात्मा केवल भगवा कपड़े पहनकर इस भौतिक जगत की आसक्ति को नहीं काट सकता। उसे अनासक्त होना पड़ेगा।
जीवात्मा बहुत संघर्ष और पीड़ा में है। वह शरीर कैसे बदलता है? “शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥”
जैसे हवा किसी दुर्गंध वाली जगह से गुजरती है तो प्रदूषित हो जाती है, और फूलों से गुजरती है तो सुगंधित हो जाती है। उसी तरह से, आत्मा जिस परिवेश या संगति में रहता है, वैसी ही उसकी इच्छाएं और विचार बनते हैं, और उसी के अनुसार उसे अगला शरीर प्राप्त होता है।
और इस तरह: “श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥”
जैसे हाथ में हथेली के इर्द-गिर्द पाँच उंगलियां होती हैं, वैसे ही मन के निर्देशन में पाँच इंद्रियाँ कार्य करती हैं। जीवात्मा इंद्रिय-विषयों के प्रति आकर्षित होता है, मन में भोग के विचार लाता है, और विषयों के पीछे भागता है। इस तरह वह महान कष्ट में है।
जो अज्ञानी (विमूढ़) हैं, वे यह नहीं देख पाते कि वे शरीर कैसे छोड़ते हैं या गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग कैसे करते हैं: “उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥” केवल ज्ञान के चक्षु वाले ही इस सत्य को देख पाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक पूरकता
जब आइजैक न्यूटन (Newton) से पूछा गया कि यह ऊर्जा या गुरुत्वाकर्षण कहाँ से आता है? तो उन्होंने कहा, “जो ऊर्जा दिखाई दे रही है, उसे मापने के लिए मैं एक फॉर्मूला दे सकता हूँ, लेकिन मुझे नहीं पता कि यह मूल रूप से कहाँ से आती है।” विज्ञान के अधिकांश नियम केवल यह वर्णन (Describe) करते हैं कि क्या हो रहा है, वे यह व्याख्या (Explain) नहीं कर पाते कि यह क्यों हो रहा है।
सभी ग्रह अपनी कक्षा में क्यों रहते हैं? विज्ञान कहेगा गुरुत्वाकर्षण के कारण। गुरुत्वाकर्षण क्या है? जो ग्रहों को कक्षा में रखता है! तो यह बस गोल-गोल बातें और एक फॉर्मूला है। इसका मूल उद्गम कहाँ है? यह भगवान से आता है।
इसलिए वैज्ञानिक और आध्यात्मिक बातें विरोधाभासी (Contradictory) नहीं, बल्कि पूरक (Complementary) हैं। जैसे बिलियर्ड्स (Billiards) के खेल में गेंद एक निश्चित गति और कोण (angle) से छेद (hole) में गिरती है, जिसे विज्ञान समझा सकता है। पर यह भी सच है कि उस गेंद को मारने के पीछे एक व्यक्ति की प्रतिभा (Talent) और चेतना काम कर रही थी।
परमात्मा द्वारा शरीर का पालन-पोषण
अंत में भगवान बताते हैं कि वे सिर्फ ब्रह्मांड का ही नहीं, बल्कि हमारे शरीर के पंचतत्त्वों का भी पालन-पोषण करते हैं:
“अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥”
भगवान कहते हैं कि मैं सभी प्राणियों के शरीर में वैश्वानर (पाचन अग्नि) के रूप में निवास करता हूँ, और प्राण तथा अपान वायु के साथ मिलकर भोजन पचाता हूँ।
वैज्ञानिकों को पता चला है कि कृत्रिम पाचन कोई आसान काम नहीं है। यदि हम पेट के लिए कोई कृत्रिम पाचन मशीन बनाना चाहें, तो वह कोई छोटी मशीन नहीं, बल्कि दो मील लंबी फैक्ट्रियों की श्रृंखला होगी! हम जो एक निवाला खाते हैं, उसे पचाने में अंदर इतनी ऊर्जा लगती है, जितना शारीरिक श्रम एक साधारण मनुष्य बाहर पूरे दिन में नहीं करता।
अगर किसी व्यक्ति को कृत्रिम श्वास (Ventilator) और कृत्रिम पाचन आदि पर जीवित रखना हो, तो पूरे शरीर की कार्यप्रणाली चलाने का खर्च लगभग 7 करोड़ रुपये प्रतिदिन आ सकता है! तो यह सब अंदर कौन कर रहा है? हम तो बस जीवन का आनंद ले रहे हैं, लेकिन पृष्ठभूमि (background) में यह सब भगवान कर रहे हैं। ज्ञान की दृष्टि से देखने पर, हम अपने जीवन में भगवान के इस महान योगदान को समझ सकते हैं।
हम इसके बारे में कल और चर्चा करेंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद। श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृंद की जय!